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वैष्णव खण्ड · अध्याय 207

श्री वासुदेव अवतार आदि कथन

अध्याय 206अध्याय-सूचीअध्याय 208

श्लोक 1 (skanda.2.207.1)

श्रीभगवानुवाच । दर्शनं मम यज्जातं तव तत्तु महामुने । नित्यैकान्तिकभक्तत्वान्निर्दम्भत्वान्मदिच्छया

śrībhagavānuvāca darśanaṁ mama yajjātaṁ tava tattu mahāmune nityaikāntikabhaktatvānnirdambhatvānmadicchayā

श्रीभगवान ने कहा - हे महामुने! तुम्हें मेरा जो यह दर्शन प्राप्त हुआ है, वह तुम्हारी नित्य अनन्य भक्ति के कारण, निष्कपटता के कारण और मेरी अपनी इच्छा से हुआ है।

श्लोक 2 (skanda.2.207.2)

अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्वयि नित्यं च तद्द्वयम् । स्वधर्मोपशमौ चैव वैराग्यं चात्मवेदनम्

ahiṁsā brahmacaryaṁ ca tvayi nityaṁ ca taddvayam svadharmopaśamau caiva vairāgyaṁ cātmavedanam

अहिंसा और ब्रह्मचर्य - ये दोनों तुझमें सदैव नित्य विद्यमान हैं, साथ ही स्वधर्मपालन, उपशम (शान्ति), वैराग्य तथा आत्मज्ञान भी।

श्लोक 3 (skanda.2.207.3)

सत्सङ्गोऽष्टाङ्गयोगश्च सर्वथेन्द्रियनिग्रहः । मुन्यन्नवृत्तिश्च तपः सर्वव्यसनहीनता

satsaṅgo'ṣṭāṅgayogaśca sarvathendriyanigrahaḥ munyannavṛttiśca tapaḥ sarvavyasanahīnatā

सत्संग, अष्टांगयोग, सभी प्रकार से इन्द्रियों का निग्रह, मुनियों के समान मिताहार-वृत्ति, तप, तथा समस्त व्यसनों से रहित होना - ये सब तुझमें विद्यमान हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.207.4)

मदेकान्तिकभक्तिश्च महात्म्यज्ञानपूर्विका । वर्त्तते तेन मामत्र पश्यसि त्वं हि सुव्रत

madekāntikabhaktiśca mahātmyajñānapūrvikā varttate tena māmatra paśyasi tvaṁ hi suvrata

तथा मेरी महिमा के ज्ञानपूर्वक की गई अनन्य भक्ति भी तुझमें विद्यमान है; इसीलिए, हे सुव्रत, तू यहाँ मुझे देख पा रहा है।

श्लोक 5 (skanda.2.207.5)

ईदृग्लक्षणसंपन्ना ये स्युरन्येपि मानवाः । तेपि मामीदृशं विप्र पश्यन्त्येकान्तिकप्रियम्

īdṛglakṣaṇasaṁpannā ye syuranyepi mānavāḥ tepi māmīdṛśaṁ vipra paśyantyekāntikapriyam

हे विप्र! इन्हीं लक्षणों से युक्त जो अन्य मनुष्य भी हों, वे भी मुझ अनन्य-भक्त-प्रिय को इसी प्रकार देख पाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.2.207.6)

असावहमिह ब्रह्मन्नस्मिन्नक्षरधामनि । राधालक्ष्मीयुतो नित्यं वसामि स्वाश्रितैः सह

asāvahamiha brahmannasminnakṣaradhāmani rādhālakṣmīyuto nityaṁ vasāmi svāśritaiḥ saha

हे ब्रह्मन्! यहाँ इस अक्षरधाम में मैं स्वयं राधा और लक्ष्मी के सहित नित्य निवास करता हूँ, अपने शरणागतों के साथ।

श्लोक 7 (skanda.2.207.7)

वासुदेवस्वरूपोहं सर्वकर्मफलप्रदः । अन्तर्यामितया वर्त्ते स्वतन्त्रः सर्वदेहिनाम्

vāsudevasvarūpohaṁ sarvakarmaphalapradaḥ antaryāmitayā vartte svatantraḥ sarvadehinām

मैं वासुदेव-स्वरूप में समस्त कर्मों के फल का प्रदाता हूँ; स्वतंत्र रहते हुए मैं समस्त देहधारियों के अन्तर्यामी रूप में विद्यमान रहता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.2.207.8)

वैकुण्ठाख्यं महाधाम्नि लक्ष्म्या सह चतुर्भुजः । वसामि नन्दगरुडमुख्यैः साकं च पार्षदैः

vaikuṇṭhākhyaṁ mahādhāmni lakṣmyā saha caturbhujaḥ vasāmi nandagaruḍamukhyaiḥ sākaṁ ca pārṣadaiḥ

वैकुण्ठ नामक महाधाम में मैं चतुर्भुज रूप से लक्ष्मी के साथ, तथा नन्द, गरुड़ आदि प्रमुख पार्षदों के साथ निवास करता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.2.207.9)

धाम्नि तेजोमये दिव्ये श्वेतद्वीपेऽन्वहं भुवि । ददामि श्वेतमुक्तेभ्यः पञ्चकालं स्वदर्शनम्

dhāmni tejomaye divye śvetadvīpe'nvahaṁ bhuvi dadāmi śvetamuktebhyaḥ pañcakālaṁ svadarśanam

