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वैष्णव खण्ड · अध्याय 215

क्रियायोगाधिकारादि-निरूपण

अध्याय 214अध्याय-सूचीअध्याय 216

श्लोक 1 (skanda.2.215.1)

स्कन्द उवाच । एकान्तधर्मविवृतिं श्रुत्वा भगवतोदिताम् । प्रहृष्टमानसो भूयस्तं पप्रच्छ स नारदः

skanda uvāca | ekāntadharmavivṛtiṁ śrutvā bhagavatoditām | prahṛṣṭamānaso bhūyastaṁ papraccha sa nāradaḥ

स्कन्द ने कहा - भगवान् द्वारा कहे गए एकान्तिक धर्म के वर्णन को सुनकर, अत्यन्त प्रसन्न मन वाले नारद ने पुनः उनसे प्रश्न किया।

श्लोक 2 (skanda.2.215.2)

नारद उवाच । धर्म एकान्तिकः स्वामिंस्त्वया सम्यगुदीरितः । तमाश्रुत्य महान्हर्षो जातोस्ति मम मानसे

nārada uvāca | dharma ekāntikaḥ svāmiṁstvayā samyagudīritaḥ | tamāśrutya mahānharṣo jātosti mama mānase

नारद ने कहा - हे स्वामिन्! आपने एकान्तिक धर्म का भलीभाँति वर्णन किया; उसे सुनकर मेरे मन में महान् हर्ष उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 3 (skanda.2.215.3)

सिद्धये तस्य भवता क्रियायोगो य उच्यते । तमहं बोद्धुमिच्छामि भगवंस्तव संमतम्

siddhaye tasya bhavatā kriyāyogo ya ucyate | tamahaṁ boddhumicchāmi bhagavaṁstava saṁmatam

उसकी सिद्धि के लिए आप जिस क्रियायोग की बात कहते हैं, हे भगवन्! आपके द्वारा अनुमोदित उसे मैं समझना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (skanda.2.215.4)

श्रीनारायण उवाच । पूजाविधिः क्रियायोगो वासुदेवस्य कीर्त्त्यते । स तु वेदेषु तन्त्रेषु बहुधैवास्ति वर्णितः

śrīnārāyaṇa uvāca | pūjāvidhiḥ kriyāyogo vāsudevasya kīrttyate | sa tu vedeṣu tantreṣu bahudhaivāsti varṇitaḥ

श्री नारायण ने कहा - वासुदेव की पूजा-विधि ही क्रियायोग कहलाती है; वह वेदों और तन्त्रों में अनेक प्रकार से वर्णित है।

श्लोक 5 (skanda.2.215.5)

भक्तानां रुचिवैचित्र्यात्तथा बहुविधत्वतः । वासुदेवस्य मूर्तीनां बहुधा सोऽस्ति विस्तृतः

bhaktānāṁ rucivaicitryāttathā bahuvidhatvataḥ | vāsudevasya mūrtīnāṁ bahudhā so'sti vistṛtaḥ

भक्तों की रुचि की विविधता के कारण, तथा वासुदेव की मूर्तियों की बहुविधता के कारण, वह अनेक प्रकार से विस्तृत हुआ है।

श्लोक 6 (skanda.2.215.6)

साकल्येनोच्यमानस्य पारो नायाति तस्य वै । अतः संक्षेपतस्तुभ्यं वच्मि भक्तिविवर्द्धनम्

sākalyenocyamānasya pāro nāyāti tasya vai | ataḥ saṁkṣepatastubhyaṁ vacmi bhaktivivarddhanam

उसे सम्पूर्णता से कहने पर उसका अन्त नहीं आता; इसलिए मैं संक्षेप में तुम्हें वह बताता हूँ, जो भक्ति की वृद्धि करने वाला है।

श्लोक 7 (skanda.2.215.7)

प्राप्ता ये वैष्णवीं दीक्षां वर्णाश्चत्वार आश्रमाः । चातुर्वर्ण्यस्त्रियश्चैते प्रोक्ता अत्राधिकारिणः

prāptā ye vaiṣṇavīṁ dīkṣāṁ varṇāścatvāra āśramāḥ | cāturvarṇyastriyaścaite proktā atrādhikāriṇaḥ

जिन्होंने वैष्णवी दीक्षा प्राप्त की है, ऐसे चारों वर्ण, चारों आश्रम और चारों वर्णों की स्त्रियाँ - ये सब इसके अधिकारी कहे गए हैं।

श्लोक 8 (skanda.2.215.8)

