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वैष्णव खण्ड · अध्याय 35

सृष्टि वर्णन

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (skanda.2.35.1)

भरद्वाज उवाच । सुवर्णमुखरी तत्र संगता मंगलप्रदा । कल्यानाम नदी पुण्या कालिन्दी जाह्नवीमिव ।

bharadvāja uvāca suvarṇamukharī tatra saṁgatā maṁgalapradā kalyānāma nadī puṇyā kālindī jāhnavīmiva

भरद्वाज ने कहा — वहाँ मंगलदायिनी सुवर्णमुखरी, कल्या नामक पुण्य नदी से मिली, जैसे कालिंदी (यमुना) जाह्नवी (गंगा) से मिलती है।

श्लोक 2 (skanda.2.35.2)

वृषभाचलसंभूता तीर्थराजविराजिता । नदीनामुत्तमा कल्या कलुषौघविनाशिनी ।

vṛṣabhācalasaṁbhūtā tīrtharājavirājitā nadīnāmuttamā kalyā kaluṣaughavināśinī

वृषभाचल से उत्पन्न, तीर्थराज से सुशोभित कल्या, नदियों में सर्वश्रेष्ठ, समस्त मल-समूहों का नाश करने वाली है,

श्लोक 3 (skanda.2.35.3)

नानातरुलताव्रातविभूषिततटद्वया । मुनिसंघसुखावासा पुण्याश्रमसमुत्कटा ।

nānātarulatāvrātavibhūṣitataṭadvayā munisaṁghasukhāvāsā puṇyāśramasamutkaṭā

जिसके दोनों तट नाना वृक्षों और लताओं के समूहों से सुशोभित हैं, जो मुनि-समूहों का सुखद निवास और पुण्य आश्रमों से भरपूर है,

श्लोक 4 (skanda.2.35.4)

द्विजदत्तार्ध्यविलसत्कुशाक्षतलसत्तटा । अप्सरःकुचकस्तूरीपंकक्षालनपंकिला ।

dvijadattārdhyavilasatkuśākṣatalasattaṭā apsaraḥkucakastūrīpaṁkakṣālanapaṁkilā

जिसके तट द्विजों द्वारा अर्पित अर्घ्य में प्रयुक्त कुश और अक्षतों से चमकते हैं, जो अप्सराओं के स्तनों की कस्तूरी के धोए हुए लेप से कीचड़युक्त हो जाती है,

श्लोक 5 (skanda.2.35.5)

दन्तावलकटच्योतन्मदाम्बुसुरभीकृता । विप्रभूपालविततमखयूपशतावृता ।

dantāvalakaṭacyotanmadāmbusurabhīkṛtā viprabhūpālavitatamakhayūpaśatāvṛtā

जो हाथियों के गंडस्थल से टपकते मद-जल से सुगंधित होती है, जो ब्राह्मणों और राजाओं द्वारा स्थापित सैकड़ों यज्ञ-स्तंभों से घिरी है,

श्लोक 6 (skanda.2.35.6)

अनाविलजलापूरतोषिताशेषमानवा । एकैवालं परा कर्तुं महानद्योस्तु पातकम् ।

anāvilajalāpūratoṣitāśeṣamānavā ekaivālaṁ parā kartuṁ mahānadyostu pātakam

जिसके निर्मल जल-प्रवाह से असंख्य मनुष्य संतुष्ट होते हैं — वह अकेली ही महानदियों तक के पाप को दूर करने में समर्थ है।

श्लोक 7 (skanda.2.35.7)

तयोः संगतयोः स्तोतुं महिमानं क ईशते । यत्र ब्रह्मशिलानाम सरिन्मध्ये च वर्तते ।

tayoḥ saṁgatayoḥ stotuṁ mahimānaṁ ka īśate yatra brahmaśilānāma sarinmadhye ca vartate

इन दोनों नदियों के संगम की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ नदी के मध्य ब्रह्मशिला नामक शिला स्थित है,

श्लोक 8 (skanda.2.35.8)

अगस्त्यतपसा पश्चाद्गया सांनिध्यमेति च । नदीद्वयजले तत्र स्नाताः पुण्ये कुरूद्वह ।

agastyatapasā paścādgayā sāṁnidhyameti ca nadīdvayajale tatra snātāḥ puṇye kurūdvaha

जिसके पास अगस्त्य के तप से प्रसन्न होकर स्वयं गया-तीर्थ भी सान्निध्य को प्राप्त हुआ। हे कुरुनंदन! वहाँ इन दोनों पुण्य नदियों के जल में स्नान करने वाले,

श्लोक 9 (skanda.2.35.9)

मखानां पौण्डरीकाणां शतस्य फलमाप्नुयुः । ब्रह्महत्यादिपापानि समायांति परिक्षयम् ।

makhānāṁ pauṇḍarīkāṇāṁ śatasya phalamāpnuyuḥ brahmahatyādipāpāni samāyāṁti parikṣayam

