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वैष्णव खण्ड · अध्याय 31

शंकरविवाह एवं अगस्त्य दक्षिणगमन वर्णन

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (skanda.2.31.1)

श्रीसूत उवाच । कृतसायन्तनविधिं हुताशनसमद्युतिम् । सुखासीनं मुनिपतिं प्रणम्य भरतर्षभः ।

śrīsūta uvāca kṛtasāyantanavidhiṁ hutāśanasamadyutim sukhāsīnaṁ munipatiṁ praṇamya bharatarṣabhaḥ

श्री सूत जी ने कहा — सायंकालीन विधि पूर्ण कर, अग्नि के समान तेजस्वी, सुखपूर्वक बैठे मुनिपति को प्रणाम कर भरतश्रेष्ठ अर्जुन ने,

श्लोक 2 (skanda.2.31.2)

तदीयशीतलामोदसुधापूरानुमोदितः । गम्भीरं प्रश्रयोपेतमिदं वचनमब्रवीत् ।

tadīyaśītalāmodasudhāpūrānumoditaḥ gambhīraṁ praśrayopetamidaṁ vacanamabravīt

उनकी शीतल, सुगंधित अमृत-धारा से आनंदित होकर, यह गंभीर और विनम्र वचन कहा।

श्लोक 3 (skanda.2.31.3)

अर्जुन उवाच । मुनिपुंगव लोकेऽस्मिन्धन्य एकोऽहमेव हि । पुत्राविशेषं भवता यदेवं सम्यगादृतः ।

arjuna uvāca munipuṁgava loke'smindhanya eko'hameva hi putrāviśeṣaṁ bhavatā yadevaṁ samyagādṛtaḥ

अर्जुन ने कहा — "हे मुनिश्रेष्ठ! इस लोक में मैं ही एकमात्र धन्य हूँ, क्योंकि आपने मुझे अपने ही पुत्र के समान इतना आदर दिया है।

श्लोक 4 (skanda.2.31.4)

भवदादरसञ्जातकौतुकं मम मानसम् । भवद्वाक्यामृतं दिव्यं पातुं त्वरयतीव माम् ।

bhavadādarasañjātakautukaṁ mama mānasam bhavadvākyāmṛtaṁ divyaṁ pātuṁ tvarayatīva mām

आपके आदर से उत्पन्न कौतुक से भरा मेरा मन, मानो आपके दिव्य वचन-रूपी अमृत को पीने के लिए मुझे शीघ्रता करा रहा है।

श्लोक 5 (skanda.2.31.5)

कस्माच्छैलादियं जाता केनानीता महानदी । किं पुण्यं स्नानदानाद्यैः कृतैस्तत्रोपलभ्यते ।

kasmācchailādiyaṁ jātā kenānītā mahānadī kiṁ puṇyaṁ snānadānādyaiḥ kṛtaistatropalabhyate

यह महानदी किस पर्वत से उत्पन्न हुई, किसके द्वारा लाई गई? वहाँ स्नान-दान आदि करने से क्या पुण्य प्राप्त होता है?

श्लोक 6 (skanda.2.31.6)

अस्याः प्रभावं प्रभवं प्रह्वस्य मम सन्मुने । वक्तुमर्हसि कार्यो हि भक्तानुग्रह एव ते ।

asyāḥ prabhāvaṁ prabhavaṁ prahvasya mama sanmune vaktumarhasi kāryo hi bhaktānugraha eva te

हे साधु मुने! इसका प्रभाव और उत्पत्ति आपके सामने झुके हुए मुझे बताइए, क्योंकि भक्तों पर अनुग्रह करना ही आपका कर्तव्य है।"

श्लोक 7 (skanda.2.31.7)

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा भरद्वाजो द्विजोत्तमः । तदाननं समालोक्य वाक्यं वाक्यविदब्रवीत् ।

arjunasya vacaḥ śrutvā bharadvājo dvijottamaḥ tadānanaṁ samālokya vākyaṁ vākyavidabravīt

अर्जुन के वचन सुनकर, द्विजोत्तम भरद्वाज ने उनके मुख को देखकर, वाणी में निपुण होकर यह वचन कहा —

श्लोक 8 (skanda.2.31.8)

