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वैष्णव खण्ड · अध्याय 204

लक्ष्मी-नारायण स्तुति निरूपण

अध्याय 203अध्याय-सूचीअध्याय 205

श्लोक 1 (skanda.2.204.1)

ब्रह्मोवाच । विचार्य्याऽहं वेदान्मुहुरुपगतो निश्चयमिमं रमारामे भक्तिस्त्वयि दृढतरा यर्ह्यसुभृताम् । भवेत्तर्ह्येवैषां क्षयविरहिता भोगनिकरास्तथा स्युर्लोका वै परमपुरुषात्यंतिकगतिः

brahmovāca vicāryyā'haṁ vedānmuhurupagato niścayamimaṁ ramārāme bhaktistvayi dṛḍhatarā yarhyasubhṛtām bhavettarhyevaiṣāṁ kṣayavirahitā bhoganikarāstathā syurlokā vai paramapuruṣātyaṁtikagatiḥ

ब्रह्मा ने कहा — हे रमारमण! वेदों पर बार-बार विचार कर मैं इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि जब प्राणियों की आपमें भक्ति अत्यन्त दृढ़ हो जाती है, तभी उनके भोग-समूह क्षयरहित होते हैं तथा उनके लोक भी वैसे ही होते हैं; और परम पुरुष ही उनकी अन्तिम गति हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.204.2)

अजानन्तस्त्वित्थं भृतरजतमस्कानपि हरे भजन्त्यस्मान्देवान्बहुविधतपोर्च्चासरणिभिः । त एवोक्ता मूढाः क्षयरहितसौख्यं न कुहचिल्लभन्तेऽतस्त्वां वै निजहृदि दधे केशवमहम्

ajānantastvitthaṁ bhṛtarajatamaskānapi hare bhajantyasmāndevānbahuvidhataporccāsaraṇibhiḥ ta evoktā mūḍhāḥ kṣayarahitasaukhyaṁ na kuhacillabhante'tastvāṁ vai nijahṛdi dadhe keśavamaham

हे हरि! इसे न जानते हुए जो लोग रज-तम से युक्त हम देवताओं को ही नाना प्रकार के तप और पूजा-मार्गों से भजते हैं, वे ही मूढ़ कहलाते हैं, क्योंकि उन्हें कहीं भी क्षयरहित सुख नहीं मिलता। इसीलिए मैं आप केशव को ही अपने हृदय में धारण करता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.2.204.3)

शंकर उवाच । त्रयी सांख्यवेदांतयोगाः पुराणं तथा पञ्चरात्रं प्रभो धर्मशास्त्रम् । तवैवातिमाहात्म्यमेकस्य नित्यं प्रकारैरनेकैर्हि गायंति भक्त्या

śaṁkara uvāca trayī sāṁkhyavedāṁtayogāḥ purāṇaṁ tathā pañcarātraṁ prabho dharmaśāstram tavaivātimāhātmyamekasya nityaṁ prakārairanekairhi gāyaṁti bhaktyā

शंकर ने कहा — हे प्रभो! त्रयी वेद, साङ्ख्य, वेदान्त, योग, पुराण, पंचरात्र तथा धर्मशास्त्र — ये सब भक्तिपूर्वक अनेक प्रकारों से नित्य आपकी ही, एक की, अतिशय महिमा का गान करते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.204.4)

त्वदेवेश शास्त्राणि चैतानि भूम्नो बभूवुस्त्वदेकाश्रयाण्यादिकल्पे । रमासेव्यपादाम्बुजं शास्त्रयोनिं तमाद्यं भवन्तं भजे वासुदेवम्

tvadeveśa śāstrāṇi caitāni bhūmno babhūvustvadekāśrayāṇyādikalpe ramāsevyapādāmbujaṁ śāstrayoniṁ tamādyaṁ bhavantaṁ bhaje vāsudevam

हे ईश! ये शास्त्र आदि कल्प में आप अनन्त से ही उत्पन्न हुए, और आप को ही एकमात्र आश्रय मानते हैं। मैं शास्त्रों के मूल-स्रोत, आदि, रमा द्वारा सेवित चरण-कमल वाले आप वासुदेव का भजन करता हूँ।

श्लोक 5 (skanda.2.204.5)

धर्म उवाच । कथा त्वदीया भवपाशमोचनी सुधैव तापत्रयतप्तदेहिनाम् । अनेकजन्माघचयापहारिणी तनोति भक्तिं वयुनं तवाञ्जसा

dharma uvāca kathā tvadīyā bhavapāśamocanī sudhaiva tāpatrayataptadehinām anekajanmāghacayāpahāriṇī tanoti bhaktiṁ vayunaṁ tavāñjasā

धर्म ने कहा — आपकी कथा, संसार-बन्धन से मुक्त करने वाली, त्रिविध तापों से संतप्त प्राणियों के लिए अमृत के समान है; वह अनेक जन्मों के संचित पापों को हरने वाली है, तथा शीघ्र ही आपके प्रति भक्ति और ज्ञान का विस्तार करती है।

श्लोक 6 (skanda.2.204.6)

सदैव सा कर्णपथेन हृद्दरी विशत्वनन्ताभिध सम्मुखोद्गता । मम त्वदन्या हरताच्च वासना दयाब्धये ते प्रभविष्णवे नमः

sadaiva sā karṇapathena hṛddarī viśatvanantābhidha sammukhodgatā mama tvadanyā haratācca vāsanā dayābdhaye te prabhaviṣṇave namaḥ