इस पृथ्वी पर स्थित श्वेतद्वीप नामक तेजोमय दिव्य धाम में, मैं प्रतिदिन पाँचों कालों में श्वेत मुक्त पुरुषों को अपना दर्शन देता हूँ।

श्लोक 10 (skanda.2.207.10)

कुर्वेऽनिरुद्धप्रद्युम्नसंकर्षणसमाह्वयैः । स्वरूपैर्नैककोट्यण्डसर्गस्थित्यप्ययानहम्

kurve'niruddhapradyumnasaṁkarṣaṇasamāhvayaiḥ svarūpairnaikakoṭyaṇḍasargasthityapyayānaham

मैं अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षण नामक अपने स्वरूपों द्वारा अनेक करोड़ों ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करता हूँ।

श्लोक 11 (skanda.2.207.11)

सर्गारम्भे मया ब्रह्मा सृष्टो नाभिसरोरुहात् । तपसाराधयामास स मां यज्ञैश्च नारद

sargārambhe mayā brahmā sṛṣṭo nābhisaroruhāt tapasārādhayāmāsa sa māṁ yajñaiśca nārada

सृष्टि के आरम्भ में मैंने अपनी नाभि-कमल से ब्रह्मा को उत्पन्न किया; हे नारद, उसने तप और यज्ञों द्वारा मेरी आराधना की।

श्लोक 12 (skanda.2.207.12)

ततस्तस्मै प्रसन्नोऽहं प्राददामीप्सितान्वरान् । ब्रह्मन्प्रास्यसि सामर्थ्यं प्रजानां त्वं विसर्जने

tatastasmai prasanno'haṁ prādadāmīpsitānvarān brahmanprāsyasi sāmarthyaṁ prajānāṁ tvaṁ visarjane

तब मैं उससे प्रसन्न होकर उसे उसके इच्छित वर प्रदान किये - 'हे ब्रह्मन्! तुझे प्रजाओं की सृष्टि करने का सामर्थ्य प्राप्त होगा।'

श्लोक 13 (skanda.2.207.13)

आज्ञायामेव ताः सर्वास्तव स्थास्यन्ति मद्वरात् । वेदाश्चापि स्फुरिष्यन्ति तव बुद्धौ सनातनाः

ājñāyāmeva tāḥ sarvāstava sthāsyanti madvarāt vedāścāpi sphuriṣyanti tava buddhau sanātanāḥ

मेरे वरदान से वे समस्त प्रजाएँ तेरी आज्ञा में ही रहेंगी; तथा सनातन वेद भी तेरी बुद्धि में स्वयं स्फुरित हो जाएँगे।

श्लोक 14 (skanda.2.207.14)

ज्ञानं च मत्स्वरूपस्य यथावत्ते भविष्यति । त्वया कृतां च मर्यादां नातिक्रंस्यति कश्चन

jñānaṁ ca matsvarūpasya yathāvatte bhaviṣyati tvayā kṛtāṁ ca maryādāṁ nātikraṁsyati kaścana

तथा मेरे स्वरूप का यथार्थ ज्ञान भी तुझे प्राप्त होगा; और तेरे द्वारा स्थापित मर्यादा का कोई भी अतिक्रमण नहीं करेगा।

श्लोक 15 (skanda.2.207.15)

सुरासुरगणानां च मुनीनां च महात्मनाम् । त्वमेव वरदो ब्रह्मन्वरेप्सूनां भविष्यसि

surāsuragaṇānāṁ ca munīnāṁ ca mahātmanām tvameva varado brahmanvarepsūnāṁ bhaviṣyasi

हे ब्रह्मन्! देवताओं, असुरों के समूहों तथा वर चाहने वाले महात्मा मुनियों के लिए तू ही वरदाता होगा।

श्लोक 16 (skanda.2.207.16)

असाध्ये यत्र कार्ये च मोहमेष्यसि तत्त्वहम्। प्रादुर्भूय करिष्यमि स्मृतमात्रस्त्वया विधे

asādhye yatra kārye ca mohameṣyasi tattvaham prādurbhūya kariṣyami smṛtamātrastvayā vidhe

हे विधे! जिस किसी असाध्य कार्य में तू मोहग्रस्त हो जाएगा, उस समय मैं तेरे द्वारा मात्र स्मरण किये जाने पर ही प्रकट होकर उसे कर दूँगा।

श्लोक 17 (skanda.2.207.17)

सृज्यमाने त्वया विश्वे नष्टां पृथ्वीं महार्णवे । आनयिष्यामि स्वं स्थानं वाराहं रूपमास्थितः । हिरण्याक्षं निहत्यैव दैतेयं बलगर्वितम्

sṛjyamāne tvayā viśve naṣṭāṁ pṛthvīṁ mahārṇave ānayiṣyāmi svaṁ sthānaṁ vārāhaṁ rūpamāsthitaḥ hiraṇyākṣaṁ nihatyaiva daiteyaṁ balagarvitam

जब तेरे द्वारा सृष्टि किये जाने के समय पृथ्वी महासागर में लुप्त हो जाएगी, तब मैं वराह रूप धारण कर, बल के अभिमान में चूर दैत्य हिरण्याक्ष का वध करके, उसे पुनः अपने स्थान पर ले आऊँगा।

