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वैष्णव खण्ड · अध्याय 198

हिंसक यज्ञ की प्रवृत्ति के हेतु का निरूपण

अध्याय 197अध्याय-सूचीअध्याय 199

श्लोक 1 (skanda.2.198.1)

स्कन्द उवाच । भाविधर्मविपर्यासकालवेगवशोऽथ सः । नाहं क्षमिष्य इत्युक्त्वा कैलासं प्रययौ मुने

skanda uvāca bhāvidharmaviparyāsakālavegavaśo'tha saḥ nāhaṁ kṣamiṣya ityuktvā kailāsaṁ prayayau mune

स्कन्द ने कहा — हे मुने! धर्म के भावी विपर्यास तथा काल के वेग के वशीभूत होकर, वे दुर्वासा 'मैं क्षमा नहीं करूँगा' यह कहकर कैलास को चले गए।

श्लोक 2 (skanda.2.198.2)

त्रैलोक्याच्छ्रीरपि तदा समुद्रेन्तर्द्धिमाययौ । इन्द्रं विहायाप्सरसः सर्वशः श्रियमन्वयुः

trailokyācchrīrapi tadā samudrentarddhimāyayau indraṁ vihāyāpsarasaḥ sarvaśaḥ śriyamanvayuḥ

तब त्रिलोकी से श्री भी सागर में अन्तर्धान हो गईं; और अप्सराएँ इन्द्र को छोड़कर सर्वथा श्री का ही अनुसरण करने लगीं।

श्लोक 3 (skanda.2.198.3)

तपः शौचं दया सत्यं पादः सद्धर्मऋद्धयः । सिद्धयश्च बलं सत्त्वं सर्वतः श्रियमन्वयुः

tapaḥ śaucaṁ dayā satyaṁ pādaḥ saddharmaṛddhayaḥ siddhayaśca balaṁ sattvaṁ sarvataḥ śriyamanvayuḥ

तप, शौच, दया, सत्य, सद्धर्म का चरण, ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ, बल तथा सत्त्व — ये सब सर्वत्र से श्री के पीछे चले गए।

श्लोक 4 (skanda.2.198.4)

गजादीनि च यानानि स्वर्णाद्याभूषणानि च । चिक्षिपुर्मणिरत्नानि धातूपकरणानि च

gajādīni ca yānāni svarṇādyābhūṣaṇāni ca cikṣipurmaṇiratnāni dhātūpakaraṇāni ca

हाथी आदि वाहन, स्वर्ण आदि के आभूषण, मणि-रत्न तथा धातु के उपकरण भी अपना मूल्य छोड़ बैठे।

श्लोक 5 (skanda.2.198.5)

अन्नान्यौषधयः स्नेहाः कालेनाल्पेन चिक्षियुः । न क्षीरं धेनुमहिषीप्रमुखानां स्तनेष्वऽभूत्

annānyauṣadhayaḥ snehāḥ kālenālpena cikṣiyuḥ na kṣīraṁ dhenumahiṣīpramukhānāṁ staneṣva'bhūt

अन्न, औषधियाँ तथा स्नेह-पदार्थ अल्प काल में ही नष्ट हो गए; गायों और भैंसों आदि के थनों में दूध भी नहीं रहा।

श्लोक 6 (skanda.2.198.6)

नवापि निधयो नष्टाः कुबेरस्यापि मन्दिरात । इन्द्रः सहामरगणैरासीत्तापससन्निभः

navāpi nidhayo naṣṭāḥ kuberasyāpi mandirāta indraḥ sahāmaragaṇairāsīttāpasasannibhaḥ

कुबेर के भवन से भी नवों निधियाँ नष्ट हो गईं; इन्द्र भी देवगणों सहित तपस्वी के समान दरिद्र हो गए।

श्लोक 7 (skanda.2.198.7)

सर्वाणि भोगद्रव्याणि नाशमीयुस्त्रिलोकतः । देवा दैत्या मनुष्याश्च सर्वे दारिद्यपीडिताः

sarvāṇi bhogadravyāṇi nāśamīyustrilokataḥ devā daityā manuṣyāśca sarve dāridyapīḍitāḥ

