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वैष्णव खण्ड · अध्याय 208

नारद-नरनारायण समागम

अध्याय 207अध्याय-सूचीअध्याय 209

श्लोक 1 (skanda.2.208.1)

स्कन्द उवाच । ततः स ददृशे देवौ पुराणावृषिसत्तमौ । तपश्चरन्तौ सुमहदात्मनिष्ठौ महाव्रतौ

skanda uvāca tataḥ sa dadṛśe devau purāṇāvṛṣisattamau tapaścarantau sumahadātmaniṣṭhau mahāvratau

स्कन्द ने कहा - तब उसने पुराण के उन दो श्रेष्ठ ऋषियों को देखा, जो तप करते हुए महान आत्मनिष्ठा में स्थित तथा महाव्रती थे।

श्लोक 2 (skanda.2.208.2)

तेजसाप्यधिकौ सूर्यात्सर्वलोकविरोचनात् । श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ

tejasāpyadhikau sūryātsarvalokavirocanāt śrīvatsalakṣaṇau pūjyau jaṭāmaṇḍaladhāriṇau

वे सर्वलोकप्रकाशक सूर्य से भी अधिक तेजस्वी थे; श्रीवत्स के चिह्न से युक्त, पूज्य, तथा जटाओं के मण्डल को धारण किये हुए थे।

श्लोक 3 (skanda.2.208.3)

पद्मचिह्नभुजौ तौ च पादयोश्चक्रलक्षणौ। व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ सितसूक्ष्मघनांशुकौ

padmacihnabhujau tau ca pādayoścakralakṣaṇau vyūḍhoraskau dīrghabhujau sitasūkṣmaghanāṁśukau

उनकी भुजाओं पर कमल का चिह्न था और चरणों पर चक्र का चिह्न; वे विशाल वक्षःस्थल वाले, दीर्घभुज तथा श्वेत सूक्ष्म वस्त्र धारण किये हुए थे।

श्लोक 4 (skanda.2.208.4)

स्वास्यौ पृथुललाटौ च सुभ्रुवौ शुभनासिकौ । शुभलक्षणसंपन्नौ दिव्यमूर्त्ती घनप्रभौ

svāsyau pṛthulalāṭau ca subhruvau śubhanāsikau śubhalakṣaṇasaṁpannau divyamūrttī ghanaprabhau

वे सुन्दर मुख वाले, विशाल ललाट वाले, सुन्दर भौंहों तथा सुन्दर नासिका वाले, समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, दिव्य मूर्ति तथा सघन मेघ के समान कान्ति वाले थे।

श्लोक 5 (skanda.2.208.5)

विनयेनान्तिकं प्राप्य तयोः कृत्वा प्रदक्षिणाम् । भक्त्या प्रणम्य साष्टाङ्गं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः

vinayenāntikaṁ prāpya tayoḥ kṛtvā pradakṣiṇām bhaktyā praṇamya sāṣṭāṅgaṁ tasthau prāñjaliragrataḥ

नारद ने विनयपूर्वक उनके समीप पहुँचकर तथा उनकी प्रदक्षिणा करके, भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये।

श्लोक 6 (skanda.2.208.6)

ततस्तौ तपसां वासौ यशसां तेजसामपि । ऋषी पौर्वाह्णिकस्यान्ते विधेर्मौनं विहाय च

tatastau tapasāṁ vāsau yaśasāṁ tejasāmapi ṛṣī paurvāhṇikasyānte vidhermaunaṁ vihāya ca

तब तप, यश और तेज के आश्रयस्वरूप वे दोनों ऋषि, पूर्वाह्ण की सन्ध्या के अंत में, विधिपूर्वक मौन त्यागकर...

