वैष्णव खण्ड · अध्याय 206
श्री वासुदेव दर्शन
श्लोक 1 (skanda.2.206.1)
स्कन्द उवाच । तत्त्वेककालसंभूतकोटिकोट्यर्कसन्निभम् । स व्यचष्ट महत्तेजो दिव्यं सिततरं मुने
skanda uvāca tattvekakālasaṁbhūtakoṭikoṭyarkasannibham sa vyacaṣṭa mahattejo divyaṁ sitataraṁ mune
स्कन्द ने कहा - हे मुने! उसने (नारद ने) एक ही काल में उत्पन्न हुए, करोड़ों-करोड़ों सूर्यों के समान उस महान, दिव्य, अत्यंत श्वेत तेज को देखा।
श्लोक 2 (skanda.2.206.2)
दिशश्च विदिशः सर्वा ऊर्द्ध्वाधो व्याप्नुवच्च यत्। अक्षरं ब्रह्म कथितं सच्चिदानन्दलक्षणम्
diśaśca vidiśaḥ sarvā ūrddhvādho vyāpnuvacca yat akṣaraṁ brahma kathitaṁ saccidānandalakṣaṇam
जो समस्त दिशाओं और विदिशाओं में तथा ऊपर-नीचे सर्वत्र व्याप्त था, वही सच्चिदानन्दस्वरूप अक्षर ब्रह्म कहा गया है।
श्लोक 3 (skanda.2.206.3)
प्रकृतिं पुरुषं चोभौ तत्कार्याण्यपि सर्वशः । व्याप्तं यद्योगसंसिद्धाः षट्चक्राणि निजान्तरे । व्यतीत्य मूर्ध्नि पश्यन्ति वासुदेवप्रसादतः
prakṛtiṁ puruṣaṁ cobhau tatkāryāṇyapi sarvaśaḥ vyāptaṁ yadyogasaṁsiddhāḥ ṣaṭcakrāṇi nijāntare vyatītya mūrdhni paśyanti vāsudevaprasādataḥ
जो प्रकृति और पुरुष तथा उन दोनों के समस्त कार्यों में सर्वत्र व्याप्त है, उसी को योगसिद्ध पुरुष अपने भीतर के छहों चक्रों को लांघकर, वासुदेव की कृपा से, मस्तक के ऊपर देखते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.206.4)
यद्भासा भासितः सूर्यो वह्निरिन्दुश्च तारकाः । भासयन्ति जगत्सर्वं स्वप्रकाशं तथामृतम्
yadbhāsā bhāsitaḥ sūryo vahnirinduśca tārakāḥ bhāsayanti jagatsarvaṁ svaprakāśaṁ tathāmṛtam
जिसकी प्रभा से प्रकाशित होकर सूर्य, अग्नि, चंद्रमा और तारागण स्वयं प्रकाशमान होकर इस समस्त जगत को प्रकाशित करते हैं, वह तेज ही अमृतस्वरूप है।
श्लोक 5 (skanda.2.206.5)
यद्ब्रह्मपुरमित्याहुर्भगवद्धाम सात्वताः । यस्यान्तिकेषु परितस्तिष्ठन्त्यर्चककोटयः
yadbrahmapuramityāhurbhagavaddhāma sātvatāḥ yasyāntikeṣu paritastiṣṭhantyarcakakoṭayaḥ
जिसे सात्वत लोग 'ब्रह्मपुर' अर्थात् भगवान का धाम कहते हैं, जिसके चारों ओर करोड़ों उपासक खड़े रहते हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.206.6)
ब्रह्मशंकर वृन्दानि ह्युपर्युपरि संभ्रमात् । पतन्ति बलिहस्तानि गोपगोपीव्रजाश्च यत्
brahmaśaṁkara vṛndāni hyuparyupari saṁbhramāt patanti balihastāni gopagopīvrajāśca yat
जहाँ ब्रह्मा और शंकर के समूह-के-समूह उत्सुकतावश एक के ऊपर एक गिर पड़ते हैं, हाथों में भेंट लिए हुए, तथा गोप-गोपियों के समूह भी वहाँ हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.206.7)
कृष्णस्यानुग्रहो यस्मिन्स तेजसि तमीक्षते । केवलं तेज एवान्ये पश्यन्ति न तु तं मुने
kṛṣṇasyānugraho yasminsa tejasi tamīkṣate kevalaṁ teja evānye paśyanti na tu taṁ mune
