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वैष्णव खण्ड · अध्याय 205

गोलोक-वर्णन

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206

श्लोक 1 (skanda.2.205.1)

स्कन्द उवाच । मेरुशृंगं समारूढो नारदो दिव्यया दृशा । श्वेतद्वीपं च तत्रस्थान्पश्यन्मुक्तान्सहस्रशः

skanda uvāca meruśṛṁgaṁ samārūḍho nārado divyayā dṛśā śvetadvīpaṁ ca tatrasthānpaśyanmuktānsahasraśaḥ

स्कन्द ने कहा — मेरु के शिखर पर चढ़े हुए नारद ने दिव्य दृष्टि से श्वेतद्वीप को तथा वहाँ स्थित सहस्रों मुक्त पुरुषों को देखा।

श्लोक 2 (skanda.2.205.2)

वासुदेवे भगवति दृष्टिमाबध्य तत्क्षणम् । उत्पपात महायोगी सद्यः प्राप च धाम तत्

vāsudeve bhagavati dṛṣṭimābadhya tatkṣaṇam utpapāta mahāyogī sadyaḥ prāpa ca dhāma tat

उसी क्षण भगवान वासुदेव पर दृष्टि बाँधकर वह महायोगी आकाश में उड़ चला, और तत्काल उस धाम को प्राप्त हुआ।

श्लोक 3 (skanda.2.205.3)

प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं नारदो हृष्टमानसः । ददर्श भक्तांस्तानेव श्वेतांश्चन्द्रप्रभाञ्छुभान्

prāpya śvetaṁ mahādvīpaṁ nārado hṛṣṭamānasaḥ dadarśa bhaktāṁstāneva śvetāṁścandraprabhāñchubhān

उस महाद्वीप श्वेतद्वीप को पाकर, प्रसन्न मन नारद ने उन्हीं श्वेत, चन्द्रमा-सी कान्ति वाले शुभ भक्तों को देखा।

श्लोक 4 (skanda.2.205.4)

पूजयामास शिरसा मनसा तैश्च पूजितः । दिदृक्षुर्ब्रह्म परमं स च कृच्छ्रपरः स्थितः

pūjayāmāsa śirasā manasā taiśca pūjitaḥ didṛkṣurbrahma paramaṁ sa ca kṛcchraparaḥ sthitaḥ

उसने सिर झुकाकर तथा मन से उनकी पूजा की और उनके द्वारा भी पूजित हुआ; परब्रह्म को देखने की इच्छा से वह तपस्या में तत्पर होकर वहाँ ठहर गया।

श्लोक 5 (skanda.2.205.5)

भक्तमेकान्तिकं विष्णोर्बुद्ध्वा भागवतास्तु ते । तमूचुस्तुष्टमनसो जपन्तं द्वादशाक्षरम्

bhaktamekāntikaṁ viṣṇorbuddhvā bhāgavatāstu te tamūcustuṣṭamanaso japantaṁ dvādaśākṣaram

उसे विष्णु का एकान्तिक भक्त जानकर, द्वादशाक्षर मन्त्र जपते हुए उससे वे भागवतगण प्रसन्न मन से बोले।

श्लोक 6 (skanda.2.205.6)

श्वेतमुक्ता ऊचुः । मुनिवर्य भवान्भक्तः कृष्णस्याऽस्ति यतोऽत्र नः । दृष्टवान्देवदुर्दृश्यान्किमिच्छन्नथ तप्यति

śvetamuktā ūcuḥ munivarya bhavānbhaktaḥ kṛṣṇasyā'sti yato'tra naḥ dṛṣṭavāndevadurdṛśyānkimicchannatha tapyati

श्वेतद्वीप के मुक्तों ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! आप कृष्ण के भक्त हैं, इसीलिए यहाँ देवताओं के लिए भी दुर्लभ हम लोगों का दर्शन आपने पाया है; अब किस इच्छा से तप कर रहे हैं?

