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वैष्णव खण्ड · अध्याय 216

पूजामण्डल-रचना-विधि-निरूपण

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217

श्लोक 1 (skanda.2.216.1)

श्रीनारायण उवाच । खननोक्षणलेपाद्यैः शोधिते धरणीतले । चतुष्पादं न्यसेत्पीठं नानारङ्गसुशोभिते

śrīnārāyaṇa uvāca | khananokṣaṇalepādyaiḥ śodhite dharaṇītale | catuṣpādaṁ nyasetpīṭhaṁ nānāraṅgasuśobhite

श्री नारायण ने कहा - खोदने, सींचने, लीपने आदि से शुद्ध की गई और विविध रंगों से सुशोभित भूमि पर चार पैरों वाला पीठ स्थापित करे।

श्लोक 2 (skanda.2.216.2)

अर्चकः प्राङ्मुखः पीठपादान्कोणेषु कारयेत् । चतुर्षु तेषु धर्मादीन्स्थापयेत्सिंहरूपिणः

arcakaḥ prāṅmukhaḥ pīṭhapādānkoṇeṣu kārayet | caturṣu teṣu dharmādīnsthāpayetsiṁharūpiṇaḥ

पूर्वाभिमुख पूजक पीठ के पैरों को कोनों में बनवाए; उन चारों पर सिंहरूपी धर्म आदि को स्थापित करे।

श्लोक 3 (skanda.2.216.3)

अग्नौ धर्मं न्यसेच्छ्वेतं ज्ञानं शोणं च नैर्ऋते । वायौ तु पीतं वैराग्यं श्याममैश्वर्यमैशके

agnau dharmaṁ nyasecchvetaṁ jñānaṁ śoṇaṁ ca nairṛte | vāyau tu pītaṁ vairāgyaṁ śyāmamaiśvaryamaiśake

अग्निकोण में श्वेत धर्म, नैर्ऋत्य में रक्त ज्ञान, वायव्य में पीत वैराग्य, और ईशान में श्याम ऐश्वर्य को स्थापित करे।

श्लोक 4 (skanda.2.216.4)

मनोधीचित्ताहङ्कारान्क्रमात्पूर्वादिदिक्ष्वऽथ । विन्यसेत्पीठगात्रेषु हरिद्रक्तसितासितान्

manodhīcittāhaṅkārānkramātpūrvādidikṣva'tha | vinyasetpīṭhagātreṣu haridraktasitāsitān

फिर पीठ के फलकों पर पूर्व आदि दिशाओं में क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को पीत, रक्त, श्वेत और श्याम वर्णों में स्थापित करे।

श्लोक 5 (skanda.2.216.5)

स्थाप्या रक्तसितश्यामा रजःसत्त्वतमोगुणाः । पीठस्य पट्टिकायां तु त्रयोपि मुनिसत्तम

sthāpyā raktasitaśyāmā rajaḥsattvatamoguṇāḥ | pīṭhasya paṭṭikāyāṁ tu trayopi munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! पीठ की पट्टिका पर रजो, सत्त्व और तमो - तीनों गुणों को रक्त, श्वेत और श्याम वर्ण में स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.2.216.6)

अन्तःकरणरूपेषु गात्रेष्वथ चतुर्ष्वपि । विमलाद्या न्यसेच्छक्तीर्द्वेद्वे एकैकगात्रके

antaḥkaraṇarūpeṣu gātreṣvatha caturṣvapi | vimalādyā nyasecchaktīrdvedve ekaikagātrake

अन्तःकरण के रूप वाले उन चारों फलकों पर विमला आदि शक्तियों को, प्रत्येक फलक पर दो-दो, स्थापित करे।

श्लोक 7 (skanda.2.216.7)

विमलोत्कर्षिणीति द्वे गौराङ्ग्यौ पूर्वतो न्यसेत् । वादयन्त्यौ शुभां वीणां हरिद्वस्त्रे स्वलंकृते

vimalotkarṣiṇīti dve gaurāṅgyau pūrvato nyaset | vādayantyau śubhāṁ vīṇāṁ haridvastre svalaṁkṛte

विमला और उत्कर्षिणी नामक दोनों गौरांगी देवियों को पूर्व में, पीत वस्त्र से अलंकृत, शुभ वीणा बजाती हुई स्थापित करे।

श्लोक 8 (skanda.2.216.8)

ज्ञानाक्रिये न्यसेद्याम्ये पीतवस्त्रेऽरुणद्युती । एका तालं वादयन्ती मृदङ्गमपरा तथा

jñānākriye nyasedyāmye pītavastre'ruṇadyutī | ekā tālaṁ vādayantī mṛdaṅgamaparā tathā

ज्ञाना और क्रिया नामक, पीत वस्त्र और अरुण कान्ति वाली देवियों को दक्षिण में स्थापित करे - एक ताल बजाती हुई, दूसरी मृदंग बजाती हुई।

श्लोक 9 (skanda.2.216.9)

योगाप्रद्ध्यौ न्यसेत्पश्चाच्छ्यामे अरुणवाससौ । सहेव मुरली चोभे वादयन्त्यौ पृथक्पृथक्

yogāpraddhyau nyasetpaścācchyāme aruṇavāsasau | saheva muralī cobhe vādayantyau pṛthakpṛthak

योगा और प्रद्धा नामक श्याम वर्ण, अरुण वस्त्र वाली देवियों को पश्चिम में स्थापित करे, दोनों साथ-साथ पृथक्-पृथक् मुरली बजाती हुई।

श्लोक 10 (skanda.2.216.10)

सत्येशाने हेमवर्णे उत्तरस्यां ततो न्यसेत् । श्यामांशुके वादयन्त्यावुभे ते परिवादिनीम्

satyeśāne hemavarṇe uttarasyāṁ tato nyaset | śyāmāṁśuke vādayantyāvubhe te parivādinīm

सत्या और ईशाना नामक स्वर्णवर्ण, श्याम वस्त्र वाली देवियों को उत्तर में स्थापित करे, दोनों परिवादिनी वीणा बजाती हुई।

श्लोक 11 (skanda.2.216.11)

अनुग्रहाख्या पट्टिकायां स्थाप्यैका च कृताञ्जलिः । सर्वा एतास्तु कर्तव्या द्विभुजाः सुविभूषणाः

anugrahākhyā paṭṭikāyāṁ sthāpyaikā ca kṛtāñjaliḥ | sarvā etāstu kartavyā dvibhujāḥ suvibhūṣaṇāḥ

अनुग्रहा नामक एक देवी को पट्टिका पर हाथ जोड़े हुए स्थापित करे; ये सभी द्विभुज और सुविभूषित बनानी चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.2.216.12)

पीठोपरि सितद्वीपं कुर्वीत श्वेतवाससा । तन्मध्येऽष्टदलं पद्मं कुर्वीतोज्वलकर्णिकम्

pīṭhopari sitadvīpaṁ kurvīta śvetavāsasā | tanmadhye'ṣṭadalaṁ padmaṁ kurvītojvalakarṇikam

पीठ के ऊपर श्वेत वस्त्र से श्वेत द्वीप बनाए; उसके मध्य में उज्ज्वल कर्णिका वाला अष्टदल कमल बनाए।

श्लोक 13 (skanda.2.216.13)

द्वादशांशं परित्यज्य पद्मक्षेत्रस्य बाह्यतः । वृत्तैस्त्रिभिस्तस्य मध्यं विभजेत्समभागतः

dvādaśāṁśaṁ parityajya padmakṣetrasya bāhyataḥ | vṛttaistribhistasya madhyaṁ vibhajetsamabhāgataḥ