वेदतन्त्रपुराणोक्तैर्मन्त्रैर्मूलेन च द्विजाः । पूजेयुर्दीक्षिता योषाः सच्छूद्रा मूलमन्त्रतः । मूलमन्त्रस्तु विज्ञेयः श्रीकृष्णस्य षडक्षरः

vedatantrapurāṇoktairmantrairmūlena ca dvijāḥ | pūjeyurdīkṣitā yoṣāḥ sacchūdrā mūlamantrataḥ | mūlamantrastu vijñeyaḥ śrīkṛṣṇasya ṣaḍakṣaraḥ

द्विजों को वेद-तन्त्र-पुराणोक्त मन्त्रों और मूल मन्त्र से, तथा दीक्षित स्त्रियों और सच्छूद्रों को केवल मूल मन्त्र से पूजा करनी चाहिए। मूल मन्त्र श्रीकृष्ण का षडक्षर मन्त्र समझना चाहिए।

श्लोक 9 (skanda.2.215.9)

स्वस्वधर्मं पालयद्भिः सर्वेरेतैर्यथाविधि । पूजनीयो वासुदेवो भक्त्या निष्कपटान्तरैः

svasvadharmaṁ pālayadbhiḥ sarveretairyathāvidhi | pūjanīyo vāsudevo bhaktyā niṣkapaṭāntaraiḥ

अपने-अपने धर्म का विधिपूर्वक पालन करने वाले इन सबके द्वारा निष्कपट हृदय से भक्तिपूर्वक वासुदेव की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.2.215.10)

आदौ तु वैष्णवीं दीक्षां गृह्णीयात्सद्वरोः पुमान् । सदैकान्तिकधर्मस्थाद्ब्रह्मजातेर्दयानिधेः

ādau tu vaiṣṇavīṁ dīkṣāṁ gṛhṇīyātsadvaroḥ pumān | sadaikāntikadharmasthādbrahmajāterdayānidheḥ

सबसे पहले पुरुष को सदैव एकान्तिक धर्म में स्थित, ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, दयासागर सद्गुरु से वैष्णवी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.2.215.11)

संपन्नो ज्ञानभक्तिभ्यां स्वधर्मरहितस्तु यः । स गुरुन्नैव कर्तव्यः स्त्रीहृतात्मा च कर्हिचित्

saṁpanno jñānabhaktibhyāṁ svadharmarahitastu yaḥ | sa gurunnaiva kartavyaḥ strīhṛtātmā ca karhicit

जो ज्ञान और भक्ति से सम्पन्न होते हुए भी स्वधर्म से रहित हो, उसे गुरु कभी न बनाया जाए; और जिसका मन स्त्री द्वारा हरा गया हो, उसे भी कभी नहीं।

श्लोक 12 (skanda.2.215.12)

प्राप्ता स्त्रैणाद्गुरोर्दीक्षा ज्ञानं भक्तिं च कर्हिचित् । फलेन्नैव यथाऽपत्यं युवतिः षण्ढसंगिनी

prāptā straiṇādgurordīkṣā jñānaṁ bhaktiṁ ca karhicit | phalennaiva yathā'patyaṁ yuvatiḥ ṣaṇḍhasaṁginī

स्त्री-लम्पट गुरु से प्राप्त दीक्षा, ज्ञान और भक्ति कभी फल नहीं देती, जैसे नपुंसक के साथ रहने वाली युवती को कभी सन्तान नहीं होती।

श्लोक 13 (skanda.2.215.13)

प्राप्यातः सद्गुरोर्दीक्षां तुलसीमालिकां गले । ललाटादौ चोर्द्ध्वपुण्ड्रं गोपीचन्दनतो धरेत्

prāpyātaḥ sadgurordīkṣāṁ tulasīmālikāṁ gale | lalāṭādau corddhvapuṇḍraṁ gopīcandanato dharet

सद्गुरु से दीक्षा प्राप्त करके गले में तुलसी की माला तथा ललाट आदि पर गोपीचन्दन से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.215.14)

विष्णुपूजारुचिर्भक्तो गुरोरेवागमोदितम् । पूजाविधिं सुविज्ञाय ततः पूजनमारभेत्

viṣṇupūjārucirbhakto gurorevāgamoditam | pūjāvidhiṁ suvijñāya tataḥ pūjanamārabhet

विष्णु-पूजा में रुचि रखने वाला भक्त गुरु से आगम-कथित पूजा-विधि को भलीभाँति जानकर ही पूजा आरम्भ करे।

श्लोक 15 (skanda.2.215.15)

