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वैष्णव खण्ड · अध्याय 32

स्वर्णमुखरी आविर्भाव वर्णन

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (skanda.2.32.1)

भरद्वाज उवाच । स कदाचिन्मुनिवरः कृतपौर्वाह्निकक्रियः । विवेश देवतागारं समाराधयितुं शिवम् ।

bharadvāja uvāca sa kadācinmunivaraḥ kṛtapaurvāhnikakriyaḥ viveśa devatāgāraṁ samārādhayituṁ śivam

भरद्वाज ने कहा — एक बार वह श्रेष्ठ मुनि, प्रातःकालीन क्रिया पूर्ण कर, शिव की आराधना करने के लिए देवालय में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 2 (skanda.2.32.2)

अदृश्यरूपा वाग्देवी तत्राश्रावि महात्मना । तेनाद्भुतोपपन्नेन व्यक्तवर्णसमुज्ज्वला ।

adṛśyarūpā vāgdevī tatrāśrāvi mahātmanā tenādbhutopapannena vyaktavarṇasamujjvalā

वहाँ उस महात्मा को अदृश्य रूप वाली वाग्देवी सुनाई दी, जो स्पष्ट वर्णों से उज्ज्वल और एक अद्भुत घटना से युक्त थी।

श्लोक 3 (skanda.2.32.3)

आकाशवाण्युवाचैनमगस्त्यं जपतां वरम् । नदीहीनो ह्ययं देशः प्रसिद्धोऽपि न शोभते ।

ākāśavāṇyuvācainamagastyaṁ japatāṁ varam nadīhīno hyayaṁ deśaḥ prasiddho'pi na śobhate

आकाशवाणी ने जप करने वालों में श्रेष्ठ उस अगस्त्य से कहा — "यह देश, प्रसिद्ध होते हुए भी, नदी-रहित होने के कारण शोभा नहीं पाता,

श्लोक 4 (skanda.2.32.4)

ज्ञानविज्ञानविमुखः साकार इव भूसुरः । दीक्षेव दक्षिणाहीना ज्योत्स्नाहीनेव शर्वरी ।

jñānavijñānavimukhaḥ sākāra iva bhūsuraḥ dīkṣeva dakṣiṇāhīnā jyotsnāhīneva śarvarī

मानो ज्ञान-विज्ञान से विमुख, केवल आकार वाला ब्राह्मण हो; मानो दक्षिणा-रहित दीक्षा हो; मानो चाँदनी-रहित रात्रि हो।

श्लोक 5 (skanda.2.32.5)

न विभाति नदीहीना पृथ्वीयं भूसुरोत्तम । प्रवर्तय नदीं काञ्चिल्लोकानां हितकाम्यया ।

na vibhāti nadīhīnā pṛthvīyaṁ bhūsurottama pravartaya nadīṁ kāñcillokānāṁ hitakāmyayā

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यह पृथ्वी नदी-रहित होने के कारण शोभित नहीं होती। लोगों के हित की कामना से किसी नदी को प्रवाहित करो,

श्लोक 6 (skanda.2.32.6)

अगाधदुरितोद्भूतभीतिमोचनशालिनीम् । हितमेतत्सुरौघानामेतन्मुनिवरार्थितम् ।

agādhaduritodbhūtabhītimocanaśālinīm hitametatsuraughānāmetanmunivarārthitam

जो अगाध पाप से उत्पन्न भय से मुक्ति दिलाने में समर्थ हो — यह देव-समूहों के लिए हितकारी होगा; यह, हे श्रेष्ठ मुने, तुमसे प्रार्थित है।

श्लोक 7 (skanda.2.32.7)

भद्रमेतन्मनुष्याणामेतदाचर सुव्रत । देवानामृषिवर्याणां भूजनानां हितावहाम् ।

bhadrametanmanuṣyāṇāmetadācara suvrata devānāmṛṣivaryāṇāṁ bhūjanānāṁ hitāvahām

यह मनुष्यों के लिए कल्याणकारी होगा; इसे करो, हे सुव्रत — देवताओं, श्रेष्ठ ऋषियों और पृथ्वी के लोगों के हित के लिए।