श्लोक 18 (skanda.2.207.18)

दिनान्ते तव मत्स्योहं भूत्वा क्षोणीं तरीमिव । सहौषधिं धारयिष्ये मन्वादींश्च निशावधि

dinānte tava matsyohaṁ bhūtvā kṣoṇīṁ tarīmiva sahauṣadhiṁ dhārayiṣye manvādīṁśca niśāvadhi

तेरे दिन के अंत में मैं मत्स्य रूप धारण कर पृथ्वी को नौका के समान, औषधियों तथा मनु आदि के सहित, रात्रि के अंत तक धारण करूँगा।

श्लोक 19 (skanda.2.207.19)

सुधायै मथ्नतामब्धिं काश्यपानां निराश्रयम् । मन्थानं कूर्मरूपोहं धास्ये पृष्ठे च मन्दरम्

sudhāyai mathnatāmabdhiṁ kāśyapānāṁ nirāśrayam manthānaṁ kūrmarūpohaṁ dhāsye pṛṣṭhe ca mandaram

जब कश्यप-वंशज (देव-असुर) अमृत के लिए समुद्र का मंथन करेंगे और मंथन-दण्ड (मन्दराचल) निराश्रय हो जाएगा, तब मैं कूर्म रूप धारण कर उस मन्दर पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करूँगा।

श्लोक 20 (skanda.2.207.20)

नारसिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुं विधे । सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम्

nārasiṁhaṁ vapuḥ kṛtvā hiraṇyakaśipuṁ vidhe surakārye haniṣyāmi yajñaghnaṁ ditinandanam

हे विधे! नरसिंह रूप धारण कर, देवकार्य के लिए, मैं यज्ञविनाशक दितिपुत्र हिरण्यकशिपु का वध करूँगा।

श्लोक 21 (skanda.2.207.21)

विरोचनस्य बलवान्बलिः पुत्रो महासुरः । भविष्यति स शक्रं च स्वाराज्याच्च्यावयिष्यति

virocanasya balavānbaliḥ putro mahāsuraḥ bhaviṣyati sa śakraṁ ca svārājyāccyāvayiṣyati

विरोचन का बलवान पुत्र बलि नामक महान असुर उत्पन्न होगा; वह इन्द्र को उसके स्वराज्य से च्युत कर देगा।

श्लोक 22 (skanda.2.207.22)

त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ । अदित्यां द्वादशः पुत्रः संभविष्यामि कश्यपात्

trailokye'pahṛte tena vimukhe ca śacīpatau adityāṁ dvādaśaḥ putraḥ saṁbhaviṣyāmi kaśyapāt

जब वह त्रैलोक्य को हर लेगा और इन्द्र निराश हो जाएगा, तब मैं कश्यप से अदिति के गर्भ में उनके बारहवें पुत्र के रूप में उत्पन्न होऊँगा।

श्लोक 23 (skanda.2.207.23)

ततो राज्यं प्रदास्यामि देवेन्द्राय दिवः पुनः । देवताः स्थापयिष्यामि स्वेषु स्थानेष्वहं विधे । बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम्

tato rājyaṁ pradāsyāmi devendrāya divaḥ punaḥ devatāḥ sthāpayiṣyāmi sveṣu sthāneṣvahaṁ vidhe baliṁ caiva kariṣyāmi pātālatalavāsinam

तब मैं देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य पुनः प्रदान करूँगा; हे विधे! मैं देवताओं को उनके-उनके स्थानों में पुनःस्थापित करूँगा, तथा बलि को पाताल-तल का निवासी बना दूँगा।

श्लोक 24 (skanda.2.207.24)

कर्दमाद्देवहूत्यां च भूत्वाऽथ कपिलाभिधः । प्रवर्तयिष्ये कालेन नष्टं सांख्यं विरागयुक्

kardamāddevahūtyāṁ ca bhūtvā'tha kapilābhidhaḥ pravartayiṣye kālena naṣṭaṁ sāṁkhyaṁ virāgayuk

फिर कर्दम और देवहूति से कपिल नामक पुत्र होकर, मैं काल के प्रभाव से लुप्त हुए सांख्यशास्त्र को वैराग्य-सहित पुनः प्रवर्तित करूँगा।

श्लोक 25 (skanda.2.207.25)

दत्तो भूत्याऽनसूययामत्रेरान्विक्षिकीं ततः । प्रह्लादायोपदेक्ष्यामि विद्यां च यदवे विधे

datto bhūtyā'nasūyayāmatrerānvikṣikīṁ tataḥ prahlādāyopadekṣyāmi vidyāṁ ca yadave vidhe

हे विधे! फिर अत्रि और अनसूया से दत्त नामक पुत्र होकर, मैं प्रह्लाद को तथा एक यदुवंशी को आन्वीक्षिकी विद्या का उपदेश करूँगा।

श्लोक 26 (skanda.2.207.26)

मेरुदेव्यां सुतो नाभेर्भूत्वाहमृषभो भुवि । धर्मं पारमहंस्याख्यं वर्तयिष्ये सनातनम्

merudevyāṁ suto nābherbhūtvāhamṛṣabho bhuvi dharmaṁ pāramahaṁsyākhyaṁ vartayiṣye sanātanam

