Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 37

श्री वेंकटाचल के प्रति शंख-अगस्त्य आदि का आगमन वर्णन

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (skanda.2.37.1)

भारद्वाज उवाच । शृणु पार्थ प्रवक्ष्यामि कथामाश्चर्यकारिणीम् । यथाऽसौ भगवानस्मिञ्छैले प्राप प्रकाशताम् ।

bhāradvāja uvāca śṛṇu pārtha pravakṣyāmi kathāmāścaryakāriṇīm yathā'sau bhagavānasmiñchaile prāpa prakāśatām

भारद्वाज ने कहा — हे पार्थ! सुनो, मैं एक आश्चर्यकारी कथा कहूँगा — जिस प्रकार वे भगवान इस पर्वत पर प्रकट हुए।

श्लोक 2 (skanda.2.37.2)

श्रुताभिधानो नृपतिरस्ति हैहयवंशजः । यः प्रजाः स्वा इव चिरं शशास धरणीं शुभाम् ।

śrutābhidhāno nṛpatirasti haihayavaṁśajaḥ yaḥ prajāḥ svā iva ciraṁ śaśāsa dharaṇīṁ śubhām

हैहयवंश में उत्पन्न श्रुत नामक एक राजा थे, जिन्होंने प्रजा को अपनी संतान के समान मानकर चिरकाल तक इस शुभ पृथ्वी का शासन किया।

श्लोक 3 (skanda.2.37.3)

तस्य पुत्रो गुणनिधिः शंखो नाम महीपतिः । पालयामास वसुधां सर्वशास्त्रविशारदः ।

tasya putro guṇanidhiḥ śaṁkho nāma mahīpatiḥ pālayāmāsa vasudhāṁ sarvaśāstraviśāradaḥ

उनका पुत्र, गुणों का भंडार, शंख नामक राजा हुआ, जो समस्त शास्त्रों में निपुण होकर पृथ्वी का पालन करता था।

श्लोक 4 (skanda.2.37.4)

तस्य विष्णौ जगन्नाथे पुण्डरीकायतेक्षणे । बभूव निश्चला भक्तिः परित्यक्तान्यसंश्रया ।

tasya viṣṇau jagannāthe puṇḍarīkāyatekṣaṇe babhūva niścalā bhaktiḥ parityaktānyasaṁśrayā

कमल-नेत्र, जगन्नाथ विष्णु में उसकी अटल भक्ति थी, जिसने अन्य सभी आश्रयों को त्याग दिया था।

श्लोक 5 (skanda.2.37.5)

देवदेवं जगन्नाथमनन्तं पुरुषोत्तमम् । प्रगाढनिश्चयो नित्यं ध्यायन्नद्भुतवैभवम् ।

devadevaṁ jagannāthamanantaṁ puruṣottamam pragāḍhaniścayo nityaṁ dhyāyannadbhutavaibhavam

वह दृढ़ निश्चय से निरंतर देवों के देव, जगन्नाथ, अनंत, पुरुषोत्तम, अद्भुत ऐश्वर्य वाले का ध्यान करता था।

श्लोक 6 (skanda.2.37.6)

चक्रे व्रतानि दानानि पुण्यानि विविधानि च । वेदवेद्यस्य नियतं प्रीत्यर्थं मधुविद्विषः ।

cakre vratāni dānāni puṇyāni vividhāni ca vedavedyasya niyataṁ prītyarthaṁ madhuvidviṣaḥ

वेदों से जाने जाने वाले मधुसूदन को प्रसन्न करने के लिए उसने नियमित रूप से अनेक व्रत, दान और पुण्यकर्म किए।

श्लोक 7 (skanda.2.37.7)

तमुद्दिश्यैव विदधे वाजिमेधादिकान्क्रतून् । यथोक्तदक्षिणायोगात्प्रीणिताशेषभूसुरः ।

tamuddiśyaiva vidadhe vājimedhādikānkratūn yathoktadakṣiṇāyogātprīṇitāśeṣabhūsuraḥ

उन्हीं को उद्देश्य कर उसने अश्वमेध आदि यज्ञ किए, विधिवत दक्षिणा देकर समस्त ब्राह्मणों को संतुष्ट किया।

श्लोक 8 (skanda.2.37.8)

