वैष्णव खण्ड · अध्याय 195
वेद की हिंसापरता कहने से उपरिचर वसु के पतन का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.195.1)
सावर्णिरुवाच । स हि भक्तो भगवत आसीद्राजा महान्वसुः । किं मिथ्याऽभ्यवदद्येन दिवो भूविवरं गतः
sāvarṇiruvāca sa hi bhakto bhagavata āsīdrājā mahānvasuḥ kiṁ mithyā'bhyavadadyena divo bhūvivaraṁ gataḥ
सावर्णि ने कहा — वह महान राजा वसु तो भगवान का भक्त था; उसने ऐसा कौन सा मिथ्या वचन कहा जिसके कारण वह स्वर्ग से पृथ्वी के गर्त में जा गिरा?
श्लोक 2 (skanda.2.195.2)
केनोद्धृतः पुनर्भूमेः शप्तोऽसौ पितृभिः कुतः । कथं मुक्तस्ततो भूप इत्येतत्स्कन्द मे वद्
kenoddhṛtaḥ punarbhūmeḥ śapto'sau pitṛbhiḥ kutaḥ kathaṁ muktastato bhūpa ityetatskanda me vad
फिर उसे पृथ्वी से किसने निकाला? वह पितरों द्वारा किस कारण शापित हुआ? और वह राजा उससे कैसे मुक्त हुआ? हे स्कन्द! यह मुझे बताओ।
श्लोक 3 (skanda.2.195.3)
स्कन्द उवाच । शृणु ब्रह्मन्कथामेतां वसोर्वास वरोचिषः । यस्याः श्रवणतः सद्यः सर्वपापक्षयो भवेत्
skanda uvāca śṛṇu brahmankathāmetāṁ vasorvāsa varociṣaḥ yasyāḥ śravaṇataḥ sadyaḥ sarvapāpakṣayo bhavet
स्कन्द ने कहा — हे ब्राह्मण! तेजस्वी वसु की यह कथा सुनो, जिसके श्रवण मात्र से समस्त पापों का तत्काल नाश हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.2.195.4)
स्वायम्भुवान्तरे पूर्वमिन्द्रो विश्वजिदाह्वयः । आररम्भे महायज्ञमश्वमेधाभिधं मुने
svāyambhuvāntare pūrvamindro viśvajidāhvayaḥ ārarambhe mahāyajñamaśvamedhābhidhaṁ mune
हे मुने! स्वायम्भुव मन्वन्तर में पूर्वकाल में विश्वजित नामक इन्द्र ने अश्वमेध नामक महायज्ञ का आरम्भ किया।
श्लोक 5 (skanda.2.195.5)
निबद्धाः पशवोऽजाद्याः क्रोशन्तस्तत्र भूरिशः । सर्वे देवगणाश्चापि रसलुब्धास्तदासत
nibaddhāḥ paśavo'jādyāḥ krośantastatra bhūriśaḥ sarve devagaṇāścāpi rasalubdhāstadāsata
वहाँ बकरे आदि अनेक बँधे हुए पशु चिल्ला रहे थे, और रस के लोभी सभी देवगण भी वहाँ बैठे हुए थे।
श्लोक 6 (skanda.2.195.6)
क्षेमाय सर्वलोकानां विचरन्तो यदृच्छया । महर्षय उपाजग्मुस्तत्र भास्करवर्च्चसः
kṣemāya sarvalokānāṁ vicaranto yadṛcchayā maharṣaya upājagmustatra bhāskaravarccasaḥ
समस्त लोकों के कल्याण के लिए स्वेच्छा से विचरण करते हुए, सूर्य के समान तेजस्वी महर्षि वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 7 (skanda.2.195.7)
संमानिता सुरगणैः पाद्यार्घ्यस्वागतादिभिः । ते बृहन्मुनयोऽपश्यन्मेध्यांस्तान्क्रोशतः पशून्
saṁmānitā suragaṇaiḥ pādyārghyasvāgatādibhiḥ te bṛhanmunayo'paśyanmedhyāṁstānkrośataḥ paśūn
देवगणों द्वारा पाद्य, अर्घ्य, स्वागत आदि से सम्मानित हुए वे महामुनि, उन चिल्लाते हुए बलि-पशुओं को देखने लगे।