हे अनन्त नाम वाले! वह कथा सदा मेरे सम्मुख उदित होकर, कान के मार्ग से मेरे हृदय की गुहा में प्रवेश करे, और आपसे भिन्न मेरी सारी वासना को हर ले। हे दयासागर, हे सर्वशक्तिमान! आपको नमस्कार है।

श्लोक 7 (skanda.2.204.7)

प्रजापतय ऊचुः । धन्या एते कल्पवृक्षा यदीयां छायामेतामाश्रितस्त्वं सहश्रीः । धन्यः कर्ता मण्डपस्यास्य ते वै धन्यैषा भूर्यत्र पीठं तवेश

prajāpataya ūcuḥ dhanyā ete kalpavṛkṣā yadīyāṁ chāyāmetāmāśritastvaṁ sahaśrīḥ dhanyaḥ kartā maṇḍapasyāsya te vai dhanyaiṣā bhūryatra pīṭhaṁ taveśa

प्रजापतियों ने कहा — धन्य हैं ये कल्पवृक्ष, जिनकी छाया का श्री सहित आपने आश्रय लिया है; धन्य है आपके इस मण्डप का निर्माता; और हे ईश! धन्य है यह भूमि, जहाँ आपका आसन है।

श्लोक 8 (skanda.2.204.8)

धन्यो लोके नूनमेषोम्बुराशिः साक्षात्तुभ्यं येन दत्ता स्वकन्या । धन्याश्चैते त्वां वयं वीक्षमाणा धन्येशानं श्रीपतिं त्वां नताः स्मः

dhanyo loke nūnameṣomburāśiḥ sākṣāttubhyaṁ yena dattā svakanyā dhanyāścaite tvāṁ vayaṁ vīkṣamāṇā dhanyeśānaṁ śrīpatiṁ tvāṁ natāḥ smaḥ

इस लोक में निश्चय ही धन्य है यह समुद्र, जिसने साक्षात् आपको अपनी पुत्री अर्पित की है; और आपको देखने वाले हम भी धन्य हैं; हे ईश, हे श्रीपति! धन्य होकर हम आपको नमन करते हैं।

श्लोक 9 (skanda.2.204.9)

मनव ऊचुः । धर्मः खलु स हि परमो धर्मेभ्यो माधव सकलेभ्योपि । भक्तिर्भवति यतो वै धर्मभुवि त्वयि हि निरवद्या

manava ūcuḥ dharmaḥ khalu sa hi paramo dharmebhyo mādhava sakalebhyopi bhaktirbhavati yato vai dharmabhuvi tvayi hi niravadyā

मनुओं ने कहा — हे माधव! समस्त धर्मों में वही परम धर्म है, जिससे धर्म के आधार आप में निर्दोष भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 10 (skanda.2.204.10)

धर्मात्मानं भगवन्धर्मधुरीणं च धर्मपातारम् । सर्वातिप्रियधर्मं नुमस्त्वां धर्मसंभूतिम्

dharmātmānaṁ bhagavandharmadhurīṇaṁ ca dharmapātāram sarvātipriyadharmaṁ numastvāṁ dharmasaṁbhūtim

हे भगवन्! हम आपकी स्तुति करते हैं — जो धर्मात्मा हैं, धर्म के धुरन्धर हैं, धर्म के रक्षक हैं, सबसे अधिक प्रिय धर्म-स्वरूप हैं, तथा धर्म के उद्गम हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.204.11)

ऋषय ऊचुः । भक्त्या हीनस्त्वद्विमुखो वयुनार्थी श्राम्यन्भूयोप्यस्य न सिद्धिं समुपैति । तर्ह्यासक्तः कर्मणि काम्ये तु कुतोसौ सौख्यं यायादक्षयमानन्दमहाब्धे

ṛṣaya ūcuḥ bhaktyā hīnastvadvimukho vayunārthī śrāmyanbhūyopyasya na siddhiṁ samupaiti tarhyāsaktaḥ karmaṇi kāmye tu kutosau saukhyaṁ yāyādakṣayamānandamahābdhe

ऋषियों ने कहा — भक्तिरहित, आपसे विमुख, ज्ञान का इच्छुक पुरुष बार-बार परिश्रम करने पर भी सिद्धि नहीं पाता। हे आनन्दमहासागर! तब काम्य कर्म में आसक्त पुरुष अक्षय सुख को कैसे प्राप्त कर सकता है?

