वैष्णव खण्ड · अध्याय 209
चातुर्वर्ण्य धर्म निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.209.1)
नारद उवाच । भगवन्ब्रूहि मे धर्ममेकान्तं तव संमतम् । प्रीयते येन विश्वात्मा वासुदेवः स सर्वदा
nārada uvāca bhagavanbrūhi me dharmamekāntaṁ tava saṁmatam prīyate yena viśvātmā vāsudevaḥ sa sarvadā
नारद ने कहा - हे भगवन्! मुझे वह एकान्तिक धर्म बताइये जो आपको मान्य है, जिससे विश्वात्मा वासुदेव सदा प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 2 (skanda.2.209.2)
श्रीनारायण उवाच । साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्मतिस्ते विमला किल । मयि स्निग्धाय भक्ताय तुभ्यं गुह्यमपि ब्रुवे
śrīnārāyaṇa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā brahmanmatiste vimalā kila mayi snigdhāya bhaktāya tubhyaṁ guhyamapi bruve
श्रीनारायण ने कहा - हे ब्रह्मन्! तुमने अच्छा पूछा है, तुम्हारी बुद्धि निश्चय ही निर्मल है। तुम मुझसे स्नेह रखने वाले भक्त हो, अतः मैं तुम्हें यह गुह्य रहस्य भी बताता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.2.209.3)
धर्म एष मया प्रोक्तः कल्पस्यादौ विवस्वते । तमेव कथये तुभ्यं सनातनमहं मुने
dharma eṣa mayā proktaḥ kalpasyādau vivasvate tameva kathaye tubhyaṁ sanātanamahaṁ mune
यह धर्म मैंने कल्प के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य) को बताया था; वही सनातन धर्म, हे मुने, मैं तुम्हें कहता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.2.209.4)
स्वधर्मज्ञानवैराग्यैः सह लक्ष्मीवदीश्वरे । तस्मिन्ननन्या भक्तिर्या धर्म एकान्तिकः स वै
svadharmajñānavairāgyaiḥ saha lakṣmīvadīśvare tasminnananyā bhaktiryā dharma ekāntikaḥ sa vai
स्वधर्म, ज्ञान और वैराग्य के सहित, लक्ष्मी की भाँति ईश्वर में जो अनन्य भक्ति है, वही एकान्तिक धर्म है।
श्लोक 5 (skanda.2.209.5)
तेनैवातिप्रसन्नः स्याद्गोलोकाधिपतिः स्वयम् । जायते स च भक्तोपि परिपूर्णमनोरथः
tenaivātiprasannaḥ syādgolokādhipatiḥ svayam jāyate sa ca bhaktopi paripūrṇamanorathaḥ
उसी से गोलोकाधिपति स्वयं अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और वह भक्त भी अपने समस्त मनोरथों को परिपूर्ण पाता है।
श्लोक 6 (skanda.2.209.6)
नारद उवाच । लक्षणानि बुभुत्सामि स्वधर्मादेः पृथक्पृथक् । शास्त्रयोनेरहं त्वत्तो वक्तुं तानि त्वमर्हसि
nārada uvāca lakṣaṇāni bubhutsāmi svadharmādeḥ pṛthakpṛthak śāstrayonerahaṁ tvatto vaktuṁ tāni tvamarhasi
नारद ने कहा - मैं स्वधर्म आदि के पृथक्-पृथक् लक्षणों को जानना चाहता हूँ; हे शास्त्रों के मूल स्रोत! आप ही मुझे उन्हें बताने के योग्य हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.209.7)
निगमागमशास्त्राणां सर्वेषामपि सत्पते । मूलं त्वमेक एवासि येषु धर्मः सनातनः