श्लोक 8 (skanda.2.32.8)

पापपंकप्रशमनीं प्रवर्तय महानदीम् ।

pāpapaṁkapraśamanīṁ pravartaya mahānadīm

पाप-रूपी कीचड़ को शांत करने वाली महानदी को प्रवाहित करो।"

श्लोक 9 (skanda.2.32.9)

श्रीभरद्वाज उवाच । तदाकर्ण्य वचो विप्रः क्षणं चिन्तापरायणः । समाप्य देवतापूजां बहिर्वेद्यामुपाविशत् ।

śrībharadvāja uvāca tadākarṇya vaco vipraḥ kṣaṇaṁ cintāparāyaṇaḥ samāpya devatāpūjāṁ bahirvedyāmupāviśat

श्री भरद्वाज ने कहा — यह वचन सुनकर वह ब्राह्मण क्षणभर चिंता में लीन रहा, फिर देवता-पूजा समाप्त कर वेदी के बाहर बैठ गया।

श्लोक 10 (skanda.2.32.10)

आनाययामास तदा तदाश्रमगतान्मुनीन् । तेषामकथयच्चासौ दिव्यवाणीरितं वचः ।

ānāyayāmāsa tadā tadāśramagatānmunīn teṣāmakathayaccāsau divyavāṇīritaṁ vacaḥ

तब उन्होंने अपने आश्रम में रहने वाले मुनियों को बुलाया, और उन्हें उस दिव्य वाणी द्वारा कहे गए वचन बताए।

श्लोक 11 (skanda.2.32.11)

तदद्भुतमुपश्रुत्य मुनयो हृष्टमानसाः ।

tadadbhutamupaśrutya munayo hṛṣṭamānasāḥ

उस अद्भुत घटना को सुनकर मुनिजन प्रसन्न मन वाले हुए,

श्लोक 12 (skanda.2.32.12)

अभिवन्द्य मुनिश्रेष्ठं मैत्रावरुणिमब्रुवन् ।

abhivandya muniśreṣṭhaṁ maitrāvaruṇimabruvan

और मुनिश्रेष्ठ मैत्रावरुणि (अगस्त्य) की वंदना कर उनसे बोले —

श्लोक 13 (skanda.2.32.13)

मुनय ऊचुः । आश्चर्याणां महाश्चर्यं मंगलानां च मंगलम् । तवैव शोभते दिव्यं त्वच्चरित्रं कृपानिधे ।

munaya ūcuḥ āścaryāṇāṁ mahāścaryaṁ maṁgalānāṁ ca maṁgalam tavaiva śobhate divyaṁ tvaccaritraṁ kṛpānidhe

मुनियों ने कहा — "हे कृपानिधे! आश्चर्यों में महाआश्चर्य, मंगलों में मंगल, आपका ही दिव्य चरित्र शोभित होता है।

श्लोक 14 (skanda.2.32.14)

तव हुंकारमात्रेण भ्रष्टो देवाधिराज्यतः । नहुषः कीटतां प्राप ततश्चित्रं न विद्यते ।

tava huṁkāramātreṇa bhraṣṭo devādhirājyataḥ nahuṣaḥ kīṭatāṁ prāpa tataścitraṁ na vidyate

आपकी केवल हुंकार-मात्र से नहुष देवाधिराज्य से भ्रष्ट होकर कीट बन गया — उसके बाद अब और कुछ आश्चर्यजनक नहीं रह जाता।

श्लोक 15 (skanda.2.32.15)

समावृतधराचक्रः कल्लोलाताडिताम्बरः । किं न्वतो विद्यते चित्रं यदब्धिश्चुलकीकृतः ।

samāvṛtadharācakraḥ kallolātāḍitāmbaraḥ kiṁ nvato vidyate citraṁ yadabdhiśculakīkṛtaḥ

आपने समस्त पृथ्वी-मंडल को घेरकर, आकाश को अपनी लहरों से टकराने वाले समुद्र को अपनी अंजलि में पी लिया — इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य है?

