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वैष्णव खण्ड · अध्याय 34

अगस्त्यतीर्थादि विविध तीर्थ माहात्म्य

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (skanda.2.34.1)

अर्जुन उवाच । श्रोत्राञ्जलिभ्यां पीत्वापि भवद्वाक्यामृतं मुहुः । मनो नोपैति मे तृप्तिं भूयः श्रवणकाङ्क्षया ।

arjuna uvāca śrotrāñjalibhyāṁ pītvāpi bhavadvākyāmṛtaṁ muhuḥ mano nopaiti me tṛptiṁ bhūyaḥ śravaṇakāṅkṣayā

अर्जुन ने कहा — "अपने कानों की अंजलि से बार-बार आपके वचन-रूपी अमृत को पीकर भी, मेरा मन तृप्ति को प्राप्त नहीं होता, और अधिक सुनने की इच्छा करता है।

श्लोक 2 (skanda.2.34.2)

क्रियासमभिहारो मे त्वद्वाक्याकर्णनैषिणः । मनः खेदाय मा भूत्ते करुणाभरितात्मनः ।

kriyāsamabhihāro me tvadvākyākarṇanaiṣiṇaḥ manaḥ khedāya mā bhūtte karuṇābharitātmanaḥ

आपके वचन सुनने के इच्छुक मुझ पर इस क्रिया की पुनरावृत्ति हो; करुणा से भरे आपके मन को यह खेद का कारण न बने।

श्लोक 3 (skanda.2.34.3)

इदानीं श्रोतुमिच्छामि नद्यामस्यां महामुने । कुत्र कुत्र समर्थानि तीर्थान्यघनिबर्हणे ।

idānīṁ śrotumicchāmi nadyāmasyāṁ mahāmune kutra kutra samarthāni tīrthānyaghanibarhaṇe

अब, हे महामुने, मैं इस नदी में यह सुनना चाहता हूँ कि कहाँ-कहाँ पापनाशक समर्थ तीर्थ हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.34.4)

काः काः पुण्यतरंगिण्यः सङ्गता अनया मुने । कुत्र स्नानेन कृत्ताघा नोपयांति यमाद्भयम् ।

kāḥ kāḥ puṇyataraṁgiṇyaḥ saṅgatā anayā mune kutra snānena kṛttāghā nopayāṁti yamādbhayam

हे मुने, कौन-कौन सी पुण्य नदियाँ इससे मिली हैं? कहाँ स्नान करने से पाप कटकर लोग यमराज के भय को प्राप्त नहीं होते?

श्लोक 5 (skanda.2.34.5)

हराच्युतादिदेवानां पुण्यान्यायतनानि च । यानियानि च पुण्यानि तिष्ठन्त्यस्यास्तटद्वये ।

harācyutādidevānāṁ puṇyānyāyatanāni ca yāniyāni ca puṇyāni tiṣṭhantyasyāstaṭadvaye

हर, अच्युत आदि देवताओं के पुण्य निवास-स्थान, और जो भी अन्य पुण्य इसके दोनों तटों पर स्थित हैं,

श्लोक 6 (skanda.2.34.6)

तेषु क्षेत्रेषु मनुजैर्यत्फलं समवाप्यते । विहितैर्विधिवत्स्नानदानादिशुभकर्मभिः ।

teṣu kṣetreṣu manujairyatphalaṁ samavāpyate vihitairvidhivatsnānadānādiśubhakarmabhiḥ

उन क्षेत्रों में विधिपूर्वक स्नान-दान आदि शुभ कर्मों से मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है, वह भी बताइए।

श्लोक 7 (skanda.2.34.7)

सोपाख्यानमिदं सर्वं वेदितं वेदवित्तम । संजाता महती प्रीतिर्विस्तार्याचक्ष्व मे क्रमात् ।

sopākhyānamidaṁ sarvaṁ veditaṁ vedavittama saṁjātā mahatī prītirvistāryācakṣva me kramāt

हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ! यह सब आख्यानों सहित क्रमशः विस्तार से मुझे बताइए — मुझे इसे सुनने की बड़ी उत्कंठा हुई है।"

श्लोक 8 (skanda.2.34.8)