तीनों लोकों से समस्त भोग्य पदार्थ नष्ट हो गए; देवता, दैत्य तथा मनुष्य सभी दरिद्रता से पीड़ित हो गए।

श्लोक 8 (skanda.2.198.8)

कान्त्या हीनस्ततश्चन्द्रः प्रापाम्बुत्वं महोदधौ । अनावृष्टिर्महत्यासीद्धान्यबीजक्षयंकरी

kāntyā hīnastataścandraḥ prāpāmbutvaṁ mahodadhau anāvṛṣṭirmahatyāsīddhānyabījakṣayaṁkarī

कान्तिहीन हुआ चन्द्रमा मानो महासागर के जल के समान फीका पड़ गया; धान्य-बीज को नष्ट करने वाला भारी अनावृष्टि का काल आया।

श्लोक 9 (skanda.2.198.9)

क्वान्नं क्वान्नेति जल्पन्तः क्षुत्क्षामाश्च निरोजसः । त्यक्त्वा ग्रामान्पुरश्चोषुर्वनेषु च नगेषु च

kvānnaṁ kvānneti jalpantaḥ kṣutkṣāmāśca nirojasaḥ tyaktvā grāmānpuraścoṣurvaneṣu ca nageṣu ca

'अन्न कहाँ है, अन्न कहाँ है' कहते हुए, भूख से दुर्बल तथा निस्तेज लोग गाँवों और नगरों को छोड़कर वनों तथा पर्वतों में रहने लगे।

श्लोक 10 (skanda.2.198.10)

क्षुधार्त्तास्ते पशून्हत्वा ग्राम्यानारण्यकांस्तथा । पक्त्वाऽपक्त्वापि वा केचित्तेषां मांसान्यभुञ्जत

kṣudhārttāste paśūnhatvā grāmyānāraṇyakāṁstathā paktvā'paktvāpi vā kecitteṣāṁ māṁsānyabhuñjata

भूख से पीड़ित होकर वे ग्राम्य तथा वन्य पशुओं को मारकर, कुछ लोग पकाकर या बिना पकाए भी उनका मांस खाने लगे।

श्लोक 11 (skanda.2.198.11)

विद्वांसो मुनयश्चाऽथ ये वै सद्धर्मचारिणः । म्रियमाणाः क्षुधाऽथापि नाश्नन्त पललानि तु

vidvāṁso munayaścā'tha ye vai saddharmacāriṇaḥ mriyamāṇāḥ kṣudhā'thāpi nāśnanta palalāni tu

किन्तु विद्वान और सद्धर्म का आचरण करने वाले मुनि, भूख से मरते हुए भी मांस नहीं खाते थे।

श्लोक 12 (skanda.2.198.12)

तदा तु वृद्धा ऋषयस्तान्दृष्ट्वाऽनशनादृतान् । मनुभिः सह वेदोक्तमापद्धर्ममबोधयन्

tadā tu vṛddhā ṛṣayastāndṛṣṭvā'naśanādṛtān manubhiḥ saha vedoktamāpaddharmamabodhayan

तब वृद्ध ऋषियों ने उन्हें अनशन का व्रत रखते देखकर, मनुओं सहित उन्हें वेदोक्त आपद्धर्म का उपदेश दिया।

श्लोक 13 (skanda.2.198.13)

मुनयः प्रायशस्तत्र क्षुधा व्याकुलितेन्द्रियाः । परोक्षवादवेदार्थान्विपरीतान्प्रपेदिरे

munayaḥ prāyaśastatra kṣudhā vyākulitendriyāḥ parokṣavādavedārthānviparītānprapedire

वहाँ प्रायः भूख से व्याकुल इन्द्रियों वाले मुनियों ने वेद के परोक्ष-वाद अर्थों के विपरीत अर्थ ग्रहण कर लिए।

श्लोक 14 (skanda.2.198.14)

अर्थं चाजादिशब्दानां मुख्यं छागादिमेव ते । बुबुधुश्चाऽथ ते प्राहुर्यज्ञान् कुरुत भो द्विजाः

arthaṁ cājādiśabdānāṁ mukhyaṁ chāgādimeva te bubudhuścā'tha te prāhuryajñān kuruta bho dvijāḥ

