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वैष्णव खण्ड · अध्याय 36

वराहावतार कीर्तन

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (skanda.2.36.1)

भरद्वाज उवाच । पुरा निशात्यये धातुः प्रबुद्धो मधुसूदनः । पुनः प्रवृत्तिं भूतानामन्वियेष धिया भृशम् ।

bharadvāja uvāca purā niśātyaye dhātuḥ prabuddho madhusūdanaḥ punaḥ pravṛttiṁ bhūtānāmanviyeṣa dhiyā bhṛśam

भरद्वाज ने कहा — पूर्वकाल में, रात्रि की समाप्ति पर मधुसूदन जागे और बुद्धि से प्राणियों की पुनः उत्पत्ति की गहनता से खोज करने लगे।

श्लोक 2 (skanda.2.36.2)

विना वसुमतीमन्ये भूतौघधरणक्षमाः । न भवन्तीति हृदये तर्कस्तस्याजनिष्ट च ।

vinā vasumatīmanye bhūtaughadharaṇakṣamāḥ na bhavantīti hṛdaye tarkastasyājaniṣṭa ca

"पृथ्वी के बिना अन्य कोई भी प्राणि-समूह को धारण करने में समर्थ नहीं है" — ऐसा विचार उनके हृदय में उत्पन्न हुआ।

श्लोक 3 (skanda.2.36.3)

अपश्यत्प्रणिधानेन महीं पातालगोचराम् । अतिमात्रभयोद्विग्नां परीतां महताम्बुना ।

apaśyatpraṇidhānena mahīṁ pātālagocarām atimātrabhayodvignāṁ parītāṁ mahatāmbunā

उन्होंने ध्यान से देखा कि पृथ्वी पाताल में जा पड़ी है, अत्यधिक भय से व्याकुल है और विशाल जल से घिरी हुई है।

श्लोक 4 (skanda.2.36.4)

प्रतिपेदे तदा रूपं भूसमुद्धरणोचितम् । उपकर्मोष्ठमनलजिह्वं प्रणवघोषणम् ।

pratipede tadā rūpaṁ bhūsamuddharaṇocitam upakarmoṣṭhamanalajihvaṁ praṇavaghoṣaṇam

तब उन्होंने पृथ्वी के उद्धार के योग्य रूप धारण किया — यज्ञ-कर्म के अनुरूप ओष्ठ, अग्नि जैसी जिह्वा, ओंकार की ध्वनि से युक्त।

श्लोक 5 (skanda.2.36.5)

चतुराम्नायचरणं प्रायश्चित्तखुरांचितम् । प्राग्वंशकायं विलसद्दर्भरोमावलीयुतम् ।

caturāmnāyacaraṇaṁ prāyaścittakhurāṁcitam prāgvaṁśakāyaṁ vilasaddarbharomāvalīyutam

चार वेद जिसके चरण थे, प्रायश्चित्त जिसके खुरों में अंकित था, यज्ञशाला के वंश जैसा शरीर, कुश-तृण जैसी दीप्त रोमावली से युक्त।

श्लोक 6 (skanda.2.36.6)

प्रवर्ग्यावर्तसंपन्नं दक्षिणाग्न्युदरान्वितम् । स्रुक्तुण्डमखिलैः सर्वैः संविभक्तांगसन्धिकम् ।

pravargyāvartasaṁpannaṁ dakṣiṇāgnyudarānvitam sruktuṇḍamakhilaiḥ sarvaiḥ saṁvibhaktāṁgasandhikam

प्रवर्ग्य यज्ञ जिसका कुंडल था, दक्षिणाग्नि जिसका उदर था, स्रुक जैसा मुख, समस्त यज्ञांगों से विभक्त शरीर-संधियों से युक्त।

श्लोक 7 (skanda.2.36.7)

दिव्यसूक्तसटाजालं परत्रह्मशिरस्तथा । हव्यकव्यरयोपेतं विशुद्धपशुजानुकम् ।

divyasūktasaṭājālaṁ paratrahmaśirastathā havyakavyarayopetaṁ viśuddhapaśujānukam

दिव्य सूक्त जिसकी अयाल थी, परब्रह्म जिसका मस्तक था, हव्य और कव्य के वेग से युक्त, शुद्ध यज्ञ-पशु जैसे घुटनों वाला।

श्लोक 8 (skanda.2.36.8)

उक्तात्युक्तादिकच्छन्दोमार्गमंत्र बलान्वितम् । सर्वयज्ञमयं दिव्यं वाराहं रूपमास्थितः ।

uktātyuktādikacchandomārgamaṁtra balānvitam sarvayajñamayaṁ divyaṁ vārāhaṁ rūpamāsthitaḥ

