वैष्णव खण्ड · अध्याय 213
ज्ञानस्वरूप-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.213.1)
श्रीनारायण उवाच । अथ ज्ञानस्वरूपं ते वच्मि सांख्येन निश्चितम् । क्षेत्रादि ज्ञायते येन तज्ज्ञानं हि निरुच्यते
śrīnārāyaṇa uvāca | atha jñānasvarūpaṁ te vacmi sāṁkhyena niścitam | kṣetrādi jñāyate yena tajjñānaṁ hi nirucyate
श्री नारायण ने कहा - अब मैं तुम्हें सांख्य के अनुसार निश्चित ज्ञान का स्वरूप बताता हूँ। जिसके द्वारा क्षेत्र आदि जाने जाते हैं, वही ज्ञान कहलाता है।
श्लोक 2 (skanda.2.213.2)
वासुदेवः परं ब्रह्म बृहत्यक्षरधामनि । आदावेकोऽद्वितीयोऽभून्निर्गुणो दिव्यविग्रहः
vāsudevaḥ paraṁ brahma bṛhatyakṣaradhāmani | ādāveko'dvitīyo'bhūnnirguṇo divyavigrahaḥ
वासुदेव ही परब्रह्म हैं; उस विशाल अक्षर धाम में आदि में वे अकेले, अद्वितीय, निर्गुण और दिव्य विग्रह वाले थे।
श्लोक 3 (skanda.2.213.3)
स कार्यमूलप्रकृतिः सकालाऽक्षरतेजसि । प्रकाशेऽर्कस्य रात्रीव तिरोभूता तदाऽभवत्
sa kāryamūlaprakṛtiḥ sakālā'kṣaratejasi | prakāśe'rkasya rātrīva tirobhūtā tadā'bhavat
वह कार्य की मूल प्रकृति, काल-शक्ति सहित, उस अक्षर तेज में उसी प्रकार छिपी रही, जैसे सूर्य के प्रकाश में रात्रि छिप जाती है।
श्लोक 4 (skanda.2.213.4)
सिसृक्षाथाभवत्तस्य ब्रह्माण्डानां यदा तदा । सकालाविर्बभूवादौ महामाया ततो हि सा
sisṛkṣāthābhavattasya brahmāṇḍānāṁ yadā tadā | sakālāvirbabhūvādau mahāmāyā tato hi sā
जब उन्हें ब्रह्माण्डों की सृष्टि की इच्छा हुई, तब वह महामाया काल के साथ पहले-पहल प्रकट हुई।
श्लोक 5 (skanda.2.213.5)
तां कालशक्तिमादाय वासुदेवोऽक्षरात्मना । सिसृक्षयैक्षत यदा सा चुक्षोभ तदैव हि
tāṁ kālaśaktimādāya vāsudevo'kṣarātmanā | sisṛkṣayaikṣata yadā sā cukṣobha tadaiva hi
उस काल-शक्ति को लेकर वासुदेव ने अक्षर-रूप से सृष्टि की इच्छा से उस पर दृष्टि डाली, और उसी क्षण वह क्षुब्ध हो उठी।
श्लोक 6 (skanda.2.213.6)
तस्याः प्रधानपुरुषकोटयो जज्ञिरे मुने । युज्यन्ते स्म प्रधानैस्ते पुरुषाश्चेच्छया प्रभोः
tasyāḥ pradhānapuruṣakoṭayo jajñire mune | yujyante sma pradhānaiste puruṣāścecchayā prabhoḥ
हे मुने! उससे करोड़ों प्रधान और पुरुष उत्पन्न हुए; और प्रभु की इच्छा से वे पुरुष प्रधानों से युक्त हुए।
श्लोक 7 (skanda.2.213.7)
पुमांसो निदधुर्गर्भांस्तेषु तेभ्यश्च जज्ञिरे । ब्रह्माण्डानि ह्यसङ्ख्यानि तत्रैकं तु विविच्यते
pumāṁso nidadhurgarbhāṁsteṣu tebhyaśca jajñire | brahmāṇḍāni hyasaṅkhyāni tatraikaṁ tu vivicyate
उन पुरुषों ने उनमें गर्भ स्थापित किए, और उनसे असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुए; उनमें से एक का यहाँ वर्णन किया जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.213.8)
आदौ जज्ञे महांस्तस्मात्पुंसो वीर्याद्धिरण्मयात् । अहङ्कारस्ततस्तस्माद्गुणाः सत्त्वादयस्त्रयः
ādau jajñe mahāṁstasmātpuṁso vīryāddhiraṇmayāt | ahaṅkārastatastasmādguṇāḥ sattvādayastrayaḥ
उस हिरण्मय पुरुष के वीर्य से पहले महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ, फिर उससे अहंकार, और अहंकार से सत्त्व आदि तीन गुण उत्पन्न हुए।
श्लोक 9 (skanda.2.213.9)
तमसः पञ्च तन्मात्रा महाभूतानि जज्ञिरे । दशेन्द्रियाणि रजसो बुद्ध्या सह महानसुः
tamasaḥ pañca tanmātrā mahābhūtāni jajñire | daśendriyāṇi rajaso buddhyā saha mahānasuḥ
तमोगुण से पाँच तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत उत्पन्न हुए; रजोगुण से बुद्धि सहित दस इन्द्रियाँ और महान् प्राण उत्पन्न हुए।
श्लोक 10 (skanda.2.213.10)
सत्त्वादिन्द्रियदेवाश्च जायन्ते स्म मनस्तथा । सामान्यतस्तत्त्वसंज्ञा एते देवाः प्रकीर्त्तिताः