श्लोक 12 (skanda.2.204.12)

भक्त्या नित्यं त्वामत एव वयं वै श्रद्धायुक्ता धर्मतपोनिगमाद्यैः । मायातीतं कालनियन्तारमुदारं ध्यायामः श्रीकान्तपरात्परमेकम्

bhaktyā nityaṁ tvāmata eva vayaṁ vai śraddhāyuktā dharmataponigamādyaiḥ māyātītaṁ kālaniyantāramudāraṁ dhyāyāmaḥ śrīkāntaparātparamekam

इसीलिए हम श्रद्धायुक्त होकर धर्म, तप, वेद आदि के साथ नित्य भक्तिपूर्वक आपका ध्यान करते हैं — माया से परे, काल के नियन्ता, उदार, श्रीकान्त, परात्पर, एकमात्र आपका।

श्लोक 13 (skanda.2.204.13)

इन्द्र उवाच । भगवन्नुरुदुःखिता वयं ननु दुर्वासस एव हेलनात् । न भवन्तमृतेऽवितुं हि नो विधिरुद्रप्रमुखा इमेऽशकन्

indra uvāca bhagavannuruduḥkhitā vayaṁ nanu durvāsasa eva helanāt na bhavantamṛte'vituṁ hi no vidhirudrapramukhā ime'śakan

इन्द्र ने कहा — हे भगवन्! दुर्वासा के अनादर से ही हम अत्यन्त दुःखी हुए; आपके बिना ब्रह्मा, रुद्र आदि भी हमारी रक्षा करने में समर्थ न हो सके।

श्लोक 14 (skanda.2.204.14)

विगताखिलसंपदो निरन्नाः समभावं भुवि पामरैरुपेताः । भवतैव वयं हृतापदः स्मः सपदि श्रीहरये नमोस्तु तुभ्यम्

vigatākhilasaṁpado nirannāḥ samabhāvaṁ bhuvi pāmarairupetāḥ bhavataiva vayaṁ hṛtāpadaḥ smaḥ sapadi śrīharaye namostu tubhyam

अपनी सारी सम्पदा खोकर, अन्नरहित होकर, पृथ्वी पर तुच्छ लोगों के समान हो गए हम, आप ही के द्वारा तत्काल विपत्ति से मुक्त किए गए हैं। हे श्रीहरि! आपको नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.2.204.15)

अग्निरुवाच । गीर्वाणदानवनराद्युपजीवनान्नं यन्निर्मितं हि भवतैव ततो बुधास्तु । यज्ञेषु तेन यजनं तव कुर्वतेऽथो त्वच्छेषमन्यदिविषद्भ्य उपानयन्ति

agniruvāca gīrvāṇadānavanarādyupajīvanānnaṁ yannirmitaṁ hi bhavataiva tato budhāstu yajñeṣu tena yajanaṁ tava kurvate'tho tvaccheṣamanyadiviṣadbhya upānayanti

अग्नि ने कहा — देवताओं, दानवों तथा मनुष्यों आदि के जीवन का आधार जो अन्न है, वह आपके द्वारा ही निर्मित है; इसीलिए विद्वान लोग यज्ञों में उसी से आपका यजन करते हैं, और उसके शेष को अन्य देवताओं तक पहुँचाते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.204.16)

काम्येषु कर्मसु रता अपि याज्ञिकास्ते तत्कर्मबन्धनत आशु विमुच्य यान्ति । ब्राह्मीं गतिं तदितरे तु भवन्ति चौराः श्रीयज्ञपूरुषमहं प्रणमामि तं त्वाम्

kāmyeṣu karmasu ratā api yājñikāste tatkarmabandhanata āśu vimucya yānti brāhmīṁ gatiṁ taditare tu bhavanti caurāḥ śrīyajñapūruṣamahaṁ praṇamāmi taṁ tvām

काम्य कर्मों में रत यज्ञकर्ता भी उस कर्म-बन्धन से शीघ्र मुक्त होकर ब्रह्म-गति को प्राप्त होते हैं; परन्तु इससे भिन्न आचरण करने वाले तो चोर ही हैं। मैं श्रीयज्ञपुरुष आपको प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 17 (skanda.2.204.17)

मरुत ऊचुः । भक्ता एकान्तिकास्तेऽक्षरपरमपदे सेवया ते तु हीनं वासैश्वर्यादि नेच्छन्त्यतिशयितसुखं नापि कैवल्यमोक्षम् । तद्युक्तं त्वात्मनोपि श्वपचकुलजनुर्मानयन्त्युत्तमं वै तं त्वामेकान्तधर्माश्रयणमुपगताः श्रीमहापूरुषं स्मः

maruta ūcuḥ bhaktā ekāntikāste'kṣaraparamapade sevayā te tu hīnaṁ vāsaiśvaryādi necchantyatiśayitasukhaṁ nāpi kaivalyamokṣam tadyuktaṁ tvātmanopi śvapacakulajanurmānayantyuttamaṁ vai taṁ tvāmekāntadharmāśrayaṇamupagatāḥ śrīmahāpūruṣaṁ smaḥ

मरुतों ने कहा — आपके एकान्तिक भक्त, आपकी सेवा से रहित अक्षर परम पद में निवास, ऐश्वर्य आदि, अतिशय सुख अथवा कैवल्य-मोक्ष की भी इच्छा नहीं करते; वे उस सेवा से युक्त होने पर चाण्डाल-कुल में जन्म को भी अपनी दिव्य स्थिति से श्रेष्ठ मानते हैं। हम भी उसी एकान्तिक धर्म का आश्रय लेकर, हे श्रीमहापुरुष, आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.204.18)

सिद्धा ऊचुः । नैकब्रह्माण्डसर्गादिकारणं त्वामकारणम् । तत्स्थं तद्व्यतिरिक्तं च नियन्तारं नमामहे

siddhā ūcuḥ naikabrahmāṇḍasargādikāraṇaṁ tvāmakāraṇam tatsthaṁ tadvyatiriktaṁ ca niyantāraṁ namāmahe