उक्त, अत्युक्त आदि छंदों के मार्ग और मंत्र-बल से युक्त, वे संपूर्ण यज्ञमय दिव्य वाराह-रूप में स्थित हो गए।

श्लोक 9 (skanda.2.36.9)

अन्वेष्टुं धरणीमब्धेर्विवेश सलिलांतरम् । दंष्ट्राबालशशांकोत्थलसत्कांतिचयैर्हठात् ।

anveṣṭuṁ dharaṇīmabdherviveśa salilāṁtaram daṁṣṭrābālaśaśāṁkotthalasatkāṁticayairhaṭhāt

पृथ्वी को खोजने के लिए वे समुद्र के जल में प्रवेश कर गए, बलपूर्वक, अपनी दाढ़ से बाल-चंद्रमा के समान उठती हुई कांति-राशियों के साथ।

श्लोक 10 (skanda.2.36.10)

कल्पांतसमयस्फीतं तमिस्रमपसारयन् । अभिभूतांबुभृद्घोषैर्मुहुर्ब्रह्माण्डकन्दराम् ।

kalpāṁtasamayasphītaṁ tamisramapasārayan abhibhūtāṁbubhṛdghoṣairmuhurbrahmāṇḍakandarām

कल्पांत-काल में बढ़े हुए अंधकार को दूर करते हुए, बार-बार अपनी घोर गर्जना से मेघों को भी दबाते हुए, ब्रह्मांड की गुहा को...

श्लोक 11 (skanda.2.36.11)

निनादमुखरां कुर्वन्गाढैर्घुरुघुरुस्वनैः । खुरप्रखुरविन्यासैर्जर्जरीकृतविग्रहम् ।

ninādamukharāṁ kurvangāḍhairghurughurusvanaiḥ khuraprakhuravinyāsairjarjarīkṛtavigraham

...घुरु-घुरु की गहरी ध्वनियों से मुखरित करते हुए, अपने अत्यंत तीक्ष्ण खुरों के प्रहार से समुद्र के रूप को छिन्न-भिन्न करते हुए,

श्लोक 12 (skanda.2.36.12)

इतस्ततो विलुठयन्नुरगाणामधीश्वरम् । तीव्रैर्निःश्वासपवनैरापातालं सरित्पतेः ।

itastato viluṭhayannuragāṇāmadhīśvaram tīvrairniḥśvāsapavanairāpātālaṁ saritpateḥ

नागराज (शेष) को इधर-उधर लुढ़काते हुए, अपनी तीव्र नि:श्वास-वायु से नदीपति (समुद्र) को पाताल तक...

श्लोक 13 (skanda.2.36.13)

प्रापयन्नतलस्पर्शमन्तरं दर्शनीयताम् । अतिदीर्घेण पात्रेण मग्नोन्मग्नेन वारिधेः ।

prāpayannatalasparśamantaraṁ darśanīyatām atidīrgheṇa pātreṇa magnonmagnena vāridheḥ

...उसकी गहराई को भी स्पर्श कराते हुए दर्शनीय बनाते हुए, अपने अत्यंत दीर्घ थूथन से समुद्र में डूबते-उतराते हुए,

श्लोक 14 (skanda.2.36.14)

संक्षोभितानि पाथांसि कुर्वन्नन्तर्ययौ तदा । सप्तपातालमूलाधः स्थितां तोये भयाकुलाम् ।

saṁkṣobhitāni pāthāṁsi kurvannantaryayau tadā saptapātālamūlādhaḥ sthitāṁ toye bhayākulām

जल को क्षुब्ध करते हुए वे भीतर गए, जो सातों पातालों की जड़ के नीचे जल में भय से व्याकुल खड़ी थी,

श्लोक 15 (skanda.2.36.15)

वेपमानां समालोक्य धरणीं हृष्टमानसः । तामारोप्य स्वदंष्ट्राग्रमुन्ममज्ज सरित्पतेः ।

vepamānāṁ samālokya dharaṇīṁ hṛṣṭamānasaḥ tāmāropya svadaṁṣṭrāgramunmamajja saritpateḥ

कांपती हुई पृथ्वी को देखकर, हर्षित मन से, उसे अपनी दाढ़ के अग्रभाग पर उठाकर, वे समुद्र से बाहर निकले।

श्लोक 16 (skanda.2.36.16)