रात्र्यन्तयाम उत्थाय भक्तो ब्राह्मेक्षणेऽथ वा । मुहूर्तार्धं हृदि ध्यायेत्केशवं क्लेशनाशनम्

rātryantayāma utthāya bhakto brāhmekṣaṇe'tha vā | muhūrtārdhaṁ hṛdi dhyāyetkeśavaṁ kleśanāśanam

रात्रि के अन्तिम प्रहर या ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भक्त आधे मुहूर्त तक हृदय में क्लेशनाशक केशव का ध्यान करे।

श्लोक 16 (skanda.2.215.16)

कीर्त्तयित्वाऽभिधास्तस्य तदीयानां च नाडिकाम् । ततः शौचविधिं कृत्वा दन्तधावनमाचरेत्

kīrttayitvā'bhidhāstasya tadīyānāṁ ca nāḍikām | tataḥ śaucavidhiṁ kṛtvā dantadhāvanamācaret

उनके और उनके सम्बन्धियों के नामों का एक घड़ी तक कीर्तन करके, फिर शौच-विधि करके दन्तधावन करे।

श्लोक 17 (skanda.2.215.17)

अंगशुद्धिस्नानमादौ कृत्वा स्नायात्समन्त्रकम् । गृहीत्वा शुचिमृत्स्नादीन्कुर्यात्स्नानांगतर्पणम्

aṁgaśuddhisnānamādau kṛtvā snāyātsamantrakam | gṛhītvā śucimṛtsnādīnkuryātsnānāṁgatarpaṇam

पहले अंगशुद्धि के लिए स्नान करके, फिर मन्त्रपूर्वक स्नान करे; शुद्ध मिट्टी आदि लेकर स्नान-अंग-तर्पण करे।

श्लोक 18 (skanda.2.215.18)

परिधायांशुके धौते उपविश्यासने शुचौ । कृत्वोर्द्ध्वपुण्ड्रं कुर्वीत संध्यां होमं जपादि च

paridhāyāṁśuke dhaute upaviśyāsane śucau | kṛtvorddhvapuṇḍraṁ kurvīta saṁdhyāṁ homaṁ japādi ca

धुले हुए वस्त्र पहनकर, शुद्ध आसन पर बैठकर, ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर, संध्या, होम और जप आदि करे।

श्लोक 19 (skanda.2.215.19)

वस्त्रचन्दनपुष्पादीनुपहारांस्ततोऽखिलान् । आहरेन्मांसमदिराद्यशुचिस्पर्श वर्जितान्

vastracandanapuṣpādīnupahārāṁstato'khilān | āharenmāṁsamadirādyaśucisparśa varjitān

फिर वस्त्र, चन्दन, पुष्प आदि समस्त उपहारों को, जो मांस-मदिरा आदि अशुद्ध वस्तुओं के स्पर्श से रहित हों, एकत्र करे।

श्लोक 20 (skanda.2.215.20)

देवेभ्यो वा पितृभ्यश्चाप्यन्येभ्यो न निवेदितान् । अनाघ्रातांश्च मनुजैः केशकीटादिवर्जितान्

devebhyo vā pitṛbhyaścāpyanyebhyo na niveditān | anāghrātāṁśca manujaiḥ keśakīṭādivarjitān

जो देवताओं, पितरों या अन्य किसी को अर्पित न किए गए हों, मनुष्यों द्वारा सूँघे न गए हों, और बाल-कीट आदि से रहित हों।

श्लोक 21 (skanda.2.215.21)

संस्थाप्य तान्दक्षपार्श्वे पूजोपकरणानि च । उद्वर्त्य दीपमाज्येन कुर्यात्तैलेन वा ततः

saṁsthāpya tāndakṣapārśve pūjopakaraṇāni ca | udvartya dīpamājyena kuryāttailena vā tataḥ

उन पूजा-सामग्रियों को दाहिनी ओर रखकर, फिर घी या तेल से दीपक को सँवारकर जलाए।

श्लोक 22 (skanda.2.215.22)

कौशे वौर्णे च वस्त्रादौ विकाष्ठे शुद्ध आसने । उपाविशेद्वासुदेवप्रतिमासन्निधौ ततः

kauśe vaurṇe ca vastrādau vikāṣṭhe śuddha āsane | upāviśedvāsudevapratimāsannidhau tataḥ

रेशम, ऊन, वस्त्र आदि के, काठ से रहित, शुद्ध आसन पर बैठकर, फिर वासुदेव की प्रतिमा के समीप बैठे।