nigamāgamaśāstrāṇāṁ sarveṣāmapi satpate mūlaṁ tvameka evāsi yeṣu dharmaḥ sanātanaḥ
हे सत्पते! समस्त निगम-आगम शास्त्रों के, जिनमें सनातन धर्म वर्णित है, आप ही एकमात्र मूल हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.209.8)
त्वमेव साक्षाद्भगवान्वासुदेवोऽक्षरात्परः । श्रेयसे सर्वभूतानां वर्तसेऽत्र दयानिधिः
tvameva sākṣādbhagavānvāsudevo'kṣarātparaḥ śreyase sarvabhūtānāṁ vartase'tra dayānidhiḥ
आप ही साक्षात् भगवान वासुदेव हैं, अक्षर से भी परे हैं; हे दयानिधे! आप यहाँ समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए विद्यमान हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.209.9)
त्वत्तोऽन्ये तु स्वस्वभावगुणतन्त्रा ह्यजादयः । यथावन्न विजानीयुर्द्धर्मादींस्त्वमतो वद
tvatto'nye tu svasvabhāvaguṇatantrā hyajādayaḥ yathāvanna vijānīyurddharmādīṁstvamato vada
आपसे भिन्न अन्य ब्रह्मादि भी अपने-अपने स्वभावगत गुणों के अधीन होने से धर्मादि को यथार्थ रूप से नहीं जान सकते; अतः आप ही कहिये।
श्लोक 10 (skanda.2.209.10)
स्कन्द उवाच । इति देवर्षिणा पृष्टो भगवान्धर्मनन्दनः । स्वधर्मादीन्क्रमेणैव कथयामास सर्ववित्
skanda uvāca iti devarṣiṇā pṛṣṭo bhagavāndharmanandanaḥ svadharmādīnkrameṇaiva kathayāmāsa sarvavit
स्कन्द ने कहा - इस प्रकार देवर्षि द्वारा पूछे जाने पर, धर्मनन्दन भगवान सर्वज्ञ ने क्रमशः स्वधर्म आदि का वर्णन किया।
श्लोक 11 (skanda.2.209.11)
श्रीनारायण उवाच । वर्णानामाश्रमाणां च सदाचारः पृथक्पृथक् । सामान्यः सविशेषश्च स्वधर्मः स उदीर्यते
śrīnārāyaṇa uvāca varṇānāmāśramāṇāṁ ca sadācāraḥ pṛthakpṛthak sāmānyaḥ saviśeṣaśca svadharmaḥ sa udīryate
श्रीनारायण ने कहा - वर्णों और आश्रमों का जो पृथक्-पृथक् सदाचार है, वह सामान्य और विशेष दोनों रूप में स्वधर्म कहा जाता है।
श्लोक 12 (skanda.2.209.12)
नृणां साधारणं धर्मं सर्वेषामादितः शृणु । अहिंसा परमो धर्मस्तत्रादिम उदाहृतः
nṛṇāṁ sādhāraṇaṁ dharmaṁ sarveṣāmāditaḥ śṛṇu ahiṁsā paramo dharmastatrādima udāhṛtaḥ
पहले सब मनुष्यों के सामान्य धर्म को सुनो। अहिंसा को परम धर्म कहा गया है, जो इनमें प्रथम है।
श्लोक 13 (skanda.2.209.13)
स्वमुख्यधर्मवृत्योरप्यद्रोहो मनसापि यः । सति गत्यन्तरे प्राणिमात्रस्यापीति सा मता
svamukhyadharmavṛtyorapyadroho manasāpi yaḥ sati gatyantare prāṇimātrasyāpīti sā matā
अपने प्रमुख धर्म एवं वृत्ति के पालन में भी, यदि अन्य उपाय उपलब्ध हो, तो मन से भी किसी प्राणिमात्र का अद्रोह करना - यही अहिंसा मानी गई है।
श्लोक 14 (skanda.2.209.14)
सत्या वाग्भूतमात्रस्य द्रोहो न स्याद्यया तथा । तपश्च शास्त्रविहितभोगसंकोचलक्षणम्
satyā vāgbhūtamātrasya droho na syādyayā tathā tapaśca śāstravihitabhogasaṁkocalakṣaṇam