संस्तूयमानो मुनिभिर्जनलोकनिवासिभिः । तस्मिन्नुद्वहति प्रेम्णा देवे वसुमतीं क्षणम् ।

saṁstūyamāno munibhirjanalokanivāsibhiḥ tasminnudvahati premṇā deve vasumatīṁ kṣaṇam

जनलोक-निवासी मुनियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, जब वे देव प्रेमपूर्वक क्षणभर पृथ्वी को धारण किए हुए थे,

श्लोक 17 (skanda.2.36.17)

प्रतिसारा बभूवाधो वारिधेमर्ङ्गलोचिता । तदुत्तारणवेलायां वराहवपुषोऽर्जुन ।

pratisārā babhūvādho vāridhemarṅgalocitā taduttāraṇavelāyāṁ varāhavapuṣo'rjuna

हे अर्जुन! उस उद्धार के समय समुद्र के नीचे मानो मंगल-अनुरागयुक्त बारात-सी शोभा हुई, वाराह-शरीर के कारण।

श्लोक 18 (skanda.2.36.18)

गम्भीरघोषैरम्भोधिः प्राप मंगलतूर्यताम् । उद्वृत्तवीचिविक्षिप्तशीकरासारसंगतः ।

gambhīraghoṣairambhodhiḥ prāpa maṁgalatūryatām udvṛttavīcivikṣiptaśīkarāsārasaṁgataḥ

गंभीर घोषों से समुद्र मंगल-वाद्य की भाँति हो गया, उमड़ती हुई तरंगों से उछले जल-कणों की झड़ी से युक्त।

श्लोक 19 (skanda.2.36.19)

भेजे मुक्ताफलचयो मंगलाक्षतविभ्रमम् । उदूढा तेन देवेन सा बभौ सलिलाप्लुता ।

bheje muktāphalacayo maṁgalākṣatavibhramam udūḍhā tena devena sā babhau salilāplutā

मोतियों की राशियाँ मंगल-अक्षत जैसी शोभा पाने लगीं; उस देव द्वारा उठाई गई वह पृथ्वी जल से भीगी हुई शोभित हुई,

श्लोक 20 (skanda.2.36.20)

गाढरागसमुत्पन्नस्वेदक्लिन्नतनूरिव । इत्थमुद्धृत्य भगवान्महीं पातालमूलतः ।

gāḍharāgasamutpannasvedaklinnatanūriva itthamuddhṛtya bhagavānmahīṁ pātālamūlataḥ

मानो गहरे अनुराग से उत्पन्न स्वेद से उसका शरीर आर्द्र हो गया हो। इस प्रकार भगवान ने पृथ्वी को पाताल की जड़ से उठाकर,

श्लोक 21 (skanda.2.36.21)

सुदृढं स्थापयामास मध्येऽम्बुनिधिपाथसाम् । तेनोद्धृतायां मेदिन्यां पूर्णं तद्भूनभोन्तरे ।

sudṛḍhaṁ sthāpayāmāsa madhye'mbunidhipāthasām tenoddhṛtāyāṁ medinyāṁ pūrṇaṁ tadbhūnabhontare

समुद्र के जल के मध्य में दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया। उनके द्वारा पृथ्वी के उद्धार से, आकाश और पृथ्वी के बीच का स्थान...

श्लोक 22 (skanda.2.36.22)

जलं तत्कृतमर्यादाऽव्यवच्छिन्नमभूत्तदा । संस्थाप्य पृथिवीमित्थं तदीयाधारसिद्धये ।

jalaṁ tatkṛtamaryādā'vyavacchinnamabhūttadā saṁsthāpya pṛthivīmitthaṁ tadīyādhārasiddhaye

...उनके द्वारा बनाई गई मर्यादा से पूर्ण, अविच्छिन्न जल हो गया। इस प्रकार पृथ्वी को स्थापित करके, उसके आधार की सिद्धि के लिए,

श्लोक 23 (skanda.2.36.23)

दिग्गजानहिराजं च कमठं च न्यवेशयत् । तेषामपि च सर्वेषामाधारत्वेन सादरम् ।

diggajānahirājaṁ ca kamaṭhaṁ ca nyaveśayat teṣāmapi ca sarveṣāmādhāratvena sādaram

उन्होंने दिग्गजों, नागराज और कच्छप को नियुक्त किया। उन सभी के भी आधार-रूप में आदरपूर्वक...

श्लोक 24 (skanda.2.36.24)

अव्यक्तरूपां स्वां शक्तिं युयोज च दयानिधिः । ततो धरां समुद्धृत्य स्थितं किटितनुं हरिम् ।

avyaktarūpāṁ svāṁ śaktiṁ yuyoja ca dayānidhiḥ tato dharāṁ samuddhṛtya sthitaṁ kiṭitanuṁ harim

...दयासागर ने अपनी अव्यक्त शक्ति को नियुक्त किया। तब पृथ्वी को उठाकर वाराह-शरीर में स्थित हरि की...

