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वैष्णव खण्ड · अध्याय 197

देवेन्द्र-शाप

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198

श्लोक 1 (skanda.2.197.1)

सावर्णिरुवाच । महर्षिवारितैर्द्देवैस्त्यक्ते हिंसामये मखे । पुनः कथं संप्रवृत्ता मखाः सर्वत्र तादृशाः

sāvarṇiruvāca maharṣivāritairddevaistyakte hiṁsāmaye makhe punaḥ kathaṁ saṁpravṛttā makhāḥ sarvatra tādṛśāḥ

सावर्णि ने कहा — जब महर्षियों द्वारा रोके गए देवताओं ने वह हिंसामय यज्ञ त्याग दिया था, तो फिर सर्वत्र वैसे ही यज्ञ पुनः कैसे प्रचलित हुए?

श्लोक 2 (skanda.2.197.2)

देवेष्वृषिषु भूपेषु प्राचीनाधुनिकेषु च । सनातनः शुद्धधर्मो विपर्यासं कथं गतः

deveṣvṛṣiṣu bhūpeṣu prācīnādhunikeṣu ca sanātanaḥ śuddhadharmo viparyāsaṁ kathaṁ gataḥ

प्राचीन तथा आधुनिक देवताओं, ऋषियों और राजाओं में सनातन शुद्ध धर्म विपरीत रूप में कैसे परिणत हो गया?

श्लोक 3 (skanda.2.197.3)

अत्र मे संशयो भूयान्संजातोऽद्य षडानन । त्वं सर्वशास्त्रतत्त्वज्ञस्तमपाकर्त्तुमर्हसि

atra me saṁśayo bhūyānsaṁjāto'dya ṣaḍānana tvaṁ sarvaśāstratattvajñastamapākarttumarhasi

हे षडानन! इस विषय में आज मुझे बड़ा संशय उत्पन्न हुआ है; आप समस्त शास्त्रों के तत्त्वज्ञ हैं, उसे दूर करने योग्य हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.197.4)

स्कन्द उवाच । कालो बलीयान्बलिनां भिद्यन्ते तेन बुद्धयः । कामक्रोधरसास्वादलोभमानवतां मुने

skanda uvāca kālo balīyānbalināṁ bhidyante tena buddhayaḥ kāmakrodharasāsvādalobhamānavatāṁ mune

स्कन्द ने कहा — हे मुने! काल बलवानों से भी बलवान है; उसी के द्वारा काम, क्रोध, रस-लोलुपता, लोभ तथा अभिमान वालों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

श्लोक 5 (skanda.2.197.5)

अतिक्रमेण महतां यथार्थहितभाषिणाम् । क्रोधमानवशात्पुंसां नश्यन्त्येव च सद्धियः

atikrameṇa mahatāṁ yathārthahitabhāṣiṇām krodhamānavaśātpuṁsāṁ naśyantyeva ca saddhiyaḥ

यथार्थ हित बोलने वाले महापुरुषों के अतिक्रमण से, क्रोध और अभिमान के वशीभूत मनुष्यों की सद्बुद्धि नष्ट हो ही जाती है।

श्लोक 6 (skanda.2.197.6)

अकार्यमपि ते कर्तुं तदानीं तु बुधा अपि । प्रवर्त्तन्तेऽनुतप्यन्ते बम्भ्रम्यन्तेऽथ संसृतौ

akāryamapi te kartuṁ tadānīṁ tu budhā api pravarttante'nutapyante bambhramyante'tha saṁsṛtau

उस समय बुद्धिमान भी अकरणीय कर्म करने में प्रवृत्त हो जाते हैं, फिर पश्चाताप करते हैं, और संसार-चक्र में भटकते रहते हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.197.7)

कामादिभिर्विहीना ये सात्वताः क्षीणवासनाः । तेषां तु बुद्धिभेदाय क्वापि कालो न शक्नुते

kāmādibhirvihīnā ye sātvatāḥ kṣīṇavāsanāḥ teṣāṁ tu buddhibhedāya kvāpi kālo na śaknute

किन्तु जो सात्वत भक्त काम आदि से रहित तथा जिनकी वासनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, उनकी बुद्धि को भ्रष्ट करने में काल कहीं भी समर्थ नहीं होता।

श्लोक 8 (skanda.2.197.8)

अनाश्रितस्तु सद्धर्मं पुमान्कश्चन कर्हिचित् । संसृतेर्म्मुच्यते नैव सत्यमेतद्वचो मम

anāśritastu saddharmaṁ pumānkaścana karhicit saṁsṛtermmucyate naiva satyametadvaco mama