sattvādindriyadevāśca jāyante sma manastathā | sāmānyatastattvasaṁjñā ete devāḥ prakīrttitāḥ
सत्त्वगुण से इन्द्रियों के देवता और मन उत्पन्न हुए; सामान्यतः ये सब तत्त्व-संज्ञक देवता कहे गए हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.213.11)
प्रेरिता वासुदेवेन स्वस्वांशैरैश्वरं वपुः । अजीजनन्विराट्सञ्ज्ञं ते चराचरसंश्रयम्
preritā vāsudevena svasvāṁśairaiśvaraṁ vapuḥ | ajījananvirāṭsañjñaṁ te carācarasaṁśrayam
वासुदेव द्वारा प्रेरित होकर इन सबने अपने-अपने अंशों से विराट् नामक ऐश्वर्य-सम्पन्न वह देह उत्पन्न की, जो चराचर का आश्रय है।
श्लोक 12 (skanda.2.213.12)
स च वैराजपुरुषः स्वसृष्टास्वप्स्वशेत यत् । तेन नारायण इति प्रोच्यते निगमादिभिः
sa ca vairājapuruṣaḥ svasṛṣṭāsvapsvaśeta yat | tena nārāyaṇa iti procyate nigamādibhiḥ
और चूँकि वह विराट् पुरुष अपने ही द्वारा रची गई जल-राशि में शयन करता है, इसलिए वेदादि उसे 'नारायण' कहते हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.213.13)
तन्नाभिपद्माद्ब्रह्मासीद्राजसोऽथ हृदम्बुजात् । जज्ञे विष्णुः सत्त्वगुणो ललाटात्तामसो हरः
tannābhipadmādbrahmāsīdrājaso'tha hṛdambujāt | jajñe viṣṇuḥ sattvaguṇo lalāṭāttāmaso haraḥ
उसकी नाभि-कमल से रजोगुणी ब्रह्मा हुए, हृदय-कमल से सत्त्वगुणी विष्णु उत्पन्न हुए, और ललाट से तमोगुणी हर उत्पन्न हुए।
श्लोक 14 (skanda.2.213.14)
एतेभ्य एव स्थानेभ्यस्तिस्र आसंश्च शक्तयः । तत्रासीत्तामसी दुर्गा सावित्री राजसी तथा । सात्त्विकी श्रीश्चेति सर्वा वस्त्रालंकारशोभिताः
etebhya eva sthānebhyastisra āsaṁśca śaktayaḥ | tatrāsīttāmasī durgā sāvitrī rājasī tathā | sāttvikī śrīśceti sarvā vastrālaṁkāraśobhitāḥ
इन्हीं स्थानों से तीन शक्तियाँ भी उत्पन्न हुईं - तमोगुणी दुर्गा, रजोगुणी सावित्री, और सत्त्वगुणी श्री - सभी वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित।
श्लोक 15 (skanda.2.213.15)
ता वैराजाज्ञया त्रींश्च ब्रह्मादीन्प्रतिपेदिरे । दुर्गा रुद्रं च सावित्री ब्रह्माणं विष्णुमन्तिमा
tā vairājājñayā trīṁśca brahmādīnpratipedire | durgā rudraṁ ca sāvitrī brahmāṇaṁ viṣṇumantimā
विराट् की आज्ञा से इन तीनों ने ब्रह्मादि तीनों को स्वीकार किया - दुर्गा ने रुद्र को, सावित्री ने ब्रह्मा को, और अन्तिम श्री ने विष्णु को।
श्लोक 16 (skanda.2.213.16)
चण्डिकाद्याश्च दुर्गाया अंशेनासन्सहस्रशः । त्रयीमुख्याश्च सावित्र्याः शक्तयोंशेन जज्ञिरे । दुस्सहाप्रमुखाश्चासन्नंशेनैव श्रियो मुने
caṇḍikādyāśca durgāyā aṁśenāsansahasraśaḥ | trayīmukhyāśca sāvitryāḥ śaktayoṁśena jajñire | dussahāpramukhāścāsannaṁśenaiva śriyo mune
चण्डिका आदि हजारों देवियाँ दुर्गा के अंश से उत्पन्न हुईं; तीनों वेदों की प्रमुख शक्तियाँ सावित्री के अंश से उत्पन्न हुईं; और हे मुने! दुस्सहा आदि श्री के मात्र अंश से उत्पन्न हुईं।
श्लोक 17 (skanda.2.213.17)
तत्रादितो यो ब्रह्मासीद्वैराजनाभिपद्मतः । एकार्णवे तदब्जस्थः स कश्चिदपि नैक्षत
tatrādito yo brahmāsīdvairājanābhipadmataḥ | ekārṇave tadabjasthaḥ sa kaścidapi naikṣata
उनमें से जो ब्रह्मा विराट् की नाभि-कमल से सबसे पहले उत्पन्न हुए, वे एकार्णव में उस कमल पर स्थित होकर कुछ भी नहीं देख सके।
श्लोक 18 (skanda.2.213.18)
विसर्गबुद्धिमप्राप्तो नात्मानं च विवेद सः । कोहं कुत इति ध्यायन्नदिदृक्षत्कजाश्रयम्
visargabuddhimaprāpto nātmānaṁ ca viveda saḥ | kohaṁ kuta iti dhyāyannadidṛkṣatkajāśrayam
उसे सृष्टि की समझ प्राप्त नहीं हुई थी और वह अपने आप को भी नहीं जानता था; 'मैं कौन हूँ, कहाँ से हूँ' - यह सोचता हुआ वह उस कमल के मूल को देखना चाहता था।