सौ पुंडरीक यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं; ब्रह्महत्या आदि पाप पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.35.10)

तत्राभिषेकपूतानां नदीद्वितयसंगमे । सङ्गता भवनाशिन्या कृष्णवेणीव पावनी ।

tatrābhiṣekapūtānāṁ nadīdvitayasaṁgame saṅgatā bhavanāśinyā kṛṣṇaveṇīva pāvanī

वहाँ दोनों नदियों के संगम पर अभिषेक से पवित्र होकर, संसार-नाशक पावन कृष्णवेणी से मिलकर,

श्लोक 11 (skanda.2.35.11)

राजते स्वर्णमुखरी कल्यया संगता तदा ।

rājate svarṇamukharī kalyayā saṁgatā tadā

सुवर्णमुखरी, कल्या से युक्त होकर उस समय शोभित होती है।

श्लोक 12 (skanda.2.35.12)

अथोदीच्यां महानद्या योजनार्द्धे विराजते । योजनोत्सेधसहितो विख्यातो वेंकटाचलः ।

athodīcyāṁ mahānadyā yojanārddhe virājate yojanotsedhasahito vikhyāto veṁkaṭācalaḥ

फिर उस महानदी के उत्तर में, आधे योजन की दूरी पर, एक योजन ऊँचा प्रसिद्ध वेंकटाचल पर्वत स्थित है —

श्लोक 13 (skanda.2.35.13)

सर्वेषामेव तीर्थानामाश्रयोऽयं नगोत्तमः । अञ्जनानन्तवृषभनीलकेसरिपोत्रिणः ।

sarveṣāmeva tīrthānāmāśrayo'yaṁ nagottamaḥ añjanānantavṛṣabhanīlakesaripotriṇaḥ

यह श्रेष्ठ पर्वत समस्त तीर्थों का आश्रय है, हाथी, सर्प, वृषभ, नीलगाय, सिंह और वराह का निवास है।

श्लोक 14 (skanda.2.35.14)

एतान्युपवनान्यद्रेः स्युर्नारायणवेंकटौ । वराहवपुषा पूर्वं स्वीकृतत्वान्मधुद्विषा ।

etānyupavanānyadreḥ syurnārāyaṇaveṁkaṭau varāhavapuṣā pūrvaṁ svīkṛtatvānmadhudviṣā

इस पर्वत के ये उपवन नारायण और वेंकट के हैं, क्योंकि प्राचीन काल में मधुसूदन ने वराह-रूप में इसे अपनाया था।

श्लोक 15 (skanda.2.35.15)

वराहक्षेत्रमित्यार्यैः कीर्तितोऽयं महीधरः । सुवर्णमुखरीतीरे विख्याते वेंकटाचले ।

varāhakṣetramityāryaiḥ kīrtito'yaṁ mahīdharaḥ suvarṇamukharītīre vikhyāte veṁkaṭācale

इसीलिए आर्यजनों ने इस पर्वत को "वराह-क्षेत्र" कहा है; सुवर्णमुखरी के तट पर, प्रसिद्ध वेंकटाचल पर,

श्लोक 16 (skanda.2.35.16)

निवसत्यच्युतो नित्यमब्धीन्द्रतनयान्वितः । तस्मिन्गिरौ श्रिया सार्द्धं वसन्ते वेंकटाधिपम् ।

nivasatyacyuto nityamabdhīndratanayānvitaḥ tasmingirau śriyā sārddhaṁ vasante veṁkaṭādhipam

अच्युत सदा समुद्र-पुत्री (लक्ष्मी) के साथ निवास करते हैं। उस पर्वत पर, श्री सहित निवास करने वाले वेंकटाधिप की,

श्लोक 17 (skanda.2.35.17)

सेवन्ते सिद्धगन्धर्वमुनिमानवदानवाः । तस्मिन्विन्यस्तचित्तानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ।

sevante siddhagandharvamunimānavadānavāḥ tasminvinyastacittānāṁ bhaktānāṁ puruṣottame

सिद्ध, गंधर्व, मुनि, मनुष्य और दानव सभी सेवा करते हैं। उस पुरुषोत्तम में जिन भक्तों का चित्त लगा रहता है,

श्लोक 18 (skanda.2.35.18)

वांछितान्याशु सिध्यंति नश्यंति विपदोऽर्जुन । ये स्मरंति जगन्नाथं वेंकटाद्रिनिवासिनम् ।

vāṁchitānyāśu sidhyaṁti naśyaṁti vipado'rjuna ye smaraṁti jagannāthaṁ veṁkaṭādrinivāsinam

उनकी इच्छाएँ शीघ्र सिद्ध होती हैं और विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, हे अर्जुन; जो वेंकटाद्रि-निवासी जगन्नाथ का स्मरण करते हैं,

श्लोक 19 (skanda.2.35.19)

निरस्तदोषास्ते यांति शाश्वतं पदमव्ययम् ।

nirastadoṣāste yāṁti śāśvataṁ padamavyayam

वे दोषों से मुक्त होकर सनातन, अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.35.20)

अर्जुन उवाच । वेंकटाद्रौ महापुण्ये सुरासुरनमस्कृतः । कथं प्रादुरभूद्देवो भगवान्कमलापतिः ।

arjuna uvāca veṁkaṭādrau mahāpuṇye surāsuranamaskṛtaḥ kathaṁ prādurabhūddevo bhagavānkamalāpatiḥ

अर्जुन ने कहा — "देव-असुरों द्वारा नमस्कृत महापुण्य वेंकटाद्रि पर भगवान कमलापति कैसे प्रकट हुए?