श्लोक 8 (skanda.2.195.8)
सात्त्विकानामपि च तं देवानां यज्ञविस्तरम् । हिंसामयं समालोक्य तेऽत्याश्चर्यं हि लेभिरे
sāttvikānāmapi ca taṁ devānāṁ yajñavistaram hiṁsāmayaṁ samālokya te'tyāścaryaṁ hi lebhire
सात्त्विक स्वभाव वाले देवताओं के भी उस हिंसामय विस्तृत यज्ञ को देखकर, उन्हें अत्यन्त आश्चर्य हुआ।
श्लोक 9 (skanda.2.195.9)
धर्मव्यतिक्रमं दृष्ट्वा कृपया ते द्विजोत्तमाः । महेन्द्रप्रमुखानूचुर्देवान्धर्मधियस्ततः
dharmavyatikramaṁ dṛṣṭvā kṛpayā te dvijottamāḥ mahendrapramukhānūcurdevāndharmadhiyastataḥ
इस धर्म-उल्लंघन को देखकर, कृपापूर्वक धर्म-बुद्धि वाले उन श्रेष्ठ द्विजों ने महेन्द्र आदि देवताओं से कहा।
श्लोक 10 (skanda.2.195.10)
महर्षय ऊचुः । देवैश्च ऋषिभिः साकं महेन्द्राऽस्मद्वचः शृणु । यथास्थितं धर्मतत्त्वं वदामो हि सनातनम्
maharṣaya ūcuḥ devaiśca ṛṣibhiḥ sākaṁ mahendrā'smadvacaḥ śṛṇu yathāsthitaṁ dharmatattvaṁ vadāmo hi sanātanam
महर्षियों ने कहा — हे महेन्द्र! देवताओं और ऋषियों के साथ हमारी बात सुनो; हम सनातन धर्म-तत्त्व को जैसा है वैसा ही कहते हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.195.11)
यूयं जगत्सर्गकाले ब्रह्मणा परमेष्ठिना । सत्त्वेन निर्मिताः स्थो वै चतुष्पाद्धर्मधारकाः
yūyaṁ jagatsargakāle brahmaṇā parameṣṭhinā sattvena nirmitāḥ stho vai catuṣpāddharmadhārakāḥ
सृष्टि के समय परमेष्ठी ब्रह्मा ने तुम्हें सत्त्वगुण से निर्मित किया था, चतुष्पाद धर्म के धारक बनाकर।
श्लोक 12 (skanda.2.195.12)
रजसा तमसा चासौ मनूंश्चैव नराधिपान् । असुराणां चाधिपतीनसृजद्धर्मधारिणः
rajasā tamasā cāsau manūṁścaiva narādhipān asurāṇāṁ cādhipatīnasṛjaddharmadhāriṇaḥ
और रजोगुण तथा तमोगुण से उसने मनुओं, राजाओं तथा असुरों के अधिपतियों को भी धर्मधारक के रूप में रचा।
श्लोक 13 (skanda.2.195.13)
सर्वेषामथ युष्माकं यज्ञादिविधिबोधकम् । ससर्ज श्रेयसे वेदं सर्वाभीष्टफलप्रदम्
sarveṣāmatha yuṣmākaṁ yajñādividhibodhakam sasarja śreyase vedaṁ sarvābhīṣṭaphalapradam
फिर उसने तुम सबके कल्याण के लिए यज्ञ आदि की विधि बताने वाले, सम्पूर्ण अभीष्ट फल देने वाले वेद की रचना की।
श्लोक 14 (skanda.2.195.14)
अहिंसैव परो धर्मस्तत्र वेदेऽस्ति कीर्त्तितः । साक्षात्पशुवधो यज्ञे नहि वेदस्य संमतः
ahiṁsaiva paro dharmastatra vede'sti kīrttitaḥ sākṣātpaśuvadho yajñe nahi vedasya saṁmataḥ
उस वेद में अहिंसा को ही परम धर्म कहा गया है; यज्ञ में साक्षात् पशु-वध वेद को कदापि सम्मत नहीं है।
श्लोक 15 (skanda.2.195.15)
चतुष्पादस्य धर्मस्य स्थापने ह्येव सर्वथा । तात्पर्यमस्ति वेदस्य न तु नाशेऽस्य हिंसया