श्लोक 25 (skanda.2.36.25)

तुष्टुवुः सनकाद्यास्तं जनलोकनिवासिनः । तदा वराहवपुषमाराध्य पुरुषोत्तमम् ।

tuṣṭuvuḥ sanakādyāstaṁ janalokanivāsinaḥ tadā varāhavapuṣamārādhya puruṣottamam

...जनलोकवासी सनकादि मुनियों ने स्तुति की। तब वाराह-शरीरधारी पुरुषोत्तम की आराधना करके,

श्लोक 26 (skanda.2.36.26)

तदाज्ञया जगद्ब्रह्मा यथापूर्वमकल्पयत् ।

tadājñayā jagadbrahmā yathāpūrvamakalpayat

उनकी आज्ञा से ब्रह्मा ने जगत को पूर्ववत रचा।

श्लोक 27 (skanda.2.36.27)

अर्जुन उवाच । कल्पान्तसलिले मग्ना कथं तिष्ठति भूरियम् । सप्तपाताललोकाधः किमाधारा महामुने ।

arjuna uvāca kalpāntasalile magnā kathaṁ tiṣṭhati bhūriyam saptapātālalokādhaḥ kimādhārā mahāmune

अर्जुन ने कहा — कल्पांत के जल में डूबी हुई यह पृथ्वी कैसे टिकी रहती है? सातों पातालों के नीचे, हे महामुने, इसका आधार क्या है?

श्लोक 28 (skanda.2.36.28)

कल्पकालः कियानेष स्यात्तद्वृत्तिश्च कीदृशी ।

kalpakālaḥ kiyāneṣa syāttadvṛttiśca kīdṛśī

यह कल्प-काल कितना बड़ा होता है और उसकी गति कैसी है?

श्लोक 29 (skanda.2.36.29)

एतद्विस्तार्य सकलं मम ब्रह्मन्मुने वद ।

etadvistārya sakalaṁ mama brahmanmune vada

यह सब मुझे विस्तार से बताइए, हे ब्रह्मन् मुने।

श्लोक 30 (skanda.2.36.30)

भरद्वाज उवाच । विनाडिकानां षष्ट्या स्यान्नाडिकैका दिनं भवेत् । तत्षष्ट्या दिवसास्त्रिंशन्मासः पक्षद्वयात्मकः ।

bharadvāja uvāca vināḍikānāṁ ṣaṣṭyā syānnāḍikaikā dinaṁ bhavet tatṣaṣṭyā divasāstriṁśanmāsaḥ pakṣadvayātmakaḥ

भरद्वाज ने कहा — साठ विनाड़िकाओं की एक नाड़िका होती है; उसकी साठ से एक दिन होता है; तीस दिनों का, दो पक्षों वाला, एक मास होता है।

श्लोक 31 (skanda.2.36.31)

मासौ द्वावृतुरित्युक्तस्तैः षङ्भिर्वत्सरो भवेत् । अयनद्वितयाकारः शीतवर्षोष्णसंश्रयः ।

māsau dvāvṛturityuktastaiḥ ṣaṅbhirvatsaro bhavet ayanadvitayākāraḥ śītavarṣoṣṇasaṁśrayaḥ

दो मासों को ऋतु कहा गया है; उन छह ऋतुओं से एक वर्ष होता है, जो दो अयनों के रूप में शीत, वर्षा और उष्ण ऋतुओं से युक्त होता है।

श्लोक 32 (skanda.2.36.32)

देवासुराणामन्योयमहोरात्रं विपर्ययात् । उत्तरं दक्षिणे भानोरयने ते यथाक्रमम् ।

devāsurāṇāmanyoyamahorātraṁ viparyayāt uttaraṁ dakṣiṇe bhānorayane te yathākramam

देवों और असुरों के लिए यह वर्ष परस्पर उलटे क्रम से अहोरात्र होता है; सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन क्रमशः उनके दिन-रात होते हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.36.33)

मानुषाब्दैः खखव्योमखाक्षिपावकसागरैः । महायुगं भवेत्पार्थ कृताद्याकारसंयुतम् ।

mānuṣābdaiḥ khakhavyomakhākṣipāvakasāgaraiḥ mahāyugaṁ bhavetpārtha kṛtādyākārasaṁyutam