श्लोक 21 (skanda.2.35.21)

कस्य वा कृतिनस्तत्र प्रसन्नो निजमद्भुतम् । रूपं प्रकाशयांचक्रे भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।

kasya vā kṛtinastatra prasanno nijamadbhutam rūpaṁ prakāśayāṁcakre bhuktimuktiphalapradam

किस पुण्यात्मा पर प्रसन्न होकर उन्होंने भोग और मोक्ष का फल देने वाला अपना अद्भुत रूप प्रकट किया?

श्लोक 22 (skanda.2.35.22)

विष्णोर्देवादिदेवस्य महिमानं महामुने । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन तन्मे कथय विस्तरात् ।

viṣṇordevādidevasya mahimānaṁ mahāmune śrotumicchāmi tattvena tanme kathaya vistarāt

हे महामुने! देवाधिदेव विष्णु की महिमा को मैं तत्त्व से सुनना चाहता हूँ; वह मुझे विस्तार से बताइए।"

श्लोक 23 (skanda.2.35.23)

भरद्वाज उवाच । शृणु वेंकटनाथस्य महिमानं समाहितः । विस्तरेण समाख्यातुं ब्रह्मणापि न शक्यते ।

bharadvāja uvāca śṛṇu veṁkaṭanāthasya mahimānaṁ samāhitaḥ vistareṇa samākhyātuṁ brahmaṇāpi na śakyate

भरद्वाज ने कहा — "एकाग्र मन से वेंकटनाथ की महिमा सुनो; इसे विस्तार से कहना तो ब्रह्मा जी के लिए भी संभव नहीं है।

श्लोक 24 (skanda.2.35.24)

धन्योऽसि देवदेवस्य माहात्म्यं मधुविद्विषः । यद्भक्तियुक्ताभूत्तात श्रोतुं मतिररिन्दम ।

dhanyo'si devadevasya māhātmyaṁ madhuvidviṣaḥ yadbhaktiyuktābhūttāta śrotuṁ matirarindama

हे तात, शत्रुदमन! तुम धन्य हो, जिसका मन देवाधिदेव मधुसूदन की महिमा सुनने में भक्तिपूर्वक लगा है।

श्लोक 25 (skanda.2.35.25)

कृतपुण्योऽस्म्यहं पार्थ सर्वभूतपतेर्हरेः । पवित्राणि चरित्राणि स्तोष्यन्ते यन्मयाऽधुना ।

kṛtapuṇyo'smyahaṁ pārtha sarvabhūtapaterhareḥ pavitrāṇi caritrāṇi stoṣyante yanmayā'dhunā

हे पार्थ! मैं भी पुण्यात्मा हो गया हूँ, क्योंकि अब मैं समस्त प्राणियों के स्वामी हरि के पवित्र चरित्रों की स्तुति करूँगा।

श्लोक 26 (skanda.2.35.26)

पुरा भागीरथीतीरे जनकाय महात्मने । क्रतुदीक्षाप्रसक्ताय विशुद्धज्ञानशालिने ।

purā bhāgīrathītīre janakāya mahātmane kratudīkṣāprasaktāya viśuddhajñānaśāline

प्राचीन काल में भागीरथी के तट पर, यज्ञ-दीक्षा में लीन, विशुद्ध ज्ञान से युक्त महात्मा जनक को,

श्लोक 27 (skanda.2.35.27)

वामदेवेन कथितां कथां पापप्रणाशिनीम् । कथयिष्यामि ते पार्थ विष्णुकीर्तनपावनीम् ।

vāmadevena kathitāṁ kathāṁ pāpapraṇāśinīm kathayiṣyāmi te pārtha viṣṇukīrtanapāvanīm

वामदेव ने जो पापनाशक कथा सुनाई थी, वही विष्णु-कीर्तन से पवित्र करने वाली कथा, हे पार्थ, मैं तुम्हें सुनाऊँगा।

श्लोक 28 (skanda.2.35.28)

सर्वेषामेव भूतानामाद्यो नारायणः प्रभुः । जगन्मयो जगत्कर्ता चित्स्वरूपो निरंजनः ।

sarveṣāmeva bhūtānāmādyo nārāyaṇaḥ prabhuḥ jaganmayo jagatkartā citsvarūpo niraṁjanaḥ

नारायण भगवान समस्त प्राणियों के आदि प्रभु हैं, जगत्-स्वरूप, जगत्-कर्ता, चित्-स्वरूप और निरंजन हैं,