सिद्धों ने कहा — हम आपको नमस्कार करते हैं, जो अनेक ब्रह्माण्डों की सृष्टि आदि के कारण हैं, स्वयं अकारण हैं, उनमें स्थित तथा उनसे पृथक् भी हैं, और सबके नियन्ता हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.204.19)

रुद्रा ऊचुः । मायायाः सर्वमोहिन्या मोहनं मोहवर्जितम् । महाकालस्यापि कालं त्वां नमः पुरुषोत्तमम्

rudrā ūcuḥ māyāyāḥ sarvamohinyā mohanaṁ mohavarjitam mahākālasyāpi kālaṁ tvāṁ namaḥ puruṣottamam

रुद्रों ने कहा — सबको मोहित करने वाली माया को भी मोहित करने वाले, स्वयं मोहरहित, महाकाल के भी काल — हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।

श्लोक 20 (skanda.2.204.20)

आदित्या ऊचुः । प्रकाशिता येन वयं जगन्ति प्रकाशयामो भवता रमेश । स्वयंप्रकाशं तमुरुप्रकाशं प्रकाशमूर्त्तिं प्रणता भवन्तम्

ādityā ūcuḥ prakāśitā yena vayaṁ jaganti prakāśayāmo bhavatā rameśa svayaṁprakāśaṁ tamuruprakāśaṁ prakāśamūrttiṁ praṇatā bhavantam

आदित्यों ने कहा — हे रमेश! जिसके द्वारा हम प्रकाशित हुए हैं और जिसके कारण हम लोकों को प्रकाशित करते हैं, उन स्वयंप्रकाश, महाप्रकाश, प्रकाशमूर्ति आप को हम नमन करते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.204.21)

साध्या ऊचुः । शास्ता नृपाणां च महोरगाणां दैत्याधिपानां च सुराधिपानाम् । त्वं वै मनूनां च प्रजापतीनां राजाधिराजाय नमोस्तु तुभ्यम्

sādhyā ūcuḥ śāstā nṛpāṇāṁ ca mahoragāṇāṁ daityādhipānāṁ ca surādhipānām tvaṁ vai manūnāṁ ca prajāpatīnāṁ rājādhirājāya namostu tubhyam

साध्यों ने कहा — आप ही राजाओं, महानागों, दैत्येश्वरों तथा देवेश्वरों के शासक हैं, तथा मनुओं और प्रजापतियों के भी — हे राजाधिराज! आपको नमस्कार है।

श्लोक 22 (skanda.2.204.22)

वसव ऊचुः । भवति भुवि यदायदाऽसुरांशैः प्रथितसनातनधर्मधार्मिकाणाम् । कदनमुरु तदातदा स्वयं ते ह्यवतरते प्रणमाम धर्मगोप्त्रे

vasava ūcuḥ bhavati bhuvi yadāyadā'surāṁśaiḥ prathitasanātanadharmadhārmikāṇām kadanamuru tadātadā svayaṁ te hyavatarate praṇamāma dharmagoptre

वसुओं ने कहा — जब-जब पृथ्वी पर असुरांशों द्वारा सनातन धर्म का पालन करने वालों का बड़ा संहार होता है, तब-तब आप स्वयं अवतरित होते हैं; हे धर्म के रक्षक! हम आपको प्रणाम करते हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.204.23)

चारणा ऊचुः । चरित्रं शुभं ते धृतानेकमूर्त्तेः प्रबन्धैरनेकैर्हि गायन्ति भक्ताः । यदु श्रोतृवक्तॄन्पुनात्येव सद्यो वयं तं नताः पुण्यकीर्त्तिं भवन्तम्

cāraṇā ūcuḥ caritraṁ śubhaṁ te dhṛtānekamūrtteḥ prabandhairanekairhi gāyanti bhaktāḥ yadu śrotṛvaktṝnpunātyeva sadyo vayaṁ taṁ natāḥ puṇyakīrttiṁ bhavantam

चारणों ने कहा — अनेक रूप धारण करने वाले आपके शुभ चरित्र को भक्तजन अनेक प्रबन्धों में गाते हैं, जो सुनने और कहने वालों को तत्काल पवित्र कर देता है; उन पुण्यकीर्ति आपको हम नमन करते हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.204.24)

गन्धर्वाप्सरस ऊचुः । ये कथास्ते विहायान्यगाथाः प्रभो कीर्त्तयन्तेऽथ शृण्वन्ति वा ते जनाः । दुःखिताः स्युश्च संसारपाशैः सितास्तं नताः स्मः शरण्यं भवन्तं वयम्

gandharvāpsarasa ūcuḥ ye kathāste vihāyānyagāthāḥ prabho kīrttayante'tha śṛṇvanti vā te janāḥ duḥkhitāḥ syuśca saṁsārapāśaiḥ sitāstaṁ natāḥ smaḥ śaraṇyaṁ bhavantaṁ vayam

गन्धर्वों और अप्सराओं ने कहा — हे प्रभो! अन्य कथाओं को छोड़कर जो लोग आपकी ही कथाएँ कहते या सुनते हैं, वे संसार के बन्धनों से बँधकर दुःखी नहीं होते; हम शरण्य आपको नमन करते हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.204.25)

