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वैष्णव खण्ड · अध्याय 202

देवताओं द्वारा अमृतपान का वर्णन

अध्याय 201अध्याय-सूचीअध्याय 203

श्लोक 1 (skanda.2.202.1)

स्कन्द उवाच । उत्प्रेक्षन्तो जायमानं मंथितारोऽथ तेऽखिलाः । आयांतं ददृशुर्द्दूरादन्ति धन्वन्तरिं श्रियः

skanda uvāca utprekṣanto jāyamānaṁ maṁthitāro'tha te'khilāḥ āyāṁtaṁ dadṛśurddūrādanti dhanvantariṁ śriyaḥ

स्कन्द ने कहा — उत्पन्न होने वाली वस्तुओं को देखते हुए वे सभी मन्थन करने वाले, दूर से ही श्री के समीप आते हुए धन्वन्तरि को देखने लगे।

श्लोक 2 (skanda.2.202.2)

सुधाभृतं हेमकुम्भं दृष्ट्वा चाऽस्य करे धृतम् । असुराः सहसा ब्रह्मन्नुत्प्लुत्य जगृहुश्च तम्

sudhābhṛtaṁ hemakumbhaṁ dṛṣṭvā cā'sya kare dhṛtam asurāḥ sahasā brahmannutplutya jagṛhuśca tam

हे ब्राह्मण! उसके हाथ में धारण किया हुआ अमृत से भरा स्वर्ण-कुम्भ देखकर, असुरों ने सहसा उछलकर उसे छीन लिया।

श्लोक 3 (skanda.2.202.3)

तत्रापि बलिनो ये ते गृहीत्वा दुद्रुवुस्ततः । तान्दुर्बला न्यषेधन्त नीतिवाक्यैरनुद्रुताः

tatrāpi balino ye te gṛhītvā dudruvustataḥ tāndurbalā nyaṣedhanta nītivākyairanudrutāḥ

उनमें भी जो बलवान थे, वे उसे लेकर वहाँ से भाग गए; उनका पीछा न करते हुए दुर्बल असुरों ने नीति-वाक्यों से उन्हें रोकने का प्रयत्न किया।

श्लोक 4 (skanda.2.202.4)

अहो नैवमधर्मो वः कार्यो धर्मपरायणैः । समश्रमेभ्यो देवेभ्यो दत्त्वा पेयं न चान्यथा

aho naivamadharmo vaḥ kāryo dharmaparāyaṇaiḥ samaśramebhyo devebhyo dattvā peyaṁ na cānyathā

'अहो! धर्मपरायण तुम लोगों को ऐसा अधर्म नहीं करना चाहिए; समान श्रम करने वाले देवताओं को देकर ही इसे पीना चाहिए, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 5 (skanda.2.202.5)

अनादृत्येति तद्वाक्यं ययुर्दूरं त्वरान्विताः । तत्रापि तेषामन्योन्यं कराकृष्टिर्महत्यभूत्

anādṛtyeti tadvākyaṁ yayurdūraṁ tvarānvitāḥ tatrāpi teṣāmanyonyaṁ karākṛṣṭirmahatyabhūt

इस वचन का अनादर कर वे शीघ्रतापूर्वक दूर चले गए; वहाँ भी आपस में एक-दूसरे के हाथ से उसे खींचने का बड़ा विवाद हुआ।

श्लोक 6 (skanda.2.202.6)

अहं पूर्वमहं पूर्वं न त्वं न त्वं पिबाम्यहम् । इत्थं विवदमानास्ते नापुस्तत्प्राशनक्षणम्

ahaṁ pūrvamahaṁ pūrvaṁ na tvaṁ na tvaṁ pibāmyaham itthaṁ vivadamānāste nāpustatprāśanakṣaṇam

'मैं पहले, मैं पहले! तू नहीं, तू नहीं, मैं पीऊँगा!' — इस प्रकार आपस में विवाद करते हुए वे उसे पीने का क्षण ही न पा सके।