श्लोक 29 (skanda.2.35.29)

सहस्रशीर्षा भगवान्सहस्राक्षः सहस्रपात् । यस्य भासा जगदिदं विभाति सचराचरम् ।

sahasraśīrṣā bhagavānsahasrākṣaḥ sahasrapāt yasya bhāsā jagadidaṁ vibhāti sacarācaram

सहस्र सिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण वाले भगवान, जिनके तेज से यह चराचर संपूर्ण जगत् प्रकाशित होता है।

श्लोक 30 (skanda.2.35.30)

तस्मात्परतरं तेजस्तस्मात्परतरं तपः । तस्मात्परतरं ज्ञानं योगस्तस्मात्परो न च ।

tasmātparataraṁ tejastasmātparataraṁ tapaḥ tasmātparataraṁ jñānaṁ yogastasmātparo na ca

उससे बढ़कर कोई तेज नहीं, उससे बढ़कर कोई तप नहीं, उससे बढ़कर कोई ज्ञान नहीं, और उससे बढ़कर कोई योग नहीं है —

श्लोक 31 (skanda.2.35.31)

विद्या तस्मादपि परा नास्ति पार्थ नरर्षभ । सर्वेष्वपि च भूतेषु सदा सन्निहितः प्रभुः ।

vidyā tasmādapi parā nāsti pārtha nararṣabha sarveṣvapi ca bhūteṣu sadā sannihitaḥ prabhuḥ

हे पार्थ, नरश्रेष्ठ! उससे बढ़कर कोई विद्या भी नहीं है। वह प्रभु सदा समस्त प्राणियों में निवास करते हैं,

श्लोक 32 (skanda.2.35.32)

सर्वाण्यपि च भूतानि तस्मिन्नेवासते सुखम् । स एव यज्ञो यज्वा च साधनं स्रुक्स्रुवादिकम् ।

sarvāṇyapi ca bhūtāni tasminnevāsate sukham sa eva yajño yajvā ca sādhanaṁ sruksruvādikam

और समस्त प्राणी उन्हीं में सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे ही यज्ञ हैं, वे ही यजमान हैं, वे ही स्रुक्-स्रुवा आदि साधन हैं,

श्लोक 33 (skanda.2.35.33)

फलं फलप्रदाता च तत्संप्राप्या गतिस्तथा । वह्नौ प्रणीते पशुना प्रोक्षितेन प्रजुह्वति । ये तं प्रयांति ते यांति गतिं तत्प्रतिपादिताम् ।

phalaṁ phalapradātā ca tatsaṁprāpyā gatistathā vahnau praṇīte paśunā prokṣitena prajuhvati ye taṁ prayāṁti te yāṁti gatiṁ tatpratipāditām

वे ही फल हैं, फल देने वाले भी वे ही हैं, और उस फल से प्राप्त गति भी वे ही हैं। प्रज्वलित अग्नि में प्रोक्षित पशु के साथ हवन करते हुए जो उनकी ओर बढ़ते हैं, वे उसी गति को प्राप्त करते हैं जो उन्हीं के द्वारा बताई गई है।

श्लोक 34 (skanda.2.35.34)

कर्मबन्धं पशुं कृत्वा ज्ञानाग्नौ संप्रवर्तिते । ये जुह्वते तमुद्दिश्य ते तत्सायुज्यभागिनः ।

karmabandhaṁ paśuṁ kṛtvā jñānāgnau saṁpravartite ye juhvate tamuddiśya te tatsāyujyabhāginaḥ

जो कर्म-बंधन को पशु बनाकर, प्रज्वलित ज्ञान-अग्नि में उन्हीं के उद्देश्य से हवन करते हैं, वे उनके साथ सायुज्य के भागी होते हैं।

श्लोक 35 (skanda.2.35.35)

हरिः सदाशिवो ब्रह्मा महेन्द्रः परमः स्वराट् । सर्वेश्वरस्य तस्यैते पर्यायाः परिकीर्तिताः ।

hariḥ sadāśivo brahmā mahendraḥ paramaḥ svarāṭ sarveśvarasya tasyaite paryāyāḥ parikīrtitāḥ

हरि, सदाशिव, ब्रह्मा, महेंद्र, परम स्वराट् — ये सब उसी सर्वेश्वर के पर्याय नाम कहे गए हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.35.36)

ममाहितोऽनुसंधत्ते य इदं परमात्मनः । नारायणस्य माहात्म्यं स न याति पुनर्भवम् ।

mamāhito'nusaṁdhatte ya idaṁ paramātmanaḥ nārāyaṇasya māhātmyaṁ sa na yāti punarbhavam

जो मुझमें अनुरक्त होकर उस परमात्मा नारायण की इस महिमा का अनुसंधान करता है, वह पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 37 (skanda.2.35.37)

