वैष्णव खण्ड · अध्याय 201
अमृत-मन्थन में चतुर्दश-रत्नों की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.2.201.1)
स्कन्द उवाच । ततो हृष्टाः काश्यपेया मन्थस्थानमुपेत्य ते । पुनर्वर्षसहस्रं च मन्थन्ति स्म पयोनिधिम्
skanda uvāca tato hṛṣṭāḥ kāśyapeyā manthasthānamupetya te punarvarṣasahasraṁ ca manthanti sma payonidhim
स्कन्द ने कहा — फिर प्रसन्न हुए कश्यप-पुत्र, मन्थन-स्थान पर पहुँचकर, पुनः एक हजार वर्षों तक क्षीरसागर का मन्थन करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.2.201.2)
मथ्यमानात्तथा सिन्धोः सर्वेस्तैरपि किञ्चन । नासीच्च शिथिला आसन्मंथितारः श्वसन्मुखाः
mathyamānāttathā sindhoḥ sarvestairapi kiñcana nāsīcca śithilā āsanmaṁthitāraḥ śvasanmukhāḥ
उस प्रकार सभी के द्वारा मथे जाने पर भी सागर से कुछ भी नहीं निकला; मथने वाले श्वास लेते हुए मुख से शिथिल हो गए।
श्लोक 3 (skanda.2.201.3)
वासुकिश्च महासर्पः प्राणवैक्लव्यमाप्तवान् । मन्थकाले मन्दरोपि नैकत्रासीत्स्थिरस्थितिः
vāsukiśca mahāsarpaḥ prāṇavaiklavyamāptavān manthakāle mandaropi naikatrāsītsthirasthitiḥ
महासर्प वासुकि के प्राण व्याकुल हो उठे; मन्थन के समय मन्दराचल भी एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सका।
श्लोक 4 (skanda.2.201.4)
सर्वान्दृष्ट्वा निरुत्साहान्प्रद्युम्नो विण्वनुज्ञया । देवासुराहिराजेषु प्रविश्य बलमादधौ
sarvāndṛṣṭvā nirutsāhānpradyumno viṇvanujñayā devāsurāhirājeṣu praviśya balamādadhau
सबको उत्साहहीन देखकर, विष्णु की आज्ञा से प्रद्युम्न ने देवताओं, असुरों तथा नागराज में प्रवेश कर उन्हें बल प्रदान किया।
श्लोक 5 (skanda.2.201.5)
अनिरुद्धोपि तर्ह्येव तमाक्रम्य नगाधिपम् । सहस्रबाहुभिस्तस्थौ महाचल इवाऽपरः
aniruddhopi tarhyeva tamākramya nagādhipam sahasrabāhubhistasthau mahācala ivā'paraḥ
अनिरुद्ध ने भी उसी समय उस पर्वतराज को थामकर, सहस्र भुजाओं से मानो दूसरे महापर्वत के समान खड़े होकर उसे सम्भाला।
श्लोक 6 (skanda.2.201.6)
ततो ममन्थुस्तरसा संप्राप्तपरमोजसः । सविस्मया महाब्धिं ते सुरासुरगणा मुदा
tato mamanthustarasā saṁprāptaparamojasaḥ savismayā mahābdhiṁ te surāsuragaṇā mudā
फिर परम बल को प्राप्त हुए वे देव और असुर गण आश्चर्य तथा आनन्द के साथ महासागर का वेगपूर्वक मन्थन करने लगे।
श्लोक 7 (skanda.2.201.7)
नारायणानुभावेन नापुर्द्देवादयः श्रमम् । शुशुभे मन्थनं तच्च सममाकर्षणात्तदा
nārāyaṇānubhāvena nāpurddevādayaḥ śramam śuśubhe manthanaṁ tacca samamākarṣaṇāttadā
नारायण के प्रभाव से देवता आदि को श्रम का अनुभव नहीं हुआ; और तब दोनों ओर से समान आकर्षण के कारण वह मन्थन अत्यन्त शोभित हुआ।
श्लोक 8 (skanda.2.201.8)