इष्टापूर्त्तात्मकं चक्रे कर्मजातमतन्द्रितः । विन्यस्तहृदयो नित्यं केशवे भक्तवत्सले ।

iṣṭāpūrttātmakaṁ cakre karmajātamatandritaḥ vinyastahṛdayo nityaṁ keśave bhaktavatsale

अथक होकर उसने इष्ट और पूर्त कर्म किए, अपना हृदय सदा भक्तवत्सल केशव में लगाए रखा।

श्लोक 9 (skanda.2.37.9)

स्मरत्यजस्रं गोविन्दं जपत्यच्युतमव्ययम् । पूजयत्यब्जनयनं संकीर्तयति शार्ङ्गिणम् ।

smaratyajasraṁ govindaṁ japatyacyutamavyayam pūjayatyabjanayanaṁ saṁkīrtayati śārṅgiṇam

वह निरंतर गोविंद का स्मरण करता, अच्युत का जप करता, कमल-नेत्र की पूजा करता, और शार्ङ्गधारी का कीर्तन करता।

श्लोक 10 (skanda.2.37.10)

शृणोति सततं राजा संसारार्णवतारिणीः । पौराणिकैः समाख्याताः पवित्रा वैष्णवी कथाः ।

śṛṇoti satataṁ rājā saṁsārārṇavatāriṇīḥ paurāṇikaiḥ samākhyātāḥ pavitrā vaiṣṇavī kathāḥ

राजा सतत पुराणिकों द्वारा कही गई, संसार-सागर से तारने वाली पवित्र वैष्णव कथाओं को सुनता था।

श्लोक 11 (skanda.2.37.11)

ब्राह्मणानर्चति स्मायं हरिप्रीत्यर्थमेव च । इत्थं सर्वात्मना युक्तोऽप्यश्रान्तः पृथिवीपतिः ।

brāhmaṇānarcati smāyaṁ hariprītyarthameva ca itthaṁ sarvātmanā yukto'pyaśrāntaḥ pṛthivīpatiḥ

वह केवल हरि की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों की पूजा करता था। इस प्रकार अपने पूरे मन से युक्त होते हुए भी, वह अथक पृथ्वीपति...

श्लोक 12 (skanda.2.37.12)

नापश्यच्छाश्वतैश्वर्यं स्वतन्त्रं पुरुषोत्तमम् । अप्राप्य दर्शनं विष्णोः सर्वयज्ञमयात्मनः ।

nāpaśyacchāśvataiśvaryaṁ svatantraṁ puruṣottamam aprāpya darśanaṁ viṣṇoḥ sarvayajñamayātmanaḥ

...उस नित्य ऐश्वर्यवान, स्वतंत्र पुरुषोत्तम को नहीं देख सका; उसे सर्वयज्ञमय विष्णु का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 13 (skanda.2.37.13)

सशोकाक्रान्तहृदयः परां चिन्तामुपागमत् ।

saśokākrāntahṛdayaḥ parāṁ cintāmupāgamat

शोकाकुल हृदय से वह गहरी चिंता में डूब गया।

श्लोक 14 (skanda.2.37.14)

शंख उवाच । परः सहस्रैर्जनैरतीतदुष्कृतं बहु । कृतं मया यदप्राप्तं हृषीकेशस्य दर्शनम् ।

śaṁkha uvāca paraḥ sahasrairjanairatītaduṣkṛtaṁ bahu kṛtaṁ mayā yadaprāptaṁ hṛṣīkeśasya darśanam

शंख ने कहा — मैंने अवश्य ही हजारों मनुष्यों से भी बढ़कर पूर्वजन्मों का पाप किया होगा, कि मुझे हृषीकेश का दर्शन नहीं मिल रहा।

श्लोक 15 (skanda.2.37.15)

उपार्जितानां तमसामनेकैः पूर्वजन्मभिः । अखण्डं हि फलं विष्णोर्दर्शनं मधुघातिनः ।

upārjitānāṁ tamasāmanekaiḥ pūrvajanmabhiḥ akhaṇḍaṁ hi phalaṁ viṣṇordarśanaṁ madhughātinaḥ

अनेक पूर्वजन्मों में संचित पापों के [नष्ट होने] का ही सम्पूर्ण फल है मधुघाती विष्णु का दर्शन।

श्लोक 16 (skanda.2.37.16)

कथं नु यायाद्भगवान्विषयं मम नेत्रयोः । कदा वा लभ्यते श्रेयस्तद्वाक्याकर्णनात्मकम् ।

kathaṁ nu yāyādbhagavānviṣayaṁ mama netrayoḥ kadā vā labhyate śreyastadvākyākarṇanātmakam

वे भगवान मेरे नेत्रों के विषय में कैसे आएँगे? या कब मुझे उनके वचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त होगा?

