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वैष्णव खण्ड · अध्याय 38

अगस्त्य-शंख के तप से प्रसन्न श्री वेंकटेश के आविर्भाव का माहात्म्य वर्णन

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (skanda.2.38.1)

भरद्वाज उवाच । तेषां हरौ जगन्नाथे समावेशितचेतसाम् । दिनत्रयं गतं तत्र पूजास्तोत्रपरात्मनाम् ।

bharadvāja uvāca teṣāṁ harau jagannāthe samāveśitacetasām dinatrayaṁ gataṁ tatra pūjāstotraparātmanām

भरद्वाज ने कहा — हरि जगन्नाथ में मन लगाए हुए उन सबके, पूजा-स्तोत्र में तत्पर, वहाँ तीन दिन बीत गए।

श्लोक 2 (skanda.2.38.2)

तृतीये दिवसे प्राप्ते ते सर्वे निद्रिता निशि । अन्ते चतुर्थयामस्य ददृशुः स्वप्नमुत्तमम् ।

tṛtīye divase prāpte te sarve nidritā niśi ante caturthayāmasya dadṛśuḥ svapnamuttamam

तीसरा दिन आने पर, रात्रि में सोए हुए वे सब, चौथे प्रहर के अंत में एक उत्तम स्वप्न देखने लगे।

श्लोक 3 (skanda.2.38.3)

शङ्खचक्रगदापाणिं प्रसन्नं पुरुषोत्तमम् । वरदानाय संप्राप्तमपश्यन्स्मेरलोचनम् ।

śaṅkhacakragadāpāṇiṁ prasannaṁ puruṣottamam varadānāya saṁprāptamapaśyansmeralocanam

उन्होंने शंख-चक्र-गदाधारी, प्रसन्न, मुस्कुराते नेत्रों वाले पुरुषोत्तम को वर देने के लिए आया हुआ देखा।

श्लोक 4 (skanda.2.38.4)

उत्थाय मुदितात्मानो गृहान्निर्गत्य पावने । स्वामिपुष्करिणीतोये सस्नुर्विधिवदादरात् ।

utthāya muditātmāno gṛhānnirgatya pāvane svāmipuṣkariṇītoye sasnurvidhivadādarāt

प्रसन्न मन से उठकर, अपने निवास से निकलकर, उन्होंने पवित्र स्वामिपुष्करिणी के जल में आदरपूर्वक विधिवत स्नान किया।

श्लोक 5 (skanda.2.38.5)

विधाय विधिवत्कर्म सर्वे दिनमुखोचितम् । गृहान्प्रत्याययुर्देवमाराधयितुमच्युतम् ।

vidhāya vidhivatkarma sarve dinamukhocitam gṛhānpratyāyayurdevamārādhayitumacyutam

प्रातःकाल के उपयुक्त कर्म विधिवत करके, सब अच्युत की आराधना के लिए अपने निवास लौट आए।

श्लोक 6 (skanda.2.38.6)

सद्यः श्रेयस्करं मार्गे निमित्तं पक्षिसृचितम् । दृष्ट्वा प्रसादं देवस्य करस्थं मेनिरे तदा ।

sadyaḥ śreyaskaraṁ mārge nimittaṁ pakṣisṛcitam dṛṣṭvā prasādaṁ devasya karasthaṁ menire tadā

मार्ग में पक्षियों द्वारा सूचित तत्काल शुभ शकुन देखकर, उन्होंने तब भगवान की कृपा को हाथ में आया हुआ माना।

श्लोक 7 (skanda.2.38.7)

ततस्त्रिलोककर्तारं पूजयित्वा जनार्दनम् । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पवित्रैर्वेदवर्णितैः ।

tatastrilokakartāraṁ pūjayitvā janārdanam tuṣṭuvurvividhaiḥ stotraiḥ pavitrairvedavarṇitaiḥ

फिर त्रिलोक के कर्ता जनार्दन की पूजा करके, उन्होंने वेदों में वर्णित पवित्र, विविध स्तोत्रों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 8 (skanda.2.38.8)

स्तोत्रावसाने कौन्तेय मुनीन्द्रः कुम्भसंभवः । जजाप शंखसहितो मन्त्रमष्टाक्षरं हरेः ।

stotrāvasāne kaunteya munīndraḥ kumbhasaṁbhavaḥ jajāpa śaṁkhasahito mantramaṣṭākṣaraṁ hareḥ

हे कौन्तेय! स्तोत्र की समाप्ति पर, मुनीन्द्र कुंभसंभव ने शंख के साथ हरि के अष्टाक्षर मंत्र का जप किया।

श्लोक 9 (skanda.2.38.9)

इत्थं तेषां जगत्स्वामिन्यच्युतेऽर्पितचेतसाम् । अग्रभागे प्रादुरभूदेकं तेजो महाद्भुतम् ।

itthaṁ teṣāṁ jagatsvāminyacyute'rpitacetasām agrabhāge prādurabhūdekaṁ tejo mahādbhutam

इस प्रकार, जगत्स्वामी अच्युत में मन अर्पित किए हुए उनके सम्मुख एक महान अद्भुत तेज प्रकट हुआ।

श्लोक 10 (skanda.2.38.10)

अनेककोटिसंख्यानामादित्येन्दु हविर्भुजाम् । एकीभूयाम्बरतले ज्योतिर्जालमिव स्थितम् ।

anekakoṭisaṁkhyānāmādityendu havirbhujām ekībhūyāmbaratale jyotirjālamiva sthitam

