वैष्णव खण्ड · अध्याय 33
स्वर्णमुखरी प्रभाव माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.2.33.1)
भरद्वाज उवाच । तदा दिव्यविमानस्थाः शक्रमुख्या दिवौकसः । अगस्त्यमनुयान्तीं तामनुजग्मुर्महापगाम् ।
bharadvāja uvāca tadā divyavimānasthāḥ śakramukhyā divaukasaḥ agastyamanuyāntīṁ tāmanujagmurmahāpagām
भरद्वाज ने कहा — तब इंद्र आदि श्रेष्ठ देवगण दिव्य विमानों में बैठकर, अगस्त्य के पीछे-पीछे चलती हुई उस महानदी के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 2 (skanda.2.33.2)
नवावतारां तां दिव्यां सर्वे च मुनिपुंगवाः । कृताञ्जलिपुटाः स्तोत्रैरनुयाताः सिषेविरे ।
navāvatārāṁ tāṁ divyāṁ sarve ca munipuṁgavāḥ kṛtāñjalipuṭāḥ stotrairanuyātāḥ siṣevire
नवावतरित उस दिव्य नदी को समस्त मुनिश्रेष्ठों ने भी हाथ जोड़कर स्तोत्रों से अनुगमन करते हुए सेवा की।
श्लोक 3 (skanda.2.33.3)
सिद्धचारणगन्धर्वाः संभृताश्च सहस्रशः । तां नदीं तं मुनीन्द्रं च प्रशशंसुः शुभैः स्तवैः ।
siddhacāraṇagandharvāḥ saṁbhṛtāśca sahasraśaḥ tāṁ nadīṁ taṁ munīndraṁ ca praśaśaṁsuḥ śubhaiḥ stavaiḥ
सिद्ध, चारण और गंधर्व सहस्रों की संख्या में एकत्र होकर, उस नदी और उस मुनीन्द्र की शुभ स्तुतियों से प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.2.33.4)
सुधोपमानममलं दिष्ट्या लब्धमिदं जलम् । इत्यौत्सुक्यरसायत्ता ननन्दुर्धरणीजनाः ।
sudhopamānamamalaṁ diṣṭyā labdhamidaṁ jalam ityautsukyarasāyattā nanandurdharaṇījanāḥ
"सौभाग्य से यह अमृत के समान निर्मल जल प्राप्त हुआ है!" — ऐसा कहकर उत्सुकता से भरे पृथ्वी के लोग आनंदित हुए।
श्लोक 5 (skanda.2.33.5)
तदा निदेशाद्देवस्य पद्मयोनेः समीरणः । शृण्वतां सर्वदेवानामिदं वचनमब्रवीत् ।
tadā nideśāddevasya padmayoneḥ samīraṇaḥ śṛṇvatāṁ sarvadevānāmidaṁ vacanamabravīt
तब देव ब्रह्मा के आदेश से, समस्त देवताओं के सुनते हुए, वायु ने यह वचन कहा —
श्लोक 6 (skanda.2.33.6)
वायुरुवाच । सुवर्णमिव लोकानां भागधेयादियं नदी । नीता भुवमगस्त्येन मुखरीकृतदिङ्मुखा ।
vāyuruvāca suvarṇamiva lokānāṁ bhāgadheyādiyaṁ nadī nītā bhuvamagastyena mukharīkṛtadiṅmukhā
वायु ने कहा — यह नदी, मानो लोगों के भाग्य को स्वर्ण के समान बनाने वाली, अगस्त्य द्वारा पृथ्वी पर लाई गई, जिसने समस्त दिशाओं को मुखरित (गुंजायमान) कर दिया है —
श्लोक 7 (skanda.2.33.7)
तस्माद्यास्यति विख्यातिं सर्वलोकाभिनन्दिताम् । सुवर्णमुखरी नाम्ना धाम्नि कैवल्यसंपदः ।
tasmādyāsyati vikhyātiṁ sarvalokābhinanditām suvarṇamukharī nāmnā dhāmni kaivalyasaṁpadaḥ
इसलिए यह समस्त लोकों द्वारा अभिनंदित, कैवल्य-संपत्ति के धाम में सुवर्णमुखरी नाम से विख्यात होगी।
श्लोक 8 (skanda.2.33.8)
एषा सुवर्णमुखरी सरित्सु सकलास्वपि । विशिष्टा सेवनीया च ब्रह्मणो वचनं त्विदम् ।
eṣā suvarṇamukharī saritsu sakalāsvapi viśiṣṭā sevanīyā ca brahmaṇo vacanaṁ tvidam
यह सुवर्णमुखरी समस्त नदियों में विशिष्ट और सेवनीय है — यह स्वयं ब्रह्मा जी का वचन है।
श्लोक 9 (skanda.2.33.9)
भरद्वाज उवाच । श्रुत्वेत्थं पवनेनोक्तं वचनं कुम्भसम्भवः । तुतोष विस्मयाक्रान्तः स्वान्तःपुलकितांगकः ।
bharadvāja uvāca śrutvetthaṁ pavanenoktaṁ vacanaṁ kumbhasambhavaḥ tutoṣa vismayākrāntaḥ svāntaḥpulakitāṁgakaḥ
भरद्वाज ने कहा — वायु द्वारा इस प्रकार कहे गए वचन को सुनकर, वह कलशोद्भव मुनि विस्मय से भरकर संतुष्ट हुए, उनके शरीर के रोमांच से रोमांचित हो उठे।
श्लोक 10 (skanda.2.33.10)