भरद्वाज उवाच । यत्पृष्टं भवता पार्थ क्रमाद्विस्तार्य कथ्यते । आरभ्यागस्त्यतीर्थेन्द्रादस्यास्तीर्थौघवैभवम् ।

bharadvāja uvāca yatpṛṣṭaṁ bhavatā pārtha kramādvistārya kathyate ārabhyāgastyatīrthendrādasyāstīrthaughavaibhavam

भरद्वाज ने कहा — "हे पार्थ! तुमने जो पूछा है, वह क्रमशः विस्तार से बताया जाता है — इस नदी पर स्थित तीर्थों के समूह की महिमा, अगस्त्यतीर्थ से आरंभ करके।

श्लोक 9 (skanda.2.34.9)

अखण्डज्ञानरूपेण सर्वलोकहितैषिणा । सुरासुराणां संभाव्येनागस्त्येन महात्मना ।

akhaṇḍajñānarūpeṇa sarvalokahitaiṣiṇā surāsurāṇāṁ saṁbhāvyenāgastyena mahātmanā

अखंड ज्ञान-रूप, समस्त लोकों के हित की कामना करने वाले, देव-असुरों द्वारा सम्मानित महात्मा अगस्त्य द्वारा,

श्लोक 10 (skanda.2.34.10)

वसुधामवतीर्णायां प्रथमं तद्धराधरात् । स्नात्वा यत्र महानद्यां संप्राप्नोति कृतार्थताम् ।

vasudhāmavatīrṇāyāṁ prathamaṁ taddharādharāt snātvā yatra mahānadyāṁ saṁprāpnoti kṛtārthatām

जब यह महानदी उस पर्वत से पृथ्वी पर पहली बार अवतरित हुई, वहाँ स्नान करके मनुष्य कृतार्थता को प्राप्त करता है —

श्लोक 11 (skanda.2.34.11)

अगस्त्यतीर्थमित्युक्तं पावनं तज्जगत्त्रये । तत्र स्नानेन शुद्धिः स्यान्महापातकिनामपि ।

agastyatīrthamityuktaṁ pāvanaṁ tajjagattraye tatra snānena śuddhiḥ syānmahāpātakināmapi

वह तीनों लोकों में पवित्र अगस्त्यतीर्थ कहलाता है; वहाँ स्नान करने से महापातकियों को भी शुद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 12 (skanda.2.34.12)

अनेकजन्माचरितमहापातकसंहतिम् । निरस्य दिवि मोदन्ते तत्र स्नानरता जनाः ।

anekajanmācaritamahāpātakasaṁhatim nirasya divi modante tatra snānaratā janāḥ

अनेक जन्मों में किए गए महापातकों के समूह को त्यागकर, वहाँ स्नान में लीन लोग स्वर्ग में आनंदित होते हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.34.13)

ये तत्र तीर्थे यतिनः कृतस्नाना यतेन्द्रियाः । गोभूतिलहिरण्यादिमहादानानि कुर्वते ।

ye tatra tīrthe yatinaḥ kṛtasnānā yatendriyāḥ gobhūtilahiraṇyādimahādānāni kurvate

जो संयमित इंद्रिय वाले यति उस तीर्थ में स्नान करके गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि के महादान करते हैं,

श्लोक 14 (skanda.2.34.14)

ते प्राप्नुवन्ति संपूर्णं गंगाद्वारे समाहितैः । विहितानां शतगुणं दानानां फलमर्जुन ।

te prāpnuvanti saṁpūrṇaṁ gaṁgādvāre samāhitaiḥ vihitānāṁ śataguṇaṁ dānānāṁ phalamarjuna

हे अर्जुन! वे गंगाद्वार में एकाग्र मन से किए गए विहित दानों के फल से सौ गुना संपूर्ण फल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.34.15)

अत्रास्ति भगवानीशः ख्यातोऽगस्त्येशसंज्ञया । स्थापितोऽगस्त्यमुनिना लोकानन्दविधायिना ।

atrāsti bhagavānīśaḥ khyāto'gastyeśasaṁjñayā sthāpito'gastyamuninā lokānandavidhāyinā