मानो अनेक करोड़ सूर्य, चंद्र और अग्नियों का तेज एक होकर आकाश में ज्योति-जाल के समान स्थित हो गया हो।

श्लोक 11 (skanda.2.38.11)

तत्तेजो वीक्ष्य ते सर्वेऽमितान्ताश्चर्यगोचराः । दध्युर्नारायणं दिव्यं परमानन्दविग्रहम् ।

tattejo vīkṣya te sarve'mitāntāścaryagocarāḥ dadhyurnārāyaṇaṁ divyaṁ paramānandavigraham

उस तेज को देखकर वे सभी अपार आश्चर्य में डूब गए, और दिव्य, परमानंद-स्वरूप नारायण का ध्यान करने लगे,

श्लोक 12 (skanda.2.38.12)

वाङ्मानसपथातीतं विश्रुतैश्वर्यभासुरम् । सहस्रनेत्रं साहस्रबाहुपादैः समन्वितम् ।

vāṅmānasapathātītaṁ viśrutaiśvaryabhāsuram sahasranetraṁ sāhasrabāhupādaiḥ samanvitam

जो वाणी और मन के मार्ग से परे हैं, प्रख्यात ऐश्वर्य से देदीप्यमान हैं, सहस्र नेत्रों वाले, सहस्र भुजाओं और चरणों से युक्त हैं,

श्लोक 13 (skanda.2.38.13)

तप्तकार्तस्वरनिभस्फुरत्कांतिमनोहरम । दंष्ट्राकरालं दुर्दर्शं वमन्तं दहनच्छटाः ।

taptakārtasvaranibhasphuratkāṁtimanoharama daṁṣṭrākarālaṁ durdarśaṁ vamantaṁ dahanacchaṭāḥ

तपे हुए स्वर्ण के समान चमकती कांति से मनोहर, दाढ़ों से भयंकर, दुर्दर्शनीय, अग्नि-ज्वालाएँ उगलते हुए,

श्लोक 14 (skanda.2.38.14)

कौस्तुभेन विराजन्तं दधानमुरसि श्रियम् । अविचिन्त्यमनाद्यन्तमत्यन्तभयदायकम् ।

kaustubhena virājantaṁ dadhānamurasi śriyam avicintyamanādyantamatyantabhayadāyakam

कौस्तुभमणि से सुशोभित, वक्षस्थल पर श्री को धारण किए, अचिन्त्य, अनादि-अनंत, अत्यंत भयदायक,

श्लोक 15 (skanda.2.38.15)

प्रकाशयन्तं ब्रह्माण्डं सर्वमात्मनि सर्वगम् । अगस्त्यशंखप्रमुखास्ते सर्वे हृष्टचेतसः ।

prakāśayantaṁ brahmāṇḍaṁ sarvamātmani sarvagam agastyaśaṁkhapramukhāste sarve hṛṣṭacetasaḥ

संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करते हुए, सर्वव्यापी, सबको अपने में समाहित किए हुए — अगस्त्य, शंख आदि सभी हर्षित चित्त से,

श्लोक 16 (skanda.2.38.16)

तमालोक्य जगन्नाथं भूयोभूयो ववन्दिरे । भ्रमन्ति लोकरक्षार्थमायुधानि तदा हरेः ।

tamālokya jagannāthaṁ bhūyobhūyo vavandire bhramanti lokarakṣārthamāyudhāni tadā hareḥ

उन जगन्नाथ को देखकर बार-बार वंदना करने लगे। उस समय हरि के आयुध लोक-रक्षा के लिए विचरण करते हुए,

श्लोक 17 (skanda.2.38.17)

निजतेजोबलोपेतान्याजग्मुस्तं निषेवितुम् । चक्रमर्कप्रभं दिव्या गदा खङ्गश्च नन्दकः ।

nijatejobalopetānyājagmustaṁ niṣevitum cakramarkaprabhaṁ divyā gadā khaṅgaśca nandakaḥ

अपने-अपने तेज और बल से युक्त होकर उनकी सेवा में उपस्थित हुए — सूर्य-प्रभा चक्र, दिव्य गदा, नंदक खड्ग,

श्लोक 18 (skanda.2.38.18)

पुण्डरीकं चोग्ररवः पाञ्चजन्यः शशिप्रभः । तदा ब्रह्माण्डमखिलं पूरयामास निर्भरः ।

puṇḍarīkaṁ cograravaḥ pāñcajanyaḥ śaśiprabhaḥ tadā brahmāṇḍamakhilaṁ pūrayāmāsa nirbharaḥ

शार्ङ्ग धनुष और भयंकर घोष वाला चंद्रकांति पांचजन्य शंख; तब उसने संपूर्ण ब्रह्मांड को परिपूर्ण कर दिया,

श्लोक 19 (skanda.2.38.19)

पाञ्चजन्यस्य निनदः सर्वासुरभयंकरः । पाञ्चजन्यध्वनिं श्रुत्वा नितान्ताश्चर्यभीषणम् ।

pāñcajanyasya ninadaḥ sarvāsurabhayaṁkaraḥ pāñcajanyadhvaniṁ śrutvā nitāntāścaryabhīṣaṇam

पांचजन्य की गर्जना, जो समस्त असुरों को भयभीत करने वाली थी; पांचजन्य की ध्वनि सुनकर, जो अत्यंत आश्चर्यजनक और भीषण थी,

श्लोक 20 (skanda.2.38.20)

आययुर्देवताः सर्वाः स्वंस्वं वाहनमास्थिताः । ब्रह्मा रुद्रः शतमखः सनकाद्याश्च योगिनः ।