श्लोक 7 (skanda.2.202.7)

अथ देवा म्लानवक्त्रा दृष्ट्वा दैत्यैर्हृता सुधाम् । अशक्तास्तत्प्रतीकारे शरणं प्रापुरच्युतम्

atha devā mlānavaktrā dṛṣṭvā daityairhṛtā sudhām aśaktāstatpratīkāre śaraṇaṁ prāpuracyutam

फिर दैत्यों द्वारा अमृत हर लिए जाने को देखकर, म्लान मुख वाले तथा उसका प्रतिकार करने में असमर्थ देवता, अच्युत की शरण में गए।

श्लोक 8 (skanda.2.202.8)

पाहिपाहि जगन्नाथ नष्टं सर्वस्वमेव नः । दैत्यैर्हृता सुधा सर्वा का गतिर्न्नो भविष्यति

pāhipāhi jagannātha naṣṭaṁ sarvasvameva naḥ daityairhṛtā sudhā sarvā kā gatirnno bhaviṣyati

'हे जगन्नाथ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए! हमारा सर्वस्व नष्ट हो गया है। दैत्यों ने सारा अमृत हर लिया है; अब हमारी क्या गति होगी?'

श्लोक 9 (skanda.2.202.9)

सुधापानादृतेप्येते हन्तुमस्मानलं क्षमाः । पीतेऽमृते तु तैरद्य किं करिष्यामहे वयम्

sudhāpānādṛtepyete hantumasmānalaṁ kṣamāḥ pīte'mṛte tu tairadya kiṁ kariṣyāmahe vayam

'अमृतपान के बिना भी ये हमें मार डालने में समर्थ हैं; यदि आज उन्होंने अमृत पी लिया, तो हम क्या करेंगे?'

श्लोक 10 (skanda.2.202.10)

स्कन्द उवाच । निशम्य दैन्यं देवानां भगवान्भक्तकार्यकृत् । मा भैष्टेति सुरानुक्त्वा सुधामादित्सदासुरात्

skanda uvāca niśamya dainyaṁ devānāṁ bhagavānbhaktakāryakṛt mā bhaiṣṭeti surānuktvā sudhāmāditsadāsurāt

स्कन्द ने कहा — देवताओं की दीनता सुनकर, भक्तों के कार्य को सिद्ध करने वाले भगवान ने देवताओं से 'भय मत करो' कहकर, असुरों से अमृत छीनने की इच्छा की।

श्लोक 11 (skanda.2.202.11)

स्त्रीरूपमद्भुतं धृत्वा सर्वलोकविमोहनम् । दैत्यान्तिकमुपागत्य चक्रे कन्दुकखेलनम्

strīrūpamadbhutaṁ dhṛtvā sarvalokavimohanam daityāntikamupāgatya cakre kandukakhelanam

समस्त लोकों को मोहित करने वाला अद्भुत स्त्री-रूप धारण कर, वे दैत्यों के समीप जाकर गेंद से खेलने लगे।

श्लोक 12 (skanda.2.202.12)

ते तु तद्रूपमालोक्य मोहिताः कामविह्वलाः । त्यक्त्वा परस्परोन्मर्द्दं तामुपेत्याब्रुवन्वचः

te tu tadrūpamālokya mohitāḥ kāmavihvalāḥ tyaktvā parasparonmarddaṁ tāmupetyābruvanvacaḥ

उस रूप को देखकर वे मोहित तथा कामातुर हो गए; आपस की छीना-झपटी छोड़कर उसके पास जाकर यह वचन बोले।

श्लोक 13 (skanda.2.202.13)

सुधाकुम्भमिमं भद्रे गृहीत्वा त्वं विभज्य नः । सर्वान्पायय सुश्रोणि वयं कश्यपसूनवः

sudhākumbhamimaṁ bhadre gṛhītvā tvaṁ vibhajya naḥ sarvānpāyaya suśroṇi vayaṁ kaśyapasūnavaḥ

'हे भद्रे! इस अमृत-कुम्भ को लेकर तुम इसे बाँटकर, हम सब कश्यप-पुत्रों को पिला दो, हे सुश्रोणि!'