कमल-क्षेत्र के बारहवें भाग को बाहर छोड़कर, उसके मध्य भाग को तीन वृत्तों से समान भागों में बाँटे।

श्लोक 14 (skanda.2.216.14)

तत्राद्यं कर्णिकास्थानं केसराणां तु मध्यमम् । पत्राणां तु तृतीयं स्याद्दलाग्राणि तु बाह्यतः

tatrādyaṁ karṇikāsthānaṁ kesarāṇāṁ tu madhyamam | patrāṇāṁ tu tṛtīyaṁ syāddalāgrāṇi tu bāhyataḥ

उनमें पहला भाग कर्णिका का स्थान है, मध्य भाग केसरों का, तीसरा भाग पत्तों का, और बाहर दल के अग्रभाग हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.216.15)

परितस्तस्य च पुरं चतुर्द्वारं प्रकल्पयेत् । रङ्गद्रव्यैर्बहुविधैर्हरिद्राकुंकुमादिभिः

paritastasya ca puraṁ caturdvāraṁ prakalpayet | raṅgadravyairbahuvidhairharidrākuṁkumādibhiḥ

उसके चारों ओर हल्दी-कुंकुम आदि अनेक रंग-द्रव्यों से चार द्वारों वाला नगर बनाए।

श्लोक 16 (skanda.2.216.16)

कुर्वीत तण्डुलैर्वापि तत्र पद्मादि शोभनम् । पद्मस्य कर्णिकां मध्ये हेमवर्णा सुशोभयेत्

kurvīta taṇḍulairvāpi tatra padmādi śobhanam | padmasya karṇikāṁ madhye hemavarṇā suśobhayet

अथवा चावलों से भी वहाँ सुन्दर कमल आदि बनाए; कमल की कर्णिका को मध्य में स्वर्णवर्ण से सुशोभित करे।

श्लोक 17 (skanda.2.216.17)

शोणवर्णानि पत्राणि परितस्तस्य चार्चकः । कुर्यादष्टाप्यष्टदिक्षु स्वर्णवर्णानि वा मुने

śoṇavarṇāni patrāṇi paritastasya cārcakaḥ | kuryādaṣṭāpyaṣṭadikṣu svarṇavarṇāni vā mune

हे मुने! पूजक उसके चारों ओर लाल रंग की पंखुड़ियाँ, अथवा आठों दिशाओं में स्वर्णवर्ण की पंखुड़ियाँ बनाए।

श्लोक 18 (skanda.2.216.18)

पूर्वं तु गोपुरं शोणं श्यामं कुर्याच्च दक्षिणम् । पीतवर्णं पश्चिमं च स्फटिकाभं तथोत्तरम्

pūrvaṁ tu gopuraṁ śoṇaṁ śyāmaṁ kuryācca dakṣiṇam | pītavarṇaṁ paścimaṁ ca sphaṭikābhaṁ tathottaram

पूर्वी गोपुर लाल, दक्षिणी गोपुर श्याम, पश्चिमी गोपुर पीत वर्ण का, और उत्तरी गोपुर स्फटिक के समान बनाए।

श्लोक 19 (skanda.2.216.19)

अन्तराले च पुष्पाणि चित्राणि पुरपद्मयोः । कृत्वा मध्येऽथ श्रीकृष्णं तद्वामे राधिकां न्यसेत्

antarāle ca puṣpāṇi citrāṇi purapadmayoḥ | kṛtvā madhye'tha śrīkṛṣṇaṁ tadvāme rādhikāṁ nyaset

नगर और कमल के बीच के स्थान में विविध पुष्प बनाकर, फिर मध्य में श्रीकृष्ण को और उनके बाईं ओर राधिका को स्थापित करे।

श्लोक 20 (skanda.2.216.20)

राधाकृष्णस्यास्य ततः पृष्ठे संकर्षणं न्यसेत् । चतुर्बाहुं धृतच्छत्रं गौराङ्गं नीलवाससम्

rādhākṛṣṇasyāsya tataḥ pṛṣṭhe saṁkarṣaṇaṁ nyaset | caturbāhuṁ dhṛtacchatraṁ gaurāṅgaṁ nīlavāsasam

फिर इस राधाकृष्ण के पीछे, चतुर्भुज, छत्र धारण किए हुए, गौरवर्ण, नीलवस्त्रधारी संकर्षण को स्थापित करे।

श्लोक 21 (skanda.2.216.21)

दक्षे न्यसेद्भगवतः प्रद्युम्नं पीतवाससम् । चतुर्भुजं घनश्यामं धृत्वा चामरमास्थितम्

dakṣe nyasedbhagavataḥ pradyumnaṁ pītavāsasam | caturbhujaṁ ghanaśyāmaṁ dhṛtvā cāmaramāsthitam

भगवान् के दाहिनी ओर पीतवस्त्रधारी, चतुर्भुज, मेघ-श्याम, चामर धारण किए हुए प्रद्युम्न को स्थापित करे।

श्लोक 22 (skanda.2.216.22)

वामेऽनिरुद्धं च हरेर्न्यसेदरुणवाससम् । इन्द्रनीलमणिश्यामं संस्थितं धृतचामरम्

vāme'niruddhaṁ ca harernyasedaruṇavāsasam | indranīlamaṇiśyāmaṁ saṁsthitaṁ dhṛtacāmaram

हरि के बाईं ओर अरुणवस्त्रधारी, इन्द्रनील मणि के समान श्याम, चामर धारण किए हुए अनिरुद्ध को स्थापित करे।

श्लोक 23 (skanda.2.216.23)

त्रयोप्येते तु कर्तव्या नानालंकारशोभिताः । अनर्घ्यरत्नमुकुटास्तारुण्येन मनोहराः

trayopyete tu kartavyā nānālaṁkāraśobhitāḥ | anarghyaratnamukuṭāstāruṇyena manoharāḥ

ये तीनों ही विविध आभूषणों से सुशोभित, अमूल्य रत्नों के मुकुटधारी और तरुणाई से मनोहर बनाने चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.2.216.24)

ततोऽवतारांस्तु हरेः केसरेष्वष्टसु क्रमात् । एकैकस्मिन्न्यसेद् द्वौद्वावष्टस्वेवं हि षोडश

tato'vatārāṁstu hareḥ kesareṣvaṣṭasu kramāt | ekaikasminnyased dvaudvāvaṣṭasvevaṁ hi ṣoḍaśa

फिर हरि के आठों केसरों पर क्रमशः अवतारों को स्थापित करे, प्रत्येक पर दो-दो, इस प्रकार आठों पर सोलह अवतार।

श्लोक 25 (skanda.2.216.25)

स्थापयेद्वामनं बुद्धं पूर्वस्मिन्केसरेऽग्रतः । घनश्यामावुभौ ह्येतौ करुणौ ब्रह्मचारिणौ

sthāpayedvāmanaṁ buddhaṁ pūrvasminkesare'grataḥ | ghanaśyāmāvubhau hyetau karuṇau brahmacāriṇau

पूर्वी केसर के अग्रभाग पर वामन और बुद्ध को स्थापित करे; दोनों ही मेघ-श्याम, करुणामय और ब्रह्मचारी हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.216.26)

सितांशुकौ करे दक्षे बिभ्रतौ फुल्लपङ्कजम् । अभयं वामहस्ते च शान्तौ यज्ञोपवीतिनौ

sitāṁśukau kare dakṣe bibhratau phullapaṅkajam | abhayaṁ vāmahaste ca śāntau yajñopavītinau