श्लोक 7 (skanda.2.205.7)

नारद उवाच । भगवन्तं परं ब्रह्म साक्षात्कृष्णमहं प्रभुम् । द्रष्टुमुत्कोऽस्मि भक्तेन्द्रास्तं दर्शयत तत्प्रियाः

nārada uvāca bhagavantaṁ paraṁ brahma sākṣātkṛṣṇamahaṁ prabhum draṣṭumutko'smi bhaktendrāstaṁ darśayata tatpriyāḥ

नारद ने कहा — हे भक्तश्रेष्ठो! मैं साक्षात् परब्रह्म प्रभु भगवान कृष्ण को देखने के लिए उत्सुक हूँ; उनके प्रिय तुम लोग मुझे उनका दर्शन कराओ।

श्लोक 8 (skanda.2.205.8)

स्कन्द उवाच । तदैकः श्वेतमुक्तस्तु कृष्णेन प्रेरितो हृदि । एहि ते दर्शये कृष्णमित्युक्त्वा पुरतोभवत्

skanda uvāca tadaikaḥ śvetamuktastu kṛṣṇena prerito hṛdi ehi te darśaye kṛṣṇamityuktvā puratobhavat

स्कन्द ने कहा — तब कृष्ण द्वारा हृदय में प्रेरित हुए एक श्वेतद्वीपवासी मुक्त पुरुष ने कहा — 'आओ, मैं तुम्हें कृष्ण का दर्शन कराता हूँ' — और वह आगे-आगे चलने लगा।

श्लोक 9 (skanda.2.205.9)

प्रहृष्टो नारदस्तेन साकमाकाशवर्त्मना । पश्यन्धामानि देवानां तत ऊर्द्ध्वं ययौ मुनिः

prahṛṣṭo nāradastena sākamākāśavartmanā paśyandhāmāni devānāṁ tata ūrddhvaṁ yayau muniḥ

अत्यन्त प्रसन्न हुए नारद उसके साथ आकाशमार्ग से, देवताओं के धामों को देखते हुए, वहाँ से और ऊपर की ओर चले।

श्लोक 10 (skanda.2.205.10)

सप्तर्षींश्च ध्रुवं दृष्ट्वाऽनासक्तः कुत्रचित्स च । महर्जनतपोलोकान्व्यतीयाय द्विजोत्तम

saptarṣīṁśca dhruvaṁ dṛṣṭvā'nāsaktaḥ kutracitsa ca maharjanatapolokānvyatīyāya dvijottama

हे द्विजोत्तम! सप्तर्षियों तथा ध्रुव को देखकर भी कहीं आसक्त न होते हुए, वे महर्लोक, जनलोक तथा तपोलोक को पार कर गए।

श्लोक 11 (skanda.2.205.11)

ब्रह्मलोकं ततो दृष्ट्वा श्वेतमुक्तानुगो मुनिः । कृष्णस्यैवेच्छयाऽध्वानं प्रापाष्टावरणेष्वपि

brahmalokaṁ tato dṛṣṭvā śvetamuktānugo muniḥ kṛṣṇasyaivecchayā'dhvānaṁ prāpāṣṭāvaraṇeṣvapi

फिर ब्रह्मलोक को देखकर, श्वेतद्वीप के उस मुक्त पुरुष का अनुसरण करते हुए मुनि नारद, कृष्ण की ही इच्छा से आठों आवरणों में भी मार्ग को प्राप्त हुए।

श्लोक 12 (skanda.2.205.12)

भूम्यप्तेजोनिलाकाशाहम्महत्प्रकृतीः क्रमात् । क्रान्त्वा दशोत्तरगुणाः प्राप गोलोकमद्भुतम्

bhūmyaptejonilākāśāhammahatprakṛtīḥ kramāt krāntvā daśottaraguṇāḥ prāpa golokamadbhutam

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, महत् तथा प्रकृति — इन क्रमशः दस-दस गुना बढ़ने वाले आवरणों को पार कर वे अद्भुत गोलोक को प्राप्त हुए।

श्लोक 13 (skanda.2.205.13)

धाम तेजोमयं तद्धि प्राप्यमेकान्तिकैर्हरेः । गच्छन्ददर्श विततामगाधां विरजां नदीम्

dhāma tejomayaṁ taddhi prāpyamekāntikairhareḥ gacchandadarśa vitatāmagādhāṁ virajāṁ nadīm

