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वैष्णव खण्ड · अध्याय 41

मुनियों का प्रश्न और पुरुषोत्तम-क्षेत्र का प्राकट्य

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (skanda.2.41.1)

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्

nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ vyāsaṁ tato jayamudīrayet

नारायण को तथा नरों में श्रेष्ठ नर को नमस्कार करके, देवी सरस्वती और व्यास जी को प्रणाम करके, तत्पश्चात् 'जय' नामक ग्रंथ का उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.2.41.2)

मुनय ऊचुः । भगवन्सर्वशास्त्रज्ञ सर्वतीर्थमहत्त्ववित् । कथितं यत्त्वया पूर्वं प्रस्तुते तीर्थकीर्तने । पुरुषोत्तमाख्यं सुमहत्क्षेत्रं परमपावनम्

munaya ūcuḥ bhagavan sarvaśāstrajña sarvatīrthamahattvavit kathitaṁ yattvayā pūrvaṁ prastute tīrthakīrtane puruṣottamākhyaṁ sumahatkṣetraṁ paramapāvanam

मुनियों ने कहा — हे भगवन्, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता, समस्त तीर्थों की महिमा के ज्ञाता! तीर्थों का वर्णन करते समय आपने पहले जिस पुरुषोत्तम नामक अत्यंत महान और परम पवित्र क्षेत्र की चर्चा की थी —

श्लोक 3 (skanda.2.41.3)

यत्रास्ते दारवतनुः श्रीशो मानुषलीलया । दर्शनान्मुक्तिदः साक्षात्सर्वतीर्थफलप्रदः

yatrāste dāravatanuḥ śrīśo mānuṣalīlayā darśanānmuktidaḥ sākṣātsarvatīrthaphalapradaḥ

— जहाँ श्रीहरि काष्ठमय शरीर में मानव-लीला के द्वारा विराजमान हैं, जो दर्शनमात्र से मुक्ति देने वाले तथा साक्षात् समस्त तीर्थों का फल देने वाले हैं —

श्लोक 4 (skanda.2.41.4)

तन्नो विस्तरतो ब्रूहि तत्क्षेत्रं केन निर्मितम् । ज्योतिःप्रकाशो भगवान्साक्षान्नारायणः प्रभुः

tanno vistarato brūhi tatkṣetraṁ kena nirmitam jyotiḥprakāśo bhagavānsākṣānnārāyaṇaḥ prabhuḥ

— उसे हमें विस्तारपूर्वक बताइए, कि वह क्षेत्र किसके द्वारा निर्मित हुआ; तथा वह भगवान् प्रभु नारायण, जो साक्षात् ज्योति-प्रकाश-स्वरूप हैं —

श्लोक 5 (skanda.2.41.5)

कथं दारुमयस्तस्मिन्नास्ते परमपूरुषः । वद त्वं वदतां श्रेष्ठ सर्वलोकगुरो मुने । श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन्परं कौतूहलं हि नः

kathaṁ dārumayastasminnāste paramapūruṣaḥ vada tvaṁ vadatāṁ śreṣṭha sarvalokaguro mune śrotumicchāmahe brahman paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

— वे परमपुरुष वहाँ काष्ठमय रूप में कैसे विराजमान हैं? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, सम्पूर्ण लोक के गुरु मुने, आप कहें; हे ब्रह्मन्, हमें यह सुनने की परम उत्कण्ठा है।

श्लोक 6 (skanda.2.41.6)

जैमिनिरुवाच । शृणुध्वं मुनयः सर्वे रहस्यं परमं हि तत्

jaiminiruvāca śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve rahasyaṁ paramaṁ hi tat

जैमिनि ने कहा — हे समस्त मुनियो, सुनिए, वह परम रहस्य है।

श्लोक 7 (skanda.2.41.7)