चिदानन्दमयः साक्षी निर्गुणो निरुपाधिकः । नित्योऽपि भजते तांतामवस्थां स यदृच्छया ।

cidānandamayaḥ sākṣī nirguṇo nirupādhikaḥ nityo'pi bhajate tāṁtāmavasthāṁ sa yadṛcchayā

चिदानंदमय, साक्षी, निर्गुण, निरुपाधिक होते हुए भी, वे नित्य होकर भी अपनी इच्छा से विभिन्न अवस्थाओं को धारण करते हैं।

श्लोक 38 (skanda.2.35.38)

पवित्राणां पवित्रं यो ह्यगतीनां परा गतिः । दैवतं देवतानां च श्रेयसां श्रेय उत्तमम् ।

pavitrāṇāṁ pavitraṁ yo hyagatīnāṁ parā gatiḥ daivataṁ devatānāṁ ca śreyasāṁ śreya uttamam

जो पवित्रों के पवित्र हैं, जो गति-रहितों की परम गति हैं, जो देवताओं के देवता हैं, जो श्रेयों में उत्तम श्रेय हैं,

श्लोक 39 (skanda.2.35.39)

बोध्यानां बोध्य एकोऽसौ ध्येयानां ध्येय उत्तमः । विनयानां समधिको विनयो नयसंयुतः ।

bodhyānāṁ bodhya eko'sau dhyeyānāṁ dhyeya uttamaḥ vinayānāṁ samadhiko vinayo nayasaṁyutaḥ

जो जानने योग्य वस्तुओं में एकमात्र जानने योग्य हैं, ध्यान करने योग्य वस्तुओं में उत्तम ध्येय हैं, विनयों में श्रेष्ठ, नीति से युक्त विनय हैं,

श्लोक 40 (skanda.2.35.40)

तेजसां जनकं तेजः प्रकृष्टं तपसां तपः । आधारः सर्वभूतानामनाद्यन्तो जनार्दनः ।

tejasāṁ janakaṁ tejaḥ prakṛṣṭaṁ tapasāṁ tapaḥ ādhāraḥ sarvabhūtānāmanādyanto janārdanaḥ

जो तेजों को जन्म देने वाला तेज हैं, तपों में प्रकृष्ट तप हैं, समस्त प्राणियों के आधार, आदि-अंत रहित जनार्दन हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.35.41)

तस्येदं भावविज्ञाने मूढा ब्रह्मादयोऽपि च । अजो गृह्णाति जननं सर्वात्मा हन्ति विद्विषः ।

tasyedaṁ bhāvavijñāne mūḍhā brahmādayo'pi ca ajo gṛhṇāti jananaṁ sarvātmā hanti vidviṣaḥ

उनके स्वरूप के ज्ञान में ब्रह्मा आदि देवता भी मोहित हो जाते हैं; वह अजन्मा जन्म धारण करते हैं, वह सर्वात्मा अपने शत्रुओं का वध करते हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.35.42)

स्वतन्त्रोऽपि स्वभक्तानां परतन्त्रः प्रवर्तते । स साक्षी कर्मणां देवः सर्वज्ञो गरुडध्वजः ।

svatantro'pi svabhaktānāṁ paratantraḥ pravartate sa sākṣī karmaṇāṁ devaḥ sarvajño garuḍadhvajaḥ

स्वतंत्र होते हुए भी वे अपने भक्तों के लिए परतंत्र की भाँति आचरण करते हैं; वे ही समस्त कर्मों के साक्षी देव, सर्वज्ञ, गरुड़-ध्वज हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.35.43)

तस्य स्वरूपं मुनयो मृगयन्ते समाहिताः । सङ्कर्षणो वासुदेवः प्रद्युम्नश्च तथा पुनः ।

tasya svarūpaṁ munayo mṛgayante samāhitāḥ saṅkarṣaṇo vāsudevaḥ pradyumnaśca tathā punaḥ

मुनिजन एकाग्र मन से उनके स्वरूप की खोज करते हैं। संकर्षण, वासुदेव और फिर प्रद्युम्न,

श्लोक 44 (skanda.2.35.44)

अनिरुद्ध इति ख्यातं तन्मूर्तीनां चतुष्टयम् । कीर्तितः प्रणवः पश्चाद्धृदयं तस्य भास्वरम् ।

aniruddha iti khyātaṁ tanmūrtīnāṁ catuṣṭayam kīrtitaḥ praṇavaḥ paścāddhṛdayaṁ tasya bhāsvaram

तथा अनिरुद्ध नाम से प्रसिद्ध — ये उनकी चार मूर्तियाँ कही गई हैं; और उनके बाद प्रणव (ॐ) उनका देदीप्यमान हृदय कहा गया है।

श्लोक 45 (skanda.2.35.45)

भगवान्वासुदेवश्च मन्त्रोऽयं तत्प्रकाशकः ।

bhagavānvāsudevaśca mantro'yaṁ tatprakāśakaḥ

"भगवान वासुदेव" — यह मंत्र ही उस परमात्मा को प्रकट करने वाला है।

श्लोक 46 (skanda.2.35.46)