नाभि और मेरुदेवी के पुत्र ऋषभ के रूप में इस पृथ्वी पर होकर, मैं परमहंसाख्य सनातन धर्म का प्रवर्तन करूँगा।

श्लोक 27 (skanda.2.207.27)

त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्वहः । क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि भग्नसेतुकदध्वगम्

tretāyuge bhaviṣyāmi rāmo bhṛgukulodvahaḥ kṣatraṁ cotsādayiṣyāmi bhagnasetukadadhvagam

त्रेतायुग में मैं भृगुकुल में श्रेष्ठ राम (परशुराम) के रूप में होऊँगा, और मर्यादा को तोड़कर कुमार्गगामी बने क्षत्रियों का संहार करूँगा।

श्लोक 28 (skanda.2.207.28)

सन्धौ तु समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । कौशल्यायां भविष्यामि रामो दशरथादहम्

sandhau tu samanuprāpte tretāyā dvāparasya ca kauśalyāyāṁ bhaviṣyāmi rāmo daśarathādaham

फिर त्रेता और द्वापर के संधिकाल के आने पर, मैं दशरथ से कौशल्या में राम के रूप में उत्पन्न होऊँगा।

श्लोक 29 (skanda.2.207.29)

सीताभिधाना लक्ष्मीश्च भवित्री जनकात्मजा । उद्वहिष्यामि तामैशं भंक्त्वा धनुरहं महत्

sītābhidhānā lakṣmīśca bhavitrī janakātmajā udvahiṣyāmi tāmaiśaṁ bhaṁktvā dhanurahaṁ mahat

लक्ष्मी सीता नाम से जनक की पुत्री होंगी; मैं शिव के उस महान धनुष को तोड़कर उनका पाणिग्रहण करूँगा।

श्लोक 30 (skanda.2.207.30)

ततो रक्षःपतिं घोरं देवर्षिद्रोहकारिणम् । सीतापहारिणं संख्ये हनिष्यामि सहानुजम्

tato rakṣaḥpatiṁ ghoraṁ devarṣidrohakāriṇam sītāpahāriṇaṁ saṁkhye haniṣyāmi sahānujam

फिर मैं देवताओं और ऋषियों का द्रोह करने वाले, सीता का अपहरण करने वाले उस भयंकर राक्षसराज को उसके छोटे भाई सहित युद्ध में मार डालूँगा।

श्लोक 31 (skanda.2.207.31)

तस्य मे तु चरित्राणि वाल्मीक्याद्या महर्षयः । तदा गास्यन्ति बहुधा यच्छ्रुतेः स्यादघक्षयः

tasya me tu caritrāṇi vālmīkyādyā maharṣayaḥ tadā gāsyanti bahudhā yacchruteḥ syādaghakṣayaḥ

तब वाल्मीकि आदि महर्षि मेरे उन चरित्रों को अनेक प्रकार से गाएँगे, जिनके श्रवण मात्र से पापों का नाश हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.2.207.32)

द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । भूभारासुरनाशार्थं पातुं धर्मं च धार्मिकान् । वसुदेवाद्भविष्यामि देवक्यां मथुरापुरे

dvāparasya kaleścaiva sandhau paryavasānike bhūbhārāsuranāśārthaṁ pātuṁ dharmaṁ ca dhārmikān vasudevādbhaviṣyāmi devakyāṁ mathurāpure

द्वापर और कलियुग के अंतिम संधिकाल में, पृथ्वी पर भार-रूप असुरों के नाश तथा धर्म और धार्मिकों की रक्षा के लिए, मैं मथुरापुरी में वसुदेव से देवकी के गर्भ में उत्पन्न होऊँगा।

श्लोक 33 (skanda.2.207.33)

कृष्णोहं वासुदेवाख्यस्तथा संकर्षणो बलः । प्रद्युम्नश्चाऽनिरुद्धश्च भविष्यन्ति यदोः कुले

kṛṣṇohaṁ vāsudevākhyastathā saṁkarṣaṇo balaḥ pradyumnaścā'niruddhaśca bhaviṣyanti yadoḥ kule

मैं वासुदेव नाम से कृष्ण कहलाऊँगा, तथा संकर्षण बलराम के रूप में; प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी यदुवंश में उत्पन्न होंगे।

श्लोक 34 (skanda.2.207.34)

गोपस्य वृषभानोस्तु सुता राधा भविष्यति । वृन्दावने तया साकं विहरिष्यामि पद्मज

gopasya vṛṣabhānostu sutā rādhā bhaviṣyati vṛndāvane tayā sākaṁ vihariṣyāmi padmaja

हे पद्मज! गोप वृषभानु की पुत्री राधा होंगी; उनके साथ मैं वृन्दावन में विहार करूँगा।

श्लोक 35 (skanda.2.207.35)

लक्ष्मीश्च भीष्मकसुता रुक्मिण्याख्या भविष्यति । उद्वहिष्यामि राजन्यान्युद्धे निर्जित्य तामहम्

lakṣmīśca bhīṣmakasutā rukmiṇyākhyā bhaviṣyati udvahiṣyāmi rājanyānyuddhe nirjitya tāmaham

और लक्ष्मी भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी नाम से होंगी; मैं राजाओं को युद्ध में जीतकर उनका पाणिग्रहण करूँगा।

