वैष्णव खण्ड · अध्याय 212
वानप्रस्थ-यतिधर्म-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.212.1)
श्रीनारायण उवाच । वानप्रस्थस्य वक्ष्यामि नियमानथ ते मुने । तृतीय आयुषो भागे तृतीयाश्रम ईरितः
śrīnārāyaṇa uvāca | vānaprasthasya vakṣyāmi niyamānatha te mune | tṛtīya āyuṣo bhāge tṛtīyāśrama īritaḥ
श्री नारायण ने कहा - हे मुने! अब मैं वानप्रस्थ के नियम बताता हूँ। आयु के तीसरे भाग में यह तीसरा आश्रम कहा गया है।
श्लोक 2 (skanda.2.212.2)
अनुकूला स्वसेवायां विरक्ता च तपःप्रिया । यदि पत्नी भवेत्तर्हि तया सह वनं विशेत्
anukūlā svasevāyāṁ viraktā ca tapaḥpriyā | yadi patnī bhavettarhi tayā saha vanaṁ viśet
यदि पत्नी अपनी सेवा में अनुकूल हो, विरक्त हो और तप में प्रिय रुचि रखती हो, तो उसके साथ वन में प्रवेश करे।
श्लोक 3 (skanda.2.212.3)
अन्यथा तु सुतादिभ्यस्तस्याः पोषणरक्षणम् । आदिश्य स्वयमेकाकी विरक्तो वनमाविशेत्
anyathā tu sutādibhyastasyāḥ poṣaṇarakṣaṇam | ādiśya svayamekākī virakto vanamāviśet
अन्यथा, उसके पालन और रक्षण का भार पुत्रादि को सौंपकर, वह स्वयं अकेला विरक्त होकर वन में प्रवेश करे।
श्लोक 4 (skanda.2.212.4)
निर्भयो निवसेत्तत्र तपोरुचिरतन्द्रितः । कुर्यादुटजमग्न्यर्थं स्वयं तु बहिरावसेत्
nirbhayo nivasettatra taporuciratandritaḥ | kuryāduṭajamagnyarthaṁ svayaṁ tu bahirāvaset
वहाँ वह निर्भय होकर, तप में रुचि रखता हुआ, आलस्यरहित होकर निवास करे; अग्नि के लिए कुटी बनाए, किन्तु स्वयं उसके बाहर रहे।
श्लोक 5 (skanda.2.212.5)
भवेत्पञ्चतपा ग्रीष्म उदवासश्च शैशिरे । आसारषाट्च वर्षासु जितक्रोधो जितेन्द्रियः
bhavetpañcatapā grīṣma udavāsaśca śaiśire | āsāraṣāṭca varṣāsu jitakrodho jitendriyaḥ
ग्रीष्म में पंचाग्नि तप करे, शिशिर में जल में खड़ा रहे, वर्षा में वृष्टि में खड़ा रहे - इस प्रकार क्रोध और इन्द्रियों को जीतता हुआ।
श्लोक 6 (skanda.2.212.6)
वासश्च तार्णं पार्णं वा वसीताजिनवल्कलम् । भुञ्जीत ऋषिधान्यानि वन्यं कन्दफलादि वा
vāsaśca tārṇaṁ pārṇaṁ vā vasītājinavalkalam | bhuñjīta ṛṣidhānyāni vanyaṁ kandaphalādi vā
उसका वस्त्र घास या पत्तों का हो, अथवा वह चर्म और वल्कल पहने; वह ऋषियों के योग्य अन्न या वन के कन्द-फलादि खाए।
श्लोक 7 (skanda.2.212.7)
अग्निपक्वं वार्कपक्वमपक्वं वापि भक्षयेत् । अभावे त्वेष दन्तानामश्मोलूखलकुट्टितम्
agnipakvaṁ vārkapakvamapakvaṁ vāpi bhakṣayet | abhāve tveṣa dantānāmaśmolūkhalakuṭṭitam
वह अग्नि में पकाया हुआ, या सूर्य से पका हुआ, अथवा कच्चा भी भोजन कर सकता है; दाँत न होने पर पत्थर की ओखली में कूटा हुआ अन्न खाए।
श्लोक 8 (skanda.2.212.8)