यहाँ अगस्त्येश नाम से विख्यात भगवान ईश्वर विराजमान हैं, जिन्हें लोकों को आनंद देने वाले अगस्त्य मुनि ने स्थापित किया।

श्लोक 16 (skanda.2.34.16)

स्नात्वा तस्यां महानद्यां तल्लिंगं पूजयन्ति ये । दशानामश्वमेधानां फलं संप्राप्नुवंति ते ।

snātvā tasyāṁ mahānadyāṁ talliṁgaṁ pūjayanti ye daśānāmaśvamedhānāṁ phalaṁ saṁprāpnuvaṁti te

जो उस महानदी में स्नान कर उस लिंग की पूजा करते हैं, वे दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.34.17)

धनूराशिं परित्यज्य यदा मकरमंशुमान् । विशेत्तदयनं पुण्यमुत्तरं परिकीर्तितम् ।

dhanūrāśiṁ parityajya yadā makaramaṁśumān viśettadayanaṁ puṇyamuttaraṁ parikīrtitam

जब सूर्य धनु राशि को त्यागकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब वह पुण्य उत्तरायण कहलाता है।

श्लोक 18 (skanda.2.34.18)

तस्मिन्दिने ये नियता नद्यां स्नात्वा समाहिताः । पश्यन्ति पार्वतीनाथमगस्त्येशं सुरार्चितम् ।

tasmindine ye niyatā nadyāṁ snātvā samāhitāḥ paśyanti pārvatīnāthamagastyeśaṁ surārcitam

उस दिन जो संयमित होकर नदी में स्नान कर, एकाग्र मन से देवताओं द्वारा पूजित अगस्त्येश, पार्वतीनाथ का दर्शन करते हैं,

श्लोक 19 (skanda.2.34.19)

अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । फलं संप्राप्य मोदन्ते दिवि देवगणार्चिताः ।

agniṣṭomasahasrasya vājapeyaśatasya ca phalaṁ saṁprāpya modante divi devagaṇārcitāḥ

वे सहस्र अग्निष्टोम और सौ वाजपेय यज्ञों का फल प्राप्त कर, देवगणों द्वारा पूजित होकर स्वर्ग में आनंदित होते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.34.20)

मृगसंक्रमवेलायां पुरुषैर्मंगलार्थिभिः । अवश्यमेव कर्तव्यमगस्त्येशस्य दर्शनम् ।

mṛgasaṁkramavelāyāṁ puruṣairmaṁgalārthibhiḥ avaśyameva kartavyamagastyeśasya darśanam

मकर-संक्रांति के समय, मंगल की कामना करने वाले पुरुषों को अवश्य ही अगस्त्येश का दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.2.34.21)

ऐशान्यां तस्य तीर्थस्य देशे क्रोशमितेऽर्जुन । अस्ति तीर्थत्रयं ख्यातं देवर्षिपितृनामभिः ।

aiśānyāṁ tasya tīrthasya deśe krośamite'rjuna asti tīrthatrayaṁ khyātaṁ devarṣipitṛnāmabhiḥ

हे अर्जुन! उस तीर्थ की ईशान दिशा में एक क्रोश की दूरी पर देव, ऋषि और पितर नामों से विख्यात तीर्थ-त्रय है।

श्लोक 22 (skanda.2.34.22)

देवर्षिपितरस्तत्र मुनिना तेन पूजिताः । प्रददुर्हृष्टमनसः सर्वान्समभिवाञ्छितान् ।

devarṣipitarastatra muninā tena pūjitāḥ pradadurhṛṣṭamanasaḥ sarvānsamabhivāñchitān

वहाँ उस मुनि द्वारा पूजित देवता, ऋषि और पितर, प्रसन्न मन से उन्हें उनकी सभी अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.34.23)

तदा देवर्षिपितृभिरिदं तीर्थत्रयं क्रमात् । अस्मन्नामभिरीड्यं स्यादित्युक्तं तस्य सन्निधौ ।

tadā devarṣipitṛbhiridaṁ tīrthatrayaṁ kramāt asmannāmabhirīḍyaṁ syādityuktaṁ tasya sannidhau

तब देवताओं, ऋषियों और पितरों ने उनके सामने कहा कि यह तीर्थ-त्रय क्रमशः हमारे ही नामों से पुकारा जाए।

