वैष्णव खण्ड · अध्याय 196
उपरिचर वसु के मोक्ष का निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.196.1)
स्कन्द उवाच । भूमध्यगः स राजाऽथ स्वकृतं कर्म गर्हयन् । अनुतप्यमानश्च भृशं मानयंस्ताबृहन्मुनीन् । जजाप भगवन्मन्त्रं त्र्यक्षरं मनसा सदा
skanda uvāca bhūmadhyagaḥ sa rājā'tha svakṛtaṁ karma garhayan anutapyamānaśca bhṛśaṁ mānayaṁstābṛhanmunīn jajāpa bhagavanmantraṁ tryakṣaraṁ manasā sadā
स्कन्द ने कहा — पृथ्वी के भीतर गया हुआ वह राजा अपने ही किए कर्म की निन्दा करते हुए, अत्यन्त पश्चाताप करते हुए तथा उन महामुनियों का मन ही मन सम्मान करते हुए, सदा भगवान के त्र्यक्षर मन्त्र का मन में जप करता रहा।
श्लोक 2 (skanda.2.196.2)
तत्रापि परया भक्त्या पञ्चकालं स्वचेतसा । अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवर आदरात्
tatrāpi parayā bhaktyā pañcakālaṁ svacetasā ayajaddhariṁ surapatiṁ bhūmervivara ādarāt
वहाँ भी पृथ्वी के उस गर्त में, परम भक्ति से, पाँचों कालों में अपने मन से आदरपूर्वक वह देवताओं के स्वामी हरि का यजन करता रहा।
श्लोक 3 (skanda.2.196.3)
ततोऽस्य तुष्टो भगवान्वासुदेवो जगत्पतिः । आपद्यपि यथाकालं यथाशास्त्रं स्वमर्चतः
tato'sya tuṣṭo bhagavānvāsudevo jagatpatiḥ āpadyapi yathākālaṁ yathāśāstraṁ svamarcataḥ
तब जगत्पति भगवान वासुदेव उस पर प्रसन्न हुए, जो विपत्ति में भी यथासमय, यथाशास्त्र उन्हीं की पूजा करता रहा था।
श्लोक 4 (skanda.2.196.4)
वरदो भगवान्विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् । गरुत्मन्तं महावेगमाबभाषे स्वयं ततः
varado bhagavānviṣṇuḥ samīpasthaṁ dvijottamam garutmantaṁ mahāvegamābabhāṣe svayaṁ tataḥ
तब वरदाता भगवान विष्णु ने अपने पास खड़े महावेगशाली पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ से स्वयं यह कहा।
श्लोक 5 (skanda.2.196.5)
श्रीभगवानुवाच । द्विजोत्तम महाभाग गम्यतां वचनान्मम । सम्राड्राजा वसुर्नाम धर्मात्मा मां समाश्रितः
śrībhagavānuvāca dvijottama mahābhāga gamyatāṁ vacanānmama samrāḍrājā vasurnāma dharmātmā māṁ samāśritaḥ
श्रीभगवान ने कहा — हे पक्षिश्रेष्ठ, महाभाग! मेरे वचन से जाओ; वसु नामक एक सम्राट, जो धर्मात्मा है, मेरी शरण में है।
श्लोक 6 (skanda.2.196.6)
ब्रह्मातिक्रमदोषेण प्रविष्टो वसुधातलम् । तन्मानना कृता तेन तद्गच्छाद्य तदन्तिकम्
brahmātikramadoṣeṇa praviṣṭo vasudhātalam tanmānanā kṛtā tena tadgacchādya tadantikam
ब्रह्मवचन के अतिक्रमण के दोष से वह पृथ्वी के तल में प्रविष्ट हो गया है; उसने उसका मान रखा है, अतः अब तुम उसके समीप जाओ।
श्लोक 7 (skanda.2.196.7)
भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडैनं ममाज्ञया । अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम्
bhūmervivarasaṁguptaṁ garuḍainaṁ mamājñayā adhaścaraṁ nṛpaśreṣṭhaṁ khecaraṁ kuru mā ciram
हे गरुड़! मेरी आज्ञा से पृथ्वी के गर्त में छिपे, नीचे विचरण करते हुए इस श्रेष्ठ राजा को आकाशचारी बना दो, विलम्ब मत करो।
श्लोक 8 (skanda.2.196.8)
स्कन्द उवाच । गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् । विवेश विवरं भूम्या यत्रास्ते वाग्यतो वसुः
skanda uvāca garutmānatha vikṣipya pakṣau mārutavegavān viveśa vivaraṁ bhūmyā yatrāste vāgyato vasuḥ
स्कन्द ने कहा — तब वायु के समान वेगवान गरुड़ ने अपने पंख फैलाकर पृथ्वी के उस गर्त में प्रवेश किया, जहाँ मौन साधे वसु विद्यमान थे।
श्लोक 9 (skanda.2.196.9)
तत एनं समुत्क्षिप्य स्वचञ्च्वा विनता सुतः । उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत
tata enaṁ samutkṣipya svacañcvā vinatā sutaḥ utpapāta nabhastūrṇaṁ tatra cainamamuñcata
फिर विनता-पुत्र गरुड़ ने अपनी चोंच से उसे उठाकर तुरन्त आकाश में उड़ान भरी, और वहाँ उसे छोड़ दिया।
श्लोक 10 (skanda.2.196.10)
तस्मिन्मुहूर्त्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः । सशरीरो गतः स्वर्गं परमं सुखमाप्तवान्
tasminmuhūrtte saṁjajñe rājoparicaraḥ punaḥ saśarīro gataḥ svargaṁ paramaṁ sukhamāptavān
उसी क्षण राजा उपरिचर पुनः प्रकट हुआ, और सशरीर स्वर्ग को जाकर उसने परम सुख प्राप्त किया।
श्लोक 11 (skanda.2.196.11)
एवं तेनापि ब्रह्मर्षे वाग्दोषात्सदवज्ञया । प्राप्ता गतिरयज्वार्हा धर्मज्ञेन महात्मना
evaṁ tenāpi brahmarṣe vāgdoṣātsadavajñayā prāptā gatirayajvārhā dharmajñena mahātmanā
हे ब्रह्मर्षे! इस प्रकार धर्मज्ञ उस महात्मा ने भी सन्तों के अनादर से हुए वाणी के दोष के बावजूद, अन्ततः वैसी ही उत्तम गति प्राप्त की।
श्लोक 12 (skanda.2.196.12)
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरिरीश्वरः । ततः शीघ्रं जहौ पापं स्वर्गलोकमवाप च
kevalaṁ puruṣastena sevito harirīśvaraḥ tataḥ śīghraṁ jahau pāpaṁ svargalokamavāpa ca
केवल इसलिए कि उसने उस परमपुरुष ईश्वर हरि की सेवा की थी, वह शीघ्र ही पाप से मुक्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
श्लोक 13 (skanda.2.196.13)
भुञ्जानो विविधं सौख्यं मनोभीष्टं च तत्र सः । उवासान्यो यथा शक्रो गीयमानयशाः सुरैः
bhuñjāno vividhaṁ saukhyaṁ manobhīṣṭaṁ ca tatra saḥ uvāsānyo yathā śakro gīyamānayaśāḥ suraiḥ
वहाँ वह मनोवांछित नाना प्रकार के सुखों का भोग करता हुआ, देवताओं द्वारा गाए जाते यश के साथ, मानो दूसरे इन्द्र के समान रहने लगा।
