वैष्णव खण्ड · अध्याय 210
ब्रह्मचारी धर्म निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.210.1)
श्रीनारायण उवाच । ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । एत आश्रमिणः प्रोक्ताश्चत्वारो मुनिसत्तम
śrīnārāyaṇa uvāca brahmacārī gṛhasthaśca vānaprastho yatistathā eta āśramiṇaḥ proktāścatvāro munisattama
श्रीनारायण ने कहा - ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा यति - हे मुनिसत्तम! ये चारों आश्रमी कहे गये हैं।
श्लोक 2 (skanda.2.210.2)
संस्कारैः संस्कृतो यस्तु शुद्धयोनिर्द्विजातिताम् । प्राप्तः स हि ब्रह्मचारी तद्धर्मानादितो ब्रुवे
saṁskāraiḥ saṁskṛto yastu śuddhayonirdvijātitām prāptaḥ sa hi brahmacārī taddharmānādito bruve
जो शुद्ध योनि वाला संस्कारों से संस्कृत होकर द्विजत्व को प्राप्त हुआ है, वही ब्रह्मचारी है; अब मैं उसके धर्मों को आदि से कहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.2.210.3)
वर्णी वेदमधीयीत वसन्गुरुगृहे शुचिः । जितेन्द्रियो जितक्रोधो विनीतस्तथ्यभाषणः
varṇī vedamadhīyīta vasangurugṛhe śuciḥ jitendriyo jitakrodho vinītastathyabhāṣaṇaḥ
ब्रह्मचारी को गुरु के घर में निवास करते हुए, शुद्ध रहते हुए, जितेन्द्रिय, जितक्रोध, विनम्र तथा सत्यभाषी होकर वेद का अध्ययन करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.210.4)
सायं प्रातश्चरेद्धोमं भिक्षाचर्यां च संयतः । कुर्यात्त्रिकालं संध्यां च विष्णुपूजां तथान्वहम्
sāyaṁ prātaścareddhomaṁ bhikṣācaryāṁ ca saṁyataḥ kuryāttrikālaṁ saṁdhyāṁ ca viṣṇupūjāṁ tathānvaham
वह संयमपूर्वक सायं-प्रातः होम करे तथा भिक्षाचर्या करे; त्रिकाल सन्ध्या करे तथा प्रतिदिन विष्णु की पूजा भी करे।
श्लोक 5 (skanda.2.210.5)
गुर्वाज्ञयैव भुञ्जीत मितमन्नमनाकुलः । गुरुसेवापरो नित्यं भवेद्व्यसनवर्जितः
gurvājñayaiva bhuñjīta mitamannamanākulaḥ gurusevāparo nityaṁ bhavedvyasanavarjitaḥ
वह गुरु की आज्ञा से ही, अव्याकुल होकर, मित भोजन करे; सदा गुरुसेवा में तत्पर रहे तथा व्यसनों से रहित रहे।
श्लोक 6 (skanda.2.210.6)
स्नाने च भोजने होमे जपे मौनमुपाश्रयेत् । छिन्द्यान्न नखरोमाणि दन्तान्नैवातिधावयेत्
snāne ca bhojane home jape maunamupāśrayet chindyānna nakharomāṇi dantānnaivātidhāvayet
स्नान, भोजन, होम तथा जप के समय मौन का आश्रय ले; नख और रोम न काटे, तथा दाँतों को अत्यधिक न रगड़े।
श्लोक 7 (skanda.2.210.7)
नातिधावेच्च वासांसि भवेन्निष्कपटो गुरौ । आहूतोध्ययनं कुर्यादादावन्ते च तं नमेत्
nātidhāvecca vāsāṁsi bhavenniṣkapaṭo gurau āhūtodhyayanaṁ kuryādādāvante ca taṁ namet
वह वस्त्रों को भी अधिक न रगड़े तथा गुरु के प्रति निष्कपट रहे; बुलाये जाने पर अध्ययन करे, तथा आरम्भ और अंत में गुरु को प्रणाम करे।
श्लोक 8 (skanda.2.210.8)
अस्पृश्यान्न स्पृशेच्चासौ नाऽसंभाष्यांश्च भाषयेत् । अभक्ष्यं भक्षयेन्नैव नाऽपेयं च पिबेत्क्वचित्
aspṛśyānna spṛśeccāsau nā'saṁbhāṣyāṁśca bhāṣayet abhakṣyaṁ bhakṣayennaiva nā'peyaṁ ca pibetkvacit
वह अस्पृश्यों को न छुए, न असंभाष्यों से वार्तालाप करे; अभक्ष्य को कभी न खाए और अपेय को कभी न पिये।
श्लोक 9 (skanda.2.210.9)
मेखलामजिनं दण्डं बिभृयाच्च कमण्डलुम् । सिते द्वे वाससी ब्रह्मसूत्रं च जपमालिकाम्
mekhalāmajinaṁ daṇḍaṁ bibhṛyācca kamaṇḍalum site dve vāsasī brahmasūtraṁ ca japamālikām
वह करधनी (मेखला), मृगचर्म, दण्ड तथा कमण्डलु धारण करे; तथा दो श्वेत वस्त्र, यज्ञोपवीत और जपमाला भी।
श्लोक 10 (skanda.2.210.10)
