वैष्णव खण्ड · अध्याय 200
अमृत-मन्थन में विष की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.2.200.1)
स्कन्द उवाच । ब्रह्मरुद्रौ महेन्द्रादीन्संधानायाऽसुरैः सह । आज्ञाप्य जग्मतुः स्वंस्वं धाम देवा रसां मुने
skanda uvāca brahmarudrau mahendrādīnsaṁdhānāyā'suraiḥ saha ājñāpya jagmatuḥ svaṁsvaṁ dhāma devā rasāṁ mune
स्कन्द ने कहा — हे मुने! ब्रह्मा और रुद्र, महेन्द्र आदि देवताओं को असुरों के साथ सन्धि करने की आज्ञा देकर, अपने-अपने धाम को चले गए।
श्लोक 2 (skanda.2.200.2)
समयोचितभाषाविद्वासवो नीतियुक्तिभिः । प्रलोभ्य फलभागेन सन्धिं चक्रेऽसुरैः सह
samayocitabhāṣāvidvāsavo nītiyuktibhiḥ pralobhya phalabhāgena sandhiṁ cakre'suraiḥ saha
अवसरोचित वाणी में कुशल इन्द्र ने, नीति-युक्तियों से फल के भाग का प्रलोभन देकर, असुरों के साथ सन्धि कर ली।
श्लोक 3 (skanda.2.200.3)
ततो देवासुरगणा मिलिता वारिधेस्तटे । महौषधीरुपानीय बहुशो निदधुर्द्रुतम्
tato devāsuragaṇā militā vāridhestaṭe mahauṣadhīrupānīya bahuśo nidadhurdrutam
फिर देवता और असुरगण सागर-तट पर मिलकर, अनेक महौषधियाँ लाकर शीघ्र ही उसमें डालने लगे।
श्लोक 4 (skanda.2.200.4)
मन्दराद्रिमुपेत्याऽथ नानौषधिविराजितम् । मूलादुत्पाट्य ते सर्वे नेतुमब्धिं समुद्यताः
mandarādrimupetyā'tha nānauṣadhivirājitam mūlādutpāṭya te sarve netumabdhiṁ samudyatāḥ
फिर नाना औषधियों से सुशोभित मन्दराचल के पास जाकर, उसे जड़ से उखाड़कर वे सब उसे सागर तक ले जाने के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 5 (skanda.2.200.5)
एकादशसहस्राणि योजनानां भुवि स्थितम् । नोद्धर्तुमशकंस्ते तं तदानीं तुष्टुवुर्हरिम्
ekādaśasahasrāṇi yojanānāṁ bhuvi sthitam noddhartumaśakaṁste taṁ tadānīṁ tuṣṭuvurharim
पृथ्वी में ग्यारह हजार योजन तक स्थित उस पर्वत को वे उखाड़ न सके; तब उन्होंने हरि की स्तुति की।
श्लोक 6 (skanda.2.200.6)
एतद्विदित्वा भगवान्संकर्षणमहीश्वरम् । अजिज्ञपत्तमुद्धर्तुं बद्धमूलं महीधरम्
etadviditvā bhagavānsaṁkarṣaṇamahīśvaram ajijñapattamuddhartuṁ baddhamūlaṁ mahīdharam
यह जानकर भगवान ने पृथ्वी के स्वामी संकर्षण को उस दृढ़मूल पर्वत को उखाड़ने की आज्ञा दी।
श्लोक 7 (skanda.2.200.7)
फूत्कारमात्रेणैकेन स तु सद्यस्तमीश्वरः । बहिश्चिक्षेप तत्स्थानाद्योजनद्वितयान्तरे
