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वैष्णव खण्ड · अध्याय 42

यम की स्तुति और लक्ष्मी का उपदेश

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

श्लोक 1 (skanda.2.42.1)

जैमिनिरुवाच । ततो ब्रह्मागमत्तूर्णं यत्रास्ते भगवान्स्वयम् । स्तवान्तेऽसौ यथा दृष्टस्तथाद्राक्षीत्प्रभुं तदा

jaiminiruvāca tato brahmāgamattūrṇaṁ yatrāste bhagavānsvayam stavānte'sau yathā dṛṣṭastathādrākṣītprabhuṁ tadā

जैमिनि ने कहा — तत्पश्चात् ब्रह्मा जी शीघ्र वहाँ पहुँचे जहाँ भगवान् स्वयं विराजमान थे; स्तुति के अंत में जैसा दर्शन हुआ था, उसी प्रकार उन्होंने तब प्रभु को देखा।

श्लोक 2 (skanda.2.42.2)

प्रत्यभिज्ञानसंहृष्टस्तं दृष्ट्वा परमेश्वरम् । अत्यद्भुतज्ञाननिधिर्बभूवासौ द्विजोत्तमाः

pratyabhijñānasaṁhṛṣṭastaṁ dṛṣṭvā parameśvaram atyadbhutajñānanidhirbabhūvāsau dvijottamāḥ

पहचान के आनंद से हर्षित होकर, उस परमेश्वर को देखकर, हे द्विजोत्तमो, वे अत्यंत अद्भुत ज्ञान के भंडार बन गए।

श्लोक 3 (skanda.2.42.3)

यावत्स्तोतुं समारेभे हर्षसंफुल्ललोचनः । तावदेव समागत्य कुतश्चिद्वायसोत्तमः

yāvatstotuṁ samārebhe harṣasaṁphullalocanaḥ tāvadeva samāgatya kutaścidvāyasottamaḥ

ज्यों ही वे हर्ष से खिले नेत्रों के साथ स्तुति करने को उद्यत हुए, त्यों ही कहीं से एक श्रेष्ठ कौआ वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 4 (skanda.2.42.4)

कारुण्योदकसंपूर्णे तस्मिन्कुण्डे निमज्य तम् । विलोक्य माधवं नीलरत्नकांतिं कृपानिधिम्

kāruṇyodakasaṁpūrṇe tasminkuṇḍe nimajya tam vilokya mādhavaṁ nīlaratnakāntiṁ kṛpānidhim

करुणा के जल से परिपूर्ण उस कुण्ड में डुबकी लगाकर, नीलरत्न-सी कांति वाले कृपानिधि माधव को देखकर,

श्लोक 5 (skanda.2.42.5)

काकदेहं समुत्सृज्य लुठमानो मुहुः क्षितौ । शंखचक्रगदापाणिस्तस्य पार्श्वे व्यवस्थितः

kākadehaṁ samutsṛjya luṭhamāno muhuḥ kṣitau śaṅkhacakragadāpāṇistasya pārśve vyavasthitaḥ

— काकदेह त्यागकर, बार-बार पृथ्वी पर लोटता हुआ, वह शंख-चक्र-गदा हाथों में धारण किए हुए उनके पार्श्व में स्थित हो गया।

श्लोक 6 (skanda.2.42.6)

तिरश्चस्तां गतिं दृष्ट्वा योगींद्राणां सुदुर्लभाम् । मेनेऽसौ मुनयः सृष्टिः क्रमात्क्षीणा भविष्यति

tiraścastāṁ gatiṁ dṛṣṭvā yogīndrāṇāṁ sudurlabhām mene'sau munayaḥ sṛṣṭiḥ kramātkṣīṇā bhaviṣyati

योगींद्रों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ ऐसी गति एक तिर्यक् (पशु) में देखकर, मुनियों को यह प्रतीत हुआ कि सृष्टि क्रमशः क्षीण हो जाएगी —

श्लोक 7 (skanda.2.42.7)

मनुष्याधिकृते मुक्तौ वेदांते संशयोऽभवत् । न किंचिद्दुर्लभं चेह विष्णुभक्तस्य विद्यते

manuṣyādhikṛte muktau vedānte saṁśayo'bhavat na kiṁciddurlabhaṁ ceha viṣṇubhaktasya vidyate