श्लोक 36 (skanda.2.207.36)

धर्मद्रुहोऽसुरान्हत्वा तदाविष्टांश्च भूपतीन् । धर्मं संस्थापयन्नेव करिष्ये निर्भरां भुवम्

dharmadruho'surānhatvā tadāviṣṭāṁśca bhūpatīn dharmaṁ saṁsthāpayanneva kariṣye nirbharāṁ bhuvam

धर्म के शत्रु असुरों तथा उनसे आविष्ट राजाओं का वध करके, तथा धर्म की सम्यक् स्थापना करते हुए, मैं पृथ्वी को भाररहित कर दूँगा।

श्लोक 37 (skanda.2.207.37)

येन केनापि भावेन यस्य कस्यापि मानसम् । मयि संयोक्ष्यते तंतं नेष्ये ब्रह्मगतिं पराम्

yena kenāpi bhāvena yasya kasyāpi mānasam mayi saṁyokṣyate taṁtaṁ neṣye brahmagatiṁ parām

जिस किसी का भी मन, किसी भी भाव से, मुझमें युक्त हो जाएगा, उस-उस को मैं परम ब्रह्मगति की प्राप्ति कराऊँगा।

श्लोक 38 (skanda.2.207.38)

धर्मं भुवि स्थापयित्वा कृत्वा यदुकुलक्षयम् । पश्यतां सर्वदेवानामन्तर्द्धास्ये भुवस्ततः

dharmaṁ bhuvi sthāpayitvā kṛtvā yadukulakṣayam paśyatāṁ sarvadevānāmantarddhāsye bhuvastataḥ

पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करके तथा यदुकुल का संहार करके, फिर मैं समस्त देवताओं के देखते-देखते पृथ्वी से अन्तर्धान हो जाऊँगा।

श्लोक 39 (skanda.2.207.39)

कृष्णस्य मम वीर्याणि कृष्णद्वैपायनादयः । गास्यन्ति बहुधा ब्रह्मन्सद्यः पापहराणि हि

kṛṣṇasya mama vīryāṇi kṛṣṇadvaipāyanādayaḥ gāsyanti bahudhā brahmansadyaḥ pāpaharāṇi hi

हे ब्रह्मन्! कृष्णद्वैपायन (व्यास) आदि मेरे कृष्णरूप के पराक्रमों को अनेक प्रकार से गाएँगे, जो तत्काल पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.207.40)

कृष्णद्वैपायनो भूत्वा पराशरमुनेः सुतः । शाखाविभागं वेदस्य करिष्यामि तरोरिव

kṛṣṇadvaipāyano bhūtvā parāśaramuneḥ sutaḥ śākhāvibhāgaṁ vedasya kariṣyāmi taroriva

पराशर मुनि के पुत्र कृष्णद्वैपायन (व्यास) के रूप में होकर, मैं वेद की वृक्ष के समान शाखाओं में विभाजन करूँगा।

श्लोक 41 (skanda.2.207.41)

वैदिकं विधिमाश्रित्य त्रिलोकीपरिपीडकान् । छलेन मोहयिष्यामि भूत्वा बुद्धोऽसुरानहम्

vaidikaṁ vidhimāśritya trilokīparipīḍakān chalena mohayiṣyāmi bhūtvā buddho'surānaham

वैदिक विधि का आश्रय लेकर, त्रिलोकी को पीड़ित करने वाले असुरों को मैं बुद्ध रूप धारण कर छलपूर्वक मोहित कर दूँगा।

श्लोक 42 (skanda.2.207.42)

मया कृष्णेन निहताः सार्जुनेन रणेषु ये । प्रवर्तयिष्यन्त्यसुरास्ते त्वधर्मं यदा क्षितौ

mayā kṛṣṇena nihatāḥ sārjunena raṇeṣu ye pravartayiṣyantyasurāste tvadharmaṁ yadā kṣitau

जब वे ही असुर, जिन्हें मैंने कृष्णरूप में अर्जुन के सहित युद्धों में मार डाला था, पुनः पृथ्वी पर अधर्म फैलाने लगेंगे...

श्लोक 43 (skanda.2.207.43)

धर्मदेवात्तदा भक्तादहं नारायणो मुनिः। जनिष्ये कोशले देशे भूमौ हि सामगो द्विजः

dharmadevāttadā bhaktādahaṁ nārāyaṇo muniḥ janiṣye kośale deśe bhūmau hi sāmago dvijaḥ

...तब मैं भक्त धर्मदेव से नारायण मुनि के रूप में, कोशल देश की भूमि पर, सामवेद के गायक ब्राह्मण के रूप में जन्म लूँगा।

श्लोक 44 (skanda.2.207.44)

मुनिशापान्नृतां प्राप्तानृषींस्तात तथोद्धवम्। ततोऽवितासुरेभ्योऽहं सद्धर्मं स्थापयन्नज

muniśāpānnṛtāṁ prāptānṛṣīṁstāta tathoddhavam tato'vitāsurebhyo'haṁ saddharmaṁ sthāpayannaja

हे तात! मुनि के शाप से मनुष्यत्व को प्राप्त हुए ऋषियों को तथा उद्धव को भी सहायता दूँगा; हे अज! तब मैं असुरों से उनकी रक्षा करते हुए सद्धर्म की स्थापना करूँगा।