श्लोक 17 (skanda.2.37.17)

हा धिङ्मां विहितागस्कं क्रियासाफल्यवर्जितम् । नारायणकृपादूरं संसारक्लेशगोचरम् ।

hā dhiṅmāṁ vihitāgaskaṁ kriyāsāphalyavarjitam nārāyaṇakṛpādūraṁ saṁsārakleśagocaram

हा! धिक्कार है मुझे, जो अपराधी हूँ, कर्मों के फल से वंचित हूँ, नारायण की कृपा से दूर हूँ, और संसार के क्लेशों का भागी हूँ।

श्लोक 18 (skanda.2.37.18)

भरद्वाज उवाच । इति चिन्ताकुले तस्मिन्राज्ञि जीवितनिःस्पृहे । अदृश्यमूर्तिः सर्वेषां शृण्वतामाह केशवः ।

bharadvāja uvāca iti cintākule tasminrājñi jīvitaniḥspṛhe adṛśyamūrtiḥ sarveṣāṁ śṛṇvatāmāha keśavaḥ

भरद्वाज ने कहा — इस प्रकार चिंता में डूबे, जीवन से उदासीन उस राजा से, अदृश्य स्वरूप केशव ने सबके सुनते हुए कहा —

श्लोक 19 (skanda.2.37.19)

श्रीभगवानुवाच । मा शोकस्य वशं यायाः शृणु वक्ष्याभि ते हितम् । मदेकशरणं साधुं त्वां त्यक्ष्यामि कथं नृप ।

śrībhagavānuvāca mā śokasya vaśaṁ yāyāḥ śṛṇu vakṣyābhi te hitam madekaśaraṇaṁ sādhuṁ tvāṁ tyakṣyāmi kathaṁ nṛpa

श्रीभगवान ने कहा — शोक के वशीभूत मत हो; सुनो, मैं तुम्हारा हित कहूँगा। हे राजन्! मुझ अकेले की शरण में आए साधु तुझे मैं कैसे त्याग सकता हूँ?

श्लोक 20 (skanda.2.37.20)

अयं वेंकटनामाद्रिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । वैकुण्ठादपि मे राजन्नावासोऽतिप्रियावहः ।

ayaṁ veṁkaṭanāmādristriṣu lokeṣu viśrutaḥ vaikuṇṭhādapi me rājannāvāso'tipriyāvahaḥ

यह वेंकट नामक पर्वत तीनों लोकों में विख्यात है; हे राजन्! यह वैकुंठ से भी अधिक मुझे प्रिय निवास है।

श्लोक 21 (skanda.2.37.21)

तं गत्वा भूधरवरं तव भक्त्या तपस्यतः । गते सहस्रे वर्षाणां यास्याम्यालोकनीयताम् ।

taṁ gatvā bhūdharavaraṁ tava bhaktyā tapasyataḥ gate sahasre varṣāṇāṁ yāsyāmyālokanīyatām

उस श्रेष्ठ पर्वत पर जाकर, वहाँ भक्तिपूर्वक तपस्या करते हुए, सहस्र वर्ष बीतने पर मैं तुम्हें दृष्टिगोचर होऊँगा।

श्लोक 22 (skanda.2.37.22)

भवानिवोद्यतोऽगस्त्यो मम दर्शनमञ्जसा । क्व वा संदृश्यते विष्णुरेवमाह चतुर्मुखम् ।

bhavānivodyato'gastyo mama darśanamañjasā kva vā saṁdṛśyate viṣṇurevamāha caturmukham

तुम्हारे ही समान अगस्त्य भी सहज ही मेरे दर्शन के लिए उद्यत हैं; "विष्णु कहाँ दिखाई देते हैं?" — इस प्रकार उन्होंने चतुर्मुख ब्रह्मा से पूछा था।