श्लोक 23 (skanda.2.215.23)

शैली धातुमयी दार्वी लेख्या मणिमयी च वा । प्रतिमा स्यात्सिता रक्ता पीता कृष्णाऽथ वा मुने

śailī dhātumayī dārvī lekhyā maṇimayī ca vā | pratimā syātsitā raktā pītā kṛṣṇā'tha vā mune

हे मुने! प्रतिमा पत्थर, धातु, काठ, चित्रित अथवा मणि की बनी हो सकती है, और वह श्वेत, रक्त, पीत अथवा श्याम वर्ण की हो सकती है।

श्लोक 24 (skanda.2.215.24)

कृष्णस्य सा तु कर्तव्या द्विभुजा वा चतुर्भुजा । मुरलीं धारयेत्तत्र द्विभुजायाः करद्वये

kṛṣṇasya sā tu kartavyā dvibhujā vā caturbhujā | muralīṁ dhārayettatra dvibhujāyāḥ karadvaye

कृष्ण की वह प्रतिमा द्विभुज या चतुर्भुज बनानी चाहिए; द्विभुज रूप में दोनों हाथों में मुरली धारण करानी चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.215.25)

अथ वा दक्षहस्तेऽस्याश्चक्रं शंखं तथेतरे । पद्मं वा धारयेद्दक्षे पाणावभयमुत्तरे

atha vā dakṣahaste'syāścakraṁ śaṁkhaṁ tathetare | padmaṁ vā dhārayeddakṣe pāṇāvabhayamuttare

अथवा दाहिने हाथ में चक्र और दूसरे में शंख, अथवा दाहिने हाथ में पद्म और ऊपरी हाथ में अभय-मुद्रा धारण कराई जा सकती है।

श्लोक 26 (skanda.2.215.26)

द्वितीयायास्तु हस्तेषु दक्षिणाधःकरक्रमात् । गदाब्जदरचक्राणि धारयेन्मुनिसत्तम

dvitīyāyāstu hasteṣu dakṣiṇādhaḥkarakramāt | gadābjadaracakrāṇi dhārayenmunisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! दूसरे (चतुर्भुज) रूप में, दाहिने नीचे हाथ से क्रमशः गदा, पद्म, शंख और चक्र धारण कराने चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.2.215.27)

द्विविधाया अपि हरेर्मूर्तेर्वामे श्रियं न्यसेत् । मुरलीधरवामे तु राधां रासेश्वरीं न्यसेत्

dvividhāyā api harermūrtervāme śriyaṁ nyaset | muralīdharavāme tu rādhāṁ rāseśvarīṁ nyaset

हरि की दोनों प्रकार की मूर्तियों में बाईं ओर श्री को स्थापित करे; किन्तु मुरलीधर रूप में बाईं ओर रासेश्वरी राधा को स्थापित करे।

श्लोक 28 (skanda.2.215.28)

अप्येषा द्विविधा मूर्त्तिरखण्डा शुभलक्षणा । सर्वावयवसंपन्ना भवेदर्च्चकसिद्धिदा

apyeṣā dvividhā mūrttirakhaṇḍā śubhalakṣaṇā | sarvāvayavasaṁpannā bhavedarccakasiddhidā

ये दोनों प्रकार की मूर्तियाँ, अखण्ड, शुभ लक्षणों से युक्त और सभी अंगों से सम्पन्न होने पर ही पूजक को सिद्धि देने वाली होती हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.215.29)

लक्ष्मीस्तु द्विभुजा कार्या वासुदेवस्य सन्निधौ । दधती पंकजं हस्ते वस्त्रालंकारशोभना

lakṣmīstu dvibhujā kāryā vāsudevasya sannidhau | dadhatī paṁkajaṁ haste vastrālaṁkāraśobhanā

वासुदेव के समीप लक्ष्मी को द्विभुज, हाथ में कमल धारण करने वाली, वस्त्राभूषणों से सुशोभित बनाना चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.2.215.30)

लक्ष्मीवद्राधिकापि स्याद्द्विभुजा चारुहासिनी । पङ्कजं पुष्पमालां वा दधती पाणिपङ्कजे

lakṣmīvadrādhikāpi syāddvibhujā cāruhāsinī | paṅkajaṁ puṣpamālāṁ vā dadhatī pāṇipaṅkaje

लक्ष्मी की भाँति राधिका भी द्विभुज, मधुर हास्य वाली, अपने कर-कमल में कमल या पुष्पमाला धारण करने वाली होनी चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.2.215.31)