दोनों श्वेत वस्त्रधारी, दाहिने हाथ में खिला हुआ कमल और बाएँ हाथ में अभय-मुद्रा धारण किए हुए, शान्त और यज्ञोपवीतधारी।

श्लोक 27 (skanda.2.216.27)

कल्किनं पर्शुरामं च वह्निकोणेऽथ विन्यसेत् । खङ्गपाणिस्तत्र कल्की पर्शुपाणिस्तथाऽपरः

kalkinaṁ parśurāmaṁ ca vahnikoṇe'tha vinyaset | khaṅgapāṇistatra kalkī parśupāṇistathā'paraḥ

फिर अग्निकोण में कल्कि और परशुराम को स्थापित करे; वहाँ कल्कि के हाथ में खड्ग है, और दूसरे के हाथ में फरसा है।

श्लोक 28 (skanda.2.216.28)

उभौ गौरौ च ताम्राक्षौ जटिलौ सितवाससौ । यज्ञोपवीतिनौ कार्यौ त्यक्तक्रोधमहारयौ

ubhau gaurau ca tāmrākṣau jaṭilau sitavāsasau | yajñopavītinau kāryau tyaktakrodhamahārayau

दोनों गौरवर्ण, ताम्रनयन, जटाधारी, श्वेतवस्त्रधारी, यज्ञोपवीतधारी और क्रोध-वैर से रहित बनाने चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.216.29)

हयग्रीववराहौ च स्थापयेद्याम्यकेसरे । हयग्रीवो हयास्यः स्यान्नरांगश्च चतुर्भुजः

hayagrīvavarāhau ca sthāpayedyāmyakesare | hayagrīvo hayāsyaḥ syānnarāṁgaśca caturbhujaḥ

दक्षिणी केसर पर हयग्रीव और वराह को स्थापित करे; हयग्रीव का मुख अश्व का, शरीर मानव का और चार भुजाएँ हों।

श्लोक 30 (skanda.2.216.30)

शङ्खादिभृत्स्वर्णवर्णो धृतदिव्यसिताम्बरः । वराहस्तु वराहास्यो नरांगः स्याच्चतुर्भुजः

śaṅkhādibhṛtsvarṇavarṇo dhṛtadivyasitāmbaraḥ | varāhastu varāhāsyo narāṁgaḥ syāccaturbhujaḥ

शंखादि धारण करने वाला, स्वर्णवर्ण, दिव्य श्वेत वस्त्रधारी; वराह का मुख शूकर का, शरीर मानव का और चार भुजाएँ हों।

श्लोक 31 (skanda.2.216.31)

शङ्खचक्रगदाब्जानि दधत्पीताम्बरं तथा । मधुपिंगलवर्णश्च कर्त्तव्यो द्विभुजोऽथ वा

śaṅkhacakragadābjāni dadhatpītāmbaraṁ tathā | madhupiṁgalavarṇaśca karttavyo dvibhujo'tha vā

शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करने वाला, पीतवस्त्रधारी, मधु के समान पिंगल वर्ण वाला - अथवा उसे द्विभुज भी बनाया जा सकता है।

श्लोक 32 (skanda.2.216.32)

मत्स्यकूर्म्मौ नैर्ऋते च स्थापयेत्केसरे ततः । कटेरधस्तदाकारावूर्द्ध्वं तौ तु नराकृती

matsyakūrmmau nairṛte ca sthāpayetkesare tataḥ | kaṭeradhastadākārāvūrddhvaṁ tau tu narākṛtī

फिर नैर्ऋत्य केसर पर मत्स्य और कूर्म को स्थापित करे; कटि के नीचे उनका (मत्स्य/कूर्म) आकार, ऊपर मानव आकृति हो।

श्लोक 33 (skanda.2.216.33)

वामे शंखं गदां दक्षे पाणौ च दधतावुभौ । श्यामसुन्दरदेहौ च कर्त्तव्यौ धृतभूषणौ

vāme śaṁkhaṁ gadāṁ dakṣe pāṇau ca dadhatāvubhau | śyāmasundaradehau ca karttavyau dhṛtabhūṣaṇau

दोनों बाएँ हाथ में शंख और दाहिने हाथ में गदा धारण करने वाले, श्याम-सुन्दर शरीर वाले और आभूषणधारी बनाने चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.2.216.34)

धन्वन्तरिं नृसिंहं च पश्चिमे केसरे न्यसेत् । धन्वन्तरिः शुक्लवासा गौरांगोऽमृतकुम्भधृत्

dhanvantariṁ nṛsiṁhaṁ ca paścime kesare nyaset | dhanvantariḥ śuklavāsā gaurāṁgo'mṛtakumbhadhṛt

पश्चिमी केसर पर धन्वन्तरि और नृसिंह को स्थापित करे; धन्वन्तरि श्वेतवस्त्रधारी, गौरवर्ण, अमृत-कलश धारण किए हुए।

श्लोक 35 (skanda.2.216.35)

सिंहवक्त्रो नृसिंहस्तु नृदेहः केसरान्वितः । नीलोत्पलाभो द्विभुजो गदाचक्रधरो भवेत

siṁhavaktro nṛsiṁhastu nṛdehaḥ kesarānvitaḥ | nīlotpalābho dvibhujo gadācakradharo bhaveta

नृसिंह का मुख सिंह का, शरीर मानव का, अयाल सहित; नील कमल के समान श्याम, द्विभुज, गदा-चक्र धारण करने वाला हो।

श्लोक 36 (skanda.2.216.36)

वायौ न्यसेदुभौ हंसदत्तात्रेयौ जटाधरौ । योगिवेषौ सितौ दण्डकमण्डलुकरौ तथा

vāyau nyasedubhau haṁsadattātreyau jaṭādharau | yogiveṣau sitau daṇḍakamaṇḍalukarau tathā

वायव्य कोण में जटाधारी, योगी-वेषधारी, श्वेत, हाथों में दण्ड-कमण्डलु लिए हंस और दत्तात्रेय दोनों को स्थापित करे।

श्लोक 37 (skanda.2.216.37)

उत्तरे केसरे व्यासं न्यसेद्गणपतिं ततः । तत्र व्यासो विशालाक्षः कृष्णवर्णः सिताम्बरः

uttare kesare vyāsaṁ nyasedgaṇapatiṁ tataḥ | tatra vyāso viśālākṣaḥ kṛṣṇavarṇaḥ sitāmbaraḥ

उत्तरी केसर पर व्यास और गणपति को स्थापित करे; वहाँ व्यास विशाल नेत्रों वाले, श्यामवर्ण, श्वेतवस्त्रधारी हों।

श्लोक 38 (skanda.2.216.38)

द्विभुजो धृतवेदश्च सुपिशंगजटाधरः । सितयज्ञोपवीतश्च कर्त्तव्यः सपवित्रकः

dvibhujo dhṛtavedaśca supiśaṁgajaṭādharaḥ | sitayajñopavītaśca karttavyaḥ sapavitrakaḥ

द्विभुज, वेदधारी, सुन्दर पिंगल जटाधारी, श्वेत यज्ञोपवीत और पवित्रक सहित बनाने चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.2.216.39)

गजास्य एकदन्तश्च रक्तो गणपतिर्भवेत् । रक्ताम्बरधरश्चैव नागयज्ञोपवीतवान्

gajāsya ekadantaśca rakto gaṇapatirbhavet | raktāmbaradharaścaiva nāgayajñopavītavān

गणपति गजमुख, एकदन्त, रक्तवर्ण, रक्तवस्त्रधारी और नागयज्ञोपवीतधारी होने चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.2.216.40)