श्लोक 7 (skanda.2.208.7)

प्रीत्या नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यां समार्चताम् । पीठयोरुपविष्टौ तौ कौशयोर्नारदश्च सः

prītyā nāradamavyagrau pādyārghyābhyāṁ samārcatām pīṭhayorupaviṣṭau tau kauśayornāradaśca saḥ

...प्रेमपूर्वक तथा शान्तभाव से पाद्य और अर्घ्य द्वारा नारद का सत्कार किया; तथा वे दोनों और नारद कुशासनों पर विराजमान हुए।

श्लोक 8 (skanda.2.208.8)

तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोभिव्यराजत । आज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटोग्निभिर्यथा

teṣu tatropaviṣṭeṣu sa deśobhivyarājata ājyāhutimahājvālairyajñavāṭognibhiryathā

जब वे वहाँ विराजमान हुए, तो वह स्थान ऐसा शोभायमान हुआ मानो घृताहुतियों की महाज्वालाओं से युक्त यज्ञशाला अग्नियों से जगमगा रही हो।

श्लोक 9 (skanda.2.208.9)

अथ नारायणस्तत्र नारदं वाक्यमब्रवीत् । सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुसत्कृतम्

atha nārāyaṇastatra nāradaṁ vākyamabravīt sukhopaviṣṭaṁ viśrāntaṁ kṛtātithyaṁ susatkṛtam

तब नारायण ने सुखपूर्वक बैठे, विश्राम कर चुके, आतिथ्य सत्कार पाए हुए नारद से यह वचन कहा।

श्लोक 10 (skanda.2.208.10)

श्रीनारायण उवाच । अपि ब्रह्मन्स भगवान्परमात्मा सनातनः । ब्रह्मधाम्नि त्वया दृष्ट आवयो कारणं परम्

śrīnārāyaṇa uvāca api brahmansa bhagavānparamātmā sanātanaḥ brahmadhāmni tvayā dṛṣṭa āvayo kāraṇaṁ param

श्रीनारायण ने कहा - हे ब्रह्मन्! क्या तुमने उस भगवान सनातन परमात्मा को, जो हम दोनों के भी परम कारण हैं, ब्रह्मधाम में देखा?

श्लोक 11 (skanda.2.208.11)

नारद उवाच । भगवंस्त्वत्प्रसादेन तमहं परमेश्वरम् । वासुदेवं समालोके स्थितमक्षरधामनि

nārada uvāca bhagavaṁstvatprasādena tamahaṁ parameśvaram vāsudevaṁ samāloke sthitamakṣaradhāmani

नारद ने कहा - हे भगवन्! आपकी कृपा से मैंने उस परमेश्वर वासुदेव को अक्षरधाम में स्थित देखा।

श्लोक 12 (skanda.2.208.12)

इह चैवागतस्तेन विसृष्टो वां निषेवितुम् । आसिष्ये तत्परो भूत्वा युवाभ्यां सह नित्यशः

iha caivāgatastena visṛṣṭo vāṁ niṣevitum āsiṣye tatparo bhūtvā yuvābhyāṁ saha nityaśaḥ

तथा उन्हीं के द्वारा भेजे जाकर, आप दोनों की सेवा के लिए मैं यहाँ भी आया हूँ; उसी में तत्पर होकर मैं सदा आप दोनों के साथ रहूँगा।

श्लोक 13 (skanda.2.208.13)

श्रीनारायण उवाच । धन्योस्यनुगृहीतोसि यत्ते दृष्टः स्वयं प्रभुः । नहि तं दृष्टवान्ब्रह्मन्कश्चिद्देवोपि वा ऋषिः

śrīnārāyaṇa uvāca dhanyosyanugṛhītosi yatte dṛṣṭaḥ svayaṁ prabhuḥ nahi taṁ dṛṣṭavānbrahmankaściddevopi vā ṛṣiḥ

श्रीनारायण ने कहा - तुम धन्य हो, तुम पर अनुगृहीत हुआ है, कि तुमने स्वयं प्रभु का दर्शन किया है; हे ब्रह्मन्! उन्हें न कोई देवता और न कोई ऋषि देख पाया है।

श्लोक 14 (skanda.2.208.14)