स्वयमेवाहरेदन्नं यथाकालं दिनेदिने । काले पराहृतं वापि गृह्णीयान्नान्यदा क्वचित्
svayamevāharedannaṁ yathākālaṁ dinedine | kāle parāhṛtaṁ vāpi gṛhṇīyānnānyadā kvacit
वह प्रतिदिन समय पर स्वयं ही अन्न लाए; अथवा समय पर दूसरों द्वारा लाया हुआ ग्रहण करे, अन्य किसी समय कभी नहीं।
श्लोक 9 (skanda.2.212.9)
कालेपि कृष्टपच्यं तु न गृह्णीयादनापदि । वन्यैरेवाग्निकार्यं च धान्यैः कुर्वीत पूर्ववत्
kālepi kṛṣṭapacyaṁ tu na gṛhṇīyādanāpadi | vanyairevāgnikāryaṁ ca dhānyaiḥ kurvīta pūrvavat
समय पर भी जोत-बोकर पके अन्न को आपत्ति के बिना ग्रहण न करे; पूर्ववत् वन्य अन्न से ही अग्निकार्य करे।
श्लोक 10 (skanda.2.212.10)
रक्षेत्कमण्डलुं दण्डमग्निहोत्रपरिच्छदान् । केशरोमश्मश्रुनखान्धारयेन्मलिनान्दतः
rakṣetkamaṇḍaluṁ daṇḍamagnihotraparicchadān | keśaromaśmaśrunakhāndhārayenmalināndataḥ
वह कमण्डलु, दण्ड और अग्निहोत्र की सामग्री की रक्षा करे; केश, रोम, दाढ़ी-मूँछ और नखों को मैला और असंवारा रहने दे।
श्लोक 11 (skanda.2.212.11)
अंगान्यमर्दयन्स्नायाद्भूतले च शयीत सः । देशकाल बलावस्थानुसारेण तपश्चरेत्
aṁgānyamardayansnāyādbhūtale ca śayīta saḥ | deśakāla balāvasthānusāreṇa tapaścaret
वह अंगों को बिना मले स्नान करे और भूमि पर ही शयन करे; देश, काल और अपनी शक्ति एवं अवस्था के अनुसार तप करे।
श्लोक 12 (skanda.2.212.12)
फेनपाश्चौदुम्बराश्च वालखिल्यास्तथैव च । वैखानसेति कथिताश्चतुर्द्धा वनवासिनः
phenapāścaudumbarāśca vālakhilyāstathaiva ca | vaikhānaseti kathitāścaturddhā vanavāsinaḥ
फेनप, औदुम्बर, वालखिल्य तथा वैखानस - इस प्रकार वनवासी चार प्रकार के कहे गए हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.212.13)
यथाशक्ति द्वादशाब्दानष्टौ वा चतुरो वने । वसेद्द्वावेकमेवापि ततः संन्यासमाश्रयेत्
yathāśakti dvādaśābdānaṣṭau vā caturo vane | vaseddvāvekamevāpi tataḥ saṁnyāsamāśrayet
अपनी शक्ति के अनुसार वह बारह वर्ष, या आठ, या चार, या दो, अथवा एक ही वर्ष वन में रहे, फिर संन्यास का आश्रय ले।
श्लोक 14 (skanda.2.212.14)
यदि स्यात्तीव्रवैराग्यं तर्हि न्यासो हितावहः । वसेत्तत्रैवाऽन्यथा तु यावज्जीवं वने द्विजः
yadi syāttīvravairāgyaṁ tarhi nyāso hitāvahaḥ | vasettatraivā'nyathā tu yāvajjīvaṁ vane dvijaḥ
यदि तीव्र वैराग्य हो तो संन्यास ही हितकारी है; अन्यथा द्विज जीवनभर वन में ही रहे।
श्लोक 15 (skanda.2.212.15)
यथाविधि कृतत्यागस्तुरीयाश्रममास्थितः । साच्छादनं तु कौपीनं कन्थामेकां च धारयेत्
yathāvidhi kṛtatyāgasturīyāśramamāsthitaḥ | sācchādanaṁ tu kaupīnaṁ kanthāmekāṁ ca dhārayet
विधिपूर्वक त्याग करके चतुर्थ आश्रम में स्थित हुआ वह केवल कौपीन और एक ही गुदड़ी (कन्था) धारण करे।