मथ्यमाने महाम्भोधौ सुस्रुवुः परितस्तदा । महाद्रुमाणां निर्यासा बहवश्चौषधीरसाः
mathyamāne mahāmbhodhau susruvuḥ paritastadā mahādrumāṇāṁ niryāsā bahavaścauṣadhīrasāḥ
महासागर के मथे जाने पर उस समय चारों ओर से महावृक्षों के अनेक निर्यास (गोंद-रस) तथा औषधियों के रस बहने लगे।
श्लोक 9 (skanda.2.201.9)
तथाभूतादम्बुनिधेराविरासीत्कलानिधिः । कान्त्यौषधीनामध्यक्षः सर्वासां य उदीर्यते
tathābhūtādambunidherāvirāsītkalānidhiḥ kāntyauṣadhīnāmadhyakṣaḥ sarvāsāṁ ya udīryate
उस प्रकार बने हुए सागर से चन्द्रमा प्रकट हुए, जो अपनी कान्ति से समस्त औषधियों के अधिपति हैं और सबमें प्रशंसित हैं।
श्लोक 10 (skanda.2.201.10)
ततो गवामधिष्ठात्री सर्वासामपि कामधुक् । हविर्द्धान्यभवद्धेनुः शीतांशुसदृशद्युतिः
tato gavāmadhiṣṭhātrī sarvāsāmapi kāmadhuk havirddhānyabhavaddhenuḥ śītāṁśusadṛśadyutiḥ
फिर समस्त गायों की अधिष्ठात्री, सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली, चन्द्रमा के समान कान्ति वाली हविर्धानी नामक कामधेनु उत्पन्न हुई।
श्लोक 11 (skanda.2.201.11)
अश्वः श्वेतोऽथाविरासीद्धयानामधिदेवता । ऐरावतश्च नागेन्द्रश्चतुर्द्दन्तः शशिप्रभः
aśvaḥ śveto'thāvirāsīddhayānāmadhidevatā airāvataśca nāgendraścaturddantaḥ śaśiprabhaḥ
फिर घोड़ों के अधिष्ठाता श्वेत अश्व प्रकट हुए, तथा चार दाँतों वाला, चन्द्रमा के समान कान्ति वाला गजराज ऐरावत भी प्रकट हुआ।
श्लोक 12 (skanda.2.201.12)
पारिजातो दिव्यतरुस्तरुराजस्ततोऽभवत् । मणिरत्नं कौस्तुभाख्यं पद्मरागमभूत्ततः
pārijāto divyatarustarurājastato'bhavat maṇiratnaṁ kaustubhākhyaṁ padmarāgamabhūttataḥ
फिर वृक्षों का राजा दिव्य वृक्ष पारिजात उत्पन्न हुआ; फिर कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि-रत्न प्रकट हुआ।
श्लोक 13 (skanda.2.201.13)
ततोऽभवन्नप्सरसो रूपलावण्यभूमयः । सुरा देवी ततो जज्ञे सर्वमादकदेवता
tato'bhavannapsaraso rūpalāvaṇyabhūmayaḥ surā devī tato jajñe sarvamādakadevatā
फिर रूप और लावण्य की भूमि स्वरूप अप्सराएँ उत्पन्न हुईं; फिर समस्त मादक पदार्थों की देवी सुरा (वारुणी) उत्पन्न हुईं।
श्लोक 14 (skanda.2.201.14)
आसीदथ धनुः शार्ङ्गं सर्वशस्त्राधिदैवतम् । वाद्याधिदैवतं शंखः पाञ्चजन्यस्ततोऽभवत्
āsīdatha dhanuḥ śārṅgaṁ sarvaśastrādhidaivatam vādyādhidaivataṁ śaṁkhaḥ pāñcajanyastato'bhavat
फिर समस्त शस्त्रों का अधिष्ठाता शार्ङ्ग धनुष प्रकट हुआ; फिर वाद्यों का अधिष्ठाता पाञ्चजन्य शंख उत्पन्न हुआ।
श्लोक 15 (skanda.2.201.15)
तत्र चन्द्रः पारिजातस्तथैवाप्सरसां गणः । आदित्यपथमाश्रित्य तस्थुरेते तु तत्क्षणम्
tatra candraḥ pārijātastathaivāpsarasāṁ gaṇaḥ ādityapathamāśritya tasthurete tu tatkṣaṇam