āyayurdevatāḥ sarvāḥ svaṁsvaṁ vāhanamāsthitāḥ brahmā rudraḥ śatamakhaḥ sanakādyāśca yoginaḥ

सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर आए — ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र, तथा सनक आदि योगीजन,

श्लोक 21 (skanda.2.38.21)

वसिष्ठमुख्या मुनयो गन्धर्वोरगकिन्नराः । विष्वक्सेनो गरुत्मांश्च विष्णुभृत्या जयादयः ।

vasiṣṭhamukhyā munayo gandharvoragakinnarāḥ viṣvakseno garutmāṁśca viṣṇubhṛtyā jayādayaḥ

वसिष्ठ आदि मुनिगण, गंधर्व, नाग, किन्नर, विष्वक्सेन, गरुड़ तथा जय आदि विष्णु के सेवकगण,

श्लोक 22 (skanda.2.38.22)

सरूपाश्चैव ये नित्याः श्वेतद्वीपनिवासिनः । सुमनोद्रुमसंभूता सुमनोवृष्टिरद्भुता ।

sarūpāścaiva ye nityāḥ śvetadvīpanivāsinaḥ sumanodrumasaṁbhūtā sumanovṛṣṭiradbhutā

और श्वेतद्वीपवासी, नित्य, सदृश-रूप वाले पार्षद भी आए। कल्पवृक्षों से उत्पन्न अद्भुत पुष्प-वृष्टि,

श्लोक 23 (skanda.2.38.23)

पपात मेदुरामोदमोदिताशेषमानसा । ननृतुर्दिव्यसुदृशो जगुः किन्नरपुङ्गवाः ।

papāta medurāmodamoditāśeṣamānasā nanṛturdivyasudṛśo jaguḥ kinnarapuṅgavāḥ

अपनी गाढ़ सुगंध से सबके मन को प्रसन्न करती हुई गिरने लगी; दिव्य सुंदरियाँ नृत्य करने लगीं, श्रेष्ठ किन्नर गायन करने लगे।

श्लोक 24 (skanda.2.38.24)

तुष्टुवुर्हर्षतरलाः सुरगन्धर्वचारणाः । दृष्ट्वा ते पुण्डरीकाक्षं प्रसन्नं भक्तवत्सलम् ।

tuṣṭuvurharṣataralāḥ suragandharvacāraṇāḥ dṛṣṭvā te puṇḍarīkākṣaṁ prasannaṁ bhaktavatsalam

हर्ष से कंपित देव, गंधर्व और चारण स्तुति करने लगे; प्रसन्न, भक्तवत्सल पुण्डरीकाक्ष को देखकर,

श्लोक 25 (skanda.2.38.25)

प्रणम्य तोषयामासुः साष्टांगं विविधैस्तवैः ।

praṇamya toṣayāmāsuḥ sāṣṭāṁgaṁ vividhaistavaiḥ

वे साष्टांग प्रणाम करके विविध स्तवों से उन्हें संतुष्ट करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.2.38.26)

ब्रह्मादय ऊचुः । जय विष्णो कृपासिन्धो जय तामरसेक्षण । जय लोकैकवरद जय भक्तार्तिभञ्जन ।

brahmādaya ūcuḥ jaya viṣṇo kṛpāsindho jaya tāmarasekṣaṇa jaya lokaikavarada jaya bhaktārtibhañjana

ब्रह्मा आदि ने कहा — हे विष्णु! कृपा-सागर! आपकी जय हो, हे कमलनयन! जय हो, हे लोकों के एकमात्र वरदाता! जय हो, हे भक्तों की पीड़ा हरने वाले! जय हो!

श्लोक 27 (skanda.2.38.27)

अनन्तमक्षरं शान्तमवाङ्मनसगोचरम् । को वा भवन्तं जानाति चिदानन्दमयात्मकम् ।

anantamakṣaraṁ śāntamavāṅmanasagocaram ko vā bhavantaṁ jānāti cidānandamayātmakam

अनंत, अक्षर, शांत, वाणी और मन से परे — आपको, चिदानंदस्वरूप को, भला कौन जान सकता है?

श्लोक 28 (skanda.2.38.28)

अणोरणुतरं स्थूलात्स्थूलं सर्वान्तरस्थितम् । त्वामामनन्ति पुरुषं प्रकृतेः परमच्युतम् ।

aṇoraṇutaraṁ sthūlātsthūlaṁ sarvāntarasthitam tvāmāmananti puruṣaṁ prakṛteḥ paramacyutam

अणु से भी अणुतर, स्थूल से भी स्थूल, सबके भीतर स्थित — आपको ही वे प्रकृति से परे, अच्युत पुरुष मानते हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.38.29)

वेदान्तसाररूपं त्वां सर्वान्तर्बाह्यवर्तिनम् । को हि वर्णयितुं शक्तो मायायत्तेषु देहिषु ।

vedāntasārarūpaṁ tvāṁ sarvāntarbāhyavartinam ko hi varṇayituṁ śakto māyāyatteṣu dehiṣu

वेदांत के सार-स्वरूप, सबके भीतर-बाहर व्याप्त आपको, माया के अधीन देहधारियों में कौन वर्णन करने में समर्थ है?

