वैष्णव खण्ड · अध्याय 199
श्रीवासुदेव-प्रसाद-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.199.1)
सावर्णिरुवाच । कथं प्राप्ता पुनः स्कन्द श्रीरिन्द्रेण गताम्बुधिम् । एतां कथय मे सर्वां कथां नारायणाश्रयाम्
sāvarṇiruvāca kathaṁ prāptā punaḥ skanda śrīrindreṇa gatāmbudhim etāṁ kathaya me sarvāṁ kathāṁ nārāyaṇāśrayām
सावर्णि ने कहा — हे स्कन्द! सागर में गई हुई श्री को इन्द्र ने पुनः कैसे प्राप्त किया? नारायण के आश्रय वाली यह सम्पूर्ण कथा मुझे सुनाइए।
श्लोक 2 (skanda.2.199.2)
स्कन्द उवाच । श्रिया विहीनो देवेन्द्रः श्रीहीनैरपि दानवैः । पराजितो हृतस्थानो नष्टाशेषपरिच्छदः
skanda uvāca śriyā vihīno devendraḥ śrīhīnairapi dānavaiḥ parājito hṛtasthāno naṣṭāśeṣaparicchadaḥ
स्कन्द ने कहा — श्री से रहित देवेन्द्र, श्रीहीन दानवों द्वारा भी पराजित हो गए, उनका स्थान छिन गया, और उनका सम्पूर्ण वैभव नष्ट हो गया।
श्लोक 3 (skanda.2.199.3)
गिरिगह्वरकुञ्जेषु काननेषु ततस्ततः । परिबभ्राम सहितो दिगीशैर्वरुणादिभिः
girigahvarakuñjeṣu kānaneṣu tatastataḥ paribabhrāma sahito digīśairvaruṇādibhiḥ
वे वरुण आदि दिक्पालों सहित पर्वतों की गुफाओं, कुंजों तथा वनों में इधर-उधर भटकते रहे।
श्लोक 4 (skanda.2.199.4)
वल्कलाजिन वस्त्राश्च पशुपक्ष्यामिषाशनाः । देवा दैत्या नरा नागास्तुल्याचारपरिच्छदाः
valkalājina vastrāśca paśupakṣyāmiṣāśanāḥ devā daityā narā nāgāstulyācāraparicchadāḥ
वल्कल और मृगचर्म पहने, पशु-पक्षियों का मांस खाते हुए, देवता, दैत्य, मनुष्य तथा नाग सभी समान आचार और वैभव वाले हो गए।
श्लोक 5 (skanda.2.199.5)
पात्राणि मृन्मयान्येव सर्वेषामपि वेश्मसु । आसन्वराकाः सर्वेपि पिशाच्य इव च स्त्रियः
pātrāṇi mṛnmayānyeva sarveṣāmapi veśmasu āsanvarākāḥ sarvepi piśācya iva ca striyaḥ
सबके घरों में मिट्टी के ही बर्तन रह गए; सभी दयनीय हो गए, और स्त्रियाँ पिशाचिनियों के समान दिखने लगीं।
श्लोक 6 (skanda.2.199.6)
आदावभूदनावृष्टिर्भुवि द्वादशवार्षिकी । ततो वर्षे क्वचिद्वृष्टिरासीत्स्वल्पा क्वचिन्न च
ādāvabhūdanāvṛṣṭirbhuvi dvādaśavārṣikī tato varṣe kvacidvṛṣṭirāsītsvalpā kvacinna ca
पहले पृथ्वी पर बारह वर्षों का अनावृष्टि-काल आया; फिर कुछ वर्षों में थोड़ी वर्षा हुई, और कुछ में बिल्कुल नहीं।
श्लोक 7 (skanda.2.199.7)
इत्थं दारिद्र्यदुःखानां तेषां वर्षशतं गतम् । बलिष्ठारब्धकर्माणस्तेऽतिदुःखेपि नो मृताः
itthaṁ dāridryaduḥkhānāṁ teṣāṁ varṣaśataṁ gatam baliṣṭhārabdhakarmāṇaste'tiduḥkhepi no mṛtāḥ
इस प्रकार उनके दरिद्रता के दुःख में सौ वर्ष बीत गए; अत्यन्त दुःख में भी बलपूर्वक कर्म आरम्भ करने वाले वे नहीं मरे।
श्लोक 8 (skanda.2.199.8)
अजीवन्त मृतप्राया नरकेष्विव नारकाः । यतन्तोपि श्रियः प्राप्त्यै यज्ञाद्यैर्न्नाऽलभन्त ताम्
ajīvanta mṛtaprāyā narakeṣviva nārakāḥ yatantopi śriyaḥ prāptyai yajñādyairnnā'labhanta tām
वे नरक में नारकियों के समान मृतप्राय जीवन बिताने लगे; यज्ञ आदि द्वारा श्री की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने पर भी उसे न पा सके।