भरद्वाज उवाच । त्वमर्जुन महाबाहो कौरवान्वयपावनः । विशेषान्मम मान्योऽसि धर्मपुत्रानुजो यतः ।

bharadvāja uvāca tvamarjuna mahābāho kauravānvayapāvanaḥ viśeṣānmama mānyo'si dharmaputrānujo yataḥ

भरद्वाज ने कहा — "हे महाबाहु अर्जुन! कौरव-वंश को पवित्र करने वाले, तुम धर्मपुत्र के अनुज होने के कारण मुझे विशेष रूप से मान्य हो।

श्लोक 9 (skanda.2.31.9)

अनेके भूमिपा दृष्टा न ते त्वमिव फाल्गुन । लीलार्जवदयौदार्यधैर्यगाम्भीर्यशालिनः ।

aneke bhūmipā dṛṣṭā na te tvamiva phālguna līlārjavadayaudāryadhairyagāmbhīryaśālinaḥ

हे फाल्गुन! मैंने अनेक राजाओं को देखा है, परंतु तुम्हारे समान लीला, सरलता, दया, उदारता, धैर्य और गंभीरता से युक्त कोई नहीं देखा।

श्लोक 10 (skanda.2.31.10)

कुलं विद्या धनं चैव बलिनां मदकारणम् । भवादृशानां भव्यानां तानि प्रश्रयकारणम् ।

kulaṁ vidyā dhanaṁ caiva balināṁ madakāraṇam bhavādṛśānāṁ bhavyānāṁ tāni praśrayakāraṇam

कुल, विद्या और धन बलवानों के लिए मद का कारण बनते हैं, परंतु तुम जैसे श्रेष्ठ पुरुषों के लिए वे ही विनम्रता का कारण बनते हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.31.11)

प्राज्येषु राज्यभोगेषु विद्यमानेषु कौरव । ऋते भवन्तं को वान्यो नोपैति विकृतेर्वशम् ।

prājyeṣu rājyabhogeṣu vidyamāneṣu kaurava ṛte bhavantaṁ ko vānyo nopaiti vikṛtervaśam

हे कौरव! ऐसे प्रचुर राज्य-भोगों के होते हुए भी, तुम्हारे अतिरिक्त और कौन है जो विकार के वश में न हो?

श्लोक 12 (skanda.2.31.12)

परवानस्मि कौन्तेय गुणैलाकोत्तरैस्तव । किमस्त्यकथनीयं ते कौतुकोपेतमानस ।

paravānasmi kaunteya guṇailākottaraistava kimastyakathanīyaṁ te kautukopetamānasa

हे कुंतीपुत्र! तुम्हारे अलौकिक गुणों से मैं वशीभूत हूँ; तुम्हें, जिसका मन कौतुक से भरा है, क्या न बताने योग्य है?

श्लोक 13 (skanda.2.31.13)

शृणु राजन्कथां दिव्यां मया मुनिमुखाच्छुताम् । यां श्रुत्वा पातकातङ्कान्मुच्यन्ते सर्वजन्तवः ।

śṛṇu rājankathāṁ divyāṁ mayā munimukhācchutām yāṁ śrutvā pātakātaṅkānmucyante sarvajantavaḥ

हे राजन्! सुनो वह दिव्य कथा, जो मैंने एक मुनि के मुख से सुनी थी, जिसे सुनकर सभी प्राणी पापों की पीड़ा से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.31.14)

पूर्वं दाक्षायणी देवी जनकेनावमानिता । त्यक्त्वा तनुं तां नीहारगिरेरभवदात्मजा ।

pūrvaṁ dākṣāyaṇī devī janakenāvamānitā tyaktvā tanuṁ tāṁ nīhāragirerabhavadātmajā

पूर्वकाल में दक्ष-पुत्री सती देवी, अपने पिता द्वारा अपमानित होकर, उस शरीर को त्यागकर हिमाचल की पुत्री बनीं।

श्लोक 15 (skanda.2.31.15)

सप्तर्षिभिरुपागम्य प्रार्थितो धरणीधरः । मृत्युंजयाय स्वां पुत्रीं विवाहे दातुमुद्यतः ।

saptarṣibhirupāgamya prārthito dharaṇīdharaḥ mṛtyuṁjayāya svāṁ putrīṁ vivāhe dātumudyataḥ