श्लोक 23 (skanda.2.37.23)

वृषभाद्रौ हरिर्द्रष्टुं लभ्यते नियतात्मभिः । गच्छ तत्रेति मुनये कथयामास पद्मभूः ।

vṛṣabhādrau harirdraṣṭuṁ labhyate niyatātmabhiḥ gaccha tatreti munaye kathayāmāsa padmabhūḥ

[ब्रह्मा ने कहा:] "वृषभाद्रि पर संयमी आत्माओं को हरि का दर्शन प्राप्त होता है; वहीं जाओ" — इस प्रकार कमलासन ने उस मुनि से कहा।

श्लोक 24 (skanda.2.37.24)

अम्भोजसंभवेनेत्थमादिष्टः कुम्भसम्भवः । अञ्जनाद्रौ महावासे तपस्तप्तुं समेष्यति ।

ambhojasaṁbhavenetthamādiṣṭaḥ kumbhasambhavaḥ añjanādrau mahāvāse tapastaptuṁ sameṣyati

इस प्रकार कमलजन्मा द्वारा आदिष्ट, कुंभसंभव (अगस्त्य) अंजनाद्रि के महान निवास में तपस्या करने के लिए आएँगे।

श्लोक 25 (skanda.2.37.25)

तस्मिन्महीधरे पुण्ये कृतवासो भवानपि । आराध्य मां तपोनिष्ठो मम दर्शनमाप्स्यसि ।

tasminmahīdhare puṇye kṛtavāso bhavānapi ārādhya māṁ taponiṣṭho mama darśanamāpsyasi

उसी पवित्र पर्वत पर निवास बनाकर, तुम भी तपोनिष्ठ होकर, मेरी आराधना करके मेरा दर्शन प्राप्त करोगे।

श्लोक 26 (skanda.2.37.26)

भरद्वाज उवाच । इत्याज्ञप्तो भगवता शंखो दानववैरिणा । जगाम प्रीतिमतुलां धन्योस्मीति स्वचेतसि ।

bharadvāja uvāca ityājñapto bhagavatā śaṁkho dānavavairiṇā jagāma prītimatulāṁ dhanyosmīti svacetasi

भरद्वाज ने कहा — दानवों के शत्रु भगवान द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर, शंख को अतुल प्रसन्नता हुई; उसने अपने मन में सोचा, "मैं धन्य हूँ।"

श्लोक 27 (skanda.2.37.27)

विन्यस्य तनयं वज्रं प्रजापालनकर्मणि । गोविन्ददर्शनापेक्षी नारायणगिरिं ययौ ।

vinyasya tanayaṁ vajraṁ prajāpālanakarmaṇi govindadarśanāpekṣī nārāyaṇagiriṁ yayau

अपने पुत्र वज्र को प्रजापालन के कार्य में नियुक्त कर, गोविंद-दर्शन की आकांक्षा से वह नारायण-गिरि की ओर चल पड़ा।

श्लोक 28 (skanda.2.37.28)

तस्य शृंगे समुत्तुंगे स्वामिपुष्करिणीं शुभाम् । दिव्यैः पयोभिरापूर्णामपश्यदमृतोपमैः ।

tasya śṛṁge samuttuṁge svāmipuṣkariṇīṁ śubhām divyaiḥ payobhirāpūrṇāmapaśyadamṛtopamaiḥ

उसके ऊँचे शिखर पर उसने शुभ स्वामिपुष्करिणी को देखा, जो अमृत के समान दिव्य जल से परिपूर्ण थी,

श्लोक 29 (skanda.2.37.29)

अनेकसिद्धगन्धर्वदेवर्षिगणसेविताम् । भवतापप्रशमनी सर्वतीर्थसमाश्रयाम् ।

anekasiddhagandharvadevarṣigaṇasevitām bhavatāpapraśamanī sarvatīrthasamāśrayām

अनेक सिद्ध, गंधर्व और देवर्षियों के समूह से सेवित, संसार-ताप को शांत करने वाली, समस्त तीर्थों की आश्रयस्थली,

श्लोक 30 (skanda.2.37.30)