— क्योंकि इससे वेदांत के इस वचन में संशय उत्पन्न हो गया कि मुक्ति केवल मनुष्यों का अधिकार है; यहाँ विष्णुभक्त के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.2.42.8)

प्रत्यक्षोऽभूद्द्विजश्रेष्ठाः पुराणपुरुषोदिते । संकीर्त्य यन्नाम नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते

pratyakṣo'bhūddvijaśreṣṭhāḥ purāṇapuruṣodite saṁkīrtya yannāma naraḥ sarvapāpaiḥ pramucyate

हे द्विजश्रेष्ठो! पुराणपुरुष द्वारा पूर्व में जो कहा गया था कि जिनका नाम-संकीर्तन करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, वह यहाँ साक्षात् प्रत्यक्ष हो गया।

श्लोक 9 (skanda.2.42.9)

तस्य संदर्शने विप्रा मुक्तिः किं खलु दुर्लभा । मनसा ध्याययन्विष्णुं त्यजन्प्राणान्विमुच्यते

tasya saṁdarśane viprā muktiḥ kiṁ khalu durlabhā manasā dhyāyayanviṣṇuṁ tyajanprāṇānvimucyate

हे विप्रो! उनके दर्शनमात्र से मुक्ति भला दुर्लभ कैसे हो सकती है? जो मन से विष्णु का ध्यान करते हुए प्राण त्यागता है, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 10 (skanda.2.42.10)

साक्षात्कृतो भगवतः किं चित्रं मुक्तिमेति यत् । पुरुषोत्तमसंज्ञस्य क्षेत्रस्य महिमाद्भुतः

sākṣātkṛto bhagavataḥ kiṁ citraṁ muktimeti yat puruṣottamasaṁjñasya kṣetrasya mahimādbhutaḥ

भगवान् का साक्षात्कार पाकर कोई मुक्ति को प्राप्त हो — इसमें क्या आश्चर्य है? यही तो पुरुषोत्तम नामक क्षेत्र की अद्भुत महिमा है।

श्लोक 11 (skanda.2.42.11)

यत्र काकोऽपि च हरिं साक्षात्पश्यति भो द्विजाः । सुदुर्लभं क्षेत्रमिदमज्ञानां च विमोचनम् । अहो क्षेत्रस्य माहात्म्यं काकस्यापि विमुक्तिदम् । किं पुनः सततं शांति वैराग्यज्ञानसंयुजाम्

yatra kāko'pi ca hariṁ sākṣātpaśyati bho dvijāḥ sudurlabhaṁ kṣetramidamajñānāṁ ca vimocanam aho kṣetrasya māhātmyaṁ kākasyāpi vimuktidam kiṁ punaḥ satataṁ śāntiṁ vairāgyajñānasaṁyujām

जहाँ, हे द्विजो, कौआ भी साक्षात् हरि का दर्शन करता है — यह अत्यंत दुर्लभ क्षेत्र अज्ञानियों को भी मुक्त कर देता है। अहो, इस क्षेत्र की महिमा जो कौए को भी विमुक्ति दे देती है — फिर जो सदा शांति, वैराग्य और ज्ञान से युक्त हैं, उनकी तो बात ही क्या!

श्लोक 12 (skanda.2.42.12)

ऋषय ऊचुः । नीलाख्यं माधवं दृष्ट्वा किं चकार पितामहः

ṛṣaya ūcuḥ nīlākhyaṁ mādhavaṁ dṛṣṭvā kiṁ cakāra pitāmahaḥ

ऋषियों ने कहा — नीलवर्ण माधव को देखकर पितामह ब्रह्मा ने क्या किया?

श्लोक 13 (skanda.2.42.13)

तद्दर्शने क्षणान्नष्टदेहबन्धं च वायसम्

taddarśane kṣaṇānnaṣṭadehabandhaṁ ca vāyasam

और उनके दर्शन से क्षणभर में जिस कौए का देह-बंधन नष्ट हो गया, [उसका क्या हुआ]?