श्लोक 14 (skanda.2.196.14)
तमेकदा विमानेन चरन्तं सूर्यसन्निभम् । अद्रिकाप्सरसा युक्तमच्छोदा समवैक्षत
tamekadā vimānena carantaṁ sūryasannibham adrikāpsarasā yuktamacchodā samavaikṣata
एक बार जब वह सूर्य के समान तेजस्वी विमान में विचरण कर रहा था, तब अप्सरा अद्रिका के साथ रहे उसे अच्छोदा ने देखा।
श्लोक 15 (skanda.2.196.15)
सा हि सोमपदस्थानां पितॄणां मानसी सुता । अग्निष्वात्ताभिधानानाममूर्त्तानां महात्मनाम्
sā hi somapadasthānāṁ pitṝṇāṁ mānasī sutā agniṣvāttābhidhānānāmamūrttānāṁ mahātmanām
वह अच्छोदा सोमलोक में स्थित, अग्निष्वात्त नामक निराकार महात्मा पितरों की मानस-पुत्री थी।
श्लोक 16 (skanda.2.196.16)
अमूर्त्तत्वात्पितॄन्स्वान्सा न जानन्ती शुचिस्मिता । तं वसुं पितरं मेने स च तामात्मजामिव
amūrttatvātpitṝnsvānsā na jānantī śucismitā taṁ vasuṁ pitaraṁ mene sa ca tāmātmajāmiva
उन पितरों के निराकार होने के कारण उन्हें न पहचानती हुई उस पवित्र-हास्य वाली ने उस वसु को अपना पिता मान लिया, और उसने भी उसे अपनी पुत्री के समान माना।
श्लोक 17 (skanda.2.196.17)
तौ ततः पितरः शेपुर्भावं दृष्ट्वेदृशं तयोः । कन्ये त्वमस्य नृपतेर्भुवि कन्या भविष्यसि
tau tataḥ pitaraḥ śepurbhāvaṁ dṛṣṭvedṛśaṁ tayoḥ kanye tvamasya nṛpaterbhuvi kanyā bhaviṣyasi
फिर पितरों ने उन दोनों का ऐसा भाव देखकर उन्हें शाप दिया — हे कन्ये! तू पृथ्वी पर इस राजा की पुत्री होगी।
श्लोक 18 (skanda.2.196.18)
वसो त्वं मानुषो भूत्वा सुतामेनां स्वयोषिति । अस्यामेवाप्सरायां त्वं जनयिष्यसि निश्चितम्
vaso tvaṁ mānuṣo bhūtvā sutāmenāṁ svayoṣiti asyāmevāpsarāyāṁ tvaṁ janayiṣyasi niścitam
और हे वसु! तू मनुष्य होकर अपनी ही पत्नी बनी इसी अप्सरा में निश्चय ही इस कन्या को उत्पन्न करेगा।
श्लोक 19 (skanda.2.196.19)
इत्थं तौ पितृभिः शप्तौ शापमोक्षाय तास्ततः । प्रार्थयामासतुर्न्नत्वा तदोचुस्ते कृपालवः
itthaṁ tau pitṛbhiḥ śaptau śāpamokṣāya tāstataḥ prārthayāmāsaturnnatvā tadocuste kṛpālavaḥ
इस प्रकार पितरों द्वारा शापित हुए वे दोनों तब शाप से मुक्ति हेतु उनके चरणों में झुककर प्रार्थना करने लगे; तब उन कृपालु पितरों ने कहा।
श्लोक 20 (skanda.2.196.20)
अवश्यमित्थं भावित्वाद्युवाभ्यामुपलम्भितः । शापोऽयं तत्र युवयोः श्रेय एव भविष्यति
avaśyamitthaṁ bhāvitvādyuvābhyāmupalambhitaḥ śāpo'yaṁ tatra yuvayoḥ śreya eva bhaviṣyati
जो होना अवश्य ही होना था, वह तुम दोनों को प्राप्त हुआ है; अतः यह शाप तुम दोनों के लिए कल्याणकारी ही सिद्ध होगा।
श्लोक 21 (skanda.2.196.21)
अष्टाविंशे द्वापरे तु वसो त्वं भुवि भूपतेः । कृतयज्ञस्य तनयो भवितासि महात्मनः