phūtkāramātreṇaikena sa tu sadyastamīśvaraḥ bahiścikṣepa tatsthānādyojanadvitayāntare
उन ईश्वर ने केवल एक फुत्कार मात्र से ही तत्काल उसे उसके स्थान से दो योजन दूर बाहर फेंक दिया।
श्लोक 8 (skanda.2.200.8)
अत्याश्चर्यं तदालोक्य हृष्टाः सर्वे सुरासुराः । तदन्तिकमुपाजग्मुर्द्धावन्तश्च कृतारवाः
atyāścaryaṁ tadālokya hṛṣṭāḥ sarve surāsurāḥ tadantikamupājagmurddhāvantaśca kṛtāravāḥ
उस अत्यन्त आश्चर्य को देखकर हर्षित हुए सभी देव और असुर दौड़ते और शोर मचाते हुए उसके पास पहुँचे।
श्लोक 9 (skanda.2.200.9)
बलिनो यत्नवन्तोपि परिघोपमबाहवः । उद्धृत्य नेतुं नो शेकुर्विषण्णा विफलश्रमाः
balino yatnavantopi parighopamabāhavaḥ uddhṛtya netuṁ no śekurviṣaṇṇā viphalaśramāḥ
बलवान तथा प्रयत्नशील होते हुए भी, गदा के समान भुजाओं वाले वे उसे उठाकर ले जाने में समर्थ न हुए, और निष्फल श्रम से खिन्न हो गए।
श्लोक 10 (skanda.2.200.10)
ज्ञात्वा सुरगणान्खिन्नान्भगवान्सर्वदर्शनः । तार्क्ष्यमाज्ञापयामास नेतुं तमुदधिं द्रुतम्
jñātvā suragaṇānkhinnānbhagavānsarvadarśanaḥ tārkṣyamājñāpayāmāsa netuṁ tamudadhiṁ drutam
देवगणों को खिन्न जानकर सर्वदर्शी भगवान ने गरुड़ को उस पर्वत को शीघ्र सागर तक ले जाने की आज्ञा दी।
श्लोक 11 (skanda.2.200.11)
सहावरणमप्यण्डं लीलया धर्त्तुमीश्वरः । मनोवेगः स तत्रेत्य निजत्रोट्यैव तं गिरिम् । उत्पाट्य सागरतटे निधाय हरिमाययौ
sahāvaraṇamapyaṇḍaṁ līlayā dharttumīśvaraḥ manovegaḥ sa tatretya nijatroṭyaiva taṁ girim utpāṭya sāgarataṭe nidhāya harimāyayau
जो लीला मात्र से आवरण सहित ब्रह्माण्ड को भी धारण करने में समर्थ हैं, वे मन के समान वेगवान गरुड़ वहाँ जाकर, अपनी चोंच से ही उस पर्वत को उखाड़कर सागर-तट पर रखकर हरि के पास लौट आए।
श्लोक 12 (skanda.2.200.12)
ततः संहृष्टमनसः सर्वे कश्यपनन्दनाः । वासुकिं चाह्वयामासुः सुधाभागप्रतिज्ञया
tataḥ saṁhṛṣṭamanasaḥ sarve kaśyapanandanāḥ vāsukiṁ cāhvayāmāsuḥ sudhābhāgapratijñayā
फिर प्रसन्न मन वाले कश्यप के सभी पुत्रों ने अमृत के भाग की प्रतिज्ञा करके वासुकि को बुलाया।
श्लोक 13 (skanda.2.200.13)
स तत्रागादथो सर्वे तेऽब्धिं मन्थितुमुद्यताः । तानपान्निधिरागत्य मूर्त्तिमानब्रवीद्वचः