श्लोक 19 (skanda.2.213.19)
नालं प्रविश्याऽधो यातुस्तन्मूलं च विचिन्वतः । संवत्सरशतं यातं तस्य नान्तं तु सोलभत्
nālaṁ praviśyā'dho yātustanmūlaṁ ca vicinvataḥ | saṁvatsaraśataṁ yātaṁ tasya nāntaṁ tu solabhat
नाल में प्रवेश करके नीचे जाते हुए और उसकी जड़ खोजते हुए, उसे सौ वर्ष बीत गए, फिर भी उसे उसका अन्त नहीं मिला।
श्लोक 20 (skanda.2.213.20)
ऊर्ध्वं पुनरुपेत्याऽथ श्रान्तश्च निषसाद सः । अदृश्यमूर्तिर्भगवानूचे तपतपेति तम्
ūrdhvaṁ punarupetyā'tha śrāntaśca niṣasāda saḥ | adṛśyamūrtirbhagavānūce tapatapeti tam
फिर ऊपर लौटकर वह थका हुआ बैठ गया; तब अदृश्य स्वरूप वाले भगवान् ने उससे कहा - 'तप करो, तप करो'।
श्लोक 21 (skanda.2.213.21)
तच्छ्रुत्वा तत्प्रवक्तारमदृष्ट्वा च स सर्वतः । गुरूपदिष्टवत्तेपे दिव्यं वर्षसहस्रकम्
tacchrutvā tatpravaktāramadṛṣṭvā ca sa sarvataḥ | gurūpadiṣṭavattepe divyaṁ varṣasahasrakam
यह सुनकर, कहने वाले को कहीं भी न देखते हुए, उसने मानो गुरु के उपदेश के अनुसार एक हजार दिव्य वर्षों तक तप किया।
श्लोक 22 (skanda.2.213.22)
पद्मे तपस्यते तस्मै तपः शुद्धात्मने ततः । समाधौ दर्शयामास धाम वैकुण्ठमच्युतः
padme tapasyate tasmai tapaḥ śuddhātmane tataḥ | samādhau darśayāmāsa dhāma vaikuṇṭhamacyutaḥ
कमल पर तप करते हुए, शुद्ध आत्मा वाले उस ब्रह्मा को अच्युत भगवान् ने समाधि में वैकुण्ठधाम का दर्शन कराया।
श्लोक 23 (skanda.2.213.23)
प्राधानिका गुणा यत्र त्रयोपि रजआदयः । न भवन्त्यल्पमपि यत्कालमायाभयं न च
prādhānikā guṇā yatra trayopi rajaādayaḥ | na bhavantyalpamapi yatkālamāyābhayaṁ na ca
जहाँ रजोगुण आदि तीनों प्रधान गुण भी लेशमात्र नहीं होते, और जहाँ काल तथा माया का कोई भय नहीं है।
श्लोक 24 (skanda.2.213.24)
सहोदितार्कायुतवद्भास्वरे तत्र तेजसि । वासुदेवं ददर्शाऽसौ रम्यदिव्यासिताकृतिम्
sahoditārkāyutavadbhāsvare tatra tejasi | vāsudevaṁ dadarśā'sau ramyadivyāsitākṛtim
वहाँ, दस हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने जैसे उस देदीप्यमान तेज में, उसने रम्य, दिव्य, श्याम आकृति वाले वासुदेव को देखा।
श्लोक 25 (skanda.2.213.25)
चतुर्भुजं गदापद्मशंखचक्रधरं विभुम् । पीताम्बरं महारत्नकिरीटादिविभूषणम्
caturbhujaṁ gadāpadmaśaṁkhacakradharaṁ vibhum | pītāmbaraṁ mahāratnakirīṭādivibhūṣaṇam
वे चतुर्भुज, गदा-पद्म-शंख-चक्र धारण करने वाले, सर्वव्यापी, पीताम्बरधारी, महारत्नों के मुकुट आदि से विभूषित थे।
श्लोक 26 (skanda.2.213.26)
नन्दतार्क्ष्यादिभिर्ज्जुष्टं पार्षदैश्च चतुर्भुजैः । सिद्धिभिश्चाष्टभिः षड्भिर्बद्धाञ्जलिपुटैर्भगैः
nandatārkṣyādibhirjjuṣṭaṁ pārṣadaiśca caturbhujaiḥ | siddhibhiścāṣṭabhiḥ ṣaḍbhirbaddhāñjalipuṭairbhagaiḥ
नन्द, गरुड़ आदि, चतुर्भुज पार्षदों, आठों सिद्धियों और जुड़े हुए हाथों वाली छहों विभूतियों से वे सेवित थे।
श्लोक 27 (skanda.2.213.27)
सिंहासने श्रिया साकमुपविष्टं तमीश्वरम् । प्रणम्य प्राञ्जलिस्तस्थौ विरिञ्चो हृष्टमानसः
siṁhāsane śriyā sākamupaviṣṭaṁ tamīśvaram | praṇamya prāñjalistasthau viriñco hṛṣṭamānasaḥ
श्री के साथ सिंहासन पर विराजमान उस ईश्वर को प्रणाम करके, प्रसन्न मन वाले ब्रह्मा हाथ जोड़कर खड़े रहे।
श्लोक 28 (skanda.2.213.28)
तं प्राह भगवान्ब्रह्मंस्तुष्टोहं तपसा तव । वरं वरय मत्तस्त्वं स्वाभीष्टं यत्प्रियोसि मे
taṁ prāha bhagavānbrahmaṁstuṣṭohaṁ tapasā tava | varaṁ varaya mattastvaṁ svābhīṣṭaṁ yatpriyosi me
भगवान् ने उससे कहा - 'हे ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ; तुम मुझसे इच्छित वर माँगो, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।'