सप्तर्षियों द्वारा प्रार्थना किए जाने पर पर्वतराज ने अपनी पुत्री को मृत्युंजय (शिव) को विवाह में देने का निश्चय किया।

श्लोक 16 (skanda.2.31.16)

वृषभांको जगत्स्वामी विवोढुं सर्वमंगलाम् । प्राप्तो हिमवदावासमोषधीप्रस्थनामकम् ।

vṛṣabhāṁko jagatsvāmī vivoḍhuṁ sarvamaṁgalām prāpto himavadāvāsamoṣadhīprasthanāmakam

वृषभ-चिह्न वाले जगत्स्वामी शिव, सर्व-मंगला पार्वती से विवाह करने के लिए हिमालय के औषधिप्रस्थ नामक निवास पर पहुँचे।

श्लोक 17 (skanda.2.31.17)

तच्छासनात्समाजग्मुः स्थावराणि चराणि च । भूतानि भूतनाथस्य कल्याणमभिनंदितुम् ।

tacchāsanātsamājagmuḥ sthāvarāṇi carāṇi ca bhūtāni bhūtanāthasya kalyāṇamabhinaṁditum

उनकी आज्ञा से स्थावर और चर सभी प्राणी, भूतनाथ के मंगल-विवाह में आनंद मनाने के लिए वहाँ एकत्र हुए।

श्लोक 18 (skanda.2.31.18)

तद्भूरिभारसंभग्ना भूमिरुत्तरसंश्रया । निम्नतामाययौ तावद्यावत्पातालमास्थिता ।

tadbhūribhārasaṁbhagnā bhūmiruttarasaṁśrayā nimnatāmāyayau tāvadyāvatpātālamāsthitā

उन सबके भारी बोझ से दबी हुई उत्तर दिशा की पृथ्वी तब तक नीचे धँसती गई, जब तक कि वह पाताल तक न पहुँच गई,

श्लोक 19 (skanda.2.31.19)

निर्भारलाघवादस्माद्भृशं दक्षिणगामिनी । ऊर्ध्वं गता च तं दृष्ट्वा सर्वेषामभवद्भयम् ।

nirbhāralāghavādasmādbhṛśaṁ dakṣiṇagāminī ūrdhvaṁ gatā ca taṁ dṛṣṭvā sarveṣāmabhavadbhayam

जबकि इस भार से मुक्त और हल्की हुई दक्षिण दिशा अत्यधिक ऊपर उठ गई; इसे देखकर सभी में भय उत्पन्न हो गया।

श्लोक 20 (skanda.2.31.20)

ज्ञात्वा तां विकृतिं भूमेर्दृष्ट्वागस्त्यं महेश्वरः । इत एहि महाप्राज्ञेत्युक्त्वा वचनमब्रवीत् ।

jñātvā tāṁ vikṛtiṁ bhūmerdṛṣṭvāgastyaṁ maheśvaraḥ ita ehi mahāprājñetyuktvā vacanamabravīt

पृथ्वी के इस विकार को जानकर, अगस्त्य मुनि को देखकर महेश्वर ने "हे महाप्राज्ञ, यहाँ आओ" कहकर यह वचन कहा —

श्लोक 21 (skanda.2.31.21)

आगतेषु समस्तेषु भूतेष्वत्र वसुन्धरा । तद्भारेण समाक्रान्ता विकृतिं समुपागता ।

āgateṣu samasteṣu bhūteṣvatra vasundharā tadbhāreṇa samākrāntā vikṛtiṁ samupāgatā

"यहाँ आए हुए समस्त प्राणियों के भार से आक्रांत होकर यह पृथ्वी विकार को प्राप्त हो गई है।

श्लोक 22 (skanda.2.31.22)

तद्भुवः साम्यकरणे त्वमर्हसि महामते । ऋते त्वामत्र हि त्वत्तः परेणैतत्कथं भवेत् ।

tadbhuvaḥ sāmyakaraṇe tvamarhasi mahāmate ṛte tvāmatra hi tvattaḥ pareṇaitatkathaṁ bhavet

हे महामते! इस पृथ्वी को समतल करने में तुम ही समर्थ हो; तुम्हारे बिना यह कार्य तुमसे बढ़कर कौन कर सकता है?