श्लोक 30 (skanda.2.38.30)

भवदीयमिदं रूपं दृष्ट्वातिभयदायकम् । भयोद्विग्ना वयं सर्वे शान्तं रूपं भजस्व ह ।

bhavadīyamidaṁ rūpaṁ dṛṣṭvātibhayadāyakam bhayodvignā vayaṁ sarve śāntaṁ rūpaṁ bhajasva ha

आपके इस अत्यंत भयदायक रूप को देखकर हम सब भय से व्याकुल हैं — कृपया शांत रूप धारण कीजिए।

श्लोक 31 (skanda.2.38.31)

भरद्वाज उवाच । इति स्तुतो विरिञ्चाद्यैः प्रसन्नो गरुडध्वजः । मेघघोषप्रतिमया वाचा सादरमब्रवीत ।

bharadvāja uvāca iti stuto viriñcādyaiḥ prasanno garuḍadhvajaḥ meghaghoṣapratimayā vācā sādaramabravīta

भरद्वाज ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा आदि द्वारा स्तुति किए जाने पर, प्रसन्न गरुड़ध्वज ने मेघ-गर्जन जैसी वाणी में आदरपूर्वक कहा —

श्लोक 32 (skanda.2.38.32)

श्रीभगवानुवाच । भयावहामिमां मूर्तिमुत्सृज्याहं प्रियावहम् । शान्तं रूपं भजिष्यामि मां पश्यत निराकुलाः ।

śrībhagavānuvāca bhayāvahāmimāṁ mūrtimutsṛjyāhaṁ priyāvaham śāntaṁ rūpaṁ bhajiṣyāmi māṁ paśyata nirākulāḥ

श्रीभगवान ने कहा — इस भयावह मूर्ति को त्यागकर मैं प्रिय, शांत रूप धारण करूँगा; निराकुल होकर मुझे देखो।

श्लोक 33 (skanda.2.38.33)

इत्युक्त्वान्तर्हितो भूत्वा तस्मिन्नेव क्षणांतरे । विमाने रत्नखचिते बभूव सुखदर्शनः ।

ityuktvāntarhito bhūtvā tasminneva kṣaṇāṁtare vimāne ratnakhacite babhūva sukhadarśanaḥ

ऐसा कहकर वे अंतर्धान हो गए और उसी क्षण रत्नजड़ित विमान में सुखद-दर्शन रूप में प्रकट हुए,

श्लोक 34 (skanda.2.38.34)

चन्द्रबिम्बाननः शान्तो नीलोत्पलदलद्युतिः । सुवर्णवर्णवसनो रत्नभूषणभूषितः ।

candrabimbānanaḥ śānto nīlotpaladaladyutiḥ suvarṇavarṇavasano ratnabhūṣaṇabhūṣitaḥ

चंद्रमा के समान शांत मुख वाले, नील-कमल-दल की कांति वाले, स्वर्ण-वर्ण वस्त्र धारण किए, रत्नाभूषणों से विभूषित,

श्लोक 35 (skanda.2.38.35)

शंखचक्रगदापद्मलसत्करचतुष्टयः । तमालोक्य रमाकान्तं भूयो भूयो ववंदिरे ।

śaṁkhacakragadāpadmalasatkaracatuṣṭayaḥ tamālokya ramākāntaṁ bhūyo bhūyo vavaṁdire

शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुशोभित चार भुजाओं वाले। उन रमाकांत को देखकर सबने बार-बार वंदना की।

श्लोक 36 (skanda.2.38.36)

सन्तोषयित्वा ब्रह्मादीनभीष्टप्रतिपादनैः । अवोचद्विनयानम्रमगस्त्यं मुनिपुंगवम् ।

santoṣayitvā brahmādīnabhīṣṭapratipādanaiḥ avocadvinayānamramagastyaṁ munipuṁgavam

ब्रह्मा आदि को उनके मनोरथ पूर्ण करके संतुष्ट किया, और फिर विनयपूर्वक झुके हुए मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य से कहा —

श्लोक 37 (skanda.2.38.37)

श्रीभगवानुवाच । त्वं मुनीन्द्र व्रतैर्घोरैश्चीर्णैर्मां प्रति संप्रति । परिक्लिष्टोऽसि दास्यामि वरांस्तेऽभीप्सितान्वद ।

śrībhagavānuvāca tvaṁ munīndra vratairghoraiścīrṇairmāṁ prati saṁprati parikliṣṭo'si dāsyāmi varāṁste'bhīpsitānvada

श्रीभगवान ने कहा — हे मुनीन्द्र! अब तुम मेरे प्रति किए गए घोर व्रतों से क्लांत हो गए हो; मैं तुम्हें वर दूँगा, अपनी अभीष्ट कामनाएँ कहो।

श्लोक 38 (skanda.2.38.38)

भरद्वाज उवाच । निशम्य वाक्यं श्रीभर्तुः प्रणम्य च पुनःपुनः । स रोमाञ्चितसर्वांगः कुम्भजन्मा वचोऽब्रवीत् ।

bharadvāja uvāca niśamya vākyaṁ śrībhartuḥ praṇamya ca punaḥpunaḥ sa romāñcitasarvāṁgaḥ kumbhajanmā vaco'bravīt

भरद्वाज ने कहा — श्रीभगवान के वचन सुनकर, बार-बार प्रणाम करके, समस्त शरीर में रोमांच से भरे हुए कुंभजन्मा ने कहा —

श्लोक 39 (skanda.2.38.39)

अगस्त्य उवाच । यद्धुतं यत्तपस्तप्तं यदधीतं श्रुतं मया । तत्सर्वं सफलं जातमादृतोऽस्मि यतस्त्वया ।

agastya uvāca yaddhutaṁ yattapastaptaṁ yadadhītaṁ śrutaṁ mayā tatsarvaṁ saphalaṁ jātamādṛto'smi yatastvayā