श्लोक 16 (skanda.2.212.16)
दण्डं कमण्डलुं चाम्बुगालनं बिभृयाच्च सः । सदाचारद्विजगृहे काले भिक्षां समाचरेत्
daṇḍaṁ kamaṇḍaluṁ cāmbugālanaṁ bibhṛyācca saḥ | sadācāradvijagṛhe kāle bhikṣāṁ samācaret
वह दण्ड, कमण्डलु और जल छानने का वस्त्र धारण करे; उचित समय पर सदाचारी द्विज के घर भिक्षा करे।
श्लोक 17 (skanda.2.212.17)
न कुर्यात्प्रत्यहं भिक्षामेकस्यैव गृहे यतिः । रसलुब्धो भवेन्नेव सकृच्च मितभुग्भवेत्
na kuryātpratyahaṁ bhikṣāmekasyaiva gṛhe yatiḥ | rasalubdho bhavenneva sakṛcca mitabhugbhavet
यति प्रतिदिन एक ही घर में भिक्षा न करे; वह स्वाद का लोभी कभी न बने और एक ही बार सीमित भोजन करे।
श्लोक 18 (skanda.2.212.18)
वनस्थाश्रमिणो भिक्षां प्रायो गृह्णीत भिक्षुकः । तदन्धसातिशुद्धेन शुद्ध्यत्येवाऽस्य यन्मनः
vanasthāśramiṇo bhikṣāṁ prāyo gṛhṇīta bhikṣukaḥ | tadandhasātiśuddhena śuddhyatyevā'sya yanmanaḥ
भिक्षुक प्रायः वानप्रस्थियों से ही भिक्षा ग्रहण करे, क्योंकि उस अत्यन्त शुद्ध अन्न से उसका मन ही शुद्ध होता है।
श्लोक 19 (skanda.2.212.19)
घ्राणेपि मांससुरयोः पाराकं व्रतमाचरेत् । शौचाचारविशुद्धः स्याच्छूद्रादींश्चापि न स्पृशेत्
ghrāṇepi māṁsasurayoḥ pārākaṁ vratamācaret | śaucācāraviśuddhaḥ syācchūdrādīṁścāpi na spṛśet
मांस और मदिरा की गन्ध से भी दूर रहने का व्रत पालन करे; शौच और आचार में शुद्ध रहे तथा शूद्रादि का स्पर्श भी न करे।
श्लोक 20 (skanda.2.212.20)
नित्यं कुर्याद्विष्णुपूजा मद्याद्विष्णोर्न्निवेदितम् । द्वादशार्णं जपेद्विष्णोरष्टाक्षरमनुं च वा
nityaṁ kuryādviṣṇupūjā madyādviṣṇornniveditam | dvādaśārṇaṁ japedviṣṇoraṣṭākṣaramanuṁ ca vā
वह नित्य विष्णु की पूजा करे और विष्णु को अर्पित भोजन ही ग्रहण करे; विष्णु के द्वादशाक्षर या अष्टाक्षर मन्त्र का जप करे।
श्लोक 21 (skanda.2.212.21)
असद्वादं न कुर्वीत वृत्त्यर्थं नाचरेत्कथाम् । असच्छास्त्रे न सक्तः स्यान्नोपजीवेच्च जीविकाम्
asadvādaṁ na kurvīta vṛttyarthaṁ nācaretkathām | asacchāstre na saktaḥ syānnopajīvecca jīvikām
वह असत् वचन न बोले और आजीविका के लिए कथा न कहे; असत् शास्त्र में आसक्त न हो और उससे जीविका न चलाए।
श्लोक 22 (skanda.2.212.22)
सच्छास्त्रमभ्यसेच्चासौ बन्धमोक्षानुदर्शनम् । मठादीन्नैव बध्नीयादहन्ताममते त्यजेत्
sacchāstramabhyaseccāsau bandhamokṣānudarśanam | maṭhādīnnaiva badhnīyādahantāmamate tyajet
वह बन्धन और मोक्ष को दिखाने वाले सत् शास्त्र का अभ्यास करे; मठ आदि न बनाए और अहंता-ममता को त्यागे।
श्लोक 23 (skanda.2.212.23)
चातुर्मास्यं विनैकत्र वसेन्नाऽसावनापदि । आत्मनश्च हरे रूपं विद्याज्ज्ञानेन तत्त्वतः