श्लोक 23 (skanda.2.31.23)

मत्तेजःसंभवो हि त्वं लोकसंरक्षणोद्यतः । तस्मान्मद्वचनाद्वत्स भुवमेतां समीकुरु ।

mattejaḥsaṁbhavo hi tvaṁ lokasaṁrakṣaṇodyataḥ tasmānmadvacanādvatsa bhuvametāṁ samīkuru

तुम मेरे ही तेज से उत्पन्न हुए हो और सदा लोक-रक्षा में तत्पर हो; इसलिए, हे वत्स, मेरी आज्ञा से इस पृथ्वी को समतल करो।

श्लोक 24 (skanda.2.31.24)

मत्पाणिग्रहणाल्लोककौतुकायत्तबुद्धिषु । आगतेषु समस्तेषु स्थातव्यं भवताऽपि च ।

matpāṇigrahaṇāllokakautukāyattabuddhiṣu āgateṣu samasteṣu sthātavyaṁ bhavatā'pi ca

मेरे पाणिग्रहण को देखने के कौतुक में लीन बुद्धि वाले जितने भी प्राणी यहाँ आए हैं, उनके साथ तुम्हें भी दक्षिण में रहना होगा —

श्लोक 25 (skanda.2.31.25)

त्वं न तिष्ठसि चेदत्र न कश्चिद्विकृतिं भुवः । अपनेतुं हि शक्नोति तद्गन्तव्यं त्वयानघ ।

tvaṁ na tiṣṭhasi cedatra na kaścidvikṛtiṁ bhuvaḥ apanetuṁ hi śaknoti tadgantavyaṁ tvayānagha

क्योंकि यदि तुम वहाँ नहीं रहोगे, तो कोई भी पृथ्वी के इस विकार को दूर नहीं कर सकेगा; इसलिए, हे निष्पाप, तुम्हें अवश्य जाना होगा।

श्लोक 26 (skanda.2.31.26)

इमां गिरिसुतापाणिग्रहकल्याणभासुराम् । मूर्तिं प्रदर्शयिष्यामि यत्र तिष्ठसि तत्र ते ।

imāṁ girisutāpāṇigrahakalyāṇabhāsurām mūrtiṁ pradarśayiṣyāmi yatra tiṣṭhasi tatra te

जहाँ तुम रहोगे, वहीं मैं तुम्हें पर्वत-पुत्री के पाणिग्रहण के मंगल से देदीप्यमान अपना यह रूप दिखाऊँगा।"

श्लोक 27 (skanda.2.31.27)

इत्युक्त्वा तं परिष्वज्य विससर्ज महेश्वरः । तथेति प्रणम्यासौ ययौ याम्यां दिशं मुनिः ।

ityuktvā taṁ pariṣvajya visasarja maheśvaraḥ tatheti praṇamyāsau yayau yāmyāṁ diśaṁ muniḥ

ऐसा कहकर महेश्वर ने उन्हें आलिंगन कर विदा किया; "ऐसा ही हो" कहकर प्रणाम कर वह मुनि दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

श्लोक 28 (skanda.2.31.28)

विन्ध्याद्रिं समतिक्रम्य दक्षिणामागते दिशम् । अगस्त्ये मुनिशार्दूले मही साम्यमुपाययौ ।

vindhyādriṁ samatikramya dakṣiṇāmāgate diśam agastye muniśārdūle mahī sāmyamupāyayau

विंध्याचल को पार कर जब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य दक्षिण दिशा में पहुँचे, तब पृथ्वी समतल हो गई।

श्लोक 29 (skanda.2.31.29)

भुवोऽपनीय विकृतिं स्थितं कलशजं मुनिम् । तुष्टुवुर्हर्षतरलाः सुरगन्धर्वकिन्नराः ।

bhuvo'panīya vikṛtiṁ sthitaṁ kalaśajaṁ munim tuṣṭuvurharṣataralāḥ suragandharvakinnarāḥ

पृथ्वी के विकार को दूर कर वहीं स्थित हुए उस कलशोद्भव मुनि की देवता, गंधर्व और किन्नरों ने हर्ष से कांपते हुए स्तुति की।

श्लोक 30 (skanda.2.31.30)