अगस्त्य ने कहा — मैंने जो हवन किया, जो तप किया, जो अध्ययन और श्रवण किया — वह सब सफल हो गया, क्योंकि आपने मुझे सम्मानित किया है।

श्लोक 40 (skanda.2.38.40)

एषोऽहमेव धर्मात्मा त्रिषु लोकेष्वपि प्रभो । त्वां विचिन्वन्तमधुना मामन्विष्यागतोऽसि यत् ।

eṣo'hameva dharmātmā triṣu lokeṣvapi prabho tvāṁ vicinvantamadhunā māmanviṣyāgato'si yat

हे प्रभो! मैं तीनों लोकों में स्वयं धर्मात्मा हूँ, क्योंकि जब मैं आपको ढूँढ़ रहा था, तब आप स्वयं मुझे खोजते हुए आए हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.38.41)

त्वत्प्रसादात्पुरैवाहं प्राप्ताखिलमनोरथः । न पश्यामि विचिन्त्यापि प्राप्यं संप्रति माधव ।

tvatprasādātpuraivāhaṁ prāptākhilamanorathaḥ na paśyāmi vicintyāpi prāpyaṁ saṁprati mādhava

हे माधव! आपकी कृपा से पहले ही मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं; विचार करने पर भी अब मुझे कुछ और पाने योग्य नहीं दिखता।

श्लोक 42 (skanda.2.38.42)

तथापि चापलादेतत्तव विज्ञाप्यते प्रभो । त्वत्पादाम्बुजयोर्भक्तिमेवं कुरु निरन्तरम् ।

tathāpi cāpalādetattava vijñāpyate prabho tvatpādāmbujayorbhaktimevaṁ kuru nirantaram

फिर भी, हे प्रभो, चपलतावश यह निवेदन करता हूँ — मुझे अपने चरण-कमलों में निरंतर ऐसी ही भक्ति प्रदान कीजिए।

श्लोक 43 (skanda.2.38.43)

अवधारय चैतत्त्वं सुरप्रार्थनया मया । नदी सुवर्णमुखरी स्नाताघौघविनाशिनी ।

avadhāraya caitattvaṁ suraprārthanayā mayā nadī suvarṇamukharī snātāghaughavināśinī

और यह भी जानिए, जो मैं देवताओं की प्रार्थना पर निवेदन करता हूँ — सुवर्णमुखरी नदी, जो स्नान करने वालों के पाप-समूह का नाश करती है,

श्लोक 44 (skanda.2.38.44)

सा भवच्छैलकटकसमासन्ना समागता । तां कृतार्थय लोकेश त्वदनुग्रहवृत्तिभिः ।

sā bhavacchailakaṭakasamāsannā samāgatā tāṁ kṛtārthaya lokeśa tvadanugrahavṛttibhiḥ

आपके पर्वत की तलहटी के निकट आ पहुँची है; हे लोकेश! अपनी अनुग्रह-वृत्ति से उसे सफल कीजिए।

श्लोक 45 (skanda.2.38.45)

सुवर्णमुखरीतोये स्नात्वा ये वेंकटे स्थितम् । पश्यंति भुक्तिमुक्त्योस्तु भूयासुर्भाजनानि ते ।

suvarṇamukharītoye snātvā ye veṁkaṭe sthitam paśyaṁti bhuktimuktyostu bhūyāsurbhājanāni te

सुवर्णमुखरी के जल में स्नान करके जो वेंकट पर स्थित आपका दर्शन करें, वे भोग और मोक्ष दोनों के भागी बनें।

श्लोक 46 (skanda.2.38.46)

अल्पायुषो नरा मूढा ज्ञानयोगपरिच्युताः । न शक्नुवंति त्वां द्रष्टुं व्रताध्ययनकर्मभिः ।

alpāyuṣo narā mūḍhā jñānayogaparicyutāḥ na śaknuvaṁti tvāṁ draṣṭuṁ vratādhyayanakarmabhiḥ

अल्पायु, मूढ़, ज्ञान-योग से च्युत मनुष्य व्रत-अध्ययन आदि कर्मों से आपका दर्शन नहीं कर पाते।

श्लोक 47 (skanda.2.38.47)

सदास्मिन्नास्थितः शैले सर्वेषां च जगद्गुरो । प्रसादसुमुखो देव कांक्षितार्थप्रदो भव ।

sadāsminnāsthitaḥ śaile sarveṣāṁ ca jagadguro prasādasumukho deva kāṁkṣitārthaprado bhava

हे जगद्गुरु! सदा इस पर्वत पर स्थित रहकर, प्रसन्न मुख वाले होकर, सभी को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले बनिए।

श्लोक 48 (skanda.2.38.48)

श्रीभगवानुवाच । यत्प्रार्थितं त्वया विप्र तत्तथैव भविष्यति । नूनमप्रतिमा लोके मयि भक्तिः कृता त्वया ।

śrībhagavānuvāca yatprārthitaṁ tvayā vipra tattathaiva bhaviṣyati nūnamapratimā loke mayi bhaktiḥ kṛtā tvayā

श्रीभगवान ने कहा — हे विप्र! जो तुमने प्रार्थना की है, वह वैसा ही होगा; निश्चय ही तुमने मुझमें संसार में अद्वितीय भक्ति की है।

श्लोक 49 (skanda.2.38.49)