एवमेषा दिव्यनदी स्नानपानादिकल्पनैः । सौख्यावहा मनुष्याणां प्रतिष्ठामगमद्भुवि ।
evameṣā divyanadī snānapānādikalpanaiḥ saukhyāvahā manuṣyāṇāṁ pratiṣṭhāmagamadbhuvi
इस प्रकार यह दिव्य नदी, स्नान-पान आदि की व्यवस्थाओं से मनुष्यों को सुख देने वाली, पृथ्वी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुई।
श्लोक 11 (skanda.2.33.11)
आज्ञया पद्मगर्भस्य तटिन्याकाशवाहिनी । सुवर्णमुखरीनाम्ना पुनात्यात्मैकसंश्रयान् ।
ājñayā padmagarbhasya taṭinyākāśavāhinī suvarṇamukharīnāmnā punātyātmaikasaṁśrayān
पद्मगर्भ (ब्रह्मा) की आज्ञा से यह आकाशगामिनी नदी, सुवर्णमुखरी नाम से, अपनी शरण में आए लोगों को पवित्र करती है,
श्लोक 12 (skanda.2.33.12)
बहून्गिरीन्द्रान्वनमण्डलं च देशाननेकान्सरिदुत्तमेयम् । क्रमादतिक्रम्य निषेव्यमाणा महानदीभिर्गिरिसंभवाभिः ।
bahūngirīndrānvanamaṇḍalaṁ ca deśānanekānsariduttameyam kramādatikramya niṣevyamāṇā mahānadībhirgirisaṁbhavābhiḥ
अनेक श्रेष्ठ पर्वतों, वन-मंडलों और अनेक देशों को क्रमशः पार करती हुई यह श्रेष्ठ नदी, पर्वतों से उत्पन्न महानदियों द्वारा सेवित होती हुई,
श्लोक 13 (skanda.2.33.13)
रोगाहतानामधिकातुराणामनामयैकप्रतिपादकानि । अन्तर्बहिः संभृतभूरितापनिवारणानि प्रियकारणानि ।
rogāhatānāmadhikāturāṇāmanāmayaikapratipādakāni antarbahiḥ saṁbhṛtabhūritāpanivāraṇāni priyakāraṇāni
रोग-पीड़ितों और अत्यंत व्याकुलों के लिए एकमात्र निरामयता का साधन, भीतर-बाहर संचित अत्यधिक ताप को दूर करने वाली, प्रिय कारणभूत जल धारण करती है,
श्लोक 14 (skanda.2.33.14)
विहारलोलद्विरदप्रकाण्डशुण्डामहाघातरयोत्थितेन । पुष्पोपहारं पृषतोत्करेण हर्षाद्ददातीव दिवाकरस्य ।
vihāraloladviradaprakāṇḍaśuṇḍāmahāghātarayotthitena puṣpopahāraṁ pṛṣatotkareṇa harṣāddadātīva divākarasya
मानो क्रीड़ा में चंचल हाथियों की विशाल सूँड़ों के प्रबल प्रहार से उठे हुए जल-कणों के समूह से हर्षपूर्वक सूर्यदेव को पुष्पांजलि अर्पित कर रही हो,
श्लोक 15 (skanda.2.33.15)
सौगंधिकाम्भोरुहकैरवाणां सौरभ्यसंवासितदिङ्मुखानाम् । द्विरेफभाग्यैकनिकेतनानामाधारभूतान्प्रतिनिर्मलानि ।
saugaṁdhikāmbhoruhakairavāṇāṁ saurabhyasaṁvāsitadiṅmukhānām dvirephabhāgyaikaniketanānāmādhārabhūtānpratinirmalāni
सुगंधित लाल कमल, नीलकमल और कुमुद के, जो अपनी सुगंध से समस्त दिशाओं को सुवासित करते हैं, भ्रमरों के एकमात्र भाग्य-निवास के आधारभूत, अत्यंत निर्मल जल धारण करती है,
श्लोक 16 (skanda.2.33.16)
लीलावगाहोत्सुकनाकनारीसीमन्तसिन्दूररजोऽरुणानि । तत्केशपाशच्युतपारिजातप्रसूनगन्धैरधिवासितानि ।
līlāvagāhotsukanākanārīsīmantasindūrarajo'ruṇāni tatkeśapāśacyutapārijātaprasūnagandhairadhivāsitāni
क्रीड़ा में स्नान की उत्सुक स्वर्गीय स्त्रियों की माँग के सिंदूर-रज से लाल हुए, उनकी केश-राशि से गिरे पारिजात पुष्पों की सुगंध से सुवासित जल धारण करती है,
श्लोक 17 (skanda.2.33.17)
सा बिभ्रती संभृतमंगलानि स्वादून्यपंकान्यतिनिर्मलानि । सुधोपमानानि सुरेन्द्रसूनोः पयांसि पापप्रतिघातुकानि ।
sā bibhratī saṁbhṛtamaṁgalāni svādūnyapaṁkānyatinirmalāni sudhopamānāni surendrasūnoḥ payāṁsi pāpapratighātukāni
वह समस्त मंगलों से युक्त, मधुर, कीचड़-रहित, अत्यंत निर्मल, अमृत-तुल्य, पाप-नाशक इंद्र-पुत्री जल को धारण करती हुई,
श्लोक 18 (skanda.2.33.18)
अगस्त्यशैलात्समवाप्तजन्मा नीता भुवं कुम्भसमुद्भवेन । प्रशस्ततीर्थौघविराजमाना समाययौ दक्षिणवारिराशिम् ।