श्लोक 9 (skanda.2.199.9)
ततः सहस्रवर्षान्ते मेरौ शरणमाययुः । शापाद्दुर्वाससो देवाः सर्वे दुर्वाससो विधिम्
tataḥ sahasravarṣānte merau śaraṇamāyayuḥ śāpāddurvāsaso devāḥ sarve durvāsaso vidhim
फिर हजार वर्षों के अन्त में, दुर्वासा के शाप से पीड़ित सभी देवता मेरु पर्वत पर ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 10 (skanda.2.199.10)
प्रणम्य तस्मै दुःखं स्वं वासवाद्या न्यवेदयन् । आदावेव हि सोऽज्ञासीत्सर्वज्ञत्वात्सुरापदम्
praṇamya tasmai duḥkhaṁ svaṁ vāsavādyā nyavedayan ādāveva hi so'jñāsītsarvajñatvātsurāpadam
उन्हें प्रणाम कर इन्द्र आदि ने अपना दुःख निवेदित किया; परन्तु सर्वज्ञ होने के कारण वे तो पहले से ही देवताओं की इस विपत्ति को जानते थे।
श्लोक 11 (skanda.2.199.11)
उपालभ्य ततश्चेन्द्रं विरिञ्चः सहशंकरः । तद्दुःखवारणा कल्पो विष्णुमैच्छत्प्रसादितुम्
upālabhya tataścendraṁ viriñcaḥ sahaśaṁkaraḥ tadduḥkhavāraṇā kalpo viṣṇumaicchatprasāditum
फिर ब्रह्मा ने शंकर सहित इन्द्र को उपालम्भ देकर, उस दुःख को दूर करने में समर्थ विष्णु को प्रसन्न करने की इच्छा की।
श्लोक 12 (skanda.2.199.12)
आराधयिष्यंस्तपसा ततोऽसौ तं तपःप्रियम् । सर्वदेवगणोपेत उपायात्क्षीरसागरम्
ārādhayiṣyaṁstapasā tato'sau taṁ tapaḥpriyam sarvadevagaṇopeta upāyātkṣīrasāgaram
फिर वे तप के प्रिय उन विष्णु की तप से आराधना करने की इच्छा से, समस्त देवगणों सहित क्षीरसागर के पास गए।
श्लोक 13 (skanda.2.199.13)
तस्योत्तरे तटे रम्ये सर्वे तेऽनशनव्रताः । एकपादस्थिता ऊर्द्ध्वबाहवश्चक्रिरे तपः
tasyottare taṭe ramye sarve te'naśanavratāḥ ekapādasthitā ūrddhvabāhavaścakrire tapaḥ
उसके सुन्दर उत्तरी तट पर वे सब अनशन का व्रत धारण कर, एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाए तप करने लगे।
श्लोक 14 (skanda.2.199.14)
केशवं हृदि ते दध्युः सर्वक्लेशविनाशनम् । लक्ष्मीपतिं वासुदेवमेकाग्रकृतमानसाः
keśavaṁ hṛdi te dadhyuḥ sarvakleśavināśanam lakṣmīpatiṁ vāsudevamekāgrakṛtamānasāḥ
एकाग्रचित्त होकर उन्होंने हृदय में समस्त क्लेशों के नाशक, लक्ष्मीपति केशव वासुदेव का ध्यान किया।
श्लोक 15 (skanda.2.199.15)
शताब्दान्ते ततो विष्णुः श्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् । अत्यापन्नेषु दीनेषु कृपां देवेषु सोऽकरोत्
śatābdānte tato viṣṇuḥ śrīkṛṣṇo bhagavānsvayam atyāpanneṣu dīneṣu kṛpāṁ deveṣu so'karot
फिर सौ वर्ष के अन्त में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण विष्णु ने अत्यन्त विपत्तिग्रस्त, दीन देवताओं पर कृपा की।
श्लोक 16 (skanda.2.199.16)
अदृश्यमूर्तिरात्मज्ञैरपि भूरितपस्विभिः । तत्राविरासीत्कृपया नियुताहस्करद्युतिः
adṛśyamūrtirātmajñairapi bhūritapasvibhiḥ tatrāvirāsītkṛpayā niyutāhaskaradyutiḥ
आत्मज्ञानियों तथा महातपस्वियों के लिए भी अदृश्य रूप वाले वे, दस लाख सूर्यों के तेज के साथ, कृपापूर्वक वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 17 (skanda.2.199.17)