तुन्दिलश्च चतुर्बाहुः पाशाङ्कुशवरान्दधत् । करेणैकेन च दधद्रम्यां पुस्तकलेखिनीम्

tundilaśca caturbāhuḥ pāśāṅkuśavarāndadhat | kareṇaikena ca dadhadramyāṁ pustakalekhinīm

तुन्दिल, चतुर्भुज, पाश-अंकुश-वरमुद्रा धारण करने वाले, और एक हाथ में सुन्दर पुस्तक और लेखनी धारण करने वाले।

श्लोक 41 (skanda.2.216.41)

न्यसेत्केसर ईशाने कपिलं पूजकस्ततः । सनत्कुमारं च मुनिं नैष्ठिकब्रह्मचारिणम्

nyasetkesara īśāne kapilaṁ pūjakastataḥ | sanatkumāraṁ ca muniṁ naiṣṭhikabrahmacāriṇam

फिर पूजक ईशान केसर पर कपिल और नैष्ठिक ब्रह्मचारी मुनि सनत्कुमार को स्थापित करे।

श्लोक 42 (skanda.2.216.42)

शुक्लांगः कपिलः कार्यो धृतचारुसिताम्बरः । दधत्कराभ्यामम्भोजमभयं शान्तविग्रहम्

śuklāṁgaḥ kapilaḥ kāryo dhṛtacārusitāmbaraḥ | dadhatkarābhyāmambhojamabhayaṁ śāntavigraham

कपिल गौरांग, सुन्दर श्वेतवस्त्रधारी, एक हाथ में कमल और दूसरे में अभय-मुद्रा धारण किए, शान्त स्वरूप वाले बनाने चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.2.216.43)

पञ्चवार्षिकबालाभो दिग्वस्त्रोऽल्पजटाधरः । सनत्कुमारश्च मुनिः कर्त्तव्यः पूजकेन तु

pañcavārṣikabālābho digvastro'lpajaṭādharaḥ | sanatkumāraśca muniḥ karttavyaḥ pūjakena tu

मुनि सनत्कुमार को पूजक पाँच वर्ष के बालक के समान, दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले, अल्प जटाधारी बनाना चाहिए।

श्लोक 44 (skanda.2.216.44)

संस्थाप्य केसरेष्वित्थं देवताः पङ्कजस्य तु । न्यसेच्च दलमध्येषु पार्षदानर्च्चकोऽष्टसु

saṁsthāpya kesareṣvitthaṁ devatāḥ paṅkajasya tu | nyasecca dalamadhyeṣu pārṣadānarccako'ṣṭasu

इस प्रकार केसरों पर देवताओं को स्थापित करके, पूजक कमल के आठों दलों के मध्य में पार्षदों को स्थापित करे।

श्लोक 45 (skanda.2.216.45)

विष्वक्सेनं च गरुडं तत्रादौ पूर्वतो न्यसेत् । ततो दक्षक्रमेणैव प्रबलं च बलं न्यसेत्

viṣvaksenaṁ ca garuḍaṁ tatrādau pūrvato nyaset | tato dakṣakrameṇaiva prabalaṁ ca balaṁ nyaset

पहले पूर्व में विष्वक्सेन और गरुड़ को स्थापित करे; फिर दाहिनी ओर क्रम से प्रबल और बल को स्थापित करे।

श्लोक 46 (skanda.2.216.46)

कुमुदं कुमुदाक्षं च सुनन्दं नन्दमेव च । श्रुतदेवं जयन्तं च विन्यसेद्विजयं जयम्

kumudaṁ kumudākṣaṁ ca sunandaṁ nandameva ca | śrutadevaṁ jayantaṁ ca vinyasedvijayaṁ jayam

कुमुद और कुमुदाक्ष, सुनन्द और नन्द, श्रुतदेव और जयन्त, तथा विजय और जय को स्थापित करे।

श्लोक 47 (skanda.2.216.47)

ततः प्रचण्डं चण्डं च पुष्पदन्तं च सात्वतम् । द्वौद्वावेवं क्रमेणैव स्थानेष्वष्टसु विन्यसेत्

tataḥ pracaṇḍaṁ caṇḍaṁ ca puṣpadantaṁ ca sātvatam | dvaudvāvevaṁ krameṇaiva sthāneṣvaṣṭasu vinyaset

फिर प्रचण्ड और चण्ड, तथा पुष्पदन्त और सात्वत को - इस प्रकार क्रम से आठों स्थानों में दो-दो स्थापित करे।

श्लोक 48 (skanda.2.216.48)

चतुर्भुजाः सर्व एते शङ्खार्यब्जगदाधराः । कार्याः किरिटिनः श्यामाः पीतवस्त्राः सुभूषणाः

caturbhujāḥ sarva ete śaṅkhāryabjagadādharāḥ | kāryāḥ kiriṭinaḥ śyāmāḥ pītavastrāḥ subhūṣaṇāḥ

ये सभी चतुर्भुज, शंख-चक्र-पद्म-गदा धारण करने वाले, मुकुटधारी, श्यामवर्ण, पीतवस्त्रधारी और सुभूषित बनाने चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.2.216.49)

दलमध्यान्तरालेषु सिद्धीरष्टसु विन्यसेत् । नाना मंगलवाद्यानां वादने निपुणाः क्रमात्

dalamadhyāntarāleṣu siddhīraṣṭasu vinyaset | nānā maṁgalavādyānāṁ vādane nipuṇāḥ kramāt

दलों के मध्य के अन्तरालों में आठों सिद्धियों को स्थापित करे, जो क्रमशः विविध मंगल-वाद्यों को बजाने में निपुण हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.216.50)

अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा । ईशिता वशिता चैवाष्टमी कामावसायिता

aṇimā laghimā prāptiḥ prākāmyaṁ mahimā tathā | īśitā vaśitā caivāṣṭamī kāmāvasāyitā

अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशिता, वशिता, और आठवीं कामावसायिता।

श्लोक 51 (skanda.2.216.51)

एताः सुवर्णवर्णाभाः सर्वाभरणभूषिताः । वेणुवीणादिहस्ताश्च कर्त्तव्याश्चित्रवाससः

etāḥ suvarṇavarṇābhāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ | veṇuvīṇādihastāśca karttavyāścitravāsasaḥ

ये स्वर्णवर्ण, सर्वाभूषणभूषित, हाथों में वेणु-वीणा आदि धारण करने वाली और विविध रंगों के वस्त्रधारी बनानी चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.2.216.52)

दलाग्रेष्वष्टसु ततो वेदाञ्छास्त्राणि च न्यसेत् । तत्र वेदान्न्यसेद्दिक्षु शास्त्राणि तु विदिक्षु सः

dalāgreṣvaṣṭasu tato vedāñchāstrāṇi ca nyaset | tatra vedānnyaseddikṣu śāstrāṇi tu vidikṣu saḥ

फिर आठों दलों के अग्रभाग पर वेदों और शास्त्रों को स्थापित करे; वेदों को दिशाओं में और शास्त्रों को विदिशाओं में स्थापित करे।

श्लोक 53 (skanda.2.216.53)

पूर्वे न्यसेत्तु ऋग्वेदमक्षमालाधरं सितम् । खर्वं लम्बोदरं सौम्यं पद्मनेत्रं सिताम्बरम्

pūrve nyasettu ṛgvedamakṣamālādharaṁ sitam | kharvaṁ lambodaraṁ saumyaṁ padmanetraṁ sitāmbaram

