वैष्णव खण्ड · अध्याय 193
श्वेतद्वीप-मुक्त-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.193.1)
स्कन्द उवाच । स एवमुक्तोत्मविदां वरिष्ठो नारायणेनोत्तमपूरुषेण । जगाद वाक्यं जगतां गरिष्ठं तमच्युतं लोकहिताधिवासम्
skanda uvāca sa evamuktotmavidāṁ variṣṭho nārāyaṇenottamapūruṣeṇa jagāda vākyaṁ jagatāṁ gariṣṭhaṁ tamacyutaṁ lokahitādhivāsam
स्कन्द ने कहा — इस प्रकार परमपुरुष नारायण द्वारा कहे जाने पर, आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ वे नारद, लोक-कल्याण के आधार उन अच्युत से यह गम्भीर वचन बोले।
श्लोक 2 (skanda.2.193.2)
नारद उवाच । श्रुतं मया देव समं त्वयोक्तमृष्याकृतिच्छादितभूरिधाम्ना । तवैव लीला सकलेयमीश सर्वेश्वरस्येति विदामि चित्ते
nārada uvāca śrutaṁ mayā deva samaṁ tvayoktamṛṣyākṛticchāditabhūridhāmnā tavaiva līlā sakaleyamīśa sarveśvarasyeti vidāmi citte
नारद ने कहा — हे देव! जिनका विशाल तेज ऋषि के रूप में छिपा हुआ है, आपके द्वारा कहा गया सब मैंने भली भाँति सुना है। हे ईश! मैं हृदय में जानता हूँ कि यह सब सर्वेश्वर आपकी ही लीला है।
श्लोक 3 (skanda.2.193.3)
त्वद्दर्शनेनैव हि पूर्णकामो भवामि भूमन्स्वहृदीप्सितेन । तथाप्यहं तत्तव पूर्वरूपं प्रभो दिदृक्षामि हि कौतुकं मे
tvaddarśanenaiva hi pūrṇakāmo bhavāmi bhūmansvahṛdīpsitena tathāpyahaṁ tattava pūrvarūpaṁ prabho didṛkṣāmi hi kautukaṁ me
हे भूमन्! अपने हृदय से इच्छित आपके दर्शन मात्र से ही मैं पूर्णकाम हो जाता हूँ; फिर भी हे प्रभो! मुझे आपका वह पूर्व रूप देखने की उत्सुकता है।
श्लोक 4 (skanda.2.193.4)
श्रीनारायण उवाच । न तत्स्वरूपं मम दानयज्ञयोगैश्च वैदेस्तपसापि दृश्यम् । एकान्तिकैर्भक्तवरैस्तु भक्त्या ह्यनन्यया नारद दृश्यते तत्
śrīnārāyaṇa uvāca na tatsvarūpaṁ mama dānayajñayogaiśca vaidestapasāpi dṛśyam ekāntikairbhaktavaraistu bhaktyā hyananyayā nārada dṛśyate tat
श्रीनारायण ने कहा — मेरा वह स्वरूप दान, यज्ञ, योग, वेदाध्ययन अथवा तप से भी दिखाई नहीं देता; परन्तु हे नारद! वह एकान्तिक श्रेष्ठ भक्तों को अनन्य भक्ति से ही दिखाई देता है।
श्लोक 5 (skanda.2.193.5)
भक्तिस्तव त्वस्ति मयि ह्यनन्या ज्ञानं च वैराग्ययुतं स्वधर्मः । अतश्च तद्दर्शनमाप्स्यसि त्वं सुरेश्वराद्यैरपि यद्दुरापम्
bhaktistava tvasti mayi hyananyā jñānaṁ ca vairāgyayutaṁ svadharmaḥ ataśca taddarśanamāpsyasi tvaṁ sureśvarādyairapi yaddurāpam
तुम्हारी मुझमें अनन्य भक्ति है, वैराग्य से युक्त ज्ञान है, और स्वधर्म भी है; इसलिए जो देवताओं के स्वामी आदि के लिए भी दुर्लभ है, वह दर्शन तुम्हें प्राप्त होगा।
श्लोक 6 (skanda.2.193.6)
त्वदीयभक्त्याऽतितरा प्रसन्नस्त्वाज्ञापयाम्यद्य तदीक्षणाय । सितान्तरीपं व्रज तत्र तेऽयं मनोरथः सेत्स्यति विप्रवर्य
tvadīyabhaktyā'titarā prasannastvājñāpayāmyadya tadīkṣaṇāya sitāntarīpaṁ vraja tatra te'yaṁ manorathaḥ setsyati vipravarya