हरि के एकान्तिक भक्तों द्वारा ही प्राप्य वह तेजोमय धाम — उसकी ओर जाते हुए उन्होंने विस्तृत तथा अथाह विरजा नदी को देखा।

श्लोक 14 (skanda.2.205.14)

गोपीगोपगणस्नानधौतचन्दनसौरभाम् । पुण्डरीकैः कोकनदै रम्यामिन्दीवरैरपि

gopīgopagaṇasnānadhautacandanasaurabhām puṇḍarīkaiḥ kokanadai ramyāmindīvarairapi

वह नदी गोपी-गोपगणों के स्नान से धुले चन्दन की सुगन्ध से युक्त थी, तथा श्वेत, लाल और नील कमलों से रमणीय थी।

श्लोक 15 (skanda.2.205.15)

तस्यास्तटं मनोहारि स्फटिकाश्ममयं महत् । प्राप श्वेतहरिद्रक्तपीतसन्मणिराजितम्

tasyāstaṭaṁ manohāri sphaṭikāśmamayaṁ mahat prāpa śvetaharidraktapītasanmaṇirājitam

वे उसके स्फटिक-पाषाण से बने विशाल एवं मनोहर तट पर पहुँचे, जो श्वेत, पीत, रक्त तथा स्वर्ण-वर्ण की उत्तम मणियों से सुशोभित था।

श्लोक 16 (skanda.2.205.16)

कल्पवृक्षालिभिर्ज्जुष्टं प्रवालाङ्कुरशोभितम् । स्यमन्तकेन्द्रनीलादिमणीनां खनिमण्डितम्

kalpavṛkṣālibhirjjuṣṭaṁ pravālāṅkuraśobhitam syamantakendranīlādimaṇīnāṁ khanimaṇḍitam

वह कल्पवृक्षों की पंक्तियों से युक्त, प्रवाल के अंकुरों से सुशोभित, तथा स्यमन्तक, इन्द्रनील आदि मणियों की खानों से मण्डित था।

श्लोक 17 (skanda.2.205.17)

नानामणीन्द्रनिचितसोपानततिशोभनम् । कूजद्भिर्मधुरं जुष्टं हंसकारण्डवादिभिः

nānāmaṇīndranicitasopānatatiśobhanam kūjadbhirmadhuraṁ juṣṭaṁ haṁsakāraṇḍavādibhiḥ

वह नाना उत्तम मणियों से जड़ी सीढ़ियों की पंक्तियों से सुशोभित तथा हंस, कारण्डव आदि पक्षियों के मधुर कलरव से युक्त था।

श्लोक 18 (skanda.2.205.18)

वृन्दैः कामदुघानां च गजेन्द्राणां च वाजिनाम् । पिबद्भिर्न्निर्मलं तोयं राजितं स व्यतिक्रमत्

vṛndaiḥ kāmadughānāṁ ca gajendrāṇāṁ ca vājinām pibadbhirnnirmalaṁ toyaṁ rājitaṁ sa vyatikramat

वे उस तट को पार कर गए, जो कामधेनुओं, गजराजों तथा घोड़ों के झुंडों से सुशोभित था, जो उसका निर्मल जल पी रहे थे।

श्लोक 19 (skanda.2.205.19)

उत्तीर्याऽथ धुनी दिव्यां तत्क्षणादीश्वरेच्छया । तद्धामपरिखाभूतां शतशृङ्गागमाप सः

uttīryā'tha dhunī divyāṁ tatkṣaṇādīśvarecchayā taddhāmaparikhābhūtāṁ śataśṛṅgāgamāpa saḥ

फिर उस धाम की खाई-स्वरूप उस दिव्य नदी को पार कर, ईश्वर की इच्छा से उसी क्षण वे शतशृंग पर्वत को प्राप्त हुए।

श्लोक 20 (skanda.2.205.20)