श्लोक 29 (skanda.2.213.29)
इत्युक्तस्तेन तं जानंस्तपसि प्रेरकं प्रभुम् । स्वं च विश्वसृजं ब्रह्मा ययाचेऽभिमतं वरम्
ityuktastena taṁ jānaṁstapasi prerakaṁ prabhum | svaṁ ca viśvasṛjaṁ brahmā yayāce'bhimataṁ varam
इस प्रकार कहे जाने पर, उन्हें अपने तप के प्रेरक प्रभु और स्वयं को विश्व का स्रष्टा जानते हुए, ब्रह्मा ने अभीष्ट वर माँगा।
श्लोक 30 (skanda.2.213.30)
प्रजाविसर्गशक्तिं मे देहि तुभ्यं नमः प्रभो । तत्रापि च न बद्ध्येयं यथा कुरु तथा कृपाम्
prajāvisargaśaktiṁ me dehi tubhyaṁ namaḥ prabho | tatrāpi ca na baddhyeyaṁ yathā kuru tathā kṛpām
'हे प्रभो! मुझे नमस्कार है; मुझे प्रजा उत्पन्न करने की शक्ति दीजिए, और यह कृपा भी करें कि उस कार्य में भी मैं बद्ध न होऊँ।'
श्लोक 31 (skanda.2.213.31)
ततस्तं भगवानूचे सेत्स्यते ते मनोरथः । वैराजेन मयात्मैक्यं भावयित्वा समाधिना । प्रजाः सृजाऽथ स्वासाध्ये कार्ये स्मर्योहमिष्टदः
tatastaṁ bhagavānūce setsyate te manorathaḥ | vairājena mayātmaikyaṁ bhāvayitvā samādhinā | prajāḥ sṛjā'tha svāsādhye kārye smaryohamiṣṭadaḥ
तब भगवान् ने उससे कहा - 'तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। समाधि द्वारा विराट्-रूप मेरे साथ अपनी एकता का भाव करके प्रजा उत्पन्न करो; और जो कार्य तुमसे न हो सके, उसमें इच्छाओं को पूर्ण करने वाले मुझे स्मरण करना।'
श्लोक 32 (skanda.2.213.32)
इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्माप्येकसमाधिना । वैराजेनाऽथ लोकान्प्राग्लीनान्सर्वान्स्व ऐक्षत
ityuktvāntardadhe viṣṇurbrahmāpyekasamādhinā | vairājenā'tha lokānprāglīnānsarvānsva aikṣata
ऐसा कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गए; और ब्रह्मा ने भी एकाग्र समाधि से विराट्-रूप के द्वारा पहले लीन हुए सभी लोकों को अपने भीतर देखा।
श्लोक 33 (skanda.2.213.33)
विसर्गशक्तिं संप्राप्य स सर्गाय मनो दधे । ब्रह्मज्योतिर्मयस्तावदादित्यः प्रादुरास ह
visargaśaktiṁ saṁprāpya sa sargāya mano dadhe | brahmajyotirmayastāvadādityaḥ prādurāsa ha
सृष्टि की शक्ति प्राप्त करके उसने सृजन में मन लगाया; तभी ब्रह्मतेज से युक्त सूर्य प्रकट हुआ।
श्लोक 34 (skanda.2.213.34)
स्थापयित्वाण्डमध्ये तं ततः स मनसाऽसृजत् । तपोभक्तिविशुद्धेन मुनीनाद्यांश्चतुःसनान्
sthāpayitvāṇḍamadhye taṁ tataḥ sa manasā'sṛjat | tapobhaktiviśuddhena munīnādyāṁścatuḥsanān
उसे ब्रह्माण्ड के मध्य स्थापित करके, तप और भक्ति से पवित्र मन द्वारा उसने पहले-पहल चारों सनक-आदि मुनियों को मानसिक रूप से उत्पन्न किया।
श्लोक 35 (skanda.2.213.35)
प्रजाः सृजत चेत्यूचे तांस्तदा ते तु तद्वचः । न जगृहुर्न्नैष्ठिकेन्द्रास्तेभ्यश्चुक्रोध विश्वसृट्
prajāḥ sṛjata cetyūce tāṁstadā te tu tadvacaḥ | na jagṛhurnnaiṣṭhikendrāstebhyaścukrodha viśvasṛṭ
उसने उनसे कहा - 'प्रजा उत्पन्न करो'; परन्तु आजीवन ब्रह्मचारियों में श्रेष्ठ वे उसकी बात न मानी, और विश्वस्रष्टा उनसे क्रुद्ध हो गए।
श्लोक 36 (skanda.2.213.36)
क्रुद्धस्य तस्य भालाच्च रुद्र आसीत्तमोमयः । मन्युं नियम्य मनसा प्रजेशान्सोऽसृजत्ततः
kruddhasya tasya bhālācca rudra āsīttamomayaḥ | manyuṁ niyamya manasā prajeśānso'sṛjattataḥ
उस क्रुद्ध ब्रह्मा के ललाट से तमोमय रुद्र उत्पन्न हुए; फिर मन से क्रोध को रोककर उन्होंने प्रजापतियों को उत्पन्न किया।
श्लोक 37 (skanda.2.213.37)
मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्यं च भृगुं क्रतुम् । वसिष्ठं कर्दमं चैव दक्षमंगिरसं तथा
marīcimatriṁ pulahaṁ pulastyaṁ ca bhṛguṁ kratum | vasiṣṭhaṁ kardamaṁ caiva dakṣamaṁgirasaṁ tathā
मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, भृगु, क्रतु, वसिष्ठ, कर्दम, तथा दक्ष और अंगिरा।
श्लोक 38 (skanda.2.213.38)
धर्मं ततः स हृदयादधर्मं पृष्ठतस्तथा । मनसः काममास्याच्च वाणीं क्रोधं भ्रुवोऽसृजत्
dharmaṁ tataḥ sa hṛdayādadharmaṁ pṛṣṭhatastathā | manasaḥ kāmamāsyācca vāṇīṁ krodhaṁ bhruvo'sṛjat
फिर उन्होंने हृदय से धर्म, पीठ से अधर्म, मन से काम, मुख से वाणी, और भौंहों से क्रोध उत्पन्न किया।
श्लोक 39 (skanda.2.213.39)
शौचं तपो दया सत्यमिति धर्मपदानि च । चतुर्भ्यो वदनेभ्यश्च चत्वारि ससृजे ततः
śaucaṁ tapo dayā satyamiti dharmapadāni ca | caturbhyo vadanebhyaśca catvāri sasṛje tataḥ
शौच, तप, दया और सत्य - ये धर्म के चार पद उन्होंने अपने चार मुखों से उत्पन्न किए।
श्लोक 40 (skanda.2.213.40)
ऋग्वेदं वदनात्पूर्वाद्यजुर्वेदं च दक्षिणात् । ससर्ज पश्चिमात्साम सौम्याच्चाथर्वसंज्ञितम्
ṛgvedaṁ vadanātpūrvādyajurvedaṁ ca dakṣiṇāt | sasarja paścimātsāma saumyāccātharvasaṁjñitam
पूर्व मुख से ऋग्वेद, दक्षिण मुख से यजुर्वेद, पश्चिम मुख से सामवेद, और उत्तर मुख से अथर्ववेद नामक वेद को उन्होंने उत्पन्न किया।
श्लोक 41 (skanda.2.213.41)
इतिहासपुराणानि यज्ञान्विप्रशतं तथा । वस्वादित्यमरुद्विश्वान्साध्यांश्च मुखतोऽसृजत्
itihāsapurāṇāni yajñānvipraśataṁ tathā | vasvādityamarudviśvānsādhyāṁśca mukhato'sṛjat
अपने मुखों से उन्होंने इतिहास-पुराण, यज्ञ, सौ प्रकार के विप्र, तथा वसु, आदित्य, मरुत्, विश्वेदेव और साध्यगण भी उत्पन्न किए।
श्लोक 42 (skanda.2.213.42)
बाहुभ्यः क्षत्रियशतमूरुभ्यां च विशां शतम् । पद्भ्यां शूद्रशतं चैतान्ससर्ज सह वृत्तिभिः
bāhubhyaḥ kṣatriyaśatamūrubhyāṁ ca viśāṁ śatam | padbhyāṁ śūdraśataṁ caitānsasarja saha vṛttibhiḥ
भुजाओं से सौ प्रकार के क्षत्रिय, जंघाओं से सौ प्रकार के वैश्य, और चरणों से सौ प्रकार के शूद्र - इन सबको उन्होंने उनकी वृत्तियों सहित उत्पन्न किया।
श्लोक 43 (skanda.2.213.43)
ब्रह्मचर्यं च हृदयाद्गार्हस्थ्यं जघनस्थलात् । वनाश्रमं तथोरस्तः संन्यासं शिरसोऽसृजत्
brahmacaryaṁ ca hṛdayādgārhasthyaṁ jaghanasthalāt | vanāśramaṁ tathorastaḥ saṁnyāsaṁ śiraso'sṛjat
हृदय से ब्रह्मचर्य, कटि-प्रदेश से गार्हस्थ्य, वक्षःस्थल से वानप्रस्थ, और सिर से संन्यास आश्रम को उन्होंने उत्पन्न किया।
श्लोक 44 (skanda.2.213.44)
वक्षःस्थलात्पितृगणानसुराञ्जघनस्थलात् । ससर्ज च गुदान्मृत्युं निर्ऋतिं निरयांश्च सः
vakṣaḥsthalātpitṛgaṇānasurāñjaghanasthalāt | sasarja ca gudānmṛtyuṁ nirṛtiṁ nirayāṁśca saḥ
वक्षःस्थल से पितृगण, कटि-प्रदेश से असुर, और गुदा से मृत्यु, निर्ऋति तथा नरकों को उन्होंने उत्पन्न किया।
श्लोक 45 (skanda.2.213.45)
गन्धर्वांश्चारणान्सिद्धान्सर्पान्यक्षांश्च राक्षसान् । नगान्मेघान्विद्युतश्च समुद्रान्सरितस्तथा
gandharvāṁścāraṇānsiddhānsarpānyakṣāṁśca rākṣasān | nagānmeghānvidyutaśca samudrānsaritastathā
गन्धर्व, चारण, सिद्ध, सर्प, यक्ष और राक्षस; पर्वत, मेघ, बिजली, समुद्र और नदियाँ भी उन्होंने उत्पन्न कीं।
श्लोक 46 (skanda.2.213.46)
वृक्षान्पशून्पक्षिणश्च सर्वान्स्थावरजङ्गमान् । स्वाङ्गेभ्य एव सोस्राक्षीद्ब्रह्मा नारायणात्मकः
vṛkṣānpaśūnpakṣiṇaśca sarvānsthāvarajaṅgamān | svāṅgebhya eva sosrākṣīdbrahmā nārāyaṇātmakaḥ
वृक्ष, पशु, पक्षी और सभी स्थावर-जंगम प्राणियों को नारायणस्वरूप ब्रह्मा ने अपने ही अंगों से उत्पन्न किया।
श्लोक 47 (skanda.2.213.47)
सृष्टिमेतां विलोक्यापि नातिप्रीतो यदा तदा । हरिं ध्यात्वा स ससृजे तपोविद्यासमाधिभिः । ऋषीन्स्वायम्भुवादींश्च मनूंश्च मनुजानपि
sṛṣṭimetāṁ vilokyāpi nātiprīto yadā tadā | hariṁ dhyātvā sa sasṛje tapovidyāsamādhibhiḥ | ṛṣīnsvāyambhuvādīṁśca manūṁśca manujānapi