जो पुरुष सद्धर्म का आश्रय नहीं लेता, वह कभी भी संसार-बन्धन से मुक्त नहीं होता — यह मेरा वचन सत्य है।

श्लोक 9 (skanda.2.197.9)

प्रवृत्तिं हिंस्रयज्ञादेरथ ते द्विजसत्तम । कथयामि यथा पूर्वं मयाऽश्रावि पितुर्मुखात्

pravṛttiṁ hiṁsrayajñāderatha te dvijasattama kathayāmi yathā pūrvaṁ mayā'śrāvi piturmukhāt

हे द्विजसत्तम! अब मैं तुम्हें हिंसक यज्ञ आदि की उत्पत्ति उसी प्रकार कहता हूँ जैसे पूर्व में मैंने अपने पिता के मुख से सुना था।

श्लोक 10 (skanda.2.197.10)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारायणस्य माहात्म्यं यत्र लक्ष्म्याश्च कीर्तितम्

atrāpyudāharantīmamitihāsaṁ purātanam nārāyaṇasya māhātmyaṁ yatra lakṣmyāśca kīrtitam

इस विषय में भी यह प्राचीन इतिहास कहा जाता है, जिसमें नारायण तथा लक्ष्मी की महिमा का वर्णन है।

श्लोक 11 (skanda.2.197.11)

मुनीनां बृहतां तेषामतिक्रमणदोषतः । इन्द्रस्यासीद्विश्वजितः सद्बुद्धिविलयो मुने

munīnāṁ bṛhatāṁ teṣāmatikramaṇadoṣataḥ indrasyāsīdviśvajitaḥ sadbuddhivilayo mune

हे मुने! उन महान मुनियों के अतिक्रमण के दोष से ही इन्द्र विश्वजित की सद्बुद्धि नष्ट हो गई थी।

श्लोक 12 (skanda.2.197.12)

दुर्वासाः शंकरस्यांशस्तपस्वी मुनिरेकदा । चरन्यदृच्छया लोकान्पुष्पभद्रां नदीं ययौ

durvāsāḥ śaṁkarasyāṁśastapasvī munirekadā caranyadṛcchayā lokānpuṣpabhadrāṁ nadīṁ yayau

शंकर के अंशरूप तपस्वी मुनि दुर्वासा एक बार लोकों में स्वेच्छा से विचरण करते हुए पुष्पभद्रा नदी पर पहुँचे।

श्लोक 13 (skanda.2.197.13)

जलक्रीडार्थमायांतीं स्वर्गात्तत्र सखीवृताम् । विद्याधरस्य सुमतेरङ्गनां स समैक्षत

jalakrīḍārthamāyāṁtīṁ svargāttatra sakhīvṛtām vidyādharasya sumateraṅganāṁ sa samaikṣata

वहाँ उन्होंने जल-क्रीड़ा के लिए स्वर्ग से सखियों सहित आती हुई विद्याधर सुमति की पत्नी को देखा।

श्लोक 14 (skanda.2.197.14)

स्वर्गङ्गाहेमकमलैर्ग्रथितामतिसौरभाम् । दधतीं दक्षिणे पाणौ स्रजं मदकलाभिधाम्

svargaṅgāhemakamalairgrathitāmatisaurabhām dadhatīṁ dakṣiṇe pāṇau srajaṁ madakalābhidhām

वह अपने दाहिने हाथ में स्वर्ग-गंगा के स्वर्ण-कमलों से गूँथी हुई, अत्यन्त सुगन्धित, 'मदकला' नामक माला धारण किए हुए थी।

श्लोक 15 (skanda.2.197.15)

तामवेक्ष्य मुनिस्तस्याः समीपमुपगम्य सः । उन्मत्तवद्ययाचे तां स्रजं विद्याधरीधृताम्

tāmavekṣya munistasyāḥ samīpamupagamya saḥ unmattavadyayāce tāṁ srajaṁ vidyādharīdhṛtām

उसे देखकर मुनि उसके समीप गए और उन्मत्त के समान उस विद्याधरी द्वारा धारण की गई माला की याचना करने लगे।

श्लोक 16 (skanda.2.197.16)

सापि प्रणम्य तं सद्यो माहात्म्यं तस्य जानती । तत्कंठे धारयामास मालां तां परमादरात्

sāpi praṇamya taṁ sadyo māhātmyaṁ tasya jānatī tatkaṁṭhe dhārayāmāsa mālāṁ tāṁ paramādarāt

उसके माहात्म्य को जानने वाली उसने भी तुरन्त प्रणाम कर, परम आदर के साथ वह माला उनके गले में पहना दी।

श्लोक 17 (skanda.2.197.17)