जिस पर कृष्ण की कृपा होती है, वही उस तेज में उन्हें देख पाता है; अन्य लोग केवल तेज को ही देखते हैं, हे मुने, उन्हें नहीं।
श्लोक 8 (skanda.2.206.8)
तस्मिन्ददर्शाद्भुतदिव्यमन्दिरं विचित्ररत्नेन्द्रमयं मनोज्ञम् । रत्नोज्ज्वलस्तम्भसहस्रकान्तं महासभा मण्डपदर्शनीयम्
tasmindadarśādbhutadivyamandiraṁ vicitraratnendramayaṁ manojñam ratnojjvalastambhasahasrakāntaṁ mahāsabhā maṇḍapadarśanīyam
वहाँ उसने एक अद्भुत दिव्य भवन देखा, जो विचित्र श्रेष्ठ रत्नों से बना, मनोहर, रत्नजटित सहस्रों स्तम्भों से सुशोभित तथा एक विशाल सभामण्डप के समान दर्शनीय था।
श्लोक 9 (skanda.2.206.9)
सौधालिभिर्भूरिभिरुज्ज्वलाभिः स्वोपासकानां परितो विराजितम् । विचित्रसूक्ष्माम्बररत्नभूषाविभूषितानां हि नृणां च योषिताम्
saudhālibhirbhūribhirujjvalābhiḥ svopāsakānāṁ parito virājitam vicitrasūkṣmāmbararatnabhūṣāvibhūṣitānāṁ hi nṛṇāṁ ca yoṣitām
जो चारों ओर अपने उपासकों के अनेक उज्ज्वल भवनों की पंक्तियों से सुशोभित था, तथा विचित्र सूक्ष्म वस्त्रों और रत्नाभूषणों से अलंकृत नर-नारियों से युक्त था।
श्लोक 10 (skanda.2.206.10)
सिंहासनं तत्र मणीन्द्रसारै रत्नेन्द्रसारैश्च विनिर्मितं सः । आश्चर्यकृन्प्रेक्षकमानसानां दिव्य मुनिः प्रैक्षत भूरिहर्षः
siṁhāsanaṁ tatra maṇīndrasārai ratnendrasāraiśca vinirmitaṁ saḥ āścaryakṛnprekṣakamānasānāṁ divya muniḥ praikṣata bhūriharṣaḥ
वहाँ उसने श्रेष्ठतम मणियों और रत्नों से निर्मित एक सिंहासन देखा, जो देखने वालों के मन को चकित कर देने वाला था; उस दिव्य मुनि ने अत्यंत हर्षित होकर उसे देखा।
श्लोक 11 (skanda.2.206.11)
तत्राऽथ कृष्णं भगवन्तमैक्षन्नारायणं निर्गुणमास्थितं सः । सर्वज्ञमीशं पुरुषोत्तमं च यं वासुदेवं च वदन्ति सात्वताः
tatrā'tha kṛṣṇaṁ bhagavantamaikṣannārāyaṇaṁ nirguṇamāsthitaṁ saḥ sarvajñamīśaṁ puruṣottamaṁ ca yaṁ vāsudevaṁ ca vadanti sātvatāḥ
वहाँ उसने भगवान कृष्ण को, निर्गुण नारायण के रूप में विराजमान, सर्वज्ञ ईश्वर, पुरुषोत्तम - जिन्हें सात्वत लोग वासुदेव कहते हैं - देखा।
श्लोक 12 (skanda.2.206.12)
यं केचिदाहुः परमात्मसंज्ञं केचित्परं ब्रह्म परात्परं च । ब्रह्मेति केचिद्भगवन्तमेके विष्णुं च भक्ताः परमेश्वरं च
yaṁ kecidāhuḥ paramātmasaṁjñaṁ kecitparaṁ brahma parātparaṁ ca brahmeti kecidbhagavantameke viṣṇuṁ ca bhaktāḥ parameśvaraṁ ca
जिन्हें कुछ लोग परमात्मा कहते हैं, कुछ परब्रह्म परात्पर कहते हैं; कुछ भगवान ब्रह्मा कहते हैं तो कुछ भक्त उन्हें विष्णु और परमेश्वर कहते हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.206.13)
कन्दर्पसाहस्रमनोहराङ्गं सदा किशोरं करुणानिधानम् । अतिप्रशांताकृतिदर्शनीयं क्षराक्षरेभ्यश्च परं स्वतन्त्रम्
kandarpasāhasramanoharāṅgaṁ sadā kiśoraṁ karuṇānidhānam atipraśāṁtākṛtidarśanīyaṁ kṣarākṣarebhyaśca paraṁ svatantram