मानव वर्षों की एक गूढ़ संख्या से — हे पार्थ, कृत आदि युगों से युक्त महायुग बनता है।

श्लोक 34 (skanda.2.36.34)

सप्तत्या सैकया कालो युगानामन्तरं मनोः । अस्मिञ्छ्वेतवराहाख्ये कल्पे जातान्मनूञ्छृणु ।

saptatyā saikayā kālo yugānāmantaraṁ manoḥ asmiñchvetavarāhākhye kalpe jātānmanūñchṛṇu

इकहत्तर महायुगों का काल मन्वंतर कहलाता है। इस श्वेतवाराह नामक कल्प में उत्पन्न मनुओं को सुनो।

श्लोक 35 (skanda.2.36.35)

स्वायंभुवः स्यात्प्रथमस्ततः स्वारोचिषो मनुः । उत्तमस्तामसाख्यश्च रैवतश्चाक्षुषाह्वयः ।

svāyaṁbhuvaḥ syātprathamastataḥ svārociṣo manuḥ uttamastāmasākhyaśca raivataścākṣuṣāhvayaḥ

प्रथम स्वायंभुव मनु हुए, फिर स्वारोचिष मनु; उत्तम, तामस नामक, रैवत और चाक्षुष नामक मनु हुए।

श्लोक 36 (skanda.2.36.36)

एते गताः प्राङ्मनवः षट्सेन्द्रसुरतापसाः । वैवस्वतो वर्ततेऽद्य सप्तमो मनुरर्जुन ।

ete gatāḥ prāṅmanavaḥ ṣaṭsendrasuratāpasāḥ vaivasvato vartate'dya saptamo manurarjuna

ये छह पूर्ववर्ती मनु अपने इंद्र, देव और तपस्वियों सहित बीत चुके; हे अर्जुन, आज सातवें मनु वैवस्वत विद्यमान हैं।

श्लोक 37 (skanda.2.36.37)

आदित्यवसुरुद्राद्यास्तत्काले देवतागणाः । इष्ट्वाश्वमेधशतकं तेजस्वी प्राप शक्रताम् ।

ādityavasurudrādyāstatkāle devatāgaṇāḥ iṣṭvāśvamedhaśatakaṁ tejasvī prāpa śakratām

उस समय आदित्य, वसु, रुद्र आदि देवगण थे; तेजस्वी इंद्र ने सौ अश्वमेध यज्ञ करके शक्रत्व प्राप्त किया।

श्लोक 38 (skanda.2.36.38)

विश्वामित्रोऽहमत्रिश्च जमदग्निश्च कश्यपः । वसिष्ठो गौतमश्चैव ते वै सप्तर्षयोऽर्जुन ।

viśvāmitro'hamatriśca jamadagniśca kaśyapaḥ vasiṣṭho gautamaścaiva te vai saptarṣayo'rjuna

विश्वामित्र, मैं (भरद्वाज), अत्रि, जमदग्नि, कश्यप, वसिष्ठ और गौतम — हे अर्जुन, ये ही सप्तर्षि हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.36.39)

इक्ष्वाकुप्रमुखाः शूरा मनुपुत्रा महाबलाः । अवनिं पालयामासुर्नित्यं धर्मपरायणाः ।

ikṣvākupramukhāḥ śūrā manuputrā mahābalāḥ avaniṁ pālayāmāsurnityaṁ dharmaparāyaṇāḥ

इक्ष्वाकु आदि शूरवीर, महाबली मनुपुत्रों ने सदा धर्मपरायण रहकर पृथ्वी का पालन किया।

श्लोक 40 (skanda.2.36.40)

सूर्यदक्षब्रह्मधर्मरुद्राणां पञ्च सूनवः । सावर्णिरौच्यभौमाद्या भविष्यन्मनुसप्तकम् ।

sūryadakṣabrahmadharmarudrāṇāṁ pañca sūnavaḥ sāvarṇiraucyabhaumādyā bhaviṣyanmanusaptakam

सूर्य, दक्ष, ब्रह्मा, धर्म और रुद्र के पाँच पुत्र — सावर्णि, रौच्य, भौम्य आदि — भावी सप्त मनु होंगे।

श्लोक 41 (skanda.2.36.41)

चतुर्दश विधातुस्ते भवन्ति मनवोऽहनि । तत्कल्पसंज्ञं तस्यान्ते निशा स्यात्तत्समा शृणु ।

caturdaśa vidhātuste bhavanti manavo'hani tatkalpasaṁjñaṁ tasyānte niśā syāttatsamā śṛṇu