भक्त्यैकान्तिकया तस्य प्राप्ता अक्षरसाम्यताम्। ये हि भक्तास्त एवैनं पश्यन्त्यखिलकारणम्

bhaktyaikāntikayā tasya prāptā akṣarasāmyatām ye hi bhaktāsta evainaṁ paśyantyakhilakāraṇam

जो लोग अनन्य भक्ति द्वारा अक्षर-साम्यता को प्राप्त हुए हैं, वे ही भक्त उन सबके कारणस्वरूप प्रभु को देख पाते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.208.15)

स दिव्यमूर्त्तिर्भगवान्दुर्द्दर्शः पुरुषोत्तमः । नारदैतद्धि मे सत्यं वचनं समुदाहृतम्

sa divyamūrttirbhagavāndurddarśaḥ puruṣottamaḥ nāradaitaddhi me satyaṁ vacanaṁ samudāhṛtam

वे दिव्यमूर्ति भगवान पुरुषोत्तम अत्यंत दुर्दर्श हैं; हे नारद! मैंने तुमसे जो यह वचन कहा है, यह सत्य है।

श्लोक 16 (skanda.2.208.16)

नान्यो भक्तात्प्रियतरो लोके तस्यास्ति कश्चन । ततः स्वयं दर्शितवांस्तवात्मानं द्विजोत्तम

nānyo bhaktātpriyataro loke tasyāsti kaścana tataḥ svayaṁ darśitavāṁstavātmānaṁ dvijottama

संसार में उनसे बढ़कर भक्त कोई भी उन्हें प्रिय नहीं है; इसीलिए, हे द्विजोत्तम, उन्होंने स्वयं तुम्हें अपना दर्शन दिया।

श्लोक 17 (skanda.2.208.17)

तेजःपुञ्जाभिरुद्धांगो गुणातीताद्भुताकृतिः । अखण्डानन्दरूपश्च सदा शुद्धोऽच्युतोस्ति सः

tejaḥpuñjābhiruddhāṁgo guṇātītādbhutākṛtiḥ akhaṇḍānandarūpaśca sadā śuddho'cyutosti saḥ

उनका शरीर तेजःपुंज से आवृत है, उनकी आकृति गुणातीत और अद्भुत है; वे अखण्ड आनन्दस्वरूप, सदा शुद्ध तथा अच्युत हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.208.18)

रूपवर्णवयोवस्थाः प्राकृता नैव तस्य हि । सर्वं तस्यास्ति तद्दिव्यं सर्वोपकरणानि च । एकान्तिकानां भक्तानां स एव परमा गतिः

rūpavarṇavayovasthāḥ prākṛtā naiva tasya hi sarvaṁ tasyāsti taddivyaṁ sarvopakaraṇāni ca ekāntikānāṁ bhaktānāṁ sa eva paramā gatiḥ

उनका रूप, वर्ण और अवस्था कदापि प्राकृत नहीं हैं; उनका सब कुछ दिव्य है, तथा उनकी समस्त सामग्री भी दिव्य है; वे ही अनन्य भक्तों की परम गति हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.208.19)

आत्मब्रह्मैक्यसंपन्नैर्विनिवृत्तगुणैरपि । क्रियते वासुदेवस्य भक्तिरित्थंगुणो हि सः

ātmabrahmaikyasaṁpannairvinivṛttaguṇairapi kriyate vāsudevasya bhaktiritthaṁguṇo hi saḥ

जो आत्मा-ब्रह्म की एकता को प्राप्त तथा गुणों से निवृत्त हो चुके हैं, वे भी वासुदेव की भक्ति करते हैं; ऐसे ही गुणों वाले वे हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.208.20)

माहात्म्यमस्य को वक्तुं शक्नुयात्परमात्मनः । अचिन्त्यानन्तशक्तीनामधिपस्य महामुने

māhātmyamasya ko vaktuṁ śaknuyātparamātmanaḥ acintyānantaśaktīnāmadhipasya mahāmune

हे महामुने! उस परमात्मा की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जो अचिन्त्य और अनन्त शक्तियों के स्वामी हैं?