जिनका अंग सहस्रों कामदेवों से भी अधिक मनोहर है, जो सदा किशोर रूप में रहते हैं, करुणा के भण्डार हैं, जिनकी अत्यंत शांत आकृति दर्शनीय है, तथा जो क्षर और अक्षर दोनों से परे स्वतंत्र हैं।
श्लोक 14 (skanda.2.206.14)
नैकाण्डसर्गस्थितिनाशलीलाविधायकापांगनिरीक्षणं च । अनेककोट्यण्डमहाधिराजं विश्वैकवन्द्यं नटवर्यवेषम्
naikāṇḍasargasthitināśalīlāvidhāyakāpāṁganirīkṣaṇaṁ ca anekakoṭyaṇḍamahādhirājaṁ viśvaikavandyaṁ naṭavaryaveṣam
जिनका कटाक्ष मात्र ही अनेक ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीला कर देता है; जो अनेक करोड़ों ब्रह्माण्डों के महाधिराज हैं, समस्त विश्व द्वारा वंदनीय हैं, तथा जो श्रेष्ठ नट के समान वेष धारण किये हुए थे।
श्लोक 15 (skanda.2.206.15)
अनर्घ्यदिव्योत्तमपीतवाससमनेकसद्रत्नविभूषणाढ्यम् । नवीनजीमूतसमानवर्णं कर्णोल्लसत्सन्मकराभकुण्डलम्
anarghyadivyottamapītavāsasamanekasadratnavibhūṣaṇāḍhyam navīnajīmūtasamānavarṇaṁ karṇollasatsanmakarābhakuṇḍalam
जो अमूल्य, दिव्य, उत्तम पीताम्बर धारण किये हुए तथा अनेक उत्तम रत्नाभूषणों से समृद्ध थे; जिनका वर्ण नवीन मेघ के समान था, तथा जिनके कानों में सुन्दर मकराकृति कुण्डल शोभायमान थे।
श्लोक 16 (skanda.2.206.16)
निजांगनिर्यत्सितभूरितेजश्चयावृतत्वात्सितवर्णमुक्तम् । सद्रत्नसारोज्ज्वलसत्किरीटं शरत्सरोजच्छदचारुनेत्रम्
nijāṁganiryatsitabhūritejaścayāvṛtatvātsitavarṇamuktam sadratnasārojjvalasatkirīṭaṁ śaratsarojacchadacārunetram
जो अपने ही अंगों से निकलने वाले प्रचुर श्वेत तेज-समूह से आवृत होने के कारण श्वेतवर्ण के प्रतीत होते थे; जिनका मुकुट उत्तम रत्नों से उज्ज्वल था, तथा जिनके सुन्दर नेत्र शरद्-ऋतु के कमलदलों के समान थे।
श्लोक 17 (skanda.2.206.17)
सुगन्धिसच्चन्दनचर्चितांगं श्रीवत्सलक्ष्माङ्कितहृत्कपाटम् । निनादयन्तं मधुरं च वेणुं कृत्वा मुखाग्रेम्बुजचारुदोर्भ्याम्
sugandhisaccandanacarcitāṁgaṁ śrīvatsalakṣmāṅkitahṛtkapāṭam ninādayantaṁ madhuraṁ ca veṇuṁ kṛtvā mukhāgrembujacārudorbhyām
जिनका शरीर सुगन्धित उत्तम चन्दन से लिप्त था, जिनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित था, तथा जो अपनी सुन्दर कमल जैसी भुजाओं से मुख के आगे बाँसुरी रखकर मधुर स्वर बजा रहे थे।
श्लोक 18 (skanda.2.206.18)
जयासुशीलाललितामुखानां वृन्दैः सखीनां सह राधया च । समर्च्यमानं रमया च भामा कलिन्दजा जाम्बवतीमुखानाम्
jayāsuśīlālalitāmukhānāṁ vṛndaiḥ sakhīnāṁ saha rādhayā ca samarcyamānaṁ ramayā ca bhāmā kalindajā jāmbavatīmukhānām
जिनकी पूजा जया, सुशीला, ललिता आदि सखियों के समूहों तथा राधा द्वारा की जा रही थी, और रमा (लक्ष्मी), सत्यभामा, कालिन्दजा तथा जाम्बवती आदि द्वारा भी।
श्लोक 19 (skanda.2.206.19)