दर्भपाणिश्च जटिलः केशसंस्कारवर्जितः । अङ्गरागं पुष्पहारान्भूषणानि च वर्जयेत्
darbhapāṇiśca jaṭilaḥ keśasaṁskāravarjitaḥ aṅgarāgaṁ puṣpahārānbhūṣaṇāni ca varjayet
वह हाथ में दर्भ (कुश) लिए, जटाधारी, केशों के संस्कार से रहित रहे; अंगराग, पुष्पमाला तथा आभूषणों का त्याग करे।
श्लोक 11 (skanda.2.210.11)
तैलाभ्यङ्गं न कुर्वीत कज्जले नाञ्जनं तथा । वर्जयेच्च प्रयत्नेन संसर्गं मद्यमांसयोः
tailābhyaṅgaṁ na kurvīta kajjale nāñjanaṁ tathā varjayecca prayatnena saṁsargaṁ madyamāṁsayoḥ
वह तेल की मालिश न करे, न काजल-अंजन लगाए; तथा प्रयत्नपूर्वक मद्य और मांस के संसर्ग का त्याग करे।
श्लोक 12 (skanda.2.210.12)
स्त्रीणां निरीक्षणं स्पर्शं भाषणं क्रीडनादि च । वर्जयेत्सर्वथा वर्णी स्त्रियाश्चाप्यवलेखनम्
strīṇāṁ nirīkṣaṇaṁ sparśaṁ bhāṣaṇaṁ krīḍanādi ca varjayetsarvathā varṇī striyāścāpyavalekhanam
ब्रह्मचारी स्त्रियों को देखना, स्पर्श करना, उनसे वार्तालाप-क्रीड़ा आदि करना, तथा स्त्री का चित्रांकन करना भी - सर्वथा त्याग दे।
श्लोक 13 (skanda.2.210.13)
विना च देवप्रतिमां काष्ठचित्रादियोषितम् । अपि नैव स्पृशेद्धीमान्न च बुद्ध्यावलोकयेत्
vinā ca devapratimāṁ kāṣṭhacitrādiyoṣitam api naiva spṛśeddhīmānna ca buddhyāvalokayet
देवप्रतिमा के अतिरिक्त, काष्ठ या चित्र आदि में बनी स्त्री-आकृति को भी बुद्धिमान व्यक्ति स्पर्श न करे, न जानबूझकर उसे देखे।
श्लोक 14 (skanda.2.210.14)
प्राणिमात्रं च मिथुनीभूतं नेक्षेत कर्हिचित् । स्त्रीणां गुणाश्चाप्यगुणाञ्छृणुयान्नैव नो वदेत्
prāṇimātraṁ ca mithunībhūtaṁ nekṣeta karhicit strīṇāṁ guṇāścāpyaguṇāñchṛṇuyānnaiva no vadet
वह किसी भी प्राणी को मैथुनरत कभी न देखे; तथा स्त्रियों के गुण-अवगुणों को न तो सुने और न ही कहे।
श्लोक 15 (skanda.2.210.15)
अस्पृशन्नेव वन्देत गुरुपत्नीमपि स्वकाम् । जनन्यापि न तिष्ठेत रहःस्थाने तु कर्हिचित्
aspṛśanneva vandeta gurupatnīmapi svakām jananyāpi na tiṣṭheta rahaḥsthāne tu karhicit
वह अपने गुरु की पत्नी को भी बिना स्पर्श किये ही प्रणाम करे; अपनी माता के साथ भी कभी एकान्त स्थान में न रहे।
श्लोक 16 (skanda.2.210.16)
एवंवृत्तो वसेत्तत्र यावद्विद्यासमापनम् । ततो विरक्तो न्यासी स्याद्वर्णी वा नैष्ठिको भवेत् । अनधिकारिता प्रोक्ता नैष्ठिकव्रतिनां कलौ
evaṁvṛtto vasettatra yāvadvidyāsamāpanam tato virakto nyāsī syādvarṇī vā naiṣṭhiko bhavet anadhikāritā proktā naiṣṭhikavratināṁ kalau
इस प्रकार रहते हुए वह वहाँ विद्या की समाप्ति तक निवास करे; तत्पश्चात् विरक्त होने पर न्यासी (संन्यासी) बने, अथवा ब्रह्मचारी ही रहे या नैष्ठिक बने। कलियुग में नैष्ठिक व्रतधारियों के लिए यह अधिकार नहीं कहा गया है।
श्लोक 17 (skanda.2.210.17)
न संधाविति विज्ञेयं कलीति शब्दसंग्रहात् । वनी स्यादथ वा ब्रह्मन्नविरक्तो भवेद्गृही
na saṁdhāviti vijñeyaṁ kalīti śabdasaṁgrahāt vanī syādatha vā brahmannavirakto bhavedgṛhī
'कलि' शब्द के ही अर्थ-संग्रह से यह जानना चाहिए कि संधिकाल में यह उचित नहीं है; हे ब्रह्मन्! अतः वह वनवासी बने, अथवा विरक्त न होने पर गृहस्थ बने।
श्लोक 18 (skanda.2.210.18)
प्राजापत्यं च सावित्रं ब्राह्मं नैष्ठिकमेव च । चतुर्विधं ब्रह्मचर्यं तत्रैकं शक्तितः श्रयेत्
prājāpatyaṁ ca sāvitraṁ brāhmaṁ naiṣṭhikameva ca caturvidhaṁ brahmacaryaṁ tatraikaṁ śaktitaḥ śrayet
प्राजापत्य, सावित्र, ब्राह्म तथा नैष्ठिक - ये चार प्रकार के ब्रह्मचर्य हैं; इनमें से एक को अपनी शक्ति के अनुसार अपनाना चाहिए।