अवैष्णवानां श्रवणे भक्तिस्तव न जायते । यस्य संकीर्तनादेव सकलं लीयते तमः

avaiṣṇavānāṁ śravaṇe bhaktistava na jāyate yasya saṁkīrtanādeva sakalaṁ līyate tamaḥ

जो विष्णु-भक्तिविहीन हैं, उनके सुनने मात्र से भक्ति उत्पन्न नहीं होती — जिनके संकीर्तनमात्र से समस्त अंधकार विलीन हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.2.41.8)

यद्यप्येष जगन्नाथः सर्वगः सर्वभावनः । स्कन्देन कथितं पूर्वं श्रुत्वा शंभोर्मुखाम्बुजात् । संति क्षेत्राणि चान्यानि सर्वपापहराणि वै

yadyapyeṣa jagannāthaḥ sarvagaḥ sarvabhāvanaḥ skandena kathitaṁ pūrvaṁ śrutvā śaṁbhormukhāmbujāt santi kṣetrāṇi cānyāni sarvapāpaharāṇi vai

यद्यपि यह भगवान् जगन्नाथ सर्वव्यापी और सबके अंतःकरण में विद्यमान हैं — जो पहले भगवान् शंभु के मुखकमल से सुनकर स्कन्द द्वारा कहा गया — फिर भी अन्य अनेक क्षेत्र भी हैं जो समस्त पापों का हरण करने वाले हैं,

श्लोक 9 (skanda.2.41.9)

एतत्क्षेत्रं परं चास्य वपुर्भूतं महात्मनः । स्वयं वपुष्मांस्तत्रास्ते स्वनाम्ना ख्यापितं हि तत्

etatkṣetraṁ paraṁ cāsya vapurbhūtaṁ mahātmanaḥ svayaṁ vapuṣmāṁstatrāste svanāmnā khyāpitaṁ hi tat

किन्तु यह क्षेत्र उन महात्मा का साक्षात् उत्कृष्ट शरीर ही है; वे स्वयं देहधारी होकर वहाँ विराजमान हैं, और वह क्षेत्र उन्हीं के नाम से विख्यात है।

श्लोक 10 (skanda.2.41.10)

तत्र ये स्थातुमिच्छंति तेपि सर्वे हतांहसः । किं पुनस्तव तिष्ठंतो ये पश्यन्ति गदाधरम्

tatra ye sthātumicchanti tepi sarve hatāṁhasaḥ kiṁ punastava tiṣṭhanto ye paśyanti gadādharam

वहाँ जो निवास करने की इच्छामात्र रखते हैं, वे भी सब पापरहित हो जाते हैं; फिर जो वहाँ रहकर गदाधर का दर्शन करते हैं, उनकी तो बात ही क्या!

श्लोक 11 (skanda.2.41.11)

अहो तत्परमं क्षेत्रं विस्तृतं दशयोजनम् । तीर्थराजस्य सलिलादुत्थितं वालुकाचितम्

aho tatparamaṁ kṣetraṁ vistṛtaṁ daśayojanam tīrtharājasya salilādutthitaṁ vālukācitam

अहो, वह परम क्षेत्र दस योजन विस्तृत है, तीर्थराज (समुद्र) के जल से उठा हुआ, बालुका से आच्छादित है।

श्लोक 12 (skanda.2.41.12)

नीलाचलेन महता मध्यस्थेन विराजितम् । एकस्तनमिव पृथ्व्याः सुदूरात्परिभावितम्

nīlācalena mahatā madhyasthena virājitam ekastanamiva pṛthvyāḥ sudūrātparibhāvitam

जो मध्य में स्थित महान नीलाचल पर्वत से सुशोभित है, जो दूर से देखने पर पृथ्वी के एक स्तन के समान प्रतीत होता है।

श्लोक 13 (skanda.2.41.13)