ये चौदह मनु विधाता के एक दिन में होते हैं; वह कल्प कहलाता है, और उसके अंत में उतनी ही रात्रि होती है — सुनो।

श्लोक 42 (skanda.2.36.42)

दिनावसानसमये ब्रह्मणः पाण्डुनन्दन । जायतेऽवग्रहो घोरः पृथिव्यां शतवार्षिकः ।

dināvasānasamaye brahmaṇaḥ pāṇḍunandana jāyate'vagraho ghoraḥ pṛthivyāṁ śatavārṣikaḥ

हे पांडुनंदन! ब्रह्मा के दिन की समाप्ति के समय पृथ्वी पर सौ वर्षों तक चलने वाला घोर अनावृष्टि उत्पन्न होता है।

श्लोक 43 (skanda.2.36.43)

तस्मिन्नवग्रहे पृथ्व्यां नीरसायां धनञ्जय । चतुर्विधानि भूतानि समायान्ति परिक्षयम् ।

tasminnavagrahe pṛthvyāṁ nīrasāyāṁ dhanañjaya caturvidhāni bhūtāni samāyānti parikṣayam

हे धनंजय! उस अनावृष्टि में जब पृथ्वी रसहीन हो जाती है, तब चारों प्रकार के प्राणी विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.36.44)

तदा तप्तशिखाकारैरुपेतो घर्मदीधितिः । मयूखैरग्निसदृशैर्वमद्भिः पावकच्छटाः ।

tadā taptaśikhākārairupeto gharmadīdhitiḥ mayūkhairagnisadṛśairvamadbhiḥ pāvakacchaṭāḥ

तब तपे हुए शिखा जैसी अग्निकिरणों से युक्त सूर्य, अग्नि के समान किरणों से अग्नि-ज्वालाएँ उगलता हुआ...

श्लोक 45 (skanda.2.36.45)

विनष्टग्रामनगरशैलवृक्षादिकानना । कूर्मपृष्ठोपमोर्वी स्यात्तप्तायःपिण्डसन्निभा ।

vinaṣṭagrāmanagaraśailavṛkṣādikānanā kūrmapṛṣṭhopamorvī syāttaptāyaḥpiṇḍasannibhā

...ग्राम, नगर, पर्वत, वृक्ष आदि वनों को नष्ट कर देता है; पृथ्वी कच्छप की पीठ के समान, तपे हुए लौह-पिंड के समान हो जाती है।

श्लोक 46 (skanda.2.36.46)

ततो विधातुर्गात्रेभ्यः समुत्पन्ना महाघनाः । आच्छादयन्तो गगनं गर्जितध्वानबन्धुराः ।

tato vidhāturgātrebhyaḥ samutpannā mahāghanāḥ ācchādayanto gaganaṁ garjitadhvānabandhurāḥ

तब विधाता के अंगों से महामेघ उत्पन्न होते हैं, जो आकाश को ढकते हुए गर्जन-ध्वनि से सुंदर लगते हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.36.47)

सितपीतारुणश्यामाश्चित्रवर्णाश्च भीषणाः । शैलेभसौधवृक्षादिनानारूपसमन्विताः ।

sitapītāruṇaśyāmāścitravarṇāśca bhīṣaṇāḥ śailebhasaudhavṛkṣādinānārūpasamanvitāḥ

श्वेत, पीत, अरुण, श्याम और विचित्र वर्णों वाले, भयंकर, पर्वत, हाथी, महल, वृक्ष आदि के विविध रूपों से युक्त,

श्लोक 48 (skanda.2.36.48)

ते शताब्दमितं कालं महावृष्टिं वितन्वते । तेनाम्भसा शमं याति सूर्योद्भूतो महानलः ।

te śatābdamitaṁ kālaṁ mahāvṛṣṭiṁ vitanvate tenāmbhasā śamaṁ yāti sūryodbhūto mahānalaḥ

वे सौ वर्ष तक महावृष्टि करते हैं; उस जल से सूर्य से उत्पन्न महान अग्नि शांत हो जाती है।

श्लोक 49 (skanda.2.36.49)

भूयश्च शतवर्षाणि वर्षन्त्युग्रं महाघनाः । तदम्भसा समुद्वेला विकृतिं यान्ति वार्द्धयः ।

bhūyaśca śatavarṣāṇi varṣantyugraṁ mahāghanāḥ tadambhasā samudvelā vikṛtiṁ yānti vārddhayaḥ

फिर से सौ वर्षों तक महामेघ भीषण वर्षा करते हैं; उस जल से समुद्र अपने तट को लांघकर विकृत हो जाते हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.36.50)

