वैष्णव खण्ड · अध्याय 194
उपरिचर वसु के सद्गुणों का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.194.1)
स्कन्द उवाच । आसीद्राजोपरिचरो वसुनामा पुरा मुने । भूभर्त्तुरायोस्तनयः ख्यातश्चासावमावसुः । आखण्डलसखो भक्तिं प्राप्तो नारायणे प्रभौ
skanda uvāca āsīdrājoparicaro vasunāmā purā mune bhūbhartturāyostanayaḥ khyātaścāsāvamāvasuḥ ākhaṇḍalasakho bhaktiṁ prāpto nārāyaṇe prabhau
स्कन्द ने कहा — हे मुने! प्राचीन काल में उपरिचर वसु नामक एक राजा था, जो भूपति आयु का पुत्र था तथा अमावसु नाम से भी प्रसिद्ध था। इन्द्र का सखा वह राजा प्रभु नारायण में भक्ति को प्राप्त हुआ था।
श्लोक 2 (skanda.2.194.2)
धार्मिकः पितृभक्तश्च पितॄन्देवांश्च तर्पयन् । सदाचाररतो दक्षः क्षमावाननसूयकः
dhārmikaḥ pitṛbhaktaśca pitṝndevāṁśca tarpayan sadācārarato dakṣaḥ kṣamāvānanasūyakaḥ
वह धार्मिक, पितरों का भक्त था, पितरों और देवताओं को तर्पण देता था; सदाचार में रत, कुशल, क्षमावान तथा ईर्ष्यारहित था।
श्लोक 3 (skanda.2.194.3)
सर्वोपकारकः शान्तो ब्रह्मचर्यरतः शुचिः । अक्रोधनश्च मितभुङ्मृदुर्निर्व्यसनो मुनिः
sarvopakārakaḥ śānto brahmacaryarataḥ śuciḥ akrodhanaśca mitabhuṅmṛdurnirvyasano muniḥ
सबका उपकार करने वाला, शान्त, ब्रह्मचर्य में रत, पवित्र; क्रोधरहित, मित भोजन करने वाला, कोमल तथा व्यसनरहित मुनितुल्य था।
श्लोक 4 (skanda.2.194.4)
निर्द्वन्द्वो निर्विकारश्च निर्मानो धीर आत्मवित् । निर्द्दम्भो मानदो योगी तपस्वी विजितेन्द्रियः
nirdvandvo nirvikāraśca nirmāno dhīra ātmavit nirddambho mānado yogī tapasvī vijitendriyaḥ
वह द्वन्द्वरहित, विकाररहित, अभिमानरहित, धीर तथा आत्मज्ञानी था; कपटरहित, सम्मान देने वाला, योगी, तपस्वी तथा जितेन्द्रिय था।
श्लोक 5 (skanda.2.194.5)
धनपुत्रकलत्रेषु विरक्तः स्वजनादिषु । नारायणमनुं भक्त्या स जजापान्वहं नृपः
dhanaputrakalatreṣu viraktaḥ svajanādiṣu nārāyaṇamanuṁ bhaktyā sa jajāpānvahaṁ nṛpaḥ
धन, पुत्र, पत्नी तथा स्वजन आदि से विरक्त वह राजा प्रतिदिन भक्तिपूर्वक नारायण-मन्त्र का जप करता था।
श्लोक 6 (skanda.2.194.6)
तस्मै तुष्टोऽथ भगवान्वासुदेवः स्वयं ददौ । साम्राज्यं सोऽथ नासक्तस्तत्र भेजे तमादरात्
tasmai tuṣṭo'tha bhagavānvāsudevaḥ svayaṁ dadau sāmrājyaṁ so'tha nāsaktastatra bheje tamādarāt
उस पर प्रसन्न होकर भगवान वासुदेव ने स्वयं उसे साम्राज्य प्रदान किया; परन्तु वह उसमें अनासक्त रहकर आदरपूर्वक उन्हीं की सेवा करता रहा।
श्लोक 7 (skanda.2.194.7)
तत्रोक्तेन विधानेन पञ्चकालसमाहितः । पूजयामास देवेशं तच्छेषेण सुरान्पितॄन्