हिरण्मयं दर्शनीयं कोटियोजनमुच्छ्रितम् । विस्तारे दशकोट्यस्तु योजनानां मनोहरम्

hiraṇmayaṁ darśanīyaṁ koṭiyojanamucchritam vistāre daśakoṭyastu yojanānāṁ manoharam

वह पर्वत स्वर्णमय, दर्शनीय, एक करोड़ योजन ऊँचा, तथा दस करोड़ योजन विस्तार में मनोहर था।

श्लोक 21 (skanda.2.205.21)

सहस्रशः कल्पवृक्षैः पारिजातादिभिर्द्रुमैः । मल्लिकायूथिकाभिश्च लवङ्गैलालतादिभिः

sahasraśaḥ kalpavṛkṣaiḥ pārijātādibhirdrumaiḥ mallikāyūthikābhiśca lavaṅgailālatādibhiḥ

वह सहस्रों कल्पवृक्षों, पारिजात आदि वृक्षों, मल्लिका तथा यूथिका के फूलों, तथा लौंग-इलायची आदि लताओं से युक्त था।

श्लोक 22 (skanda.2.205.22)

स्वर्णरम्भादिभिश्चान्यैः शोभमानं महीरुहैः । दिव्यैर्मृगगणैर्न्नागैः पक्षिभिश्च सुकूजितैः

svarṇarambhādibhiścānyaiḥ śobhamānaṁ mahīruhaiḥ divyairmṛgagaṇairnnāgaiḥ pakṣibhiśca sukūjitaiḥ

वह स्वर्ण-केले आदि अन्य वृक्षों से सुशोभित तथा दिव्य मृग-समूहों, गजों तथा मधुर कलरव करते पक्षियों से युक्त था।

श्लोक 23 (skanda.2.205.23)

दुर्गायितस्य तद्धाम्नस्तस्य रम्येषु सानुषु । मनोज्ञान्विततानैक्षद्भगवद्रासमण्डपान्

durgāyitasya taddhāmnastasya ramyeṣu sānuṣu manojñānvitatānaikṣadbhagavadrāsamaṇḍapān

उस दुर्गयुक्त धाम की सुन्दर चोटियों पर उन्होंने भगवान के मनोहर तथा विस्तृत रास-मण्डपों को देखा।

श्लोक 24 (skanda.2.205.24)

वृतानुद्यानततिभिः फुल्लपुष्पसुगन्धिभिः । कपाटै रत्ननिचितैश्चतुर्द्वारसुशोभनान्

vṛtānudyānatatibhiḥ phullapuṣpasugandhibhiḥ kapāṭai ratnanicitaiścaturdvārasuśobhanān

वे मण्डप खिले हुए पुष्पों से सुगन्धित उद्यानों की पंक्तियों से घिरे थे, तथा रत्न-जड़ित कपाटों वाले चार द्वारों से सुशोभित थे।

श्लोक 25 (skanda.2.205.25)

चित्रतोरणसंपन्नै रत्नस्तम्भैः सहस्रशः । जुष्टांश्च कदलीस्तम्भैर्मुक्तालम्बैर्वितानकैः

citratoraṇasaṁpannai ratnastambhaiḥ sahasraśaḥ juṣṭāṁśca kadalīstambhairmuktālambairvitānakaiḥ

वे चित्रित तोरणों से सुसज्जित, सहस्रों रत्न-स्तम्भों से तथा कदली-स्तम्भों एवं मोतियों से लटकते हुए वितानों से युक्त थे।

श्लोक 26 (skanda.2.205.26)

दूर्वालाजाक्षतफलैर्युक्तान्माङ्गलिकैरपि । चन्दनागुरुकस्तूरीकेशरोक्षित चत्वरान्

dūrvālājākṣataphalairyuktānmāṅgalikairapi candanāgurukastūrīkeśarokṣita catvarān

वे दूर्वा, लावा, अक्षत तथा फलों जैसी मंगल-सामग्री से युक्त थे, तथा उनके प्रांगण चन्दन, अगर, कस्तूरी और केसर से सिंचित थे।

श्लोक 27 (skanda.2.205.27)