जाह्नवीव नदी सेयं सुवर्णमुखरी मुने । स्यादाशास्या सुराणां च वांछितश्रीविधायिनी ।

jāhnavīva nadī seyaṁ suvarṇamukharī mune syādāśāsyā surāṇāṁ ca vāṁchitaśrīvidhāyinī

हे मुने! यह सुवर्णमुखरी नदी जाह्नवी (गंगा) के समान देवों की भी अभिलाषा की पात्र, वांछित लक्ष्मी प्रदान करने वाली होगी।

श्लोक 50 (skanda.2.38.50)

स्वामिपुष्करिणी चेयं नदी मूर्त्या समन्विता । संक्रमिष्यति तां दिव्यां नदीं तीर्थौघसंश्रयाम् ।

svāmipuṣkariṇī ceyaṁ nadī mūrtyā samanvitā saṁkramiṣyati tāṁ divyāṁ nadīṁ tīrthaughasaṁśrayām

यह स्वामिपुष्करिणी भी मूर्तिमान होकर उस दिव्य, तीर्थ-समूह की आश्रयस्थली नदी में विलीन हो जाएगी।

श्लोक 51 (skanda.2.38.51)

वैकुण्ठनाम्नि शैलेऽस्मिन्नद्यप्रभृति सर्वदा । कृतावासो भविष्यामि मुने प्रार्थनया तव ।

vaikuṇṭhanāmni śaile'sminnadyaprabhṛti sarvadā kṛtāvāso bhaviṣyāmi mune prārthanayā tava

हे मुने! तुम्हारी प्रार्थना से, वैकुंठ नामक इस पर्वत पर मैं आज से सदा निवास करूँगा।

श्लोक 52 (skanda.2.38.52)

सुवर्णमुखरीस्नानक्षालिताघौघकर्दमाः । अस्मिन्वैकुण्ठशैले मां ये पश्यंति समाहिताः ।

suvarṇamukharīsnānakṣālitāghaughakardamāḥ asminvaikuṇṭhaśaile māṁ ye paśyaṁti samāhitāḥ

सुवर्णमुखरी में स्नान करके, पाप-रूपी मैल धुल जाने पर, जो एकाग्रचित्त होकर इस वैकुंठ पर्वत पर मुझे देखते हैं,

श्लोक 53 (skanda.2.38.53)

भुवि पुत्रादिसंपन्नाः सर्वैश्वर्यसमन्विताः । मृतास्त्रिविष्टपे भोगानाकल्पमनुभूय च ।

bhuvi putrādisaṁpannāḥ sarvaiśvaryasamanvitāḥ mṛtāstriviṣṭape bhogānākalpamanubhūya ca

वे पृथ्वी पर पुत्र आदि से संपन्न, सर्व ऐश्वर्य से युक्त होंगे, और मरणोपरांत स्वर्ग में एक कल्प तक भोग भोगकर,

श्लोक 54 (skanda.2.38.54)

पुनरावृत्तिरहितं केवलानन्दभासुरम् । मत्पदं समवाप्स्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ।

punarāvṛttirahitaṁ kevalānandabhāsuram matpadaṁ samavāpsyanti nātra kāryā vicāraṇā

पुनरावृत्ति-रहित, केवल आनंदमय मेरे पद को प्राप्त करेंगे — इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 55 (skanda.2.38.55)

मां द्रष्टुमागतान्सर्वान्प्रतीक्ष्याभीप्सितैः शुभैः । योजयिष्यामि सततं त्वद्वचोगौरवान्मुने ।

māṁ draṣṭumāgatānsarvānpratīkṣyābhīpsitaiḥ śubhaiḥ yojayiṣyāmi satataṁ tvadvacogauravānmune

हे मुने! तुम्हारे वचन के गौरव से, मुझे देखने आए सभी की प्रतीक्षा करके मैं उन्हें निरंतर उनकी अभीष्ट शुभ वस्तुओं से युक्त करूँगा।

श्लोक 56 (skanda.2.38.56)

पुत्रार्थिनां बहून्पुत्रान्धनानि च धनार्थिनाम् । तथैवारोग्यकामानां रोगशांतिं गरीयसीम् ।

putrārthināṁ bahūnputrāndhanāni ca dhanārthinām tathaivārogyakāmānāṁ rogaśāṁtiṁ garīyasīm

पुत्रार्थियों को अनेक पुत्र, धनार्थियों को धन, और आरोग्य-कामियों को महान रोग-शांति,

श्लोक 57 (skanda.2.38.57)

तीव्रापत्परिभूतानां तथैवापन्निवारणम् । दास्याम्यभीप्सितान्भोगान्दुर्लभानपि सर्वदा ।

tīvrāpatparibhūtānāṁ tathaivāpannivāraṇam dāsyāmyabhīpsitānbhogāndurlabhānapi sarvadā

तथा भीषण विपत्ति से पीड़ितों को विपत्ति-निवारण — दुर्लभ से दुर्लभ अभीष्ट भोग भी मैं सदा प्रदान करूँगा।

श्लोक 58 (skanda.2.38.58)

ये यान्कामानपेक्ष्येह प्रेक्षन्ते मां समागताः । अवाप्नुवन्ति ते सर्वे तांस्तान्कामान्न संशयः ।

ye yānkāmānapekṣyeha prekṣante māṁ samāgatāḥ avāpnuvanti te sarve tāṁstānkāmānna saṁśayaḥ

जो भी कामनाएँ लेकर यहाँ आकर मुझे देखते हैं, वे सब निःसंदेह उन्हीं-उन्हीं कामनाओं को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 59 (skanda.2.38.59)