श्लोक 21 (skanda.2.208.21)

आत्मात्मा चाक्षरात्मा च ह्येष आकाशनिर्मलः । दिव्यदृगीक्ष्यः सन्मात्रः पुरुषो वसुदेवजः

ātmātmā cākṣarātmā ca hyeṣa ākāśanirmalaḥ divyadṛgīkṣyaḥ sanmātraḥ puruṣo vasudevajaḥ

वे आत्मा के भी आत्मा, अक्षर के भी आत्मा, आकाश के समान निर्मल, केवल दिव्य दृष्टि से दर्शनीय, सन्मात्रस्वरूप तथा वसुदेव-पुत्र रूप में प्रकट पुरुष हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.208.22)

समस्तकल्याणगुणो निर्गुणश्चेश्वरेश्वरः । परया विद्यया वेद्य उपास्यो ब्रह्मवित्प्रभुः

samastakalyāṇaguṇo nirguṇaśceśvareśvaraḥ parayā vidyayā vedya upāsyo brahmavitprabhuḥ

वे समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त होते हुए भी निर्गुण हैं, ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, परा विद्या द्वारा ज्ञातव्य हैं, उपास्य हैं तथा ब्रह्मवेत्ताओं के भी स्वामी हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.208.23)

दिव्यमूर्त्तिं तमीशानं तपसैकान्तिकेन च । यः प्रीणयति धर्मेण स धन्यतम उच्यते

divyamūrttiṁ tamīśānaṁ tapasaikāntikena ca yaḥ prīṇayati dharmeṇa sa dhanyatama ucyate

जो पुरुष उस दिव्यमूर्ति ईश्वर को अनन्य तप द्वारा धर्मपूर्वक प्रसन्न करता है, वह सबसे अधिक धन्य कहा जाता है।

श्लोक 24 (skanda.2.208.24)

तस्मात्त्वमपि देवर्षे धर्मेणैकान्तिकेन तम् । आराधयन्निहैवांग कंचित्कालं तपः कुरु

tasmāttvamapi devarṣe dharmeṇaikāntikena tam ārādhayannihaivāṁga kaṁcitkālaṁ tapaḥ kuru

अतः हे देवर्षे, हे वत्स! तुम भी यहीं अनन्य धर्म द्वारा उनकी आराधना करते हुए कुछ काल तक तप करो।

श्लोक 25 (skanda.2.208.25)

तपसैवाऽतिशुद्धात्मा माहात्म्यं तस्य सत्पतेः । यथावज्ज्ञास्यति भवान्प्रोच्यमानं मयाऽखिलम्

tapasaivā'tiśuddhātmā māhātmyaṁ tasya satpateḥ yathāvajjñāsyati bhavānprocyamānaṁ mayā'khilam

उस तप से ही अत्यंत शुद्धात्मा होकर, मेरे द्वारा कहे जाने वाले उस सत्पते की समस्त महिमा को तुम यथावत् जान सकोगे।

श्लोक 26 (skanda.2.208.26)

सर्वार्थसाधनं विद्धि तपस्तद्धृदयं मुने । नातप्तभूरितपसा स वशीक्रियते प्रभुः

sarvārthasādhanaṁ viddhi tapastaddhṛdayaṁ mune nātaptabhūritapasā sa vaśīkriyate prabhuḥ

हे मुने! तप को ही समस्त प्रयोजनों का साधक तथा उसका हृदय समझो; बिना प्रचुर तप किये वे प्रभु वश में नहीं होते।

श्लोक 27 (skanda.2.208.27)

स्कन्द उवाच । एवमुक्तो भगवता नरनारायणेन सः । प्रीतस्तपः कर्त्तुमिच्छँस्तमुवाच महामतिः

skanda uvāca evamukto bhagavatā naranārāyaṇena saḥ prītastapaḥ karttumiccham̐stamuvāca mahāmatiḥ

स्कन्द ने कहा - भगवान नरनारायण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह महामति नारद प्रसन्न होकर तप करने की इच्छा से उनसे बोले।

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