मन्त्रराजमिमं नित्यं प्रजपेद्यः समाहितः । स विष्णोः करुणायोगात्सिद्धीनां भाजनं भवेत् ।

mantrarājamimaṁ nityaṁ prajapedyaḥ samāhitaḥ sa viṣṇoḥ karuṇāyogātsiddhīnāṁ bhājanaṁ bhavet

जो एकाग्र मन से इस मंत्रराज का नित्य जप करता है, वह विष्णु की कृपा से सिद्धियों का पात्र बन जाता है।

श्लोक 47 (skanda.2.35.47)

आपन्निवारकः संपत्प्रापको भुक्तिमुक्तिदः । यथा ससर्ज भूतानि कल्पादावेव माधवः ।

āpannivārakaḥ saṁpatprāpako bhuktimuktidaḥ yathā sasarja bhūtāni kalpādāveva mādhavaḥ

आपत्तियों को दूर करने वाले, संपत्ति देने वाले, भोग और मोक्ष दोनों देने वाले माधव ने कल्प के आरंभ में जिस प्रकार प्राणियों की सृष्टि की,

श्लोक 48 (skanda.2.35.48)

तत्सर्वं कथयिष्यामि समाहितमनाः शृणु । तस्य चिन्तयतः सर्गं तेजोरूपं परं हरेः ।

tatsarvaṁ kathayiṣyāmi samāhitamanāḥ śṛṇu tasya cintayataḥ sargaṁ tejorūpaṁ paraṁ hareḥ

वह सब मैं बताऊँगा, एकाग्र मन से सुनो। सृष्टि का चिंतन करते हुए हरि से एक परम तेजोमय रूप उत्पन्न हुआ,

श्लोक 49 (skanda.2.35.49)

विरिंच इति विख्यातं राजसं गुणमाश्रितम् । तस्य देवस्य वदनाच्छक्रो देवः सपावकः । जज्ञे यश्च त्रिलोकेशः पाककर्मणि यः प्रभुः ।

viriṁca iti vikhyātaṁ rājasaṁ guṇamāśritam tasya devasya vadanācchakro devaḥ sapāvakaḥ jajñe yaśca trilokeśaḥ pākakarmaṇi yaḥ prabhuḥ

जो विरिंचि (ब्रह्मा) नाम से प्रसिद्ध, रजोगुण के आश्रित था; और उस देव के मुख से इंद्र देव अग्नि सहित उत्पन्न हुए, जो तीनों लोकों के स्वामी और पाक-कर्म में निपुण हैं,

श्लोक 50 (skanda.2.35.50)

मनसश्चाभवच्चन्द्रः करुणानित्यशीतलात् । अपां सर्वौषधीनां च विप्राणां रक्षकः सदा ।

manasaścābhavaccandraḥ karuṇānityaśītalāt apāṁ sarvauṣadhīnāṁ ca viprāṇāṁ rakṣakaḥ sadā

और करुणा से सदा शीतल उनके मन से चंद्रमा उत्पन्न हुए — जल, समस्त औषधियों और ब्राह्मणों के सदा रक्षक,

श्लोक 51 (skanda.2.35.51)

नेत्राभ्यामुदभूत्सूर्यस्तस्य विश्वप्रकाशकः । शीतोष्णवर्षकृत्कालकारणं तेजसां निधिः ।

netrābhyāmudabhūtsūryastasya viśvaprakāśakaḥ śītoṣṇavarṣakṛtkālakāraṇaṁ tejasāṁ nidhiḥ

उनके दोनों नेत्रों से विश्व को प्रकाशित करने वाले सूर्य उत्पन्न हुए, जो शीत, उष्ण, वर्षा और काल के कारण, तेजों के भंडार हैं,

श्लोक 52 (skanda.2.35.52)

प्राणेभ्योऽस्य जगत्प्राणः समीरः समजायत । धर्ता ग्रहर्क्षस्वर्गंगा विमानानां महाबलः ।

prāṇebhyo'sya jagatprāṇaḥ samīraḥ samajāyata dhartā graharkṣasvargaṁgā vimānānāṁ mahābalaḥ

उनके प्राणों से जगत् के प्राण-स्वरूप वायु उत्पन्न हुए, जो महाबली, ग्रह-नक्षत्र, आकाश-गंगा और विमानों के धारक हैं,

श्लोक 53 (skanda.2.35.53)

नाभिदेशात्समुत्पन्नमन्तरिक्षं महात्मनः । तस्यासीच्छिरसो व्योम भूतसंभवकारणम् ।

nābhideśātsamutpannamantarikṣaṁ mahātmanaḥ tasyāsīcchiraso vyoma bhūtasaṁbhavakāraṇam

उस महात्मा की नाभि से अंतरिक्ष उत्पन्न हुआ; उनके सिर से आकाश उत्पन्न हुआ, जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का कारण है,

श्लोक 54 (skanda.2.35.54)