tatroktena vidhānena pañcakālasamāhitaḥ pūjayāmāsa deveśaṁ taccheṣeṇa surānpitṝn
वहाँ कही गई विधि से, पाँचों कालों में समाहित रहकर, उसने देवेश की पूजा की, और उसके शेष से देवताओं तथा पितरों की।
श्लोक 8 (skanda.2.194.8)
तेषां शेषेण विप्राश्च संविभज्याश्रितांश्च सः । शेषान्नभुक्सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः
teṣāṁ śeṣeṇa viprāśca saṁvibhajyāśritāṁśca saḥ śeṣānnabhuksatyaparaḥ sarvabhūteṣvahiṁsakaḥ
उसके शेष से उसने ब्राह्मणों तथा आश्रितों को बाँटकर स्वयं शेष अन्न ग्रहण किया; वह सत्यनिष्ठ तथा सब प्राणियों के प्रति अहिंसक था।
श्लोक 9 (skanda.2.194.9)
भक्षणे दोषमविदत्प्राणिमात्रामिषस्य तु । महापातकवद्राजा स्वप्रजाश्च तथाऽवदत्
bhakṣaṇe doṣamavidatprāṇimātrāmiṣasya tu mahāpātakavadrājā svaprajāśca tathā'vadat
किसी भी प्राणी के मांस के भक्षण को वह राजा महापातक के समान दोष मानता था, और अपनी प्रजा को भी वैसा ही उपदेश देता था।
श्लोक 10 (skanda.2.194.10)
सर्वभावेन भेजेऽसौ देवदेवं जनार्दनम् । अनादिमध्यनिधनं लोककर्त्तारमव्ययम्
sarvabhāvena bheje'sau devadevaṁ janārdanam anādimadhyanidhanaṁ lokakarttāramavyayam
उसने सम्पूर्ण भाव से देवाधिदेव जनार्दन का सेवन किया, जो आदि-मध्य-अन्त से रहित, लोकों के अविनाशी कर्ता हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.194.11)
श्रीवासुदेवपदयोः स चकार मनः स्थिरम् । श्रोत्रे च नित्यं भगवत्कथायाः श्रवणे नृपः
śrīvāsudevapadayoḥ sa cakāra manaḥ sthiram śrotre ca nityaṁ bhagavatkathāyāḥ śravaṇe nṛpaḥ
उस राजा ने अपना मन श्रीवासुदेव के चरणों में स्थिर किया, तथा अपने कानों को सदा भगवत्कथा के श्रवण में लगाया।
श्लोक 12 (skanda.2.194.12)
नयने स्वे मुकुन्दस्य तद्भक्तानां च दर्शने । गुणगाने हरेर्वाणीं चक्रे भूमिपतिः स तु
nayane sve mukundasya tadbhaktānāṁ ca darśane guṇagāne harervāṇīṁ cakre bhūmipatiḥ sa tu
उस भूपति ने अपने नेत्रों को मुकुन्द तथा उनके भक्तों के दर्शन में, और अपनी वाणी को हरि के गुणगान में लगाया।
श्लोक 13 (skanda.2.194.13)
नारायणांघ्रिसंस्पृष्ट तुलसीपुष्पसौरभे । प्राणं चकार च नृपो नान्यगन्धेषु कर्हिचित्
nārāyaṇāṁghrisaṁspṛṣṭa tulasīpuṣpasaurabhe prāṇaṁ cakāra ca nṛpo nānyagandheṣu karhicit
राजा ने अपनी घ्राण-शक्ति नारायण के चरणों से स्पर्शित तुलसी-पुष्पों की सुगन्ध में लगाई, अन्य किसी गन्ध में कभी नहीं।
श्लोक 14 (skanda.2.194.14)
श्रीशोपभुक्तवस्त्रादि स्पर्शने च त्वचं निजाम् । चकार रसनामन्ने नारायणनिवेदिते
śrīśopabhuktavastrādi sparśane ca tvacaṁ nijām cakāra rasanāmanne nārāyaṇanivedite