cāturmāsyaṁ vinaikatra vasennā'sāvanāpadi | ātmanaśca hare rūpaṁ vidyājjñānena tattvataḥ
चातुर्मास्य को छोड़कर वह एक स्थान पर बिना आवश्यकता न रहे; ज्ञान द्वारा अपने आत्मा और हरि के स्वरूप को यथार्थतः जाने।
श्लोक 24 (skanda.2.212.24)
कामं क्रोधं भयं वैरं धनधान्यादिसंग्रहम् । नैव कुर्यात्पालयेत यमांश्च नियमान्यतिः
kāmaṁ krodhaṁ bhayaṁ vairaṁ dhanadhānyādisaṁgraham | naiva kuryātpālayeta yamāṁśca niyamānyatiḥ
यति कभी काम, क्रोध, भय, वैर तथा धन-धान्यादि का संग्रह न करे; यम और नियमों का पालन करे।
श्लोक 25 (skanda.2.212.25)
तीव्रज्ञानविरागाभ्यां संपन्नोपि यतिर्ध्रुवम् । स्त्रीवित्तभूषासद्वस्त्रसंसर्गाद्भ्रष्टतां व्रजेत्
tīvrajñānavirāgābhyāṁ saṁpannopi yatirdhruvam | strīvittabhūṣāsadvastrasaṁsargādbhraṣṭatāṁ vrajet
तीव्र ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न यति भी स्त्री, धन, आभूषण और सुन्दर वस्त्रों के संसर्ग से निश्चय ही भ्रष्ट हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.2.212.26)
पुष्प चन्दनतैलादिसुगन्धिद्रव्यवर्जनम् । त्यागी कुर्वीतान्यथा तु भवेद्देहात्मधीः स वै
puṣpa candanatailādisugandhidravyavarjanam | tyāgī kurvītānyathā tu bhaveddehātmadhīḥ sa vai
त्यागी पुष्प, चन्दन, तेल आदि सुगन्धित द्रव्यों का वर्जन करे; अन्यथा उसकी बुद्धि देह में ही आत्मभाव करने लगती है।
श्लोक 27 (skanda.2.212.27)
आहारो यस्य यावांस्तं तावान्स्त्रीकाम आविशेत् । अतो मितं नीरसं च भोजनं त्यागिनो हितम्
āhāro yasya yāvāṁstaṁ tāvānstrīkāma āviśet | ato mitaṁ nīrasaṁ ca bhojanaṁ tyāgino hitam
जिसका आहार जितना अधिक होता है, उतना ही स्त्री-काम उसमें प्रवेश करता है; इसलिए मित और नीरस भोजन ही त्यागी के लिए हितकर है।
श्लोक 28 (skanda.2.212.28)
न श्राव्या ग्राम्यवार्त्ता च मोक्षसिद्धिमभीप्सता । नश्येद्यच्छ्रवणान्नॄणां सद्यो विष्णुकथा रुचिः
na śrāvyā grāmyavārttā ca mokṣasiddhimabhīpsatā | naśyedyacchravaṇānnṝṇāṁ sadyo viṣṇukathā ruciḥ
मोक्ष की सिद्धि चाहने वाले को ग्राम्य-कथा नहीं सुननी चाहिए, क्योंकि उसे सुनने से मनुष्यों की विष्णु-कथा में रुचि तत्काल नष्ट हो जाती है।
श्लोक 29 (skanda.2.212.29)
अपि चित्रमयीं नारीं त्यागी नेक्षेत न स्पृशेत् । स्त्र्याकारदर्शनादेव भ्रष्टा भूरि तपस्विनः
api citramayīṁ nārīṁ tyāgī nekṣeta na spṛśet | stryākāradarśanādeva bhraṣṭā bhūri tapasvinaḥ
त्यागी चित्रित नारी को भी न देखे और न स्पर्श करे, क्योंकि स्त्री के आकार के दर्शन मात्र से ही अनेक तपस्वी भ्रष्ट हो गए हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.212.30)