धर्मेण वेदैरखिलैर्भगैश्च ज्ञानादिभिः संयतपाणियुग्मैः । निषेव्यमाणं च सुदर्शनाद्यैर्निजायुधैर्मूर्तिधरैरनेकैः
dharmeṇa vedairakhilairbhagaiśca jñānādibhiḥ saṁyatapāṇiyugmaiḥ niṣevyamāṇaṁ ca sudarśanādyairnijāyudhairmūrtidharairanekaiḥ
जो धर्म, समस्त वेदों, तथा ज्ञानादि दिव्य ऐश्वर्यों द्वारा - जो सब हाथ जोड़े हुए थे - सेवित थे, तथा सुदर्शन आदि अपने अनेक शस्त्रों द्वारा भी, जो मूर्तिमान रूप धारण किये हुए थे, सेवित थे।
श्लोक 20 (skanda.2.206.20)
मसारमाणिक्यसुवर्णवर्णैः सितैश्च कैश्चिन्निजपार्षदाग्र्यैः । उपासितं चक्रगदाब्जशङ्खलसद्भुजैर्नन्दसुनन्दमुख्यैः
masāramāṇikyasuvarṇavarṇaiḥ sitaiśca kaiścinnijapārṣadāgryaiḥ upāsitaṁ cakragadābjaśaṅkhalasadbhujairnandasunandamukhyaiḥ
जो अपने प्रमुख पार्षदों द्वारा सेवित थे, जिनके रंग मरकत, माणिक्य, स्वर्ण तथा कुछ श्वेत वर्ण के थे - जिनमें नन्द, सुनन्द आदि प्रमुख थे - जिनकी सुन्दर भुजाओं में चक्र, गदा, कमल और शंख शोभायमान थे।
श्लोक 21 (skanda.2.206.21)
श्रीदाममुख्यैरथ गोपवेषैर्भक्त्यावनम्रैर्द्विभुजैरनेकैः । उपास्यमानं गरुडेन चाग्रतो विभूतिभिश्चाष्टभिरानताभिः
śrīdāmamukhyairatha gopaveṣairbhaktyāvanamrairdvibhujairanekaiḥ upāsyamānaṁ garuḍena cāgrato vibhūtibhiścāṣṭabhirānatābhiḥ
तथा श्रीदाम आदि प्रमुख, गोपवेषधारी, भक्तिपूर्वक झुके हुए अनेक द्विभुज पार्षदों द्वारा भी सेवित थे, और आगे गरुड़ द्वारा तथा नत हुई आठों विभूतियों (सिद्धियों) द्वारा भी।
श्लोक 22 (skanda.2.206.22)
मूर्त्या च शान्त्या दयया च सेवितं पुष्ट्या च तुष्ट्या ह्यथ मेधया च । श्रद्धाक्रिया ह्युन्नतिभिश्च मैत्र्या तथा तितिक्षास्मृतिबुद्धिभिश्च
mūrtyā ca śāntyā dayayā ca sevitaṁ puṣṭyā ca tuṣṭyā hyatha medhayā ca śraddhākriyā hyunnatibhiśca maitryā tathā titikṣāsmṛtibuddhibhiśca
जो मूर्ति, शान्ति, दया, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, श्रद्धा, क्रिया, उन्नति, मैत्री, तथा तितिक्षा, स्मृति और बुद्धि - इन मूर्तिमती दिव्य शक्तियों द्वारा सेवित थे।
श्लोक 23 (skanda.2.206.23)
दृष्ट्वा तमत्यद्भुतदिव्यमूर्त्ति तद्रूपसौरभ्यहृताखिलेन्द्रियः । आनन्दवारिप्रतिरुद्धदृष्टिः प्रेम्णोर्द्ध्वरोमा सुखसंभृतोऽभूत्
dṛṣṭvā tamatyadbhutadivyamūrtti tadrūpasaurabhyahṛtākhilendriyaḥ ānandavāripratiruddhadṛṣṭiḥ premṇorddhvaromā sukhasaṁbhṛto'bhūt
उस अत्यंत अद्भुत दिव्य मूर्ति को देखकर, उस रूप की सुगन्ध से उसकी समस्त इन्द्रियाँ हर ली गईं; आनन्द के आँसुओं से उसकी दृष्टि अवरुद्ध हो गई, प्रेमवश उसके रोंगटे खड़े हो गये, और वह सुख से परिपूर्ण हो गया।
श्लोक 24 (skanda.2.206.24)
दण्डवत्तं नमस्कृत्य नारदः प्रेमविह्वलः । बद्धाञ्जलिपुटस्तस्थौ वीक्षमाणस्तदाननम्
daṇḍavattaṁ namaskṛtya nāradaḥ premavihvalaḥ baddhāñjalipuṭastasthau vīkṣamāṇastadānanam