ततः प्रीतमना गच्छन्गायन्नुन्मत्तवन्मुनिः । ददर्श पथि देवेन्द्रमायान्तं तां महानदीम्

tataḥ prītamanā gacchangāyannunmattavanmuniḥ dadarśa pathi devendramāyāntaṁ tāṁ mahānadīm

फिर प्रसन्न मन से उन्मत्त के समान गाते हुए जाते मुनि ने मार्ग में उस महानदी की ओर आते हुए देवेन्द्र को देखा।

श्लोक 18 (skanda.2.197.18)

अप्सरोभिश्च गन्धर्वैः सतालं मधुरस्वरम् । उपगीयमानविजयमधिरूढं गजाधिपम्

apsarobhiśca gandharvaiḥ satālaṁ madhurasvaram upagīyamānavijayamadhirūḍhaṁ gajādhipam

वे गजराज पर आरूढ़ थे, और अप्सराओं तथा गन्धर्वों द्वारा ताल सहित मधुर स्वर में उनकी विजय गाई जा रही थी।

श्लोक 19 (skanda.2.197.19)

रम्भामधुरसंगीतश्रवणानन्दनिर्वृतम् । तन्मुखाब्जस्थिरदृशं छत्रचामरशोभितम्

rambhāmadhurasaṁgītaśravaṇānandanirvṛtam tanmukhābjasthiradṛśaṁ chatracāmaraśobhitam

वे रम्भा के मधुर संगीत को सुनने के आनन्द में लीन थे, उसके मुखकमल पर उनकी दृष्टि स्थिर थी, और वे छत्र-चामर से सुशोभित थे।

श्लोक 20 (skanda.2.197.20)

अनवेक्षमाणमात्मानं तं दृष्ट्वा सोऽत्रिनन्दनः । स्वकण्ठस्थां स्रजं तस्मिंश्चिक्षेपोन्मत्तवद्धसन्

anavekṣamāṇamātmānaṁ taṁ dṛṣṭvā so'trinandanaḥ svakaṇṭhasthāṁ srajaṁ tasmiṁścikṣeponmattavaddhasan

अपनी ओर ध्यान न देते हुए इन्द्र को देखकर, उन अत्रि-नन्दन ने उन्मत्त के समान हँसते हुए अपने गले की वह माला उन पर फेंक दी।

श्लोक 21 (skanda.2.197.21)

इन्द्रोप्यधर्मसर्गेण समाविष्टः पुरैव यत् । ततस्तदा कामवशस्तां न्यधाद्गजकुम्भयोः । तत्सौरभाकृष्टचेताः करीन्द्रः शुण्डयाऽकृषत्

indropyadharmasargeṇa samāviṣṭaḥ puraiva yat tatastadā kāmavaśastāṁ nyadhādgajakumbhayoḥ tatsaurabhākṛṣṭacetāḥ karīndraḥ śuṇḍayā'kṛṣat

इन्द्र भी, जो पहले से ही अधर्म के अंश से आविष्ट थे, उस समय अभिमानवश उस माला को हाथी के मस्तक पर रख दिया; उसकी सुगन्ध से आकृष्ट-चित्त हुए गजराज ने उसे सूँड़ से खींच लिया।

श्लोक 22 (skanda.2.197.22)

करात्सा पतिता भूमौ तां च गच्छन्करी पदा । ममर्द्द पश्यतस्तस्य महर्षेस्तपसां निधेः

karātsā patitā bhūmau tāṁ ca gacchankarī padā mamardda paśyatastasya maharṣestapasāṁ nidheḥ

वह उसके सूँड़ से भूमि पर गिर पड़ी, और आगे बढ़ते हुए गजराज ने उसे उन तपोनिधि महर्षि के देखते-देखते ही पैर से कुचल दिया।

श्लोक 23 (skanda.2.197.23)

ततः क्रुद्धः स दुर्वासाः प्रलयाग्न्यरुणेक्षणः । प्राहेन्द्रं मत्त दुष्टात्मन्स्तब्धोसि कामलम्पट

tataḥ kruddhaḥ sa durvāsāḥ pralayāgnyaruṇekṣaṇaḥ prāhendraṁ matta duṣṭātmanstabdhosi kāmalampaṭa

तब क्रोधित हुए दुर्वासा, जिनकी आँखें प्रलय-अग्नि के समान लाल हो गई थीं, इन्द्र से बोले — रे मत्त! दुष्टात्मन्! तू अभिमानी और कामलम्पट हो गया है।

श्लोक 24 (skanda.2.197.24)

श्रियो धाम स्रजं प्रीत्या मद्दत्तां नाभिनन्दसि । प्रणाममपि रे मूढ न करोषि त्वमुन्मदः

