वैष्णव खण्ड · अध्याय 40
अंजना का वर-लाभ तथा आकाशगंगा-स्नानकाल-निर्णय वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.40.1)
श्रीसूत उवाच । अंजनापि वरं लब्ध्वा भर्त्रा साकं मुमोद ह । ब्रह्मादीनागतान्दृष्ट्वा विस्मयाविष्टमानसा ।
śrīsūta uvāca aṁjanāpi varaṁ labdhvā bhartrā sākaṁ mumoda ha brahmādīnāgatāndṛṣṭvā vismayāviṣṭamānasā
श्रीसूत ने कहा — वर पाकर अंजना भी अपने पति के साथ हर्षित हुई, ब्रह्मा आदि को आया देखकर उसका मन विस्मय से भर गया।
श्लोक 2 (skanda.2.40.2)
पत्या साकं ततः स्वस्था चांजना मंजुभाषिणी । ब्रह्मादिभिरनुज्ञातो व्यासो वेदविदां वरः ।
patyā sākaṁ tataḥ svasthā cāṁjanā maṁjubhāṣiṇī brahmādibhiranujñāto vyāso vedavidāṁ varaḥ
तब पति के साथ स्वस्थ होकर मंजुभाषिणी अंजना को, ब्रह्मा आदि द्वारा अनुज्ञा प्राप्त वेदज्ञों में श्रेष्ठ व्यास ने,
श्लोक 3 (skanda.2.40.3)
अञ्जना तामुवाचेदं मेघगम्भीरया गिरा ।
añjanā tāmuvācedaṁ meghagambhīrayā girā
मेघ के समान गंभीर वाणी में यह कहा।
श्लोक 4 (skanda.2.40.4)
व्यास उवाच । अञ्जने शृणु मद्वाक्यं सर्वलोकोपकारकम् । मतङ्गस्य ऋषेर्वाक्यं श्रुत्वा निर्मलचेतसा ।
vyāsa uvāca añjane śṛṇu madvākyaṁ sarvalokopakārakam mataṅgasya ṛṣervākyaṁ śrutvā nirmalacetasā
व्यास ने कहा — हे अंजने! समस्त लोकों का हितकारी मेरा वचन सुनो। मतंग ऋषि के वचन को निर्मल चित्त से सुनकर,
श्लोक 5 (skanda.2.40.5)
यस्मात्तु वेंकटं गत्वा तपः कृत्वा सुदुष्करम् । प्रसूयते त्वया पुत्रः शूरस्त्रैलोक्यविक्रमः ।
yasmāttu veṁkaṭaṁ gatvā tapaḥ kṛtvā suduṣkaram prasūyate tvayā putraḥ śūrastrailokyavikramaḥ
चूँकि वेंकट जाकर अत्यंत दुष्कर तपस्या करने से तुम्हें त्रैलोक्य-विख्यात पराक्रमी शूर पुत्र प्राप्त होगा,
श्लोक 6 (skanda.2.40.6)
इदं तीर्थोत्तमं तस्मात्प्रत्यक्षदिवसे तव । गंगाद्यानि च तीर्थानि समायांति जगत्त्रये ।
idaṁ tīrthottamaṁ tasmātpratyakṣadivase tava gaṁgādyāni ca tīrthāni samāyāṁti jagattraye
इसलिए यह उत्तम तीर्थ, तुम्हारे पुत्र के प्राकट्य-दिवस पर — गंगा आदि तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ आ मिलते हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.40.7)
वेंकटाद्रिसमं तीर्थं ब्रह्माण्डे नास्ति किञ्चन । तत्राप्यत्यन्तपुण्या वै स्वामिपुष्करिणी शुभा ।
veṁkaṭādrisamaṁ tīrthaṁ brahmāṇḍe nāsti kiñcana tatrāpyatyantapuṇyā vai svāmipuṣkariṇī śubhā
ब्रह्मांड में वेंकटाद्रि के समान कोई तीर्थ नहीं है; और वहाँ भी अत्यंत पवित्र शुभ स्वामिपुष्करिणी है।
श्लोक 8 (skanda.2.40.8)
ततोऽधिकमिदं तीर्थं प्रत्यक्षं दिवसे तव । स्नानार्थं ये समायांति चित्राऋक्षसमन्विते ।
tato'dhikamidaṁ tīrthaṁ pratyakṣaṁ divase tava snānārthaṁ ye samāyāṁti citrāṛkṣasamanvite
उससे भी बढ़कर है यह तीर्थ, तुम्हारे पुत्र के प्राकट्य-दिवस पर; जो चित्रा नक्षत्र से युक्त होने पर यहाँ स्नान के लिए आते हैं,
श्लोक 9 (skanda.2.40.9)
मेषं पूषणि संप्राप्ते पूर्णिमायां शुभे दिने । शृणु तेषां फलं देवि वक्ष्यामि तव सुव्रते ।
meṣaṁ pūṣaṇi saṁprāpte pūrṇimāyāṁ śubhe dine śṛṇu teṣāṁ phalaṁ devi vakṣyāmi tava suvrate
सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने पर, शुभ पूर्णिमा तिथि पर — उनका फल सुनो, हे देवी, मैं बताऊँगा, हे सुव्रते।
श्लोक 10 (skanda.2.40.10)
गंगादिसर्वतीर्थेषु द्वादशाब्दं वरानने । यत्फलं विद्यते देवि तत्फलं भवति धुवम् ।
gaṁgādisarvatīrtheṣu dvādaśābdaṁ varānane yatphalaṁ vidyate devi tatphalaṁ bhavati dhuvam
हे वरानने! गंगा आदि समस्त तीर्थों में बारह वर्ष तक स्नान करने से जो फल मिलता है, हे देवी, वही फल निश्चय ही यहाँ मिलता है।
श्लोक 11 (skanda.2.40.11)
दानानि कुर्वतां पुंसां तेषां शृणु फलोन्नतिम् । स्थाने तूक्तं फलं देवि विद्धि तेषां वरानने ।
dānāni kurvatāṁ puṁsāṁ teṣāṁ śṛṇu phalonnatim sthāne tūktaṁ phalaṁ devi viddhi teṣāṁ varānane
यहाँ दान करने वाले पुरुषों के फल की महिमा सुनो; हे देवी, हे वरानने, जानो कि अन्यत्र कहा गया फल यहाँ (कई गुना) है।
श्लोक 12 (skanda.2.40.12)
अञ्जनोवाच । कार्याणि यानि दानानि वेंकटाद्रौ नगोत्तमे । तानि सर्वाणि विप्रेन्द्र वद वेदविदां वर ।
añjanovāca kāryāṇi yāni dānāni veṁkaṭādrau nagottame tāni sarvāṇi viprendra vada vedavidāṁ vara
अंजना ने कहा — हे विप्रेन्द्र, वेदज्ञों में श्रेष्ठ! नगश्रेष्ठ वेंकटाद्रि पर जो-जो दान करने योग्य हैं, वे सब मुझे बताइए।
श्लोक 13 (skanda.2.40.13)
व्यास उवाच । अन्नदानं वस्त्रदानं द्वयमेतत्प्रशस्यते । पितुः श्राद्धं विशेषेण वेंकटाद्रौ नगोत्तमे ।
vyāsa uvāca annadānaṁ vastradānaṁ dvayametatpraśasyate pituḥ śrāddhaṁ viśeṣeṇa veṁkaṭādrau nagottame
व्यास ने कहा — अन्न-दान और वस्त्र-दान — ये दोनों प्रशंसनीय हैं; विशेष रूप से नगश्रेष्ठ वेंकटाद्रि पर पितृ-श्राद्ध।
श्लोक 14 (skanda.2.40.14)
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति प्रीतये मधुघातिनः । सर्वलोकं समासाद्य मोदन्ते मुनिसत्तमाः ।
suvarṇaṁ ye prayacchanti prītaye madhughātinaḥ sarvalokaṁ samāsādya modante munisattamāḥ
जो मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण दान करते हैं, वे मुनिश्रेष्ठ समस्त लोकों को प्राप्त कर आनंदित होते हैं।
श्लोक 15 (skanda.2.40.15)
शालग्रामशिलादानं ये कुर्वन्ति नगोत्तमे । अंगभंगमवाप्नोति स्वानुभूतिं च विन्दति ।
śālagrāmaśilādānaṁ ye kurvanti nagottame aṁgabhaṁgamavāpnoti svānubhūtiṁ ca vindati
जो नगश्रेष्ठ पर शालग्राम-शिला का दान करते हैं, वे देह-बंधन से मुक्ति पाकर अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.40.16)
यो ददाति द्विजेन्द्राय गोदानं च कुटुम्बिने । रोमसंख्याप्रमाणेन विष्णुलोके विराजते ।
yo dadāti dvijendrāya godānaṁ ca kuṭumbine romasaṁkhyāpramāṇena viṣṇuloke virājate
जो द्विजश्रेष्ठ गृहस्थ को गोदान देता है, वह गाय के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में शोभित होता है।
श्लोक 17 (skanda.2.40.17)
भूमिं ददाति यो देवि ब्राह्मणाय कुटुम्बिने । तस्याश्च पुण्यफलं वक्तुं कः शक्तो दिवि वा भुवि ।
bhūmiṁ dadāti yo devi brāhmaṇāya kuṭumbine tasyāśca puṇyaphalaṁ vaktuṁ kaḥ śakto divi vā bhuvi
हे देवी! जो गृहस्थ ब्राह्मण को भूमि-दान देता है, उसके पुण्य-फल को कहने में भला स्वर्ग या पृथ्वी पर कौन समर्थ है?