वराहरूपिणा पूर्वं समुद्धृत्य वसुन्धराम् । सर्वतः सुसमां कृत्वा पर्वतैः सुस्थिरीकृताम्

varāharūpiṇā pūrvaṁ samuddhṛtya vasundharām sarvataḥ susamāṁ kṛtvā parvataiḥ susthirīkṛtām

पूर्वकाल में वराह-रूप धारण करके पृथ्वी का उद्धार करके, उसे सर्वत्र समतल बनाकर, पर्वतों के द्वारा उसे सुस्थिर करके —

श्लोक 14 (skanda.2.41.14)

सृष्ट्वा चराचरं सर्वं तीर्थानि सरिदब्धिकान् । क्षेत्राणि च यथास्थानं संनिवेश्य यथा पुरा

sṛṣṭvā carācaraṁ sarvaṁ tīrthāni saridabdhikān kṣetrāṇi ca yathāsthānaṁ saṁniveśya yathā purā

— समस्त चराचर जगत्, तीर्थों, नदियों और समुद्रों की सृष्टि करके, तथा पूर्वकाल के समान क्षेत्रों को यथास्थान स्थापित करके,

श्लोक 15 (skanda.2.41.15)

ब्रह्मा विचिन्तयामास सृष्टिभारनिपीडितः । पुनरेतां क्रियां गुर्वीं नारभेय कथं त्विति

brahmā vicintayāmāsa sṛṣṭibhāranipīḍitaḥ punaretāṁ kriyāṁ gurvīṁ nārabheya kathaṁ tviti

सृष्टि के भार से पीड़ित ब्रह्मा जी ने विचार किया — 'मैं इस भारी कार्य को पुनः किस प्रकार आरम्भ न करूँ?'

श्लोक 16 (skanda.2.41.16)

तापत्रयाभिभूता हि मुच्यंते जंतवः कथम् । एवं चिन्तयमानस्य मतिरासीत्प्रजापतेः

tāpatrayābhibhūtā hi mucyante jantavaḥ katham evaṁ cintayamānasya matirāsītprajāpateḥ

'त्रिविध तापों से पीड़ित प्राणी किस प्रकार मुक्त हो सकते हैं?' इस प्रकार चिंतन करते हुए प्रजापति के मन में यह विचार उदित हुआ —

श्लोक 17 (skanda.2.41.17)

मुक्त्येककारणं विष्णुं स्तोष्येऽहं परमेश्वरम् । ब्रह्मोवाच । नमस्ते जगदाधार शङ्खचक्रगदाधर

muktyekakāraṇaṁ viṣṇuṁ stoṣye'haṁ parameśvaram brahmovāca namaste jagadādhāra śaṅkhacakragadādhara

'मैं मुक्ति के एकमात्र कारण परमेश्वर विष्णु की स्तुति करूँगा।' ब्रह्मा जी ने कहा — हे जगदाधार, शंख-चक्र-गदाधारी, आपको नमस्कार है।

श्लोक 18 (skanda.2.41.18)

यन्नाभिपंकजादेव जातोऽहं विश्वसृष्टिकृत् । परमार्थस्वरूपं ते त्वं वै वेत्सि जगन्मय

yannābhipaṅkajādeva jāto'haṁ viśvasṛṣṭikṛt paramārthasvarūpaṁ te tvaṁ vai vetsi jaganmaya

जिनके नाभिकमल से ही मैं, विश्व की सृष्टि करने वाला, उत्पन्न हुआ — हे जगन्मय! आपके परमार्थ-स्वरूप को आप ही जानते हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.41.19)

यन्मायया जगत्सर्वं निर्मितं महदादिकम् । यन्निःश्वाससमुद्भूतं शब्दब्रह्म त्रिधाऽभवत्

yanmāyayā jagatsarvaṁ nirmitaṁ mahadādikam yanniḥśvāsasamudbhūtaṁ śabdabrahma tridhā'bhavat

जिनकी माया से महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत् निर्मित हुआ, जिनके निःश्वास से उत्पन्न शब्दब्रह्म तीन प्रकार का हुआ,

