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वैष्णव खण्ड · अध्याय 214

वैराग्य-भक्ति-निरूपण

अध्याय 213अध्याय-सूचीअध्याय 215

श्लोक 1 (skanda.2.214.1)

श्रीनारायण उवाच । वैराग्यस्याथ ते वच्मि लक्षणं मुनिसत्तम । क्षयिष्णुवस्तुष्वरुचिः सर्वथेति तदीरितम्

śrīnārāyaṇa uvāca | vairāgyasyātha te vacmi lakṣaṇaṁ munisattama | kṣayiṣṇuvastuṣvaruciḥ sarvatheti tadīritam

श्री नारायण ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें वैराग्य का लक्षण बताता हूँ; नाशवान वस्तुओं में सर्वथा अरुचि होना ही वैराग्य कहा गया है।

श्लोक 2 (skanda.2.214.2)

आरभ्य मायापुरुषात्सर्वा ह्याकृतयस्तु याः । कालशक्त्या भगवतो नाश्यन्ते ताश्च तद्वशाः

ārabhya māyāpuruṣātsarvā hyākṛtayastu yāḥ | kālaśaktyā bhagavato nāśyante tāśca tadvaśāḥ

माया और पुरुष से लेकर जो भी आकृतियाँ हैं, वे सब भगवान् की काल-शक्ति द्वारा नष्ट होती हैं और उसी के वश में रहती हैं।

श्लोक 3 (skanda.2.214.3)

प्रत्यक्षेणानुमानेन शाब्देन च विवेकिभिः । असत्यता कृतीनां च निश्चिता सत्यतात्मनाम्

pratyakṣeṇānumānena śābdena ca vivekibhiḥ | asatyatā kṛtīnāṁ ca niścitā satyatātmanām

प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द-प्रमाण द्वारा विवेकी पुरुषों ने कृत (रचित) वस्तुओं की असत्यता और आत्मा की सत्यता निश्चित की है।

श्लोक 4 (skanda.2.214.4)

नित्येन प्रलयेनैष कालो नैमित्तिकेन च । प्राकृतिकेन रूपेण चरत्यात्यन्तिकेन च

nityena pralayenaiṣa kālo naimittikena ca | prākṛtikena rūpeṇa caratyātyantikena ca

यह काल नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृतिक प्रलय और आत्यन्तिक प्रलय - इन रूपों में गति करता है।

श्लोक 5 (skanda.2.214.5)

देहिदेहा इमे नित्यं क्षीयन्ते परिणामिनः । क्रमेण दृश्यते यत्र बाल्यतारुण्यवार्द्धकम्

dehidehā ime nityaṁ kṣīyante pariṇāminaḥ | krameṇa dṛśyate yatra bālyatāruṇyavārddhakam

देहधारियों के ये शरीर परिवर्तनशील होकर नित्य क्षीण होते रहते हैं, जिनमें क्रमशः बाल्य, तारुण्य और वार्धक्य देखे जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.2.214.6)

सूक्ष्मत्वान्नेक्ष्यते तत्तु गतिर्दीपार्चिषो यथा । फलवृद्धिर्वाऽनुपदं जायमाना द्रुमे यथा

sūkṣmatvānnekṣyate tattu gatirdīpārciṣo yathā | phalavṛddhirvā'nupadaṁ jāyamānā drume yathā

सूक्ष्म होने के कारण यह क्षय दिखाई नहीं देता, जैसे दीपक की लौ की गति नहीं दिखती, या जैसे वृक्ष में फल की वृद्धि क्षण-क्षण होती हुई भी नहीं दिखती।

श्लोक 7 (skanda.2.214.7)

तस्यांतस्यामवस्थायां दुःखं च महदीक्ष्यते । जाग्रदादिष्ववस्थासु दुःखं चैव पुनःपुनः

tasyāṁtasyāmavasthāyāṁ duḥkhaṁ ca mahadīkṣyate | jāgradādiṣvavasthāsu duḥkhaṁ caiva punaḥpunaḥ

शरीर की प्रत्येक अवस्था में महान् दुःख देखा जाता है; जाग्रत आदि अवस्थाओं में भी बार-बार दुःख होता है।

श्लोक 8 (skanda.2.214.8)

दुःखमाध्यात्मिकं भूरि दृश्यते चाधिभौतिकम् । आधिदैविकमप्यत्र दुःखमेवास्ति देहिनाम्

duḥkhamādhyātmikaṁ bhūri dṛśyate cādhibhautikam | ādhidaivikamapyatra duḥkhamevāsti dehinām

देहधारियों को यहाँ अधिकतर आध्यात्मिक और आधिभौतिक दुःख दिखाई देता है, तथा आधिदैविक दुःख भी विद्यमान है।

श्लोक 9 (skanda.2.214.9)

हाहा ममार मत्पुत्रो हा पत्नी म्रियते मम । तातं मेऽभक्षयद्व्याघ्रो दष्टा सर्पेण मे वधूः

hāhā mamāra matputro hā patnī mriyate mama | tātaṁ me'bhakṣayadvyāghro daṣṭā sarpeṇa me vadhūḥ

'हाय, मेरा पुत्र मर गया! हाय, मेरी पत्नी मर रही है! बाघ ने मेरे पिता को खा लिया! सर्प ने मेरी वधू को डस लिया!'