तुम्हारी भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न होकर मैं आज तुम्हें उस दर्शन हेतु आज्ञा देता हूँ — हे श्रेष्ठ विप्र! श्वेतद्वीप को जाओ, वहाँ तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा।
श्लोक 7 (skanda.2.193.7)
स्कन्द उवाच । श्रुत्वेति वाचं परमेष्ठिपुत्रः सोप्यर्च्चयित्वा तमृषिं पुराणम् । खमुत्पपातोत्तमयोगयुक्तस्ततोधिमेरौ सहसा निपेते
skanda uvāca śrutveti vācaṁ parameṣṭhiputraḥ sopyarccayitvā tamṛṣiṁ purāṇam khamutpapātottamayogayuktastatodhimerau sahasā nipete
स्कन्द ने कहा — यह वचन सुनकर, ब्रह्मा के पुत्र नारद ने भी उस पुरातन ऋषि की पूजा करके, उत्तम योग से युक्त होकर आकाश में उड़ान भरी, और फिर सहसा मेरु पर्वत पर उतरे।
श्लोक 8 (skanda.2.193.8)
तस्यावतस्थे च मुनिर्मुहूर्त्तमेकान्तमासाद्य गिरेः स शृंगे । आलोकयन्नुत्तरपश्चिमेन ददर्श चात्यद्भुतमन्तरीपम्
tasyāvatasthe ca munirmuhūrttamekāntamāsādya gireḥ sa śṛṁge ālokayannuttarapaścimena dadarśa cātyadbhutamantarīpam
वह मुनि उस पर्वत के शिखर पर एक एकान्त स्थान पाकर क्षणभर ठहरे; उत्तर-पश्चिम की ओर देखते हुए उन्होंने एक अत्यन्त अद्भुत द्वीप देखा।
श्लोक 9 (skanda.2.193.9)
क्षीरोदधेरुत्तरतो हि द्वीपः श्वेतः स नाम्ना प्रथितो विशालः । देदीप्यमानो विततेन सर्वतो ज्योतिश्चयेनातिसि तेन नित्यम्
kṣīrodadheruttarato hi dvīpaḥ śvetaḥ sa nāmnā prathito viśālaḥ dedīpyamāno vitatena sarvato jyotiścayenātisi tena nityam
क्षीरसागर के उत्तर में वह विशाल द्वीप है, जो 'श्वेत' नाम से प्रसिद्ध है, तथा जो चारों ओर फैले हुए अत्यन्त धवल तेजःपुंज से नित्य देदीप्यमान रहता है।
श्लोक 10 (skanda.2.193.10)
आम्रैरनेकैरसनैरशोकैराम्रातकैर्निम्बकदम्बनीपैः । बिल्वैर्मधूकैः सुरदारुभिश्च प्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैश्च
āmrairanekairasanairaśokairāmrātakairnimbakadambanīpaiḥ bilvairmadhūkaiḥ suradārubhiśca plakṣairvaṭaiḥ kiṁśukacandanaiśca
अनेक आम्र, असन, अशोक, आम्रातक, नीम, कदम्ब, नीप वृक्षों से; बिल्व, महुआ, देवदारु, प्लक्ष, वट, किंशुक तथा चन्दन वृक्षों से युक्त —
श्लोक 11 (skanda.2.193.11)
सर्ज्जैश्च शालैः पनसैस्तमालैर्मुनिद्रुमैः केतकचम्पकैश्च । कुन्दैश्च जातीसुरमल्लिकाभिद्रुमैर्वृतः पुष्पफलावनम्रैः
sarjjaiśca śālaiḥ panasaistamālairmunidrumaiḥ ketakacampakaiśca kundaiśca jātīsuramallikābhidrumairvṛtaḥ puṣpaphalāvanamraiḥ
सर्ज, साल, कटहल, तमाल, मुनि-वृक्षों, केतकी और चम्पा से; तथा कुन्द, जाती, सुन्दर मल्लिका के फूलों-फलों से झुके हुए वृक्षों से घिरा हुआ —
श्लोक 12 (skanda.2.193.12)
कल्पद्रुमाणां बहुभिश्च वृन्दैः सुवर्णरम्भाक्रमुकालिभिश्च । महद्भिरुद्यानवरैरनेकैः सरित्सरोभिर्विकचाम्बुजैश्च । हंसादिभिः पक्षिवरैः सुशब्दैर्गणैर्मृगाणां रुचिरैश्चलद्भिः