पूर्व में अक्षमाला धारण करने वाले श्वेतवर्ण ऋग्वेद को स्थापित करे, जो नाटे कद, लम्बोदर, सौम्य और पद्मनेत्र, श्वेतवस्त्रधारी हों।

श्लोक 54 (skanda.2.216.54)

याम्ये न्यसेद्यजुर्वेदं मध्यमांगं कृशोदरम् । पिंगाक्षं स्थूलकण्ठं च पीतं चारुणवाससम्

yāmye nyasedyajurvedaṁ madhyamāṁgaṁ kṛśodaram | piṁgākṣaṁ sthūlakaṇṭhaṁ ca pītaṁ cāruṇavāsasam

दक्षिण में यजुर्वेद को स्थापित करे, जो मध्यम शरीर, कृशोदर, पिंगल नेत्र, स्थूल कण्ठ, पीतवर्ण और सुन्दर लाल वस्त्रधारी हों।

श्लोक 55 (skanda.2.216.55)

अक्षस्रजं करे वामे दक्षे वज्रं च बिभ्रतम् । पश्चिमे सामवेदं च प्रांशुमादित्यवर्चसम्

akṣasrajaṁ kare vāme dakṣe vajraṁ ca bibhratam | paścime sāmavedaṁ ca prāṁśumādityavarcasam

बाएँ हाथ में अक्षमाला और दाहिने में वज्र धारण करने वाला; पश्चिम में सामवेद को स्थापित करे, जो लम्बे कद के और सूर्य के समान तेजस्वी हों।

श्लोक 56 (skanda.2.216.56)

दक्षेऽक्षमालां वामे च धृतवन्तं करे दरम् । स्वर्णवस्त्रं विशालाक्षं विन्यसेद्गायनोद्यतम्

dakṣe'kṣamālāṁ vāme ca dhṛtavantaṁ kare daram | svarṇavastraṁ viśālākṣaṁ vinyasedgāyanodyatam

दाहिने हाथ में अक्षमाला और बाएँ में शंख धारण करने वाले, स्वर्णवस्त्रधारी, विशाल नेत्र वाले और गायन में तत्पर उन्हें स्थापित करे।

श्लोक 57 (skanda.2.216.57)

अथर्वाणं न्यसेत्सौम्ये सितांगं नीलवाससम् । वामेऽक्षसूत्रं दक्षे च खट्वांगं बिभ्रतं करे । वह्न्योजसं च ताम्राक्षं वयसा स्थविरं तथा

atharvāṇaṁ nyasetsaumye sitāṁgaṁ nīlavāsasam | vāme'kṣasūtraṁ dakṣe ca khaṭvāṁgaṁ bibhrataṁ kare | vahnyojasaṁ ca tāmrākṣaṁ vayasā sthaviraṁ tathā

उत्तर में अथर्ववेद को स्थापित करे, जो श्वेतांग, नीलवस्त्रधारी, बाएँ हाथ में अक्षसूत्र और दाहिने में खट्वांग धारण किए हों, अग्नि के समान तेजस्वी, ताम्रनेत्र और वृद्धावस्था वाले।

श्लोक 58 (skanda.2.216.58)

अग्निकोणे धर्मशास्त्रं न्यसेच्च कमलासनम् । श्वेतं च बिभ्रतं दोर्भ्यां मुक्तामालां तथातुलाम्

agnikoṇe dharmaśāstraṁ nyasecca kamalāsanam | śvetaṁ ca bibhrataṁ dorbhyāṁ muktāmālāṁ tathātulām

अग्निकोण में धर्मशास्त्र को कमलासन पर बैठा हुआ, श्वेतवर्ण, दोनों भुजाओं में अनुपम मुक्तामाला धारण किए हुए स्थापित करे।

श्लोक 59 (skanda.2.216.59)

दीर्घकेशनखं सांख्यं नैर्ऋते तुन्दिलं न्यसेत् । जपमालां च दण्डं च कराभ्यां बिभ्रतं सितम्

dīrghakeśanakhaṁ sāṁkhyaṁ nairṛte tundilaṁ nyaset | japamālāṁ ca daṇḍaṁ ca karābhyāṁ bibhrataṁ sitam

नैर्ऋत्य में सांख्यशास्त्र को स्थापित करे, जो दीर्घ केश-नख वाला, तुन्दिल, श्वेत, दोनों हाथों में जपमाला और दण्ड धारण किए हो।

श्लोक 60 (skanda.2.216.60)

न्यसेद्वायौ ततो योगं स्वर्णवर्णं कृशोदरम् । ऊरुन्यस्तकरद्वन्द्वं स्वनासाग्रकृतेक्षणम्

nyasedvāyau tato yogaṁ svarṇavarṇaṁ kṛśodaram | ūrunyastakaradvandvaṁ svanāsāgrakṛtekṣaṇam

फिर वायव्य में योगशास्त्र को स्थापित करे, जो स्वर्णवर्ण, कृशोदर, दोनों हाथ जंघाओं पर रखे और नासाग्र पर दृष्टि जमाए हो।

श्लोक 61 (skanda.2.216.61)

पञ्चरात्रं तथेशाने धवलं वनमालिनम् । न्यसेत्कराभ्यां दधतमक्षमालां च लांगलम्

pañcarātraṁ tatheśāne dhavalaṁ vanamālinam | nyasetkarābhyāṁ dadhatamakṣamālāṁ ca lāṁgalam

और ईशान में पंचरात्रशास्त्र को स्थापित करे, जो श्वेत, वनमाला धारण किए, दोनों हाथों में अक्षमाला और हल धारण किए हो।

श्लोक 62 (skanda.2.216.62)

एषां चतुर्णां वासांसि श्वेतसूक्ष्मघनानि च । कर्त्तव्यानि तथाक्षीणि पद्मपत्रायतानि च

eṣāṁ caturṇāṁ vāsāṁsi śvetasūkṣmaghanāni ca | karttavyāni tathākṣīṇi padmapatrāyatāni ca

इन चारों के वस्त्र श्वेत, सूक्ष्म और घने बनाने चाहिए, तथा उनके नेत्र कमल-पत्र के समान लम्बे बनाने चाहिए।

श्लोक 63 (skanda.2.216.63)

अग्राणामन्तरालेषु महर्षींश्च सयोषितः । विन्यसेत्पठतो वेदान्पूर्वाग्नेयाद्यनुक्रमात्

agrāṇāmantarāleṣu maharṣīṁśca sayoṣitaḥ | vinyasetpaṭhato vedānpūrvāgneyādyanukramāt

दलों के अग्रभागों के बीच के स्थानों में, पूर्व-आग्नेय आदि क्रम से, वेद पढ़ते हुए महर्षियों को उनकी पत्नियों सहित स्थापित करे।

श्लोक 64 (skanda.2.216.64)

मरीचिं कलया युक्तमत्रिं चाप्यनसूयया । श्रद्धयांगिरसं साकं पुलस्त्यं च हविर्भुवा

marīciṁ kalayā yuktamatriṁ cāpyanasūyayā | śraddhayāṁgirasaṁ sākaṁ pulastyaṁ ca havirbhuvā

मरीचि को कला के साथ, अत्रि को अनसूया के साथ, अंगिरा को श्रद्धा के साथ, और पुलस्त्य को हविर्भू के साथ स्थापित करे।

श्लोक 65 (skanda.2.216.65)

गत्या युक्तं च पुलहं क्रियया च सह क्रतुम् । ख्यात्या भृगुमरुन्धत्या वशिष्ठं सह विन्यसेत्

gatyā yuktaṁ ca pulahaṁ kriyayā ca saha kratum | khyātyā bhṛgumarundhatyā vaśiṣṭhaṁ saha vinyaset