श्लोक 10 (skanda.2.214.10)

महासौधोग्निना दग्धो हाहा सोपस्करोऽद्य मे । स्वकुटुम्बं कथं पोक्ष्ये नावर्षत्पाकशासनः

mahāsaudhogninā dagdho hāhā sopaskaro'dya me | svakuṭumbaṁ kathaṁ pokṣye nāvarṣatpākaśāsanaḥ

'मेरा विशाल भवन साज-सामान सहित आज अग्नि से जल गया! अब मैं अपने परिवार का पालन कैसे करूँ? इन्द्र ने वर्षा नहीं की!'

श्लोक 11 (skanda.2.214.11)

सस्यैः समृद्धं मत्क्षेत्रं हाहा दग्धं हिमाग्निना । ह्रियन्ते तस्करैर्गावः सर्वस्वं मम लुण्ठितम्

sasyaiḥ samṛddhaṁ matkṣetraṁ hāhā dagdhaṁ himāgninā | hriyante taskarairgāvaḥ sarvasvaṁ mama luṇṭhitam

'फसलों से समृद्ध मेरा खेत हिम-अग्नि (पाले) से जल गया! चोर मेरी गायों को हर ले जा रहे हैं, मेरा सर्वस्व लुट गया!'

श्लोक 12 (skanda.2.214.12)

नृपेण दण्डितोऽत्यर्थं शत्रुणा हाऽतिताडितः । किं करोमि च कं ब्रूयां माता मे व्यभिचारिणी

nṛpeṇa daṇḍito'tyarthaṁ śatruṇā hā'titāḍitaḥ | kiṁ karomi ca kaṁ brūyāṁ mātā me vyabhicāriṇī

'राजा ने मुझे अत्यधिक दण्ड दिया, शत्रु ने मुझे बुरी तरह पीटा! मैं क्या करूँ, किससे कहूँ - मेरी माता ही व्यभिचारिणी निकली!'

श्लोक 13 (skanda.2.214.13)

विषं पास्यामि हाहाऽद्य मत्पत्नीं शत्रुराकृषत् । हा स्वसा मे हृता म्लेच्छैर्हाहाऽरिः प्राप मर्मभित्

viṣaṁ pāsyāmi hāhā'dya matpatnīṁ śatrurākṛṣat | hā svasā me hṛtā mlecchairhāhā'riḥ prāpa marmabhit

'मैं आज विष पी लूँगा! शत्रु मेरी पत्नी को खींच ले गया! हाय, मेरी बहन को म्लेच्छों ने हर लिया! हाय, मेरे शत्रु ने मेरी सबसे कमजोर नस पकड़ ली!'

श्लोक 14 (skanda.2.214.14)

प्रिये ज्वरातिव्यथया यमदूता इमे हहा । इत्थं रोरूयमाणा हि दृश्यन्ते सर्वतो जनाः

priye jvarātivyathayā yamadūtā ime hahā | itthaṁ rorūyamāṇā hi dṛśyante sarvato janāḥ

'हे प्रिये, ज्वर की भारी पीड़ा से - हाय, ये यमदूत आ गए!' - इस प्रकार चिल्लाते हुए लोग सर्वत्र दिखाई देते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.214.15)

अवस्थानां शरीरस्य जन्ममृत्यू प्रतिक्षणम् । कालेन प्राप्नुवद्भिः स्वं प्रारब्धं दुःखमश्यते

avasthānāṁ śarīrasya janmamṛtyū pratikṣaṇam | kālena prāpnuvadbhiḥ svaṁ prārabdhaṁ duḥkhamaśyate

शरीर की अवस्थाओं में प्रतिक्षण जन्म-मृत्यु होती रहती है; काल से प्राप्त होकर प्राणी अपने प्रारब्ध का दुःख भोगते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.214.16)

प्रारब्धान्ते मृत्युदुःखं भवत्यप्रतिमं हि तत् । मृत्वापि च महद्दुःखं प्राप्यते यमयातनाः

prārabdhānte mṛtyuduḥkhaṁ bhavatyapratimaṁ hi tat | mṛtvāpi ca mahadduḥkhaṁ prāpyate yamayātanāḥ

प्रारब्ध के अन्त में मृत्यु का दुःख होता है, जो अनुपम है; मरने के बाद भी यमयातनाओं का महान् दुःख प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.2.214.17)

ततो जरायुजोद्भिज्जस्वेदजाण्डजयोनिषु । भूत्वाभूत्वा यथाकर्म म्रियते दुःखितैः पुनः

tato jarāyujodbhijjasvedajāṇḍajayoniṣu | bhūtvābhūtvā yathākarma mriyate duḥkhitaiḥ punaḥ

फिर जरायुज, उद्भिज्ज, स्वेदज और अण्डज योनियों में बार-बार जन्म लेकर, अपने कर्मानुसार दुःखी होकर पुनः मर जाता है।

श्लोक 18 (skanda.2.214.18)