उन्होंने 'अज' आदि शब्दों का मुख्य अर्थ केवल बकरा आदि ही समझा, और फिर कहा — हे द्विजो! यज्ञ करो।

श्लोक 15 (skanda.2.198.15)

या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसास्ति दोषदा । उद्दिश्य देवान्पितॄंश्च ततो घ्नत पशूञ्छुभान्

yā vedavihitā hiṁsā na sā hiṁsāsti doṣadā uddiśya devānpitṝṁśca tato ghnata paśūñchubhān

'जो हिंसा वेद-विहित है, वह दोष देने वाली हिंसा नहीं है; अतः देवताओं तथा पितरों के उद्देश्य से शुभ पशुओं का वध करो।'

श्लोक 16 (skanda.2.198.16)

प्रोक्षितं देवताभ्यश्च पितृभ्यश्च निवेदितम् । भुञ्जत स्वेप्सितं मांसं स्वार्थं तु घ्नत मा पशून्

prokṣitaṁ devatābhyaśca pitṛbhyaśca niveditam bhuñjata svepsitaṁ māṁsaṁ svārthaṁ tu ghnata mā paśūn

'देवताओं तथा पितरों को अर्पित तथा प्रोक्षित इच्छित मांस खाओ; परन्तु अपने स्वार्थ के लिए पशुओं का वध मत करो।'

श्लोक 17 (skanda.2.198.17)

ततो देवर्षिभूपाला नराश्च स्वस्वशक्तितः । चक्रुस्तैर्बोधिता यज्ञानृते ह्येकान्तिकान्हरेः

tato devarṣibhūpālā narāśca svasvaśaktitaḥ cakrustairbodhitā yajñānṛte hyekāntikānhareḥ

तब उनके द्वारा उपदिष्ट होकर, देवता, ऋषि, राजा तथा मनुष्यों ने अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार यज्ञ किए — हरि के एकान्तिक भक्तों को छोड़कर।

श्लोक 18 (skanda.2.198.18)

गोमेधमश्वमेधं च नरमेधमुखान्मखान् । चक्रुर्यज्ञावशिष्टानि मांसानि बुभुजुश्च ते

gomedhamaśvamedhaṁ ca naramedhamukhānmakhān cakruryajñāvaśiṣṭāni māṁsāni bubhujuśca te

उन्होंने गोमेध, अश्वमेध तथा नरमेध आदि यज्ञ किए, और यज्ञ के शेष मांस को खाया भी।

श्लोक 19 (skanda.2.198.19)

विनष्टायाः श्रियः प्राप्त्यै केचिद्यज्ञांश्च चक्रिरे । स्त्रीपुत्रमंदिराद्यर्थं केचिच्च स्वीयवृत्तये

vinaṣṭāyāḥ śriyaḥ prāptyai kecidyajñāṁśca cakrire strīputramaṁdirādyarthaṁ kecicca svīyavṛttaye

कुछ ने नष्ट हुई श्री की प्राप्ति के लिए यज्ञ किए, तथा कुछ ने स्त्री, पुत्र, घर आदि के लिए और अपनी जीविका के लिए किए।

श्लोक 20 (skanda.2.198.20)

महायज्ञेष्वशक्तास्तु पितॄनुदिश्य भूरिशः । निहत्य श्राद्धेषु पशून्मांसान्यादंस्तथाऽऽदयन्

mahāyajñeṣvaśaktāstu pitṝnudiśya bhūriśaḥ nihatya śrāddheṣu paśūnmāṁsānyādaṁstathā''dayan

महायज्ञों में असमर्थ लोग, बहुधा पितरों के उद्देश्य से श्राद्धों में पशुओं को मारकर उनका मांस खाते और खिलाते थे।

श्लोक 21 (skanda.2.198.21)

केचित्सरित्समुद्राणां तीरेष्वेवावसञ्जनाः । मत्स्याञ्जालैरुपादाय तदाहारा बभूविरे

kecitsaritsamudrāṇāṁ tīreṣvevāvasañjanāḥ matsyāñjālairupādāya tadāhārā babhūvire

कुछ लोग नदियों और समुद्रों के तटों पर ही रहते हुए, जालों से मछलियाँ पकड़कर उन्हीं का आहार करने लगे।