श्लोक 16 (skanda.2.32.16)

सूर्यमार्गनिरोधार्थं प्रवृत्तो विन्ध्यभूधरः । त्वया प्रशांतिं गमितः किं न्वतो विद्यते परम् ।

sūryamārganirodhārthaṁ pravṛtto vindhyabhūdharaḥ tvayā praśāṁtiṁ gamitaḥ kiṁ nvato vidyate param

सूर्य के मार्ग को रोकने के लिए उठा हुआ विंध्य पर्वत आपके द्वारा शांत कर दिया गया — इससे बढ़कर और क्या है?

श्लोक 17 (skanda.2.32.17)

तवाद्भुतानि कर्माणि कः स्तोतुं प्रभवेद्भुवि । मन्महाभाग्ययोगात्त्वं प्राप्तोऽसीति शरीरिताम् ।

tavādbhutāni karmāṇi kaḥ stotuṁ prabhavedbhuvi manmahābhāgyayogāttvaṁ prāpto'sīti śarīritām

आपके अद्भुत कर्मों की स्तुति करने में इस पृथ्वी पर कौन समर्थ हो सकता है? हमारे ही महाभाग्य से आप यहाँ शरीरधारी होकर पधारे हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.32.18)

वयं कृतार्थाः संजातास्त्रैलोक्ये यन्महामुने । निवसामोऽत्र भवता सनाथा ह्याश्रमस्थले ।

vayaṁ kṛtārthāḥ saṁjātāstrailokye yanmahāmune nivasāmo'tra bhavatā sanāthā hyāśramasthale

हे महामुने! हम तीनों लोकों में कृतार्थ हो गए हैं, क्योंकि हम इस आश्रम-स्थल में आपके सनाथ होकर निवास करते हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.32.19)

वर्ण्यो हि याम्यतो दूरे विषयोऽयं द्विजोत्तम । समस्तवस्तुपूर्णोपि नदीहीनो न राजते ।

varṇyo hi yāmyato dūre viṣayo'yaṁ dvijottama samastavastupūrṇopi nadīhīno na rājate

हे द्विजोत्तम! यह प्रदेश तो यमलोक से भी दूर कहा जाने योग्य है — समस्त वस्तुओं से परिपूर्ण होते हुए भी, नदी-रहित होने के कारण शोभा नहीं पाता।

श्लोक 20 (skanda.2.32.20)

किमलब्धनदीस्नानेनाऽमुना हतजन्मना । अनदीके जनपदे वासादजननं वरम् ।

kimalabdhanadīsnānenā'munā hatajanmanā anadīke janapade vāsādajananaṁ varam

जिसने कभी नदी-स्नान न पाया हो, उस अभागे जन्म से क्या लाभ? नदी-रहित प्रदेश में निवास करने से तो जन्म न लेना ही श्रेष्ठ है।

श्लोक 21 (skanda.2.32.21)

परिपाकस्तु भाग्यानामस्माकं समुपस्थितः । यदादिष्टोसि विबुधैः प्रवर्तय महानदीम् ।

paripākastu bhāgyānāmasmākaṁ samupasthitaḥ yadādiṣṭosi vibudhaiḥ pravartaya mahānadīm

अब तो हमारे भाग्य का परिपाक उपस्थित हो गया है, क्योंकि विद्वानों द्वारा आपको आदेश दिया गया है — महानदी को प्रवाहित करो।

श्लोक 22 (skanda.2.32.22)

प्रवर्तितायां देशेस्मिन्महानद्यां तवानघ । कदा नु खलु यास्यामः कृतस्नाना कृतार्थताम् ।

pravartitāyāṁ deśesminmahānadyāṁ tavānagha kadā nu khalu yāsyāmaḥ kṛtasnānā kṛtārthatām

हे निष्पाप! इस प्रदेश में महानदी के प्रवाहित होने पर, हम स्नान करके कब कृतार्थता को प्राप्त होंगे?