इस सृष्टि को देखकर भी वे अधिक प्रसन्न नहीं हुए; तब हरि का ध्यान करके, तप, विद्या और समाधि द्वारा उन्होंने स्वायम्भुव आदि ऋषियों, मनुओं तथा मनुष्यों को भी उत्पन्न किया।
श्लोक 48 (skanda.2.213.48)
ततः प्रीतः स सर्वेषां निवासाय यथोचितम् । स्वर्लोकं च भुवर्लोकं भूर्लोकं समकल्पयत्
tataḥ prītaḥ sa sarveṣāṁ nivāsāya yathocitam | svarlokaṁ ca bhuvarlokaṁ bhūrlokaṁ samakalpayat
तब प्रसन्न होकर उन्होंने सबके निवास के लिए उचित रूप से स्वर्लोक, भुवर्लोक और भूर्लोक की रचना की।
श्लोक 49 (skanda.2.213.49)
येषां तु यादृशं कर्म प्राक्कालीनं हि तान्विधिः । संस्थाप्य तादृशे स्थाने वृत्तीस्तेषामकल्पयत्
yeṣāṁ tu yādṛśaṁ karma prākkālīnaṁ hi tānvidhiḥ | saṁsthāpya tādṛśe sthāne vṛttīsteṣāmakalpayat
जिसका जैसा पूर्वकालिक कर्म था, विधाता ने उसे वैसे ही स्थान में स्थापित करके उसकी वृत्ति निश्चित की।
श्लोक 50 (skanda.2.213.50)
देवानाममृतं नॄणामृषीणां चान्नमोषधीः । यक्षरक्षोसुरव्याघ्रसर्पादीनां सुरामिषम् । चक्लृपे गोमृगादीनां वृत्तिं स यवसादि च
devānāmamṛtaṁ nṝṇāmṛṣīṇāṁ cānnamoṣadhīḥ | yakṣarakṣosuravyāghrasarpādīnāṁ surāmiṣam | caklṛpe gomṛgādīnāṁ vṛttiṁ sa yavasādi ca
देवताओं के लिए अमृत, मनुष्यों और ऋषियों के लिए अन्न और औषधियाँ, यक्ष-राक्षस-असुर-व्याघ्र-सर्पादि के लिए मदिरा और मांस, तथा गौ-मृगादि के लिए घास आदि की वृत्ति उन्होंने निश्चित की।
श्लोक 51 (skanda.2.213.51)
स देवानां तु विश्वेषां हव्यं वृत्तिमकल्पयत् । अमूर्तानां च मूर्तानां पितॄणां कव्यमेव च
sa devānāṁ tu viśveṣāṁ havyaṁ vṛttimakalpayat | amūrtānāṁ ca mūrtānāṁ pitṝṇāṁ kavyameva ca
उन्होंने समस्त देवताओं के लिए हव्य को वृत्ति के रूप में निश्चित किया, तथा अमूर्त और मूर्त पितरों के लिए कव्य को।
श्लोक 52 (skanda.2.213.52)
दुर्गोद्भवानां शक्तीनां तदुपासनतत्परैः । दैत्यरक्षःपिशाचाद्यैर्दत्तं मद्यामिषादि च
durgodbhavānāṁ śaktīnāṁ tadupāsanatatparaiḥ | daityarakṣaḥpiśācādyairdattaṁ madyāmiṣādi ca
दुर्गा से उत्पन्न शक्तियों के लिए, उनकी उपासना में तत्पर दैत्य-राक्षस-पिशाचादि द्वारा दिया गया मद्य-मांसादि निश्चित हुआ।
श्लोक 53 (skanda.2.213.53)
तथा सावित्र्युद्भवानां शक्तीनां तदुपासकैः । दत्तमृष्यादिभिर्यज्ञे मुन्यन्नं चान्नमोषधीः
tathā sāvitryudbhavānāṁ śaktīnāṁ tadupāsakaiḥ | dattamṛṣyādibhiryajñe munyannaṁ cānnamoṣadhīḥ
इसी प्रकार सावित्री से उत्पन्न शक्तियों के लिए, उनके उपासक ऋषियों द्वारा यज्ञ में दिया गया मुनि-अन्न तथा अन्न-औषधियाँ निश्चित हुईं।
श्लोक 54 (skanda.2.213.54)
श्रीजातानां च शक्तीनां तदुपास्तिपरायणैः । दत्तं देवासुरनरैः पायसाज्यसितादि च
śrījātānāṁ ca śaktīnāṁ tadupāstiparāyaṇaiḥ | dattaṁ devāsuranaraiḥ pāyasājyasitādi ca
श्री से उत्पन्न शक्तियों के लिए, उनकी उपासना में लगे देव-असुर-मनुष्यों द्वारा दिया गया खीर, घी, चीनी आदि निश्चित हुआ।
श्लोक 55 (skanda.2.213.55)
प्रजापतीनां स पतिस्ततः प्राहाऽखिलाः प्रजाः । इज्या देवाश्च पितरो हव्यकव्यात्मकैर्मखैः
prajāpatīnāṁ sa patistataḥ prāhā'khilāḥ prajāḥ | ijyā devāśca pitaro havyakavyātmakairmakhaiḥ
तब प्रजापतियों के स्वामी उन ब्रह्मा ने सभी प्रजाओं से कहा - देवता और पितर हव्य-कव्यमय यज्ञों से पूजनीय हैं।
श्लोक 56 (skanda.2.213.56)
इष्टाः संपूरयिष्यन्ति ह्येते युष्मन्मनोरथान् । एतान्ये नार्चयिष्यन्ति ते वै निरयगामिनः
iṣṭāḥ saṁpūrayiṣyanti hyete yuṣmanmanorathān | etānye nārcayiṣyanti te vai nirayagāminaḥ