श्लोक 24 (skanda.2.34.24)

तस्मिंस्तीर्थत्रये ये तु स्नात्वा विहिततर्पणाः । ऋणत्रयविनिर्मुक्तास्ते यान्ति दिवमक्षयाम् ।

tasmiṁstīrthatraye ye tu snātvā vihitatarpaṇāḥ ṛṇatrayavinirmuktāste yānti divamakṣayām

जो उस तीर्थ-त्रय में स्नान कर विहित तर्पण करते हैं, वे तीनों ऋणों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.34.25)

ततः प्रागुत्तरक्षोण्यां योजनद्वयसीमनि । प्राप्ता सुवर्णमुखरी वेणानाम महानदी ।

tataḥ prāguttarakṣoṇyāṁ yojanadvayasīmani prāptā suvarṇamukharī veṇānāma mahānadī

फिर उत्तर-पूर्व दिशा में दो योजन की दूरी पर, सुवर्णमुखरी वेणा नामक महानदी से मिली,

श्लोक 26 (skanda.2.34.26)

समुदग्ररयाघातनिपातिततटद्रुमा । कुल्यानिर्गतवाःपूरसमाप्लावितकानना ।

samudagrarayāghātanipātitataṭadrumā kulyānirgatavāḥpūrasamāplāvitakānanā

जिसके तटवर्ती वृक्ष उसके प्रबल प्रहार से गिर पड़े थे, जिसकी नहरों से निकले जल-प्रवाह से वन जलमग्न हो गए थे,

श्लोक 27 (skanda.2.34.27)

उत्तुङ्गपुलिनोत्संगखेलत्कोककुलाकुला । अम्बुजामोदलोलालिमालालीलारवान्विता ।

uttuṅgapulinotsaṁgakhelatkokakulākulā ambujāmodalolālimālālīlāravānvitā

जो अपने ऊँचे बालू-तटों पर क्रीड़ा करते चक्रवाक-समूहों से भरी हुई, कमलों की सुगंध से चंचल भ्रमर-समूहों के मधुर गुंजार से युक्त थी,

श्लोक 28 (skanda.2.34.28)

अतिक्रम्य समुत्तुंगाननेकान्धरणीधरान् । प्रभूततोयरुचिरा सुवर्णमुखरीं गता ।

atikramya samuttuṁgānanekāndharaṇīdharān prabhūtatoyarucirā suvarṇamukharīṁ gatā

अनेक ऊँचे पर्वतों को पार करती हुई, प्रचुर जल से सुशोभित वह वेणा नदी सुवर्णमुखरी से जा मिली।

श्लोक 29 (skanda.2.34.29)

नदीद्वयव्यतिकरे कृतस्नाना यथाविधि । दशानामश्वमेधानामखण्डं प्राप्नुयुः फलम् ।

nadīdvayavyatikare kṛtasnānā yathāvidhi daśānāmaśvamedhānāmakhaṇḍaṁ prāpnuyuḥ phalam

दोनों नदियों के संगम पर विधिपूर्वक स्नान करने वाले दस अश्वमेध यज्ञों का अखंड फल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.34.30)

संगता वेणया पुण्या सुवर्णमुखरी नदी । गिरिदुर्गममार्गेण ययावुत्तरवाहिनी ।

saṁgatā veṇayā puṇyā suvarṇamukharī nadī giridurgamamārgeṇa yayāvuttaravāhinī

वेणा से मिली हुई वह पुण्य सुवर्णमुखरी नदी, दुर्गम पर्वत-मार्ग से उत्तर की ओर बहने लगी,

श्लोक 31 (skanda.2.34.31)

मध्यगेन महीध्राणां मार्गेण विषमेण सा । गत्वा विरेजे तटिनी योजनानां चतुष्टयम् ।

madhyagena mahīdhrāṇāṁ mārgeṇa viṣameṇa sā gatvā vireje taṭinī yojanānāṁ catuṣṭayam

और पर्वतों के मध्य से विषम मार्ग द्वारा जाकर, वह नदी चार योजन तक शोभित हुई।

श्लोक 32 (skanda.2.34.32)