kalpadrumāṇāṁ bahubhiśca vṛndaiḥ suvarṇarambhākramukālibhiśca mahadbhirudyānavarairanekaiḥ saritsarobhirvikacāmbujaiśca haṁsādibhiḥ pakṣivaraiḥ suśabdairgaṇairmṛgāṇāṁ ruciraiścaladbhiḥ
कल्पवृक्षों के अनेक समूहों से, सुवर्ण के केले तथा सुपारी की पंक्तियों से; अनेक विशाल श्रेष्ठ उद्यानों से, खिले हुए कमलों वाली नदियों-सरोवरों से; तथा मधुर स्वर वाले हंस आदि श्रेष्ठ पक्षियों के झुंडों से और चंचल सुन्दर मृग-समूहों से भी युक्त —
श्लोक 13 (skanda.2.193.13)
सर्वेपि जीवाः किल यत्र मुक्ता वसन्ति च स्थावरजङ्गमाश्च । तं वीक्षमाणेन च तेन दृष्टा भक्तोत्तमाः श्रीपुरुषोत्तमस्य
sarvepi jīvāḥ kila yatra muktā vasanti ca sthāvarajaṅgamāśca taṁ vīkṣamāṇena ca tena dṛṣṭā bhaktottamāḥ śrīpuruṣottamasya
वहाँ निश्चय ही सभी स्थावर और जंगम मुक्त जीव निवास करते हैं; उस द्वीप को देखते हुए नारद ने श्रीपुरुषोत्तम के श्रेष्ठ भक्तों को देखा।
श्लोक 14 (skanda.2.193.14)
अतीन्द्रिया निर्गतसर्वपापा निष्यन्दहीनाश्च सुगन्धिनश्च । द्विबाहवः केपि चतुर्भुजाश्च श्वेताश्च केचिन्नवनीरदाभाः
atīndriyā nirgatasarvapāpā niṣyandahīnāśca sugandhinaśca dvibāhavaḥ kepi caturbhujāśca śvetāśca kecinnavanīradābhāḥ
वे इन्द्रियों से परे, समस्त पापों से रहित, शरीर-मल से मुक्त तथा सुगन्धित थे; कुछ दो भुजाओं वाले, कुछ चार भुजाओं वाले; कुछ श्वेत तथा कुछ नवीन मेघ के समान श्याम वर्ण के थे।
श्लोक 15 (skanda.2.193.15)
पद्मच्छदाक्षाः सममानगात्राः सुरूपदिव्यावयवाः सुसाराः । विकीर्णकेशाश्च सदा किशोरा सद्भिश्च चिह्नैर्न्निखिलैरुपेताः
padmacchadākṣāḥ samamānagātrāḥ surūpadivyāvayavāḥ susārāḥ vikīrṇakeśāśca sadā kiśorā sadbhiśca cihnairnnikhilairupetāḥ
कमल-दल के समान नेत्रों वाले, सुडौल शरीर वाले, सुन्दर दिव्य अंगों वाले तथा तेजस्वी; बिखरे हुए केशों वाले, सदा किशोर तथा समस्त सत्पुरुषों के चिह्नों से युक्त थे।
श्लोक 16 (skanda.2.193.16)
सरोजरेखाङ्कितपाणिपादाः षडूर्मिहीना मिहिरातितेजसः । सितांशुका ध्यानपराश्च सौम्याः कालोपि येभ्यो भयमेति नित्यम्
sarojarekhāṅkitapāṇipādāḥ ṣaḍūrmihīnā mihirātitejasaḥ sitāṁśukā dhyānaparāśca saumyāḥ kālopi yebhyo bhayameti nityam
उनके हाथ-पैर कमल-रेखाओं से अंकित थे, वे छहों ऊर्मियों से रहित तथा सूर्य से भी अधिक तेजस्वी थे; श्वेत वस्त्र धारण किए, ध्यानपरायण तथा सौम्य थे, और काल भी सदा जिनसे भयभीत रहता है।
श्लोक 17 (skanda.2.193.17)
सावर्णिरुवाच । अतीन्द्रिया निरातङ्का अनिष्यन्दाः सुगन्धिनः । के ते नराः कथं जातास्तादृशाः का च तद्गतिः
sāvarṇiruvāca atīndriyā nirātaṅkā aniṣyandāḥ sugandhinaḥ ke te narāḥ kathaṁ jātāstādṛśāḥ kā ca tadgatiḥ
सावर्णि ने कहा — जो इन्द्रियों से परे, निर्भय, मलरहित तथा सुगन्धित हैं, वे कौन से मनुष्य हैं? वे ऐसे कैसे बने? और उनकी अन्तिम गति क्या है?