श्लोक 14 (skanda.2.202.14)

इत्युक्त्वा तं ददुस्तस्मै तेऽनिच्छन्त्या अपि स्त्रियै । सा प्राह मम विश्रम्भो न कार्यः स्वैरिणी ह्यहम्

ityuktvā taṁ dadustasmai te'nicchantyā api striyai sā prāha mama viśrambho na kāryaḥ svairiṇī hyaham

यह कहकर उन्होंने वह कुम्भ उस अनिच्छुक स्त्री को भी दे दिया; उसने कहा — 'मुझ पर विश्वास मत करो, क्योंकि मैं स्वच्छन्द स्वभाव वाली हूँ।'

श्लोक 15 (skanda.2.202.15)

अकार्यं वः कृतं ह्येतद्विभजिष्ये निजेच्छया । इत्युक्ता अपि ते मूढा यथेष्टं कुर्विति ब्रुवन्

akāryaṁ vaḥ kṛtaṁ hyetadvibhajiṣye nijecchayā ityuktā api te mūḍhā yatheṣṭaṁ kurviti bruvan

'तुमने यह अनुचित कार्य किया है; मैं इसे अपनी इच्छा से बाँटूँगी।' ऐसा कहे जाने पर भी वे मूर्ख बोले — 'जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो।'

श्लोक 16 (skanda.2.202.16)

ततस्तदाज्ञया सर्वे देवा दैत्याश्च वासुकिः । निषेदुः पंक्तिशस्तत्र स्वस्वमण्डलमाश्रिताः

tatastadājñayā sarve devā daityāśca vāsukiḥ niṣeduḥ paṁktiśastatra svasvamaṇḍalamāśritāḥ

फिर उसकी आज्ञा से समस्त देवता, दैत्य तथा वासुकि, अपने-अपने समूह में रहते हुए वहाँ पंक्तिबद्ध होकर बैठ गए।

श्लोक 17 (skanda.2.202.17)

पंक्तिबंधोद्यतेष्वेषु मोहिनी सा तु दूरतः । सम्मुखं देवपंक्तीनां हेमासन उपाविशत्

paṁktibaṁdhodyateṣveṣu mohinī sā tu dūrataḥ sammukhaṁ devapaṁktīnāṁ hemāsana upāviśat

जब वे पंक्तिबद्ध होने में लगे थे, तब वह मोहिनी दूर हटकर, देव-पंक्तियों के सम्मुख स्वर्ण-आसन पर बैठ गई।

श्लोक 18 (skanda.2.202.18)

स्वांतिके चामृतघटं निधाय स्त्रैणलीलया । इतस्ततो वीक्षमाणा तस्थौ निःस्पृहवत्क्षणम्

svāṁtike cāmṛtaghaṭaṁ nidhāya straiṇalīlayā itastato vīkṣamāṇā tasthau niḥspṛhavatkṣaṇam

अपने पास अमृत-घट रखकर, स्त्री-सुलभ लीला से इधर-उधर देखती हुई वह एक क्षण निःस्पृह के समान बैठी रही।

श्लोक 19 (skanda.2.202.19)

विप्रचित्तिमुखास्तर्हि ये वै दानवयूथपाः । संदिग्धचित्ता मोहिन्यामासन्देवांतिकस्थितेः

vipracittimukhāstarhi ye vai dānavayūthapāḥ saṁdigdhacittā mohinyāmāsandevāṁtikasthiteḥ

तब विप्रचित्ति आदि जो दानवों के सेनापति थे, वे मोहिनी के देवताओं के समीप बैठने के कारण उसके प्रति संशयशील हो उठे।