श्लोक 20 (skanda.2.41.20)

उपजीव्य तदेवाहमसृजं भुवनानि वै । त्वत्तो नान्यः स्थूलसूक्ष्मदीर्घह्रस्वादि किंचन

upajīvya tadevāhamasṛjaṁ bhuvanāni vai tvatto nānyaḥ sthūlasūkṣmadīrghahrasvādi kiṁcana

— उसी का आश्रय लेकर मैंने भुवनों की सृष्टि की। आपसे भिन्न स्थूल, सूक्ष्म, दीर्घ, ह्रस्व आदि कुछ भी नहीं है।

श्लोक 21 (skanda.2.41.21)

विकारभेदैर्भगवंस्त्वमेवेदं चराचरम् । कटकादि यथा स्वर्णं गुणत्रयविभागशः

vikārabhedairbhagavaṁstvamevedaṁ carācaram kaṭakādi yathā svarṇaṁ guṇatrayavibhāgaśaḥ

हे भगवन्! विकार के भेदों से आप ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् हैं — जैसे कड़ा आदि आभूषण सुवर्ण ही हैं — त्रिगुण के विभाग के अनुसार।

श्लोक 22 (skanda.2.41.22)

स्रष्टा सृज्यं त्वमेवात्र पोष्टा पोष्यं जगत्प्रभो । आधारो ध्रियमाणं च धर्त्ता त्वं परमेश्वर

sraṣṭā sṛjyaṁ tvamevātra poṣṭā poṣyaṁ jagatprabho ādhāro dhriyamāṇaṁ ca dharttā tvaṁ parameśvara

हे जगत्प्रभो! आप ही यहाँ सृष्टा और सृज्य, पोषक और पोष्य हैं; हे परमेश्वर! आप ही आधार, आधेय और धारण करने वाले भी हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.41.23)

त्वत्प्रेरितमतिः सर्वश्चरते च शुभाऽशुभम् । ततः प्राप्नोति सदृशीं त्वयैव विहितां गतिम्

tvatpreritamatiḥ sarvaścarate ca śubhā'śubham tataḥ prāpnoti sadṛśīṁ tvayaiva vihitāṁ gatim

आपकी प्रेरणा से ही सबकी बुद्धि शुभ-अशुभ कर्मों में प्रवृत्त होती है, और तत्पश्चात् आपके ही द्वारा विहित सदृश गति को प्राप्त करती है।

श्लोक 24 (skanda.2.41.24)

जगतोऽस्य गतिर्भर्त्ता साक्षी त्वं परमेश्वर । चराचरगुरो सर्वजीवभूत कृपामय । प्रसीदाद्य जगन्नाथ नित्यं त्वच्छरण्यस्य मे

jagato'sya gatirbharttā sākṣī tvaṁ parameśvara carācaraguro sarvajīvabhūta kṛpāmaya prasīdādya jagannātha nityaṁ tvaccharaṇyasya me

हे परमेश्वर! आप ही इस जगत् की गति, स्वामी और साक्षी हैं; हे चराचर के गुरु, समस्त जीवों पर कृपा करने वाले! हे जगन्नाथ! अपनी शरण में सदा रहने वाले मुझ पर अभी प्रसन्न हों।

श्लोक 25 (skanda.2.41.25)

जैमिनिरुवाच । एवं संस्तूयमानश्च ब्रह्मणा गरुडध्वजः । नीलजीमूतसंकाशः शंखचक्रादिचिह्नितः

jaiminiruvāca evaṁ saṁstūyamānaśca brahmaṇā garuḍadhvajaḥ nīlajīmūtasaṁkāśaḥ śaṁkhacakrādicihnitaḥ

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा स्तुति किए जाने पर, गरुड़ध्वज भगवान्, नीलमेघ के समान श्यामवर्ण, शंख-चक्र आदि से चिह्नित —