समुद्र उवाच । अजित तवाऽथ तावकजनस्य मुदाऽल्पमपि द्रविण जलान्नवस्त्रनमनान्यतमेन सकृत् । चरति ह सेवनं स पदवीं महतीं महतां व्रजति जनोल्पकोपि तमहं प्रणतः करुणम्

samudra uvāca ajita tavā'tha tāvakajanasya mudā'lpamapi draviṇa jalānnavastranamanānyatamena sakṛt carati ha sevanaṁ sa padavīṁ mahatīṁ mahatāṁ vrajati janolpakopi tamahaṁ praṇataḥ karuṇam

समुद्र ने कहा — हे अजित! जो कोई भी तुच्छ मनुष्य भी एक बार, प्रसन्नतापूर्वक, थोड़ा भी धन, जल, अन्न, वस्त्र या प्रणाम में से किसी एक के द्वारा आपकी अथवा आपके जनों की सेवा करता है, वह भी महापुरुषों की महान पदवी को प्राप्त कर लेता है। हे करुणामय! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 26 (skanda.2.204.26)

पार्षदा ऊचुः । पितरो त्वमसि स्वजनस्त्वमसि त्वमसीष्टगुरुः सुहृदात्मपतिः । त्वमसीश्वर एव च नः परमस्त्वमसि द्रविणं सकलं त्वमसि

pārṣadā ūcuḥ pitaro tvamasi svajanastvamasi tvamasīṣṭaguruḥ suhṛdātmapatiḥ tvamasīśvara eva ca naḥ paramastvamasi draviṇaṁ sakalaṁ tvamasi

पार्षदों ने कहा — आप ही हमारे पिता हैं, आप ही स्वजन हैं, आप ही प्रिय गुरु, सुहृद तथा आत्मा के स्वामी हैं। आप ही हमारे परम ईश्वर हैं, और आप ही हमारा सम्पूर्ण धन हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.204.27)

मूर्त्तिरुवाच । यत्संबन्धत एव यान्ति पदवीमुच्चां महद्भिर्न्नुतां स्त्रीशूद्रासुरनीचपक्षिपशवः पापात्मजीवा अपि । यद्धीना विबुधेश्वरा अपि भवन्त्यर्च्चोज्झितास्तत्क्षणं गोलोकाधिपतिं तमेव हृदये नित्यं भजे त्वामहम्

mūrttiruvāca yatsaṁbandhata eva yānti padavīmuccāṁ mahadbhirnnutāṁ strīśūdrāsuranīcapakṣipaśavaḥ pāpātmajīvā api yaddhīnā vibudheśvarā api bhavantyarccojjhitāstatkṣaṇaṁ golokādhipatiṁ tameva hṛdaye nityaṁ bhaje tvāmaham

मूर्ति ने कहा — जिनके संबन्ध मात्र से स्त्री, शूद्र, असुर, नीच, पक्षी, पशु तथा पापी जीव भी महापुरुषों द्वारा प्रशंसित उच्च पद को प्राप्त होते हैं, और जिनसे रहित होकर देवताओं के स्वामी भी तत्काल पूजा से वंचित हो जाते हैं — उन्हीं गोलोकाधिपति आपको मैं सदा हृदय में भजती हूँ।

श्लोक 28 (skanda.2.204.28)

सावित्र्युवाच । त्वं सर्गकाले प्रकृतिं च पूरुषं दृष्ट्या स्वयोत्थाप्य ततस्तदात्मना । तत्त्वानि सृष्ट्वा महदादिमानितैर्न्नैकान्विराजो बहुधा ससर्जिथ

sāvitryuvāca tvaṁ sargakāle prakṛtiṁ ca pūruṣaṁ dṛṣṭyā svayotthāpya tatastadātmanā tattvāni sṛṣṭvā mahadādimānitairnnaikānvirājo bahudhā sasarjitha

सावित्री ने कहा — सृष्टि के समय आपने अपनी दृष्टि से प्रकृति और पुरुष को उठाकर, फिर उन्हीं के द्वारा महत् आदि तत्त्वों की रचना कर, विराट रूप में अनेक प्रकार से असंख्य जगतों की सृष्टि की।

श्लोक 29 (skanda.2.204.29)

वैराजरूपेण जगद्विधातृतां स्वीकृत्य देवासुरमानुषोरगान् । त्वं स्थावरं जंगममीश निर्ममे त्वामादिकर्तारमुपाश्रितास्म्यहम्

vairājarūpeṇa jagadvidhātṛtāṁ svīkṛtya devāsuramānuṣoragān tvaṁ sthāvaraṁ jaṁgamamīśa nirmame tvāmādikartāramupāśritāsmyaham

हे ईश! विराट रूप धारण कर, जगत के विधाता का पद स्वीकार कर, आपने देवता, असुर, मनुष्य, नाग तथा समस्त स्थावर-जंगम जीवों की रचना की। मैंने आदि-कर्ता आपकी ही शरण ली है।

श्लोक 30 (skanda.2.204.30)

दुर्गोवाच । प्रियतयाऽधिकया हृदि चिन्तनं विदधते तव ये भुवि ते विभो । न परमेष्ठिसुखं न दिवः सुखं न कमयन्ति धरैकनरेशताम्

durgovāca priyatayā'dhikayā hṛdi cintanaṁ vidadhate tava ye bhuvi te vibho na parameṣṭhisukhaṁ na divaḥ sukhaṁ na kamayanti dharaikanareśatām