अचला च चला चेति द्विविधा प्रतिमा हरेः । तत्राद्यायां न कर्तव्यमावाहनविसर्जनम्

acalā ca calā ceti dvividhā pratimā hareḥ | tatrādyāyāṁ na kartavyamāvāhanavisarjanam

हरि की प्रतिमा दो प्रकार की होती है - अचल और चल; उनमें से पहली (अचल) में आवाहन और विसर्जन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.2.215.32)

तदङ्गदेवतानां च कार्यं नावाहनाद्यपि । न च दिङ्नियमोऽर्चायां तस्याः स्थेयं तु सम्मुखे

tadaṅgadevatānāṁ ca kāryaṁ nāvāhanādyapi | na ca diṅniyamo'rcāyāṁ tasyāḥ stheyaṁ tu sammukhe

उसके अंग-देवताओं का भी आवाहन आदि नहीं करना चाहिए; और उसकी पूजा में दिशा का कोई नियम नहीं है - केवल उसके सम्मुख स्थित रहना चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.2.215.33)

शालग्रामेप्येवमेव कार्यं नावाहनादि च । अन्यत्र चलमूलौ तु कर्तव्यं तत्तदर्चकैः

śālagrāmepyevameva kāryaṁ nāvāhanādi ca | anyatra calamūlau tu kartavyaṁ tattadarcakaiḥ

शालग्राम के विषय में भी इसी प्रकार आवाहन आदि नहीं करना चाहिए; परन्तु अन्यत्र चल-प्रतिमाओं में सम्बन्धित पूजकों को ये कार्य करने चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.2.215.34)

तत्रापि दार्व्या लेख्यायां जलस्पर्शोनुलेपनम् । नैव कार्यं पूजकेन कर्तव्यं परिमार्जनम्

tatrāpi dārvyā lekhyāyāṁ jalasparśonulepanam | naiva kāryaṁ pūjakena kartavyaṁ parimārjanam

वहाँ भी काठ या चित्रित प्रतिमा में पूजक को जल-स्पर्श और लेप कभी नहीं करना चाहिए; केवल परिमार्जन (पोंछना) करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.2.215.35)

उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा चलायां सम्मुखोऽथ वा । यथाशक्ति यथालब्धैरुपहारैर्यजेद्धरिम्

udaṅmukhaḥ prāṅmukho vā calāyāṁ sammukho'tha vā | yathāśakti yathālabdhairupahārairyajeddharim

उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके, अथवा चल प्रतिमा में उसके सम्मुख होकर, यथाशक्ति यथाप्राप्त उपहारों से हरि की पूजा करे।

श्लोक 36 (skanda.2.215.36)

श्रद्धानिश्छद्मभक्तिभ्यामर्पितेनाम्बुनापि सः । प्रीतस्तुष्यति विश्वात्मा किमुताऽखिलपूजया

śraddhāniśchadmabhaktibhyāmarpitenāmbunāpi saḥ | prītastuṣyati viśvātmā kimutā'khilapūjayā

वे विश्वात्मा श्रद्धा और निश्छल भक्ति से अर्पित जल मात्र से भी प्रसन्न होकर सन्तुष्ट हो जाते हैं, फिर सम्पूर्ण पूजा से तो कहना ही क्या!

श्लोक 37 (skanda.2.215.37)

पुंसा श्रद्धादिहीनेन रत्नहेमाद्यलंक्रियाः । चतुर्विधं चाप्यन्नाद्यं दत्तं गृह्णाति नो मुदा

puṁsā śraddhādihīnena ratnahemādyalaṁkriyāḥ | caturvidhaṁ cāpyannādyaṁ dattaṁ gṛhṇāti no mudā

किन्तु श्रद्धा-रहित पुरुष द्वारा दिए गए रत्न-स्वर्णादि आभूषण तथा चार प्रकार के अन्न को वे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते।

श्लोक 38 (skanda.2.215.38)

तस्माद्भक्तिमता कार्यं पुंसा स्वश्रेयसे मुने । श्रीकृष्णस्यार्च्चनं नित्यं सर्वाभीष्टाशुदायिनः

tasmādbhaktimatā kāryaṁ puṁsā svaśreyase mune | śrīkṛṣṇasyārccanaṁ nityaṁ sarvābhīṣṭāśudāyinaḥ

इसलिए हे मुने! भक्तिमान पुरुष को अपने कल्याण के लिए नित्य श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए, जो सब अभीष्टों को शीघ्र प्रदान करने वाले हैं।

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