पादाम्बुजाभ्यामुदभूद्भूमिर्भूतगणाश्रया । विनिःसृता दिशः सर्वाः श्रोत्राभ्यां परमात्मनः ।

pādāmbujābhyāmudabhūdbhūmirbhūtagaṇāśrayā viniḥsṛtā diśaḥ sarvāḥ śrotrābhyāṁ paramātmanaḥ

उनके चरण-कमलों से पृथ्वी उत्पन्न हुई, जो समस्त प्राणी-समूहों का आश्रय है; परमात्मा के कानों से समस्त दिशाएँ प्रकट हुईं,

श्लोक 55 (skanda.2.35.55)

भूर्भुवाद्यास्तथा लोकाः स्मरणात्तस्य जज्ञिरे । रसातलादिलोकाश्च यक्षरक्षोगणादयः ।

bhūrbhuvādyāstathā lokāḥ smaraṇāttasya jajñire rasātalādilokāśca yakṣarakṣogaṇādayaḥ

और उनके स्मरण मात्र से भूः, भुवः आदि लोक उत्पन्न हुए, तथा रसातल आदि लोक और यक्ष-राक्षस आदि समूह भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 56 (skanda.2.35.56)

मुखबाहूरुपादेभ्यो जनयामास स क्रमात् । ब्राह्मणान्क्षत्त्रियान्वैश्याञ्छूद्रादींश्च कुरूद्वह ।

mukhabāhūrupādebhyo janayāmāsa sa kramāt brāhmaṇānkṣattriyānvaiśyāñchūdrādīṁśca kurūdvaha

हे कुरुनंदन! उन्होंने अपने मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि को उत्पन्न किया,

श्लोक 57 (skanda.2.35.57)

छन्दांसि यज्ञस्तुरगा गावो मेषाविकादयः । अतर्क्यप्रभवां तस्मादुत्पत्तिं प्रतिपेदिरे ।

chandāṁsi yajñasturagā gāvo meṣāvikādayaḥ atarkyaprabhavāṁ tasmādutpattiṁ pratipedire

तथा छंद, यज्ञ, अश्व, गौ, भेड़-बकरी आदि ने भी उन्हीं से अतर्क्य उत्पत्ति प्राप्त की।

श्लोक 58 (skanda.2.35.58)

संकल्पाद्देवदेवस्य तस्य स्थावरजंगमम् । भूतजातमभूत्कालो भूतो भावी भवंस्तथा ।

saṁkalpāddevadevasya tasya sthāvarajaṁgamam bhūtajātamabhūtkālo bhūto bhāvī bhavaṁstathā

उस देवाधिदेव के केवल संकल्प मात्र से चराचर समस्त भूत-समूह उत्पन्न हुए — जो हो चुका, जो होने वाला है, और जो अभी है।

श्लोक 59 (skanda.2.35.59)

पिबत्यम्बु समुद्राणां बडवानलरूपधृक् । कल्पान्तकाले तत्सर्वं विसृजत्यात्मनि स्थितम् ।

pibatyambu samudrāṇāṁ baḍavānalarūpadhṛk kalpāntakāle tatsarvaṁ visṛjatyātmani sthitam

बडवानल के रूप को धारण कर वे समुद्रों का जल पी जाते हैं; कल्प के अंत में वे उस सबको अपने में समेटकर विलीन कर देते हैं।

श्लोक 60 (skanda.2.35.60)

सञ्चारयति भूतानां वृत्तिं सूर्येन्दुरूपधृक् । तमोनिरसनाच्चापि कालधर्मप्रवर्तनात् ।

sañcārayati bhūtānāṁ vṛttiṁ sūryendurūpadhṛk tamonirasanāccāpi kāladharmapravartanāt

सूर्य और चंद्रमा का रूप धारण कर, अंधकार को दूर करके और काल-धर्म को प्रवर्तित करके, वे समस्त प्राणियों की गतिविधि को संचालित करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.2.35.61)

जगन्ति कल्पविरमे विन्यस्य स्वोदरान्तरे । लीलाबालाकृतिः शेते वटपत्रे महाम्बुधौ ।

jaganti kalpavirame vinyasya svodarāntare līlābālākṛtiḥ śete vaṭapatre mahāmbudhau

कल्प के अंत में समस्त लोकों को अपने उदर के भीतर रखकर, वे बालक के लीला-रूप में विशाल समुद्र में वटपत्र पर शयन करते हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.35.62)

अथ चोदग्रभोगीन्द्रभोगतल्पे सुखोचिते । योगनिद्रामवाप्नोति सद्वितीयोऽब्जवासया ।

atha codagrabhogīndrabhogatalpe sukhocite yoganidrāmavāpnoti sadvitīyo'bjavāsayā

फिर सुखद, विशाल सर्पराज की कुंडलियों की शय्या पर, कमल-वासिनी अपनी पत्नी सहित, वे योगनिद्रा को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 63 (skanda.2.35.63)