श्लोक 14 (skanda.2.42.14)

जैमिनिरुवाच । अत्यद्भुतमयं दृष्ट्वा यावद्ध्यायति माधवम् । तावत्पितृपतिः स्वाधिकारसंयमनाकुलः

jaiminiruvāca atyadbhutamayaṁ dṛṣṭvā yāvaddhyāyati mādhavam tāvatpitṛpatiḥ svādhikārasaṁyamanākulaḥ

जैमिनि ने कहा — जब तक ब्रह्मा इस अत्यंत अद्भुत दृश्य को देखकर माधव का ध्यान करते रहे, तब तक पितरों के स्वामी यम, अपने अधिकार के संयमन से व्याकुल होकर,

श्लोक 15 (skanda.2.42.15)

दीनाननो निःश्वसन्वै तत्र यातस्त्वरान्वितः । नीलाद्रौ माधवं दृष्ट्वा साऽष्टांगं प्रणिपत्य च । तुष्टाव स जगन्नाथं स्वाधिकारदृढस्थितौ

dīnānano niḥśvasanvai tatra yātastvarānvitaḥ nīlādrau mādhavaṁ dṛṣṭvā sāṣṭāṅgaṁ praṇipatya ca tuṣṭāva sa jagannāthaṁ svādhikāradṛḍhasthitau

— दीन मुख से निःश्वास लेते हुए वे वहाँ शीघ्रतापूर्वक गए; नीलाद्रि पर माधव को देखकर उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया, और अपने अधिकार में दृढ़ रहते हुए जगन्नाथ की स्तुति की।

श्लोक 16 (skanda.2.42.16)

यम उवाच । नमस्ते देवदेवेश सृष्टिस्थित्यन्तकारण

yama uvāca namaste devadeveśa sṛṣṭisthityantakāraṇa

यम ने कहा — हे देवदेवेश! सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारण, आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.2.42.17)

त्वयि प्रोतमिदं सर्वं सूत्रे मणिगणा यथा । त्वया धृतं त्वया सृष्टं त्वया चाप्यायितं जगत्

tvayi protamidaṁ sarvaṁ sūtre maṇigaṇā yathā tvayā dhṛtaṁ tvayā sṛṣṭaṁ tvayā cāpyāyitaṁ jagat

जैसे सूत्र में मणियों की माला पिरोई रहती है, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् आपमें पिरोया हुआ है; यह आपके द्वारा धारण किया गया, आपके द्वारा सृजित, और आपके ही द्वारा पोषित है।

श्लोक 18 (skanda.2.42.18)

चन्द्रसूर्यादिरूपेण नित्यं भासयसेऽखिलम् । विश्वेश्वरं जगद्योनिं विश्वावासं जगद्गुरुम्

candrasūryādirūpeṇa nityaṁ bhāsayase'khilam viśveśvaraṁ jagadyoniṁ viśvāvāsaṁ jagadgurum

चंद्र-सूर्य आदि रूपों से आप नित्य समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं — विश्वेश्वर, जगत् के मूल कारण, विश्व के आवास, तथा जगद्गुरु —

श्लोक 19 (skanda.2.42.19)

विश्वसाक्षिणमाद्यन्तवर्जितं प्रणमाम्यहम् । नमः परमकारुण्यजलसंभृतसिन्धवे

viśvasākṣiṇamādyantavarjitaṁ praṇamāmyaham namaḥ paramakāruṇyajalasaṁbhṛtasindhave

— विश्व के साक्षी, आदि-अंत रहित, आपको मैं प्रणाम करता हूँ। परम करुणा के जल से भरे सिंधु-स्वरूप को नमस्कार है,

श्लोक 20 (skanda.2.42.20)

परापरपरातीतविभवे विश्वसंभवे

parāparaparātītavibhave viśvasaṁbhave

— जिनका वैभव पर और अपर दोनों से परे है, जो विश्व की उत्पत्ति के कारण हैं,

श्लोक 21 (skanda.2.42.21)

भवसंतापनीहारभानवे दीनबन्धवे । स्वमायारचिताशेष भवे गुणरज्जवे

bhavasaṁtāpanīhārabhānave dīnabandhave svamāyāracitāśeṣa bhave guṇarajjave

— भवसंताप रूपी कुहासे को दूर करने वाले सूर्य के समान, दीनों के बंधु, अपनी माया से रचे गए इस सम्पूर्ण संसार को गुण-रूपी रस्सी से बाँधने वाले,