दुर्गा ने कहा — हे विभो! पृथ्वी पर जो लोग अत्यन्त प्रेम से आपका हृदय में चिन्तन करते हैं, वे न ब्रह्मलोक के सुख की, न स्वर्ग के सुख की, और न पृथ्वी के एकछत्र राज्य की भी कामना करते हैं।

श्लोक 31 (skanda.2.204.31)

प्रसभमर्पितमप्यतुलं त्वया सुखमिदं समवाप्य च तत्र ते । तदपहाय न शक्तिकृतः क्षणं तमु नमामि च सात्वतनायकम्

prasabhamarpitamapyatulaṁ tvayā sukhamidaṁ samavāpya ca tatra te tadapahāya na śaktikṛtaḥ kṣaṇaṁ tamu namāmi ca sātvatanāyakam

आपके द्वारा बलपूर्वक अर्पित यह अतुलनीय सुख पाकर भी, वे उसे छोड़कर एक क्षण भी असमर्थ हो जाते हैं। सात्वतों के उस नायक को मैं नमस्कार करती हूँ।

श्लोक 32 (skanda.2.204.32)

नद्य ऊचुः । वरद नमनमात्रं नामसंकीर्तनं वा विदधति तव ये वै ज्ञानतोऽज्ञानतो वा । जनिमृतियमभीतेस्तानपि त्रायमाणं नरसखमुपयाताः स्मोऽद्य नारायणं त्वाम्

nadya ūcuḥ varada namanamātraṁ nāmasaṁkīrtanaṁ vā vidadhati tava ye vai jñānato'jñānato vā janimṛtiyamabhītestānapi trāyamāṇaṁ narasakhamupayātāḥ smo'dya nārāyaṇaṁ tvām

नदियों ने कहा — हे वरद! जो लोग ज्ञानपूर्वक या अज्ञानवश ही आपको मात्र नमन करते हैं, अथवा आपके नाम का संकीर्तन करते हैं, उन्हें भी आप जन्म, मृत्यु तथा यम के भय से बचा लेते हैं; ऐसे नरसखा नारायण आपकी शरण में आज हम आई हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.204.33)

देवपत्न्य ऊचुः । भुवि धृताकृतेर्जन्म मङ्गलं चरितमद्भुतं लोकपावनम् । भवति निर्गुणं सर्वमेव ते भवसि निर्गुणब्रह्म यत्परम्

devapatnya ūcuḥ bhuvi dhṛtākṛterjanma maṅgalaṁ caritamadbhutaṁ lokapāvanam bhavati nirguṇaṁ sarvameva te bhavasi nirguṇabrahma yatparam

देव-पत्नियों ने कहा — पृथ्वी पर धारण किए गए रूप में आपका जन्म, आपका मंगलमय अद्भुत लोक-पावन चरित्र — यह सब वास्तव में निर्गुण ही है, क्योंकि आप स्वयं परम निर्गुण ब्रह्म हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.204.34)

तव समाश्रयात्तामसा जना अपि च राजसाः सात्त्विकाश्च ये । ननु भवन्ति ते निर्गुणास्ततो वयमुपास्महे त्वां हि निर्गुणम्

tava samāśrayāttāmasā janā api ca rājasāḥ sāttvikāśca ye nanu bhavanti te nirguṇāstato vayamupāsmahe tvāṁ hi nirguṇam

आपका आश्रय लेने से तामसिक, राजसिक तथा सात्त्विक — सभी लोग निर्गुण हो जाते हैं; इसलिए हम आप निर्गुण की ही उपासना करती हैं।

श्लोक 35 (skanda.2.204.35)

ऋषिपत्न्य ऊचुः । आर्तानामुरुवृजिनैस्त्रिधा च तापैः सर्वापत्प्रशमनमेकमेव विष्णोः । पादाब्जं तव भवतीति तद्वयं वै प्राप्ताः स्मः शरणमनन्त देवदेव

ṛṣipatnya ūcuḥ ārtānāmuruvṛjinaistridhā ca tāpaiḥ sarvāpatpraśamanamekameva viṣṇoḥ pādābjaṁ tava bhavatīti tadvayaṁ vai prāptāḥ smaḥ śaraṇamananta devadeva

ऋषि-पत्नियों ने कहा — हे विष्णु! महान पापों तथा त्रिविध तापों से पीड़ितों के लिए समस्त विपत्तियों की शान्ति का एकमात्र साधन आपका चरण-कमल है; इसीलिए हे अनन्त देवदेव! हम उसी की शरण में आई हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.204.36)

पृथिव्युवाच । पूर्णशारदसुधाकराननं शारदाब्जदलदीर्घलोचनम् । श्रीवियोगबहुधार्तिमोचनं वाऽसुदेवमहमेकमाश्रये

pṛthivyuvāca pūrṇaśāradasudhākarānanaṁ śāradābjadaladīrghalocanam śrīviyogabahudhārtimocanaṁ vā'sudevamahamekamāśraye

पृथ्वी ने कहा — जिनका मुख पूर्ण शरत्कालीन चन्द्रमा के समान है, जिनके नेत्र शरत्कालीन कमल-दल के समान दीर्घ हैं, जो श्री के वियोग से उत्पन्न नाना पीड़ाओं से मुक्त करने वाले हैं — मैं उन्हीं वासुदेव की, एकमात्र, शरण लेती हूँ।