पुलह को गति के साथ, क्रतु को क्रिया के साथ, भृगु को ख्याति के साथ, और वसिष्ठ को अरुन्धती के साथ स्थापित करे।

श्लोक 66 (skanda.2.216.66)

द्विभुजाः सर्व एवैते जटाश्मश्रुधराः कृशाः । कार्यास्तपस्विनो दण्डान्दधतश्च कमण्डलून्

dvibhujāḥ sarva evaite jaṭāśmaśrudharāḥ kṛśāḥ | kāryāstapasvino daṇḍāndadhataśca kamaṇḍalūn

ये सभी द्विभुज, जटा-दाढ़ी धारण करने वाले, कृश शरीर, तपस्वी रूप वाले तथा दण्ड-कमण्डलु धारण करने वाले बनाने चाहिए।

श्लोक 67 (skanda.2.216.67)

पद्माद्बहिर्न्यसेच्चाऽष्टौ दिशासु विदिशासु च । दिक्पालानिन्द्रप्रमुखान्सहयानान्यथादिशम्

padmādbahirnyaseccā'ṣṭau diśāsu vidiśāsu ca | dikpālānindrapramukhānsahayānānyathādiśam

कमल के बाहर आठों दिशाओं और विदिशाओं में इन्द्र आदि दिक्पालों को उनके-उनके वाहनों सहित, अपनी-अपनी दिशा में स्थापित करे।

श्लोक 68 (skanda.2.216.68)

प्राच्यामैरावतारूढं न्यसेदिन्द्रं चतुर्भुजम् । वज्रांकुशाम्बुजवरान्दधतं स्वर्णसन्निभम्

prācyāmairāvatārūḍhaṁ nyasedindraṁ caturbhujam | vajrāṁkuśāmbujavarāndadhataṁ svarṇasannibham

पूर्व में ऐरावत पर आरूढ़ चतुर्भुज इन्द्र को स्थापित करे, जो वज्र, अंकुश, कमल और वरमुद्रा धारण किए हुए, स्वर्ण के समान वर्ण वाले हों।

श्लोक 69 (skanda.2.216.69)

कौसुम्भरम्यवसनं नानालंकारशोभितम् । शोणापांगं विशालाक्षं सर्वलक्षणलक्षितम्

kausumbharamyavasanaṁ nānālaṁkāraśobhitam | śoṇāpāṁgaṁ viśālākṣaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam

सुन्दर लाल वस्त्रधारी, विविध आभूषणों से सुशोभित, कोरों में लालिमा लिए विशाल नेत्रों वाले और सभी शुभ लक्षणों से युक्त।

श्लोक 70 (skanda.2.216.70)

अग्निकोणे न्यसेदग्निं ताम्रवर्णं चतुर्भुजम् । दधानं पाणिभिश्चैव शूलं शक्तिं स्रुचं स्रुवम्

agnikoṇe nyasedagniṁ tāmravarṇaṁ caturbhujam | dadhānaṁ pāṇibhiścaiva śūlaṁ śaktiṁ srucaṁ sruvam

अग्निकोण में ताम्रवर्ण चतुर्भुज अग्नि को स्थापित करे, जो हाथों में त्रिशूल, शक्ति, स्रुक् और स्रुवा धारण किए हों।

श्लोक 71 (skanda.2.216.71)

चतुःशुके हैमरथे निषण्णं वायुसारथिम् । त्रिनेत्रं धूम्रवसनं पिङ्गश्मश्रुजटेक्षणम्

catuḥśuke haimarathe niṣaṇṇaṁ vāyusārathim | trinetraṁ dhūmravasanaṁ piṅgaśmaśrujaṭekṣaṇam

चार बकरों से जुते स्वर्ण रथ पर आसीन, वायु को सारथि बनाए हुए, त्रिनेत्र, धूम्रवस्त्रधारी, पिंगल दाढ़ी-जटा और नेत्रों वाले।

श्लोक 72 (skanda.2.216.72)

यमं न्यसेद्दक्षिणतः श्यामं चामीकराम्बरम् । चतुर्भुजं दण्डखड्गपरशुं पाशधारिणम् । उन्मत्तमहिषारूढं नानाभूषणभूषितम्

yamaṁ nyaseddakṣiṇataḥ śyāmaṁ cāmīkarāmbaram | caturbhujaṁ daṇḍakhaḍgaparaśuṁ pāśadhāriṇam | unmattamahiṣārūḍhaṁ nānābhūṣaṇabhūṣitam

दक्षिण में यम को स्थापित करे, जो श्यामवर्ण, स्वर्णवस्त्रधारी, चतुर्भुज, दण्ड-खड्ग-फरसा-पाश धारण किए, उन्मत्त भैंसे पर आरूढ़, विविध आभूषणों से सुशोभित हों।

श्लोक 73 (skanda.2.216.73)

ऊर्द्ध्वकेशं विरूपाक्षं नैर्ऋतं नैर्ऋते न्यसेत् । खड्गं पाशं च दधतं द्विभुजं नरवाहनम्

ūrddhvakeśaṁ virūpākṣaṁ nairṛtaṁ nairṛte nyaset | khaḍgaṁ pāśaṁ ca dadhataṁ dvibhujaṁ naravāhanam

नैर्ऋत्य में ऊर्ध्व केश और विरूप नेत्रों वाले निर्ऋति को स्थापित करे, जो द्विभुज, खड्ग-पाश धारण किए, मनुष्य को वाहन बनाए हों।

श्लोक 74 (skanda.2.216.74)

हरिश्मश्रुं धूम्रवर्णं परिवीतासिताम्बरम् । हाटकानेकभूषाढ्यमवैष्णवभयंकरम्

hariśmaśruṁ dhūmravarṇaṁ parivītāsitāmbaram | hāṭakānekabhūṣāḍhyamavaiṣṇavabhayaṁkaram

पिंगल दाढ़ी, धूम्रवर्ण, काले वस्त्र धारण किए, अनेक स्वर्णाभूषणों से युक्त, अवैष्णवों के लिए भयंकर।

श्लोक 75 (skanda.2.216.75)

ततः प्रतीच्यां वरुणमिन्द्रनीलमणिप्रभम् । श्वेताम्बरं चतुर्बाहुं मुक्ताहार विभूषितम्

tataḥ pratīcyāṁ varuṇamindranīlamaṇiprabham | śvetāmbaraṁ caturbāhuṁ muktāhāra vibhūṣitam

फिर पश्चिम में इन्द्रनील मणि के समान कान्तिवाले वरुण को स्थापित करे, जो श्वेतवस्त्रधारी, चतुर्भुज, मुक्ताहार से विभूषित हों।

श्लोक 76 (skanda.2.216.76)

सप्तहंसरथारूढं दोर्भ्यां पाशं च बिभ्रतम् । अन्याभ्यां रत्नपात्रं च शंखं च दधतं न्यसेत्

saptahaṁsarathārūḍhaṁ dorbhyāṁ pāśaṁ ca bibhratam | anyābhyāṁ ratnapātraṁ ca śaṁkhaṁ ca dadhataṁ nyaset

सात हंसों वाले रथ पर आरूढ़, एक जोड़ी हाथों में पाश धारण किए, दूसरी जोड़ी में रत्नपात्र और शंख धारण किए हुए स्थापित करे।

श्लोक 77 (skanda.2.216.77)