पूर्वतस्तस्य देशस्य विषये सार्धयोजने । उदक्कूले महानद्याः प्राग्वाहिन्या मनोहरे ।

pūrvatastasya deśasya viṣaye sārdhayojane udakkūle mahānadyāḥ prāgvāhinyā manohare

उस प्रदेश के पूर्व में, डेढ़ योजन के क्षेत्र में, पूर्व-वाहिनी उस महानदी के उत्तरी तट पर, एक मनोहर स्थान में,

श्लोक 33 (skanda.2.34.33)

अगस्त्येश्वर नामास्ते ख्यातं लिंगं पुरद्विषः । स्मरणं देवमर्त्यानां समस्ताघनिवारणम् ।

agastyeśvara nāmāste khyātaṁ liṁgaṁ puradviṣaḥ smaraṇaṁ devamartyānāṁ samastāghanivāraṇam

त्रिपुरारि शिव का अगस्त्येश्वर नामक प्रसिद्ध लिंग विराजमान है, जिसका स्मरण मात्र देवताओं और मनुष्यों के समस्त पापों को दूर करने वाला है।

श्लोक 34 (skanda.2.34.34)

तत्र स्नात्वा महानद्यां ये नरा नियतेन्द्रियाः । पश्यन्ति पार्वतीनाथमगस्त्येन प्रतिष्ठितम् ।

tatra snātvā mahānadyāṁ ye narā niyatendriyāḥ paśyanti pārvatīnāthamagastyena pratiṣṭhitam

वहाँ उस महानदी में स्नान कर जो संयमित इंद्रिय वाले मनुष्य अगस्त्य द्वारा स्थापित पार्वतीनाथ का दर्शन करते हैं,

श्लोक 35 (skanda.2.34.35)

अनेकैः पूर्वजननैरर्जितं पापसञ्चयम् । ते निरस्य सुरावासे मोदन्ते कालमक्षयम् ।

anekaiḥ pūrvajananairarjitaṁ pāpasañcayam te nirasya surāvāse modante kālamakṣayam

वे अनेक पूर्वजन्मों में अर्जित पाप-संचय को त्यागकर, देवलोक में अक्षय काल तक आनंदित होते हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.34.36)

ततः सोदङ्मुखी भूत्वा सुवर्णमुखरी ययौ । योजनार्धमिदं देशं तीर्थसंघसमन्विता ।

tataḥ sodaṅmukhī bhūtvā suvarṇamukharī yayau yojanārdhamidaṁ deśaṁ tīrthasaṁghasamanvitā

फिर उत्तर की ओर मुड़कर, तीर्थ-समूहों से युक्त सुवर्णमुखरी उस प्रदेश में आधा योजन तक बहती रही।

श्लोक 37 (skanda.2.34.37)

तस्मिन्देशे तु हिन्तालतालसालमनोरमे । गता सुवर्णमुखरी नदी व्याघ्रपदाह्वया ।

tasmindeśe tu hintālatālasālamanorame gatā suvarṇamukharī nadī vyāghrapadāhvayā

उस प्रदेश में, जो हिंताल, ताड़ और साल वृक्षों से मनोरम था, सुवर्णमुखरी नदी व्याघ्रपदा नामक नदी से जा मिली,

श्लोक 38 (skanda.2.34.38)

दुर्वारभूरिदुरितविनिवारणपेशला । नीरंधतीरवानीरवनमण्डलमंडिता ।

durvārabhūriduritavinivāraṇapeśalā nīraṁdhatīravānīravanamaṇḍalamaṁḍitā

जो अनिवार्य, प्रचुर पापों को दूर करने में कुशल, अपने तटों पर सघन वन-मंडल से सुशोभित थी,

श्लोक 39 (skanda.2.34.39)

सिद्धगंधर्वललना लीलागाहनशालिनी । तपस्विकन्यानिःक्षिप्त बलिपुष्पविराजिता ।

siddhagaṁdharvalalanā līlāgāhanaśālinī tapasvikanyāniḥkṣipta balipuṣpavirājitā

सिद्ध और गंधर्व स्त्रियों की क्रीड़ा-स्नान से आनंदित, तपस्वी कन्याओं द्वारा अर्पित बलि-पुष्पों से सुशोभित थी,