स्थिता वा यत्र कुत्रापि मां स्मरन्ति नरोत्तमाः । ते सर्वे वाञ्छितां सिद्धिं लभन्ते मत्प्रसादतः ।

sthitā vā yatra kutrāpi māṁ smaranti narottamāḥ te sarve vāñchitāṁ siddhiṁ labhante matprasādataḥ

जहाँ कहीं भी स्थित होकर श्रेष्ठ मनुष्य मुझे स्मरण करते हैं, वे सब मेरी कृपा से वांछित सिद्धि प्राप्त करते हैं।

श्लोक 60 (skanda.2.38.60)

भरद्वाज उवाच । इत्युक्त्वा तं मुनिं देवः शंखमालोक्य भूपतिम् । शृण्वतां ब्रह्ममुख्यानामिदं वचनमब्रवीत् ।

bharadvāja uvāca ityuktvā taṁ muniṁ devaḥ śaṁkhamālokya bhūpatim śṛṇvatāṁ brahmamukhyānāmidaṁ vacanamabravīt

भरद्वाज ने कहा — यह कहकर उस मुनि से, राजा शंख की ओर देखते हुए, देव ने ब्रह्मा आदि के सुनते हुए यह वचन कहा —

श्लोक 61 (skanda.2.38.61)

श्रीभगवानुवाच । प्रीतोऽस्मि शंख भक्त्या ते वृणीष्वाभीप्सितं वरम् । ददामि वरदोऽहं ते क्रशिष्ठस्य तपस्यतः ।

śrībhagavānuvāca prīto'smi śaṁkha bhaktyā te vṛṇīṣvābhīpsitaṁ varam dadāmi varado'haṁ te kraśiṣṭhasya tapasyataḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे शंख! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो। तप से अत्यंत क्षीण हुए तुम्हें वर देने वाला मैं दूँगा।

श्लोक 62 (skanda.2.38.62)

शंख उवाच । न याचेऽन्यन्महाबाहो त्वत्पादाम्बुजसेवनात् । यां प्राप्नुवंति त्वद्भक्तास्तां याचे गतिमुत्तमाम् ।

śaṁkha uvāca na yāce'nyanmahābāho tvatpādāmbujasevanāt yāṁ prāpnuvaṁti tvadbhaktāstāṁ yāce gatimuttamām

शंख ने कहा — हे महाबाहो! आपके चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं माँगता; जो गति आपके भक्त प्राप्त करते हैं, वही उत्तम गति माँगता हूँ।

श्लोक 63 (skanda.2.38.63)

श्रीभगवानुवाच । यत्प्रार्थितं त्वया शंख तत्तथैव भविष्यति । मत्सेवायोगभव्यानामलभ्यं किमु विद्यते ।

śrībhagavānuvāca yatprārthitaṁ tvayā śaṁkha tattathaiva bhaviṣyati matsevāyogabhavyānāmalabhyaṁ kimu vidyate

श्रीभगवान ने कहा — हे शंख! जो तुमने प्रार्थना की है, वह वैसा ही होगा; मेरी सेवा में योग्य लोगों के लिए भला क्या अप्राप्य है?

श्लोक 64 (skanda.2.38.64)

आकल्पमिन्द्रलोकस्थो ह्यप्सरोगणसेवितः । भुक्त्वा बहुविधान्भोगांस्ततो मल्लोकमेष्यसि ।

ākalpamindralokastho hyapsarogaṇasevitaḥ bhuktvā bahuvidhānbhogāṁstato mallokameṣyasi

इंद्रलोक में एक कल्प तक अप्सराओं से सेवित रहकर, अनेक प्रकार के भोगों को भोगकर, तत्पश्चात तुम मेरे लोक को प्राप्त करोगे।

श्लोक 65 (skanda.2.38.65)

एवं ददौ वरानिष्टाञ्छङ्खाय पृथिवीपते । नारायणो जगद्योनिर्भजतां कल्पभूरुहः ।

evaṁ dadau varāniṣṭāñchaṅkhāya pṛthivīpate nārāyaṇo jagadyonirbhajatāṁ kalpabhūruhaḥ

इस प्रकार, भक्तों के लिए कल्पवृक्ष-स्वरूप, जगत के मूल कारण नारायण ने राजा शंख को अभीष्ट वर दिए।

श्लोक 66 (skanda.2.38.66)

ततो ब्रह्मादिकान्सर्वान्विसृज्य कमलेक्षणः । संस्तूय मानसैर्भक्त्या तत्रैवांतर्दधे प्रभुः ।

tato brahmādikānsarvānvisṛjya kamalekṣaṇaḥ saṁstūya mānasairbhaktyā tatraivāṁtardadhe prabhuḥ

फिर ब्रह्मा आदि सबको विदा करके, भक्तिपूर्वक स्तुति किए जाते हुए कमल-नेत्र प्रभु वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 67 (skanda.2.38.67)

भरद्वाज उवाच । वेंकटाद्रेः प्रभावोऽयमाख्यातो भवतेऽर्जुन । नराः पापैः प्रमुच्यंते श्रुत्वेमां पावनीं कथाम् ।

bharadvāja uvāca veṁkaṭādreḥ prabhāvo'yamākhyāto bhavate'rjuna narāḥ pāpaiḥ pramucyaṁte śrutvemāṁ pāvanīṁ kathām

भरद्वाज ने कहा — हे अर्जुन! यह वेंकटाद्रि का माहात्म्य तुम्हें कहा गया; इस पावन कथा को सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त होते हैं।