सत्य वाणी वह है जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचे; और तप शास्त्रविहित भोगों के संकोच (सीमन) के रूप में लक्षित है।
श्लोक 15 (skanda.2.209.15)
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचकर्म च । अनादानं परस्वस्य परोक्षं वा छलेन च
bāhyamābhyantaraṁ ceti dvividhaṁ śaucakarma ca anādānaṁ parasvasya parokṣaṁ vā chalena ca
शौचकर्म बाह्य और आभ्यन्तर - दो प्रकार का है; तथा अस्तेय का अर्थ है परोक्ष में या छल से भी पराये धन को न लेना।
श्लोक 16 (skanda.2.209.16)
यथोचितं ब्रह्मचर्यकामलोभक्रुधां जयः । मुदा वित्तार्पणं पात्रे तुष्टिर्लब्धेन दैवतः
yathocitaṁ brahmacaryakāmalobhakrudhāṁ jayaḥ mudā vittārpaṇaṁ pātre tuṣṭirlabdhena daivataḥ
यथोचित ब्रह्मचर्य, काम-लोभ-क्रोध पर विजय; प्रसन्नतापूर्वक सुपात्र को धन अर्पण करना; तथा दैवयोग से प्राप्त वस्तु में संतोष रखना।
श्लोक 17 (skanda.2.209.17)
तीर्थे क्षेत्रे च यज्ञादौ चतुर्वर्गाप्तयेपि वा । आत्मनो वा परस्यापि सर्वथा घातवर्जनम्
tīrthe kṣetre ca yajñādau caturvargāptayepi vā ātmano vā parasyāpi sarvathā ghātavarjanam
तीर्थ में, क्षेत्र में, यज्ञ आदि में, अथवा चतुर्वर्ग की प्राप्ति के लिए भी, अपने अथवा दूसरे के प्राणों का सर्वथा घात न करना।
श्लोक 18 (skanda.2.209.18)
जातिभ्रंशकराणां च कर्मणां परिवर्जनम् । पाणिपादोदरोपस्थवाचां संयमनं तथा
jātibhraṁśakarāṇāṁ ca karmaṇāṁ parivarjanam pāṇipādodaropasthavācāṁ saṁyamanaṁ tathā
जाति-भ्रष्टता उत्पन्न करने वाले कर्मों का त्याग; तथा हाथ, पैर, उदर, उपस्थ और वाणी का संयम।
श्लोक 19 (skanda.2.209.19)
सर्वेषां व्यसनानां च वर्जनं मद्यमांसयोः । व्यभिचारान्निवृत्तिश्च कुलसद्धर्मपालनम्
sarveṣāṁ vyasanānāṁ ca varjanaṁ madyamāṁsayoḥ vyabhicārānnivṛttiśca kulasaddharmapālanam
समस्त व्यसनों का, तथा मद्य और मांस का त्याग; व्यभिचार से निवृत्ति; और कुल के सद्धर्म का पालन।
श्लोक 20 (skanda.2.209.20)
एकादशीनां सर्वासां यमैः साकमुपोषणम् । हरेर्जन्मदिनानां च व्रताचरणमञ्जसा
ekādaśīnāṁ sarvāsāṁ yamaiḥ sākamupoṣaṇam harerjanmadinānāṁ ca vratācaraṇamañjasā
समस्त एकादशियों का यमों सहित उपवास करना; तथा हरि की जन्मतिथियों पर भलीभाँति व्रतों का आचरण करना।
श्लोक 21 (skanda.2.209.21)
आर्जवं साधुसेवा च विभज्याऽन्नादिभोजनम् । भक्तिर्भगवतश्चेति धर्माः साधारणा नृणाम्
ārjavaṁ sādhusevā ca vibhajyā'nnādibhojanam bhaktirbhagavataśceti dharmāḥ sādhāraṇā nṛṇām
सरलता, साधुसेवा, अन्न आदि को बाँटकर भोजन करना, तथा भगवान की भक्ति - ये मनुष्यों के सामान्य धर्म हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.209.22)
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा वर्णाश्चत्वार ईरिताः । तेषां पृथक्पृथग्धर्मान्विशेषान्वच्मि ते मुने