sa tatrāgādatho sarve te'bdhiṁ manthitumudyatāḥ tānapānnidhirāgatya mūrttimānabravīdvacaḥ
वे वहाँ आए, और फिर वे सब सागर के मन्थन के लिए उद्यत हुए; तब जल के स्वामी ने साकार रूप में आकर उनसे यह वचन कहा।
श्लोक 14 (skanda.2.200.14)
यदि दास्यथ मे यूयममृतांशं सुरासुराः । सोढास्मि विपुलं तर्हि मन्दरभ्रमणार्द्दनम्
yadi dāsyatha me yūyamamṛtāṁśaṁ surāsurāḥ soḍhāsmi vipulaṁ tarhi mandarabhramaṇārddanam
'हे देव-असुरो! यदि तुम मुझे अमृत का अंश दोगे, तो मैं मन्दराचल के घूमने की विपुल पीड़ा को सह लूँगा।'
श्लोक 15 (skanda.2.200.15)
तथेति ते प्रतिज्ञाय क्षिप्त्वादावोषधीलताः । परिविव्युर्न्नागराजं तस्मिन्काञ्चनपर्वते
tatheti te pratijñāya kṣiptvādāvoṣadhīlatāḥ parivivyurnnāgarājaṁ tasminkāñcanaparvate
'ऐसा ही होगा' कहकर प्रतिज्ञा कर, पहले औषधि-लताओं को डालकर, उन्होंने नागराज को उस सुवर्ण-पर्वत के चारों ओर लपेट दिया।
श्लोक 16 (skanda.2.200.16)
ततो देवा हृदि हरिं सस्मरुः कार्यसिद्धये । स्मृतमात्रः स तत्राऽगादच्युतः सर्वदर्शनः
tato devā hṛdi hariṁ sasmaruḥ kāryasiddhaye smṛtamātraḥ sa tatrā'gādacyutaḥ sarvadarśanaḥ
फिर देवताओं ने कार्य की सिद्धि के लिए हृदय में हरि का स्मरण किया; स्मरण करते ही सर्वदर्शी अच्युत वहाँ आ गए।
श्लोक 17 (skanda.2.200.17)
तमालोक्यामरगणा मुदिताः फणिनां पतेः । पुरोभागं गृहीत्वैव तस्थुस्तेनानुमोदिताः
tamālokyāmaragaṇā muditāḥ phaṇināṁ pateḥ purobhāgaṁ gṛhītvaiva tasthustenānumoditāḥ
उन्हें देखकर प्रसन्न हुए देवगण, नागराज के अगले भाग को पकड़कर, उन्हीं की अनुमति से खड़े हो गए।
श्लोक 18 (skanda.2.200.18)
देवतापक्षपातित्वं सूचयन्स्वस्य च प्रभुः । यत्र देवास्तत्र तस्थौ ततो दैत्यास्तु चुक्रुधुः
devatāpakṣapātitvaṁ sūcayansvasya ca prabhuḥ yatra devāstatra tasthau tato daityāstu cukrudhuḥ
अपना देवताओं के प्रति पक्षपात प्रकट करते हुए, प्रभु उसी ओर खड़े हुए जहाँ देवता थे; इससे दैत्य क्रोधित हो उठे।
श्लोक 19 (skanda.2.200.19)
तपोविद्यावयोज्येष्ठा अधोभागममङ्गलम् । कथं तिरश्चो गृह्णीमो नेदृङ्मूर्खा वयं त्विति
tapovidyāvayojyeṣṭhā adhobhāgamamaṅgalam kathaṁ tiraśco gṛhṇīmo nedṛṅmūrkhā vayaṁ tviti
'हम तप, विद्या तथा आयु में ज्येष्ठ हैं — फिर तिर्यक् पशुओं के समान अशुभ पिछला भाग कैसे पकड़ें? हम इतने मूर्ख नहीं हैं!'