उसने अपनी त्वचा को श्रीशा (लक्ष्मीपति) द्वारा उपभुक्त वस्त्र आदि के स्पर्श में, तथा अपनी जिह्वा को नारायण को अर्पित अन्न में लगाया।
श्लोक 15 (skanda.2.194.15)
भगवन्मन्दिरक्षेत्रसदन्तिकगतौतथा । चकार चरणौ राजा सेवायां च करौ हरेः
bhagavanmandirakṣetrasadantikagatautathā cakāra caraṇau rājā sevāyāṁ ca karau hareḥ
राजा ने अपने चरणों को भगवान के मन्दिर, क्षेत्र तथा समीपवर्ती सभा में जाने में, और अपने हाथों को हरि की सेवा में लगाया।
श्लोक 16 (skanda.2.194.16)
उत्तमांगं च चक्रेऽसौ विष्णुपादाभिवन्दने । सख्यं चकार परमं महाभागवतेषु सः
uttamāṁgaṁ ca cakre'sau viṣṇupādābhivandane sakhyaṁ cakāra paramaṁ mahābhāgavateṣu saḥ
उसने अपने सिर को विष्णु के चरणों में वन्दन करने में लगाया, तथा महाभागवतों से परम मित्रता स्थापित की।
श्लोक 17 (skanda.2.194.17)
एकोपि न क्षणस्तस्य विना भक्तिं रमापतेः । जगाम किल राजर्षेस्तदीय व्रतचारिणः
ekopi na kṣaṇastasya vinā bhaktiṁ ramāpateḥ jagāma kila rājarṣestadīya vratacāriṇaḥ
उस व्रतधारी राजर्षि का एक भी क्षण लक्ष्मीपति की भक्ति के बिना व्यतीत नहीं होता था।
श्लोक 18 (skanda.2.194.18)
महद्भिरेव संभारैर्विष्णोर्ज्जन्मदिनोत्सवान् । चक्रे तदर्थमुद्यानमंदिरोपवनानि च
mahadbhireva saṁbhārairviṣṇorjjanmadinotsavān cakre tadarthamudyānamaṁdiropavanāni ca
उसने विष्णु के जन्मदिन के उत्सव महान साधन-सामग्री के साथ मनाए, और उसके लिए उद्यान, मन्दिर तथा उपवन बनवाए।
श्लोक 19 (skanda.2.194.19)
इत्थं नारायणे भक्तिं वहतो ब्राह्मणोत्तम । एकशय्यासनं तस्य दत्तवान्देवराट् स्वयम्
itthaṁ nārāyaṇe bhaktiṁ vahato brāhmaṇottama ekaśayyāsanaṁ tasya dattavāndevarāṭ svayam
हे ब्राह्मणोत्तम! इस प्रकार नारायण में भक्ति रखने वाले उसे देवराज इन्द्र ने स्वयं ही समान शय्या और आसन प्रदान किया।
श्लोक 20 (skanda.2.194.20)
वैजयन्तीं ददौ मालां तस्मा इन्द्रोऽतिशोभनाम् । अम्लानपङ्कजमयीं तथा रत्नानि भूरिशः
vaijayantīṁ dadau mālāṁ tasmā indro'tiśobhanām amlānapaṅkajamayīṁ tathā ratnāni bhūriśaḥ
इन्द्र ने उसे अत्यन्त सुन्दर वैजयन्ती माला दी, जो कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की बनी थी, तथा प्रचुर मात्रा में रत्न भी दिए।
श्लोक 21 (skanda.2.194.21)
आत्मा राज्यं धनं चैव कलत्रं वाहनादि च । यत्तद्भगवतः सर्वमिति तत्प्रेक्षितं सदा
ātmā rājyaṁ dhanaṁ caiva kalatraṁ vāhanādi ca yattadbhagavataḥ sarvamiti tatprekṣitaṁ sadā
अपना शरीर, राज्य, धन, पत्नी, वाहन आदि — यह सब भगवान का ही है, ऐसा वह सदा मानता था।
श्लोक 22 (skanda.2.194.22)