catuṣpādasya dharmasya sthāpane hyeva sarvathā tātparyamasti vedasya na tu nāśe'sya hiṁsayā
वेद का तात्पर्य सर्वथा चतुष्पाद धर्म की स्थापना में ही है, न कि हिंसा द्वारा उसके नाश में।
श्लोक 16 (skanda.2.195.16)
रजस्तमोदोषवशात्तथाप्यसुरपा नृपाः । मेध्येनाजेन यष्टव्यमित्यादौ मतिजाड्यतः । छागादिमर्थं बुबुधुर्व्रीह्यादिं तु न ते विदुः
rajastamodoṣavaśāttathāpyasurapā nṛpāḥ medhyenājena yaṣṭavyamityādau matijāḍyataḥ chāgādimarthaṁ bubudhurvrīhyādiṁ tu na te viduḥ
फिर भी रज-तम के दोषवश असुर-जैसे राजाओं ने 'मेध्य अज से यजन करना चाहिए' आदि वचनों को बुद्धि की जड़ता से केवल बकरे आदि का अर्थ समझा, किन्तु धान्य आदि अर्थ को वे नहीं जान सके।
श्लोक 17 (skanda.2.195.17)
सात्त्विकानां तु युष्माकं वेदस्यार्थो यथा स्थितः । ग्रहीतव्योन्यथा नैव तादृशी च क्रियोचिता
sāttvikānāṁ tu yuṣmākaṁ vedasyārtho yathā sthitaḥ grahītavyonyathā naiva tādṛśī ca kriyocitā
किन्तु सात्त्विक स्वभाव वाले तुम लोगों को वेद का अर्थ जैसा वस्तुतः है वैसा ही ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा नहीं, और तुम्हारे लिए वैसी ही क्रिया उचित है।
श्लोक 18 (skanda.2.195.18)
यादृशो हि गुणो यस्य स्वभावस्तस्य तादृशः । स्वस्वभावानुसारेण प्रवृत्तिः स्याच्च कर्मणि
yādṛśo hi guṇo yasya svabhāvastasya tādṛśaḥ svasvabhāvānusāreṇa pravṛttiḥ syācca karmaṇi
जिसका जैसा गुण होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है; अपने-अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म में प्रवृत्ति होती है।
श्लोक 19 (skanda.2.195.19)
सात्त्विकानां हि वो देवः साक्षाद्विष्णू रमापतिः । अहिंसयज्ञेऽस्ति ततोऽधिकारस्तस्य तुष्टये
sāttvikānāṁ hi vo devaḥ sākṣādviṣṇū ramāpatiḥ ahiṁsayajñe'sti tato'dhikārastasya tuṣṭaye
तुम सात्त्विकों के देवता तो साक्षात् लक्ष्मीपति विष्णु ही हैं; अतः उन्हें प्रसन्न करने के लिए तुम्हारा अधिकार अहिंसा-यज्ञ में ही है।
श्लोक 20 (skanda.2.195.20)
प्रत्यक्षपशुमालभ्य यज्ञस्याचरणं तु यत् । धर्मः स विपरीतो वै युष्माकं सुरसत्तमाः
pratyakṣapaśumālabhya yajñasyācaraṇaṁ tu yat dharmaḥ sa viparīto vai yuṣmākaṁ surasattamāḥ
हे श्रेष्ठ देवताओ! साक्षात् पशु का आलम्भन करके यज्ञ का जो आचरण है, वह धर्म तुम्हारे लिए विपरीत ही है।
श्लोक 21 (skanda.2.195.21)
रजस्तमोगुणवशादासुरीं संपदं श्रिताः । युष्माकं याजका ह्येते सन्त्यवेदविदो यथा
rajastamoguṇavaśādāsurīṁ saṁpadaṁ śritāḥ yuṣmākaṁ yājakā hyete santyavedavido yathā
रज-तम गुण के वश होकर आसुरी सम्पदा का आश्रय लिए हुए, तुम्हारे ये यज्ञ करने वाले मानो वेद के अज्ञाता ही हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.195.22)