brahmakṣatraviśaḥ śūdrā varṇāścatvāra īritāḥ teṣāṁ pṛthakpṛthagdharmānviśeṣānvacmi te mune
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - ये चार वर्ण कहे गये हैं; हे मुने! अब मैं उनके पृथक्-पृथक् विशेष धर्मों को बताता हूँ।
श्लोक 23 (skanda.2.209.23)
शमो दमः क्षमा शौचमास्तिक्यं भक्तिरीशितुः । तपो ज्ञानं च विज्ञानं विप्रधर्मः स्वभावजः
śamo damaḥ kṣamā śaucamāstikyaṁ bhaktirīśituḥ tapo jñānaṁ ca vijñānaṁ vipradharmaḥ svabhāvajaḥ
शम, दम, क्षमा, शौच, आस्तिकता, ईश्वर-भक्ति, तप, ज्ञान और विज्ञान - ये स्वभावजन्य ब्राह्मण के धर्म हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.209.24)
शूरत्वं धैर्यमौदार्य बलं तेजः शरण्यता। गोविप्रसाधुरक्षेज्या धर्माः क्षत्रस्य कीर्त्तिताः
śūratvaṁ dhairyamaudārya balaṁ tejaḥ śaraṇyatā goviprasādhurakṣejyā dharmāḥ kṣatrasya kīrttitāḥ
शूरता, धैर्य, उदारता, बल, तेज, शरणागतवत्सलता, गौ-ब्राह्मण-साधुओं की रक्षा तथा यज्ञ - ये क्षत्रिय के धर्म कहे गये हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.209.25)
राज्ञस्त्वेतेऽथ नीत्यैव प्रजानां परिपालनम् । धर्मसंस्थापनं भूमौ धर्मा दण्डार्हदण्डनम्
rājñastvete'tha nītyaiva prajānāṁ paripālanam dharmasaṁsthāpanaṁ bhūmau dharmā daṇḍārhadaṇḍanam
राजा के लिए विशेष रूप से ये भी धर्म हैं - नीतिपूर्वक प्रजा का पालन करना, पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करना, तथा दण्डनीय को उचित दण्ड देना।
श्लोक 26 (skanda.2.209.26)
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च साधुब्राह्मणसेवनम् । अतुष्टिरर्थोपचये धर्मा वैश्यस्य चोद्यमः
āstikyaṁ dānaniṣṭhā ca sādhubrāhmaṇasevanam atuṣṭirarthopacaye dharmā vaiśyasya codyamaḥ
आस्तिकता, दान में निष्ठा, सुयोग्य ब्राह्मणों की सेवा, धन-संचय में असन्तोष (अर्थात् निरन्तर उद्यमशीलता), तथा उद्यम - ये वैश्य के धर्म हैं।
श्लोक 27 (skanda.2.209.27)
द्विजातीनां च देवानां सेवा निष्कपटं गवाम् । विशेषधर्मः कथितः शूद्रस्य मुनिसत्तम
dvijātīnāṁ ca devānāṁ sevā niṣkapaṭaṁ gavām viśeṣadharmaḥ kathitaḥ śūdrasya munisattama
हे मुनिसत्तम! द्विजातियों की, देवताओं की तथा गौओं की निष्कपट सेवा - यह शूद्र का विशेष धर्म कहा गया है।
श्लोक 28 (skanda.2.209.28)
अध्यापनं याजनं च विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः । विप्रस्य जीविका प्रोक्ता तत्रान्त्या त्वापदि स्मृता
adhyāpanaṁ yājanaṁ ca viśuddhācca pratigrahaḥ viprasya jīvikā proktā tatrāntyā tvāpadi smṛtā
अध्यापन, याजन (यज्ञ कराना) तथा शुद्ध स्रोत से दान ग्रहण करना - ये ब्राह्मण की आजीविका कही गई हैं; इनमें अन्तिम केवल आपत्काल में मानी गई है।
श्लोक 29 (skanda.2.209.29)
याजनेऽध्यापने वापि दोषदर्शी द्विजोत्तमः । यस्तस्याऽन्यापि विहिता वृत्तिरस्ति चतुर्विधा