श्लोक 23 (skanda.2.32.23)

किं वितर्केण बहुना प्रयत्नः क्रियतां धुवम् । समानेतुं जगद्वन्द्यां शरण्यां सरिदुत्तमाम् ।

kiṁ vitarkeṇa bahunā prayatnaḥ kriyatāṁ dhuvam samānetuṁ jagadvandyāṁ śaraṇyāṁ sariduttamām

अधिक तर्क से क्या लाभ — जगत्-वंदित, सबकी शरणभूत, श्रेष्ठ नदी को यहाँ लाने का निश्चित प्रयत्न करो।"

श्लोक 24 (skanda.2.32.24)

श्रीभरद्वाज उवाच । स तेषां वचनं हृद्यं मानयित्वा महाद्विजः । समानेष्यामि सरितमिति चक्रे विनिश्चयम् ।

śrībharadvāja uvāca sa teṣāṁ vacanaṁ hṛdyaṁ mānayitvā mahādvijaḥ samāneṣyāmi saritamiti cakre viniścayam

श्री भरद्वाज ने कहा — उन मुनियों के हृदयस्पर्शी वचन का सम्मान कर उस महाब्राह्मण ने निश्चय किया — "मैं इस नदी को यहाँ लाऊँगा।"

श्लोक 25 (skanda.2.32.25)

मुनीश्वरैरनुज्ञातस्तानभ्यर्च्य सुरानपि । विशेषपूजां विधिवद्विधाय पुरविद्विषः ।

munīśvarairanujñātastānabhyarcya surānapi viśeṣapūjāṁ vidhivadvidhāya puravidviṣaḥ

मुनीश्वरों की अनुमति पाकर, उन्हें और देवताओं को भी सम्मानित कर, त्रिपुरारि शिव की विधिपूर्वक विशेष पूजा कर,

श्लोक 26 (skanda.2.32.26)

अंगीकृत्य व्रतं गाढं बहुलक्लेशदुःसहम् । अनन्यसुलभं यत्नात्स चकार महत्तपः ।

aṁgīkṛtya vrataṁ gāḍhaṁ bahulakleśaduḥsaham ananyasulabhaṁ yatnātsa cakāra mahattapaḥ

अनेक कष्टों से युक्त, दुःसह, अन्य किसी के लिए अप्राप्य कठोर व्रत स्वीकार कर, उन्होंने प्रयत्नपूर्वक महान तप किया।

श्लोक 27 (skanda.2.32.27)

घोरेषु घर्मदिवसेष्वन्तरस्थो हविर्भुजाम् । चतुर्णां सवितृन्यस्तदृष्टिर्नापययौ क्लमम् ।

ghoreṣu gharmadivaseṣvantarastho havirbhujām caturṇāṁ savitṛnyastadṛṣṭirnāpayayau klamam

भीषण ग्रीष्म के दिनों में चार अग्नियों और सूर्य के बीच स्थित होकर, सूर्य पर दृष्टि टिकाए हुए, वे कभी थके नहीं।

श्लोक 28 (skanda.2.32.28)

वार्षिकेषु दिनेषूग्रवायुसम्पातदुःसहैः । आसारैस्ताड्यमानोऽपि नोद्वेगमगमद्धृदि ।

vārṣikeṣu dineṣūgravāyusampātaduḥsahaiḥ āsāraistāḍyamāno'pi nodvegamagamaddhṛdi

वर्षा-ऋतु के दिनों में उग्र वायु के प्रहार से असह्य वर्षा-धाराओं से पीड़ित होते हुए भी, उनके हृदय में कोई उद्वेग नहीं आया।

श्लोक 29 (skanda.2.32.29)

हेमन्ते समये तिष्ठन्कण्ठदघ्नेषु वारिषु । जपध्यानपरो भूत्वा न किञ्चिद्विकृतिं ययौ ।

hemante samaye tiṣṭhankaṇṭhadaghneṣu vāriṣu japadhyānaparo bhūtvā na kiñcidvikṛtiṁ yayau

हेमंत ऋतु में कंठ तक जल में खड़े रहकर, जप-ध्यान में लीन होकर, उन्होंने कोई विकार नहीं पाया।

श्लोक 30 (skanda.2.32.30)