नित्यः प्रलय एवं ते कीर्त्तितः सूक्ष्मया दृशा । स ज्ञेयोऽथ मुने वच्मि लयं नैमित्तिकाभिधम्

nityaḥ pralaya evaṁ te kīrttitaḥ sūkṣmayā dṛśā | sa jñeyo'tha mune vacmi layaṁ naimittikābhidham

इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से देखा गया यह नित्य प्रलय तुम्हें बताया गया; अब हे मुने! मैं नैमित्तिक प्रलय का वर्णन करता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.2.214.19)

निमित्तीकृत्य रजनीं भवेद्विश्वसृजस्तु यः । नैमित्तिकः स कथितो लयो दैनंदिनश्च सः

nimittīkṛtya rajanīṁ bhavedviśvasṛjastu yaḥ | naimittikaḥ sa kathito layo dainaṁdinaśca saḥ

विश्व के स्रष्टा की रात्रि के निमित्त से जो प्रलय होता है, वही नैमित्तिक प्रलय कहा गया है, और वही दैनिक प्रलय भी है।

श्लोक 20 (skanda.2.214.20)

चतुर्युगानां साहस्रं दिनं विश्वसृजो मुने । निशा च तावती तस्य तद्द्वयं कल्प उच्यते

caturyugānāṁ sāhasraṁ dinaṁ viśvasṛjo mune | niśā ca tāvatī tasya taddvayaṁ kalpa ucyate

हे मुने! चार युगों का एक हजार गुना काल विश्व-स्रष्टा का एक दिन है, और उतनी ही उसकी रात्रि है; उन दोनों को कल्प कहा जाता है।

श्लोक 21 (skanda.2.214.21)

एकैकस्मिन्दिने तस्य चतुर्दश चतुर्दश । भवन्ति मनवो ब्रह्मन्धर्मसेत्वभिरक्षकाः

ekaikasmindine tasya caturdaśa caturdaśa | bhavanti manavo brahmandharmasetvabhirakṣakāḥ

हे ब्रह्मन्! उसके एक-एक दिन में चौदह-चौदह मनु होते हैं, जो धर्म की मर्यादा के रक्षक हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.214.22)

आद्यः स्वायम्भुवस्तत्र मनुः स्वारोचिषस्ततः । उत्तमस्तामसश्चाऽथ रैवतश्चाक्षुषस्ततः

ādyaḥ svāyambhuvastatra manuḥ svārociṣastataḥ | uttamastāmasaścā'tha raivataścākṣuṣastataḥ

पहले स्वायम्भुव मनु, फिर स्वारोचिष; फिर उत्तम, तामस, फिर रैवत, फिर चाक्षुष मनु।

श्लोक 23 (skanda.2.214.23)

श्राद्धदेवश्च सावर्णि भौत्यो रौच्यस्ततः परम् । ब्रह्मसावर्णिनामा च रुद्रसावर्णिरेव च

śrāddhadevaśca sāvarṇi bhautyo raucyastataḥ param | brahmasāvarṇināmā ca rudrasāvarṇireva ca

फिर श्राद्धदेव (वैवस्वत), सावर्णि, भौत्य, और रौच्य; फिर ब्रह्मसावर्णि नामक और रुद्रसावर्णि।

श्लोक 24 (skanda.2.214.24)

मेरुसावर्णिसंज्ञोऽथ दक्षसावर्णिरन्तिमः । चतुर्दशैते मनवः प्रोक्ता ब्रह्मैकवासरे

merusāvarṇisaṁjño'tha dakṣasāvarṇirantimaḥ | caturdaśaite manavaḥ proktā brahmaikavāsare

फिर मेरुसावर्णि नामक, और अन्तिम दक्षसावर्णि - ये चौदह मनु ब्रह्मा के एक ही दिन में कहे गए हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.214.25)

एकैकस्य मनोः कालो युगानां चैकसप्ततिः । दिव्यैर्द्वादशसाहस्रैर्युगकालश्च वत्सरैः

ekaikasya manoḥ kālo yugānāṁ caikasaptatiḥ | divyairdvādaśasāhasrairyugakālaśca vatsaraiḥ

एक-एक मनु का काल इकहत्तर युगों का होता है, और एक युग का काल बारह हजार दिव्य वर्षों का होता है।

श्लोक 26 (skanda.2.214.26)

चतुर्दशस्यैव मनोरन्तरेन्तमुपेयुषि । सायंसंध्या विश्वसृजो जायते मुनिसत्तम

caturdaśasyaiva manorantarentamupeyuṣi | sāyaṁsaṁdhyā viśvasṛjo jāyate munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! जब चौदहवें मनु का अन्तर समाप्ति को प्राप्त होता है, तब विश्व-स्रष्टा की सायं-सन्ध्या होती है।

श्लोक 27 (skanda.2.214.27)

दिनावसाने वैराजः शक्तीराकर्षति स्थितेः । वैराजात्मा तदा रुद्रस्त्रिलोकीं हर्तुमीहते

dināvasāne vairājaḥ śaktīrākarṣati sthiteḥ | vairājātmā tadā rudrastrilokīṁ hartumīhate