श्लोक 40 (skanda.2.34.40)

हंसकारण्डवक्रौञ्चकुलकोलाहलाकुला । प्राक्प्रवाहा समागत्य शैलान्तरगताध्वना ।

haṁsakāraṇḍavakrauñcakulakolāhalākulā prākpravāhā samāgatya śailāntaragatādhvanā

हंस, कारंडव और क्रौंच पक्षी-समूहों के कोलाहल से भरी हुई — वह व्याघ्रपदा, पूर्व से बहती हुई, पर्वतों के बीच से मार्ग बनाकर आई थी —

श्लोक 41 (skanda.2.34.41)

संगमे सरितोस्तत्र कृतस्नाना नरोत्तमाः । समग्रमश्वमेधानां दशानाप्राप्नुयुः फलम् ।

saṁgame saritostatra kṛtasnānā narottamāḥ samagramaśvamedhānāṁ daśānāprāpnuyuḥ phalam

उन दोनों नदियों के संगम पर स्नान करने वाले श्रेष्ठ पुरुष दस अश्वमेध यज्ञों का संपूर्ण फल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.34.42)

तत्र व्याघ्रपदाख्यायास्तटे लोकमलापहे । अनघं सर्वपापघ्नं शंखतीर्थं विराजते ।

tatra vyāghrapadākhyāyāstaṭe lokamalāpahe anaghaṁ sarvapāpaghnaṁ śaṁkhatīrthaṁ virājate

वहाँ, लोक की मलिनता को दूर करने वाली व्याघ्रपदा के तट पर, निष्पाप, सर्व-पापनाशक शंखतीर्थ शोभित है,

श्लोक 43 (skanda.2.34.43)

ब्रह्मर्षिनियतावासं सुरगन्धर्वसेवितम् । दर्शनस्नानपानाद्यैरमितानन्ददायकम् ।

brahmarṣiniyatāvāsaṁ suragandharvasevitam darśanasnānapānādyairamitānandadāyakam

जो ब्रह्मर्षियों का नित्य निवास-स्थान, देवताओं और गंधर्वों से सेवित, दर्शन-स्नान-पान आदि से अमित आनंद देने वाला है।

श्लोक 44 (skanda.2.34.44)

तत्रास्ते भगवानीशः शंखेशोनाम फाल्गुन । शंखनाम्ना मुनींद्रेण लिंगरूपं प्रतिष्ठितम् ।

tatrāste bhagavānīśaḥ śaṁkheśonāma phālguna śaṁkhanāmnā munīṁdreṇa liṁgarūpaṁ pratiṣṭhitam

हे फाल्गुन! वहाँ शंखेश नामक भगवान ईश्वर विराजमान हैं, जिन्हें शंख नामक मुनीन्द्र ने लिंग-रूप में स्थापित किया।

श्लोक 45 (skanda.2.34.45)

ये तत्र तीर्थे सुस्नाताः पश्यन्ति वृषवाहनम् । दशाश्वमेधजं पुण्यं लब्ध्वा यांति सुरालयम् ।

ye tatra tīrthe susnātāḥ paśyanti vṛṣavāhanam daśāśvamedhajaṁ puṇyaṁ labdhvā yāṁti surālayam

जो उस तीर्थ में भली-भाँति स्नान कर वृषभ-वाहन शिव का दर्शन करते हैं, वे दस अश्वमेध यज्ञों से उत्पन्न पुण्य पाकर देवलोक को जाते हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.34.46)

युक्ता तया व्याघ्रपदाभिधानया गत्वा ततो योजनसंमितां भुवम् । ययौ मुनीन्द्रैर्वृषभाचलांतिकं संसेव्यमाना शुभनिर्मलोदका ।

yuktā tayā vyāghrapadābhidhānayā gatvā tato yojanasaṁmitāṁ bhuvam yayau munīndrairvṛṣabhācalāṁtikaṁ saṁsevyamānā śubhanirmalodakā

उस व्याघ्रपदा नामक नदी से युक्त होकर, फिर एक योजन की दूरी तक जाकर, वह शुभ, निर्मल जल वाली नदी, मुनीन्द्रों द्वारा सेवित होती हुई, वृषभाचल के समीप पहुँची।

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