नारद, प्रेम से विह्वल होकर, उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके, हाथ जोड़े हुए खड़े रहे और उनके मुखमण्डल को निहारते रहे।
श्लोक 25 (skanda.2.206.25)
तं मानयामास हरिः पृष्ट्वा स्वागतमादरात् । भक्तमेकान्तिकं स्वस्य स्वेनैव च दिदृक्षितम्
taṁ mānayāmāsa hariḥ pṛṣṭvā svāgatamādarāt bhaktamekāntikaṁ svasya svenaiva ca didṛkṣitam
हरि ने आदरपूर्वक कुशल-क्षेम पूछते हुए उनका सम्मान किया - अपने उस अनन्य भक्त का, जिसे स्वयं भगवान भी देखने के इच्छुक थे।
श्लोक 26 (skanda.2.206.26)
भगवद्वाक्यपीयूषास्वादप्राप्तात्मसंस्मृतिः । तद्दर्शनमहानन्दो भक्त्या तुष्टाव तं मुनिः
bhagavadvākyapīyūṣāsvādaprāptātmasaṁsmṛtiḥ taddarśanamahānando bhaktyā tuṣṭāva taṁ muniḥ
भगवान के वचनरूपी अमृत का आस्वादन करके अपनी सुधि पुनः प्राप्त कर, तथा उस दर्शन से महान आनन्दित होकर, उस मुनि ने भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की।
श्लोक 27 (skanda.2.206.27)
नारद उवाच । जय श्रीकृष्ण भगवन्नारायण जगत्प्रभो । वासुदेवाऽखिलावास सदैकान्तिकवल्लभ
nārada uvāca jaya śrīkṛṣṇa bhagavannārāyaṇa jagatprabho vāsudevā'khilāvāsa sadaikāntikavallabha
नारद ने कहा - हे श्रीकृष्ण, भगवन् नारायण, जगत्प्रभो! आपकी जय हो। हे वासुदेव, हे सबके आश्रयस्थान, हे अनन्य भक्तों के सदा प्रिय!
श्लोक 28 (skanda.2.206.28)
अप्याश्चर्यार्चनीयाङ्घ्रे राधिकाकमलादिभिः । त्वमेवात्यन्तिकं श्रेयोऽभीप्सतां परमा गतिः
apyāścaryārcanīyāṅghre rādhikākamalādibhiḥ tvamevātyantikaṁ śreyo'bhīpsatāṁ paramā gatiḥ
हे राधिका, कमला (लक्ष्मी) आदि द्वारा अद्भुत रूप से पूजित चरणों वाले! आप ही परम कल्याण की इच्छा रखने वालों की चरम गति हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.206.29)
नित्यानामात्मनां नित्य आत्मा चेतनचेतनः । क्षराक्षरेभ्यश्च परस्त्वं ब्रह्म परमं हरे
nityānāmātmanāṁ nitya ātmā cetanacetanaḥ kṣarākṣarebhyaśca parastvaṁ brahma paramaṁ hare
आप नित्य आत्माओं के भी नित्य आत्मा हैं, चेतन और अचेतन दोनों के चेतयिता हैं; हे हरे! आप क्षर और अक्षर दोनों से परे परम ब्रह्म हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.206.30)
यथा विशुद्धिः सिद्धिश्च भक्त्या परमया तव । तथा न स्यान्नृणामन्यैः साधनैस्तप आदिभिः
yathā viśuddhiḥ siddhiśca bhaktyā paramayā tava tathā na syānnṛṇāmanyaiḥ sādhanaistapa ādibhiḥ
आपकी परम भक्ति से मनुष्यों को जैसी शुद्धि और सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी तप आदि अन्य साधनों से नहीं होती।
श्लोक 31 (skanda.2.206.31)
त्वदङ्घ्रिदिव्यज्योत्स्नैका मुमुक्षूणां हृदि स्थितम् । महत्सन्तमसंहर्तुं सद्यः शक्तास्ति सत्पते
tvadaṅghridivyajyotsnaikā mumukṣūṇāṁ hṛdi sthitam mahatsantamasaṁhartuṁ sadyaḥ śaktāsti satpate