श्लोक 26 (skanda.2.41.26)

पतगेंद्रसमारूढः स्फुरद्वदनपंकजः । आविरासीद्द्विजश्रेष्ठा विवक्षुः स्फुरिताधरः

patageṁdrasamārūḍhaḥ sphuradvadanapaṁkajaḥ āvirāsīddvijaśreṣṭhā vivakṣuḥ sphuritādharaḥ

— पक्षिराज गरुड़ पर आरूढ़, दीप्तिमान कमल-मुख वाले, हे द्विजश्रेष्ठो, बोलने की इच्छा से कुछ कंपित अधरों सहित प्रकट हुए।

श्लोक 27 (skanda.2.41.27)

श्रीभगवानुवाच । यदर्थं मां स्तुषे ब्रह्मन्न शक्यः प्रतिभाति सः

śrībhagavānuvāca yadarthaṁ māṁ stuṣe brahmanna śakyaḥ pratibhāti saḥ

श्रीभगवान् ने कहा — हे ब्रह्मन्! जिस प्रयोजन के लिए तुम मेरी स्तुति करते हो, वह सुगमता से सम्भव प्रतीत नहीं होता।

श्लोक 28 (skanda.2.41.28)

अनाद्यविद्या सुदृढा सुश्छेद्या कर्मबंधनैः । प्रभवंत्यां कथं तस्यां ह्रीयेते मृतिजन्मनी

anādyavidyā sudṛḍhā suśchedyā karmabaṁdhanaiḥ prabhavaṁtyāṁ kathaṁ tasyāṁ hrīyete mṛtijanmanī

अनादि अविद्या अत्यंत दृढ़ है, कर्म-बंधनों के द्वारा उसे काटना कठिन है; उसके प्रबल रहते हुए जन्म और मृत्यु किस प्रकार क्षीण हो सकते हैं?

श्लोक 29 (skanda.2.41.29)

तथापि चेदत्र कृते व्यवसायस्तवानघ । क्रमेण येन हि भवेत्तत्ते वक्ष्यामि कारणम्

tathāpi cedatra kṛte vyavasāyastavānagha krameṇa yena hi bhavettatte vakṣyāmi kāraṇam

तथापि, हे निष्पाप! चूँकि तुमने इस विषय में निश्चय कर ही लिया है, अतः जिस क्रम से यह हो सके, वह उपाय मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 30 (skanda.2.41.30)

अहं त्वं त्वमहं ब्रह्मन्मन्मयं चाखिलं जगत् । चिस्ते यत्र मे तत्र नान्यथेति विचारय

ahaṁ tvaṁ tvamahaṁ brahmanmanmayaṁ cākhilaṁ jagat ciste yatra me tatra nānyatheti vicāraya

हे ब्रह्मन्! मैं तुम हूँ, तुम मैं हो; सम्पूर्ण जगत् मुझसे ही व्याप्त है। जहाँ तुम्हारा चित्त हो, वहीं मैं हूँ — ऐसा ही जानो, अन्यथा नहीं।

श्लोक 31 (skanda.2.41.31)

सागरस्योत्तरे तीरे महानद्यास्तु दक्षिणे । स प्रदेशः पृथिव्यां हि सर्वतीर्थफलप्रदः

sāgarasyottare tīre mahānadyāstu dakṣiṇe sa pradeśaḥ pṛthivyāṁ hi sarvatīrthaphalapradaḥ

समुद्र के उत्तरी तट पर और महानदी के दक्षिण में, वह प्रदेश पृथ्वी पर समस्त तीर्थों का फल देने वाला है।

श्लोक 32 (skanda.2.41.32)

तत्र ये मनुजा ब्रह्मन्निवसंति सुबुद्धयः । जन्मांतरकृतानां च पुण्यानां फलभागिनः

tatra ye manujā brahmannivasaṁti subuddhayaḥ janmāṁtarakṛtānāṁ ca puṇyānāṁ phalabhāginaḥ