yājane'dhyāpane vāpi doṣadarśī dvijottamaḥ yastasyā'nyāpi vihitā vṛttirasti caturvidhā
जो द्विजोत्तम याजन या अध्यापन में दोष देखता है, उसके लिए भी एक अन्य चतुर्विध वृत्ति विहित है।
श्लोक 30 (skanda.2.209.30)
शिलोञ्छ नित्ययाच्ञा च शालीनं चोचिता कृषिः । श्रेयसी पूर्वपूर्वाऽत्र ज्ञातव्या द्विजसत्तमैः
śiloñcha nityayācñā ca śālīnaṁ cocitā kṛṣiḥ śreyasī pūrvapūrvā'tra jñātavyā dvijasattamaiḥ
शिलोञ्छ (बिखरे अनाज बीनना), नित्य याचना, शालीनवृत्ति (बिना माँगे प्राप्त वस्तु से जीवन-निर्वाह), तथा उचित कृषि - इनमें द्विजश्रेष्ठों को क्रमशः पूर्व-पूर्व को श्रेष्ठतर जानना चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.2.209.31)
विप्रो जीवेद्वैश्यवृत्त्या सत्यामापदि नारद । अथ वा क्षत्रवृत्त्यापि श्ववृत्त्या न तु कर्हिचित्
vipro jīvedvaiśyavṛttyā satyāmāpadi nārada atha vā kṣatravṛttyāpi śvavṛttyā na tu karhicit
हे नारद! आपत्काल में ब्राह्मण वैश्यवृत्ति से अथवा क्षत्रियवृत्ति से भी जीवन-निर्वाह कर सकता है, परन्तु श्ववृत्ति (नीच वृत्ति) से कदापि नहीं।
श्लोक 32 (skanda.2.209.32)
शस्त्रेण जीवेत्क्षत्रं तु सर्वतो धर्मरक्षया । आपन्नो वैश्यवृत्त्यैव विप्ररूपेण वा चरेत्
śastreṇa jīvetkṣatraṁ tu sarvato dharmarakṣayā āpanno vaiśyavṛttyaiva viprarūpeṇa vā caret
क्षत्रिय को शस्त्र द्वारा, सब प्रकार से धर्म की रक्षा करते हुए जीवन-निर्वाह करना चाहिए; संकट में पड़ने पर वह वैश्यवृत्ति से अथवा ब्राह्मण के रूप में भी आचरण कर सकता है।
श्लोक 33 (skanda.2.209.33)
करादानादिनृपतेरविप्राद्वृत्तिरीरिता । देशकालानुसारेण रञ्जयित्वाऽखिलाः प्रजाः
karādānādinṛpateraviprādvṛttirīritā deśakālānusāreṇa rañjayitvā'khilāḥ prajāḥ
अब्राह्मण राजा के लिए, देश-काल के अनुसार समस्त प्रजा को प्रसन्न रखते हुए, कर आदि के संग्रह द्वारा जीविका कही गई है।
श्लोक 34 (skanda.2.209.34)
आपत्कालेपि क्षत्रस्य ब्राह्मणस्येव सर्वथा । विगर्हिता नीचसेवा स्वतेजःक्षयकारिणी
āpatkālepi kṣatrasya brāhmaṇasyeva sarvathā vigarhitā nīcasevā svatejaḥkṣayakāriṇī
संकटकाल में भी क्षत्रिय के लिए, ब्राह्मण के समान ही, नीच की सेवा सर्वथा निन्दित है, क्योंकि वह अपने तेज का नाश करने वाली है।
श्लोक 35 (skanda.2.209.35)
कृषिवाणिज्यगोरक्षा तुरीया वृद्धिजीवनम् । वैश्यस्य जीविका प्रोक्ता शूद्रवृत्तिस्तथापदि
kṛṣivāṇijyagorakṣā turīyā vṛddhijīvanam vaiśyasya jīvikā proktā śūdravṛttistathāpadi
कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा तथा चौथी, ब्याज पर धन देना - ये वैश्य की जीविका कही गई है; तथा आपत्काल में उसे शूद्रवृत्ति भी अपनानी पड़ सकती है।
श्लोक 36 (skanda.2.209.36)
शूद्रो जीवेद्द्विजातीनां सेवालब्धधनेन च । आपत्काले तु कार्वादेर्जीविकावृत्तिमाश्रयेत्