तेजोमण्डलमेवादौ सहसा स्फुरितं महत् । ददृशुर्विबुधाः सर्वे सितं घनमनौपमम्
tejomaṇḍalamevādau sahasā sphuritaṁ mahat dadṛśurvibudhāḥ sarve sitaṁ ghanamanaupamam
पहले सभी देवताओं ने सहसा प्रकट हुआ एक महान, श्वेत, सघन तथा अनुपम तेजोमण्डल ही देखा।
श्लोक 18 (skanda.2.199.18)
ब्रह्मा शिवश्च तन्मध्ये ददृशाते रमापतिम् । घनश्यामं चतुर्बाहुं गदाब्जाब्जारिधारिणम्
brahmā śivaśca tanmadhye dadṛśāte ramāpatim ghanaśyāmaṁ caturbāhuṁ gadābjābjāridhāriṇam
उसके मध्य में ब्रह्मा और शिव ने लक्ष्मीपति को देखा — गहरे श्याम वर्ण के, चार भुजाओं वाले, गदा, कमल और चक्र धारण किए हुए।
श्लोक 19 (skanda.2.199.19)
किरीटकाञ्चीकटककुण्डलादिविभूषितम् । पीतकौशेयवसनं दिव्यसुन्दरविग्रहम्
kirīṭakāñcīkaṭakakuṇḍalādivibhūṣitam pītakauśeyavasanaṁ divyasundaravigraham
मुकुट, करधनी, कड़े, कुण्डल आदि से विभूषित, पीत रेशमी वस्त्र धारण किए, दिव्य सुन्दर रूप वाले।
श्लोक 20 (skanda.2.199.20)
हर्षविह्वलितान्मानौ दण्डवत्तौ प्रणेमतुः । तदिच्छयाऽथ देवाश्च दृष्ट्वा तं च मुदाऽऽनमन्
harṣavihvalitānmānau daṇḍavattau praṇematuḥ tadicchayā'tha devāśca dṛṣṭvā taṁ ca mudā''naman
हर्ष से विह्वल होकर वे दोनों दण्डवत् प्रणाम करने लगे; और फिर उन्हीं की इच्छा से देवताओं ने भी उन्हें देखकर आनन्दपूर्वक प्रणाम किया।
श्लोक 21 (skanda.2.199.21)
बभूवुरतिहृष्टास्ते निधिं प्राप्याऽधना इव । बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे भक्त्या तं तुष्टुवुः सुराः
babhūvuratihṛṣṭāste nidhiṁ prāpyā'dhanā iva baddhāñjalipuṭāḥ sarve bhaktyā taṁ tuṣṭuvuḥ surāḥ
वे सब निर्धन के धन पाने के समान अत्यन्त हर्षित हो गए; हाथ जोड़कर सभी देवताओं ने भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की।
श्लोक 22 (skanda.2.199.22)
देवा ऊचुः । ॐनमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च
devā ūcuḥ oṁnamo bhagavate tubhyaṁ vāsudevāya dhīmahi pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṁkarṣaṇāya ca
देवताओं ने कहा — ॐ, हे भगवन्! आपको नमस्कार, हम वासुदेव का ध्यान करें; प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण को भी नमस्कार।
श्लोक 23 (skanda.2.199.23)
ॐकारब्रह्मरूपाय त्रेधाविष्कृतमूर्तये । ब्रह्माण्डसर्गस्थित्यन्तहेतवे निर्गुणाय च
oṁkārabrahmarūpāya tredhāviṣkṛtamūrtaye brahmāṇḍasargasthityantahetave nirguṇāya ca
ॐकार तथा ब्रह्मरूप, त्रिविध रूप में प्रकट, ब्रह्माण्ड की सृष्टि-स्थिति-प्रलय के हेतु, गुणातीत आपको नमस्कार।
श्लोक 24 (skanda.2.199.24)
नयनानन्दरूपाय प्रणतक्लेशनाशिने । केशवाय नमस्तुभ्यं स्वतंत्रेश्वरमूर्तये
nayanānandarūpāya praṇatakleśanāśine keśavāya namastubhyaṁ svataṁtreśvaramūrtaye
नेत्रों को आनन्द देने वाले रूप वाले, शरणागतों के क्लेश-नाशक, स्वतन्त्र ईश्वर-स्वरूप केशव को नमस्कार।
श्लोक 25 (skanda.2.199.25)
