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वैष्णव खण्ड · अध्याय 217

श्रीराधाकृष्णस्वरूप-ध्यान-निरूपण

अध्याय 216अध्याय-सूचीअध्याय 218

श्लोक 1 (skanda.2.217.1)

श्रीनारायण उवाच । आचम्य प्राणानायम्य ततोसौ स्वस्थमानसः । नमस्कृत्येष्टदेवादीन्देशकालौ च कीर्तयेत्

śrīnārāyaṇa uvāca | ācamya prāṇānāyamya tatosau svasthamānasaḥ | namaskṛtyeṣṭadevādīndeśakālau ca kīrtayet

श्री नारायण ने कहा - आचमन करके, प्राणायाम करके, फिर स्वस्थ मन वाला वह इष्टदेव आदि को नमस्कार करके देश और काल का कीर्तन करे।

श्लोक 2 (skanda.2.217.2)

एकान्तधर्मसिद्यर्थं वासुदेवस्य पूजनम् । करिष्य इति संकल्प्य कुर्यान्न्यासविधिं ततः

ekāntadharmasidyarthaṁ vāsudevasya pūjanam | kariṣya iti saṁkalpya kuryānnyāsavidhiṁ tataḥ

'मैं एकान्तिक धर्म की सिद्धि के लिए वासुदेव की पूजा करूँगा' - ऐसा संकल्प करके फिर न्यास-विधि करे।

श्लोक 3 (skanda.2.217.3)

न्यासे मन्त्रा द्वादशार्णो गायत्री वैष्णवी तथा । नारायणाष्टाक्षरश्च ज्ञेया विष्णुषडक्षरः

nyāse mantrā dvādaśārṇo gāyatrī vaiṣṇavī tathā | nārāyaṇāṣṭākṣaraśca jñeyā viṣṇuṣaḍakṣaraḥ

न्यास में द्वादशाक्षर मन्त्र, वैष्णवी गायत्री, तथा नारायण का अष्टाक्षर और विष्णु का षडक्षर मन्त्र जानने चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.2.217.4)

एते द्विजानां विहितास्तदन्येषां त्विह त्रयः । वासुदेवाष्टाक्षरश्च हरिपञ्चाक्षरस्तथा । षडर्णः केशवस्येति न्यासे होमे च संमताः

ete dvijānāṁ vihitāstadanyeṣāṁ tviha trayaḥ | vāsudevāṣṭākṣaraśca haripañcākṣarastathā | ṣaḍarṇaḥ keśavasyeti nyāse home ca saṁmatāḥ

ये द्विजों के लिए विहित हैं; अन्य लोगों के लिए यहाँ तीन मन्त्र - वासुदेव का अष्टाक्षर, हरि का पंचाक्षर, और केशव का षडक्षर - न्यास और होम में मान्य हैं।

श्लोक 5 (skanda.2.217.5)

श्रीविष्णुप्रतिमांगेषु स्वांगेष्विव ततोऽखिलान् । कुर्यान्यासांश्च तैर्मन्त्रैस्ततोर्चां वाससाऽऽमृजेत्

śrīviṣṇupratimāṁgeṣu svāṁgeṣviva tato'khilān | kuryānyāsāṁśca tairmantraistatorcāṁ vāsasā''mṛjet

फिर श्री विष्णु की प्रतिमा के अंगों पर अपने ही अंगों की भाँति उन मन्त्रों से समस्त न्यास करे, फिर वस्त्र से प्रतिमा को पोंछे।

श्लोक 6 (skanda.2.217.6)

कलशं वामभागे स्वे संस्थाप्यावाह्य तत्र च । तीर्थानि गन्धपुष्पाद्यैरुपचारैस्तमर्चयेत्

kalaśaṁ vāmabhāge sve saṁsthāpyāvāhya tatra ca | tīrthāni gandhapuṣpādyairupacāraistamarcayet

अपनी बाईं ओर कलश स्थापित करके उसमें आवाहन करके, वहाँ तीर्थों की गन्ध-पुष्पादि उपचारों से पूजा करे।