agastyaśailātsamavāptajanmā nītā bhuvaṁ kumbhasamudbhavena praśastatīrthaughavirājamānā samāyayau dakṣiṇavārirāśim
अगस्त्य पर्वत से उत्पन्न होकर, कलशोद्भव मुनि द्वारा पृथ्वी पर लाई गई, प्रशस्त तीर्थ-समूहों से सुशोभित होती हुई, दक्षिण समुद्र में जा मिली।
श्लोक 19 (skanda.2.33.19)
शीकराक्षतविन्यासैः रत्नदीपार्पणैरपि । प्रत्युद्ययुस्तामम्भोधेर्वीचयोऽभिमुखागताः ।
śīkarākṣatavinyāsaiḥ ratnadīpārpaṇairapi pratyudyayustāmambhodhervīcayo'bhimukhāgatāḥ
जल-कणों और अक्षतों की भेंट से, तथा रत्न-दीपों के अर्पण से, समुद्र की लहरें सामने आकर उसका स्वागत करने लगीं,
श्लोक 20 (skanda.2.33.20)
तरंगहस्तैरालिंग्य संभाव्यैनां समागताम् । चकार सरितां नाथः प्रियमाघोषभाषणैः ।
taraṁgahastairāliṁgya saṁbhāvyaināṁ samāgatām cakāra saritāṁ nāthaḥ priyamāghoṣabhāṣaṇaiḥ
और नदियों के स्वामी समुद्र ने अपनी तरंग-रूपी भुजाओं से आलिंगन कर, आदरपूर्वक स्वागत कर, गर्जन-ध्वनि से उसका प्रिय सत्कार किया।
श्लोक 21 (skanda.2.33.21)
प्राप्तायामनुकूलायां तदा तस्यामपांनिधेः । प्रहृष्टेन तरंगेण जीवनं ववृधेतराम् ।
prāptāyāmanukūlāyāṁ tadā tasyāmapāṁnidheḥ prahṛṣṭena taraṁgeṇa jīvanaṁ vavṛdhetarām
जब वह अनुकूल नदी समुद्र में आ मिली, तब उस जल-निधि का जीवन हर्षित तरंगों से अत्यंत बढ़ गया।
श्लोक 22 (skanda.2.33.22)
इत्थं संसृज्य सरितमगस्त्यस्तामुदन्वता । स्तुत्वा ययौ समामन्त्र्य कृतकृत्यो यदृच्छया ।
itthaṁ saṁsṛjya saritamagastyastāmudanvatā stutvā yayau samāmantrya kṛtakṛtyo yadṛcchayā
इस प्रकार उस नदी को समुद्र से मिलाकर, अगस्त्य मुनि उसकी स्तुति कर, विदा लेकर, कृतकृत्य होकर अपनी इच्छानुसार चल पड़े।
श्लोक 23 (skanda.2.33.23)
अर्जुन उवाच । त्वयैष कथितो ब्रह्मन्महानद्याः समुद्भवः । अस्याः प्रभावं भगवन्निदानीं श्रोतुमुत्सहे ।
arjuna uvāca tvayaiṣa kathito brahmanmahānadyāḥ samudbhavaḥ asyāḥ prabhāvaṁ bhagavannidānīṁ śrotumutsahe
अर्जुन ने कहा — "हे ब्रह्मन्! आपने इस महानदी की उत्पत्ति बताई है; अब, हे भगवन्, इसका प्रभाव सुनने के लिए मैं उत्सुक हूँ।"
श्लोक 24 (skanda.2.33.24)
भरद्वाज उवाच । अहो निवर्हणं सर्वश्रेयसामेककारणम् । शृणु माहात्म्यमस्यास्ते कथयिष्यामि पाण्डव ।
bharadvāja uvāca aho nivarhaṇaṁ sarvaśreyasāmekakāraṇam śṛṇu māhātmyamasyāste kathayiṣyāmi pāṇḍava
भरद्वाज ने कहा — "अहो! समस्त कल्याणों का एकमात्र कारण, समस्त अमंगलों का नाशक — हे पांडव, इसका माहात्म्य सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.2.33.25)
पाश्चात्त्यं जन्म संप्राप्य ज्ञानिनां कर्मणः क्षये । सुवर्णमुखरीस्नानं सिद्ध्येद्ब्रह्मत्वकारणम् ।
pāścāttyaṁ janma saṁprāpya jñānināṁ karmaṇaḥ kṣaye suvarṇamukharīsnānaṁ siddhyedbrahmatvakāraṇam
ज्ञानियों के लिए, कर्मों के क्षय होने पर अंतिम जन्म प्राप्त कर, सुवर्णमुखरी में स्नान ब्रह्मत्व-प्राप्ति का कारण सिद्ध होता है।
श्लोक 26 (skanda.2.33.26)
एतां सुवर्णमुखरीं योजनानां शतैरपि । स्मृत्वा मनुष्यः पापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।
etāṁ suvarṇamukharīṁ yojanānāṁ śatairapi smṛtvā manuṣyaḥ pāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ
सैकड़ों योजन दूर से भी इस सुवर्णमुखरी का स्मरण कर, मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 27 (skanda.2.33.27)
निःक्षिप्तमस्थि जन्तूनां सुवर्णमुखरीजले । सोपानतां समायाति ब्रह्मलोकाधिरोहणे ।
niḥkṣiptamasthi jantūnāṁ suvarṇamukharījale sopānatāṁ samāyāti brahmalokādhirohaṇe