ततः समीहितार्थस्य विलम्बमवलोक्य सः । पुनर्गाढतरां निष्ठां प्रपेदे लोकभीषणाम् ।

tataḥ samīhitārthasya vilambamavalokya saḥ punargāḍhatarāṁ niṣṭhāṁ prapede lokabhīṣaṇām

फिर, अपने अभीष्ट कार्य में विलंब देखकर, उन्होंने पुनः और भी कठोर, लोक-भयंकर निष्ठा को अपनाया।

श्लोक 31 (skanda.2.32.31)

निगृह्य मानसीं वृत्तिं निराहारो जितेन्द्रियः । अविज्ञातबहिर्वृत्तिस्तस्थौ पाषाणवत्तदा ।

nigṛhya mānasīṁ vṛttiṁ nirāhāro jitendriyaḥ avijñātabahirvṛttistasthau pāṣāṇavattadā

मानसिक वृत्ति को रोककर, निराहार, जितेन्द्रिय होकर, अपनी बाह्य स्थिति से भी अनजान, वे तब पत्थर के समान स्थिर हो गए।

श्लोक 32 (skanda.2.32.32)

एवं तपस्यतस्तस्य सर्वाङ्गेषु हुताशनः । अभ्रंलिहो ज्वलज्ज्योतिर्निश्चक्राम भयङ्करः ।

evaṁ tapasyatastasya sarvāṅgeṣu hutāśanaḥ abhraṁliho jvalajjyotirniścakrāma bhayaṅkaraḥ

इस प्रकार तप करते हुए उनके समस्त अंगों से आकाश को चाटने वाली, भयंकर, प्रज्वलित अग्नि-ज्योति प्रकट हुई।

श्लोक 33 (skanda.2.32.33)

ततोऽद्भुतशिखाजालैरावृताः सर्वतो दिशः । समुदग्रभयोद्विग्ना जनौघाः परिचुक्रुशुः ।

tato'dbhutaśikhājālairāvṛtāḥ sarvato diśaḥ samudagrabhayodvignā janaughāḥ paricukruśuḥ

तब अद्भुत ज्वाला-समूहों से सभी दिशाएँ आवृत हो गईं, और अत्यधिक भय से व्याकुल जन-समूह चीत्कार करने लगे।

श्लोक 34 (skanda.2.32.34)

तदा तथाविधं घोरं जगत्संक्षोभमागतम् । देवा विज्ञापयामासुर्नमस्कृत्याब्जजन्मने ।

tadā tathāvidhaṁ ghoraṁ jagatsaṁkṣobhamāgatam devā vijñāpayāmāsurnamaskṛtyābjajanmane

तब इस प्रकार के भीषण जगत्-क्षोभ को देखकर, देवताओं ने ब्रह्मा जी को नमस्कार कर उन्हें यह सूचना दी।

श्लोक 35 (skanda.2.32.35)

तानाश्वास्य ततो ब्रह्मा सिद्धगन्धर्वसेवितः । प्रादुरासीत्कुम्भभुवः पुरोभागे तपस्यतः ।

tānāśvāsya tato brahmā siddhagandharvasevitaḥ prādurāsītkumbhabhuvaḥ purobhāge tapasyataḥ

तब उन्हें आश्वासन देकर, सिद्धों और गंधर्वों से सेवित ब्रह्मा जी, तप करते हुए उस कलशोद्भव मुनि के समक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 36 (skanda.2.32.36)

तमागतं समालोक्य ब्रह्माणं परमं द्विजः । प्रणम्य विविधैः स्तोत्रैस्तोषयामास तन्मनाः ।

tamāgataṁ samālokya brahmāṇaṁ paramaṁ dvijaḥ praṇamya vividhaiḥ stotraistoṣayāmāsa tanmanāḥ

इस प्रकार आए हुए परम ब्रह्मा जी को देखकर, उस द्विज ने प्रणाम कर, एकाग्र मन से विविध स्तोत्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न किया।

श्लोक 37 (skanda.2.32.37)

ततस्तं विनयानम्रमगस्त्यं वीक्ष्य पद्मभूः । प्रसादसुमुखो भूत्वा पूतां गिरमुपाददे ।

tatastaṁ vinayānamramagastyaṁ vīkṣya padmabhūḥ prasādasumukho bhūtvā pūtāṁ giramupādade