हे ब्रह्मन्! वहाँ जो सुबुद्धि मनुष्य निवास करते हैं, वे पूर्वजन्मों में किए गए पुण्यों के फल के भागी होते हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.41.33)

नाल्पपुण्याः प्रजायंते नाभक्ता मयि पद्मज । एकाम्रकाननाद्यावद्दक्षिणोदधितीरभूः

nālpapuṇyāḥ prajāyaṁte nābhaktā mayi padmaja ekāmrakānanādyāvaddakṣiṇodadhitīrabhūḥ

हे पद्मज! अल्प पुण्य वाले तथा मुझमें अभक्त, वहाँ जन्म नहीं लेते — एकाम्रकानन से लेकर दक्षिण समुद्र के तटवर्ती भूमि तक।

श्लोक 34 (skanda.2.41.34)

पदात्पदाच्छ्रेष्ठतमः क्रमात्परमपावनः । सिन्धुतीरं तु यो बह्मन्राजते नीलपर्वतः

padātpadācchreṣṭhatamaḥ kramātparamapāvanaḥ sindhutīraṁ tu yo bahmanrājate nīlaparvataḥ

पद-पद पर वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर होता जाता है, क्रमशः परम पवित्र, जहाँ सिन्धु के तट पर, हे ब्रह्मन्, नीलपर्वत सुशोभित होता है।

श्लोक 35 (skanda.2.41.35)

पृथिव्यां गोपितं स्थानं तव चापि सुदुर्लभम् । सुरासुराणां दुर्ज्ञेयं माययाछादितं मम

pṛthivyāṁ gopitaṁ sthānaṁ tava cāpi sudurlabham surāsurāṇāṁ durjñeyaṁ māyayāchāditaṁ mama

पृथ्वी पर वह स्थान गुप्त है, तुम्हारे लिए भी दुर्लभ है, देवों और असुरों के लिए दुर्ज्ञेय है, मेरी माया से आच्छादित है।

श्लोक 36 (skanda.2.41.36)

सर्वसंगपरित्यक्तस्तत्र तिष्ठामि देहभृत् । क्षराक्षरावतिक्रम्य वर्त्तेऽहं पुरुषोत्तमे

sarvasaṁgaparityaktastatra tiṣṭhāmi dehabhṛt kṣarākṣarāvatikramya vartte'haṁ puruṣottame

सर्वसंग का परित्याग करके मैं वहाँ देहधारी रूप में निवास करता हूँ; क्षर और अक्षर दोनों से परे होकर मैं पुरुषोत्तम में विराजमान हूँ।

श्लोक 37 (skanda.2.41.37)

सृष्ट्या लयेन नाक्रान्तं क्षेत्रं मे पुरुषोत्तमम् । यथा मां पश्यसि ब्रह्मन्रूपं चक्रादिचिह्नितम्

sṛṣṭyā layena nākrāntaṁ kṣetraṁ me puruṣottamam yathā māṁ paśyasi brahmanrūpaṁ cakrādicihnitam

मेरा पुरुषोत्तम क्षेत्र सृष्टि और प्रलय से अनाक्रांत है। हे ब्रह्मन्! जैसे तुम अभी मुझे चक्र आदि से चिह्नित इस रूप में देख रहे हो,

श्लोक 38 (skanda.2.41.38)

ईदृशं तत्र गत्वैव द्रक्ष्यसे मां पितामह । नीलाद्रेरंतरभुवि कल्पन्यग्रोधमूलतः

īdṛśaṁ tatra gatvaiva drakṣyase māṁ pitāmaha nīlādreraṁtarabhuvi kalpanyagrodhamūlataḥ

— हे पितामह! वहाँ जाकर तुम मुझे ठीक इसी रूप में देखोगे — नीलाद्रि के भीतर, कल्पवृक्ष-न्यग्रोध (बरगद) के मूल में।