श्लोक 7 (skanda.2.217.7)

पूजाद्रव्याणि चात्मानं प्रोक्षयित्वा तदम्बुना । शंखं घण्टां च संपूज्य भूतशुद्धिं समाचरेत्

pūjādravyāṇi cātmānaṁ prokṣayitvā tadambunā | śaṁkhaṁ ghaṇṭāṁ ca saṁpūjya bhūtaśuddhiṁ samācaret

पूजा-सामग्री और स्वयं को उस जल से सींचकर, शंख और घण्टा की पूजा करके भूतशुद्धि करे।

श्लोक 8 (skanda.2.217.8)

आभ्यन्तराग्निवायुभ्यां दग्ध्वा पापात्मकं वपुः । शुद्धस्य स्वात्मनस्त्वैक्यं भावयेद्ब्रह्मणा स्थिरः

ābhyantarāgnivāyubhyāṁ dagdhvā pāpātmakaṁ vapuḥ | śuddhasya svātmanastvaikyaṁ bhāvayedbrahmaṇā sthiraḥ

आन्तरिक अग्नि और वायु से पापमय शरीर को जलाकर, स्थिर होकर अपने शुद्ध आत्मा की ब्रह्म से एकता का भाव करे।

श्लोक 9 (skanda.2.217.9)

ततोऽक्षरब्रह्मरूपो राधाकृष्णं हृदि प्रभुम् । ध्यायेदव्यग्रमनसा प्राणायामं समाचरन्

tato'kṣarabrahmarūpo rādhākṛṣṇaṁ hṛdi prabhum | dhyāyedavyagramanasā prāṇāyāmaṁ samācaran

फिर अक्षर ब्रह्मस्वरूप होकर, अव्यग्र मन से प्राणायाम करते हुए हृदय में प्रभु राधाकृष्ण का ध्यान करे।

श्लोक 10 (skanda.2.217.10)

अधोमुखं नाभिपद्मं कदलीपुष्पवत्स्थितम् । विभाव्यापानपवनं प्राणेनैक्यमुपानयेत्

adhomukhaṁ nābhipadmaṁ kadalīpuṣpavatsthitam | vibhāvyāpānapavanaṁ prāṇenaikyamupānayet

केले के फूल के समान अधोमुख नाभि-कमल की भावना करके अपान वायु को प्राण वायु के साथ एक करे।

श्लोक 11 (skanda.2.217.11)

पद्मनाले तमानीय सह तेन तदम्बुजम् । आकर्षेदूर्ध्वमथ तन्नदत्तीव्रमुपैति हृत् । प्रफुल्लति च तत्रैतद्धृदयाकाश उल्लसत्

padmanāle tamānīya saha tena tadambujam | ākarṣedūrdhvamatha tannadattīvramupaiti hṛt | praphullati ca tatraitaddhṛdayākāśa ullasat

उस मिली हुई वायु को कमल-नाल में लाकर, उसके साथ उस कमल को ही ऊपर खींचे; तब वह तीव्र ध्वनि करता हुआ हृदय तक पहुँचता है, और वहाँ हृदयाकाश में खिलकर सुशोभित होता है।

श्लोक 12 (skanda.2.217.12)

तेजोराशिमये तत्र ततोप्यधिकतेजसा । दर्शनीयतमं शान्तं ध्यायेच्छ्रीराधिकापतिम्

tejorāśimaye tatra tatopyadhikatejasā | darśanīyatamaṁ śāntaṁ dhyāyecchrīrādhikāpatim

वहाँ उस तेजोराशि में, उससे भी अधिक तेज से, दर्शनीय, शान्त श्री राधिकापति का ध्यान करे।

श्लोक 13 (skanda.2.217.13)

उपविष्टं स्थितं वा तं दिव्यचिन्मयविग्रहम् । ध्यायेत्किशोरवयसं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्

upaviṣṭaṁ sthitaṁ vā taṁ divyacinmayavigraham | dhyāyetkiśoravayasaṁ koṭikandarpasundaram