सुवर्णमुखरी के जल में डाली गई किसी भी प्राणी की हड्डी, ब्रह्मलोक पर चढ़ने की सीढ़ी बन जाती है।
श्लोक 28 (skanda.2.33.28)
स्मरन्तः स्वर्णमुखरीं यत्र कुत्रापि मानवाः । तोयान्तरेषु स्नात्वापि लभन्ते फलमुत्तमम् ।
smarantaḥ svarṇamukharīṁ yatra kutrāpi mānavāḥ toyāntareṣu snātvāpi labhante phalamuttamam
जो मनुष्य कहीं भी, दूसरे जल में स्नान करते हुए भी सुवर्णमुखरी का स्मरण करते हैं, वे उत्तम फल प्राप्त करते हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.33.29)
तावदेवाभिभूयन्ते नराः पातककोटिभिः । सुवर्णमुखरीस्नानं यावत्तल्लभ्यते शुभम् ।
tāvadevābhibhūyante narāḥ pātakakoṭibhiḥ suvarṇamukharīsnānaṁ yāvattallabhyate śubham
मनुष्य तब तक करोड़ों पापों से आक्रांत रहते हैं, जब तक उन्हें सुवर्णमुखरी में स्नान का शुभ अवसर प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 30 (skanda.2.33.30)
दिव्यान्तरिक्षभौमानि तीर्थानि निजसिद्धये । स्मरन्त्यहरहः प्रातः सुवर्णमुखरीं नदीम् ।
divyāntarikṣabhaumāni tīrthāni nijasiddhaye smarantyaharahaḥ prātaḥ suvarṇamukharīṁ nadīm
अपनी सिद्धि के लिए लोग प्रतिदिन प्रातःकाल दिव्य, अंतरिक्ष और भूतल के तीर्थों के साथ सुवर्णमुखरी नदी का भी स्मरण करते हैं —
श्लोक 31 (skanda.2.33.31)
अगस्त्याचलसंभूता दक्षिणोदधिगामिनी । पापानि स्वर्णमुखरी स्मरणादेव नाशयेत् ।
agastyācalasaṁbhūtā dakṣiṇodadhigāminī pāpāni svarṇamukharī smaraṇādeva nāśayet
अगस्त्याचल से उत्पन्न, दक्षिण समुद्र की ओर जाने वाली सुवर्णमुखरी, केवल स्मरण मात्र से ही पापों का नाश कर देती है।
श्लोक 32 (skanda.2.33.32)
सुवर्णमुखरीस्नानलोलुपेनान्तरात्मना । वाञ्छंति मर्त्यतामेव देवाः शक्रपुरोगमाः ।
suvarṇamukharīsnānalolupenāntarātmanā vāñchaṁti martyatāmeva devāḥ śakrapurogamāḥ
सुवर्णमुखरी में स्नान की लालसा रखने वाले अंतरात्मा से, इंद्र आदि देवता भी मनुष्य जन्म पाने की इच्छा करते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.33.33)
सुवर्णमुखरीतोयपुष्टसस्यान्नभोजिनः । न लिप्यन्ते महापापैर्दुर्भोजनशतोद्भवैः ।
suvarṇamukharītoyapuṣṭasasyānnabhojinaḥ na lipyante mahāpāpairdurbhojanaśatodbhavaiḥ
सुवर्णमुखरी के जल से पोषित फसल का अन्न खाने वाले, सैकड़ों दुष्ट भोजनों से उत्पन्न महापापों से लिप्त नहीं होते।
श्लोक 34 (skanda.2.33.34)
अपि निष्कमितं पीतं सुवर्णमुखरीजलम् । नाशयेदद्रितुल्यानि ह्याशु पापानि देहिनाम् ।
api niṣkamitaṁ pītaṁ suvarṇamukharījalam nāśayedadritulyāni hyāśu pāpāni dehinām
सुवर्णमुखरी के तट से बाहर निकाला हुआ जल भी पीने पर, देहधारियों के पर्वत-तुल्य पापों को भी शीघ्र नष्ट कर देता है।
श्लोक 35 (skanda.2.33.35)
प्राप्याऽपि मानुषं जन्म सुवर्णमुखरीजले । ये वा स्नानं न कुर्वन्ति तेषां जन्म निरर्थकम् ।
prāpyā'pi mānuṣaṁ janma suvarṇamukharījale ye vā snānaṁ na kurvanti teṣāṁ janma nirarthakam
मनुष्य जन्म पाकर भी जो सुवर्णमुखरी के जल में स्नान नहीं करते, उनका जन्म निरर्थक है।
श्लोक 36 (skanda.2.33.36)
सुवर्णमुखरीस्नानं यदेकं विधिना कृतम् । जाह्नवीस्नानकोटीनां समं भवति पर्वसु ।
suvarṇamukharīsnānaṁ yadekaṁ vidhinā kṛtam jāhnavīsnānakoṭīnāṁ samaṁ bhavati parvasu
विधिपूर्वक किया गया सुवर्णमुखरी का एक स्नान, पर्वों पर की गई करोड़ों गंगा-स्नानों के समान फल देने वाला होता है।
श्लोक 37 (skanda.2.33.37)
गोविंद इव देवेषु नक्षत्रेष्विव चन्द्रमाः । नरेष्विव महीपालो भूरुहेष्विव कल्पकः ।