जलकाकबकक्रौञ्चहंसकारण्डवाकुलाम् । कुमुदोत्पलराजीवसौगन्धिकमनोहराम् ।

jalakākabakakrauñcahaṁsakāraṇḍavākulām kumudotpalarājīvasaugandhikamanoharām

जल-काक, बगुले, क्रौंच, हंस और कारंडवों से व्याप्त, कुमुद, नील-कमल, राजीव और सुगंधित पुष्पों से मनोहर।

श्लोक 31 (skanda.2.37.31)

तां दृष्ट्वा पद्मिनीं दिव्यां तत्तीरे विहितोटजः । तोषितः स्नानपानाद्यैर्निर्विकल्पमनोगतिः ।

tāṁ dṛṣṭvā padminīṁ divyāṁ tattīre vihitoṭajaḥ toṣitaḥ snānapānādyairnirvikalpamanogatiḥ

उस दिव्य पद्मिनी को देखकर उसने उसके तट पर कुटिया बनाई; स्नान-पान आदि से संतुष्ट होकर, उसका मन निःसंकल्प हो गया,

श्लोक 32 (skanda.2.37.32)

सर्वकर्माणि विन्यस्य जगदीशे जनार्दने ।

sarvakarmāṇi vinyasya jagadīśe janārdane

अपने समस्त कर्मों को जगदीश जनार्दन में समर्पित करके।

श्लोक 33 (skanda.2.37.33)

जपध्यानपरो नित्यं तपस्तेपे सुदारुणम् । तस्मिन्नेव मुनिः काले शासनात्परमेष्ठिनः ।

japadhyānaparo nityaṁ tapastepe sudāruṇam tasminneva muniḥ kāle śāsanātparameṣṭhinaḥ

जप-ध्यान में सदा तत्पर होकर उसने अत्यंत कठोर तपस्या की। उसी समय, परमेष्ठी (ब्रह्मा) की आज्ञा से वह मुनि (अगस्त्य)...

श्लोक 34 (skanda.2.37.34)

अगस्त्योऽप्याससादाद्यं शैलं मुनिशतावृतः । प्रतीचीं दिशमारभ्य कृतयत्नः प्रदक्षिणे ।

agastyo'pyāsasādādyaṁ śailaṁ muniśatāvṛtaḥ pratīcīṁ diśamārabhya kṛtayatnaḥ pradakṣiṇe

...अगस्त्य भी सौ मुनियों से घिरे हुए उस आदि पर्वत पर पहुँचे, और पश्चिम दिशा से आरंभ कर प्रयत्नपूर्वक प्रदक्षिणा करते हुए,

श्लोक 35 (skanda.2.37.35)

पश्यंस्तीर्थानि पुण्यानि बभ्राम सुचिरं गिरौ । तत्र तत्र ददर्शासौ हरिदर्शनलालसान् ।

paśyaṁstīrthāni puṇyāni babhrāma suciraṁ girau tatra tatra dadarśāsau haridarśanalālasān

पवित्र तीर्थों को देखते हुए वे दीर्घकाल तक पर्वत पर भ्रमण करते रहे; वहाँ-वहाँ उन्होंने हरि-दर्शन के अभिलाषी लोगों को देखा —

श्लोक 36 (skanda.2.37.36)

विरिंचिगुहशक्रेशविष्वक्सेनादिकान्क्रमात् । सनकाद्यांश्च योगीन्द्रान्नारदप्रमुखानृषीन् ।

viriṁciguhaśakreśaviṣvaksenādikānkramāt sanakādyāṁśca yogīndrānnāradapramukhānṛṣīn

क्रमशः ब्रह्मा, गुह (स्कंद), इंद्र, शिव, विष्वक्सेन आदि, सनक आदि योगीन्द्रों को, तथा नारद प्रमुख ऋषियों को,

श्लोक 37 (skanda.2.37.37)

सिद्धगन्धर्वदैतेययक्षराक्षसपन्नगान् । तैस्तैः संमान्यमानोऽसौ प्रश्रयप्रियभाषणैः ।

siddhagandharvadaiteyayakṣarākṣasapannagān taistaiḥ saṁmānyamāno'sau praśrayapriyabhāṣaṇaiḥ

सिद्ध, गंधर्व, दैत्य, यक्ष, राक्षस और नाग — इन सबसे विनम्र, प्रिय वचनों द्वारा सम्मानित होते हुए,