śūdro jīveddvijātīnāṁ sevālabdhadhanena ca āpatkāle tu kārvāderjīvikāvṛttimāśrayet
शूद्र को द्विजातियों की सेवा से प्राप्त धन द्वारा जीवन-निर्वाह करना चाहिए; परन्तु आपत्काल में वह शिल्प आदि की वृत्ति का आश्रय ले सकता है।
श्लोक 37 (skanda.2.209.37)
आपन्मुक्तस्तु सर्वोपि प्रायश्चित्तं यथोचितम् । विधाय स्वस्ववृत्त्यैव पुनर्वर्त्तेत मुख्यया
āpanmuktastu sarvopi prāyaścittaṁ yathocitam vidhāya svasvavṛttyaiva punarvartteta mukhyayā
संकट से मुक्त होने पर, सभी को उचित प्रायश्चित्त करके, पुनः अपनी-अपनी मुख्य वृत्ति में लौट आना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.2.209.38)
चातुर्वर्ण्यं सतां संगं कुर्यान्न त्वसतां क्वचित् । मुक्तिप्रदोस्ति सत्संगः कुसंगो निरयप्रदः
cāturvarṇyaṁ satāṁ saṁgaṁ kuryānna tvasatāṁ kvacit muktipradosti satsaṁgaḥ kusaṁgo nirayapradaḥ
चारों वर्णों को सत्संग ही करना चाहिए, दुष्टों का संग कदापि नहीं; क्योंकि सत्संग मुक्तिदायक है और कुसंग नरकदायक है।
श्लोक 39 (skanda.2.209.39)
कामं क्रोधं रसास्वादं जित्वा मानं च मत्सरम् । निर्दम्भं विष्णुभक्ता ये ते सन्तः साधवो मताः
kāmaṁ krodhaṁ rasāsvādaṁ jitvā mānaṁ ca matsaram nirdambhaṁ viṣṇubhaktā ye te santaḥ sādhavo matāḥ
जो विष्णुभक्त काम, क्रोध, रसास्वाद, अभिमान और ईर्ष्या को जीतकर निष्कपट रहते हैं, वे ही सन्त और साधु माने गये हैं।
श्लोक 40 (skanda.2.209.40)
स्त्रियां स्त्रैणे रसास्वादे सक्ताश्च धनगृध्नवः । हिंस्रा दम्भकृताटोपा भक्ताभासा ह्यसाधवः
striyāṁ straiṇe rasāsvāde saktāśca dhanagṛdhnavaḥ hiṁsrā dambhakṛtāṭopā bhaktābhāsā hyasādhavaḥ
जो स्त्री, स्त्रैण भोग तथा रसास्वाद में आसक्त, धन के लोभी, हिंसक तथा दम्भपूर्ण आडम्बर करने वाले हैं, वे भक्ताभास मात्र हैं, वस्तुतः असाधु हैं।
श्लोक 41 (skanda.2.209.41)
असाधुष्वासुरी संपद्दैवी संपत्तु साधुषु । सहजास्तीति निश्चित्य सेव्या सन्तः सुखेप्सुभिः
asādhuṣvāsurī saṁpaddaivī saṁpattu sādhuṣu sahajāstīti niścitya sevyā santaḥ sukhepsubhiḥ
असाधुओं में आसुरी सम्पत्ति और साधुओं में दैवी सम्पत्ति सहज ही विद्यमान है - यह निश्चय जानकर, सुख चाहने वालों को सन्तों की ही सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.2.209.42)
यादृशां यस्य संगः स्याच्छास्त्राणां वा नृणामपि । बुद्धिः स्यात्तादृशी तस्य कार्योऽतो नासतां हि सः
yādṛśāṁ yasya saṁgaḥ syācchāstrāṇāṁ vā nṛṇāmapi buddhiḥ syāttādṛśī tasya kāryo'to nāsatāṁ hi saḥ
जिस प्रकार के शास्त्रों या मनुष्यों का जिसे संग प्राप्त होता है, उसकी बुद्धि भी वैसी ही बन जाती है; अतः असाधुओं का संग कदापि न करे।
श्लोक 43 (skanda.2.209.43)
ये साधुसेवारुचयः पुरुषा निजशक्तितः । अप्राप्यं नास्ति तेषां वै किमप्यैश्वर्यमूर्जितम्