दिन के अन्त में विराट् पुरुष स्थिति की शक्तियों को खींच लेते हैं; तब विराट्स्वरूप रुद्र त्रिलोकी को हरने का प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 28 (skanda.2.214.28)

आदौ भवत्यनावृष्टिरत्युग्रा शतवार्षिकी । तदाल्पसारसत्त्वानि क्षीयन्ते सर्वशो भुवि

ādau bhavatyanāvṛṣṭiratyugrā śatavārṣikī | tadālpasārasattvāni kṣīyante sarvaśo bhuvi

पहले सौ वर्ष तक अत्यन्त भीषण अनावृष्टि होती है; तब पृथ्वी पर अल्प-सार वाले प्राणी सर्वथा क्षीण हो जाते हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.214.29)

सांवर्त्तकस्य चार्कस्य रश्मयोऽत्युल्बणा रसम् । आपातालात्पिबन्त्याशु धरण्यां सर्वमेव हि

sāṁvarttakasya cārkasya raśmayo'tyulbaṇā rasam | āpātālātpibantyāśu dharaṇyāṁ sarvameva hi

फिर संवर्तक सूर्य की अत्यन्त प्रचण्ड किरणें पाताल तक पृथ्वी का सारा रस शीघ्र ही पी जाती हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.214.30)

सारसं चैव नादेयं सामुद्रं चाम्बु सर्वशः । शोषयित्वाऽखिलाँल्लोकान्सोऽर्को नयति संक्षयम्

sārasaṁ caiva nādeyaṁ sāmudraṁ cāmbu sarvaśaḥ | śoṣayitvā'khilā̃llokānso'rko nayati saṁkṣayam

सरोवरों, नदियों और समुद्रों के समस्त जल को सुखाकर वह सूर्य सम्पूर्ण लोकों को विनाश की ओर ले जाता है।

श्लोक 31 (skanda.2.214.31)

ततो भवति निःस्नेहा नष्टस्थावरजङ्गमा । कूर्मपृष्ठोपमा भूमिः शुष्का संकुचिता भृशम्

tato bhavati niḥsnehā naṣṭasthāvarajaṅgamā | kūrmapṛṣṭhopamā bhūmiḥ śuṣkā saṁkucitā bhṛśam

तब पृथ्वी स्नेहरहित, स्थावर-जंगम रहित हो जाती है, और कछुए की पीठ के समान सूखी तथा अत्यन्त सिकुड़ी हुई हो जाती है।

श्लोक 32 (skanda.2.214.32)

कालाग्निरुद्रः शेषस्य मुखादुत्पद्यते ततः । अधोलोकान्सप्तभूमिं भुवः स्वश्च दहत्यसौ

kālāgnirudraḥ śeṣasya mukhādutpadyate tataḥ | adholokānsaptabhūmiṁ bhuvaḥ svaśca dahatyasau

तब शेषनाग के मुख से कालाग्नि रुद्र उत्पन्न होते हैं, जो सात पाताल-लोकों, भूलोक और स्वर्ग को जला देते हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.214.33)

निर्दग्धलोकदशको ज्वालावर्त्तभयंकरः । उद्वासितमहर्लोकः कालाग्निः परिवर्त्तते

nirdagdhalokadaśako jvālāvarttabhayaṁkaraḥ | udvāsitamaharlokaḥ kālāgniḥ parivarttate

दस लोकों को जलाकर, ज्वाला के भयंकर भँवर वाली वह कालाग्नि, महर्लोक को भी उजाड़कर चारों ओर फैल जाती है।

श्लोक 34 (skanda.2.214.34)

गताधिकारास्त्रिदशा भुवःस्वर्गनिवासिनः । महर्लोकाज्जनं यान्ति वह्निज्वालाभृशार्दिताः

gatādhikārāstridaśā bhuvaḥsvarganivāsinaḥ | maharlokājjanaṁ yānti vahnijvālābhṛśārditāḥ

भुवर्लोक और स्वर्गलोक में रहने वाले देवगण अपने अधिकार समाप्त होने पर, अग्नि-ज्वाला से अत्यन्त पीड़ित होकर महर्लोक से जनलोक को चले जाते हैं।

श्लोक 35 (skanda.2.214.35)

निवृत्तिधर्मा ऋषयः प्राप्ताः सिद्धदशां तु ये । भूतलात्तेपि तर्ह्येव ऋषिलोकं प्रयान्ति च

nivṛttidharmā ṛṣayaḥ prāptāḥ siddhadaśāṁ tu ye | bhūtalāttepi tarhyeva ṛṣilokaṁ prayānti ca

निवृत्ति-धर्म वाले जो ऋषि सिद्ध-अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं, वे भी उसी समय भूतल से ऋषिलोक को चले जाते हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.214.36)

उत्तिष्ठन्ति ततो घोरा व्योम्नि सांवर्त्तका घनाः । महागजकुलप्रख्यास्तडित्वन्तोऽतिनादिनः

uttiṣṭhanti tato ghorā vyomni sāṁvarttakā ghanāḥ | mahāgajakulaprakhyāstaḍitvanto'tinādinaḥ