aṣṭāviṁśe dvāpare tu vaso tvaṁ bhuvi bhūpateḥ kṛtayajñasya tanayo bhavitāsi mahātmanaḥ
हे वसु! अट्ठाईसवें द्वापर में तू पृथ्वी पर महात्मा राजा कृतयज्ञ का पुत्र होगा।
श्लोक 22 (skanda.2.196.22)
तत्रापि च यथेदानीं तथा त्वं सकलैर्गुणैः । जुष्टश्च खचरो भाव्यो महाभागवताग्रणीः
tatrāpi ca yathedānīṁ tathā tvaṁ sakalairguṇaiḥ juṣṭaśca khacaro bhāvyo mahābhāgavatāgraṇīḥ
वहाँ भी तू अभी की भाँति ही समस्त गुणों से सम्पन्न, आकाशचारी तथा महाभागवतों में अग्रणी होगा।
श्लोक 23 (skanda.2.196.23)
पञ्चरात्रोक्तविधिना विष्णुमभ्यर्च्य भक्तितः । तच्छेषेण सुरांश्चास्मानर्चयिष्यसि सप्रजः
pañcarātroktavidhinā viṣṇumabhyarcya bhaktitaḥ taccheṣeṇa surāṁścāsmānarcayiṣyasi saprajaḥ
पंचरात्र में कही गई विधि से भक्तिपूर्वक विष्णु की पूजा कर, उसके शेष से अपनी सन्तान सहित तू देवताओं और हम पितरों की पूजा करेगा।
श्लोक 24 (skanda.2.196.24)
ततस्त्वं दिव्यदेहेन स्वर्गलोकमवाप्स्यसि । दिव्यान्भोगांस्तत्र भुक्त्वा प्राप्स्यसे वैष्णवं पदम्
tatastvaṁ divyadehena svargalokamavāpsyasi divyānbhogāṁstatra bhuktvā prāpsyase vaiṣṇavaṁ padam
फिर तू दिव्य शरीर से स्वर्गलोक को प्राप्त करेगा; वहाँ दिव्य भोगों का उपभोग कर तू वैष्णव पद को प्राप्त करेगा।
श्लोक 25 (skanda.2.196.25)
अच्छोदे त्वमपि क्षोण्यां नाम्ना कालीति विश्रुता । स्वांशेन मत्स्यदेहायामद्रिकायां जनिष्यसे
acchode tvamapi kṣoṇyāṁ nāmnā kālīti viśrutā svāṁśena matsyadehāyāmadrikāyāṁ janiṣyase
हे अच्छोदा! तू भी पृथ्वी पर 'काली' नाम से प्रसिद्ध होकर, अपने अंश से मत्स्य-शरीर वाली अद्रिका में उत्पन्न होगी।
श्लोक 26 (skanda.2.196.26)
पराशरात्तत्र सुतं कन्येव प्राप्स्यसे हरिम् । प्रसादादेव तस्य त्वं भुक्तिं मुक्तिं च लप्स्यसे
parāśarāttatra sutaṁ kanyeva prāpsyase harim prasādādeva tasya tvaṁ bhuktiṁ muktiṁ ca lapsyase
वहाँ कन्या रहते हुए ही तू पराशर से हरि-स्वरूप एक पुत्र प्राप्त करेगी; उन्हीं की कृपा से तू भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करेगी।
श्लोक 27 (skanda.2.196.27)
स्कन्द उवाच । इत्थं स पितृभिः शप्तोऽनुगृहीतश्च भूपतिः । कृतयज्ञादिह जनिं प्राप्याऽभूद्विश्रुतो गुणैः
skanda uvāca itthaṁ sa pitṛbhiḥ śapto'nugṛhītaśca bhūpatiḥ kṛtayajñādiha janiṁ prāpyā'bhūdviśruto guṇaiḥ
स्कन्द ने कहा — इस प्रकार पितरों द्वारा शापित तथा अनुगृहीत हुआ वह राजा, यहाँ कृतयज्ञ से जन्म पाकर अपने गुणों से विख्यात हुआ।
श्लोक 28 (skanda.2.196.28)
यथा पूर्वं कृष्णभक्तो दैवपित्र्यविधानवित् । सख्ये तस्मै महेन्द्रश्च प्रादात्प्रचुरसंपदः