मोदिताशेषभक्ताय कालमायादिमोहिने । सदानंदाय कृष्णाय नमः सद्धर्मवर्त्तिने
moditāśeṣabhaktāya kālamāyādimohine sadānaṁdāya kṛṣṇāya namaḥ saddharmavarttine
समस्त भक्तों को आनन्दित करने वाले, काल-माया आदि से मोहित करने वाले, सदा आनन्दस्वरूप, सद्धर्म में स्थित कृष्ण को नमस्कार।
श्लोक 26 (skanda.2.199.26)
भवाम्बुधिनिमग्रानामुद्धृतिक्षमकीर्तये । दर्शनीयस्वरूपाय घनश्यामाय ते नमः
bhavāmbudhinimagrānāmuddhṛtikṣamakīrtaye darśanīyasvarūpāya ghanaśyāmāya te namaḥ
संसार-सागर में डूबे हुओं को उबारने में समर्थ कीर्ति वाले, दर्शनीय स्वरूप, घनश्याम आपको नमस्कार।
श्लोक 27 (skanda.2.199.27)
गदाब्जदरचक्राणि बिभ्रते दीर्घबाहुभिः । सुरगोविप्रधर्माणां गोप्त्रे तुभ्यं नमोनमः
gadābjadaracakrāṇi bibhrate dīrghabāhubhiḥ suragovipradharmāṇāṁ goptre tubhyaṁ namonamaḥ
अपनी दीर्घ भुजाओं में गदा, कमल, शंख तथा चक्र धारण करने वाले, देवताओं, गौओं, ब्राह्मणों तथा धर्म के रक्षक आपको बारंबार नमस्कार।
श्लोक 28 (skanda.2.199.28)
वरेण्याय प्रपन्नानामभीष्टवरदायिने । निगमागमवेद्याय वेदगर्भाय ते नमः
vareṇyāya prapannānāmabhīṣṭavaradāyine nigamāgamavedyāya vedagarbhāya te namaḥ
शरणागतों के लिए वरणीय, अभीष्ट वर देने वाले, वेद-आगम द्वारा जानने योग्य, वेद के गर्भस्वरूप आपको नमस्कार।
श्लोक 29 (skanda.2.199.29)
तेजोमण्डलमध्यस्थ दिव्यसुन्दरमूर्तये । नमामो विष्णवे तुभ्यं परात्परतराय च
tejomaṇḍalamadhyastha divyasundaramūrtaye namāmo viṣṇave tubhyaṁ parātparatarāya ca
तेजोमण्डल के मध्य में स्थित, दिव्य सुन्दर मूर्ति वाले, परात्पर विष्णु आपको हम नमस्कार करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.199.30)
वाणीमनोविप्रकृष्टमहिम्नेऽक्षररूपिणे । सर्वान्तर्यामिणे तुभ्यं बृहते च नमोनमः
vāṇīmanoviprakṛṣṭamahimne'kṣararūpiṇe sarvāntaryāmiṇe tubhyaṁ bṛhate ca namonamaḥ
वाणी और मन से भी परे महिमा वाले, अक्षर-स्वरूप, सबके अन्तर्यामी, बृहत् आपको बारंबार नमस्कार।
श्लोक 31 (skanda.2.199.31)
सुखदोसि त्वमेवैकः स्वाश्रितानामतो वयम् । महापदधिकक्लिष्टाः शरणं त्वामुपागताः
sukhadosi tvamevaikaḥ svāśritānāmato vayam mahāpadadhikakliṣṭāḥ śaraṇaṁ tvāmupāgatāḥ
आप ही अपने शरणागतों को सुख देने वाले एकमात्र हैं, अतः महाविपत्ति से अत्यन्त क्लिष्ट हुए हम आपकी शरण में आए हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.199.32)
देवाधिदेवभक्तस्य तव दुर्वाससो वयम् । अतिक्रमाच्छ्रिया हीनाः प्राप्ताः स्मो दुर्दशामिमाम्
devādhidevabhaktasya tava durvāsaso vayam atikramācchriyā hīnāḥ prāptāḥ smo durdaśāmimām
हे देवाधिदेव! आपके भक्त दुर्वासा के प्रति हुए अपराध के कारण ही हम श्रीहीन होकर इस दुर्दशा को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.199.33)
वासोन्नपानस्थानादिहीनान्धर्मोपि नः प्रभो । त्यक्त्वा सह श्रिया यातस्तान्पातुं त्वमसीश्वरः
vāsonnapānasthānādihīnāndharmopi naḥ prabho tyaktvā saha śriyā yātastānpātuṁ tvamasīśvaraḥ