श्लोक 22 (skanda.2.198.22)

स्वगृहागतशिष्टेभ्यः पशूनेव निहत्य च । निवेदयामासुरेते गोछागप्रमुखान्मुने

svagṛhāgataśiṣṭebhyaḥ paśūneva nihatya ca nivedayāmāsurete gochāgapramukhānmune

हे मुने! ये लोग अपने घर आए हुए सज्जन अतिथियों के लिए गाय, बकरे आदि पशुओं को मारकर उन्हें अर्पित करने लगे।

श्लोक 23 (skanda.2.198.23)

सजातीयविवाहानां नियमश्च तदा क्वचित् । नाभवद्धर्मसांकर्याद्वित्तवेश्माद्यभावतः

sajātīyavivāhānāṁ niyamaśca tadā kvacit nābhavaddharmasāṁkaryādvittaveśmādyabhāvataḥ

तब धर्म के मिश्रण तथा धन-गृह आदि के अभाव से, कहीं-कहीं सजातीय विवाह का नियम भी नहीं रहा।

श्लोक 24 (skanda.2.198.24)

ब्राह्मणाः क्षत्रियादीनां क्षत्राद्या ब्रह्मणां सुताः । उपयेमिरे कालगत्या स्वस्ववंशविवृद्धये

brāhmaṇāḥ kṣatriyādīnāṁ kṣatrādyā brahmaṇāṁ sutāḥ upayemire kālagatyā svasvavaṁśavivṛddhaye

काल की गति से, अपने-अपने वंश की वृद्धि के लिए, ब्राह्मणों ने क्षत्रिय आदि की और क्षत्रिय आदि ने ब्राह्मणों की पुत्रियों से विवाह किया।

श्लोक 25 (skanda.2.198.25)

इत्थं हिंसामया यज्ञाः संप्रवृत्ता महापदि । धर्मस्त्वाभासमात्रोऽस्थात्स्वयं तु श्रियमन्वगात्

itthaṁ hiṁsāmayā yajñāḥ saṁpravṛttā mahāpadi dharmastvābhāsamātro'sthātsvayaṁ tu śriyamanvagāt

इस प्रकार उस महान विपत्ति में हिंसामय यज्ञ प्रचलित हो गए; धर्म केवल आभास मात्र रह गया, स्वयं तो वह श्री के पीछे ही चला गया।

श्लोक 26 (skanda.2.198.26)

अधर्मः सान्वयो लोकांस्त्रीनपि व्याप्य सर्वतः । अवर्द्धताऽल्पकालेन दुर्निवार्यो बुधैरपि

adharmaḥ sānvayo lokāṁstrīnapi vyāpya sarvataḥ avarddhatā'lpakālena durnivāryo budhairapi

अधर्म अपनी सन्तान सहित तीनों लोकों में सर्वत्र व्याप्त होकर अल्प काल में ही इतना बढ़ गया कि विद्वानों द्वारा भी उसे रोकना कठिन हो गया।

श्लोक 27 (skanda.2.198.27)

दरिद्राणामथैतेषामपत्यानि तु भूरिशः । तेषां च वंशविस्तारो महाँल्लोकेष्ववर्द्धत

daridrāṇāmathaiteṣāmapatyāni tu bhūriśaḥ teṣāṁ ca vaṁśavistāro mahā~llokeṣvavarddhata

फिर इन दरिद्र लोगों की सन्तानें बहुत बढ़ गईं, और उनके वंश का विस्तार भी लोक में महान रूप से बढ़ता गया।

श्लोक 28 (skanda.2.198.28)

विद्वांसस्तत्र ये जातास्ते तु धर्मं तमेव हि । मेनिरे मुख्यमेवाऽथ ग्रन्थांश्चक्रुश्च तादृशान्

vidvāṁsastatra ye jātāste tu dharmaṁ tameva hi menire mukhyamevā'tha granthāṁścakruśca tādṛśān

उनमें जो विद्वान उत्पन्न हुए, उन्होंने उसी को मुख्य धर्म मान लिया, और वैसे ही ग्रन्थों की रचना कर डाली।