yathā pūrvaṁ kṛṣṇabhakto daivapitryavidhānavit sakhye tasmai mahendraśca prādātpracurasaṁpadaḥ
पूर्व की भाँति ही वह कृष्ण का भक्त तथा देव-पित्र्य विधि का ज्ञाता था; और मित्रता में महेन्द्र ने भी उसे प्रचुर सम्पदा प्रदान की।
श्लोक 29 (skanda.2.196.29)
श्वेतद्वीपे वासुदेवात्प्राप्तो यो विजयध्वजः । पुरा स्वेनारिनाशार्थं तस्मा इन्द्रस्तमप्यदात्
śvetadvīpe vāsudevātprāpto yo vijayadhvajaḥ purā svenārināśārthaṁ tasmā indrastamapyadāt
पूर्व में शत्रुनाश के लिए श्वेतद्वीप में वासुदेव से जो विजय-ध्वज प्राप्त हुआ था, वही इन्द्र ने भी उसे प्रदान किया।
श्लोक 30 (skanda.2.196.30)
अन्तरिक्षगती राजा भौमान्भोगान्सुदुर्लभान् । भुक्त्वान्ते स्वर्गलोकं च दिव्यदेहेन लब्धवान्
antarikṣagatī rājā bhaumānbhogānsudurlabhān bhuktvānte svargalokaṁ ca divyadehena labdhavān
आकाशगामी वह राजा, अत्यन्त दुर्लभ भौमिक भोगों का उपभोग कर, अन्त में दिव्य शरीर से स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
श्लोक 31 (skanda.2.196.31)
प्राक्पुण्यशेषस्य फलं भुञ्जन्स्वमनसेप्सितान् । तत्र भोगान्बहुविधांस्तीव्रं वैराग्यमाप्तवान्
prākpuṇyaśeṣasya phalaṁ bhuñjansvamanasepsitān tatra bhogānbahuvidhāṁstīvraṁ vairāgyamāptavān
पूर्व-पुण्य के शेष फल का भोग करते हुए वहाँ अपनी इच्छानुसार नाना प्रकार के भोगों को भोगकर भी उसे तीव्र वैराग्य प्राप्त हुआ।
श्लोक 32 (skanda.2.196.32)
मेरोः शृङ्गेऽथ विजने शुचिः कृतदृढासनः । दध्यौ स्वहृदयाम्भोजे स्वेष्टदेवं रमापतिम्
meroḥ śṛṅge'tha vijane śuciḥ kṛtadṛḍhāsanaḥ dadhyau svahṛdayāmbhoje sveṣṭadevaṁ ramāpatim
फिर मेरु के एकान्त शिखर पर पवित्र होकर, दृढ़ आसन लगाकर, उसने अपने हृदय-कमल में अपने इष्टदेव लक्ष्मीपति का ध्यान किया।
श्लोक 33 (skanda.2.196.33)
त्यक्त्वा देववपुः सोऽथ योगधारणया मुनिः । ततः सूक्ष्मशरीरेण प्राप भास्करमण्डलम् । यदाहुर्नैष्ठिकानां च मुक्तिद्वारं हि योगिनाम्
tyaktvā devavapuḥ so'tha yogadhāraṇayā muniḥ tataḥ sūkṣmaśarīreṇa prāpa bhāskaramaṇḍalam yadāhurnaiṣṭhikānāṁ ca muktidvāraṁ hi yoginām
फिर वह मुनि, योग-धारणा द्वारा अपने दिव्य शरीर को त्यागकर, सूक्ष्म शरीर से सूर्यमण्डल को प्राप्त हुआ, जिसे आजीवन ब्रह्मचारियों तथा योगियों के लिए मुक्ति का द्वार कहा जाता है।
श्लोक 34 (skanda.2.196.34)
तत्तेजोदग्धसूक्ष्माङ्गः सच्चिदूपोऽतिनिर्मलः । स बभूव महाभागः संक्षीणाशेषवासनः
tattejodagdhasūkṣmāṅgaḥ saccidūpo'tinirmalaḥ sa babhūva mahābhāgaḥ saṁkṣīṇāśeṣavāsanaḥ
उस तेज से जिसका सूक्ष्म शरीर दग्ध हो गया, वह महाभाग सत्-चित्-स्वरूप, अत्यन्त निर्मल तथा समस्त वासनाओं से रहित हो गया।