goviṁda iva deveṣu nakṣatreṣviva candramāḥ nareṣviva mahīpālo bhūruheṣviva kalpakaḥ
जैसे देवताओं में गोविंद, नक्षत्रों में चंद्रमा, मनुष्यों में धर्मात्मा राजा, वृक्षों में कल्पवृक्ष,
श्लोक 38 (skanda.2.33.38)
महाभूतेष्विव वियन्मायेवाखिलशक्तिषु । गायत्रीव च मन्त्रेषु वज्रं देवायुधेष्विव ।
mahābhūteṣviva viyanmāyevākhilaśaktiṣu gāyatrīva ca mantreṣu vajraṁ devāyudheṣviva
महाभूतों में आकाश, समस्त शक्तियों में माया, मंत्रों में गायत्री, देव-आयुधों में वज्र,
श्लोक 39 (skanda.2.33.39)
तत्त्वेष्विवात्मनस्तत्त्वं रुद्राध्यायो यजुष्ष्विव । अनन्त इव नागेषु हिमाचल इवाद्रिषु ।
tattveṣvivātmanastattvaṁ rudrādhyāyo yajuṣṣviva ananta iva nāgeṣu himācala ivādriṣu
तत्त्वों में आत्म-तत्त्व, यजुर्वेद के मंत्रों में रुद्राध्याय, नागों में अनंत, पर्वतों में हिमाचल,
श्लोक 40 (skanda.2.33.40)
पोत्रिक्षेत्रमिव क्षेत्रेष्विन्द्रियेष्विव मानसम् । नदीष्वपि च सर्वासु सुवर्णमुखरी वरा ।
potrikṣetramiva kṣetreṣvindriyeṣviva mānasam nadīṣvapi ca sarvāsu suvarṇamukharī varā
क्षेत्रों में यज्ञ-वेदी, इंद्रियों में मन — वैसे ही समस्त नदियों में सुवर्णमुखरी श्रेष्ठ है।
श्लोक 41 (skanda.2.33.41)
नित्यं स्मरेन्नमस्कुर्यात्कीर्तयेन्मनसार्चयेत् । शुद्धिक्षेमशिवापेक्षी सुवर्णमुखरीं शुभाम् ।
nityaṁ smarennamaskuryātkīrtayenmanasārcayet śuddhikṣemaśivāpekṣī suvarṇamukharīṁ śubhām
शुद्धि, कल्याण और मंगल की कामना करने वाले को नित्य शुभ सुवर्णमुखरी का स्मरण, नमन, कीर्तन और मन से पूजन करना चाहिए —
श्लोक 42 (skanda.2.33.42)
अगस्त्याचलसंभूतां दक्षिणोदधिगामिनीम् । समस्तपापहन्त्रीं त्वां सुवर्णमुखरीं श्रये ।
agastyācalasaṁbhūtāṁ dakṣiṇodadhigāminīm samastapāpahantrīṁ tvāṁ suvarṇamukharīṁ śraye
"अगस्त्याचल से उत्पन्न, दक्षिण समुद्र की ओर जाने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली हे सुवर्णमुखरी! मैं तुम्हारी शरण लेता हूँ।
श्लोक 43 (skanda.2.33.43)
महापातकविप्लुष्टं गात्रं मम तवोदकैः । क्षालयामि जगद्धात्रि श्रेयसा योजयस्व माम् ।
mahāpātakavipluṣṭaṁ gātraṁ mama tavodakaiḥ kṣālayāmi jagaddhātri śreyasā yojayasva mām
हे जगद्धात्रि! महापातकों से कलंकित अपने शरीर को तुम्हारे जल से धोता हूँ; मुझे कल्याण से युक्त करो।"
श्लोक 44 (skanda.2.33.44)
इति सूक्तद्वयं सम्यगुच्चार्य नियतो नरः । सुवर्णमुखरीतोये स्नात्वा शुद्धः प्रमोदते ।
iti sūktadvayaṁ samyaguccārya niyato naraḥ suvarṇamukharītoye snātvā śuddhaḥ pramodate
इस प्रकार इन दो सूक्तों का सम्यक् उच्चारण कर, संयमित मनुष्य सुवर्णमुखरी के जल में स्नान कर, शुद्ध होकर आनंदित होता है।
श्लोक 45 (skanda.2.33.45)
ब्रह्मणा निर्मिता पूर्वमगस्त्येन समाहृता । स्वयं मन्दाकिनी मूर्ता सुवर्णमुखरी वरा ।
brahmaṇā nirmitā pūrvamagastyena samāhṛtā svayaṁ mandākinī mūrtā suvarṇamukharī varā
पहले ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित, अगस्त्य द्वारा लाई गई, यह श्रेष्ठ सुवर्णमुखरी स्वयं मंदाकिनी (गंगा) की ही साक्षात् मूर्ति है।
श्लोक 46 (skanda.2.33.46)
एवंप्रभावा दिव्येयं कीर्तनीया शुभार्थिभिः । मनसा भक्तियुक्तेन स्नातव्या शुभकांक्षिभिः ।
evaṁprabhāvā divyeyaṁ kīrtanīyā śubhārthibhiḥ manasā bhaktiyuktena snātavyā śubhakāṁkṣibhiḥ
ऐसे प्रभाव वाली यह दिव्य नदी, शुभार्थियों द्वारा कीर्तनीय है, और शुभ-कामना रखने वालों द्वारा भक्तिपूर्ण मन से स्नान करने योग्य है।