नाभिकासारसंभूताज्जनयामास पंकजात् ।

nābhikāsārasaṁbhūtājjanayāmāsa paṁkajāt

अपनी नाभि के सरोवर से उत्पन्न कमल से उन्होंने उत्पन्न किया —

श्लोक 64 (skanda.2.35.64)

सर्वेषां जगतां नाथो विधातारं चतुर्मुखम् ।

sarveṣāṁ jagatāṁ nātho vidhātāraṁ caturmukham

समस्त लोकों के स्वामी, चतुर्मुख विधाता (ब्रह्मा) को।

श्लोक 65 (skanda.2.35.65)

लीला ह्येषा मुकुन्दस्य स्वेच्छायोगप्रवर्तिनः । विज्ञायते न केनाऽपि याथार्थ्येन स ईश्वरः ।

līlā hyeṣā mukundasya svecchāyogapravartinaḥ vijñāyate na kenā'pi yāthārthyena sa īśvaraḥ

यह तो स्वेच्छा से कार्य करने वाले मुकुंद की मात्र लीला है; उस ईश्वर को कोई भी यथार्थ रूप से नहीं जान पाता।

श्लोक 66 (skanda.2.35.66)

यदा धर्मस्य हानिः स्यादधर्मो वर्धते यदा । यदा वा महतीं पीडां भजन्ते देवतागणाः ।

yadā dharmasya hāniḥ syādadharmo vardhate yadā yadā vā mahatīṁ pīḍāṁ bhajante devatāgaṇāḥ

जब धर्म की हानि होती है, जब अधर्म बढ़ता है, या जब देवगण महान पीड़ा को प्राप्त होते हैं,

श्लोक 67 (skanda.2.35.67)

यदावलेपदुर्वारा यांति वृद्धिं सुरद्रुहः । भूमेर्भूमिजनानां च यदोदेति महद्भयम् ।

yadāvalepadurvārā yāṁti vṛddhiṁ suradruhaḥ bhūmerbhūmijanānāṁ ca yadodeti mahadbhayam

जब अपने अहंकार से दुर्निवार्य देव-द्रोही असुर बढ़ने लगते हैं, और पृथ्वी तथा पृथ्वीवासियों पर महान भय उत्पन्न होता है,

श्लोक 68 (skanda.2.35.68)

यदा वा निजभक्तानां साधूनामनिवारिता । दुरन्तातंकजननी विपत्समुपजायते ।

yadā vā nijabhaktānāṁ sādhūnāmanivāritā durantātaṁkajananī vipatsamupajāyate

अथवा जब अपने साधु भक्तों पर अनिवार्य, दुःखद विपत्ति उत्पन्न होती है,

श्लोक 69 (skanda.2.35.69)

तदा तदनुरूपाणि रूपाण्यास्थाय कौतुकात् । अधर्ममवधूयाशु कुरुते जगतो हितम् ।

tadā tadanurūpāṇi rūpāṇyāsthāya kautukāt adharmamavadhūyāśu kurute jagato hitam

तब वे कौतुकवश उन-उन अवसरों के अनुरूप रूप धारण कर, अधर्म को शीघ्र दूर कर, जगत् का हित करते हैं।

श्लोक 70 (skanda.2.35.70)

सृजति विधिसमाख्यो राजसेनात्मनाऽसौ वहति हरिसमाख्यः सत्त्वनिष्ठः प्रपञ्चम् । हरति हरसमाख्यस्तामसीमेत्य वृत्तिं मधुमथनमहिम्नामस्ति वेत्ता न कोऽपि ।

sṛjati vidhisamākhyo rājasenātmanā'sau vahati harisamākhyaḥ sattvaniṣṭhaḥ prapañcam harati harasamākhyastāmasīmetya vṛttiṁ madhumathanamahimnāmasti vettā na ko'pi

विधि (ब्रह्मा) नाम से रजोगुणी होकर वे सृष्टि करते हैं; हरि नाम से सत्त्वनिष्ठ होकर वे इस प्रपंच को धारण करते हैं; हर नाम से तमोगुणी होकर वे इसका संहार करते हैं — मधुसूदन की महिमाओं को यथार्थ रूप से जानने वाला कोई नहीं है।

श्लोक 71 (skanda.2.35.71)

यज्ञांगैः कृतसकलांगसंधिबंधं वाराहं वपुरधिगम्य लोकनाथः । शैलेऽस्मिन्नभजदसौ यथा निवासं तद्वक्ष्ये शृणु विबुधाधिनाथसूनो ।

yajñāṁgaiḥ kṛtasakalāṁgasaṁdhibaṁdhaṁ vārāhaṁ vapuradhigamya lokanāthaḥ śaile'sminnabhajadasau yathā nivāsaṁ tadvakṣye śṛṇu vibudhādhināthasūno

यज्ञ के अंगों से जिनके सभी अंगों की संधियाँ बनी थीं, ऐसा वराह-शरीर धारण कर लोकनाथ ने इस पर्वत पर जिस प्रकार निवास किया, वह मैं बताऊँगा — सुनो, हे देवराज-पुत्र।

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