श्लोक 38 (skanda.2.37.38)

पश्यन्नाश्चर्यभूतानि सर्वाणि विचचार ह । स्नात्वा तीर्थेषु सर्वेषु स्कन्दधारादिकेषु च ।

paśyannāścaryabhūtāni sarvāṇi vicacāra ha snātvā tīrtheṣu sarveṣu skandadhārādikeṣu ca

सारे आश्चर्यजनक दृश्यों को देखते हुए वे विचरण करते रहे; स्कंदधारा आदि सभी तीर्थों में स्नान करके,

श्लोक 39 (skanda.2.37.39)

तत्र तत्रार्चयामास गोविन्दं जगतां पतिम् । एवं भ्रान्त्वा गतेऽब्दानां सहस्रे मुनिसत्तमः ।

tatra tatrārcayāmāsa govindaṁ jagatāṁ patim evaṁ bhrāntvā gate'bdānāṁ sahasre munisattamaḥ

वहाँ-वहाँ जगत्पति गोविंद की पूजा की। इस प्रकार भ्रमण करते हुए, जब सहस्र वर्ष बीत गए, तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य...

श्लोक 40 (skanda.2.37.40)

नापश्यत्पुण्डरीकाक्षं चिन्ताशोकपरोऽभवत् ।

nāpaśyatpuṇḍarīkākṣaṁ cintāśokaparo'bhavat

...पुण्डरीकाक्ष का दर्शन न पा सके और चिंता तथा शोक में पड़ गए।

श्लोक 41 (skanda.2.37.41)

तस्मिन्काले समाजग्मुर्धिषणोशनसौ पुनः । राजोपरिचरो नाम वसुश्च तमृषीश्वरम् ।

tasminkāle samājagmurdhiṣaṇośanasau punaḥ rājoparicaro nāma vasuśca tamṛṣīśvaram

उसी समय बृहस्पति (धिषण) और शुक्राचार्य (उशनस्) पुनः वहाँ आए, तथा उपरिचर वसु नामक राजा भी उस ऋषिश्रेष्ठ के पास आए,

श्लोक 42 (skanda.2.37.42)

अस्माकं सफलं जातं जीवितं मुनिसत्तम । दृष्टो भवान्यदस्माभिर्नारायण इवापरः ।

asmākaṁ saphalaṁ jātaṁ jīvitaṁ munisattama dṛṣṭo bhavānyadasmābhirnārāyaṇa ivāparaḥ

[कहा:] "हमारा जीवन सफल हो गया, हे मुनिश्रेष्ठ! क्योंकि हमने आपको देखा, जो मानो दूसरे नारायण ही हैं।"

श्लोक 43 (skanda.2.37.43)

ब्रह्मणा लोकनाथेन यदादिष्टा वयं मुने । अच्युतालोकनपरास्तदिदं कथ्यते तव ।

brahmaṇā lokanāthena yadādiṣṭā vayaṁ mune acyutālokanaparāstadidaṁ kathyate tava

लोकनाथ ब्रह्मा ने हमें जो आदेश दिया, हे मुने, हम अच्युत के दर्शन के अभिलाषी होकर वह आपसे कहते हैं —

श्लोक 44 (skanda.2.37.44)

अस्ति दक्षिणदिग्भागे वेंकटोनाम भूधरः । श्वेतद्वीपादपि हरेरावासोऽयमभीप्सितः ।

asti dakṣiṇadigbhāge veṁkaṭonāma bhūdharaḥ śvetadvīpādapi harerāvāso'yamabhīpsitaḥ

दक्षिण दिशा में वेंकट नामक पर्वत है; यह हरि का निवास-स्थान श्वेतद्वीप से भी अधिक अभीष्ट है।

श्लोक 45 (skanda.2.37.45)

तस्मिन्गिरावगस्त्यस्य शंखस्य च महीपतेः । दर्शयिष्यति गोविन्दो निजरूपं जगद्गुरुः ।

tasmingirāvagastyasya śaṁkhasya ca mahīpateḥ darśayiṣyati govindo nijarūpaṁ jagadguruḥ

उस पर्वत पर अगस्त्य और राजा शंख को जगद्गुरु गोविंद अपना स्वरूप दिखाएँगे।

श्लोक 46 (skanda.2.37.46)