तत्सङ्गादेव युष्माकं साम्प्रतं व्यत्ययो मतेः । जातस्तेनेदृशं कर्म प्रारब्धमिति निश्चितम्
tatsaṅgādeva yuṣmākaṁ sāmprataṁ vyatyayo mateḥ jātastenedṛśaṁ karma prārabdhamiti niścitam
उन्हीं के संग से तुम्हारी बुद्धि में अभी विपर्यय उत्पन्न हो गया है, और इसीलिए निश्चय ही ऐसा कर्म आरम्भ किया गया है।
श्लोक 23 (skanda.2.195.23)
राजसानां तामसानामासुराणां तथा नृणाम् । यथागुणं भैरवाद्या उपास्याः सन्ति देवताः
rājasānāṁ tāmasānāmāsurāṇāṁ tathā nṛṇām yathāguṇaṁ bhairavādyā upāsyāḥ santi devatāḥ
राजसिक, तामसिक तथा आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यों के लिए, उनके गुण के अनुसार भैरव आदि देवता उपास्य होते हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.195.24)
स्वगुणानुगुणात्मीयदेवतातुष्टये भुवि । हिंस्रयज्ञविधानं यत्तेषामेवोचितं हि तत्
svaguṇānuguṇātmīyadevatātuṣṭaye bhuvi hiṁsrayajñavidhānaṁ yatteṣāmevocitaṁ hi tat
पृथ्वी पर अपने गुण के अनुरूप अपने देवता को प्रसन्न करने के लिए हिंसक यज्ञ का जो विधान है, वह उन्हीं के लिए उचित है।
श्लोक 25 (skanda.2.195.25)
तत्रापि विष्णुभक्ता ये दैत्यरक्षोनरादयः । तेषामप्युचितो नास्ति हिंस्रयज्ञः कुतस्तु वः
tatrāpi viṣṇubhaktā ye daityarakṣonarādayaḥ teṣāmapyucito nāsti hiṁsrayajñaḥ kutastu vaḥ
उनमें भी जो दैत्य, राक्षस, मनुष्य आदि विष्णु-भक्त हैं, उनके लिए भी हिंसक यज्ञ उचित नहीं है — फिर तुम्हारे लिए तो कैसे हो सकता है?
श्लोक 26 (skanda.2.195.26)
यज्ञशेषो हि सर्वेषां यज्ञकर्मानुतिष्ठताम् । अनुज्ञातो भक्षणार्थं निगमेनैव वर्तते
yajñaśeṣo hi sarveṣāṁ yajñakarmānutiṣṭhatām anujñāto bhakṣaṇārthaṁ nigamenaiva vartate
यज्ञ-कर्म का अनुष्ठान करने वाले सभी के लिए यज्ञ का शेष भाग भक्षण हेतु वेद द्वारा ही अनुज्ञात है।
श्लोक 27 (skanda.2.195.27)
सात्त्विकानां देवतानां सुरामांसाशनं क्वचित् । अस्माभिस्त्वीक्षितं नैव न श्रुतं च सतां मुखात्
sāttvikānāṁ devatānāṁ surāmāṁsāśanaṁ kvacit asmābhistvīkṣitaṁ naiva na śrutaṁ ca satāṁ mukhāt
सात्त्विक देवताओं द्वारा कभी सुरा-मांस का भक्षण, न तो हमने कभी देखा है, और न सन्तों के मुख से सुना है।
श्लोक 28 (skanda.2.195.28)
तस्माद्व्रीहिभिरेवासौ यज्ञः क्षीरेण सर्पिषा । मेध्यैरन्नरसैश्चाऽन्यैः कार्यो न पशुहिंसया
tasmādvrīhibhirevāsau yajñaḥ kṣīreṇa sarpiṣā medhyairannarasaiścā'nyaiḥ kāryo na paśuhiṁsayā
इसलिए यह यज्ञ धान्य से, दूध से, घृत से, तथा अन्य पवित्र अन्न-रसों से ही करना चाहिए, पशु-हिंसा से नहीं।
श्लोक 29 (skanda.2.195.29)