वहाँ चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा अप्सराओं का समूह — ये उसी क्षण सूर्य के मार्ग का आश्रय लेकर वहीं ठहर गए।
श्लोक 16 (skanda.2.201.16)
वारुणीमश्वराजं च दैत्येशा जगृहुर्द्रुतम् । ऐरावतं देवराजो जग्राहानुमताद्धरेः
vāruṇīmaśvarājaṁ ca daityeśā jagṛhurdrutam airāvataṁ devarājo jagrāhānumatāddhareḥ
दैत्यों के स्वामियों ने शीघ्र ही वारुणी तथा अश्वराज को ग्रहण कर लिया; और देवराज ने हरि की अनुमति से ऐरावत को ग्रहण किया।
श्लोक 17 (skanda.2.201.17)
कौस्तुभश्च धनुः शंखो विष्णुमेव प्रपेदिरे । हविर्द्धानीं तु ते सर्वे तापसेभ्यो ददुस्तदा
kaustubhaśca dhanuḥ śaṁkho viṣṇumeva prapedire havirddhānīṁ tu te sarve tāpasebhyo dadustadā
कौस्तुभ मणि, धनुष तथा शंख — ये विष्णु को ही प्राप्त हुए; और हविर्धानी गाय को उन सबने तपस्वियों को दे दिया।
श्लोक 18 (skanda.2.201.18)
मथ्यमानात्पुनः सिन्धोः साक्षाच्छ्रीरभवत्स्वयम् । आनन्दयन्ती स्वदृशा त्रिलोकीं हतवर्चसम्
mathyamānātpunaḥ sindhoḥ sākṣācchrīrabhavatsvayam ānandayantī svadṛśā trilokīṁ hatavarcasam
फिर उस मथे जाते सागर से साक्षात् श्री स्वयं प्रकट हुईं, अपनी दृष्टि से कान्तिहीन हुई त्रिलोकी को आनन्दित करती हुई।
श्लोक 19 (skanda.2.201.19)
तां ग्रहीतुं तु सर्वेपि सुरासुरनरादयः । ऐच्छंस्तस्याः प्रतापात्तु शेकेन्त्येतुं न कश्चन
tāṁ grahītuṁ tu sarvepi surāsuranarādayaḥ aicchaṁstasyāḥ pratāpāttu śekentyetuṁ na kaścana
उन्हें पाने की इच्छा देव, असुर, मनुष्य आदि सभी ने की, किन्तु उनके प्रताप के कारण कोई भी उनके पास जा न सका।
श्लोक 20 (skanda.2.201.20)
ततस्तां पद्महस्तत्वाच्छ्रीं विदित्वैव वासवः । आनन्दं परमं प्राप ब्रह्माद्या ये च तद्विदः
tatastāṁ padmahastatvācchrīṁ viditvaiva vāsavaḥ ānandaṁ paramaṁ prāpa brahmādyā ye ca tadvidaḥ
फिर हाथ में कमल होने से उन्हें श्री जानकर इन्द्र को परम आनन्द प्राप्त हुआ, और ब्रह्मा आदि जो उन्हें जानते थे, उन्हें भी।
श्लोक 21 (skanda.2.201.21)
तावत्तत्राम्बुधिः साक्षादेत्य तां हैम आसने । कन्या ममेयमित्युक्त्वा गृहीत्वाङ्क उपाविशत्
tāvattatrāmbudhiḥ sākṣādetya tāṁ haima āsane kanyā mameyamityuktvā gṛhītvāṅka upāviśat
उसी समय समुद्र स्वयं वहाँ आकर, 'यह मेरी पुत्री है' कहते हुए, उन्हें स्वर्ण-आसन पर लेकर अपनी गोद में बिठा लिया।
श्लोक 22 (skanda.2.201.22)
पुनरब्धेर्मथ्यमानादधिकं बलिभिश्च तैः । सुधार्थिभिर्द्धैर्यवद्भिरपि नैवाभवत्सुधा
punarabdhermathyamānādadhikaṁ balibhiśca taiḥ sudhārthibhirddhairyavadbhirapi naivābhavatsudhā
अमृत की इच्छा रखने वाले उन बलवान तथा धैर्यवान लोगों द्वारा सागर के और भी अधिक मथे जाने पर भी अमृत उत्पन्न नहीं हुआ।
श्लोक 23 (skanda.2.201.23)
तदा शिथिलयत्नास्ते निराशा अमृतोद्भवे । प्रम्लानवक्त्राः खिन्नाश्च बभूवुः काश्यपा मुने