श्लोक 18 (skanda.2.193.18)
श्वेतद्वीपः पयोम्भोधौ वर्त्तते हि धरातले । तद्वासिनामपि कथं प्रोक्ताऽतीन्द्रियता त्वया
śvetadvīpaḥ payombhodhau varttate hi dharātale tadvāsināmapi kathaṁ proktā'tīndriyatā tvayā
श्वेतद्वीप तो पृथ्वी पर, क्षीरसागर में ही स्थित है; फिर आपने उसके निवासियों की इन्द्रियातीतता कैसे कह दी?
श्लोक 19 (skanda.2.193.19)
ये ब्रह्मण्यक्षरे धाम्नि सच्चिदानन्दरूपिणि । स्थिताः स्युश्चिन्मया मुक्तास्ते तथा स्युर्न्नहीतरे
ye brahmaṇyakṣare dhāmni saccidānandarūpiṇi sthitāḥ syuścinmayā muktāste tathā syurnnahītare
जो सच्चिदानन्द-स्वरूप अक्षर ब्रह्म-धाम में स्थित हों, ऐसे चिन्मय मुक्त पुरुष ही ऐसे हो सकते हैं, अन्य नहीं।
श्लोक 20 (skanda.2.193.20)
एतं मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे । त्वं हि सर्वकथाभिज्ञस्ततस्त्वामाश्रितोस्मयहम्
etaṁ me saṁśayaṁ chindhi paraṁ kautūhalaṁ hi me tvaṁ hi sarvakathābhijñastatastvāmāśritosmayaham
मेरे इस संशय को दूर कीजिए, क्योंकि मुझे इसमें बड़ा कौतूहल है; आप ही सब कथाओं के ज्ञाता हैं, इसीलिए मैंने आपकी शरण ली है।
श्लोक 21 (skanda.2.193.21)
स्कन्द उवाच । एकान्तोपासनेनैव प्राक्कल्पेषु रमापतेः । ये ब्रह्मभावं संप्राप्ता अजरामरतां गताः
skanda uvāca ekāntopāsanenaiva prākkalpeṣu ramāpateḥ ye brahmabhāvaṁ saṁprāptā ajarāmaratāṁ gatāḥ
स्कन्द ने कहा — पूर्व कल्पों में लक्ष्मीपति की एकान्त उपासना से ही जो ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर अजरामरता को प्राप्त हुए —
श्लोक 22 (skanda.2.193.22)
अक्षराख्याः पुमांसस्ते श्वेतद्वीपेऽत्र धामनि । सेवितुं वासुदेवं तं स्थिता देवर्षिणेक्षिताः
akṣarākhyāḥ pumāṁsaste śvetadvīpe'tra dhāmani sevituṁ vāsudevaṁ taṁ sthitā devarṣiṇekṣitāḥ
'अक्षर' नामक वे पुरुष यहाँ श्वेतद्वीप धाम में उन वासुदेव की सेवा हेतु स्थित हैं, और देवर्षि नारद ने उन्हें ही देखा था।
श्लोक 23 (skanda.2.193.23)
प्राप्ते प्रलयकाले तु पुनश्चाक्षरधामनि । स्थास्यन्ति ते स्वतन्त्राश्च कालमायाभयोज्झिताः
prāpte pralayakāle tu punaścākṣaradhāmani sthāsyanti te svatantrāśca kālamāyābhayojjhitāḥ
प्रलयकाल आने पर वे पुनः अक्षरधाम में ही, स्वतन्त्र तथा काल एवं माया के भय से रहित होकर स्थित रहेंगे।
श्लोक 24 (skanda.2.193.24)
अत्रापि पुरुषा ये तु मायाजाता अतः क्षराः । तेपि सद्भिः साधनैर्वै जायन्ते तादृशाः किल
atrāpi puruṣā ye tu māyājātā ataḥ kṣarāḥ tepi sadbhiḥ sādhanairvai jāyante tādṛśāḥ kila