तत्रापि बीजैर्यष्टव्यमजसंज्ञामुपागतैः । त्रिवर्षकालमुषितैर्न्न येषां पुनरुद्गमः
tatrāpi bījairyaṣṭavyamajasaṁjñāmupāgataiḥ trivarṣakālamuṣitairnna yeṣāṁ punarudgamaḥ
उसमें भी 'अज' नाम को प्राप्त उन बीजों से यजन करना चाहिए जो तीन वर्ष तक रखे रहने से पुनः अंकुरित नहीं होते।
श्लोक 30 (skanda.2.195.30)
अद्रोहश्चायलोभश्च दमो भूतदया तपः । ब्रह्मचर्यं तथा सत्यमदम्भश्च क्षमा धृतिः
adrohaścāyalobhaśca damo bhūtadayā tapaḥ brahmacaryaṁ tathā satyamadambhaśca kṣamā dhṛtiḥ
अद्रोह, अनायास लोभ का त्याग, दम, प्राणि-दया, तप, ब्रह्मचर्य, सत्य, निष्कपटता, क्षमा तथा धृति —
श्लोक 31 (skanda.2.195.31)
सनातनस्य धर्मस्य रूपमेतदुदीरितम् । तदतिक्रम्य यो वर्तेद्धर्मघ्नः स पतत्यधः
sanātanasya dharmasya rūpametadudīritam tadatikramya yo varteddharmaghnaḥ sa patatyadhaḥ
यही सनातन धर्म का स्वरूप कहा गया है; जो इसका अतिक्रमण कर आचरण करता है, वह धर्मघाती नीचे गिरता है।
श्लोक 32 (skanda.2.195.32)
स्कन्द उवाच । इत्थं वेदरहस्यज्ञैर्महामुनिभिरादरात् । बोधिता अपि सन्नीत्या स्वप्रतिज्ञाविघाततः । तद्वाक्यं जगृहुर्नैव तत्प्रामाण्यविदोपि ते
skanda uvāca itthaṁ vedarahasyajñairmahāmunibhirādarāt bodhitā api sannītyā svapratijñāvighātataḥ tadvākyaṁ jagṛhurnaiva tatprāmāṇyavidopi te
स्कन्द ने कहा — इस प्रकार वेद के रहस्य को जानने वाले महामुनियों द्वारा आदरपूर्वक सन्मार्ग का उपदेश दिए जाने पर भी, अपनी प्रतिज्ञा भंग होने के भय से, उस वचन की प्रामाणिकता जानते हुए भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 33 (skanda.2.195.33)
महद्व्यतिक्रमात्तर्हि मानक्रोधमदादयः । विविशुस्तेष्वधर्मस्य वंश्याश्छिद्रगवेषिणः
mahadvyatikramāttarhi mānakrodhamadādayaḥ viviśusteṣvadharmasya vaṁśyāśchidragaveṣiṇaḥ
इस महान अतिक्रमण के कारण, अधर्म की सन्तान — मान, क्रोध, मद आदि, जो सदा छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं — उनमें प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 34 (skanda.2.195.34)
अजश्छागो न बीजानीत्यादि वादिषु तेष्वथ । विमनस्स्वृषिवर्येषु पुनस्तान्बोधयत्सु च
ajaśchāgo na bījānītyādi vādiṣu teṣvatha vimanassvṛṣivaryeṣu punastānbodhayatsu ca
जब वे देवता 'अज का अर्थ बकरा है, बीज नहीं' इत्यादि वाद करते रहे, और खिन्न मन वाले श्रेष्ठ ऋषि उन्हें पुनः समझाते रहे —
श्लोक 35 (skanda.2.195.35)
राजोपरिचरः श्रीमांस्तत्रैवागाद्यदृच्छया । तेजसा द्योतयन्नाशा इन्द्रस्य परमः सखा
rājoparicaraḥ śrīmāṁstatraivāgādyadṛcchayā tejasā dyotayannāśā indrasya paramaḥ sakhā
इन्द्र के परम सखा, श्रीमान राजा उपरिचर, अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए वहीं स्वेच्छा से आ पहुँचे।