श्लोक 22 (skanda.2.42.22)

नमः कमलकिंजल्क पीतनिर्मलवाससे । महाहवरिपुस्कन्ध कृंतचक्राय चक्रिणे

namaḥ kamalakiṁjalka pītanirmalavāsase mahāhavaripuskandha kṛṁtacakrāya cakriṇe

— कमल के केसर के समान पीत निर्मल वस्त्र धारण करने वाले को नमस्कार है; महासंग्राम में शत्रुओं के कंधे काटने वाले चक्र के धारक, हे चक्रधारी, नमस्कार है।

श्लोक 23 (skanda.2.42.23)

दंष्ट्रोद्धृत क्षितिभृते त्रयीमूर्तिमते नमः । नमो यज्ञवराहाय चन्द्रसूर्याग्निचक्षुषे

daṁṣṭroddhṛta kṣitibhṛte trayīmūrtimate namaḥ namo yajñavarāhāya candrasūryāgnicakṣuṣe

दाढ़ पर पृथ्वी को धारण करने वाले, त्रयीमूर्ति-स्वरूप आपको नमस्कार है; चंद्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रों वाले यज्ञवराह को नमस्कार है।

श्लोक 24 (skanda.2.42.24)

नरसिंहाय दंष्ट्रोग्रमूर्तिद्रावितशत्रवे । यदपांगविलासैक सृष्टिस्थित्युपसंहृतिः

narasiṁhāya daṁṣṭrogramūrtidrāvitaśatrave yadapāṅgavilāsaika sṛṣṭisthityupasaṁhṛtiḥ

— उग्र दाढ़ों वाले नरसिंह-रूप को, जिन्होंने अपने शत्रु को गला डाला, जिनके कटाक्ष की लीलामात्र से सृष्टि, स्थिति और संहार होते हैं,

श्लोक 25 (skanda.2.42.25)

उच्चावचात्मको ह्येष भवः संभवते मुहुः । तममुं नीलमेघाभं नीलाश्ममणिविग्रहम्

uccāvacātmako hyeṣa bhavaḥ saṁbhavate muhuḥ tamamuṁ nīlameghābhaṁ nīlāśmamaṇivigraham

— यह ऊँच-नीच स्वरूप वाला संसार बार-बार उत्पन्न होता है। नीलमेघ के समान श्याम, नीलरत्न जैसी काया वाले उन्हीं को,

श्लोक 26 (skanda.2.42.26)

नीलाचलगुहावासं प्रणमामि कृपानिधिम् । शंखचक्रगदापद्मधारिणं शुभदायिनम्

nīlācalaguhāvāsaṁ praṇamāmi kṛpānidhim śaṅkhacakragadāpadmadhāriṇaṁ śubhadāyinam

— नीलाचल की गुहा में निवास करने वाले, कृपानिधि को मैं प्रणाम करता हूँ; शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले, शुभ देने वाले,

श्लोक 27 (skanda.2.42.27)

प्रणताशेषपापौघदारिणं मुरवैरिणम् । नमस्ते कमलापांग संगसंस्कारचक्षुषे

praṇatāśeṣapāpaughadāriṇaṁ muravairiṇam namaste kamalāpāṅga saṁgasaṁskāracakṣuṣe

— जो शरणागतों के समस्त पाप-समूह को नष्ट करते हैं, मुर के शत्रु — हे कमला के कटाक्ष के संस्कार से युक्त नेत्रों वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 28 (skanda.2.42.28)

श्रीवत्सकौस्तुभोद्भासि मनोहृद्व्यूढवक्षसे । यत्पादपंकजद्वंद्वसंश्रयैश्वर्यभागिनी

śrīvatsakaustubhodbhāsi manohṛdvyūḍhavakṣase yatpādapaṁkajadvaṁdvasaṁśrayaiśvaryabhāginī

— श्रीवत्स और कौस्तुभ से देदीप्यमान, मन को हरने वाले विशाल वक्षस्थल वाले, जिनके चरण-कमल-युगल के आश्रय से ऐश्वर्य की भागिनी,

श्लोक 29 (skanda.2.42.29)