कुटीचको बहूदश्च हंसः परमहंसकः । एवं चतुर्द्धा कथितो यतिर्वैराग्यभेदतः
kuṭīcako bahūdaśca haṁsaḥ paramahaṁsakaḥ | evaṁ caturddhā kathito yatirvairāgyabhedataḥ
कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस - इस प्रकार वैराग्य के भेद से यति चार प्रकार का कहा गया है।
श्लोक 31 (skanda.2.212.31)
काषायवाससो ये मे भविष्याः साधवश्च तैः । कार्यं मदर्थपाकादि तुर्याश्रमस्थितैरपि
kāṣāyavāsaso ye me bhaviṣyāḥ sādhavaśca taiḥ | kāryaṁ madarthapākādi turyāśramasthitairapi
जो काषाय वस्त्र धारण करने वाले भविष्य में मेरे साधु होंगे, उन चतुर्थाश्रमियों को भी मेरे लिए भोजन बनाने आदि का कार्य करना चाहिए।
श्लोक 32 (skanda.2.212.32)
श्रीवासुदेवभक्ता ये तीव्रवैराग्यशालिनः । तेषां धर्मस्तु तत्सेवा प्रोक्ताहस्सु च रात्रिषु
śrīvāsudevabhaktā ye tīvravairāgyaśālinaḥ | teṣāṁ dharmastu tatsevā proktāhassu ca rātriṣu
जो श्री वासुदेव के भक्त तीव्र वैराग्य से युक्त हैं, उनका धर्म तो दिन-रात उन्हीं की सेवा करना कहा गया है।
श्लोक 33 (skanda.2.212.33)
एकोपि च क्षणस्तेषां ज्ञानविज्ञानभूयसाम् । भक्तिं नवविधां विष्णोर्विना व्यर्थो न वै भवेत्
ekopi ca kṣaṇasteṣāṁ jñānavijñānabhūyasām | bhaktiṁ navavidhāṁ viṣṇorvinā vyartho na vai bhavet
ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण उन भक्तों का एक क्षण भी विष्णु की नवधा भक्ति के बिना व्यर्थ नहीं जाता।
श्लोक 34 (skanda.2.212.34)
सर्वेर्गुणैरुपेतोपि भगवद्विमुखो यदि । स्वजनोपि भवेत्तं तु जह्युरेव हि वैष्णवाः
sarverguṇairupetopi bhagavadvimukho yadi | svajanopi bhavettaṁ tu jahyureva hi vaiṣṇavāḥ
सब गुणों से सम्पन्न होने पर भी यदि कोई भगवान् से विमुख हो, तो वह अपना ही क्यों न हो, वैष्णवजन उसे अवश्य त्याग देते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.212.35)
प्रासादिकं हरेरन्नं प्रोक्षितं तत्पदाम्बुना । भुञ्जीरंस्तुलसीमिश्रं प्रत्यहं सात्वता जनाः
prāsādikaṁ harerannaṁ prokṣitaṁ tatpadāmbunā | bhuñjīraṁstulasīmiśraṁ pratyahaṁ sātvatā janāḥ
सात्वत जन प्रतिदिन हरि के चरणोदक से सिंचित और तुलसी-मिश्रित, हरि को अर्पित प्रसाद ग्रहण करें।
श्लोक 36 (skanda.2.212.36)
स्त्रीणां च स्त्रीषु सक्तानां प्रसंगो विष्णुचिन्तकैः । सर्वथैव परित्याज्यो भवेत्तद्ध्यानमन्यथा
strīṇāṁ ca strīṣu saktānāṁ prasaṁgo viṣṇucintakaiḥ | sarvathaiva parityājyo bhavettaddhyānamanyathā
विष्णु का चिन्तन करने वालों को स्त्रियों का और स्त्री-आसक्त पुरुषों का संग सर्वथा त्याज्य है, अन्यथा उनका ध्यान भंग हो जाता है।
श्लोक 37 (skanda.2.212.37)