काम्या नैमित्तिकाजस्रं यज्ञियाः परमाः क्रियाः । सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः
kāmyā naimittikājasraṁ yajñiyāḥ paramāḥ kriyāḥ sarvāḥ sātvatamāsthāya vidhiṁ cakre samāhitaḥ
काम्य, नैमित्तिक तथा निरन्तर होने वाली सभी परम यज्ञ-क्रियाएँ उसने सात्वत विधि का आश्रय लेकर समाहित चित्त से सम्पन्न कीं।
श्लोक 23 (skanda.2.194.23)
पञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः । प्रायणं भगवत्प्रत्तं भुञ्जतेस्माग्रतो द्विजाः
pañcarātravido mukhyāstasya gehe mahātmanaḥ prāyaṇaṁ bhagavatprattaṁ bhuñjatesmāgrato dvijāḥ
उस महात्मा के घर में पंचरात्र के प्रमुख ज्ञाता ब्राह्मण उसके सामने भगवान द्वारा दिया गया प्रसाद ग्रहण करते थे।
श्लोक 24 (skanda.2.194.24)
तस्य प्रशासतो राज्यं धर्मेणाऽमित्रघातिनः । नानृता वाक्समभवन्मनो दुष्टं न चाऽभवत् । न च कायेन कृतवान्स पापं परमण्वपि
tasya praśāsato rājyaṁ dharmeṇā'mitraghātinaḥ nānṛtā vāksamabhavanmano duṣṭaṁ na cā'bhavat na ca kāyena kṛtavānsa pāpaṁ paramaṇvapi
उस शत्रुनाशक राजा के धर्मपूर्वक राज्य करने पर न कोई असत्य वचन बोलता था, न किसी का मन दुष्ट होता था, और न उसने स्वयं शरीर से भी अणुमात्र पाप किया।
श्लोक 25 (skanda.2.194.25)
पञ्चरात्रं महातन्त्रं भगवद्भक्तिपुष्टये । शुश्रावानुदिनं राजा भगवद्भक्तवक्त्रतः
pañcarātraṁ mahātantraṁ bhagavadbhaktipuṣṭaye śuśrāvānudinaṁ rājā bhagavadbhaktavaktrataḥ
राजा प्रतिदिन भगवद्भक्ति की पुष्टि के लिए महातन्त्र पंचरात्र को भगवद्भक्तों के मुख से सुनता था।
श्लोक 26 (skanda.2.194.26)
धर्मं संस्थापयञ्छुद्धं रञ्जयन्सकलाः प्रजाः । पालयामास पृथिवीं दिवमाखण्डलो यथा
dharmaṁ saṁsthāpayañchuddhaṁ rañjayansakalāḥ prajāḥ pālayāmāsa pṛthivīṁ divamākhaṇḍalo yathā
शुद्ध धर्म की स्थापना करते हुए तथा समस्त प्रजा को प्रसन्न रखते हुए, उसने पृथ्वी की रक्षा वैसे ही की जैसे इन्द्र स्वर्ग की करता है।
श्लोक 27 (skanda.2.194.27)
अपि सप्तविधस्तस्य राज्ये पललभक्षकः । पुमान्कोप्यभवन्नैव न च पाषण्डवेषिणः
api saptavidhastasya rājye palalabhakṣakaḥ pumānkopyabhavannaiva na ca pāṣaṇḍaveṣiṇaḥ
उसके राज्य में सातों प्रकार के मांस का भक्षण करने वाला कोई भी पुरुष नहीं था, और न ही पाखण्डी वेश धारण करने वाले कोई थे।
श्लोक 28 (skanda.2.194.28)
असाध्यो योषितश्चैव पुरुषाः पारदारिकाः । न श्रुतास्तस्य राज्ये च धर्मसंकरकारिणः
asādhyo yoṣitaścaiva puruṣāḥ pāradārikāḥ na śrutāstasya rājye ca dharmasaṁkarakāriṇaḥ
उसके राज्य में न असाध्वी स्त्रियाँ, न परस्त्रीगामी पुरुष, और न ही धर्म-संकर करने वाले कभी सुने गए।