तदानीं सर्वदेवानामृषीणां यक्षरक्षसाम् । अस्माकं देवदेवस्य दर्शनं संभविष्यति ।

tadānīṁ sarvadevānāmṛṣīṇāṁ yakṣarakṣasām asmākaṁ devadevasya darśanaṁ saṁbhaviṣyati

उस समय समस्त देवों, ऋषियों, यक्षों-राक्षसों तथा हम सबको उन देवदेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।

श्लोक 47 (skanda.2.37.47)

अचिरेणैव तद्भावि ततः संत्यक्तकल्मषाः । अन्वेष्टुं गच्छतागस्त्यं तस्मिन्नारायणाचले ।

acireṇaiva tadbhāvi tataḥ saṁtyaktakalmaṣāḥ anveṣṭuṁ gacchatāgastyaṁ tasminnārāyaṇācale

वह शीघ्र ही घटित होगा; अतः पापमुक्त होकर उस नारायण-पर्वत पर अगस्त्य को खोजने जाओ।

श्लोक 48 (skanda.2.37.48)

इत्याज्ञप्ता वयं धात्रा समागम्यात्र भाग्यतः । दृष्टवन्तो महाभागं भवंतं भूरितेजसम् ।

ityājñaptā vayaṁ dhātrā samāgamyātra bhāgyataḥ dṛṣṭavanto mahābhāgaṁ bhavaṁtaṁ bhūritejasam

इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा आज्ञप्त हम, सौभाग्यवश यहाँ आपसे मिलकर, अत्यंत तेजस्वी, महाभाग्यशाली आपका दर्शन कर पाए।

श्लोक 49 (skanda.2.37.49)

भवता सहिता गत्वा स्वामिपुष्करिणीतटे । तमप्यालोकयिष्यामः शंखं भागवतोत्तमम् ।

bhavatā sahitā gatvā svāmipuṣkariṇītaṭe tamapyālokayiṣyāmaḥ śaṁkhaṁ bhāgavatottamam

आपके साथ स्वामिपुष्करिणी के तट पर जाकर हम भागवतश्रेष्ठ शंख का भी दर्शन करेंगे।

श्लोक 50 (skanda.2.37.50)

भरद्वाज उवाच । गीष्पतिप्रमुखैरित्थमादिष्टः कुम्भसंभवः । शोकजालं परित्यज्य ययौ तैः सहितो द्रुतम् ।

bharadvāja uvāca gīṣpatipramukhairitthamādiṣṭaḥ kumbhasaṁbhavaḥ śokajālaṁ parityajya yayau taiḥ sahito drutam

भरद्वाज ने कहा — बृहस्पति आदि द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त, कुंभसंभव अगस्त्य ने शोक-जाल त्यागकर उनके साथ शीघ्र प्रस्थान किया।

श्लोक 51 (skanda.2.37.51)

स ददर्श महावृक्षान्फलपुष्पभरानतात् । प्ररूढशाखानिकरच्छायाच्छादितदिक्तटान् ।

sa dadarśa mahāvṛkṣānphalapuṣpabharānatāt prarūḍhaśākhānikaracchāyācchāditadiktaṭān

उन्होंने फल-फूलों के भार से झुके विशाल वृक्षों को देखा, जिनकी फैली शाखाओं की छाया क्षितिज के छोरों को ढक रही थी।

श्लोक 52 (skanda.2.37.52)

सिंहदंतावलव्याघ्रवराहमहिषादिकान् । मृगानालोकयामास पंथानं चांतरांतरा ।

siṁhadaṁtāvalavyāghravarāhamahiṣādikān mṛgānālokayāmāsa paṁthānaṁ cāṁtarāṁtarā

और मार्ग में बीच-बीच में सिंह, हाथी, व्याघ्र, वराह, महिष आदि वन्य पशुओं को देखा।

श्लोक 53 (skanda.2.37.53)

तैस्तदानीं ददृशिरे सानवोऽप्यम्बुभृद्भृतः । सुवर्णरौप्यताम्रादिशोभितास्तत्र तत्र तु ।

taistadānīṁ dadṛśire sānavo'pyambubhṛdbhṛtaḥ suvarṇaraupyatāmrādiśobhitāstatra tatra tu