कल्पान्ताम्बुदनिर्मुक्तं लोकान्व्याप्नोति तज्जलम् । भूर्भुवःस्वर्महर्लोकानावृणोति तमो महत् । तदा निमग्ना सलिले मही पातालमूलगा ।

kalpāntāmbudanirmuktaṁ lokānvyāpnoti tajjalam bhūrbhuvaḥsvarmaharlokānāvṛṇoti tamo mahat tadā nimagnā salile mahī pātālamūlagā

कल्पांत के मेघों से मुक्त वह जल सभी लोकों में व्याप्त हो जाता है; भू, भुवः, स्वः और महर्लोक को महान अंधकार ढक लेता है; तब पृथ्वी जल में डूबकर पाताल की जड़ में जा टिकती है।

श्लोक 51 (skanda.2.36.51)

अनष्टा कथमप्यास्ते ब्रह्मशक्त्यवलम्बिता । अथ निःश्वाससंभूतो मारुतो ब्रह्मणोऽर्जुन ।

anaṣṭā kathamapyāste brahmaśaktyavalambitā atha niḥśvāsasaṁbhūto māruto brahmaṇo'rjuna

वह किसी प्रकार नष्ट न होकर ब्रह्मा की शक्ति के सहारे टिकी रहती है। हे अर्जुन! तब ब्रह्मा की श्वास से उत्पन्न वायु...

श्लोक 52 (skanda.2.36.52)

उत्सारयति तान्सर्वान्कल्पान्तोत्थान्महाघनान् । एवं प्रवृद्धः पवनः शतसंवत्सरात्मकम् ।

utsārayati tānsarvānkalpāntotthānmahāghanān evaṁ pravṛddhaḥ pavanaḥ śatasaṁvatsarātmakam

...कल्पांत में उठे उन सभी महामेघों को हटा देता है। इस प्रकार बढ़ी हुई वह वायु सौ वर्षों तक...

श्लोक 53 (skanda.2.36.53)

कालं निरन्तरं वाति दुर्निवाररयोत्थितः । तमुग्रमनिलं हित्वा हरेर्नाभिसरोरुहे ।

kālaṁ nirantaraṁ vāti durnivārarayotthitaḥ tamugramanilaṁ hitvā harernābhisaroruhe

...निरंतर बहती है, दुर्निवार वेग से उठी हुई। उस उग्र वायु को छोड़कर, हरि की नाभि-कमल में...

श्लोक 54 (skanda.2.36.54)

योगनिद्रामवाप्नोति तस्मिन्पाथसि पद्मभूः । योगनिद्रानुषक्तस्य याति तस्य जगद्विभोः ।

yoganidrāmavāpnoti tasminpāthasi padmabhūḥ yoganidrānuṣaktasya yāti tasya jagadvibhoḥ

...कमल-जन्मा ब्रह्मा योगनिद्रा प्राप्त करते हैं। योगनिद्रा में लीन उस जगदीश की...

श्लोक 55 (skanda.2.36.55)

तावती शर्वरी पार्थ दिनं यावत्प्रमाणकम् । निशायां समतीतायामुत्थितो वेगवान्पुनः ।

tāvatī śarvarī pārtha dinaṁ yāvatpramāṇakam niśāyāṁ samatītāyāmutthito vegavānpunaḥ

...रात्रि उतनी ही होती है, हे पार्थ, जितना दिन का प्रमाण होता है। रात्रि बीत जाने पर वे पुनः वेगपूर्वक जागकर,

श्लोक 56 (skanda.2.36.56)

सृजप्यखिलजन्तून्वै पूर्ववच्छासनाद्धरेः । कल्पेकल्पे समुचितै रूपैः पाति जगद्धरिः ।

sṛjapyakhilajantūnvai pūrvavacchāsanāddhareḥ kalpekalpe samucitai rūpaiḥ pāti jagaddhariḥ

हरि की आज्ञा से पूर्ववत सभी प्राणियों की रचना करते हैं; हरि प्रत्येक कल्प में उपयुक्त रूपों से जगत की रक्षा करते हैं।

श्लोक 57 (skanda.2.36.57)

अस्मिन्कल्पे श्वेतवर्णां प्राप्तवान्यज्ञपोत्रिताम् । वराहवपुषा देवो विहरन्नवनीतले ।

asminkalpe śvetavarṇāṁ prāptavānyajñapotritām varāhavapuṣā devo viharannavanītale

इस कल्प में देव ने श्वेत वर्ण, यज्ञ-पोत्री नामक रूप प्राप्त किया; वाराह-शरीर से पृथ्वी-तल पर विचरण करते हुए,