ye sādhusevārucayaḥ puruṣā nijaśaktitaḥ aprāpyaṁ nāsti teṣāṁ vai kimapyaiśvaryamūrjitam
जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार साधुसेवा में रुचि रखते हैं, उनके लिए कोई भी महान् ऐश्वर्य अप्राप्य नहीं है।
श्लोक 44 (skanda.2.209.44)
स्वधर्मस्था अपि सतां द्रोहिणो ये तु मानवाः । सद्गतिं नैव ते यान्ति क्वापि केनापि कर्मणा
svadharmasthā api satāṁ drohiṇo ye tu mānavāḥ sadgatiṁ naiva te yānti kvāpi kenāpi karmaṇā
जो मनुष्य स्वधर्म में स्थित होते हुए भी सन्तों के द्रोही हैं, वे किसी भी कर्म से कहीं भी सद्गति को प्राप्त नहीं करते।
श्लोक 45 (skanda.2.209.45)
महापूजारता विष्णोर्भक्ता अपि सतां यदि । द्रोहं कुर्युस्तदा तेषु न प्रसीदति स क्वचित्
mahāpūjāratā viṣṇorbhaktā api satāṁ yadi drohaṁ kuryustadā teṣu na prasīdati sa kvacit
विष्णु की महापूजा में रत भक्त भी यदि सन्तों के प्रति द्रोह करें, तो भगवान उन पर कभी प्रसन्न नहीं होते।
श्लोक 46 (skanda.2.209.46)
सद्द्रोहिणस्तु देहान्ते यांयां योनिं ब्रजन्ति च । तत्रतत्र क्षुधारोगैः पीड्यन्ते जीवितावधि
saddrohiṇastu dehānte yāṁyāṁ yoniṁ brajanti ca tatratatra kṣudhārogaiḥ pīḍyante jīvitāvadhi
सन्तों के द्रोही जिस-जिस योनि को प्राप्त होते हैं, वहाँ-वहाँ वे जीवनपर्यन्त भूख और रोगों से पीड़ित रहते हैं।
श्लोक 47 (skanda.2.209.47)
सतामतिक्रमादेव पुण्यानां महतामपि । सद्यः क्षयः स्यात्सर्वेषामायुषः संपदामपि
satāmatikramādeva puṇyānāṁ mahatāmapi sadyaḥ kṣayaḥ syātsarveṣāmāyuṣaḥ saṁpadāmapi
सन्तों के अतिक्रमण मात्र से ही, समस्त महान् पुण्यों का, आयु का तथा सम्पत्ति का भी तत्काल नाश हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.2.209.48)
तस्मात्सेवा सतां कार्या सर्वैरपि सुखेप्सुभिः । पुण्यतीर्थानि सेव्यानि पूज्या विप्राश्च धेनवः
tasmātsevā satāṁ kāryā sarvairapi sukhepsubhiḥ puṇyatīrthāni sevyāni pūjyā viprāśca dhenavaḥ
अतः सुख की इच्छा रखने वाले सभी को सन्तों की सेवा करनी चाहिए; पुण्य तीर्थों का सेवन करना चाहिए तथा ब्राह्मणों और गौओं की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 49 (skanda.2.209.49)
तीर्थानि देवप्रतिमा निन्देयुर्ये कुबुद्धयः । तेषां तु जारजातानां वंशोच्छेदो भवेद्ध्रुवम्
tīrthāni devapratimā nindeyurye kubuddhayaḥ teṣāṁ tu jārajātānāṁ vaṁśocchedo bhaveddhruvam
जो कुबुद्धि लोग तीर्थों की या देवप्रतिमाओं की निन्दा करते हैं, उन व्यभिचारजात लोगों के वंश का उच्छेद निश्चय ही हो जाता है।
श्लोक 50 (skanda.2.209.50)
एकस्मिंस्तर्पिते विप्रे सद्भोज्यैर्दक्षिणादिभिः । तर्पितं स्याज्जगत्सर्वं हरिस्तुष्यति च स्वयम्
ekasmiṁstarpite vipre sadbhojyairdakṣiṇādibhiḥ tarpitaṁ syājjagatsarvaṁ haristuṣyati ca svayam