हे प्रभो! वस्त्र, अन्न, जल, आवास आदि से रहित हुए हमें, धर्म भी श्री सहित त्यागकर चला गया; उन्हें बचाने में आप ही समर्थ ईश्वर हैं।
श्लोक 34 (skanda.2.199.34)
यतो वयं च धर्मश्च त्वदीया इति विश्रुताः । यथापूर्वं सुखीकर्त्तुं त्वमेवार्हस्यतो हि नः
yato vayaṁ ca dharmaśca tvadīyā iti viśrutāḥ yathāpūrvaṁ sukhīkarttuṁ tvamevārhasyato hi naḥ
क्योंकि हम और धर्म दोनों ही आपके अपने कहलाते हैं, इसलिए हमें पूर्व की भाँति सुखी करने में आप ही समर्थ हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.199.35)
स्कन्द उवाच । इति संप्रार्थितो देवैर्भगवान्स दयानिधिः । उवाचानन्दयन्वाचा मेघगम्भीरया सुरान्
skanda uvāca iti saṁprārthito devairbhagavānsa dayānidhiḥ uvācānandayanvācā meghagambhīrayā surān
स्कन्द ने कहा — इस प्रकार देवताओं द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, वे दयानिधि भगवान मेघ के समान गम्भीर वाणी से देवताओं को आनन्दित करते हुए बोले।
श्लोक 36 (skanda.2.199.36)
श्रीभगवानुवाच । विदितं मे सुराः सर्वं कष्टं वः सदतिक्रमात् । उपायं कुरुताद्यैव वच्मि यत्तन्निवृत्तये
śrībhagavānuvāca viditaṁ me surāḥ sarvaṁ kaṣṭaṁ vaḥ sadatikramāt upāyaṁ kurutādyaiva vacmi yattannivṛttaye
श्रीभगवान ने कहा — हे देवताओ! सन्त के प्रति हुए अतिक्रमण से उत्पन्न तुम्हारा सब कष्ट मुझे ज्ञात है। जो उपाय मैं बता रहा हूँ, उसे उसकी निवृत्ति के लिए आज ही करो।
श्लोक 37 (skanda.2.199.37)
ओषधीरम्बुधौ सर्वाः क्षिप्त्वा मन्दरभूभृता । नागराजवरत्रेण मंथध्वमसुरैः सह
oṣadhīrambudhau sarvāḥ kṣiptvā mandarabhūbhṛtā nāgarājavaratreṇa maṁthadhvamasuraiḥ saha
समस्त औषधियों को सागर में डालकर, मन्दराचल को मथानी और नागराज को रस्सी बनाकर, असुरों के साथ मिलकर सागर का मन्थन करो।
श्लोक 38 (skanda.2.199.38)
आदौ संधाय दनुजैः कुरुताम्बुधिमन्थनम् । साहायं वः करिष्यामि खेदः कार्यो न तत्र वः
ādau saṁdhāya danujaiḥ kurutāmbudhimanthanam sāhāyaṁ vaḥ kariṣyāmi khedaḥ kāryo na tatra vaḥ
पहले दानवों के साथ सन्धि करके सागर-मन्थन करो; मैं तुम्हारी सहायता करूँगा, उसमें तुम्हें कोई खेद नहीं करना चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.2.199.39)
अमृतं च श्रियो दृष्टिं प्राप्य पूर्वाधिकौजसः । भवितारो मद्विमुखा दैत्यास्तु क्लेशभागिनः
amṛtaṁ ca śriyo dṛṣṭiṁ prāpya pūrvādhikaujasaḥ bhavitāro madvimukhā daityāstu kleśabhāginaḥ
अमृत तथा श्री के दर्शन को पाकर तुम पहले से भी अधिक तेजस्वी हो जाओगे; परन्तु मुझसे विमुख दैत्य केवल क्लेश के भागी होंगे।
श्लोक 40 (skanda.2.199.40)
स्कन्द उवाच । इत्युक्त्वांतर्दधे विष्णुर्भक्तसङ्कटनाशनः । देवास्तस्मै नमस्कृत्य तदुक्तं कर्तुमारभन्
skanda uvāca ityuktvāṁtardadhe viṣṇurbhaktasaṅkaṭanāśanaḥ devāstasmai namaskṛtya taduktaṁ kartumārabhan
स्कन्द ने कहा — यह कहकर भक्तों के संकट का नाश करने वाले विष्णु अन्तर्धान हो गए; और देवता उन्हें नमस्कार कर उनके कहे अनुसार कार्य करने लगे।