श्लोक 68 (skanda.2.38.68)

वाराहं रूपमुत्सृज्य ब्रह्मणाभ्यर्थितो हरिः । मुमोदात्राद्भुताकारो मायया मोहयञ्जगत् ।

vārāhaṁ rūpamutsṛjya brahmaṇābhyarthito hariḥ mumodātrādbhutākāro māyayā mohayañjagat

वाराह-रूप त्यागकर, ब्रह्मा द्वारा प्रार्थित हरि, अद्भुत आकार धारण कर अपनी माया से जगत को मोहित करते हुए वहाँ रमण करने लगे।

श्लोक 69 (skanda.2.38.69)

पश्चादगस्त्यशंखाभ्यां प्रार्थितः सुखदर्शनम् । ददौ नितान्तसुभगं शान्तं भोगात्मकं वपुः ।

paścādagastyaśaṁkhābhyāṁ prārthitaḥ sukhadarśanam dadau nitāntasubhagaṁ śāntaṁ bhogātmakaṁ vapuḥ

बाद में अगस्त्य और शंख द्वारा प्रार्थित होकर, उन्होंने अत्यंत सुंदर, शांत, सुखद-दर्शन भोग-रूप धारण किया।

श्लोक 70 (skanda.2.38.70)

नारायणं वेंकटाद्रिं स्वामिपुष्करिणीं तथा । इमामाख्यां च संस्मृत्य मुच्यंते पातकैर्जनाः ।

nārāyaṇaṁ veṁkaṭādriṁ svāmipuṣkariṇīṁ tathā imāmākhyāṁ ca saṁsmṛtya mucyaṁte pātakairjanāḥ

नारायण, वेंकटाद्रि, स्वामिपुष्करिणी और इस कथा का स्मरण करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 71 (skanda.2.38.71)

वेंकटाद्रिसमं स्थानं ब्रह्माण्डे नास्ति किञ्चन । वेंकटेशसमो देवो न भूतो न भविष्यति ।

veṁkaṭādrisamaṁ sthānaṁ brahmāṇḍe nāsti kiñcana veṁkaṭeśasamo devo na bhūto na bhaviṣyati

ब्रह्मांड में वेंकटाद्रि के समान कोई स्थान नहीं है; वेंकटेश के समान न कोई देव हुआ है, न होगा।

श्लोक 72 (skanda.2.38.72)

वेंकटाद्रिसमं स्थानं न भूतं न भविष्यति । स्वामितीर्थसरस्तुल्यं न कुत्रापि च विद्यते ।

veṁkaṭādrisamaṁ sthānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati svāmitīrthasarastulyaṁ na kutrāpi ca vidyate

वेंकटाद्रि के समान न कोई स्थान हुआ है, न होगा; स्वामितीर्थ के सरोवर के समान भी कहीं कुछ नहीं है।

श्लोक 73 (skanda.2.38.73)

प्रातरुत्थाय ये नित्यं वेंकटेशं स्मरंति वै । तेषां करस्था मोक्षश्रीर्नात्र कार्या विचारणा ।

prātarutthāya ye nityaṁ veṁkaṭeśaṁ smaraṁti vai teṣāṁ karasthā mokṣaśrīrnātra kāryā vicāraṇā

जो प्रातःकाल उठकर नित्य वेंकटेश का स्मरण करते हैं, उनके हाथ में मोक्ष-लक्ष्मी स्थित है — इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 74 (skanda.2.38.74)

स्वामिपुष्करिणीतीर्थे स्नात्वा सर्वात्मकं हरिम् । ये वा पश्यंति नियता वराहाचलवासिनम् ।

svāmipuṣkariṇītīrthe snātvā sarvātmakaṁ harim ye vā paśyaṁti niyatā varāhācalavāsinam

जो स्वामिपुष्करिणी तीर्थ में स्नान करके, संयमित होकर, वराहाचल-निवासी सर्वात्मक हरि का दर्शन करते हैं,

श्लोक 75 (skanda.2.38.75)

तेऽश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । प्राप्नुवंति फलं पूर्णं नात्र कार्या विचारणा ।

te'śvamedhasahasrasya vājapeyaśatasya ca prāpnuvaṁti phalaṁ pūrṇaṁ nātra kāryā vicāraṇā

वे सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञों का पूर्ण फल पाते हैं — इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 76 (skanda.2.38.76)

वेंकटाचलमाहात्म्यं ये शृण्वंति नरोत्तमाः । तेषां मुक्तिश्च भुक्तिश्च इह लोके परत्र च ।

veṁkaṭācalamāhātmyaṁ ye śṛṇvaṁti narottamāḥ teṣāṁ muktiśca bhuktiśca iha loke paratra ca

जो श्रेष्ठ मनुष्य वेंकटाचल-माहात्म्य को सुनते हैं, उन्हें इस लोक और परलोक दोनों में मुक्ति और भुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 77 (skanda.2.38.77)

वेंकटाचलमाहात्म्यं संक्षिप्य कथितं तव । अतः परं महानद्याः प्रभावः कथ्यतेऽर्जुन ।

veṁkaṭācalamāhātmyaṁ saṁkṣipya kathitaṁ tava ataḥ paraṁ mahānadyāḥ prabhāvaḥ kathyate'rjuna

हे अर्जुन! तुम्हें संक्षेप में वेंकटाचल का माहात्म्य कह दिया गया; अब इसके आगे महानदी (सुवर्णमुखरी) का प्रभाव कहा जाता है।

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