फिर आकाश में महागज-समूह जैसे भयंकर, बिजली से चमकते, अत्यन्त गर्जना करते संवर्तक मेघ उठते हैं।

श्लोक 37 (skanda.2.214.37)

धूम्रवर्णाः पीतवर्णा केचित्कुमुदसन्निभाः । लाक्षारसनिभाः केचिच्चाषपत्रनिभास्तथा

dhūmravarṇāḥ pītavarṇā kecitkumudasannibhāḥ | lākṣārasanibhāḥ keciccāṣapatranibhāstathā

कुछ धूम्रवर्ण, कुछ पीतवर्ण, कुछ श्वेत-कुमुद के समान, कुछ लाख के रस के समान, और कुछ चाष पक्षी के पंख के समान होते हैं।

श्लोक 38 (skanda.2.214.38)

शमयित्वा महावह्निं शतं वर्षाण्यहर्न्निशम् । वर्षमाणाः स्थूलधाराः स्तनन्तस्ते घना घनाः । ब्रह्माण्डस्यान्तरालं च पूरयन्ति ध्रुवावधि

śamayitvā mahāvahniṁ śataṁ varṣāṇyaharnniśam | varṣamāṇāḥ sthūladhārāḥ stanantaste ghanā ghanāḥ | brahmāṇḍasyāntarālaṁ ca pūrayanti dhruvāvadhi

महाअग्नि को शान्त करके, स्थूल धाराओं से गरजते हुए वे घने मेघ सौ वर्षों तक दिन-रात वर्षा करते हुए ध्रुव तक ब्रह्माण्ड के मध्य भाग को भर देते हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.214.39)

एकार्णवजले तस्मिन्वैराजपुरुषः स तु । अनिरुद्धात्मकः शेते नागेन्द्रशयने प्रभुः

ekārṇavajale tasminvairājapuruṣaḥ sa tu | aniruddhātmakaḥ śete nāgendraśayane prabhuḥ

उस एकार्णव जल में विराट् पुरुष, अनिरुद्धस्वरूप प्रभु, नागराज की शय्या पर शयन करते हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.214.40)

तदा देवाश्च ऋषयो रजःसत्त्वतमोवशाः । ये ते सह विरिञ्चेन स्वकीयगुणकर्षिताः । प्रविश्य तस्य जठरे शेरते दीर्घनिद्रया

tadā devāśca ṛṣayo rajaḥsattvatamovaśāḥ | ye te saha viriñcena svakīyaguṇakarṣitāḥ | praviśya tasya jaṭhare śerate dīrghanidrayā

तब रज, सत्त्व और तम के वशीभूत देवता और ऋषि, अपने-अपने गुणों से आकृष्ट होकर ब्रह्मा के साथ उनके उदर में प्रवेश करके दीर्घ निद्रा में सो जाते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.214.41)

ये तु ब्रह्मात्मैक्यभावा वशीकृतगुणत्रयाः । निवृत्तेनैव धर्मेण वासुदेवमुपासते

ye tu brahmātmaikyabhāvā vaśīkṛtaguṇatrayāḥ | nivṛttenaiva dharmeṇa vāsudevamupāsate

किन्तु जिन्होंने ब्रह्म से अपनी एकता का भाव प्राप्त कर लिया है, जिन्होंने त्रिगुणों को वश में कर लिया है, वे निवृत्ति-धर्म द्वारा वासुदेव की उपासना करते हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.214.42)

महरादिषु लोकेषु ते चतुर्षु कृतालयाः । तं वैराजं संस्तुवन्तो निवसन्ति यथासुखम्

maharādiṣu lokeṣu te caturṣu kṛtālayāḥ | taṁ vairājaṁ saṁstuvanto nivasanti yathāsukham

वे महर्लोक आदि चारों लोकों में निवास करते हुए, उस विराट् पुरुष की स्तुति करते हुए, सुखपूर्वक निवास करते हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.214.43)

नारायणः स भगवान्स्वरूपं परमात्मनः । चिन्तयन्वासुदेवाख्यं शेते वै योगनिद्रया

nārāyaṇaḥ sa bhagavānsvarūpaṁ paramātmanaḥ | cintayanvāsudevākhyaṁ śete vai yoganidrayā

वे भगवान् नारायण, परमात्मा के वासुदेव नामक स्वरूप का चिन्तन करते हुए, योगनिद्रा में शयन करते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.214.44)

निशान्ते ब्रह्मणा साकं सर्वे ते तस्य जाठराः । उत्पद्यन्ते यथापूर्वं यथाकर्माधिकारिणः

niśānte brahmaṇā sākaṁ sarve te tasya jāṭharāḥ | utpadyante yathāpūrvaṁ yathākarmādhikāriṇaḥ

रात्रि के अन्त में, ब्रह्मा के साथ उनके उदर में स्थित वे सब पुनः पहले की भाँति, अपने-अपने कर्म के अधिकार के अनुसार उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 45 (skanda.2.214.45)