श्लोक 29 (skanda.2.194.29)
एकादशविधं मद्यं त्रिविधां च सुरामपि । नाजिघ्रदपि कोपीह तस्मिन्राज्यं प्रशासति
ekādaśavidhaṁ madyaṁ trividhāṁ ca surāmapi nājighradapi kopīha tasminrājyaṁ praśāsati
उसके राज्य करते समय, ग्यारह प्रकार की मदिरा तथा तीन प्रकार की सुरा को भी कोई सूँघता तक नहीं था।
श्लोक 30 (skanda.2.194.30)
एवंगुणः स तु क्वापि पक्षपाताद्दिवौकसाम् । मिथ्यालापाद्दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीतलम्
evaṁguṇaḥ sa tu kvāpi pakṣapātāddivaukasām mithyālāpāddivo bhraṣṭaḥ praviveśa mahītalam
ऐसे गुणों वाला वह राजा भी कभी देवताओं के पक्षपात से, एक मिथ्या वचन के कारण स्वर्ग से भ्रष्ट होकर पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 31 (skanda.2.194.31)
अन्तर्भूमिगतश्चासौ सततं धर्मवत्सलः । नारायणपरो भूत्वा तन्मंत्रमजपत्स्थिरः
antarbhūmigataścāsau satataṁ dharmavatsalaḥ nārāyaṇaparo bhūtvā tanmaṁtramajapatsthiraḥ
पृथ्वी के भीतर गया हुआ वह सदा धर्मवत्सल राजा, नारायण-परायण होकर स्थिर भाव से उनका मन्त्र जपता रहा।
श्लोक 32 (skanda.2.194.32)
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः । दिवं प्राप्य सुखं तत्र मनोभीष्टं समन्वभूत्
tasyaiva ca prasādena punarevotthitastu saḥ divaṁ prāpya sukhaṁ tatra manobhīṣṭaṁ samanvabhūt
उन्हीं की कृपा से वह पुनः उठ खड़ा हुआ, तथा स्वर्ग को प्राप्त कर वहाँ अपने मनोवांछित सुख का अनुभव किया।
श्लोक 33 (skanda.2.194.33)
पुनश्चेदिपतिर्भूत्वा भुव्यसौ पितृशापतः । पञ्चरात्रोक्तविधिना भेजे हरिमतन्द्रितः
punaścedipatirbhūtvā bhuvyasau pitṛśāpataḥ pañcarātroktavidhinā bheje harimatandritaḥ
पिता के शाप से पुनः पृथ्वी पर चेदि-देश का राजा बनकर, उसने पंचरात्र में कही गई विधि से अथक भाव से हरि की सेवा की।
श्लोक 34 (skanda.2.194.34)
स्वर्गलोकं ततः प्रापद्दिव्यदेहेन भूपतिः । उपासनां च तत्रत्यैः परमर्षिगणैः सह
svargalokaṁ tataḥ prāpaddivyadehena bhūpatiḥ upāsanāṁ ca tatratyaiḥ paramarṣigaṇaiḥ saha
उसके पश्चात् वह भूपति दिव्य शरीर से स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ, तथा वहाँ के परम ऋषि-गणों के साथ उपासना करता रहा।
श्लोक 35 (skanda.2.194.35)
दृढीकुर्वन्भगवतः कञ्चित्कालमुवास तत् । परं पदमथ प्रापद्वासुदेवस्य निर्भयम्
dṛḍhīkurvanbhagavataḥ kañcitkālamuvāsa tat paraṁ padamatha prāpadvāsudevasya nirbhayam
भगवान के प्रति अपनी भक्ति को दृढ़ करते हुए वह वहाँ कुछ काल तक रहा, और फिर वासुदेव के निर्भय परम पद को प्राप्त हुआ।