फिर विनम्रता से झुके हुए अगस्त्य को देखकर, कमल से उत्पन्न ब्रह्मा जी ने प्रसन्न मुख होकर यह पवित्र वाणी कही —

श्लोक 38 (skanda.2.32.38)

ब्रह्मोवाच । परितुष्टोऽस्मि तपसा दुश्चरेण तवानघ । वृणीष्व यद्यदिष्टं ते तत्तद्दास्यामि सुव्रत ।

brahmovāca parituṣṭo'smi tapasā duścareṇa tavānagha vṛṇīṣva yadyadiṣṭaṁ te tattaddāsyāmi suvrata

ब्रह्मा जी ने कहा — "हे निष्पाप! मैं तुम्हारे इस दुष्कर तप से पूर्णतः संतुष्ट हूँ; हे सुव्रत, जो कुछ भी तुम चाहो, वह वर मैं तुम्हें दूँगा।"

श्लोक 39 (skanda.2.32.39)

अगस्त्य उवाच । तव प्रसादात्सकलमुपपन्नं मम प्रभो । संप्रयच्छसि चेत्कामं याचे निःशंकया धिया ।

agastya uvāca tava prasādātsakalamupapannaṁ mama prabho saṁprayacchasi cetkāmaṁ yāce niḥśaṁkayā dhiyā

अगस्त्य ने कहा — "हे प्रभो! आपकी कृपा से मेरे लिए सब कुछ सिद्ध हो चुका है; यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण करना चाहते हैं, तो मैं निःशंक मन से माँगता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.2.32.40)

नदीहीनमिमं देशं दृष्ट्वा खिद्यति मे मनः । अर्थाववोधरहितं श्रुतिपाठमिवाधिकम् ।

nadīhīnamimaṁ deśaṁ dṛṣṭvā khidyati me manaḥ arthāvavodharahitaṁ śrutipāṭhamivādhikam

इस नदी-रहित प्रदेश को देखकर मेरा मन खिन्न होता है, मानो अर्थ-बोध से रहित अत्यधिक वेद-पाठ के समान।

श्लोक 41 (skanda.2.32.41)

उर्वीं पावयितुं दक्षां रक्षितुं च महानदीम् । प्रसादं कुरु देवेश ममेष्टमिदमेव हि ।

urvīṁ pāvayituṁ dakṣāṁ rakṣituṁ ca mahānadīm prasādaṁ kuru deveśa mameṣṭamidameva hi

इस समर्थ पृथ्वी को पवित्र करने और महानदी से इसकी रक्षा करने के लिए, हे देवेश, कृपा कीजिए — यही मेरी एकमात्र इच्छा है।"

श्लोक 42 (skanda.2.32.42)

श्रीभरद्वाज उवाच । अगस्त्यस्य वचः श्रुत्वा भूयादेवमिति ब्रुवन् । सस्मार मनसा ब्रह्मा सुरवर्त्माश्रयां नदीम् ।

śrībharadvāja uvāca agastyasya vacaḥ śrutvā bhūyādevamiti bruvan sasmāra manasā brahmā suravartmāśrayāṁ nadīm

श्री भरद्वाज ने कहा — अगस्त्य के वचन सुनकर, "ऐसा ही हो" कहते हुए ब्रह्मा जी ने मन में देव-मार्ग की आश्रयभूत नदी (गंगा) का स्मरण किया।

श्लोक 43 (skanda.2.32.43)

अथोपेत्य वियद्गंगा पुरस्तात्परमेष्ठिनः । अतिष्ठन्मुकुटन्यस्तप्रशस्ताञ्जलिभासुरा ।

athopetya viyadgaṁgā purastātparameṣṭhinaḥ atiṣṭhanmukuṭanyastapraśastāñjalibhāsurā

तब आकाश-गंगा, परमेष्ठी (ब्रह्मा) के समक्ष आकर, मुकुट पर रखी हुई श्रेष्ठ अंजलि से देदीप्यमान होकर खड़ी हो गईं।