श्रीः संश्रिता जनैः शश्वत्पृथगैश्वर्यदायिनी । या परापरसंभिन्ना प्रकृतिस्ते सिसृक्षया

śrīḥ saṁśritā janaiḥ śaśvatpṛthagaiśvaryadāyinī yā parāparasaṁbhinnā prakṛtiste sisṛkṣayā

— वह श्री, जो सदा जनों द्वारा आश्रित होकर पृथक्-पृथक् ऐश्वर्य प्रदान करती हैं; जो पर और अपर दोनों से मिश्रित आपकी प्रकृति सृष्टि की इच्छा से,

श्लोक 30 (skanda.2.42.30)

निर्विकारं परं ब्रह्म विकारि ससृजेंऽजसा । सर्वलक्षणसंपूर्णा लक्षितां शुभलक्षणैः । लक्ष्मीशोरसि नित्यस्था लक्ष्मीं तां प्रणमाम्यहम्

nirvikāraṁ paraṁ brahma vikāri sasṛjeṁjasā sarvalakṣaṇasaṁpūrṇā lakṣitāṁ śubhalakṣaṇaiḥ lakṣmīśorasi nityasthā lakṣmīṁ tāṁ praṇamāmyaham

— तत्काल ही निर्विकार परब्रह्म से विकारयुक्त सृष्टि रचती है; समस्त लक्षणों से सम्पूर्ण, शुभ लक्षणों से चिह्नित, लक्ष्मीपति के वक्षस्थल पर सदा स्थित रहने वाली उस लक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 31 (skanda.2.42.31)

जैमिनिरुवाच । तदेवं धर्मराजेन श्रीकांतः परितोषितः । पार्श्वस्थां वल्लकीहस्तां नेत्रांतेनादिशच्छ्रियम्

jaiminiruvāca tadevaṁ dharmarājena śrīkāntaḥ paritoṣitaḥ pārśvasthāṁ vallakīhastāṁ netrāntenādiśacchriyam

जैमिनि ने कहा — इस प्रकार धर्मराज (यम) द्वारा संतुष्ट होकर, श्रीकांत ने अपने पार्श्व में स्थित वीणा-हस्ता श्री को नेत्रों के संकेत से आदेश दिया।

श्लोक 32 (skanda.2.42.32)

तेन संभाविता लक्ष्मीर्भवदुःखविनाशिनी । शुभाय सर्वलोकानां यमं प्रोवाच लीलया

tena saṁbhāvitā lakṣmīrbhavaduḥkhavināśinī śubhāya sarvalokānāṁ yamaṁ provāca līlayā

उनके द्वारा सम्मानित लक्ष्मी, जो संसार के दुःख का नाश करने वाली हैं, समस्त लोकों के कल्याण के लिए, लीलापूर्वक यम से बोलीं —

श्लोक 33 (skanda.2.42.33)

लक्ष्मीरुवाच । यदर्थमावां संस्तौषि क्षेत्रेस्मिन्दुर्लभं हि तत् । अत्याज्यमावयोरेतत्क्षेत्रं श्रीपुरुषोत्तमम्

lakṣmīruvāca yadarthamāvāṁ saṁstauṣi kṣetresmindurlabhaṁ hi tat atyājyamāvayoretatkṣetraṁ śrīpuruṣottamam

लक्ष्मी ने कहा — जिस प्रयोजन से तुम हम दोनों की स्तुति करते हो, वह इस क्षेत्र में दुर्लभ ही है; यह श्री-पुरुषोत्तम क्षेत्र हम दोनों के लिए कदापि त्याज्य नहीं है।

श्लोक 34 (skanda.2.42.34)

कल्पावसानेप्यावां वै ध्रियेते परमेष्ठिना । ब्रह्मादिदिक्प्रभूणां हि स्वामित्वं नेह विद्यते

kalpāvasānepyāvāṁ vai dhriyete parameṣṭhinā brahmādidikprabhūṇāṁ hi svāmitvaṁ neha vidyate

कल्प के अंत में भी हम दोनों को परमेष्ठी ही धारण करते हैं; यहाँ ब्रह्मा आदि दिक्पालों का स्वामित्व नहीं है।