श्लोक 35 (skanda.2.196.35)
ततस्तन्मण्डलगतैरातिवाहिकदैवतैः । स निन्ये वैष्णवं धाम श्वेतद्वीपाख्यमद्भुतम्
tatastanmaṇḍalagatairātivāhikadaivataiḥ sa ninye vaiṣṇavaṁ dhāma śvetadvīpākhyamadbhutam
फिर उस मण्डल में स्थित मार्गदर्शक देवताओं द्वारा वह श्वेतद्वीप नामक अद्भुत वैष्णव धाम को ले जाया गया।
श्लोक 36 (skanda.2.196.36)
स हि द्वीपो भुविस्थोपि भवत्यप्राकृतो मुने । हरिभक्तजनावासः प्राप्य एकान्तभक्तिभिः
sa hi dvīpo bhuvisthopi bhavatyaprākṛto mune haribhaktajanāvāsaḥ prāpya ekāntabhaktibhiḥ
हे मुने! वह द्वीप पृथ्वी पर स्थित होते हुए भी अप्राकृत है, हरि-भक्तों का निवास स्थान है, तथा एकान्त भक्तों द्वारा ही प्राप्य है।
श्लोक 37 (skanda.2.196.37)
स गोलोकब्रह्मपुरवैकुण्ठानां च सुव्रत । द्वारभूतोस्ति भक्तानां तल्लिप्सूनां महात्मनाम्
sa golokabrahmapuravaikuṇṭhānāṁ ca suvrata dvārabhūtosti bhaktānāṁ tallipsūnāṁ mahātmanām
हे सुव्रत! वह द्वीप गोलोक, ब्रह्मपुर तथा वैकुण्ठ को पाने की इच्छा रखने वाले महात्मा भक्तों के लिए द्वार-स्वरूप है।
श्लोक 38 (skanda.2.196.38)
यस्य यद्धाम्न इच्छा स्याद्भजतस्तं तदेव हि । प्रापयन्ति श्वेतमुक्ता मुने प्रागुक्तलक्षणाः
yasya yaddhāmna icchā syādbhajatastaṁ tadeva hi prāpayanti śvetamuktā mune prāguktalakṣaṇāḥ
हे मुने! जिस भक्त की जिस धाम को पाने की इच्छा होती है, पूर्व-वर्णित लक्षणों वाले वे श्वेतद्वीप के मुक्त पुरुष उसे उसी धाम तक पहुँचा देते हैं।
श्लोक 39 (skanda.2.196.39)
दिव्यदेहोऽभवत्तत्र धाम्न्यऽसौ श्वेतमुक्तवत् । प्राप्य गोलोकधामाऽथ परमानन्दमाप्तवान्
divyadeho'bhavattatra dhāmnya'sau śvetamuktavat prāpya golokadhāmā'tha paramānandamāptavān
उस धाम में वह श्वेतद्वीप के मुक्तों के समान दिव्य देह वाला हो गया, और फिर गोलोक-धाम को प्राप्त कर उसने परमानन्द पाया।
श्लोक 40 (skanda.2.196.40)
इत्थमेकान्तिकेनैव धर्मेणाराधयन्ति ये । नारायणं परं ब्रह्म श्वेतमुक्ता भवंति ते
itthamekāntikenaiva dharmeṇārādhayanti ye nārāyaṇaṁ paraṁ brahma śvetamuktā bhavaṁti te
इस प्रकार जो लोग एकान्तिक धर्म से ही परब्रह्म नारायण की आराधना करते हैं, वे श्वेतद्वीप के मुक्त पुरुष बन जाते हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.196.41)
एतत्ते सर्वमाख्यातं पृष्टवान्यद्भवान्मुने । स्थितिरेकांतभक्तानां श्वेतधाम्नश्च लक्षणम्
etatte sarvamākhyātaṁ pṛṣṭavānyadbhavānmune sthitirekāṁtabhaktānāṁ śvetadhāmnaśca lakṣaṇam
हे मुने! तुमने जो पूछा था वह सब — एकान्त भक्तों की स्थिति तथा श्वेतधाम का लक्षण — तुम्हें बता दिया गया।