'पूजित होने पर ये तुम्हारे मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे; और जो इनकी पूजा नहीं करेंगे, वे निश्चय ही नरकगामी होंगे।'
श्लोक 57 (skanda.2.213.57)
इत्थं कृता हि मर्यादा तेन नारायणात्मना । दैवं पित्र्यमतो नित्यं जनैः कार्यं यथाविधि
itthaṁ kṛtā hi maryādā tena nārāyaṇātmanā | daivaṁ pitryamato nityaṁ janaiḥ kāryaṁ yathāvidhi
इस प्रकार नारायणस्वरूप उन्होंने यह मर्यादा स्थापित की; इसलिए मनुष्यों को नित्य देव और पितृ कर्म विधिपूर्वक करने चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.2.213.58)
ततो ब्रह्मा स सर्वेषां धर्मसेत्ववनाय च । तत्तज्जातिषु ये मुख्यास्तान्मनूंश्चाप्यतिष्ठिपत्
tato brahmā sa sarveṣāṁ dharmasetvavanāya ca | tattajjātiṣu ye mukhyāstānmanūṁścāpyatiṣṭhipat
तब ब्रह्मा ने सबके धर्म-सेतु की रक्षा के लिए, उन-उन जातियों में जो श्रेष्ठ थे, उन्हें मनु के पद पर प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 59 (skanda.2.213.59)
वासुदेवेच्छयैवेत्थं वैराजाद्ब्रह्मरूपिणः । कल्पेकल्पे भवत्येव सृष्टिर्बहुविधा मुने
vāsudevecchayaivetthaṁ vairājādbrahmarūpiṇaḥ | kalpekalpe bhavatyeva sṛṣṭirbahuvidhā mune
हे मुने! इस प्रकार वासुदेव की ही इच्छा से, ब्रह्मरूपी विराट् पुरुष से प्रत्येक कल्प में विविध प्रकार की सृष्टि होती है।
श्लोक 60 (skanda.2.213.60)
प्राक्कल्पे यादृशी संज्ञा वेदाः शास्त्राणि च क्रियाः । कल्पेऽन्ये तादृशाः सर्वे धर्माः स्युश्चाऽधिकारिणः
prākkalpe yādṛśī saṁjñā vedāḥ śāstrāṇi ca kriyāḥ | kalpe'nye tādṛśāḥ sarve dharmāḥ syuścā'dhikāriṇaḥ
पूर्व कल्प में जैसी संज्ञाएँ, वेद, शास्त्र और क्रियाएँ थीं, दूसरे कल्प में भी वैसे ही सब धर्म और उनके अधिकारी होते हैं।
श्लोक 61 (skanda.2.213.61)
विष्णुर्यः कथितः सोपि वैराजपुरुषात्मकः । पोषयत्यखिलाँल्लोकान्मर्यादाः परिपालयन्
viṣṇuryaḥ kathitaḥ sopi vairājapuruṣātmakaḥ | poṣayatyakhilā̃llokānmaryādāḥ paripālayan
जो विष्णु कहे गए हैं, वे भी विराट् पुरुषस्वरूप ही हैं; वे मर्यादाओं का पालन करते हुए समस्त लोकों का पोषण करते हैं।
श्लोक 62 (skanda.2.213.62)
मन्वादिभिः पाल्यमानाः सेतवस्त्वसुरैर्यदा । कामरूपैर्विभिद्यन्ते वासुदेवस्तदा स्वयम् । ब्रह्मादिभिः प्रार्थ्यमानः प्रादुर्भवति भूतले
manvādibhiḥ pālyamānāḥ setavastvasurairyadā | kāmarūpairvibhidyante vāsudevastadā svayam | brahmādibhiḥ prārthyamānaḥ prādurbhavati bhūtale
किन्तु जब मन्वादि द्वारा रक्षित मर्यादाएँ कामरूपधारी असुरों द्वारा भंग की जाती हैं, तब ब्रह्मादि द्वारा प्रार्थित होकर वासुदेव स्वयं भूतल पर प्रकट होते हैं।
श्लोक 63 (skanda.2.213.63)
अवतारा भगवतो भूता भाव्याश्च सन्ति ये । कर्तुं न शक्यते तेषां संख्यां संख्याविशारदैः
avatārā bhagavato bhūtā bhāvyāśca santi ye | kartuṁ na śakyate teṣāṁ saṁkhyāṁ saṁkhyāviśāradaiḥ
भगवान् के जो अवतार हो चुके हैं और जो भविष्य में होंगे, गणना में निपुण लोग भी उनकी संख्या नहीं कर सकते।
श्लोक 64 (skanda.2.213.64)
सद्धर्मदेवसाधूनां गुप्त्यै तद्द्रोहिमृत्यवे । श्रेयसे सर्वभूतानामाविर्भावोस्ति सत्पतेः
saddharmadevasādhūnāṁ guptyai taddrohimṛtyave | śreyase sarvabhūtānāmāvirbhāvosti satpateḥ
सत्पुरुषों के स्वामी का प्राकट्य सद्धर्म, देवताओं और साधुओं की रक्षा के लिए, उनके शत्रुओं के विनाश के लिए, तथा समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए होता है।
श्लोक 65 (skanda.2.213.65)
स वासुदेवः प्रकृतौ पुंसि कार्येषु चैतयोः । अन्वितश्च पृथक्चास्ते सर्वाधीशः स्वधामनि
sa vāsudevaḥ prakṛtau puṁsi kāryeṣu caitayoḥ | anvitaśca pṛthakcāste sarvādhīśaḥ svadhāmani