श्लोक 45 (skanda.2.207.45)

जनान्म्लेच्छमयान्भूमौ कलेरन्ते महैनसः । कल्की भूत्वा हनिष्यामि विचरन्दिव्यवाजिना

janānmlecchamayānbhūmau kalerante mahainasaḥ kalkī bhūtvā haniṣyāmi vicarandivyavājinā

कलियुग के अंत में, पृथ्वी पर म्लेच्छतुल्य बने महापापी मनुष्यों को, कल्की रूप धारण कर, दिव्य अश्व पर विचरण करते हुए, मैं नष्ट करूँगा।

श्लोक 46 (skanda.2.207.46)

यदा यदा च वेदोक्तो धर्मो नाशिष्यतेऽसुरैः। प्रादुर्भावो भविष्यो मे तद्रक्षायै तदा तदा

yadā yadā ca vedokto dharmo nāśiṣyate'suraiḥ prādurbhāvo bhaviṣyo me tadrakṣāyai tadā tadā

जब-जब वेदोक्त धर्म असुरों द्वारा नष्ट किया जाने लगेगा, तब-तब उसकी रक्षा के लिए मेरा प्रादुर्भाव होगा।

श्लोक 47 (skanda.2.207.47)

तस्माच्चिन्तां विहायैव प्रजाः सृज यथा पुरा । एतान्दत्त्वा वरांस्तस्मा अहमन्तर्हितोऽभवम्

tasmāccintāṁ vihāyaiva prajāḥ sṛja yathā purā etāndattvā varāṁstasmā ahamantarhito'bhavam

अतः तू चिन्ता त्यागकर पूर्ववत् प्रजाओं की सृष्टि कर। ऐसा कहकर उसे ये वर देकर मैं अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 48 (skanda.2.207.48)

यथा तस्मै वरा दत्तास्तथैव च मया कृतम् । कुर्वे करिष्ये च मुने निजशक्तिभिरञ्जसा

yathā tasmai varā dattāstathaiva ca mayā kṛtam kurve kariṣye ca mune nijaśaktibhirañjasā

जैसे उसे वे वर दिये गये थे, वैसा ही मैंने किया है; हे मुने! अपनी शक्तियों से मैं सहज ही करता हूँ और करता रहूँगा।

श्लोक 49 (skanda.2.207.49)

एवंविधस्य मे ब्रह्मन्नीशितुः सर्वदेहिनाम् । दर्शनं दुर्लभं जातं तवैकान्तिकभक्तितः

evaṁvidhasya me brahmannīśituḥ sarvadehinām darśanaṁ durlabhaṁ jātaṁ tavaikāntikabhaktitaḥ

हे ब्रह्मन्! समस्त देहधारियों के ऐसे स्वामी मुझ जैसे का दर्शन अत्यंत दुर्लभ है, फिर भी तेरी अनन्य भक्ति के कारण यह तुझे प्राप्त हुआ है।

श्लोक 50 (skanda.2.207.50)

वरं वरय मत्तस्त्वं स्वाभीष्टं मुनिसत्तम । प्रसन्नोस्मि भृशं तुभ्यं नाफलं मम दर्शनम्

varaṁ varaya mattastvaṁ svābhīṣṭaṁ munisattama prasannosmi bhṛśaṁ tubhyaṁ nāphalaṁ mama darśanam

हे मुनिसत्तम! तू मुझसे अपनी इच्छानुसार वर माँग ले; मैं तुझसे अत्यंत प्रसन्न हूँ - मेरा दर्शन निष्फल नहीं होगा।

श्लोक 51 (skanda.2.207.51)

स्कन्द उवाच । श्रुत्वेति भगवद्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः । मन्यमानो निजं धन्यं तमुवाच प्रभुं मुने

skanda uvāca śrutveti bhagavadvākyaṁ nārado munisattamaḥ manyamāno nijaṁ dhanyaṁ tamuvāca prabhuṁ mune

स्कन्द ने कहा - हे मुने! भगवान के इन वचनों को सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद अपने आपको धन्य मानते हुए उस प्रभु से बोले।

श्लोक 52 (skanda.2.207.52)

दर्शनादेव ते स्वामिन्संपूर्णो मे मनोरथः । इदं हि दुर्लभं मन्ये सर्वेषामपि देहिनाम्

darśanādeva te svāminsaṁpūrṇo me manorathaḥ idaṁ hi durlabhaṁ manye sarveṣāmapi dehinām

हे स्वामिन्! आपके दर्शन मात्र से ही मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया है; मैं इसे समस्त देहधारियों के लिए भी दुर्लभ मानता हूँ।

श्लोक 53 (skanda.2.207.53)

अतस्ते च त्वदीयानां त्वद्धाम्नोस्याऽमृतस्य च । साक्षात्समीक्षणादन्यत्प्राप्यं मे नास्ति वांछितम्

ataste ca tvadīyānāṁ tvaddhāmnosyā'mṛtasya ca sākṣātsamīkṣaṇādanyatprāpyaṁ me nāsti vāṁchitam

अतः आपके, आपके भक्तों के, आपके इस धाम के तथा इस अमृतस्वरूप के साक्षात् दर्शन के अतिरिक्त, मुझे कोई अन्य प्राप्तव्य वस्तु अभीष्ट नहीं है।