श्लोक 20 (skanda.2.200.20)
सह देवैस्ततो विष्णुः स्वयं तान्मानयन्निव । प्रहस्य दत्त्वा प्राग्भागं सुरान्पुच्छमजिग्रहत्
saha devaistato viṣṇuḥ svayaṁ tānmānayanniva prahasya dattvā prāgbhāgaṁ surānpucchamajigrahat
तब देवताओं के साथ विष्णु ने, मानो उनका सम्मान करते हुए, हँसकर उन्हें अगला भाग दे दिया, और देवताओं को पूँछ का भाग ग्रहण करवाया।
श्लोक 21 (skanda.2.200.21)
महाहिविषफूत्कारदाहादमररक्षणम् । चरित्रमेतच्छ्रीभर्तुरिति दैत्या न ते विदुः
mahāhiviṣaphūtkāradāhādamararakṣaṇam caritrametacchrībharturiti daityā na te viduḥ
यह श्रीपति का चरित्र था — महासर्प के विष-फुत्कार की जलन से देवताओं की रक्षा करना — किन्तु उन दैत्यों को यह ज्ञात न हुआ।
श्लोक 22 (skanda.2.200.22)
तत उत्तोलयामासुः स्वर्णसान्वालिभास्वरम् । मन्दरं काश्यपेयास्ते चर्मिकाबद्धकच्छकाः
tata uttolayāmāsuḥ svarṇasānvālibhāsvaram mandaraṁ kāśyapeyāste carmikābaddhakacchakāḥ
फिर चमड़े की पट्टियों से कमर बाँधे हुए कश्यप-पुत्रों ने स्वर्ण-शिखरों से देदीप्यमान मन्दराचल को उठाया।
श्लोक 23 (skanda.2.200.23)
द्वाविंशतिसहस्राणि योजनानां तमुच्छ्रितम् । अम्भोनिधौ निदधिरे क्रोशन्तोत्यर्थमुत्सुकाः
dvāviṁśatisahasrāṇi yojanānāṁ tamucchritam ambhonidhau nidadhire krośantotyarthamutsukāḥ
बाईस हजार योजन ऊँचे उस पर्वत को अत्यन्त उत्सुक होकर, चिल्लाते हुए उन्होंने सागर में रख दिया।
श्लोक 24 (skanda.2.200.24)
धार्यमाणोप्यनाधारस्तैरद्रिरतिगौरवात् । ययावधस्तलं सद्यस्तदासंस्तेऽतिविह्वलाः
dhāryamāṇopyanādhārastairadriratigauravāt yayāvadhastalaṁ sadyastadāsaṁste'tivihvalāḥ
उनके द्वारा धारण किए जाने पर भी, आधाररहित होने के कारण वह पर्वत अपने अत्यधिक भार से तुरन्त तल में डूब गया; तब वे अत्यन्त व्याकुल हो गए।
श्लोक 25 (skanda.2.200.25)
तदा स भगवान्साक्षात्सर्वथा भक्तकार्यकृत् । स्तूयमानोमरैरद्रिमुद्दघ्रे कमठाकृतिः
tadā sa bhagavānsākṣātsarvathā bhaktakāryakṛt stūyamānomarairadrimuddaghre kamaṭhākṛtiḥ
तब सदा भक्तों के कार्य को सिद्ध करने वाले वे साक्षात् भगवान, देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए, कच्छप का रूप धारण कर उस पर्वत को उठा लिया।
श्लोक 26 (skanda.2.200.26)
उत्थितं तमवेक्ष्याशु सर्वे फुल्लहृदाननाः । बभूवुश्च स्थिरः सोऽभूत्कूर्मपृष्ठेतिविस्तृते
utthitaṁ tamavekṣyāśu sarve phullahṛdānanāḥ babhūvuśca sthiraḥ so'bhūtkūrmapṛṣṭhetivistṛte
उसे उठा हुआ देखकर सभी के हृदय तथा मुख खिल उठे; और वह पर्वत उस विशाल कच्छप-पीठ पर स्थिर हो गया।