śriyo dhāma srajaṁ prītyā maddattāṁ nābhinandasi praṇāmamapi re mūḍha na karoṣi tvamunmadaḥ

तू मेरे द्वारा प्रेमपूर्वक दी गई, श्री की निवासस्थान इस माला का सम्मान भी नहीं करता; रे मूर्ख! उन्मत्त होकर तू मुझे प्रणाम भी नहीं करता।

श्लोक 25 (skanda.2.197.25)

न वीक्षसे मामपि त्वं त्वादृङ्मत्तैकशिक्षकम् । त्रैलोक्यराज्यप्राप्तान्ध्यः सम्यक्त्वां शिक्षयेऽधुना

na vīkṣase māmapi tvaṁ tvādṛṅmattaikaśikṣakam trailokyarājyaprāptāndhyaḥ samyaktvāṁ śikṣaye'dhunā

तू तेरे जैसे मत्तों का एकमात्र शिक्षक मुझे देखता तक नहीं; त्रिलोक-राज्य पाकर अन्धा हुआ है — अब मैं तुझे भली-भाँति शिक्षा दूँगा।

श्लोक 26 (skanda.2.197.26)

यस्याः प्रसादात्त्रैलोक्यराज्यसौख्यं त्वमाप्तवान् । सैव श्रीः सत्रिलोकं त्वां हित्वा लीनाऽस्तु सागरे

yasyāḥ prasādāttrailokyarājyasaukhyaṁ tvamāptavān saiva śrīḥ satrilokaṁ tvāṁ hitvā līnā'stu sāgare

जिस श्री की कृपा से तूने त्रिलोक-राज्य का सुख पाया है, वही श्री तीनों लोकों सहित तुझे त्यागकर सागर में लीन हो जाए।

श्लोक 27 (skanda.2.197.27)

वज्रपातोपमं वाक्यं तन्निशम्यैव तत्क्षणम् । गजादुत्प्लुत्य विमदस्तदंघ्र्योर्न्यपतद्धरि

vajrapātopamaṁ vākyaṁ tanniśamyaiva tatkṣaṇam gajādutplutya vimadastadaṁghryornyapataddhari

वज्रपात के समान उस वचन को सुनते ही उसी क्षण, अभिमान से रहित होकर इन्द्र हाथी से कूदकर उनके चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 28 (skanda.2.197.28)

प्रार्थयामास च मुहुः प्रणमंस्तं सवेपथुः । प्रसादं मयि दासे त्वं कृपालो कर्तुमर्हसि

prārthayāmāsa ca muhuḥ praṇamaṁstaṁ savepathuḥ prasādaṁ mayi dāse tvaṁ kṛpālo kartumarhasi

काँपते हुए वे बार-बार प्रणाम करते हुए प्रार्थना करने लगे — हे कृपालु! मुझ दास पर आप कृपा करने योग्य हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.197.29)

तं प्राहाऽथ स रे शक्र नाहं वै गौतमो मुनिः । अक्षमासारसर्वस्वं दुर्वाससमवेहि माम्

taṁ prāhā'tha sa re śakra nāhaṁ vai gautamo muniḥ akṣamāsārasarvasvaṁ durvāsasamavehi mām

तब उन्होंने उससे कहा — रे शक्र! मैं क्षमाशील मुनि गौतम नहीं हूँ, जिनका सारा सार ही क्षमा है; मुझे दुर्वासा जानो।

श्लोक 30 (skanda.2.197.30)

अन्ये ते मुनयो दुष्टास्तावकास्तेऽनुवर्त्तिनः । अहं तु त्वादृशान्कीटान्गणये नैव निःस्पृहः

anye te munayo duṣṭāstāvakāste'nuvarttinaḥ ahaṁ tu tvādṛśānkīṭāngaṇaye naiva niḥspṛhaḥ

तेरे वे अन्य अनुयायी मुनि दूषित हैं, तेरे पिछलग्गू; परन्तु मैं निःस्पृह हूँ, तेरे जैसे कीड़ों को कुछ भी नहीं गिनता।

श्लोक 31 (skanda.2.197.31)

ज्वलज्जटाकलापाच्च भ्रुकुटीकुटिलेक्षणात् । को वा न बिभियान्मत्तो ब्रह्माण्डे पापकर्मकृत्

jvalajjaṭākalāpācca bhrukuṭīkuṭilekṣaṇāt ko vā na bibhiyānmatto brahmāṇḍe pāpakarmakṛt

मेरी जलती हुई जटाओं तथा भ्रुकुटी से कुटिल दृष्टि को देखकर, इस ब्रह्माण्ड में कौन पापकर्मी मुझसे भयभीत नहीं होगा?

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198