श्लोक 47 (skanda.2.33.47)
सोमसूर्योपरागेषु स्नानदानादिकं कृतम् । स्यादमेयफलं पार्थ सुवर्णमुखरीतटे ।
somasūryoparāgeṣu snānadānādikaṁ kṛtam syādameyaphalaṁ pārtha suvarṇamukharītaṭe
हे पार्थ! चंद्र और सूर्य ग्रहणों के समय सुवर्णमुखरी के तट पर किया गया स्नान-दान आदि अमेय फल देने वाला होता है।
श्लोक 48 (skanda.2.33.48)
संक्रान्तावयने पुण्ये व्यतीपातेऽथ वासरे । सुवर्णमुखरीस्नानं कुलकोटिं समुद्धरेत् ।
saṁkrāntāvayane puṇye vyatīpāte'tha vāsare suvarṇamukharīsnānaṁ kulakoṭiṁ samuddharet
पुण्यकारी संक्रांति पर, अयन पर, तथा व्यतीपात के दिन, सुवर्णमुखरी में स्नान करोड़ों पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।
श्लोक 49 (skanda.2.33.49)
जन्मर्क्षे जन्मदिवसे सुवर्णमुखरीजले । स्नात्वा विधिवदाप्नोति क्षेमारोग्यसुखश्रियः ।
janmarkṣe janmadivase suvarṇamukharījale snātvā vidhivadāpnoti kṣemārogyasukhaśriyaḥ
जन्म-नक्षत्र पर, जन्मदिन पर, सुवर्णमुखरी के जल में विधिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य कल्याण, आरोग्य, सुख और संपत्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 50 (skanda.2.33.50)
दुःस्वप्नविघ्नजं भूतग्रहदुःस्थानजं तथा । सुवर्णमुखरीतोये स्नात्वा तरति किल्बिषम् ।
duḥsvapnavighnajaṁ bhūtagrahaduḥsthānajaṁ tathā suvarṇamukharītoye snātvā tarati kilbiṣam
दुःस्वप्न और विघ्न से उत्पन्न, तथा भूत-ग्रह और अशुभ स्थान से उत्पन्न पाप को, सुवर्णमुखरी के जल में स्नान कर मनुष्य पार कर जाता है।
श्लोक 51 (skanda.2.33.51)
सुवर्णमुखरीतीरे गोपादप्रमितां भुवम् । दत्त्वा सर्वमहीदानाद्यत्फलं तदवाप्नुयात् ।
suvarṇamukharītīre gopādapramitāṁ bhuvam dattvā sarvamahīdānādyatphalaṁ tadavāpnuyāt
सुवर्णमुखरी के तट पर गाय के एक पग जितनी भूमि दान करके, संपूर्ण पृथ्वी-दान का जो फल है, वही फल प्राप्त होता है।
श्लोक 52 (skanda.2.33.52)
धेनुं सवस्त्रालंकारां सुवर्णमुखरीतटे । दत्त्वा विप्राय विधिवद्याति ब्रह्म सनातनम् ।
dhenuṁ savastrālaṁkārāṁ suvarṇamukharītaṭe dattvā viprāya vidhivadyāti brahma sanātanam
सुवर्णमुखरी के तट पर वस्त्र और आभूषण सहित गाय को ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान करके, मनुष्य सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 53 (skanda.2.33.53)
पुण्यकालेषु दानानि विधेयान्यखिलान्यपि । इहामुत्र फलप्राप्त्यै सुवर्णमुखरीतटे ।
puṇyakāleṣu dānāni vidheyānyakhilānyapi ihāmutra phalaprāptyai suvarṇamukharītaṭe
पुण्य-कालों में सुवर्णमुखरी के तट पर किए गए समस्त दान इस लोक और परलोक में फल प्राप्ति के लिए किए जाने चाहिए।
श्लोक 54 (skanda.2.33.54)
जपो होमस्तपो दानं पितृकर्म सुरार्चनम् । कृतं भवेच्छतगुणं सुवर्णमुखरीतटे ।
japo homastapo dānaṁ pitṛkarma surārcanam kṛtaṁ bhavecchataguṇaṁ suvarṇamukharītaṭe
जप, हवन, तप, दान, पितृ-कर्म और देव-पूजन, सुवर्णमुखरी के तट पर किए जाने पर सौ गुना फल देने वाले होते हैं।
श्लोक 55 (skanda.2.33.55)
अन्यत्ते कथयिष्यामि विधेयं व्रतमुत्तमम् । सुवर्णमुखरीतीरे प्रतिवर्षं सुखार्थिभिः ।
anyatte kathayiṣyāmi vidheyaṁ vratamuttamam suvarṇamukharītīre prativarṣaṁ sukhārthibhiḥ
मैं तुम्हें एक और उत्तम व्रत बताऊँगा, जो सुख की कामना रखने वालों द्वारा प्रतिवर्ष सुवर्णमुखरी के तट पर किया जाना चाहिए —
श्लोक 56 (skanda.2.33.56)
मेघकाले रविकरैस्तिरोधानमुपागतः । यदोदेति मुनिः श्रीमान्मित्रावरुणनन्दनः ।