श्लोक 35 (skanda.2.42.35)

नेह कर्मपरीपाकाः संभवंति कदाचन । अत्र प्रवसतां नृणां तिरश्चामपि दुष्कृताम्

neha karmaparīpākāḥ saṁbhavaṁti kadācana atra pravasatāṁ nṛṇāṁ tiraścāmapi duṣkṛtām

यहाँ कभी भी कर्मों का परिपाक नहीं होता — यहाँ निवास करने वाले दुष्कर्मी मनुष्यों और तिर्यंचों के भी,

श्लोक 36 (skanda.2.42.36)

दह्यते ज्वलिताग्नौ हि तूलराशिर्यथा भृशम् । ये बद्धा पापपुण्याभ्यां निगडाभ्यामहर्निशम्

dahyate jvalitāgnau hi tūlarāśiryathā bhṛśam ye baddhā pāpapuṇyābhyāṁ nigaḍābhyāmaharniśam

— जैसे प्रज्वलित अग्नि में रुई का ढेर पूर्णतः जल जाता है, वैसे ही जो दिन-रात पाप और पुण्य की बेड़ियों से बंधे हैं,

श्लोक 37 (skanda.2.42.37)

तेषां संयमिता त्वं हि यमः पूर्वं विनिर्मितः । अत्र साक्षाद्वपुष्मंतं नीलेन्द्रमणिमंजुलम्

teṣāṁ saṁyamitā tvaṁ hi yamaḥ pūrvaṁ vinirmitaḥ atra sākṣādvapuṣmaṁtaṁ nīlendramaṇimaṁjulam

— उनके संयमकर्ता के रूप में तुम्हें ही पूर्वकाल में यम बनाया गया था। किन्तु यहाँ साक्षात् शरीरधारी, नीलेंद्रमणि के समान मनोहर,

श्लोक 38 (skanda.2.42.38)

दृष्ट्वा नारायणं देवं मुच्यते कर्मबन्धनात् । अतोऽन्यतः कर्मभूमौ प्रभुत्वं सूर्यसंभव

dṛṣṭvā nārāyaṇaṁ devaṁ mucyate karmabandhanāt ato'nyataḥ karmabhūmau prabhutvaṁ sūryasaṁbhava

— देव नारायण का दर्शन करके प्राणी कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। हे सूर्यपुत्र! इसके अतिरिक्त, अन्य कर्मभूमि में ही तुम्हारा प्रभुत्व है।

श्लोक 39 (skanda.2.42.39)

वैक्लव्यं क्षेत्रराजेस्मिन्मा गास्त्वं यम संयमे । तवापि भगवानेष विधाता प्रपितामहः

vaiklavyaṁ kṣetrarājesminmā gāstvaṁ yama saṁyame tavāpi bhagavāneṣa vidhātā prapitāmahaḥ

हे यम! इस क्षेत्रराज में अपने संयम-कार्य को लेकर व्याकुल मत हो; यह भगवान् तो तुम्हारे भी विधाता और प्रपितामह हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.42.40)

तिर्यंचं विष्णुसारूप्यं प्राप्तं पश्यति कौतुकात् । एष कर्मपरीपाकं सर्वेषां वेत्ति कंजजः

tiryaṁcaṁ viṣṇusārūpyaṁ prāptaṁ paśyati kautukāt eṣa karmaparīpākaṁ sarveṣāṁ vetti kaṁjajaḥ

वे कौतुकवश एक तिर्यंच को भी विष्णु-सारूप्य प्राप्त करते देखते हैं; यह कमलजन्मा ब्रह्मा सबके कर्म-परिपाक को जानते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.42.41)

ज्ञात्वा क्षेत्रस्य माहात्म्यं स्तौति देवं गदाधरम् । त्वद्वशं गंतुमुचिता नेह तिष्ठंति जंतवः

jñātvā kṣetrasya māhātmyaṁ stauti devaṁ gadādharam tvadvaśaṁ gaṁtumucitā neha tiṣṭhaṁti jaṁtavaḥ

इस क्षेत्र की महिमा जानकर वे गदाधर देव की स्तुति करते हैं। जो प्राणी तुम्हारे वश में जाने योग्य हैं, वे यहाँ नहीं ठहरते।