tadā śithilayatnāste nirāśā amṛtodbhave pramlānavaktrāḥ khinnāśca babhūvuḥ kāśyapā mune
हे मुने! तब अमृत की उत्पत्ति से निराश हुए कश्यप-पुत्रों का प्रयत्न शिथिल पड़ गया, और उनके मुख म्लान तथा खिन्न हो गए।
श्लोक 24 (skanda.2.201.24)
दृष्ट्वा तथाविधांस्तांश्च भगवान्करुणानिधिः । उद्युक्तोभूत्स्वयं ब्रह्मन्मन्थनाय हसन्विभुः
dṛṣṭvā tathāvidhāṁstāṁśca bhagavānkaruṇānidhiḥ udyuktobhūtsvayaṁ brahmanmanthanāya hasanvibhuḥ
हे ब्राह्मण! उन्हें उस दशा में देखकर करुणानिधि भगवान स्वयं हँसते हुए मन्थन के लिए तत्पर हो गए।
श्लोक 25 (skanda.2.201.25)
रत्नकाञ्चीदृढाबद्धकक्षपीताम्बरद्युतिः । द्वाभ्यां द्वाभ्यामहिं मध्ये दोर्भ्यामुभयतोग्रहीत्
ratnakāñcīdṛḍhābaddhakakṣapītāmbaradyutiḥ dvābhyāṁ dvābhyāmahiṁ madhye dorbhyāmubhayatograhīt
रत्नों की करधनी से दृढ़तापूर्वक बँधी कमर वाले, पीत वस्त्र से देदीप्यमान वे, दोनों ओर से दो-दो भुजाओं से सर्प को बीच से पकड़ लिया।
श्लोक 26 (skanda.2.201.26)
धृताहिवदना दैत्यास्तस्थुरेकत एव ते । एकतो धृततत्पुच्छा देवास्तस्थुस्तदाखिलाः
dhṛtāhivadanā daityāstasthurekata eva te ekato dhṛtatatpucchā devāstasthustadākhilāḥ
एक ओर सर्प का मुख पकड़े हुए दैत्य खड़े हुए, तथा दूसरी ओर उसकी पूँछ पकड़े हुए सभी देवता खड़े हो गए।
श्लोक 27 (skanda.2.201.27)
तन्मध्यगश्च भगवान्ममन्थाब्धिं स लीलया । ददानो नयनानन्द चञ्चत्करविभूषणः
tanmadhyagaśca bhagavānmamanthābdhiṁ sa līlayā dadāno nayanānanda cañcatkaravibhūṣaṇaḥ
उनके बीच में स्थित होकर भगवान ने लीला मात्र से सागर का मन्थन किया, उनके हिलते हुए हाथों के आभूषण नेत्रों को आनन्द देते थे।
श्लोक 28 (skanda.2.201.28)
ब्रह्मा सहर्षिप्रवरैरन्तरिक्षस्थितस्तदा । अवाकिरत्तं कुसुमैः कुर्वञ्जयजयध्वनिम्
brahmā saharṣipravarairantarikṣasthitastadā avākirattaṁ kusumaiḥ kurvañjayajayadhvanim
श्रेष्ठ ऋषियों सहित आकाश में स्थित ब्रह्मा ने तब 'जय-जय' की ध्वनि करते हुए उन पर पुष्पों की वर्षा की।
श्लोक 29 (skanda.2.201.29)
मथ्यमानात्ततः सिन्धोर्ज्जज्ञे धन्वन्तरिः पुमान् । विष्णोरंशेन गौरांगः सुधाकुम्भं करे दधत्
mathyamānāttataḥ sindhorjjajñe dhanvantariḥ pumān viṣṇoraṁśena gaurāṁgaḥ sudhākumbhaṁ kare dadhat
फिर उस मथे जाते सागर से विष्णु के अंश से गौर वर्ण वाले पुरुष धन्वन्तरि उत्पन्न हुए, जो हाथ में अमृत-कुम्भ धारण किए थे।
श्लोक 30 (skanda.2.201.30)
घृतादीनां हि सर्वेषां रसानां सारमुत्तमम् । अमृतं तद्गृहीत्वाऽसौ श्रियोन्तिकमुपाययौ
ghṛtādīnāṁ hi sarveṣāṁ rasānāṁ sāramuttamam amṛtaṁ tadgṛhītvā'sau śriyontikamupāyayau
घृत आदि समस्त रसों के उत्तम सार-स्वरूप उस अमृत को लेकर वे श्री के समीप गए।