श्लोक 58 (skanda.2.36.58)

स्वपूर्वनियतावासं प्रपेदे वेंकटाचलम् । स्वामिपुष्करिणीतीरे चरंश्चिरमधोक्षजः ।

svapūrvaniyatāvāsaṁ prapede veṁkaṭācalam svāmipuṣkariṇītīre caraṁściramadhokṣajaḥ

वे अपने पूर्व-नियत निवास वेंकटाचल को प्राप्त हुए; अधोक्षज स्वामिपुष्करिणी के तट पर दीर्घकाल तक विचरण करते रहे।

श्लोक 59 (skanda.2.36.59)

भक्त्या परमया युक्तमपश्यज्जलजासनम् । संपूज्य प्रार्थयामास ब्रह्मा तं भूतभावनम् ।

bhaktyā paramayā yuktamapaśyajjalajāsanam saṁpūjya prārthayāmāsa brahmā taṁ bhūtabhāvanam

कमलासन ब्रह्मा ने परम भक्ति से युक्त होकर उन्हें देखा; भलीभाँति पूजा करके उन भूतभावन से प्रार्थना की —

श्लोक 60 (skanda.2.36.60)

पुरातनीं निजां स्वामिन्भज दिव्यां तनूमिति । गृहीत्वानुनयं तस्य त्यक्त्वा तां सूकराकृतिम् ।

purātanīṁ nijāṁ svāminbhaja divyāṁ tanūmiti gṛhītvānunayaṁ tasya tyaktvā tāṁ sūkarākṛtim

"हे स्वामिन्! अपना पुरातन दिव्य रूप धारण कीजिए।" उनकी विनती स्वीकार करके, उस शूकर-आकृति को त्यागकर,

श्लोक 61 (skanda.2.36.61)

अनन्यभजनीयां स्वां प्राप विश्वात्मिकां तनुम् । तथास्थितं गिरौ तत्र कृत्वाप्युत्साहमूर्जितम् ।

ananyabhajanīyāṁ svāṁ prāpa viśvātmikāṁ tanum tathāsthitaṁ girau tatra kṛtvāpyutsāhamūrjitam

उन्होंने अपना अनन्य-भजनीय, विश्वात्मक रूप प्राप्त किया। इस प्रकार उस पर्वत पर स्थित होकर, अत्यधिक प्रयत्न करने पर भी,

श्लोक 62 (skanda.2.36.62)

द्रष्टुं न शेकुः सर्वेऽपि कालेन बहुनापि च ।

draṣṭuṁ na śekuḥ sarve'pi kālena bahunāpi ca

सभी लोग उन्हें बहुत काल तक भी देख न सके।

श्लोक 63 (skanda.2.36.63)

अर्जुन उवाच । दर्शनस्मरणादीनां हरिरित्थमगोचरः । कथं प्रत्यक्षतां प्राप मानुषाणां महामुने ।

arjuna uvāca darśanasmaraṇādīnāṁ hariritthamagocaraḥ kathaṁ pratyakṣatāṁ prāpa mānuṣāṇāṁ mahāmune

अर्जुन ने कहा — हे महामुने! यदि हरि दर्शन-स्मरण आदि से इस प्रकार अगोचर हैं, तो वे मनुष्यों के प्रत्यक्ष कैसे हुए?

श्लोक 64 (skanda.2.36.64)

भाग्यभूतोऽथ जगतां यः को वाऽऽराध्य तं विभुम् । इह प्रकाशयामास कथामेतां निवेदय ।

bhāgyabhūto'tha jagatāṁ yaḥ ko vā''rādhya taṁ vibhum iha prakāśayāmāsa kathāmetāṁ nivedaya

वह कौन भाग्यशाली था जिसने उन सर्वव्यापक प्रभु की आराधना करके उन्हें यहाँ प्रकट किया? यह कथा मुझे बताइए।

श्लोक 65 (skanda.2.36.65)

हरिकथाश्रवणं दुरितापहं कथयतां सकलागमविद्भवान् । सुकृतिनां ननु संप्रति धुर्यता मुनिवरेण्य ममाद्य समागता ।

harikathāśravaṇaṁ duritāpahaṁ kathayatāṁ sakalāgamavidbhavān sukṛtināṁ nanu saṁprati dhuryatā munivareṇya mamādya samāgatā

हे मुनिश्रेष्ठ! आप समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, और हरिकथा का श्रवण उसके वक्ताओं के भी पाप हर लेता है — निश्चय ही आज पुण्यात्माओं में अग्रणी होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है।

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