श्लोक 54 (skanda.2.207.54)

इतोन्यद्दुर्लभं क्वापि नास्ति ब्रह्माण्डगोलके । यदहं परितुष्टात्ते प्रार्थयेयमिहाच्युत

itonyaddurlabhaṁ kvāpi nāsti brahmāṇḍagolake yadahaṁ parituṣṭātte prārthayeyamihācyuta

हे अच्युत! इस ब्रह्माण्डगोलक में इससे बढ़कर दुर्लभ अन्य कुछ भी नहीं है, जिसे मैं आपसे संतुष्ट होकर यहाँ माँगूँ।

श्लोक 55 (skanda.2.207.55)

लोकान्तरसुखं यत्तद्वैदिकैरेव कर्मभिः । दैवैः पित्र्यैश्च लभ्येत तच्चाप्यस्ति हि नश्वरम्

lokāntarasukhaṁ yattadvaidikaireva karmabhiḥ daivaiḥ pitryaiśca labhyeta taccāpyasti hi naśvaram

जो अन्य लोकों का सुख वैदिक कर्मों द्वारा, देवयज्ञों तथा पितृयज्ञों द्वारा प्राप्त होता है, वह भी नश्वर ही है।

श्लोक 56 (skanda.2.207.56)

नेच्छामि तदहं किञ्चित्सुखं त्वत्तः परं प्रभो । वरमेकं तु याचे त्वत्स्वेप्सितं वरदर्षभात्

necchāmi tadahaṁ kiñcitsukhaṁ tvattaḥ paraṁ prabho varamekaṁ tu yāce tvatsvepsitaṁ varadarṣabhāt

हे प्रभो! इसलिए मैं आपसे परे कोई सुख नहीं चाहता; किन्तु हे वरदाताओं में श्रेष्ठ! मैं आपसे अपनी इच्छानुसार एक ही वर माँगता हूँ।

श्लोक 57 (skanda.2.207.57)

तवाऽथ तव भक्तानां सदैव गुणगायने । अत्युत्सुकास्तु मे बुद्धिस्त्वयि प्रीतिविवर्द्धिनी

tavā'tha tava bhaktānāṁ sadaiva guṇagāyane atyutsukāstu me buddhistvayi prītivivarddhinī

आपके तथा आपके भक्तों के गुणगान में सदैव अत्यंत उत्सुक रहने वाली मेरी बुद्धि, आपके प्रति प्रेम बढ़ाने वाली बने।

श्लोक 58 (skanda.2.207.58)

स्कन्द उवाच । तथास्त्विति प्रतिश्रुत्य कृष्णस्तेनेति याचितम् । गानोपयुक्तां महतीं वीणां दत्त्वाऽब्रवीत्पुनः

skanda uvāca tathāstviti pratiśrutya kṛṣṇasteneti yācitam gānopayuktāṁ mahatīṁ vīṇāṁ dattvā'bravītpunaḥ

स्कन्द ने कहा - कृष्ण ने उसकी उस याचना पर 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति देते हुए, गान के लिए उपयुक्त महती वीणा प्रदान की और पुनः कहा।

श्लोक 59 (skanda.2.207.59)

श्रीभगवानुवाच । अधुना गच्छ देवर्षे विशालां बदरीमितः । तत्र धर्मात्मजं भक्त्या मामाराधय सुव्रत

śrībhagavānuvāca adhunā gaccha devarṣe viśālāṁ badarīmitaḥ tatra dharmātmajaṁ bhaktyā māmārādhaya suvrata

श्रीभगवान ने कहा - हे देवर्षे! अब यहाँ से विशाल बदरी को जाओ; हे सुव्रत! वहाँ धर्मपुत्र रूप में मुझे भक्तिपूर्वक आराधना करो।

श्लोक 60 (skanda.2.207.60)

त्वं ह्येकान्तिकभक्तोसि मम निष्कपटान्तरः । तेन त्वामधिकं मन्ये विधेरपि पितुस्तव

tvaṁ hyekāntikabhaktosi mama niṣkapaṭāntaraḥ tena tvāmadhikaṁ manye vidherapi pitustava

तुम मेरे अनन्य भक्त हो, तुम्हारा हृदय निष्कपट है; इसीलिए मैं तुम्हें अपने पिता विधि (ब्रह्मा) से भी बढ़कर मानता हूँ।

श्लोक 61 (skanda.2.207.61)

यादृशोऽहं च यद्रूपो यावांश्च महिमा मम । विदुस्तत्सर्वमपि मे भक्ता एकान्तिका मुने

yādṛśo'haṁ ca yadrūpo yāvāṁśca mahimā mama vidustatsarvamapi me bhaktā ekāntikā mune

हे मुने! मैं जैसा हूँ, जिस रूप वाला हूँ तथा मेरी महिमा जितनी है - यह सब मेरे अनन्य भक्त ही जानते हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.207.62)

हृदि चिन्त्योहमेवास्मि सतां तेषां च ते मम । तेषामिष्टं न मत्तोऽन्यन्मम तेभ्यो न किञ्चन

hṛdi cintyohamevāsmi satāṁ teṣāṁ ca te mama teṣāmiṣṭaṁ na matto'nyanmama tebhyo na kiñcana