श्लोक 20 (skanda.2.202.20)

शनैरुपेत्य तद्दृष्टिं वञ्चयित्वा सुधाघटम् । जह्रुः पुनर्दुरात्मानो रहो गत्वा पिपासवः

śanairupetya taddṛṣṭiṁ vañcayitvā sudhāghaṭam jahruḥ punardurātmāno raho gatvā pipāsavaḥ

धीरे-धीरे पास जाकर, उसकी दृष्टि को धोखा देकर, अमृत की प्यास वाले उन दुरात्माओं ने पुनः वह घट छीन लिया और एकान्त में चले गए।

श्लोक 21 (skanda.2.202.21)

नरनारायणौ तत्र मुनिभिः सह चागतौ । आस्तां तौ ददृशाते तान्दानवान्हरतोऽमृतम्

naranārāyaṇau tatra munibhiḥ saha cāgatau āstāṁ tau dadṛśāte tāndānavānharato'mṛtam

मुनियों सहित वहाँ आए हुए नर-नारायण वहाँ उपस्थित थे; उन्होंने उन दानवों को अमृत हरते हुए देखा।

श्लोक 22 (skanda.2.202.22)

नारायणेनेरितोऽथ नरस्तान्सहसारुणत् । बलादाच्छिद्य तत्कुम्भं मोहिन्यै स ददौ द्रुतम्

nārāyaṇenerito'tha narastānsahasāruṇat balādācchidya tatkumbhaṁ mohinyai sa dadau drutam

नारायण द्वारा प्रेरित होकर नर ने उन्हें सहसा रोक दिया; बलपूर्वक वह कुम्भ छीनकर उन्होंने तुरन्त मोहिनी को दे दिया।

श्लोक 23 (skanda.2.202.23)

ततो नरं हन्तुकामा आत्तशस्त्रास्तु दानवाः । आपतन्पंक्तिविक्षेपो ह्यसुराणामभून्महान्

tato naraṁ hantukāmā āttaśastrāstu dānavāḥ āpatanpaṁktivikṣepo hyasurāṇāmabhūnmahān

तब शस्त्र उठाए हुए दानव नर को मारने की इच्छा से उस पर टूट पड़े; इससे असुरों की पंक्तियों में बड़ी अफरा-तफरी मच गई।

श्लोक 24 (skanda.2.202.24)

तदा नरोपि भगवान्देवदैत्यनरैरपि । अजेयो निर्भयो ह्येकः साकं तैर्युयुधे बली

tadā naropi bhagavāndevadaityanarairapi ajeyo nirbhayo hyekaḥ sākaṁ tairyuyudhe balī

तब वे भगवान नर भी, जो देवता, दैत्य तथा मनुष्यों द्वारा भी अजेय थे, अकेले ही निर्भय होकर उन सबके साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 25 (skanda.2.202.25)

एतस्मिन्नन्तरे देवान्पंक्तिस्थान्मोहिनीवपुः । अपाययत्सुधां विष्णुः सर्वशो लघुचङ्क्रमः

etasminnantare devānpaṁktisthānmohinīvapuḥ apāyayatsudhāṁ viṣṇuḥ sarvaśo laghucaṅkramaḥ

इसी बीच मोहिनी-रूप विष्णु ने चारों ओर तीव्र गति से घूमते हुए, पंक्तिबद्ध बैठे देवताओं को अमृत पिला दिया।

श्लोक 26 (skanda.2.202.26)

तत्रापि दानवो राहुः सूर्याचन्द्रमसान्तरे । प्रविश्य देवतापंक्तावुपाविशदलक्षितः

tatrāpi dānavo rāhuḥ sūryācandramasāntare praviśya devatāpaṁktāvupāviśadalakṣitaḥ

वहाँ भी दानव राहु सूर्य और चन्द्रमा के बीच में घुसकर, देवताओं की पंक्ति में अलक्षित रूप से बैठ गया।