सुश्राव्यवाद्यनिनदैर्हृद्यान्बहुविधैरपि । तेषु यूथानि गोपीनां कोटिशः स ददर्श ह

suśrāvyavādyaninadairhṛdyānbahuvidhairapi teṣu yūthāni gopīnāṁ koṭiśaḥ sa dadarśa ha

अनेक प्रकार के मधुर वाद्यों की ध्वनियों से मनोहर उन मण्डपों में उन्होंने करोड़ों गोपियों के समूह देखे।

श्लोक 28 (skanda.2.205.28)

अनर्घ्यवासोभूषाभिः सद्रत्नमणिकङ्कणैः । काञ्चीनूपुरकेयूरैः शोभितान्यङ्गुलीयकैः

anarghyavāsobhūṣābhiḥ sadratnamaṇikaṅkaṇaiḥ kāñcīnūpurakeyūraiḥ śobhitānyaṅgulīyakaiḥ

वे अमूल्य वस्त्रों और आभूषणों से, सुन्दर रत्न-मणि-कंगनों से, करधनी, नूपुर, केयूर तथा अँगूठियों से सुशोभित थीं।

श्लोक 29 (skanda.2.205.29)

तारुण्यरूपलावण्यैः स्वरैश्चाऽप्रतिमानि हि । राधालक्ष्मीसवर्णानि शृङ्गारिककराणि च

tāruṇyarūpalāvaṇyaiḥ svaraiścā'pratimāni hi rādhālakṣmīsavarṇāni śṛṅgārikakarāṇi ca

वे यौवन, रूप, लावण्य तथा स्वर में अद्वितीय थीं, राधा और लक्ष्मी के समान वर्ण वाली थीं, तथा उनके हाथ शृंगार-कार्यों में लगे थे।

श्लोक 30 (skanda.2.205.30)

भोगद्रव्यैर्बहुविधैर्मण्डपेषु युतेषु च । विलसन्ति च गायन्ति मनोज्ञाः कृष्णगीतिकाः

bhogadravyairbahuvidhairmaṇḍapeṣu yuteṣu ca vilasanti ca gāyanti manojñāḥ kṛṣṇagītikāḥ

अनेक भोग-सामग्रियों से युक्त उन मण्डपों में वे मनोहर गोपियाँ विलास करती तथा कृष्ण-सम्बन्धी मनोहर गीत गाती थीं।

श्लोक 31 (skanda.2.205.31)

उपत्यकासु तस्याद्रेरथ वृन्दावनाभिधम् । वनं महत्तदद्राक्षीत्सावर्णे नारदो मुनिः

upatyakāsu tasyādreratha vṛndāvanābhidham vanaṁ mahattadadrākṣītsāvarṇe nārado muniḥ

हे सावर्णे! फिर उस पर्वत की तराइयों में मुनि नारद ने वृन्दावन नामक उस विशाल वन को देखा।

श्लोक 32 (skanda.2.205.32)

कृष्णस्य राधिकायाश्च प्रियं तत्क्रीडनस्थलम् । कल्पद्रुमालिभी रम्यं सरोभिश्च सपङ्कजैः

kṛṣṇasya rādhikāyāśca priyaṁ tatkrīḍanasthalam kalpadrumālibhī ramyaṁ sarobhiśca sapaṅkajaiḥ

वह कृष्ण और राधिका का प्रिय क्रीड़ा-स्थल था, कल्पवृक्षों की पंक्तियों तथा कमल-युक्त सरोवरों से रमणीय था।

श्लोक 33 (skanda.2.205.33)

आम्रैराम्रातकैर्नीपैर्बदरीभिश्च दाडिमैः । खर्जूरीपूगनारंगैर्न्नालिकेरैश्च चन्दनैः

āmrairāmrātakairnīpairbadarībhiśca dāḍimaiḥ kharjūrīpūganāraṁgairnnālikeraiśca candanaiḥ

वह आम्र, आम्रातक, नीप, बेर तथा अनार के वृक्षों से; खजूर, सुपारी, संतरा, नारियल तथा चन्दन के वृक्षों से युक्त था।