भगवन्तं वासुदेवं विनैकमितरः पुमान् । कोपि नास्त्येव यो नारीं समीक्ष्य न विमुह्यति
bhagavantaṁ vāsudevaṁ vinaikamitaraḥ pumān | kopi nāstyeva yo nārīṁ samīkṣya na vimuhyati
भगवान् वासुदेव को छोड़कर अन्य कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो स्त्री को देखकर मोहित न हो जाए।
श्लोक 38 (skanda.2.212.38)
यत्र स्थित्या मुहुः स्त्रीणां स्यातां शब्दश्रुतीक्षणे । त्यागी तत्र वसेन्नैव वसन्धर्मच्युतो भवेत्
yatra sthityā muhuḥ strīṇāṁ syātāṁ śabdaśrutīkṣaṇe | tyāgī tatra vasennaiva vasandharmacyuto bhavet
जहाँ अपने रहने से बार-बार स्त्रियों का शब्द और दर्शन होता हो, त्यागी वहाँ कभी न रहे; रहने पर वह धर्म से च्युत हो जाता है।
श्लोक 39 (skanda.2.212.39)
कामो लोभो रसास्वादः स्नेहो मानस्तथा च रुट् । एते त्याज्याः प्रयत्नेन षड्दोषाः संसृतिप्रदाः
kāmo lobho rasāsvādaḥ sneho mānastathā ca ruṭ | ete tyājyāḥ prayatnena ṣaḍdoṣāḥ saṁsṛtipradāḥ
काम, लोभ, रसास्वाद, स्नेह, मान और क्रोध - संसार में बाँधने वाले इन छह दोषों को प्रयत्नपूर्वक त्यागना चाहिए।
श्लोक 40 (skanda.2.212.40)
प्रोक्तेषु धर्मेष्वेतेषु यस्ययस्य च्युतिर्भवेत् । यथाशक्ति यथाशास्त्रं कार्या तत्तस्य निष्कृतिः
prokteṣu dharmeṣveteṣu yasyayasya cyutirbhavet | yathāśakti yathāśāstraṁ kāryā tattasya niṣkṛtiḥ
इन कहे गए धर्मों में जिस-जिस से च्युति हो, उसके लिए यथाशक्ति और यथाशास्त्र प्रायश्चित्त करना चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.2.212.41)
इत्थं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां च नारद । धर्माः संक्षेपतः प्रोक्ता वैष्णवानां च ते मया
itthaṁ caturṇāṁ varṇānāmāśramāṇāṁ ca nārada | dharmāḥ saṁkṣepataḥ proktā vaiṣṇavānāṁ ca te mayā
हे नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हें चारों वर्णों और आश्रमों के तथा वैष्णवों के धर्म संक्षेप में कहे।
श्लोक 42 (skanda.2.212.42)
वर्णी यतिश्च धर्मस्थो ब्रह्मलोकमुपैति वै । ऋषिलोकं वनस्थश्च गृहस्थः स्वर्गमाप्नुयात्
varṇī yatiśca dharmastho brahmalokamupaiti vai | ṛṣilokaṁ vanasthaśca gṛhasthaḥ svargamāpnuyāt
धर्म में स्थित ब्रह्मचारी और यति ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं; वानप्रस्थी ऋषिलोक को और गृहस्थ स्वर्ग को प्राप्त करता है।
श्लोक 43 (skanda.2.212.43)
भक्त्या सहैताञ्छ्रीविष्णोराचरेयुस्तु ये जनाः । ते तु सर्वेपि देहान्ते विष्णुलोकमवाप्नुयुः
bhaktyā sahaitāñchrīviṣṇorācareyustu ye janāḥ | te tu sarvepi dehānte viṣṇulokamavāpnuyuḥ
किन्तु जो लोग भक्ति सहित इन धर्मों का आचरण करते हैं, वे सभी देहान्त होने पर विष्णुलोक को प्राप्त करते हैं।