वायौ वायुं हरिद्वर्णं द्विभुजं कृष्णवाससम् । पृषत्स्थं मुक्तकेशं च व्यात्तास्यं ध्वजिनं न्यसेत्

vāyau vāyuṁ haridvarṇaṁ dvibhujaṁ kṛṣṇavāsasam | pṛṣatsthaṁ muktakeśaṁ ca vyāttāsyaṁ dhvajinaṁ nyaset

वायव्य में हरितवर्ण द्विभुज वायु को स्थापित करे, जो कृष्णवस्त्रधारी, मृग पर स्थित, बिखरे केशों और खुले मुख वाले, ध्वजाधारी हों।

श्लोक 78 (skanda.2.216.78)

सौम्ये न्यसेत्कुबेरं च स्वर्णवर्णं चतुर्भुजम् । गदाशक्तित्रिशूलानि रत्नपात्रं च बिभ्रतम्

saumye nyasetkuberaṁ ca svarṇavarṇaṁ caturbhujam | gadāśaktitriśūlāni ratnapātraṁ ca bibhratam

उत्तर में स्वर्णवर्ण चतुर्भुज कुबेर को स्थापित करे, जो गदा, शक्ति, त्रिशूल और रत्नपात्र धारण किए हों।

श्लोक 79 (skanda.2.216.79)

नीलाम्बरं श्मश्रुलं च शिबिकायां समास्थितम् । पिशंगवामनयनं नैकभूषं च वर्मिणम्

nīlāmbaraṁ śmaśrulaṁ ca śibikāyāṁ samāsthitam | piśaṁgavāmanayanaṁ naikabhūṣaṁ ca varmiṇam

नीलवस्त्रधारी, दाढ़ी वाले, पालकी में विराजमान, पिंगल बाईं आँख वाले, अनेक आभूषणों से युक्त और कवचधारी।

श्लोक 80 (skanda.2.216.80)

ईशानेऽथ मूहारुद्रमर्द्धनारीश्वरं न्यसेत् । वामार्द्धे पार्वती कार्या दक्षार्द्धे तत्र शंकरः

īśāne'tha mūhārudramarddhanārīśvaraṁ nyaset | vāmārddhe pārvatī kāryā dakṣārddhe tatra śaṁkaraḥ

फिर ईशान में अर्धनारीश्वर रुद्र को स्थापित करे; बाएँ आधे भाग में पार्वती और दाहिने आधे भाग में शंकर बनाने चाहिए।

श्लोक 81 (skanda.2.216.81)

ईश्वरार्द्धे जटाजूटं कर्तव्यं चन्द्रभूषितम् । उमार्द्धे तिलकं कार्यं सीमन्तमलिके तथा

īśvarārddhe jaṭājūṭaṁ kartavyaṁ candrabhūṣitam | umārddhe tilakaṁ kāryaṁ sīmantamalike tathā

ईश्वर के आधे भाग में चन्द्रभूषित जटाजूट बनाना चाहिए; उमा के आधे भाग में तिलक और सीमन्त बनाना चाहिए।

श्लोक 82 (skanda.2.216.82)

भस्मनोद्धूलितं चार्द्धमर्द्धं कुंकुमभूषितम् । नागोपवीतं चाप्यर्द्धमर्द्धं हारविभूषितम्

bhasmanoddhūlitaṁ cārddhamarddhaṁ kuṁkumabhūṣitam | nāgopavītaṁ cāpyarddhamarddhaṁ hāravibhūṣitam

एक आधा भाग भस्म से धूसरित, दूसरा आधा कुंकुम से भूषित; एक आधा नागोपवीत वाला, दूसरा आधा हार से विभूषित होना चाहिए।

श्लोक 83 (skanda.2.216.83)

वामार्द्धे च स्तनः पीनः कर्त्तव्यः कंचुकीवृतः । कट्यां च रशना हैमी पादे काञ्चननूपुरम्

vāmārddhe ca stanaḥ pīnaḥ karttavyaḥ kaṁcukīvṛtaḥ | kaṭyāṁ ca raśanā haimī pāde kāñcananūpuram

बाएँ आधे भाग में कंचुकी से आवृत पीन स्तन बनाना चाहिए; कटि में स्वर्ण की करधनी और पैर में स्वर्ण नूपुर।

श्लोक 84 (skanda.2.216.84)

कौसुम्भं वसनं चैव करौ कंकणभूषितौ । त्रिशूलमक्षसूत्रं च दधतौ रत्नमुद्रिकौ

kausumbhaṁ vasanaṁ caiva karau kaṁkaṇabhūṣitau | triśūlamakṣasūtraṁ ca dadhatau ratnamudrikau

लाल वस्त्र, दोनों हाथ कंकण से भूषित, त्रिशूल और अक्षसूत्र धारण किए हुए, तथा रत्नजड़ित अँगूठियाँ।

श्लोक 85 (skanda.2.216.85)

दक्षार्द्धे रशना सार्पी कार्या वस्त्रं गजाजिनम् । करौ च नागवलयौ दर्पणोत्पलधारिणौ

dakṣārddhe raśanā sārpī kāryā vastraṁ gajājinam | karau ca nāgavalayau darpaṇotpaladhāriṇau

दाहिने आधे भाग में सर्प की करधनी और गजचर्म का वस्त्र बनाना चाहिए; दोनों हाथ नागवलय से भूषित, दर्पण और नीलकमल धारण किए हुए।

श्लोक 86 (skanda.2.216.86)

एवंविधं महादेवं न्यसेद्वृषभवाहनम् । इत्थमष्टदिगीशानां कुर्यात्स्थापनमर्चकः

evaṁvidhaṁ mahādevaṁ nyasedvṛṣabhavāhanam | itthamaṣṭadigīśānāṁ kuryātsthāpanamarcakaḥ

इस प्रकार के महादेव को वृषभवाहन सहित स्थापित करे। इस प्रकार पूजक आठों दिक्पतियों की स्थापना करे।

श्लोक 87 (skanda.2.216.87)

पुराद्बहिस्ततश्चाष्टौ स्थापयेदर्चको ग्रहान् । स्वस्वदिक्षु स्थितान्स्वस्वान्यारूढान्स्यन्दनानि च

purādbahistataścāṣṭau sthāpayedarcako grahān | svasvadikṣu sthitānsvasvānyārūḍhānsyandanāni ca

फिर नगर के बाहर पूजक आठों ग्रहों को अपनी-अपनी दिशा में स्थित, अपने-अपने रथ पर आरूढ़ स्थापित करे।

श्लोक 88 (skanda.2.216.88)

प्राच्यां दिशि न्यसेत्तत्र भास्करं पीतवाससम् । सिन्दूरवर्णं द्विभुजं पद्महस्तं रथे स्थितम्

prācyāṁ diśi nyasettatra bhāskaraṁ pītavāsasam | sindūravarṇaṁ dvibhujaṁ padmahastaṁ rathe sthitam

पूर्व दिशा में पीतवस्त्रधारी, सिन्दूरवर्ण, द्विभुज, हाथ में कमल लिए, रथ में स्थित सूर्य को स्थापित करे।

श्लोक 89 (skanda.2.216.89)

एकं चक्रं द्वादशारं रथस्यास्यातितेजसः । सप्ताश्वाश्च हरिद्वर्णा वामे सन्ति नियोजिताः

ekaṁ cakraṁ dvādaśāraṁ rathasyāsyātitejasaḥ | saptāśvāśca haridvarṇā vāme santi niyojitāḥ

अत्यन्त तेजस्वी उस रथ का एक पहिया है, जिसमें बारह अरे हैं; और उसके बाईं ओर सात हरितवर्ण अश्व जुते हुए हैं।