श्लोक 34 (skanda.2.205.34)

जम्बूजम्बीरपनसैरक्षोदैः सुरदारुभिः । कदलीभिश्चम्पकैश्च द्राक्षाभिः स्वर्णकेतकैः

jambūjambīrapanasairakṣodaiḥ suradārubhiḥ kadalībhiścampakaiśca drākṣābhiḥ svarṇaketakaiḥ

वह जामुन, नीबू, कटहल, अक्षोद तथा देवदारु के वृक्षों से; केले, चम्पा, अंगूर तथा स्वर्ण-केतकी से युक्त था।

श्लोक 35 (skanda.2.205.35)

फलपुष्पभरानम्रैर्न्नानावृक्षैर्विराजितम् । मल्लिका माधवीकुन्दैर्ल्लवंगैर्यूथिकादिभिः

phalapuṣpabharānamrairnnānāvṛkṣairvirājitam mallikā mādhavīkundairllavaṁgairyūthikādibhiḥ

वह फल-फूलों के भार से झुके हुए नाना वृक्षों से सुशोभित था, तथा मल्लिका, माधवी, कुन्द, लौंग, यूथिका आदि से युक्त था।

श्लोक 36 (skanda.2.205.36)

मन्दशीतसुगन्धेन सेवितं मातरिश्वना । शतशृङ्गस्नुतैरार्द्रं निर्झरैश्च समन्ततः

mandaśītasugandhena sevitaṁ mātariśvanā śataśṛṅgasnutairārdraṁ nirjharaiśca samantataḥ

वह मन्द, शीतल तथा सुगन्धित वायु से सेवित था, तथा चारों ओर शतशृंग से बहते हुए झरनों से आर्द्र था।

श्लोक 37 (skanda.2.205.37)

सदा वसन्त शोभाढ्यं रत्नदीपालिमण्डितैः । शृङ्गारिकद्रव्ययुतैः कुञ्जैर्जुष्टमनेकशः

sadā vasanta śobhāḍhyaṁ ratnadīpālimaṇḍitaiḥ śṛṅgārikadravyayutaiḥ kuñjairjuṣṭamanekaśaḥ

वह सदा वसन्त की शोभा से समृद्ध था, तथा रत्न-दीपों की पंक्तियों से मण्डित एवं शृंगार-सामग्री से युक्त अनेक कुंजों से युक्त था।

श्लोक 38 (skanda.2.205.38)

गोपानां गोपिकानां च कृष्णसंकीर्त्तनैर्मुहुः । गोवत्स पक्षिनिनदैर्न्नानाभूषणनिस्वनैः । दधिमन्थनशब्दैश्च सर्वतो नादितं मुने

gopānāṁ gopikānāṁ ca kṛṣṇasaṁkīrttanairmuhuḥ govatsa pakṣininadairnnānābhūṣaṇanisvanaiḥ dadhimanthanaśabdaiśca sarvato nāditaṁ mune

हे मुने! वह गोप-गोपियों के बार-बार होते कृष्ण-संकीर्तन से, गौओं-बछड़ों तथा पक्षियों के स्वरों से, नाना आभूषणों की झंकार से, तथा दही मथने के शब्द से सब ओर गूँज रहा था।

श्लोक 39 (skanda.2.205.39)

फुल्लपुष्पफलानम्रनानाद्रुमसुशोभनैः । द्वात्रिंशतवनैरन्यैर्युक्तं पश्यमनोहरैः

phullapuṣpaphalānamranānādrumasuśobhanaiḥ dvātriṁśatavanairanyairyuktaṁ paśyamanoharaiḥ

वह बत्तीस अन्य मनोहर वनों से भी युक्त था, जो खिले हुए फूलों तथा फलों के भार से झुके हुए नाना वृक्षों से सुशोभित थे।

श्लोक 40 (skanda.2.205.40)

तद्वीक्ष्य हृष्टः स प्राप गोलोकपुरमुज्वलम् । वर्तुलं रत्नदुर्गं च राजमार्गोपशोभितम्

tadvīkṣya hṛṣṭaḥ sa prāpa golokapuramujvalam vartulaṁ ratnadurgaṁ ca rājamārgopaśobhitam