meghakāle ravikaraistirodhānamupāgataḥ yadodeti muniḥ śrīmānmitrāvaruṇanandanaḥ
वर्षा-ऋतु में सूर्य-किरणों से छिप जाने के बाद, जब श्रीमान् मित्रावरुण-नंदन मुनि (अगस्त्य तारा) पुनः उदय होते हैं,
श्लोक 57 (skanda.2.33.57)
तस्मिन्दिने ये नियताः स्नानमस्यां प्रकुर्वते । तैः कल्पं च सुरावासे स्थीयते कुरुनन्दन ।
tasmindine ye niyatāḥ snānamasyāṁ prakurvate taiḥ kalpaṁ ca surāvāse sthīyate kurunandana
उस दिन जो संयमित होकर इस नदी में स्नान करते हैं, हे कुरुनंदन, वे एक कल्प तक देवलोक में निवास करते हैं।
श्लोक 58 (skanda.2.33.58)
तदागस्त्यस्य यद्रूपं सुवर्णेन विनिर्मितम् । विधिना ददते पार्थ ते यांति ब्रह्म शाश्वतम् ।
tadāgastyasya yadrūpaṁ suvarṇena vinirmitam vidhinā dadate pārtha te yāṁti brahma śāśvatam
हे पार्थ! उस दिन जो विधिपूर्वक स्वर्ण से बना अगस्त्य का रूप दान करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 59 (skanda.2.33.59)
अर्जुन उवाच । विधिना केन कर्तव्यं व्रतमेतन्महामुने । तन्ममाचक्ष्व सकलं जिज्ञासोस्तु महात्मनः ।
arjuna uvāca vidhinā kena kartavyaṁ vratametanmahāmune tanmamācakṣva sakalaṁ jijñāsostu mahātmanaḥ
अर्जुन ने कहा — "हे महामुने! यह व्रत किस विधि से करना चाहिए? मुझे, जो महात्मा जानने का इच्छुक हूँ, यह संपूर्ण बताइए।"
श्लोक 60 (skanda.2.33.60)
भरद्वाज उवाच । अगस्त्यस्योदयदिनं ज्ञात्वा नियतमानसः । स्वशक्त्या कारयेद्रूपं तस्य हेम्ना महामुनेः ।
bharadvāja uvāca agastyasyodayadinaṁ jñātvā niyatamānasaḥ svaśaktyā kārayedrūpaṁ tasya hemnā mahāmuneḥ
भरद्वाज ने कहा — "अगस्त्य के उदय-दिन को जानकर, संयमित मन से, अपनी सामर्थ्य के अनुसार उस महामुनि की स्वर्ण से एक प्रतिमा बनवानी चाहिए,
श्लोक 61 (skanda.2.33.61)
सुवर्णभास्वरच्छायं जटाबन्धमनोहरम् । दधानं करपद्माभ्यामक्षमालां कमण्डलुम् ।
suvarṇabhāsvaracchāyaṁ jaṭābandhamanoharam dadhānaṁ karapadmābhyāmakṣamālāṁ kamaṇḍalum
स्वर्ण के समान देदीप्यमान वर्ण वाली, मनोहर जटा-बंधन वाली, अपने कमल-हाथों में अक्षमाला और कमंडल धारण किए हुए,
श्लोक 62 (skanda.2.33.62)
वसानं मृदुलं वल्कं मृगचर्मोत्तरीयकम् । सौम्यं भस्मांकरुचिरं रुद्राक्षकृतभूषणम् ।
vasānaṁ mṛdulaṁ valkaṁ mṛgacarmottarīyakam saumyaṁ bhasmāṁkaruciraṁ rudrākṣakṛtabhūṣaṇam
कोमल वल्कल वस्त्र और मृगचर्म का उत्तरीय धारण किए, सौम्य, भस्म से सुशोभित, रुद्राक्ष से अलंकृत।
श्लोक 63 (skanda.2.33.63)
एवं विधाय तद्रूपं स्नात्वा नियतमानसः । आचार्यं गन्धपुष्पाद्यैरलङ्कृत्य यथाविधि ।
evaṁ vidhāya tadrūpaṁ snātvā niyatamānasaḥ ācāryaṁ gandhapuṣpādyairalaṅkṛtya yathāvidhi
इस प्रकार वह प्रतिमा बनवाकर, संयमित मन से स्नान कर, आचार्य को गंध-पुष्प आदि से विधिपूर्वक अलंकृत कर,
श्लोक 64 (skanda.2.33.64)
शालेयतण्डुलानां तामाढकस्योपरि स्थिताम् । वस्त्रद्वयसमायुक्तां प्रतिमां प्रतिपूजयेत् ।
śāleyataṇḍulānāṁ tāmāḍhakasyopari sthitām vastradvayasamāyuktāṁ pratimāṁ pratipūjayet
शालि चावल के एक आढक की राशि पर स्थापित, दो वस्त्रों से युक्त उस प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए, यह कहते हुए —
श्लोक 65 (skanda.2.33.65)
विन्ध्यसंस्तम्भनो वार्धिचुलकीकृतिपेशलः । ब्रह्मादिसर्वदेवानां तेजसा सुप्रकाशितः ।
vindhyasaṁstambhano vārdhiculakīkṛtipeśalaḥ brahmādisarvadevānāṁ tejasā suprakāśitaḥ
'जिसने विंध्य को रोका, जो समुद्र को अंजलि में पीने में कुशल था, जो ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं के तेज से देदीप्यमान है,