श्लोक 90 (skanda.2.216.90)

अग्निकोणे ततः स्थाप्यो भृगुः श्वेतः सिताम्बरः । दण्डं कमण्डलुं बिभ्रद्द्विबाहुः सौम्यदर्शनः

agnikoṇe tataḥ sthāpyo bhṛguḥ śvetaḥ sitāmbaraḥ | daṇḍaṁ kamaṇḍaluṁ bibhraddvibāhuḥ saumyadarśanaḥ

फिर अग्निकोण में श्वेतवर्ण, श्वेतवस्त्रधारी शुक्र को स्थापित करे, जो दण्ड-कमण्डलु धारण किए, द्विभुज, सौम्य दर्शन वाले हों।

श्लोक 91 (skanda.2.216.91)

चित्रवर्णाश्वदशके स्थितो हेममये रथे । दक्षिणे च न्यसेद्भौमं रक्तं रक्ताम्बरं तथा

citravarṇāśvadaśake sthito hemamaye rathe | dakṣiṇe ca nyasedbhaumaṁ raktaṁ raktāmbaraṁ tathā

विविधवर्ण दस अश्वों वाले स्वर्णरथ में विराजमान; और दक्षिण में रक्तवर्ण, रक्तवस्त्रधारी मंगल को स्थापित करे।

श्लोक 92 (skanda.2.216.92)

चतुर्भुजं गदाशक्तित्रिशूलवरधारिणम् । तस्य हैमं रथं कुर्यादरुणाष्टहयान्वितम्

caturbhujaṁ gadāśaktitriśūlavaradhāriṇam | tasya haimaṁ rathaṁ kuryādaruṇāṣṭahayānvitam

चतुर्भुज, गदा-शक्ति-त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किए हुए; उनका रथ स्वर्ण का, आठ अरुण अश्वों से युक्त बनाना चाहिए।

श्लोक 93 (skanda.2.216.93)

राहुश्च नैर्ऋते कोणे नीलवासाश्चतुर्भुजः । करालास्यस्तमोरूपश्चर्मासिशक्तिशूलधृत्

rāhuśca nairṛte koṇe nīlavāsāścaturbhujaḥ | karālāsyastamorūpaścarmāsiśaktiśūladhṛt

नैर्ऋत्य कोण में नीलवस्त्रधारी, चतुर्भुज, भयंकर मुख वाले, तमोरूप, चर्म-खड्ग-शक्ति-त्रिशूलधारी राहु को स्थापित करे।

श्लोक 94 (skanda.2.216.94)

भृङ्गवर्णाष्टतुरगे स्थितः कार्यस्त्वयोरथे । सौरिश्च पश्चिमे स्थाप्य इन्द्रनीलसमद्युतिः

bhṛṅgavarṇāṣṭaturage sthitaḥ kāryastvayorathe | sauriśca paścime sthāpya indranīlasamadyutiḥ

भ्रमर के समान श्याम आठ अश्वों वाले लौह-रथ में स्थित बनाना चाहिए; और पश्चिम में इन्द्रनील मणि के समान कान्तिवाले शनि को स्थापित करे।

श्लोक 95 (skanda.2.216.95)

धन्वी त्रिशूली द्विभुजो मन्दाक्षश्चासिताम्बरः । शबलाष्टाश्वसंयुक्ते स्थितः कार्ष्णायसे रथे

dhanvī triśūlī dvibhujo mandākṣaścāsitāmbaraḥ | śabalāṣṭāśvasaṁyukte sthitaḥ kārṣṇāyase rathe

धनुषधारी, त्रिशूलधारी, द्विभुज, मन्द नेत्रों वाले, काले वस्त्रधारी, चितकबरे आठ अश्वों वाले लौह-रथ में स्थित।

श्लोक 96 (skanda.2.216.96)

वायुकोणे ततश्चन्द्रं स्थापयेच्च सिताम्बरम् । श्वेतवर्णं गदाहस्तं द्विभुजं च रथे स्थितम्

vāyukoṇe tataścandraṁ sthāpayecca sitāmbaram | śvetavarṇaṁ gadāhastaṁ dvibhujaṁ ca rathe sthitam

फिर वायव्य कोण में श्वेतवस्त्रधारी, श्वेतवर्ण, हाथ में गदा लिए, द्विभुज चन्द्रमा को रथ में स्थित स्थापित करे।

श्लोक 97 (skanda.2.216.97)

शतारचक्रत्रितये स्यन्दने तस्य चाम्मये । कुन्दाभाः सन्त्युभयतो योजितास्तुरगा दश

śatāracakratritaye syandane tasya cāmmaye | kundābhāḥ santyubhayato yojitāsturagā daśa

उनके चाँदी के रथ में सौ-सौ अरों वाले तीन पहिए हैं, तथा दोनों ओर चमेली के समान श्वेत दस अश्व जुते हुए हैं।

श्लोक 98 (skanda.2.216.98)

उत्तरे द्विभुजः सौम्यो वराभयकरोरुणः । हरिद्वासाष्टपिंगाश्वे कार्यो हैमरथे स्थितः

uttare dvibhujaḥ saumyo varābhayakaroruṇaḥ | haridvāsāṣṭapiṁgāśve kāryo haimarathe sthitaḥ

उत्तर में द्विभुज, सौम्य, वर-अभय मुद्रा धारण करने वाले, अरुणवर्ण बुध को स्वर्णरथ में आठ पिंगल-हरित अश्वों सहित स्थापित करे।

श्लोक 99 (skanda.2.216.99)

ईशाने च गुरुः स्थाप्यो हेमवर्णः सिताम्बरः । द्विभुजः पद्मनयनो धृतदण्डकमण्डलुः । पाण्डुराष्टहये हैमे निषण्णः स्यन्दनोत्तमे

īśāne ca guruḥ sthāpyo hemavarṇaḥ sitāmbaraḥ | dvibhujaḥ padmanayano dhṛtadaṇḍakamaṇḍaluḥ | pāṇḍurāṣṭahaye haime niṣaṇṇaḥ syandanottame

और ईशान में स्वर्णवर्ण, श्वेतवस्त्रधारी बृहस्पति को स्थापित करे, जो द्विभुज, पद्मनेत्र, दण्ड-कमण्डलुधारी, आठ श्वेत अश्वों वाले उत्तम स्वर्णरथ में आसीन हों।

श्लोक 100 (skanda.2.216.100)

अंगदेवान्भगवतः स्थापयेदित्थमर्चकः । कर्णिकाद्रिपुरान्तान्तस्थानेषु क्रमशोऽखिलान्

aṁgadevānbhagavataḥ sthāpayeditthamarcakaḥ | karṇikādripurāntāntasthāneṣu kramaśo'khilān

इस प्रकार पूजक भगवान् के अंग-देवताओं को कर्णिका से लेकर नगर की सीमा तक के सभी स्थानों में क्रमशः स्थापित करे।

श्लोक 101 (skanda.2.216.101)

वासुदेवांगदेवानां न्यसेन्मूर्त्तीस्तु वैभवी । पूगफलानीतरस्तु न्यसेत्पुष्पाक्षतादि वा

vāsudevāṁgadevānāṁ nyasenmūrttīstu vaibhavī | pūgaphalānītarastu nyasetpuṣpākṣatādi vā

वासुदेव के अंग-देवताओं की मूर्तियाँ सम्पन्न व्यक्ति स्थापित करे; साधन-हीन व्यक्ति सुपारी अथवा पुष्प-अक्षत आदि से उनकी स्थापना करे।

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