उसे देखकर प्रसन्न होकर वे गोलोक की उस देदीप्यमान, वर्तुलाकार, रत्न-दुर्ग से युक्त तथा राजमार्गों से सुशोभित नगरी को प्राप्त हुए।

श्लोक 41 (skanda.2.205.41)

राजितं कृष्णभक्तानां विमानैः कोटिभिस्तथा । रथै रत्नेन्द्रखचितैः किंकिणीजालशोभितैः

rājitaṁ kṛṣṇabhaktānāṁ vimānaiḥ koṭibhistathā rathai ratnendrakhacitaiḥ kiṁkiṇījālaśobhitaiḥ

वह कृष्ण-भक्तों के करोड़ों विमानों से, तथा उत्तम रत्नों से जड़े, घुँघरुओं के जाल से सुशोभित रथों से देदीप्यमान थी।

श्लोक 42 (skanda.2.205.42)

महामणीन्द्रनिकरै रत्नस्तम्भालिमण्डितैः । अद्भुतैः कोटिशः सौधैः पंक्तिसंस्थैर्मनोहरम्

mahāmaṇīndranikarai ratnastambhālimaṇḍitaiḥ adbhutaiḥ koṭiśaḥ saudhaiḥ paṁktisaṁsthairmanoharam

वह पंक्तिबद्ध, महामणियों के समूहों तथा रत्न-स्तम्भों की पंक्तियों से मण्डित, करोड़ों अद्भुत भवनों से मनोहर थी।

श्लोक 43 (skanda.2.205.43)

विलासमण्डपै रम्यै रत्नसारविनिर्मितः । रत्नेन्द्रदीपततिभिः शोभनं रत्नवेदिभिः

vilāsamaṇḍapai ramyai ratnasāravinirmitaḥ ratnendradīpatatibhiḥ śobhanaṁ ratnavedibhiḥ

वह उत्तम रत्नों से निर्मित, रमणीय विलास-मण्डपों से युक्त, तथा उत्तम रत्न-दीपों की पंक्तियों एवं रत्न-वेदियों से सुशोभित थी।

श्लोक 44 (skanda.2.205.44)

केसरागुरुकस्तूरीकुंकुमद्रवचर्चितम् । दधिदूर्वालाजपूगै रम्भाभिः शोभिताङ्गणम्

kesarāgurukastūrīkuṁkumadravacarcitam dadhidūrvālājapūgai rambhābhiḥ śobhitāṅgaṇam

उसके प्रांगण केसर, अगर, कस्तूरी तथा कुंकुम के द्रव से लेपित थे, और दही, दूर्वा, लावा, सुपारी तथा केले से सुशोभित थे।

श्लोक 45 (skanda.2.205.45)

वारिपूर्णैर्हेमघटैस्तोरणैः कृतमंगलम् । मणिकुट्टिमराजाध्वचलद्भूरिगजाश्वकम्

vāripūrṇairhemaghaṭaistoraṇaiḥ kṛtamaṁgalam maṇikuṭṭimarājādhvacaladbhūrigajāśvakam

वह जल से भरे स्वर्ण-कलशों तथा तोरणों से मंगलमय बनाई गई थी; उसके मणि-जड़ित राजमार्गों पर प्रचुर हाथी-घोड़े चल रहे थे।

श्लोक 46 (skanda.2.205.46)

श्रीकृष्णदर्शनायातैर्न्नैकब्रह्माण्डनायकैः । विरिञ्चिशंकराद्यैश्च बलिहस्तैः सुसंकुलम्

śrīkṛṣṇadarśanāyātairnnaikabrahmāṇḍanāyakaiḥ viriñciśaṁkarādyaiśca balihastaiḥ susaṁkulam

वह श्रीकृष्ण के दर्शन हेतु आए हुए अनेक ब्रह्माण्डों के अधिपतियों से, तथा हाथों में भेंट लिए ब्रह्मा-शंकर आदि से खचाखच भरी थी।

श्लोक 47 (skanda.2.205.47)