श्लोक 37 (skanda.2.204.37)

सरस्वत्युवाच । नयने ममाच्युत तवातिसुन्दरे मुखशीतरोचिषि चकोरतां गते । न हि गच्छतोऽन्यत इतीयमेव मे हृदि मूर्तिरस्तु सततं नहीतरा

sarasvatyuvāca nayane mamācyuta tavātisundare mukhaśītarociṣi cakoratāṁ gate na hi gacchato'nyata itīyameva me hṛdi mūrtirastu satataṁ nahītarā

सरस्वती ने कहा — हे अच्युत! मेरे दोनों नेत्र आपके अत्यन्त सुन्दर, चन्द्रमा-जैसे शीतल कान्तिमय मुख पर चकोर के समान अनुरक्त हो गए हैं, और अब कहीं और नहीं जाते। यही रूप सदा मेरे हृदय में बना रहे, अन्य कोई नहीं।

श्लोक 38 (skanda.2.204.38)

स्कन्द उवाच । इति स्तुतोऽखिलैर्देवैः सोभिनन्द्य दृशैव तान् । प्राह श्रियं शुभे पश्य देवादींस्त्वमिमानिति

skanda uvāca iti stuto'khilairdevaiḥ sobhinandya dṛśaiva tān prāha śriyaṁ śubhe paśya devādīṁstvamimāniti

स्कन्द ने कहा — इस प्रकार समस्त देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर, उन्हें दृष्टि मात्र से अभिनन्दित कर, उन्होंने श्री से कहा — 'हे शुभे! इन देवताओं आदि को देखो।'

श्लोक 39 (skanda.2.204.39)

ततः समीक्षिताः प्रीत्या तया मधुरया दृशा । त्रिलोकीवासिनः सर्वे ऋद्धा आसन्यथा पुरा

tataḥ samīkṣitāḥ prītyā tayā madhurayā dṛśā trilokīvāsinaḥ sarve ṛddhā āsanyathā purā

फिर उनकी उस मधुर दृष्टि से प्रेमपूर्वक देखे जाने पर, त्रिलोकी के समस्त निवासी पूर्व की भाँति ही समृद्ध हो गए।

श्लोक 40 (skanda.2.204.40)

लेभिरे स्वस्वऋद्धिं ते गृहिणस्त्यागिनोपि च । धर्मादयश्च सानन्दं प्रचरन्ति स्म पूर्ववत्

lebhire svasvaṛddhiṁ te gṛhiṇastyāginopi ca dharmādayaśca sānandaṁ pracaranti sma pūrvavat

गृहस्थों तथा त्यागियों सबने अपनी-अपनी समृद्धि पुनः प्राप्त कर ली, और धर्म आदि पूर्व की भाँति ही आनन्दपूर्वक विचरण करने लगे।

श्लोक 41 (skanda.2.204.41)

तस्याः श्रियश्च भगवान्ददौ स्थानमुरः स्वकम् । तत्र स्थित्वैव सा व्यापत्त्रैलोक्यं संपदात्मना

tasyāḥ śriyaśca bhagavāndadau sthānamuraḥ svakam tatra sthitvaiva sā vyāpattrailokyaṁ saṁpadātmanā

भगवान ने उन श्री को अपना वक्षःस्थल ही निवास-स्थान के रूप में प्रदान किया; वहाँ स्थित रहते हुए ही वे समृद्धि के रूप में तीनों लोकों में व्याप्त हो गईं।

श्लोक 42 (skanda.2.204.42)

ततो रत्नाकरः स्वस्माच्छ्रीजनेरनुभावतः । बभूवान्वर्थसंज्ञो वै संपूर्णक्षयरत्नवान्

tato ratnākaraḥ svasmācchrījaneranubhāvataḥ babhūvānvarthasaṁjño vai saṁpūrṇakṣayaratnavān

फिर श्री के अपने से उत्पन्न होने के प्रभाव से समुद्र सचमुच अपने नाम 'रत्नाकर' के अनुरूप, अक्षय रत्नों से परिपूर्ण हो गया।

श्लोक 43 (skanda.2.204.43)

चतुर्विधैर्बहुरसैः सदन्नैरमृतोपमैः । सर्वान्समागतांस्तत्र तर्पयामास सादरम्

caturvidhairbahurasaiḥ sadannairamṛtopamaiḥ sarvānsamāgatāṁstatra tarpayāmāsa sādaram

उसने चार प्रकार के, बहु-रसयुक्त, अमृत-तुल्य उत्तम अन्नों से वहाँ आए हुए सभी को आदरपूर्वक तृप्त किया।

श्लोक 44 (skanda.2.204.44)

अनर्घ्याणि च वस्त्राणि रत्नभूषाः परिच्छदान् । देवादिभ्यो ददौ प्रीत्या सर्वेभ्योपि पृथक्पृथक्

anarghyāṇi ca vastrāṇi ratnabhūṣāḥ paricchadān devādibhyo dadau prītyā sarvebhyopi pṛthakpṛthak

उसने प्रेमपूर्वक अमूल्य वस्त्र, रत्नाभूषण तथा साज-सामान देवताओं आदि सभी को अलग-अलग प्रदान किए।