बैठे या खड़े, दिव्य चिन्मय विग्रह वाले, किशोर वय, करोड़ों कामदेवों से सुन्दर उनका ध्यान करे।

श्लोक 14 (skanda.2.217.14)

रूपानुरूपसंपूर्णदिव्यावयवलक्षितम् । शरच्चन्द्रावदातांगं दीर्घचारुभुजद्वयम्

rūpānurūpasaṁpūrṇadivyāvayavalakṣitam | śaraccandrāvadātāṁgaṁ dīrghacārubhujadvayam

रूप के अनुरूप सम्पूर्ण दिव्य अंगों से युक्त, शरद्-चन्द्र के समान उज्ज्वल शरीर, दीर्घ और सुन्दर दो भुजाओं वाले।

श्लोक 15 (skanda.2.217.15)

आरक्तकोमलतलरम्यांगुलिपदाम्बुजम् । तुंगारुणस्निग्धनखद्युतिलज्जायितोडुपम्

āraktakomalatalaramyāṁgulipadāmbujam | tuṁgāruṇasnigdhanakhadyutilajjāyitoḍupam

लालिमायुक्त, कोमल तलवों और सुन्दर अंगुलियों वाले चरण-कमल, ऊँचे, अरुण, स्निग्ध नखों की कान्ति से चन्द्रमा को लज्जित करने वाले।

श्लोक 16 (skanda.2.217.16)

शिञ्जत्किंकिणिमञ्जीरहंसकांघ्रियुगश्रियम् । सुवृत्तजंघायुगलं समजानूरुशोभनम्

śiñjatkiṁkiṇimañjīrahaṁsakāṁghriyugaśriyam | suvṛttajaṁghāyugalaṁ samajānūruśobhanam

बजती हुई किंकिणी और हंसाकार नूपुरों से सुशोभित दोनों चरणों की शोभा, सुगोल जंघा-युगल, सुडौल घुटने और जाँघें।

श्लोक 17 (skanda.2.217.17)

सद्रत्नरशनाबद्धपीताम्बरकटिश्रियम् । उत्तुंगकुक्षिनाभ्यन्तर्निम्ननाभिवलित्रयम्

sadratnaraśanābaddhapītāmbarakaṭiśriyam | uttuṁgakukṣinābhyantarnimnanābhivalitrayam

पीताम्बर पर सुन्दर रत्नों की करधनी से सुशोभित कटि, ऊँचे कुक्षि-प्रदेश और उनके भीतर गहरी नाभि, त्रिवली से युक्त।

श्लोक 18 (skanda.2.217.18)

विततोत्तुंगहृदयं श्रीवत्सावर्त्तशोभितम् । ललन्तीगुच्छगुच्छार्द्धदेवच्छन्दादिभूषितम्

vitatottuṁgahṛdayaṁ śrīvatsāvarttaśobhitam | lalantīgucchagucchārddhadevacchandādibhūṣitam

विस्तृत, उन्नत हृदय, श्रीवत्स के चिह्न से सुशोभित; ललन्ती और देवच्छन्द आदि अर्ध-मालाओं से विभूषित।

श्लोक 19 (skanda.2.217.19)

नानासुगन्धिपुष्पस्रक्स्वर्णयज्ञोपवीतिनम् । उन्निद्रशोणपद्माभकरकंकणभूषणम्

nānāsugandhipuṣpasraksvarṇayajñopavītinam | unnidraśoṇapadmābhakarakaṁkaṇabhūṣaṇam

अनेक सुगन्धित पुष्पों की माला और स्वर्ण यज्ञोपवीत धारण किए हुए, हाथों में खिले हुए लाल कमल के समान कंकण-भूषण।

श्लोक 20 (skanda.2.217.20)