श्लोक 27 (skanda.2.200.27)
ततो ममन्थुस्तरसा यावद्बलमपांनिधिम् । श्रमफूत्कारवदना देवादयोऽदयम्
tato mamanthustarasā yāvadbalamapāṁnidhim śramaphūtkāravadanā devādayo'dayam
फिर श्रम से हाँफते हुए मुख वाले देवता आदि ने अपने पूरे बल से, निर्दयतापूर्वक सागर का मन्थन किया।
श्लोक 28 (skanda.2.200.28)
भ्राम्यमाणात्ततस्त्वद्रेर्बहवोन्यपतन्दुमाः । ऊर्द्ध्वद्रुघर्षजो वह्निस्तत्स्थ सिंहादिमादहत्
bhrāmyamāṇāttatastvadrerbahavonyapatandumāḥ ūrddhvadrugharṣajo vahnistatstha siṁhādimādahat
घूमते हुए उस पर्वत से अनेक वृक्ष गिर पड़े; ऊपर के वृक्षों की रगड़ से उत्पन्न अग्नि ने वहाँ रहने वाले सिंह आदि को जला दिया।
श्लोक 29 (skanda.2.200.29)
तत्र नाना जलचरा विनिपिष्टा महाद्रिणा । विलयं समुपाजग्मुः शतशः क्षीरवारिधौ
tatra nānā jalacarā vinipiṣṭā mahādriṇā vilayaṁ samupājagmuḥ śataśaḥ kṣīravāridhau
वहाँ उस महापर्वत से कुचले हुए नाना जलचर जीव क्षीरसागर में सैकड़ों की संख्या में नष्ट हो गए।
श्लोक 30 (skanda.2.200.30)
सांवर्त्तकमहामेघसङ्घगर्ज्जितवन्महान् । आसीन्मंथननादश्च प्रतिध्वनिविवर्द्धितः
sāṁvarttakamahāmeghasaṅghagarjjitavanmahān āsīnmaṁthananādaśca pratidhvanivivarddhitaḥ
मन्थन का महान शब्द, प्रलय-काल के सांवर्तक महामेघों की गर्जना के समान, प्रतिध्वनि से और भी बढ़ गया।
श्लोक 31 (skanda.2.200.31)
अत्याकर्षणखिन्नाङ्गवासुकर्म्मुखकृत्कृतैः । हतौजसोऽतिखिन्नाश्च दैत्या निङ्गालवद्बभुः
atyākarṣaṇakhinnāṅgavāsukarmmukhakṛtkṛtaiḥ hataujaso'tikhinnāśca daityā niṅgālavadbabhuḥ
अत्यधिक खींचे जाने से क्लान्त हुए वासुकि के मुख की ओर से खींचने वालों में, बलहीन तथा अत्यन्त थके हुए दैत्य मृतक के समान दिखने लगे।
श्लोक 32 (skanda.2.200.32)
अविषह्यं विषाग्निं च मर्षन्ति बहुधा मुहुः । लम्बन्ते स्माहिराजस्य सहस्रं वदनान्यधः
aviṣahyaṁ viṣāgniṁ ca marṣanti bahudhā muhuḥ lambante smāhirājasya sahasraṁ vadanānyadhaḥ
वे बार-बार अनेक प्रकार से उस असह्य विष-अग्नि को सहते रहे; सर्पराज के सहस्र मुख नीचे की ओर लटक रहे थे।
श्लोक 33 (skanda.2.200.33)
दधार सहसा तानि भगवन्प्रेरितो विभुः । संकर्षणो महातेजाः सहमानो विषानलम्
dadhāra sahasā tāni bhagavanprerito vibhuḥ saṁkarṣaṇo mahātejāḥ sahamāno viṣānalam
भगवान द्वारा प्रेरित महातेजस्वी संकर्षण ने विष की अग्नि को सहन करते हुए सहसा उन मुखों को धारण कर लिया।
श्लोक 34 (skanda.2.200.34)