एवं नैमित्तिको नाम त्रिलोकीक्षयलक्षणः । प्रलयः कथितस्तुभ्यं प्राकृतं कीर्त्तयाम्यथ

evaṁ naimittiko nāma trilokīkṣayalakṣaṇaḥ | pralayaḥ kathitastubhyaṁ prākṛtaṁ kīrttayāmyatha

इस प्रकार त्रिलोकी के नाश के लक्षण वाला नैमित्तिक प्रलय तुम्हें बताया गया; अब मैं प्राकृतिक प्रलय का वर्णन करता हूँ।

श्लोक 46 (skanda.2.214.46)

य एष कल्पः कथितस्तादृशानां शतत्रयम् । षष्ट्याधिकं च यः कालो वेधसः स तु वत्सरः

ya eṣa kalpaḥ kathitastādṛśānāṁ śatatrayam | ṣaṣṭyādhikaṁ ca yaḥ kālo vedhasaḥ sa tu vatsaraḥ

जो यह कल्प बताया गया, ऐसे तीन सौ साठ कल्पों का जो काल है, वही विधाता (ब्रह्मा) का एक वर्ष है।

श्लोक 47 (skanda.2.214.47)

पञ्चाशता तैः परार्द्धो ब्रह्मायुस्तद्द्वयं मतम् । पराख्यकाले संपूर्णे महान्भवति संक्षयः

pañcāśatā taiḥ parārddho brahmāyustaddvayaṁ matam | parākhyakāle saṁpūrṇe mahānbhavati saṁkṣayaḥ

ऐसे पचास वर्षों का एक परार्ध होता है, और उन दो परार्धों को ब्रह्मा की आयु माना गया है; पर नामक काल पूर्ण होने पर महाप्रलय होता है।

श्लोक 48 (skanda.2.214.48)

संहाररुद्ररूपेण संहृत्य स्वं विराड्वपुः । स्वपरं निर्गुणं रूपं वैराजो यातुमिच्छति

saṁhārarudrarūpeṇa saṁhṛtya svaṁ virāḍvapuḥ | svaparaṁ nirguṇaṁ rūpaṁ vairājo yātumicchati

संहार-रुद्र के रूप में अपने विराट् शरीर का संहार करके, विराट् पुरुष अपने निर्गुण स्वरूप को प्राप्त होना चाहते हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.214.49)

तदा भवत्यनावृष्टिः पूर्ववच्छतवार्षिकी । साङ्कर्षणश्च कालाग्निर्दहत्यण्डमशेषतः

tadā bhavatyanāvṛṣṭiḥ pūrvavacchatavārṣikī | sāṅkarṣaṇaśca kālāgnirdahatyaṇḍamaśeṣataḥ

तब पहले की भाँति सौ वर्ष की अनावृष्टि होती है, और संकर्षण से उत्पन्न कालाग्नि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जला देती है।

श्लोक 50 (skanda.2.214.50)

सांवर्त्तकास्ततो मेघा वर्षन्त्यति भयानकाः । शतं वर्षाणि धाराभिर्मुसलाकृतिभिर्मुने

sāṁvarttakāstato meghā varṣantyati bhayānakāḥ | śataṁ varṣāṇi dhārābhirmusalākṛtibhirmune

हे मुने! फिर अत्यन्त भयानक संवर्तक मेघ मूसल के आकार की धाराओं से सौ वर्षों तक वर्षा करते हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.214.51)

महदादेर्विकारस्य विशेषान्तस्य संक्षयः । सर्वस्यापि भवत्येव वासुदेवेच्छया ततः

mahadādervikārasya viśeṣāntasya saṁkṣayaḥ | sarvasyāpi bhavatyeva vāsudevecchayā tataḥ

फिर वासुदेव की इच्छा से महत्तत्त्व से लेकर अन्तिम विकार तक सबका क्षय हो जाता है।

श्लोक 52 (skanda.2.214.52)

आपो ग्रसन्ति वै पूर्वं भूमेर्गन्धात्मकं गुणम् । आत्तगन्धा ततो भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते

āpo grasanti vai pūrvaṁ bhūmergandhātmakaṁ guṇam | āttagandhā tato bhūmiḥ pralayatvāya kalpate

जल पहले पृथ्वी के गन्ध-गुण को ग्रस लेता है; गन्ध-रहित होकर पृथ्वी प्रलय के योग्य हो जाती है।

श्लोक 53 (skanda.2.214.53)

ग्रसतेम्बुगुणं तेजो रसं तल्लीयते ततः । रूपं तेजोगुणं वायुर्ग्रसते लीयतेऽथ तत्

grasatembuguṇaṁ tejo rasaṁ tallīyate tataḥ | rūpaṁ tejoguṇaṁ vāyurgrasate līyate'tha tat

अग्नि जल के रस-गुण को ग्रसती है, फिर जल अग्नि में लीन हो जाता है; वायु अग्नि के रूप-गुण को ग्रसती है, फिर अग्नि वायु में लीन हो जाती है।

श्लोक 54 (skanda.2.214.54)

वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशो ग्रसते ततः । प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु तिष्ठत्यनावृतम्

vāyorapi guṇaṁ sparśamākāśo grasate tataḥ | praśāmyati tadā vāyuḥ khaṁ tu tiṣṭhatyanāvṛtam