सूक्ष्मपर्वांगुलिद्योतन्नैकसद्रत्नमुद्रिकम् । निनादयन्तं मधुरं वेणुं सर्वमनोहरम्

sūkṣmaparvāṁgulidyotannaikasadratnamudrikam | ninādayantaṁ madhuraṁ veṇuṁ sarvamanoharam

सूक्ष्म पोर वाली अंगुलियों में चमकती अनेक सुन्दर रत्न-मुद्रिकाएँ, सबका मन हरने वाली मधुर वेणु बजाते हुए।

श्लोक 21 (skanda.2.217.21)

विपुलांसं गूढजत्रुं महाबाह्वंगदद्युतिम् । भ्रमत्सुगन्धलुब्धालिझंकारितवनस्रजम्

vipulāṁsaṁ gūḍhajatruṁ mahābāhvaṁgadadyutim | bhramatsugandhalubdhālijhaṁkāritavanasrajam

विशाल कन्धे, छिपी हुई हँसलियाँ, महान भुजाओं पर बाजूबन्दों की कान्ति; सुगन्ध के लोभी भ्रमरों के गुंजार से युक्त वनमाला धारण किए हुए।

श्लोक 22 (skanda.2.217.22)

कम्बूपमगलभ्राजत्सद्ग्रैवेयककौस्तुभम् । शोभमानहनुं बिम्बीफलशोणाधरद्युतिम्

kambūpamagalabhrājatsadgraiveyakakaustubham | śobhamānahanuṁ bimbīphalaśoṇādharadyutim

शंख के समान गले पर सुन्दर कण्ठहार और कौस्तुभमणि की शोभा, सुन्दर ठुड्डी, बिम्बाफल के समान लाल अधरों की कान्ति।

श्लोक 23 (skanda.2.217.23)

सितस्मितकलाराजत्पूर्णचन्द्रनिभाननम् । तिलपुष्पसमाकारदर्शनीयसुनासिकम्

sitasmitakalārājatpūrṇacandranibhānanam | tilapuṣpasamākāradarśanīyasunāsikam

श्वेत मुस्कान की कला से शोभित पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख, तिल के फूल के समान सुन्दर नासिका।

श्लोक 24 (skanda.2.217.24)

समानकर्णविभ्राजन्मकराकृतिकुण्डलम् । कर्णोपरिलसच्चित्रपुष्पगुच्छावतंसकम्

samānakarṇavibhrājanmakarākṛtikuṇḍalam | karṇoparilasaccitrapuṣpagucchāvataṁsakam

समान कानों पर चमकते मकराकार कुण्डल, कानों के ऊपर सुशोभित विविध पुष्पों के गुच्छों वाले अवतंसक।

श्लोक 25 (skanda.2.217.25)

समसूक्ष्मरदज्योत्स्नोल्लसद्गण्डस्थलश्रियम् । पद्मपत्रायतारक्तप्रान्तरम्यविलोचनम्

samasūkṣmaradajyotsnollasadgaṇḍasthalaśriyam | padmapatrāyatāraktaprāntaramyavilocanam

समान सूक्ष्म दाँतों की चाँदनी से उल्लसित कपोलों की शोभा, कमल-पत्र के समान लम्बे, लाल कोरों वाले सुन्दर नेत्र।

श्लोक 26 (skanda.2.217.26)

पृथुतुंगललाटं च कामचापायितभ्रुवम् । वक्रसूक्ष्मासितस्निग्धमनोहरशिरोरुहम्

pṛthutuṁgalalāṭaṁ ca kāmacāpāyitabhruvam | vakrasūkṣmāsitasnigdhamanoharaśiroruham

चौड़ा और ऊँचा ललाट, कामदेव के धनुष के समान भौंहें, घुँघराले, सूक्ष्म, काले, चिकने और मनोहर केश।

श्लोक 27 (skanda.2.217.27)

नानासद्रत्नखचितकिरीटधृतशेखरम् । प्रेम्णा निजं वीक्षमाणं प्रसन्नं स्निग्धया दृशा

nānāsadratnakhacitakirīṭadhṛtaśekharam | premṇā nijaṁ vīkṣamāṇaṁ prasannaṁ snigdhayā dṛśā