उन्होंने वहाँ-वहाँ सोना, चाँदी, ताँबे आदि से सुशोभित मेघाच्छादित पर्वत-शिखर भी देखे,

श्लोक 54 (skanda.2.37.54)

उच्चलच्छीकरासारनिर्वाहितदिवौकसः । वेगोद्धृतशिला दृष्टाः शतशो गिरिनिर्झराः ।

uccalacchīkarāsāranirvāhitadivaukasaḥ vegoddhṛtaśilā dṛṣṭāḥ śataśo girinirjharāḥ

और सैकड़ों पर्वतीय झरने देखे, जो उछलती जल-फुहारों से देवताओं को तृप्त करते और वेग से शिलाओं को उठा फेंकते थे।

श्लोक 55 (skanda.2.37.55)

तेषामापादयामास प्रमोदं मंदमारुतः । कमलामोदसंवाही विचरन्गिरिसानुषु ।

teṣāmāpādayāmāsa pramodaṁ maṁdamārutaḥ kamalāmodasaṁvāhī vicarangirisānuṣu

कमल की सुगंध लिए विचरण करती मंद वायु पर्वत-शिखरों पर उन्हें आनंद प्रदान करती थी।

श्लोक 56 (skanda.2.37.56)

शुकानां कोकिलानां च तदा शुश्रुविरे गिरः ।

śukānāṁ kokilānāṁ ca tadā śuśruvire giraḥ

तब तोतों और कोयलों की वाणी सुनाई देने लगी।

श्लोक 57 (skanda.2.37.57)

तत्र तत्र समासीनान्विस्तीर्णासु दृषत्सु ते । सिद्धानपश्यन्कृष्णस्य गायतो गुणवैभवम् ।

tatra tatra samāsīnānvistīrṇāsu dṛṣatsu te siddhānapaśyankṛṣṇasya gāyato guṇavaibhavam

वहाँ-वहाँ विस्तृत शिलाओं पर बैठे सिद्धगणों को उन्होंने कृष्ण के गुण-वैभव का गायन करते देखा।

श्लोक 58 (skanda.2.37.58)

अगस्त्यप्रमुखाः सर्वे परिक्रम्य मुनीश्वराः । स्वामिपुष्करिणीं दिव्यां ददृशुर्विमलोदकाम् ।

agastyapramukhāḥ sarve parikramya munīśvarāḥ svāmipuṣkariṇīṁ divyāṁ dadṛśurvimalodakām

अगस्त्य आदि सभी मुनीश्वरों ने परिक्रमा करके निर्मल जल वाली दिव्य स्वामिपुष्करिणी को देखा,

श्लोक 59 (skanda.2.37.59)

तत्तीरे विहितावासमपश्यच्छङ्खभूपतिम् । वाङ्मनःकायजं कर्म सन्निवेश्य स्थितं हरौ ।

tattīre vihitāvāsamapaśyacchaṅkhabhūpatim vāṅmanaḥkāyajaṁ karma sanniveśya sthitaṁ harau

और उसके तट पर निवास किए हुए, वाणी-मन-काया के कर्मों को हरि में समर्पित कर स्थित राजा शंख को देखा।

श्लोक 60 (skanda.2.37.60)

स तानालोक्य सहसा मुनीन्द्रान्संशितव्रतान् । यथोक्तमकरोत्पूजां प्रणामस्तुतिपूर्विकाम् ।

sa tānālokya sahasā munīndrānsaṁśitavratān yathoktamakarotpūjāṁ praṇāmastutipūrvikām

उन कठोर व्रतधारी मुनीश्वरों को अचानक देखकर, उसने विधिपूर्वक प्रणाम और स्तुति सहित पूजा की।

श्लोक 61 (skanda.2.37.61)

आसीनास्तत्र ते सर्वे संभाव्यान्योऽन्यमुत्सुकाः । गोविन्दकीर्तनपराः कृतार्थत्वं प्रपेदिरे ।

āsīnāstatra te sarve saṁbhāvyānyo'nyamutsukāḥ govindakīrtanaparāḥ kṛtārthatvaṁ prapedire

वहाँ बैठे हुए वे सभी परस्पर एक-दूसरे का सम्मान करते हुए, गोविंद-कीर्तन में तत्पर होकर कृतार्थता को प्राप्त हुए।

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38