आकाश वायु के स्पर्श-गुण को ग्रसता है; तब वायु शान्त हो जाती है, और केवल आकाश ही अनावृत रह जाता है।

श्लोक 55 (skanda.2.214.55)

भूतादिस्तद्गुणं शब्दं ग्रसते लीयते च खम् । इन्द्रियाणि विलीयन्ते तैजसाहंकृतौ ततः

bhūtādistadguṇaṁ śabdaṁ grasate līyate ca kham | indriyāṇi vilīyante taijasāhaṁkṛtau tataḥ

भूतादि (तामस अहंकार) आकाश के शब्द-गुण को ग्रसता है, और आकाश उसमें लीन हो जाता है; फिर इन्द्रियाँ तैजस अहंकार में लीन हो जाती हैं।

श्लोक 56 (skanda.2.214.56)

अहङ्कारे विलीयन्ते सात्त्विके देवता मनः । यद्यद्यस्मात्समुत्पन्नं तत्तत्तस्मिन्हि लीयते

ahaṅkāre vilīyante sāttvike devatā manaḥ | yadyadyasmātsamutpannaṁ tattattasminhi līyate

इन्द्रियों के देवता और मन सात्त्विक अहंकार में लीन हो जाते हैं; जो-जो जिससे उत्पन्न हुआ, वह-वह उसी में लीन हो जाता है।

श्लोक 57 (skanda.2.214.57)

अहंकारो महत्तत्त्वे त्रिविधोपि प्रलीयते । तत्प्रधाने च तत्पुंसि स मूलप्रकृतौ ततः

ahaṁkāro mahattattve trividhopi pralīyate | tatpradhāne ca tatpuṁsi sa mūlaprakṛtau tataḥ

त्रिविध अहंकार महत्तत्त्व में लीन हो जाता है, और वह महत्तत्त्व प्रधान-पुरुष में, अर्थात् मूल प्रकृति में लीन हो जाता है।

श्लोक 58 (skanda.2.214.58)

एष प्राकृतिको नाम प्रलयः परिगीयते । तिरोभवन्ति जीवेशा यत्राऽव्यक्ते हरीच्छया

eṣa prākṛtiko nāma pralayaḥ parigīyate | tirobhavanti jīveśā yatrā'vyakte harīcchayā

यही प्राकृतिक प्रलय कहलाता है, जिसमें हरि की इच्छा से जीव और ईश्वर अव्यक्त में तिरोहित हो जाते हैं।

श्लोक 59 (skanda.2.214.59)

यदा च माया पुरुषौ कालोऽत्यक्षरतेजसि । तदिच्छया तिरो यान्ति स त्वेको वर्तते प्रभुः । तदा स प्रलयो ज्ञेयो नारदात्यन्तिकाभिधः

yadā ca māyā puruṣau kālo'tyakṣaratejasi | tadicchayā tiro yānti sa tveko vartate prabhuḥ | tadā sa pralayo jñeyo nāradātyantikābhidhaḥ

और जब माया, दोनों पुरुष तथा काल, उन्हीं की इच्छा से उस अक्षय तेज में तिरोहित हो जाते हैं और केवल एक प्रभु ही रह जाते हैं, तब हे नारद! उसे आत्यन्तिक प्रलय जानना चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.2.214.60)

इत्थं प्रभोः कालशक्त्या लयैरेतैश्चतुर्विधैः । असद्बद्ध्वाऽखिलं तत्राऽरुचिर्वैराग्यमुच्यते

itthaṁ prabhoḥ kālaśaktyā layairetaiścaturvidhaiḥ | asadbaddhvā'khilaṁ tatrā'rucirvairāgyamucyate

इस प्रकार प्रभु की काल-शक्ति द्वारा इन चारों प्रकार के प्रलयों से समस्त असत् वस्तु को जानकर उसमें जो अरुचि होती है, वही वैराग्य कहलाता है।

श्लोक 61 (skanda.2.214.61)

वासुदेवेतरान्देवान्कालमायावशीकृतान् । विदित्वा तेषु च प्रीतिं हित्वा तस्यैव नित्यदा । गाढस्नेहेन या सेवा सा भक्तिरिति गीयते

vāsudevetarāndevānkālamāyāvaśīkṛtān | viditvā teṣu ca prītiṁ hitvā tasyaiva nityadā | gāḍhasnehena yā sevā sā bhaktiriti gīyate

वासुदेव से भिन्न देवताओं को काल और माया के वश में जानकर, उनमें प्रीति त्यागकर, सदा उन्हीं के प्रति गाढ़ स्नेह से जो सेवा की जाती है, वही भक्ति कही गई है।

श्लोक 62 (skanda.2.214.62)

श्रवणं कीर्तनं तस्य स्मृतिश्चरणसेवनम् । पूजा प्रणामो दास्यं च सख्यं चात्मनिवेदनम्

śravaṇaṁ kīrtanaṁ tasya smṛtiścaraṇasevanam | pūjā praṇāmo dāsyaṁ ca sakhyaṁ cātmanivedanam

उनका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरण-सेवन, पूजा, प्रणाम, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन -

श्लोक 63 (skanda.2.214.63)

इत्येतैर्न्नवभिर्भावैर्यः सेवेत तमादरात् । अनन्यया धिषणया स हि भक्त इतीर्यते

ityetairnnavabhirbhāvairyaḥ seveta tamādarāt | ananyayā dhiṣaṇayā sa hi bhakta itīryate

इन नव भावों से जो आदरपूर्वक अनन्य बुद्धि से उनकी सेवा करता है, वही भक्त कहलाता है।

श्लोक 64 (skanda.2.214.64)

त्रिभिः स्वधर्मप्रमुखैर्युक्ताभक्तिरियं मुने । धर्म एकान्तिक इति प्रोक्तो भागवतश्च सः

tribhiḥ svadharmapramukhairyuktābhaktiriyaṁ mune | dharma ekāntika iti prokto bhāgavataśca saḥ

हे मुने! स्वधर्म आदि तीन साधनों से युक्त यह भक्ति ही एकान्तिक धर्म कही गई है, और वही भागवत धर्म भी है।

श्लोक 65 (skanda.2.214.65)

साक्षाद्भगवतः सङ्गात्तद्भक्तानां च वेदृशाम् । धर्मो ह्येकान्तिकः पुम्भिः प्राप्यते नान्यथा क्वचित्

sākṣādbhagavataḥ saṅgāttadbhaktānāṁ ca vedṛśām | dharmo hyekāntikaḥ pumbhiḥ prāpyate nānyathā kvacit

यह एकान्तिक धर्म मनुष्यों को साक्षात् भगवान् और उनके ऐसे भक्तों के संग से ही प्राप्त होता है, अन्यथा कभी नहीं।

श्लोक 66 (skanda.2.214.66)

नैतादृशं परं किञ्चित्साधनं हि मुमुक्षताम् । निःश्रेयसकरं पुंसां सर्वाभद्रविनाशनम्

naitādṛśaṁ paraṁ kiñcitsādhanaṁ hi mumukṣatām | niḥśreyasakaraṁ puṁsāṁ sarvābhadravināśanam

मुमुक्षुओं के लिए इससे बढ़कर कोई अन्य साधन नहीं है, जो मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी तथा समस्त अमंगल का नाशक हो।

श्लोक 67 (skanda.2.214.67)

एकान्तधर्मसिद्ध्यर्थं क्रियायोगपरो भवेत् । पुमान्स्याद्येन नैष्कर्म्यं कर्मणां मुनिसत्तम

ekāntadharmasiddhyarthaṁ kriyāyogaparo bhavet | pumānsyādyena naiṣkarmyaṁ karmaṇāṁ munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! एकान्तिक धर्म की सिद्धि के लिए मनुष्य को क्रियायोग में तत्पर रहना चाहिए, जिससे कर्म करते हुए भी वह कर्मों से निर्लिप्त रह सके।

श्लोक 68 (skanda.2.214.68)

एतन्मया वेदपुराणगुह्यं तत्त्वं परं प्रोक्तमघौघनाशम् । एकाग्रया शुद्धधियावधार्य सच्छ्रद्धया चेतसि ते महर्षे

etanmayā vedapurāṇaguhyaṁ tattvaṁ paraṁ proktamaghaughanāśam | ekāgrayā śuddhadhiyāvadhārya sacchraddhayā cetasi te maharṣe

हे महर्षे! वेद-पुराणों के इस गुह्य, परम और पापसमूह का नाश करने वाले तत्त्व को मैंने कहा है; इसे एकाग्र, शुद्ध बुद्धि से और सच्ची श्रद्धा से अपने हृदय में धारण करो।

श्लोक 69 (skanda.2.214.69)

न वासुदेवात्परमस्ति पावनं न वासुदेवात्परमस्ति मङ्गलम् । न वासुदेवात्परमस्ति दैवतं न वासुदेवात्परमस्ति वाञ्छितम्

na vāsudevātparamasti pāvanaṁ na vāsudevātparamasti maṅgalam | na vāsudevātparamasti daivataṁ na vāsudevātparamasti vāñchitam

वासुदेव से बढ़कर कोई पवित्र वस्तु नहीं है, वासुदेव से बढ़कर कोई मंगल नहीं है; वासुदेव से बढ़कर कोई देवता नहीं है, वासुदेव से बढ़कर कोई वांछित वस्तु नहीं है।

श्लोक 70 (skanda.2.214.70)

यन्नामधेयं सकृदप्यबुद्ध्या देहावसानेपि गृणाति योऽत्र । स पुष्कसोप्याशु भवप्रवाहाद्विमुच्यते तं भज वासुदेवम्

yannāmadheyaṁ sakṛdapyabuddhyā dehāvasānepi gṛṇāti yo'tra | sa puṣkasopyāśu bhavapravāhādvimucyate taṁ bhaja vāsudevam

जो कोई भी उनका नाम अज्ञानवश एक बार भी, देहान्त के समय भी उच्चारण करता है, वह चाण्डाल भी शीघ्र ही संसार-प्रवाह से मुक्त हो जाता है - इसलिए उन्हीं वासुदेव का भजन करो।

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