विविध उत्तम रत्नों से जड़े मुकुट को शिखर पर धारण किए हुए, प्रेमपूर्वक अपने भक्त को स्निग्ध दृष्टि से प्रसन्नतापूर्वक देखते हुए।

श्लोक 28 (skanda.2.217.28)

ध्यात्वेत्थं कृष्णमथ तद्वामे राधां विचिन्तयेत् । द्विभुजां स्वर्णगौरांगीं कौसुम्भामलवाससम्

dhyātvetthaṁ kṛṣṇamatha tadvāme rādhāṁ vicintayet | dvibhujāṁ svarṇagaurāṁgīṁ kausumbhāmalavāsasam

इस प्रकार कृष्ण का ध्यान करके फिर उनके बाईं ओर राधा का चिन्तन करे - द्विभुज, स्वर्ण के समान गौर अंगों वाली, निर्मल लाल वस्त्रधारी।

श्लोक 29 (skanda.2.217.29)

समकर्णोल्लसद्रत्नभूषणांशुकनासिकाम् । किशोरीं मृगशावाक्षीं पीनोन्नतघनस्तनीम्

samakarṇollasadratnabhūṣaṇāṁśukanāsikām | kiśorīṁ mṛgaśāvākṣīṁ pīnonnataghanastanīm

समान कानों में चमकते रत्नाभूषणों वाली सुन्दर नासिका, मृगशावाक्षी किशोरी, पीन-उन्नत सघन स्तनों वाली।

श्लोक 30 (skanda.2.217.30)

कृशमध्यां पृथुश्रोणिं रत्नकाञ्चीविभूषिताम् । अनेकदिव्याभरणां विकचाब्जाननस्मिताम्

kṛśamadhyāṁ pṛthuśroṇiṁ ratnakāñcīvibhūṣitām | anekadivyābharaṇāṁ vikacābjānanasmitām

कृश कटि, विशाल नितम्ब, रत्नजड़ित करधनी से विभूषित, अनेक दिव्य आभूषणों वाली, खिले कमल के समान मुख पर मुस्कान लिए।

श्लोक 31 (skanda.2.217.31)

रत्नांगुलीयकेयूरकङ्कणादिलसत्कराम् । शिञ्जद्धंसकमञ्जीरशोभमानांघ्रिपङ्कजाम्

ratnāṁgulīyakeyūrakaṅkaṇādilasatkarām | śiñjaddhaṁsakamañjīraśobhamānāṁghripaṅkajām

रत्न-अंगूठियों, बाजूबन्दों, कंकणों आदि से चमकते हाथ, बजते हंसाकार नूपुरों से सुशोभित चरण-कमल।

श्लोक 32 (skanda.2.217.32)

विशालभालविलसत्सत्काश्मीरललाटिकाम् । बिम्बोष्ठीं सुकपोलां च वेणीग्रथितमालतीम्

viśālabhālavilasatsatkāśmīralalāṭikām | bimboṣṭhīṁ sukapolāṁ ca veṇīgrathitamālatīm

विशाल भाल पर चमकती सुन्दर कश्मीरी तिलक-रेखा, बिम्बफल के समान अधर, सुन्दर कपोल, माधवी-लता से गूँथी हुई वेणी।

श्लोक 33 (skanda.2.217.33)

प्रेक्षमाणां प्रभुं प्रेम्णा दधानामम्बुजं करे । ध्यात्वैवं राधिकां तत्र प्रभुमर्चेत्तया सह

prekṣamāṇāṁ prabhuṁ premṇā dadhānāmambujaṁ kare | dhyātvaivaṁ rādhikāṁ tatra prabhumarcettayā saha

प्रेमपूर्वक प्रभु को देखती हुई, हाथ में कमल धारण किए हुए - इस प्रकार राधिका का ध्यान करके फिर उनके साथ प्रभु की पूजा करे।

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