हे सत्पते! आपके चरणों की एकमात्र दिव्य चाँदनी ही, मुमुक्षुओं के हृदय में स्थित होकर, उस महान अन्धकार को तत्काल दूर करने में समर्थ है।
श्लोक 32 (skanda.2.206.32)
सर्वैर्वेदैस्त्वमेवेज्य उपास्यो ज्ञेय एव च । निरूपितोसि भगवन्सर्वकारणकारणम्
sarvairvedaistvamevejya upāsyo jñeya eva ca nirūpitosi bhagavansarvakāraṇakāraṇam
समस्त वेदों द्वारा आप ही इज्य (पूज्य), उपास्य और ज्ञेय निरूपित किए गए हैं; हे भगवन्! आप ही समस्त कारणों के कारण निरूपित हुए हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.206.33)
एकैकस्मिन्रोमकूपे यत्तवास्ति सितं महः । शान्तमानंदरूपं च तत्कोटीन्दुप्रभाधिकम्
ekaikasminromakūpe yattavāsti sitaṁ mahaḥ śāntamānaṁdarūpaṁ ca tatkoṭīnduprabhādhikam
आपके एक-एक रोमकूप में जो शान्त, आनन्दस्वरूप श्वेत तेज विद्यमान है, वह करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा से भी अधिक है।
श्लोक 34 (skanda.2.206.34)
अस्मिंस्त्वमक्षरे धाम्नि निर्गुणेऽमृतसञ्ज्ञके । महःपुञ्जे सदैवास्से निर्गुणः पुरुषोत्तमः
asmiṁstvamakṣare dhāmni nirguṇe'mṛtasañjñake mahaḥpuñje sadaivāsse nirguṇaḥ puruṣottamaḥ
इस अक्षर, निर्गुण, अमृत नामक धाम में, इस तेज:पुंज में, आप निर्गुण पुरुषोत्तम सदैव विराजमान रहते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.206.35)
ब्रह्माण्डभयदात्कालान्मायायाश्च महाभयात् । मुक्ता भक्ता भवन्त्येव त्वदीयोपासनाबलात्
brahmāṇḍabhayadātkālānmāyāyāśca mahābhayāt muktā bhaktā bhavantyeva tvadīyopāsanābalāt
ब्रह्माण्ड के लिए भयंकर काल से तथा महाभयंकर माया से, आपकी उपासना के बल से ही भक्त मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 36 (skanda.2.206.36)
तं त्वामहमुपेतोस्मि शरणं जगदीश्वरम् । सर्वात्मानं विभुं ब्रह्म महापुरुषमच्युतम्
taṁ tvāmahamupetosmi śaraṇaṁ jagadīśvaram sarvātmānaṁ vibhuṁ brahma mahāpuruṣamacyutam
हे जगदीश्वर! मैं आपकी ही शरण में आया हूँ - सर्वात्मा, सर्वव्यापी ब्रह्म, महापुरुष, अच्युत।
श्लोक 37 (skanda.2.206.37)
यथा त्वच्चरणाम्भोजे भक्तिर्मे निश्चला सदा । भवेत्तथैव देवेश कर्त्तुमर्हस्यनुग्रहम्
yathā tvaccaraṇāmbhoje bhaktirme niścalā sadā bhavettathaiva deveśa karttumarhasyanugraham
हे देवेश! आप कृपा कीजिए, जिससे आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति सदा अटल बनी रहे।
श्लोक 38 (skanda.2.206.38)
स्कन्द उवाच । इत्थं देवर्षिणा भक्त्या संस्तुतः परमेश्वरः । तमाहानन्दयन्वाचा सुधासंमितया मुनिम्
skanda uvāca itthaṁ devarṣiṇā bhaktyā saṁstutaḥ parameśvaraḥ tamāhānandayanvācā sudhāsaṁmitayā munim
स्कन्द ने कहा - इस प्रकार देवर्षि नारद द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति किये जाने पर, परमेश्वर ने अमृततुल्य वाणी से उस मुनि को आनन्दित करते हुए कहा।