श्लोक 39 (skanda.2.41.39)

वारुण्यां दिशि यत्कुण्डं रौहिणं नाम विश्रुतम् । तत्तीरे निवसन्तं मां पश्यन्तश्चर्मचक्षुषा

vāruṇyāṁ diśi yatkuṇḍaṁ rauhiṇaṁ nāma viśrutam tattīre nivasantaṁ māṁ paśyantaścarmacakṣuṣā

पश्चिम दिशा में जो कुण्ड है, रौहिण नाम से विख्यात, उसके तट पर निवास करते हुए मुझे चर्मचक्षुओं से देखने वाले —

श्लोक 40 (skanda.2.41.40)

तदम्भसा क्षीणपापा मम सायुज्यमाप्नुयुः । तत्र व्रज महाभाग दृष्ट्वा मां ध्यायतस्तव

tadambhasā kṣīṇapāpā mama sāyujyamāpnuyuḥ tatra vraja mahābhāga dṛṣṭvā māṁ dhyāyatastava

— उस जल से पापरहित होकर मेरे साथ सायुज्य प्राप्त करते हैं। हे महाभाग! वहाँ जाओ; मुझे देखकर, ध्यान करते हुए तुम्हारे लिए —

श्लोक 41 (skanda.2.41.41)

प्रकाशं यास्यते तस्य क्षेत्रस्य महिमाऽपरः । आश्चर्यभूतः परमस्तवापि च भविष्यति

prakāśaṁ yāsyate tasya kṣetrasya mahimā'paraḥ āścaryabhūtaḥ paramastavāpi ca bhaviṣyati

— उस क्षेत्र की और भी महिमा प्रकट होगी, जो तुम्हारे लिए भी परम आश्चर्यजनक होगी।

श्लोक 42 (skanda.2.41.42)

श्रुतिस्मृतीहासपुराणगोपितं मन्मायया तन्न हि कस्य गोचरम् । प्रसादतो मे स्तुवतस्तवाधुना प्रकाशमायास्यति सर्वगोचरम्

śrutismṛtīhāsapurāṇagopitaṁ manmāyayā tanna hi kasya gocaram prasādato me stuvatastavādhunā prakāśamāyāsyati sarvagocaram

श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में जो मेरी माया से गुप्त है, वह किसी के भी दृष्टिगोचर नहीं है; परंतु अब मेरी कृपा से, तुम्हारी स्तुति के फलस्वरूप, वह सबके लिए प्रकाशित होगा।

श्लोक 43 (skanda.2.41.43)

व्रतेषु तीर्थेषु च यज्ञदानयोः पुण्यं यदुक्तं विमलात्मनां हि तत् । अहर्निवासाल्लभतेऽत्र सर्वं निःश्वास वासात्खलु चाश्वमेधिकम्

vrateṣu tīrtheṣu ca yajñadānayoḥ puṇyaṁ yaduktaṁ vimalātmanāṁ hi tat aharnivāsāllabhate'tra sarvaṁ niḥśvāsa vāsātkhalu cāśvamedhikam

व्रतों, तीर्थों तथा यज्ञ-दान में जो पुण्य निर्मल आत्मा वालों के लिए कहा गया है, वह सब यहाँ एक दिन के निवास मात्र से प्राप्त होता है; और मात्र एक श्वास काल के निवास से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (skanda.2.41.44)

इत्यादिश्य विधिं विप्रास्तदासौ पुरुषोत्तमः । पश्यतस्तस्य तत्रैव प्रभुरन्तरधीयत

ityādiśya vidhiṁ viprāstadāsau puruṣottamaḥ paśyatastasya tatraiva prabhurantaradhīyata

हे विप्रो! इस प्रकार विधि का उपदेश देकर, वे पुरुषोत्तम प्रभु उसके देखते-देखते वहीं अंतर्धान हो गए।

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42