स ददर्श ततो गत्वा कश्चिच्छैलं समुन्नतम् । विततैर्धरणीं पादैर्धृत्वा संस्थितमग्रतः ।

sa dadarśa tato gatvā kaścicchailaṁ samunnatam vitatairdharaṇīṁ pādairdhṛtvā saṁsthitamagrataḥ

फिर वहाँ से जाकर उन्होंने एक अत्यंत ऊँचा पर्वत देखा, जो अपने विस्तृत चरणों से पृथ्वी को धारण किए सामने खड़ा था,

श्लोक 31 (skanda.2.31.31)

महौषधीनां रत्नानामशेषाणां स्वयंभुवा । अखण्डतेजोदीप्तानां विनिर्मितमिवाकरम् ।

mahauṣadhīnāṁ ratnānāmaśeṣāṇāṁ svayaṁbhuvā akhaṇḍatejodīptānāṁ vinirmitamivākaram

मानो स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा समस्त महौषधियों और रत्नों से, जो अखंड तेज से देदीप्यमान थे, बनाई गई एक खान हो,

श्लोक 32 (skanda.2.31.32)

समुन्नतैर्यः शिखरैर्निपतद्व्योमभूतले । उदारधारासंपन्नैर्दधातीव निरन्तरम् ।

samunnatairyaḥ śikharairnipatadvyomabhūtale udāradhārāsaṁpannairdadhātīva nirantaram

जो अपने ऊँचे शिखरों से, आकाश से पृथ्वी पर गिरती हुई प्रचुर जलधाराओं से युक्त होकर, मानो निरंतर आकाश को धारण किए हुए था।

श्लोक 33 (skanda.2.31.33)

शनैरारुह्य तं शैलमगस्त्यो मुनिपुंगवः । निवासाय मतिं चक्रे रम्ये तच्छिखरस्थले ।

śanairāruhya taṁ śailamagastyo munipuṁgavaḥ nivāsāya matiṁ cakre ramye tacchikharasthale

धीरे-धीरे उस पर्वत पर चढ़कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने उसके रमणीय शिखर-स्थल पर निवास करने का निश्चय किया,

श्लोक 34 (skanda.2.31.34)

तस्यामृतोपमेयस्य पद्मोत्पलकुलश्रियः । नानाद्रुमपरीतस्य कासारस्योत्तरे तटे ।

tasyāmṛtopameyasya padmotpalakulaśriyaḥ nānādrumaparītasya kāsārasyottare taṭe

उस अमृत-तुल्य, कमल और नीलकमल के समूहों से सुशोभित, नाना वृक्षों से घिरे सरोवर के उत्तरी तट पर,

श्लोक 35 (skanda.2.31.35)

मनोहरे महीभागे विधायाश्रममुत्तमम् । आराध्य पितृदेवर्षीन्विधिवद्वास्तुदेवताम् ।

manohare mahībhāge vidhāyāśramamuttamam ārādhya pitṛdevarṣīnvidhivadvāstudevatām

उस मनोहर भूभाग में उत्तम आश्रम बनाकर, पितरों, देवर्षियों और वास्तु-देवता की विधिपूर्वक आराधना कर,

श्लोक 36 (skanda.2.31.36)

उवास सुचिरं तत्र मुनिसङ्घसमन्वितः । देवतासिद्धगन्धर्वाप्सरोजुष्टमहीधरे ।

uvāsa suciraṁ tatra munisaṅghasamanvitaḥ devatāsiddhagandharvāpsarojuṣṭamahīdhare

वे मुनि-समूह सहित देवता, सिद्ध, गंधर्व और अप्सराओं से सेवित उस पर्वत पर दीर्घकाल तक निवास करते रहे।

श्लोक 37 (skanda.2.31.37)

तपः समावेशितवित्तवृत्तौ तपोवने तिष्ठति कुम्भजाते । प्रशस्तसौभाग्यसमन्वितोऽद्रिरगस्त्यशैलाह्वयमाससाद ।

tapaḥ samāveśitavittavṛttau tapovane tiṣṭhati kumbhajāte praśastasaubhāgyasamanvito'driragastyaśailāhvayamāsasāda

चूँकि उस कुंभ-सम्भव मुनि ने, जिनका सारा धन और आचरण तप में समाहित था, उस तपोवन में निवास किया, इसलिए वह प्रशस्त सौभाग्य से युक्त पर्वत अगस्त्यशैल नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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