श्लोक 36 (skanda.2.195.36)
तं दृष्ट्वा सहसायान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् । ऊचुर्द्विजातयो देवानेष च्छेत्स्यति संशयम्
taṁ dṛṣṭvā sahasāyāntaṁ vasuṁ te tvantarikṣagam ūcurdvijātayo devāneṣa cchetsyati saṁśayam
आकाशमार्ग से सहसा आते हुए उस वसु को देखकर, द्विजों ने देवताओं से कहा — यह हमारे संशय को दूर कर देगा।
श्लोक 37 (skanda.2.195.37)
एष भूमिपतिः पूर्वं महायज्ञान्सहस्रशः । चक्रे सात्वततन्त्रोक्तविधिनारण्यकेन च
eṣa bhūmipatiḥ pūrvaṁ mahāyajñānsahasraśaḥ cakre sātvatatantroktavidhināraṇyakena ca
इस भूपति ने पूर्व में सात्वत-तन्त्र में कही गई विधि से तथा आरण्यक विधि से हज़ारों महायज्ञ किए हैं।
श्लोक 38 (skanda.2.195.38)
येषु साक्षात्पशुवधः कस्मिंश्चिदपि नाऽभवत् । न दक्षिणानुकल्पश्च नाप्रत्यक्षसुरार्च्चनम्
yeṣu sākṣātpaśuvadhaḥ kasmiṁścidapi nā'bhavat na dakṣiṇānukalpaśca nāpratyakṣasurārccanam
जिनमें से किसी में भी साक्षात् पशु-वध नहीं हुआ, न कहीं दक्षिणा में कोई कल्पित विकल्प रहा, और न ही देवताओं की पूजा कहीं अप्रत्यक्ष रूप से हुई।
श्लोक 39 (skanda.2.195.39)
अहिंसाधर्मरक्षाभ्यां ख्यातोसौ सर्वतो नृपः । अग्रणीर्विष्णुभक्तानामेकपत्नीमहाव्रतः
ahiṁsādharmarakṣābhyāṁ khyātosau sarvato nṛpaḥ agraṇīrviṣṇubhaktānāmekapatnīmahāvrataḥ
अहिंसा-धर्म की रक्षा से यह राजा सर्वत्र प्रसिद्ध है, विष्णु-भक्तों में अग्रणी तथा एकपत्नी-व्रत का महान पालक है।
श्लोक 40 (skanda.2.195.40)
ईदृशो धार्मिकवरः सत्यसन्धश्च वेदवित् । कथंचिन्नान्यथा ब्रूयाद्वाक्यमेष महान्वसुः
īdṛśo dhārmikavaraḥ satyasandhaśca vedavit kathaṁcinnānyathā brūyādvākyameṣa mahānvasuḥ
ऐसा श्रेष्ठ धार्मिक, सत्यप्रतिज्ञ तथा वेदज्ञ यह महान वसु किसी भी प्रकार असत्य वचन नहीं कहेगा।
श्लोक 41 (skanda.2.195.41)
एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा । अपृच्छन्सहसाऽभ्येत्य वसुं राजानमुत्सुकाः
evaṁ te saṁvidaṁ kṛtvā vibudhā ṛṣayastathā apṛcchansahasā'bhyetya vasuṁ rājānamutsukāḥ
इस प्रकार आपस में सहमति बनाकर, देवता और ऋषि दोनों उत्सुक होकर सहसा राजा वसु के पास जाकर उनसे पूछने लगे।
श्लोक 42 (skanda.2.195.42)
देवमहर्षय ऊचुः । भो राजन्केन यष्टव्यं पशुना होस्विदौषधैः । एतं नः संशयं छिन्धि प्रमाणं नो भवान्मतः
devamaharṣaya ūcuḥ bho rājankena yaṣṭavyaṁ paśunā hosvidauṣadhaiḥ etaṁ naḥ saṁśayaṁ chindhi pramāṇaṁ no bhavānmataḥ
देवताओं और महर्षियों ने कहा — हे राजन्! यज्ञ पशु से करना चाहिए या औषधियों से? हमारे इस संशय को दूर कीजिए; आप ही हमारे प्रमाण माने गए हैं।
श्लोक 43 (skanda.2.195.43)