श्लोक 44 (skanda.2.32.44)

स्वशासनात्समायातां विनयानतमस्तकाम् । तां सर्वजगतां धात्रीमिदं वचनमब्रवीत् ।

svaśāsanātsamāyātāṁ vinayānatamastakām tāṁ sarvajagatāṁ dhātrīmidaṁ vacanamabravīt

अपनी ही आज्ञा से आई हुई, विनम्रता से झुके सिर वाली, समस्त लोकों की धात्री उस गंगा से उन्होंने यह वचन कहा —

श्लोक 45 (skanda.2.32.45)

ब्रह्मोवाच । गंगे मयानुशास्यासि कार्ये लोकोपकारके । तवापि लोकरक्षायां ममेव नियता स्थितिः ।

brahmovāca gaṁge mayānuśāsyāsi kārye lokopakārake tavāpi lokarakṣāyāṁ mameva niyatā sthitiḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — "हे गंगे! मुझसे तुम्हें लोक-कल्याणकारी कार्य में आदेश दिया जाता है; लोक-रक्षा में तुम्हारी स्थिति भी मेरे ही समान नियत है।

श्लोक 46 (skanda.2.32.46)

देशे नदीविहीनेऽत्र प्रवर्तयितुमापगाम् । हितार्थं सर्वलोकानां कुम्भजन्मा समीहते ।

deśe nadīvihīne'tra pravartayitumāpagām hitārthaṁ sarvalokānāṁ kumbhajanmā samīhate

इस नदी-रहित प्रदेश में एक नदी को प्रवाहित करने के लिए, समस्त लोकों के हित हेतु, कलशोद्भव मुनि प्रयत्नशील हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.32.47)

तस्मात्त्वमवतीर्योर्वीं स्वांशेनैकेन भूजनान् । पुनीहि गच्छ वसुधामेतद्दर्शितवर्त्मना ।

tasmāttvamavatīryorvīṁ svāṁśenaikena bhūjanān punīhi gaccha vasudhāmetaddarśitavartmanā

इसलिए तुम अपने एक अंश से पृथ्वी पर अवतरित होकर, लोगों को पवित्र करो; इस दिखाए गए मार्ग से पृथ्वी पर जाओ।

श्लोक 48 (skanda.2.32.48)

भूलोके संप्रवृत्ते तु प्रवाहे सिद्धिकांक्षिणः । सेविष्यन्ते सुरवरा मुनिवर्याश्च संततम् ।

bhūloke saṁpravṛtte tu pravāhe siddhikāṁkṣiṇaḥ seviṣyante suravarā munivaryāśca saṁtatam

भूलोक में तुम्हारा प्रवाह चलने पर, सिद्धि की कामना करने वाले श्रेष्ठ देवता और मुनिश्रेष्ठ निरंतर तुम्हारी सेवा करेंगे।

श्लोक 49 (skanda.2.32.49)

नदीषूत्तमतां याहि त्राहि त्वत्संश्रयाञ्जनान् । कुरु प्रियमगस्त्यस्य गच्छ भद्रे यथासुखम् ।

nadīṣūttamatāṁ yāhi trāhi tvatsaṁśrayāñjanān kuru priyamagastyasya gaccha bhadre yathāsukham

नदियों में उत्तमता को प्राप्त करो, अपनी शरण में आए लोगों की रक्षा करो, अगस्त्य का प्रिय कार्य करो; जाओ, हे भद्रे, सुखपूर्वक।"

श्लोक 50 (skanda.2.32.50)

भरद्वाज उवाच । इत्युक्त्वान्तर्दधे ब्रह्मा तया नद्या च तेन च । प्रणामपूजनस्तोत्रैर्विशेषैरभिनन्दितः ।

bharadvāja uvāca ityuktvāntardadhe brahmā tayā nadyā ca tena ca praṇāmapūjanastotrairviśeṣairabhinanditaḥ

भरद्वाज ने कहा — ऐसा कहकर, उस नदी और उस मुनि द्वारा प्रणाम, पूजन और स्तोत्रों से विशेष रूप से अभिनंदित होकर, ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए।