श्लोक 45 (skanda.2.204.45)

जामातुस्तुष्टये स्वस्य तदीयेभ्यस्तदाम्बुधेः । नासीत्किमप्यदेयं वै घनवद्धनवर्षिणः

jāmātustuṣṭaye svasya tadīyebhyastadāmbudheḥ nāsītkimapyadeyaṁ vai ghanavaddhanavarṣiṇaḥ

अपने जामाता की प्रसन्नता के लिए तथा उनसे संबंधित सबके लिए, मेघ के समान धन बरसाने वाले उस समुद्र के लिए कुछ भी अदेय न था।

श्लोक 46 (skanda.2.204.46)

भगवानपि तद्दत्तं यौतकं च धनं बहु । ब्राह्मणेभ्यः प्रदायैव श्रिया सह तिरोदधे

bhagavānapi taddattaṁ yautakaṁ ca dhanaṁ bahu brāhmaṇebhyaḥ pradāyaiva śriyā saha tirodadhe

भगवान भी उसके द्वारा दिए गए दहेज तथा प्रचुर धन को ब्राह्मणों को अर्पित कर, श्री के साथ अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 47 (skanda.2.204.47)

लक्ष्मीनारायणाभ्यां ते भृशमानन्दिताः सुराः । इन्द्रादयो दिवं जग्मुः स्वंस्वं धामाऽपरे ययुः

lakṣmīnārāyaṇābhyāṁ te bhṛśamānanditāḥ surāḥ indrādayo divaṁ jagmuḥ svaṁsvaṁ dhāmā'pare yayuḥ

लक्ष्मी-नारायण से अत्यन्त आनन्दित हुए इन्द्र आदि देवता स्वर्ग को गए, तथा अन्य देवता अपने-अपने धाम को चले गए।

श्लोक 48 (skanda.2.204.48)

अधिकारं च संप्राप्य यथापूर्वं निजंनिजम् । सर्वेपि सुखिनो जाताः प्रसादात्कमलापतेः

adhikāraṁ ca saṁprāpya yathāpūrvaṁ nijaṁnijam sarvepi sukhino jātāḥ prasādātkamalāpateḥ

कमलापति की कृपा से अपना-अपना अधिकार पूर्व की भाँति पुनः प्राप्त कर सभी सुखी हो गए।

श्लोक 49 (skanda.2.204.49)

मन्दरं च गिरिं तार्क्ष्यः पुनर्भगवदाज्ञया । स्वस्थानं समुपानीय स्थापयामास लीलया

mandaraṁ ca giriṁ tārkṣyaḥ punarbhagavadājñayā svasthānaṁ samupānīya sthāpayāmāsa līlayā

भगवान की आज्ञा से गरुड़ ने मन्दराचल को पुनः उसके स्थान पर लाकर, लीला मात्र से वहाँ स्थापित कर दिया।

श्लोक 50 (skanda.2.204.50)

एवमिन्द्रेण ब्रह्मर्षे नष्टा ब्राह्मणशापतः । उपलब्धा पुनः संपन्नारायणप्रसादतः

evamindreṇa brahmarṣe naṣṭā brāhmaṇaśāpataḥ upalabdhā punaḥ saṁpannārāyaṇaprasādataḥ

हे ब्रह्मर्षे! इस प्रकार ब्राह्मण के शाप से नष्ट हुई सम्पदा को इन्द्र ने नारायण की कृपा से पुनः प्राप्त कर लिया।

श्लोक 51 (skanda.2.204.51)

य एतां शृणुयात्पुण्यां कथां भगवतो मुने । कीर्तयेत्प्रयतो वापि संपदं प्राप्नुतो हि तौ

ya etāṁ śṛṇuyātpuṇyāṁ kathāṁ bhagavato mune kīrtayetprayato vāpi saṁpadaṁ prāpnuto hi tau

हे मुने! जो भगवान की इस पुण्य कथा को सुनता है, अथवा शुद्ध चित्त से इसका कीर्तन करता है, वे दोनों ही सम्पदा को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.204.52)

गृहिणां धनसिद्धिः स्यात्त्यागिनां च यथेप्सिता । भक्तिज्ञानविरागादेर्भवेत्सिद्धिरनेन वै

gṛhiṇāṁ dhanasiddhiḥ syāttyāgināṁ ca yathepsitā bhaktijñānavirāgāderbhavetsiddhiranena vai

गृहस्थों को धन की सिद्धि होती है, तथा त्यागियों को उनकी इच्छानुसार फल मिलता है; इससे भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि की भी सिद्धि होती है।

श्लोक 53 (skanda.2.204.53)

इति ते कथितं ब्रह्मन्यथेन्द्रः प्राप संपदम् । नारदोपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकेन चैतसा

iti te kathitaṁ brahmanyathendraḥ prāpa saṁpadam nāradopi yathā śvetaṁ dvīpaṁ sa gatavānṛṣiḥ tatte sarvaṁ pravakṣyāmi śṛṇuṣvaikena caitasā

हे ब्राह्मण! इस प्रकार मैंने तुम्हें बताया कि इन्द्र ने किस प्रकार सम्पदा प्राप्त की। अब ऋषि नारद जिस प्रकार श्वेतद्वीप गए, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो।

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