वे वासुदेव प्रकृति में, पुरुष में और दोनों के कार्यों में अन्वित रहते हुए भी पृथक् रहते हैं, तथा सबके स्वामी अपने ही धाम में स्थित रहते हैं।
श्लोक 66 (skanda.2.213.66)
व्याप्य स्वांशैरिमाँल्लोकान्यथाग्निवरुणादयः । स्वस्त्यासते स्वस्वलोके तथैष भगवान्मुने
vyāpya svāṁśairimā̃llokānyathāgnivaruṇādayaḥ | svastyāsate svasvaloke tathaiṣa bhagavānmune
जैसे अग्नि, वरुण आदि अपने अंशों से इन लोकों में व्याप्त होकर भी अपने-अपने लोक में सुखपूर्वक रहते हैं, वैसे ही हे मुने! ये भगवान् भी रहते हैं।
श्लोक 67 (skanda.2.213.67)
सर्गात्प्राक्सच्चिदानन्दः शुद्ध एकश्च निर्गुणः । यथासीत्तादृगेवासावन्वितोप्यस्ति निर्मलः
sargātprāksaccidānandaḥ śuddha ekaśca nirguṇaḥ | yathāsīttādṛgevāsāvanvitopyasti nirmalaḥ
सृष्टि से पहले वे जैसे सच्चिदानन्द, शुद्ध, एक और निर्गुण थे, वैसे ही अन्वित होने पर भी वे निर्मल बने रहते हैं।
श्लोक 68 (skanda.2.213.68)
वायुतेजोजलक्ष्मासु तत्तत्कार्येषु खं यथा । अन्वीयाप्यस्ति निर्लेपं यथा पूर्वं तथैष हि
vāyutejojalakṣmāsu tattatkāryeṣu khaṁ yathā | anvīyāpyasti nirlepaṁ yathā pūrvaṁ tathaiṣa hi
जैसे आकाश वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में तथा उनके कार्यों में व्याप्त रहकर भी निर्लिप्त रहता है, वैसे ही ये भी पहले की भाँति निर्लिप्त रहते हैं।
श्लोक 69 (skanda.2.213.69)
सर्वोपास्यो नियन्ता च व्यापकश्चैष कीर्तितः । आत्यन्तिके लयेऽथैष भवत्येव यथा पुरा
sarvopāsyo niyantā ca vyāpakaścaiṣa kīrtitaḥ | ātyantike laye'thaiṣa bhavatyeva yathā purā
वे सबके उपास्य, नियन्ता और व्यापक कहे गए हैं; अन्तिम प्रलय में भी वे पहले की ही भाँति रहते हैं।
श्लोक 70 (skanda.2.213.70)
वैराजः पुरुषो योऽत्र प्रोक्तोऽसावीश्वराभिधः । ज्ञेयः स्वतन्त्रः सर्वज्ञो वश्यमायश्च नारद
vairājaḥ puruṣo yo'tra prokto'sāvīśvarābhidhaḥ | jñeyaḥ svatantraḥ sarvajño vaśyamāyaśca nārada
हे नारद! यहाँ जिस विराट् पुरुष का वर्णन हुआ, वे ही ईश्वर नाम से जाने जाते हैं; उन्हें स्वतन्त्र, सर्वज्ञ और माया को वश में रखने वाला जानो।
श्लोक 71 (skanda.2.213.71)
एतस्यैव स्वरूपाणि ब्रह्मविष्णुशिवास्त्रयः । रजआदिगुणोपेताः स्वगुणानुगुणक्रियाः
etasyaiva svarūpāṇi brahmaviṣṇuśivāstrayaḥ | rajaādiguṇopetāḥ svaguṇānuguṇakriyāḥ
ब्रह्मा, विष्णु और शिव - ये तीनों इसी के स्वरूप हैं, रजोगुण आदि गुणों से युक्त तथा अपने-अपने गुणों के अनुरूप क्रिया करने वाले।
श्लोक 72 (skanda.2.213.72)
ब्रह्मणो ये समुत्पन्ना देवासुरनरादयः । ते जीवसंज्ञा ह्यल्पज्ञाः परतन्त्रा भवन्ति च
brahmaṇo ye samutpannā devāsuranarādayaḥ | te jīvasaṁjñā hyalpajñāḥ paratantrā bhavanti ca
ब्रह्मा से उत्पन्न हुए जो देव, असुर, मनुष्य आदि हैं, वे जीव कहलाते हैं; वे अल्पज्ञ और परतन्त्र होते हैं।
श्लोक 73 (skanda.2.213.73)
जीवानामीश्वराणां च तनवः क्षेत्रसञ्ज्ञकाः । महदादितत्त्वमय्यः क्षेत्रज्ञाख्यास्तु तद्विदः
jīvānāmīśvarāṇāṁ ca tanavaḥ kṣetrasañjñakāḥ | mahadāditattvamayyaḥ kṣetrajñākhyāstu tadvidaḥ
जीवों और ईश्वरों के महत्तत्त्वादि से बने शरीर 'क्षेत्र' कहलाते हैं; उनके ज्ञाता 'क्षेत्रज्ञ' कहे जाते हैं।
श्लोक 74 (skanda.2.213.74)
क्षेत्राणां च क्षेत्रविदां प्रधानपुरुषस्य च । मायायाः कालशक्तेश्चाऽक्षरस्य च परात्मनः । पृथक्पृथग्लक्षणैर्यज्ज्ञानं तज्ज्ञानमुच्यते
kṣetrāṇāṁ ca kṣetravidāṁ pradhānapuruṣasya ca | māyāyāḥ kālaśakteścā'kṣarasya ca parātmanaḥ | pṛthakpṛthaglakṣaṇairyajjñānaṁ tajjñānamucyate
क्षेत्रों, क्षेत्रज्ञों, प्रधान, पुरुष, माया, काल-शक्ति और परमात्मा अक्षर - इन सबको उनके पृथक्-पृथक् लक्षणों से जो जाना जाता है, वही ज्ञान कहलाता है।