व्रजद्भिः कृष्णवीक्षाथ गोपगोपीकदम्बकैः । सुसंकुलमहामार्गं मुमोदालोक्य तन्मुनिः

vrajadbhiḥ kṛṣṇavīkṣātha gopagopīkadambakaiḥ susaṁkulamahāmārgaṁ mumodālokya tanmuniḥ

कृष्ण के दर्शन हेतु आते-जाते गोप-गोपियों के समूहों से खचाखच भरे उस महामार्ग को देखकर वे मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 48 (skanda.2.205.48)

कृष्णमन्दिरमापाऽथ सर्वाश्चर्यं मनोहरम् । नन्दादिवृषभान्वादिगोपसौधालिभिर्वृतम्

kṛṣṇamandiramāpā'tha sarvāścaryaṁ manoharam nandādivṛṣabhānvādigopasaudhālibhirvṛtam

फिर वे सम्पूर्ण रूप से आश्चर्यमय तथा मनोहर कृष्ण-मन्दिर को प्राप्त हुए, जो नन्द आदि वृषभानु-वंशी गोपों के भवनों की पंक्तियों से घिरा था।

श्लोक 49 (skanda.2.205.49)

चतुर्द्वारैः षोडशभिर्दुर्गैः सपरिखैर्युतम् । कोटिगोपवृतैकैकद्वारपालसुरक्षितैः

caturdvāraiḥ ṣoḍaśabhirdurgaiḥ saparikhairyutam koṭigopavṛtaikaikadvārapālasurakṣitaiḥ

वह चार द्वारों, सोलह खाई-युक्त दुर्गों से युक्त था, तथा प्रत्येक द्वार करोड़ों गोपों से घिरे द्वारपालों द्वारा सुरक्षित था।

श्लोक 50 (skanda.2.205.50)

रत्नस्तम्भकपाटेषु द्वार्षु स्वाग्रस्थितेषु सः । उपविष्टान्क्रमेणैव द्वारपालान्ददर्श ह

ratnastambhakapāṭeṣu dvārṣu svāgrasthiteṣu saḥ upaviṣṭānkrameṇaiva dvārapālāndadarśa ha

रत्न-स्तम्भों वाले कपाटों से युक्त, अपने-अपने स्थान पर स्थित उन द्वारों पर उन्होंने क्रमशः बैठे हुए द्वारपालों को देखा।

श्लोक 51 (skanda.2.205.51)

वीरभानुं चन्द्रभानुं सूर्यभानुं तृतीयकम् । वसुभानुं देवभानुं शक्रभानुं ततः परम्

vīrabhānuṁ candrabhānuṁ sūryabhānuṁ tṛtīyakam vasubhānuṁ devabhānuṁ śakrabhānuṁ tataḥ param

वीरभानु, चन्द्रभानु, तीसरे सूर्यभानु; वसुभानु, देवभानु, तथा उसके बाद शक्रभानु —

श्लोक 52 (skanda.2.205.52)

रत्नभानुं सुपार्श्वं च विशालमृषभं ततः । अंशुं बलं च सुबलं देवप्रस्थं वरूथपम्

ratnabhānuṁ supārśvaṁ ca viśālamṛṣabhaṁ tataḥ aṁśuṁ balaṁ ca subalaṁ devaprasthaṁ varūthapam

रत्नभानु, सुपार्श्व, फिर विशाल तथा ऋषभ; अंशु, बल तथा सुबल, देवप्रस्थ तथा वरूथप —

श्लोक 53 (skanda.2.205.53)

श्रीदामानं च नत्वाऽसौ प्रविष्टोंतस्तदाज्ञया । महाचतुष्के वितते तेजोऽपश्यन्महोच्चयम्

śrīdāmānaṁ ca natvā'sau praviṣṭoṁtastadājñayā mahācatuṣke vitate tejo'paśyanmahoccayam

और श्रीदामा को प्रणाम कर, उनकी आज्ञा से वे भीतर प्रविष्ट हुए; वहाँ विस्तृत महाप्रांगण में उन्होंने तेज का एक महान समूह देखा।

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