उत्तम भोजन, दक्षिणा आदि से एक ब्राह्मण को तृप्त करने पर सम्पूर्ण जगत तृप्त हो जाता है, और स्वयं हरि प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 51 (skanda.2.209.51)
एकस्मिन्ब्राह्मणे द्रुग्धे द्रुग्धं स्यात्सकलं जगत्। तस्माच्छक्त्या पूजनीया ब्राह्मणा विष्णुरूपिणः
ekasminbrāhmaṇe drugdhe drugdhaṁ syātsakalaṁ jagat tasmācchaktyā pūjanīyā brāhmaṇā viṣṇurūpiṇaḥ
एक ब्राह्मण के प्रति द्रोह करने पर सम्पूर्ण जगत के प्रति द्रोह हो जाता है; अतः विष्णुस्वरूप ब्राह्मणों की यथाशक्ति पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 52 (skanda.2.209.52)
गवामंगेषु तिष्ठन्ति सर्वे देवगणा अपि। तथा सर्वाणि तीर्थानि तासु तिष्ठन्ति सर्वदा
gavāmaṁgeṣu tiṣṭhanti sarve devagaṇā api tathā sarvāṇi tīrthāni tāsu tiṣṭhanti sarvadā
गौओं के अंगों में समस्त देवगण निवास करते हैं; तथा समस्त तीर्थ भी सदा उन्हीं में निवास करते हैं।
श्लोक 53 (skanda.2.209.53)
गव्यर्च्चितायामेकस्यां सर्वे देवाः समर्च्चिताः । कृतानि स्युश्च सर्वाणि तीर्थान्यपि च नारद
gavyarccitāyāmekasyāṁ sarve devāḥ samarccitāḥ kṛtāni syuśca sarvāṇi tīrthānyapi ca nārada
हे नारद! एक गौ की पूजा करने पर समस्त देवता पूजित हो जाते हैं, तथा समस्त तीर्थ भी सम्पन्न हो जाते हैं।
श्लोक 54 (skanda.2.209.54)
एकस्या अपि गोर्द्रोहे कृते क्वापि प्रमादतः । द्रुग्धाः स्युर्देवताः सर्वास्तीर्थान्यपि च कृत्स्नशः
ekasyā api gordrohe kṛte kvāpi pramādataḥ drugdhāḥ syurdevatāḥ sarvāstīrthānyapi ca kṛtsnaśaḥ
यदि प्रमादवश किसी एक गौ के प्रति भी द्रोह हो जाए, तो समस्त देवता तथा समस्त तीर्थ भी उससे पूर्णतया द्रोहग्रस्त हो जाते हैं।
श्लोक 55 (skanda.2.209.55)
तस्माच्चातुर्वर्ण्य जनैर्यथोक्तविधिसंस्थितैः । भवितव्यं प्रयत्नेन त्रेतव्यं च निषेधतः
tasmāccāturvarṇya janairyathoktavidhisaṁsthitaiḥ bhavitavyaṁ prayatnena tretavyaṁ ca niṣedhataḥ
अतः चारों वर्णों के लोगों को यथोक्त विधि में स्थित रहते हुए प्रयत्नपूर्वक आचरण करना चाहिए, तथा निषेधों का पालन करते हुए स्वयं की रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.2.209.56)
चातुर्वर्ण्येतरे ये तु तेषां वृत्तिः कुलोचिता । चौर्यहिंसाद्यधर्मेण रहितैव हितावहा
cāturvarṇyetare ye tu teṣāṁ vṛttiḥ kulocitā cauryahiṁsādyadharmeṇa rahitaiva hitāvahā
जो लोग चारों वर्णों से बाहर हैं, उनके लिए चोरी-हिंसा आदि अधर्म से रहित, कुलोचित वृत्ति ही हितकर है।
श्लोक 57 (skanda.2.209.57)
वर्णधर्मा इति प्रोक्ताः संक्षेपेण मया मुने । चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मानथ वदामि ते
varṇadharmā iti proktāḥ saṁkṣepeṇa mayā mune caturṇāmāśramāṇāṁ ca dharmānatha vadāmi te
हे मुने! इस प्रकार मैंने संक्षेप में वर्णधर्मों का वर्णन किया; अब मैं तुम्हें चारों आश्रमों के धर्मों को बताता हूँ।