श्लोक 66 (skanda.2.33.66)
अगस्त्यः कुम्भसंभूतो देवासुरनमस्कृतः । प्रीतिमाप्नोतु महतीं दानेनानेन मे प्रभुः ।
agastyaḥ kumbhasaṁbhūto devāsuranamaskṛtaḥ prītimāpnotu mahatīṁ dānenānena me prabhuḥ
वह कुंभ-संभव अगस्त्य, देव-असुरों द्वारा नमस्कृत — मेरे इस दान से मेरे उस प्रभु को महान प्रसन्नता प्राप्त हो।'
श्लोक 67 (skanda.2.33.67)
इमं मन्त्रं समुच्चार्य धारापूर्वं सदक्षिणम् । दत्त्वा विमुक्तः पापेभ्यो याति ब्रह्म सनातनम् ।
imaṁ mantraṁ samuccārya dhārāpūrvaṁ sadakṣiṇam dattvā vimuktaḥ pāpebhyo yāti brahma sanātanam
इस मंत्र का उच्चारण कर, दक्षिणा सहित जल-धारापूर्वक दान देकर, मनुष्य पापों से मुक्त होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 68 (skanda.2.33.68)
जन्मान्तरकृतैर्नूनमिह जन्मकृतैरपि । महापापोपपापौघैर्मुच्यते नात्र संशयः ।
janmāntarakṛtairnūnamiha janmakṛtairapi mahāpāpopapāpaughairmucyate nātra saṁśayaḥ
वह निश्चय ही, दूसरे जन्मों में और इसी जन्म में किए गए महापापों और उपपापों के समूह से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 69 (skanda.2.33.69)
ब्रह्माद्याः सकला देवाः सनकाद्या महर्षयः । चराचराणि भूतानि प्रीतिं यांति न संशयः ।
brahmādyāḥ sakalā devāḥ sanakādyā maharṣayaḥ carācarāṇi bhūtāni prītiṁ yāṁti na saṁśayaḥ
ब्रह्मा आदि समस्त देवता, सनक आदि महर्षि, और चराचर सभी प्राणी प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 70 (skanda.2.33.70)
कृत्वा व्रतमिदं पुण्यमगस्त्यस्य च सन्मुनेः । प्रीत्यर्थं भोजयेद्विप्रान्यथाशक्ति सदक्षिणम् ।
kṛtvā vratamidaṁ puṇyamagastyasya ca sanmuneḥ prītyarthaṁ bhojayedviprānyathāśakti sadakṣiṇam
यह पुण्य व्रत करके, सत्पुरुष अगस्त्य मुनि की प्रसन्नता के लिए, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.2.33.71)
तस्मिन्कर्मणि चाशक्तो यथाशक्ति महीसुरान् । स्वर्णधान्यादिदानेन तोषयेद्भक्तिसंयुतः ।
tasminkarmaṇi cāśakto yathāśakti mahīsurān svarṇadhānyādidānena toṣayedbhaktisaṁyutaḥ
उस कर्म में असमर्थ व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार भक्तिपूर्वक स्वर्ण, धान्य आदि के दान से ब्राह्मणों को संतुष्ट करना चाहिए।
श्लोक 72 (skanda.2.33.72)
तिथिं न वितथीकुर्यात्तां यत्नेन समाचरेत् । यत्किञ्चिदपि चावश्यं कर्म कुर्याच्च पूरुषः ।
tithiṁ na vitathīkuryāttāṁ yatnena samācaret yatkiñcidapi cāvaśyaṁ karma kuryācca pūruṣaḥ
उस तिथि को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए, प्रयत्नपूर्वक उसका पालन करना चाहिए; मनुष्य को जो भी थोड़ा-बहुत कर्म संभव हो, वह अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.2.33.73)
महामुनेरगस्त्यस्य परिपक्वं तपःफलम् । नदी सुवर्णमुखरी कीर्तनीया सुरासुरैः ।
mahāmuneragastyasya paripakvaṁ tapaḥphalam nadī suvarṇamukharī kīrtanīyā surāsuraiḥ
महामुनि अगस्त्य के तप का परिपक्व फल यह सुवर्णमुखरी नदी, देवताओं और असुरों दोनों द्वारा कीर्तनीय है।
श्लोक 74 (skanda.2.33.74)
एवं ते कथितः सम्यङ्महानद्याः समुद्भवः । प्रभावश्च तदाचक्ष्व यद्भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
evaṁ te kathitaḥ samyaṅmahānadyāḥ samudbhavaḥ prabhāvaśca tadācakṣva yadbhūyaḥ śrotumicchasi
इस प्रकार मैंने तुम्हें इस महानदी की उत्पत्ति और प्रभाव भली-भाँति बता दिया; अब बताओ तुम और क्या सुनना चाहते हो।"