श्लोक 27 (skanda.2.202.27)

तत्रागतायां मोहिन्यां सिञ्चन्त्यां तन्मुखे सुधाम् । दृशाऽसूसुचतां तस्यै पुष्पवन्तावुभौ च तम्

tatrāgatāyāṁ mohinyāṁ siñcantyāṁ tanmukhe sudhām dṛśā'sūsucatāṁ tasyai puṣpavantāvubhau ca tam

वहाँ आई हुई मोहिनी जब उसके मुख में अमृत सींच रही थी, तब सूर्य और चन्द्रमा दोनों ने दृष्टि से उसे उसके विषय में संकेत कर दिया।

श्लोक 28 (skanda.2.202.28)

स्मृत्यागतेन चक्रेण तर्ह्येवाऽस्य च सामृतम् । शिरश्चिच्छेदातिमहन्मायायोषिद्वपुः प्रभुः

smṛtyāgatena cakreṇa tarhyevā'sya ca sāmṛtam śiraścicchedātimahanmāyāyoṣidvapuḥ prabhuḥ

तब उसी क्षण स्मरण मात्र से आए चक्र द्वारा, उस मायामयी विशाल स्त्री-रूप वाले प्रभु ने अमृत सहित उसका सिर काट दिया।

श्लोक 29 (skanda.2.202.29)

तच्छैलशृङ्गप्रतिमं ग्रसल्लोकान्नदद्भृशम् । ग्रहत्वे स्थापयामास लोकानां शान्तये हरिः

tacchailaśṛṅgapratimaṁ grasallokānnadadbhṛśam grahatve sthāpayāmāsa lokānāṁ śāntaye hariḥ

पर्वत-शिखर के समान उस सिर को, जो मानो लोकों को निगलता हुआ भयंकर गर्जन कर रहा था, हरि ने लोकों की शान्ति के लिए ग्रह के पद पर स्थापित कर दिया।

श्लोक 30 (skanda.2.202.30)

देवान्सुधां पाययित्वा जगृहे पौरुषीं तनुम् । भगवानथ देवास्तु युयुधुः सह दानवैः

devānsudhāṁ pāyayitvā jagṛhe pauruṣīṁ tanum bhagavānatha devāstu yuyudhuḥ saha dānavaiḥ

देवताओं को अमृत पिलाकर भगवान ने पुनः अपना पुरुष-शरीर धारण कर लिया; फिर देवता दानवों के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 31 (skanda.2.202.31)

उदन्वतस्तटे युद्धं देवानामसुरैः सह । सुधापानातिबलिनामासीद्विष्णुसहायिनाम्

udanvatastaṭe yuddhaṁ devānāmasuraiḥ saha sudhāpānātibalināmāsīdviṣṇusahāyinām

सागर के तट पर, अमृतपान से अत्यन्त बलवान हुए तथा विष्णु के सहायक देवताओं का असुरों के साथ युद्ध हुआ।

श्लोक 32 (skanda.2.202.32)

तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे नरेणेन्द्रादिभिश्च ते । निहन्यमाना असुराः पलाय्य विविशू रसाम्

tasmiṁstu tumule yuddhe nareṇendrādibhiśca te nihanyamānā asurāḥ palāyya viviśū rasām

उस भीषण युद्ध में नर तथा इन्द्र आदि द्वारा मारे जाते हुए असुर भागकर रसातल में जा घुसे।

श्लोक 33 (skanda.2.202.33)

सूर्यश्चास्तं गतस्तावत्सर्वे देवगणास्ततः । श्रियोन्तिकमुपाजग्मुस्तद्दर्शनमहोत्सवाः

sūryaścāstaṁ gatastāvatsarve devagaṇāstataḥ śriyontikamupājagmustaddarśanamahotsavāḥ

इतने में सूर्य अस्त हो गया; तब सभी देवगण, उनके दर्शन के महोत्सव में लीन होकर, श्री के समीप गए।

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