श्लोक 18 (skanda.2.40.18)
कन्यां ददाति यो देवि श्रोत्रियाय द्विजातये । विष्णुलोकं समासाद्य मोदते पितृभिः सह ।
kanyāṁ dadāti yo devi śrotriyāya dvijātaye viṣṇulokaṁ samāsādya modate pitṛbhiḥ saha
हे देवी! जो श्रोत्रिय द्विज को कन्यादान करता है, वह विष्णुलोक प्राप्त कर पितरों सहित आनंदित होता है।
श्लोक 19 (skanda.2.40.19)
प्रपां कुर्वन्ति ये देवि शीतलोदकसंयुताम् । तेषां पुण्यफलं वक्तुं शेषेणापि न शक्यते ।
prapāṁ kurvanti ye devi śītalodakasaṁyutām teṣāṁ puṇyaphalaṁ vaktuṁ śeṣeṇāpi na śakyate
हे देवी! जो शीतल जल से युक्त प्याऊ बनवाते हैं, उनके पुण्य-फल को कहने में स्वयं शेष भी समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.40.20)
तिलं ददाति विप्राय श्रोत्रियाय कुटुंबिने । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
tilaṁ dadāti viprāya śrotriyāya kuṭuṁbine sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati
जो श्रोत्रिय गृहस्थ ब्राह्मण को तिल-दान देता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 21 (skanda.2.40.21)
धान्यदानं प्रशंसन्ति विप्रा वेदविदां वराः । बहुपुत्रा भविष्यन्ति धान्यदानं प्रकुर्वताम् ।
dhānyadānaṁ praśaṁsanti viprā vedavidāṁ varāḥ bahuputrā bhaviṣyanti dhānyadānaṁ prakurvatām
वेदज्ञों में श्रेष्ठ ब्राह्मण धान्य-दान की प्रशंसा करते हैं; धान्य-दान करने वालों के अनेक पुत्र होते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.40.22)
गन्धचम्पकपुष्पादीञ्छत्रव्यजनचामरान् । ताम्बूलघनसारादीन्यो ददाति द्विजातये ।
gandhacampakapuṣpādīñchatravyajanacāmarān tāmbūlaghanasārādīnyo dadāti dvijātaye
जो द्विज को सुगंध, चंपा आदि पुष्प, छत्र, पंखे, चंवर, ताम्बूल, कर्पूर आदि वस्तुएँ अर्पित करता है,
श्लोक 23 (skanda.2.40.23)
भुक्त्वा भोगं चिरं कालं स्वर्गलोकं ततो व्रजेत् । दिव्यवर्षसहस्रं च भुक्त्वा भोगाननेकशः ।
bhuktvā bhogaṁ ciraṁ kālaṁ svargalokaṁ tato vrajet divyavarṣasahasraṁ ca bhuktvā bhogānanekaśaḥ
वह दीर्घकाल तक भोग भोगकर तत्पश्चात स्वर्गलोक जाता है, और सहस्र दिव्य वर्षों तक अनेक भोगों को भोगकर,
श्लोक 24 (skanda.2.40.24)
सार्वभौमस्ततो भूत्वा तत्र भुक्त्वा चिरं महीम् । ततो विप्रत्वमासाद्य वेदवेदान्तपारगः ।
sārvabhaumastato bhūtvā tatra bhuktvā ciraṁ mahīm tato vipratvamāsādya vedavedāntapāragaḥ
फिर सार्वभौम सम्राट होकर वहाँ दीर्घकाल तक पृथ्वी का भोग करके, फिर ब्राह्मणत्व पाकर वेद-वेदांत का पारगामी होकर,
श्लोक 25 (skanda.2.40.25)
ततो मुक्तिं समायाति प्रसादाच्चक्रपाणिनः । इत्येतत्कथितं देवि वेंकटाचलवैभवम् ।
tato muktiṁ samāyāti prasādāccakrapāṇinaḥ ityetatkathitaṁ devi veṁkaṭācalavaibhavam
फिर चक्रपाणि की कृपा से मुक्ति को प्राप्त होता है। हे देवी! इस प्रकार यह वेंकटाचल का वैभव कहा गया।
श्लोक 26 (skanda.2.40.26)
य एतच्छृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
ya etacchṛṇuyānnityaṁ yaścāpi parikīrtayet sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati
जो इसे नित्य सुनता है और जो इसका कीर्तन भी करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 27 (skanda.2.40.27)
इत्येतत्कथितं पूर्वं व्यासेनैव महात्मना । शृणुयाद्वा पठेद्वापि कृतकृत्यो भविष्यति ।
ityetatkathitaṁ pūrvaṁ vyāsenaiva mahātmanā śṛṇuyādvā paṭhedvāpi kṛtakṛtyo bhaviṣyati
इस प्रकार यह पूर्वकाल में महात्मा व्यास द्वारा ही कहा गया; जो इसे सुनता या पढ़ता है, वह कृतकृत्य हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.2.40.28)
तस्यैव वंशजाः सर्वे मुक्तिं यान्ति न संशयः ।
tasyaiva vaṁśajāḥ sarve muktiṁ yānti na saṁśayaḥ
उसके वंश में उत्पन्न सभी लोग मुक्ति को प्राप्त होते हैं — इसमें संदेह नहीं है।