सहस्रमेकं वर्षाणां मथ्यमानात्पयोनिधेः । हालाहलं विषमभूदुत्सर्पद्विदिशो दिशः
sahasramekaṁ varṣāṇāṁ mathyamānātpayonidheḥ hālāhalaṁ viṣamabhūdutsarpadvidiśo diśaḥ
एक हजार वर्षों तक मथे जाने वाले उस क्षीरसागर से हालाहल नामक विष उत्पन्न हुआ, जो सब दिशाओं में फैलने लगा।
श्लोक 35 (skanda.2.200.35)
यदाहुः कालकूटाख्यं सर्वलोकातिदाहकम् । तेन दन्दह्यमानाङ्गास्ते तु चक्रुः पलायनम्
yadāhuḥ kālakūṭākhyaṁ sarvalokātidāhakam tena dandahyamānāṅgāste tu cakruḥ palāyanam
जिसे कालकूट नाम से कहा जाता है, जो समस्त लोकों को अत्यन्त जलाने वाला था; उससे अपने शरीर जलते देखकर वे भाग खड़े हुए।
श्लोक 36 (skanda.2.200.36)
ततो ब्रह्मा प्रजेशाश्च देवाः सर्वेप्युमापतिम् । प्रार्थयंस्तस्य पानार्थं स्तुवन्तः स्तुतिभिर्मुने
tato brahmā prajeśāśca devāḥ sarvepyumāpatim prārthayaṁstasya pānārthaṁ stuvantaḥ stutibhirmune
हे मुने! फिर ब्रह्मा, प्रजापतिगण तथा समस्त देवताओं ने स्तुतियों से स्तुति करते हुए उमापति से उस विष को पीने के लिए प्रार्थना की।
श्लोक 37 (skanda.2.200.37)
भगवानथ तं प्राह सुराणामग्रजो भवान् । भवतीत्यग्रजं वार्द्धेर्गृहाणेदं विषं शिव
bhagavānatha taṁ prāha surāṇāmagrajo bhavān bhavatītyagrajaṁ vārddhergṛhāṇedaṁ viṣaṁ śiva
तब भगवान ने उनसे कहा — तुम देवताओं में अग्रज हो, अतः हे शिव! सागर के इस अग्रज विष को तुम ग्रहण करो।
श्लोक 38 (skanda.2.200.38)
देवानां स भयं दृष्ट्वा करुणश्चाज्ञया हरेः । आकर्षद्योगकलया विषं पाणितलेऽखिलम्
devānāṁ sa bhayaṁ dṛṣṭvā karuṇaścājñayā hareḥ ākarṣadyogakalayā viṣaṁ pāṇitale'khilam
देवताओं के भय को देखकर, करुणावश तथा हरि की आज्ञा से, उन्होंने अपनी योगशक्ति से समस्त विष को हथेली में खींच लिया।
श्लोक 39 (skanda.2.200.39)
पपौ तत्कण्ठमध्ये च शोषयामास तत्क्षणम् । नीलकण्ठ इति ख्यातः शंकराख्यश्च पऽभवत्
papau tatkaṇṭhamadhye ca śoṣayāmāsa tatkṣaṇam nīlakaṇṭha iti khyātaḥ śaṁkarākhyaśca pa'bhavat
उन्होंने उसे पी लिया और तत्क्षण अपने कण्ठ के भीतर सुखा दिया; इस प्रकार वे नीलकण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुए और शंकर नाम से भी रहे।
श्लोक 40 (skanda.2.200.40)
पास्यतस्तस्य पाणेर्ये पतिता भुविबिन्दवः । तान्नागा वृश्चिकाद्याश्च जगृहुः काश्चनौषधीः
pāsyatastasya pāṇerye patitā bhuvibindavaḥ tānnāgā vṛścikādyāśca jagṛhuḥ kāścanauṣadhīḥ
उसे पीते समय उनके हाथ से जो बूँदें पृथ्वी पर गिर पड़ीं, उन्हें नाग, बिच्छू आदि जीवों ने तथा कुछ को औषधियों ने ग्रहण कर लिया।