यहाँ भी जो पुरुष माया से उत्पन्न होने के कारण क्षर हैं, वे भी सत् साधनों के द्वारा निश्चय ही वैसे ही (अक्षर) बन जाते हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.193.25)
अहिंसया च तपसा स्वधर्मेण विरागतः । वासुदेवस्य माहात्म्यज्ञानेनैवात्मनिष्ठया
ahiṁsayā ca tapasā svadharmeṇa virāgataḥ vāsudevasya māhātmyajñānenaivātmaniṣṭhayā
अहिंसा से, तप से, स्वधर्म के पालन से, वैराग्य से, तथा आत्मनिष्ठा के साथ वासुदेव की महिमा के ज्ञान से ही —
श्लोक 26 (skanda.2.193.26)
भक्त्या परमया नित्यं प्रसङ्गेन महात्मनाम् । हरिसेवाविहीनानां मुक्तीनामप्यनिच्छया
bhaktyā paramayā nityaṁ prasaṅgena mahātmanām harisevāvihīnānāṁ muktīnāmapyanicchayā
सदा परम भक्ति से, महात्माओं के संग से, तथा हरि-सेवा से रहित मुक्तियों की भी इच्छा न करने से —
श्लोक 27 (skanda.2.193.27)
सिद्धीनामणिमादीनां सर्वासां चाप्यकांक्षया । अन्योन्यं श्रुतिकीर्तिभ्यां श्रीहरेर्जन्मकर्मणाम् । भवन्ति तादृशा नूनं पुरुषा मुनिसत्तम
siddhīnāmaṇimādīnāṁ sarvāsāṁ cāpyakāṁkṣayā anyonyaṁ śrutikīrtibhyāṁ śrīharerjanmakarmaṇām bhavanti tādṛśā nūnaṁ puruṣā munisattama
अणिमा आदि समस्त सिद्धियों की भी आकांक्षा न रखने से, तथा श्रीहरि के जन्म-कर्मों को परस्पर सुनने-कहने से — हे मुनिश्रेष्ठ! मनुष्य निश्चय ही ऐसे बन जाते हैं।
श्लोक 28 (skanda.2.193.28)
जगत्सर्गे जायमानेप्येते कालवशात्क्वचित् । न जायन्ते स्वतंत्रत्वान्न नश्यन्ति लयेऽन्यवत्
jagatsarge jāyamānepyete kālavaśātkvacit na jāyante svataṁtratvānna naśyanti laye'nyavat
जगत् की सृष्टि होने पर भी ये अपनी स्वतन्त्रता के कारण काल के वश से कभी उत्पन्न नहीं होते, और प्रलय में भी अन्य प्राणियों की भाँति नष्ट नहीं होते।
श्लोक 29 (skanda.2.193.29)
अत्र ते कथयिष्यामि कथां पौराणिकीं मुने । यथात्रत्योपि मनुजस्तथा भावमुपेयिवान्
atra te kathayiṣyāmi kathāṁ paurāṇikīṁ mune yathātratyopi manujastathā bhāvamupeyivān
हे मुने! इस विषय में मैं तुम्हें एक पौराणिक कथा सुनाऊँगा, जिसमें एक साधारण मनुष्य ने भी उसी भाव को प्राप्त किया।
श्लोक 30 (skanda.2.193.30)
विस्तीर्णैषा कथा ब्रह्मञ्छ्रुता मे पितृसन्निधौ । सैषाद्य तव वक्तव्या कथासारो हि स स्मृतः
vistīrṇaiṣā kathā brahmañchrutā me pitṛsannidhau saiṣādya tava vaktavyā kathāsāro hi sa smṛtaḥ
हे ब्रह्मन्! यह विस्तृत कथा मैंने अपने पिता के समीप सुनी थी; आज उसी कथा का सार तुम्हें सुनाया जाएगा।