श्लोक 29 (skanda.2.198.29)

ते परम्परया ग्रन्थाः प्रामाण्यं प्रतिपेदिरे । आद्ये त्रेतायुगे हीत्थमासीद्धर्मस्य विप्लवः

te paramparayā granthāḥ prāmāṇyaṁ pratipedire ādye tretāyuge hītthamāsīddharmasya viplavaḥ

वे ग्रन्थ परम्परा से प्रामाणिकता को प्राप्त हो गए। इस प्रकार आदि त्रेतायुग में ही धर्म का यह विप्लव हुआ था।

श्लोक 30 (skanda.2.198.30)

ततःप्रभृति लोकेषु यज्ञादौ पशुहिंसनम् । बभूव सत्ये तु युगे धर्म आसीत्सनातनः

tataḥprabhṛti lokeṣu yajñādau paśuhiṁsanam babhūva satye tu yuge dharma āsītsanātanaḥ

तभी से लोक में यज्ञ आदि में पशु-हिंसा होने लगी; परन्तु सत्ययुग में तो धर्म सदा सनातन ही रहा था।

श्लोक 31 (skanda.2.198.31)

कालेन महता सोपि सह देवैः सुराधिपः । आराध्य संपदं प्राप वासुदेवं प्रभुं मुने

kālena mahatā sopi saha devaiḥ surādhipaḥ ārādhya saṁpadaṁ prāpa vāsudevaṁ prabhuṁ mune

हे मुने! दीर्घ काल के पश्चात्, सुराधिप इन्द्र ने भी देवताओं सहित प्रभु वासुदेव की आराधना कर पुनः सम्पत्ति प्राप्त की।

श्लोक 32 (skanda.2.198.32)

ततो धर्मनिकेतस्य श्रीपतेः कृपया हरेः । यथापूर्वं च सद्धर्मस्त्रिलोक्यां संप्रवर्त्तत

tato dharmaniketasya śrīpateḥ kṛpayā hareḥ yathāpūrvaṁ ca saddharmastrilokyāṁ saṁpravarttata

फिर धर्म के आश्रय तथा श्री के पति हरि की कृपा से, सद्धर्म पुनः पूर्व की भाँति ही तीनों लोकों में प्रवर्तित हुआ।

श्लोक 33 (skanda.2.198.33)

तत्रापि केचिन्मुनयो नृपा देवाश्च मानुषाः । कामक्रोधरसास्वादलोभोपहतसद्धियः । तमापद्धर्ममद्यापि प्राधान्येनैव मन्वते

tatrāpi kecinmunayo nṛpā devāśca mānuṣāḥ kāmakrodharasāsvādalobhopahatasaddhiyaḥ tamāpaddharmamadyāpi prādhānyenaiva manvate

फिर भी कुछ मुनि, राजा, देवता तथा मनुष्य, जिनकी सद्बुद्धि काम, क्रोध, रस-लोलुपता और लोभ से नष्ट हो गई है, आज भी उस आपद्धर्म को ही प्रमुख मानते हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.198.34)

एकान्तिनो भागवता जितकामादयस्तु ये । आपद्यपि न तेऽगृह्णंस्तं तदा किमुताऽन्यदा

ekāntino bhāgavatā jitakāmādayastu ye āpadyapi na te'gṛhṇaṁstaṁ tadā kimutā'nyadā

किन्तु जो एकान्तिक भागवत काम आदि को जीत चुके हैं, उन्होंने विपत्ति में भी उसे स्वीकार नहीं किया — फिर अन्य समय में तो कैसे करते!

श्लोक 35 (skanda.2.198.35)

इत्थं ब्रह्मन्नादिकल्पे हिंस्रयज्ञप्रवर्त्तनम् । यथासीत्तन्मयाख्यातमापत्कालवशाद्भुवि

itthaṁ brahmannādikalpe hiṁsrayajñapravarttanam yathāsīttanmayākhyātamāpatkālavaśādbhuvi

हे ब्राह्मण! इस प्रकार आदि कल्प में विपत्ति-काल के वशीभूत होकर पृथ्वी पर हिंसक यज्ञ का प्रवर्तन जैसे हुआ, वह मैंने तुम्हें बता दिया।

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