मैं ही उन सत्पुरुषों के हृदय में ध्यान करने योग्य हूँ, और वे मेरे हैं; उन्हें मुझसे अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है, और मुझे भी उनसे भिन्न कुछ नहीं है।

श्लोक 63 (skanda.2.207.63)

यथा पतिव्रता नार्यो वशीकुर्वन्ति सत्पतिम् । निजैर्गुणैस्तथा भक्ता वशीकुर्वन्ति मामपि

yathā pativratā nāryo vaśīkurvanti satpatim nijairguṇaistathā bhaktā vaśīkurvanti māmapi

जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने सद्गुणों से अपने पति को वश में कर लेती हैं, वैसे ही भक्त भी अपने गुणों से मुझे भी वश में कर लेते हैं।

श्लोक 64 (skanda.2.207.64)

अनुयामि श्रिया साकं तानहं परवानिव । यत्रयत्र च ते सन्ति तत्रतत्राहमस्मि हि

anuyāmi śriyā sākaṁ tānahaṁ paravāniva yatrayatra ca te santi tatratatrāhamasmi hi

मैं लक्ष्मी के सहित उनके पीछे-पीछे मानो पराधीन के समान चलता हूँ; वे जहाँ-जहाँ होते हैं, वहाँ-वहाँ मैं भी अवश्य होता हूँ।

श्लोक 65 (skanda.2.207.65)

सत्संगादेव मत्प्राप्तिर्भवेद्भुवि मुमुक्षताम् । नान्योपायेन देवर्षे सत्यमित्यवधारय

satsaṁgādeva matprāptirbhavedbhuvi mumukṣatām nānyopāyena devarṣe satyamityavadhāraya

हे देवर्षे! यह सत्य जान लो कि पृथ्वी पर मुमुक्षुओं को मेरी प्राप्ति सत्संग से ही होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं।

श्लोक 66 (skanda.2.207.66)

मामेव यर्हि शरणं मानुषाः प्राप्नुवन्ति ये । तर्ह्येव ते विमुच्यन्ते मायाया जीवबन्धनात्

māmeva yarhi śaraṇaṁ mānuṣāḥ prāpnuvanti ye tarhyeva te vimucyante māyāyā jīvabandhanāt

जो मनुष्य जब भी मेरी ही शरण में आते हैं, तभी वे माया के जीवबन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 67 (skanda.2.207.67)

मां प्रपन्नस्तु पुरुषो येन केनापि भावतः । यथेष्टं सुखमाप्नोति न तु संसृतिमन्यवत्

māṁ prapannastu puruṣo yena kenāpi bhāvataḥ yatheṣṭaṁ sukhamāpnoti na tu saṁsṛtimanyavat

परन्तु जो पुरुष किसी भी भाव से मेरी शरण ग्रहण कर लेता है, वह अपनी इच्छानुसार सुख प्राप्त करता है, अन्य लोगों की भाँति संसृति को नहीं।

श्लोक 68 (skanda.2.207.68)

स्कन्द उवाच । एवमुक्तो भगवता प्राप्तोऽनुग्रहमीप्सितम् । प्रणम्य साश्रुनयनः पर्यावर्तत नारदः

skanda uvāca evamukto bhagavatā prāpto'nugrahamīpsitam praṇamya sāśrunayanaḥ paryāvartata nāradaḥ

स्कन्द ने कहा - भगवान द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर तथा अभीष्ट अनुग्रह प्राप्त कर, नारद अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रणाम करके लौट पड़े।

श्लोक 69 (skanda.2.207.69)

तमेव वीणया गायञ्छ्वेतमुक्तमपश्यत । प्राग्वत्स्वाग्रे चलन्तं तमन्वगच्छद् द्विजर्षभ

tameva vīṇayā gāyañchvetamuktamapaśyata prāgvatsvāgre calantaṁ tamanvagacchad dvijarṣabha

उन्हीं का गुणगान वीणा द्वारा करते हुए, उसने पूर्ववत् उस श्वेत मुक्त पुरुष को अपने आगे चलते देखा; हे द्विजश्रेष्ठ! वह उसके पीछे-पीछे चला।

श्लोक 70 (skanda.2.207.70)

सद्यः श्वेतं महाद्वीपं प्राप्य श्वेतान्प्रणम्य तान् । निवृत्तो नारदो ब्रह्मंस्तरसा मेरुमागमत्

sadyaḥ śvetaṁ mahādvīpaṁ prāpya śvetānpraṇamya tān nivṛtto nārado brahmaṁstarasā merumāgamat

तुरन्त श्वेतद्वीप महाद्वीप पहुँचकर तथा उन श्वेत पुरुषों को प्रणाम करके, हे ब्रह्मन्! नारद वहाँ से लौटकर वेगपूर्वक मेरु पर्वत पर आये।

श्लोक 71 (skanda.2.207.71)

ततो मेरोः प्रचक्राम पर्वतं गन्धमादनम् । निपपात च खात्तूर्णं विशालां बदरीमनु

tato meroḥ pracakrāma parvataṁ gandhamādanam nipapāta ca khāttūrṇaṁ viśālāṁ badarīmanu

फिर मेरु से वे गन्धमादन पर्वत की ओर गये, और वहाँ से आकाश से शीघ्र ही विशाला बदरी में उतर आये।

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