श्लोक 51 (skanda.2.32.51)

अथ गंगा मुनिपतेः पुरस्तात्स्वांशसंभवाम् । दिव्यतेजोमयीं मूर्तिं दर्शयित्वा वचोऽब्रवीत् ।

atha gaṁgā munipateḥ purastātsvāṁśasaṁbhavām divyatejomayīṁ mūrtiṁ darśayitvā vaco'bravīt

तब गंगा ने मुनिपति (अगस्त्य) के समक्ष अपने अंश से उत्पन्न दिव्य तेजोमय मूर्ति दिखाकर यह वचन कहा —

श्लोक 52 (skanda.2.32.52)

गंगोवाच । मदीयांशोऽयमवनीं संप्राप्य मुनिवल्लभ । पूरयिष्यति तेऽभीष्टं नदीरूपं समाश्रितः ।

gaṁgovāca madīyāṁśo'yamavanīṁ saṁprāpya munivallabha pūrayiṣyati te'bhīṣṭaṁ nadīrūpaṁ samāśritaḥ

गंगा ने कहा — "हे मुनिवल्लभ! मेरा यह अंश पृथ्वी पर पहुँचकर, नदी-रूप धारण कर, आपकी अभीष्ट इच्छा पूर्ण करेगा।"

श्लोक 53 (skanda.2.32.53)

भरद्वाज उवाच । इत्युक्त्वा सिद्धवाहिन्यां गतायां तत्प्रयुक्तया । गन्तव्यं वर्त्मना केनेत्युक्तो मुनिरुवाच ताम् ।

bharadvāja uvāca ityuktvā siddhavāhinyāṁ gatāyāṁ tatprayuktayā gantavyaṁ vartmanā kenetyukto muniruvāca tām

भरद्वाज ने कहा — ऐसा कहकर, जब वह सिद्ध-वाहिनी उस प्रयुक्त मार्ग से चल पड़ी, तब "किस मार्ग से जाना है" — यह पूछे जाने पर मुनि ने उससे कहा —

श्लोक 54 (skanda.2.32.54)

अगस्त्य उवाच । गच्छन्पुरस्तात्कल्याणि त्वदीयगमनोचितम् । अहं प्रदर्शयिष्यामि मार्गं त्वं मामनुव्रज ।

agastya uvāca gacchanpurastātkalyāṇi tvadīyagamanocitam ahaṁ pradarśayiṣyāmi mārgaṁ tvaṁ māmanuvraja

अगस्त्य ने कहा — "हे कल्याणि! तुम्हारी यात्रा के अनुकूल मार्ग को आगे चलते हुए मैं ही दिखाऊँगा; तुम मेरे पीछे-पीछे चलो।"

श्लोक 55 (skanda.2.32.55)

इत्युक्ता मुनिना तेन संप्रहृष्टा तवानघ । यदिष्टं तत्करिष्येऽहमिति प्रोवाच सा शुभा ।

ityuktā muninā tena saṁprahṛṣṭā tavānagha yadiṣṭaṁ tatkariṣye'hamiti provāca sā śubhā

उस मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, हे निष्पाप, अत्यंत प्रसन्न होकर उस शुभा ने कहा — "जो आपकी इच्छा है, वही मैं करूँगी।"

श्लोक 56 (skanda.2.32.56)

अथ मुनिरवतार्य तां नगेन्द्राद्धृततटिनीतनुमभ्रसंगिशृङ्गात् । मुदिततरमना ययौ पुरस्तात्तदभिमतां पदवीं प्रदर्शयन्सः ।

atha muniravatārya tāṁ nagendrāddhṛtataṭinītanumabhrasaṁgiśṛṅgāt muditataramanā yayau purastāttadabhimatāṁ padavīṁ pradarśayansaḥ

तब मुनि ने बादलों को छूने वाले उस पर्वतराज के शिखर से नदी-रूपी उसके शरीर को उतारकर, अत्यंत प्रसन्न मन से, उसे अभीष्ट मार्ग दिखाते हुए आगे-आगे चले।

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