स्कन्द उवाच । स तान्कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः । कस्य वः को मतः पक्षो ब्रूत सत्यं समाहिताः
skanda uvāca sa tānkṛtāñjalirbhūtvā paripapraccha vai vasuḥ kasya vaḥ ko mataḥ pakṣo brūta satyaṁ samāhitāḥ
स्कन्द ने कहा — वसु ने हाथ जोड़कर उनसे पूछा — तुममें से किसका क्या पक्ष है, यह मुझे सच्चाई से, समाहित चित्त से बताओ।
श्लोक 44 (skanda.2.195.44)
महर्षय ऊचुः । धान्यैर्यष्टव्यमित्येव पक्षोऽस्माकं नराधिप । देवानां तु पशुः पक्षो मतं राजन्वदात्मनः
maharṣaya ūcuḥ dhānyairyaṣṭavyamityeva pakṣo'smākaṁ narādhipa devānāṁ tu paśuḥ pakṣo mataṁ rājanvadātmanaḥ
महर्षियों ने कहा — हे नराधिप! हमारा पक्ष है कि यज्ञ धान्य से करना चाहिए; परन्तु देवताओं का पक्ष है पशु से — हे राजन्! अब अपना मत बताइए।
श्लोक 45 (skanda.2.195.45)
स्कन्द उवाच । देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुस्तत्पक्षसंश्रयात् । छागादिपशुनैवेज्यमित्युवाच वचस्तदा
skanda uvāca devānāṁ tu mataṁ jñātvā vasustatpakṣasaṁśrayāt chāgādipaśunaivejyamityuvāca vacastadā
स्कन्द ने कहा — देवताओं का मत जानकर वसु ने उन्हीं के पक्ष का आश्रय लेकर तब यह वचन कहा — 'बकरे आदि पशु से ही यजन करना चाहिए।'
श्लोक 46 (skanda.2.195.46)
एवं हि मानिनां पक्षमसन्तं स उपाश्रितः । धर्मज्ञोप्यवदन्मिथ्या वेदं हिंसापरं नृपः
evaṁ hi mānināṁ pakṣamasantaṁ sa upāśritaḥ dharmajñopyavadanmithyā vedaṁ hiṁsāparaṁ nṛpaḥ
इस प्रकार अभिमानी देवताओं के असत् पक्ष का आश्रय लेकर, धर्मज्ञ होते हुए भी राजा ने मिथ्या रूप से वेद को हिंसापरक कह दिया।
श्लोक 47 (skanda.2.195.47)
तस्मिन्नैव क्षणे राजा वाग्दोषादन्तरिक्षतः । अधः पपात सहसा भूमिं च प्रविवेश सः । महतीं विपदं प्राप भूमिमध्यगतो नृपः । स्मृतिस्त्वेनं न प्रजहौ तदा नारायणाश्रयात्
tasminnaiva kṣaṇe rājā vāgdoṣādantarikṣataḥ adhaḥ papāta sahasā bhūmiṁ ca praviveśa saḥ mahatīṁ vipadaṁ prāpa bhūmimadhyagato nṛpaḥ smṛtistvenaṁ na prajahau tadā nārāyaṇāśrayāt
उसी क्षण वाणी के इस दोष के कारण राजा आकाश से सहसा नीचे गिर पड़ा और पृथ्वी में समा गया; पृथ्वी के भीतर पहुँचकर उस राजा को महान विपत्ति प्राप्त हुई, फिर भी नारायण की शरण के कारण उसकी स्मृति उस समय नष्ट नहीं हुई।
श्लोक 48 (skanda.2.195.48)
मोचयित्वा पशून्त्सर्वांस्ततस्ते त्रिदिवौकसः । हिंसाभीता दिवं जग्मुः स्वाश्रमांश्च महर्षयः
mocayitvā paśūntsarvāṁstataste tridivaukasaḥ hiṁsābhītā divaṁ jagmuḥ svāśramāṁśca maharṣayaḥ
फिर हिंसा से भयभीत हुए वे स्वर्गवासी देवता समस्त पशुओं को मुक्त कराकर स्वर्ग को चले गए, और महर्षि अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।