श्लोक 42 (skanda.2.42.42)

वैवस्वत वसंत्यत्र जीवन्मुक्ता मुमुक्षवः । तया संबोधितस्त्वेवं विष्णुना स्त्रीस्वरूपिणा । ततोऽहंकारलज्जाभ्यां विनीतः प्राब्रवीद्यमः

vaivasvata vasaṁtyatra jīvanmuktā mumukṣavaḥ tayā saṁbodhitastvevaṁ viṣṇunā strīsvarūpiṇā tato'haṁkāralajjābhyāṁ vinītaḥ prābravīdyamaḥ

हे वैवस्वत! यहाँ जीवन्मुक्त और मुमुक्षु जन निवास करते हैं। स्त्री-रूपधारी उस विष्णुस्वरूपा लक्ष्मी द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर, अहंकार और लज्जा दोनों से विनम्र होकर यम बोले —

श्लोक 43 (skanda.2.42.43)

यम उवाच । मातस्त्वया यदाज्ञप्तं पुरा नैतन्मया श्रुतम्

yama uvāca mātastvayā yadājñaptaṁ purā naitanmayā śrutam

यम ने कहा — हे माता! आपने अभी जो आज्ञा दी, वह मैंने पहले कभी नहीं सुना था।

श्लोक 44 (skanda.2.42.44)

अज्ञानोपहतो वेद्मि रहस्यं कथमुत्तमम् । यस्य स्वरूपं वेदाश्च न च वेत्ति पितामहः

ajñānopahato vedmi rahasyaṁ kathamuttamam yasya svarūpaṁ vedāśca na ca vetti pitāmahaḥ

अज्ञान से आहत मैं इस उत्तम रहस्य को कैसे जान सकता हूँ, जिसका स्वरूप न वेद जानते हैं और न पितामह ब्रह्मा ही जानते हैं?

श्लोक 45 (skanda.2.42.45)

महिमानं कथं तस्य वेद्म्यहंकार मोहितः । यदादिष्टं सुरेशानि क्षेत्रमेतद्विमुक्तिदम्

mahimānaṁ kathaṁ tasya vedmyahaṁkāra mohitaḥ yadādiṣṭaṁ sureśāni kṣetrametadvimuktidam

अहंकार से मोहित मैं उनकी महिमा कैसे जानूँ? हे सुरेशानी! जैसा आपने आदेश दिया, यह क्षेत्र मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 46 (skanda.2.42.46)

सान्निध्याद्वासुदेवस्य ईश्वरेच्छा निरंकुशा । अन्यत्र बन्धदो विष्णुरत्र मोक्षं ददाति यत्

sānnidhyādvāsudevasya īśvarecchā niraṁkuśā anyatra bandhado viṣṇuratra mokṣaṁ dadāti yat

वासुदेव के सान्निध्य से ईश्वर की इच्छा निरंकुश हो जाती है; अन्यत्र विष्णु बंधन देते हैं, किन्तु यहाँ वे मोक्ष प्रदान करते हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.42.47)

ममापि निरयाणां च स्रष्टासौ त्रिदिवस्य च । मृतानामत्र मुक्तिश्चेत्तन्मामंब सुविस्तरम्

mamāpi nirayāṇāṁ ca sraṣṭāsau tridivasya ca mṛtānāmatra muktiścettanmāmaṁba suvistaram

वे ही मेरे नरकों के और स्वर्ग के भी स्रष्टा हैं; यदि यहाँ मरने वालों को मुक्ति मिलती है, तो हे माता! मुझे यह विस्तारपूर्वक बताइए —

श्लोक 48 (skanda.2.42.48)

क्षेत्रसंस्थाप्रमाणं हि तत्र स्थिति फलं हि यत् । तीर्थानि कानि संत्यत्र किमन्यद्वा रहस्यकम्

kṣetrasaṁsthāpramāṇaṁ hi tatra sthiti phalaṁ hi yat tīrthāni kāni saṁtyatra kimanyadvā rahasyakam

— इस क्षेत्र की संस्था और प्रमाण, वहाँ निवास का जो फल है, यहाँ कौन-कौन से तीर्थ हैं, अथवा और क्या रहस्य है,

श्लोक 49 (skanda.2.42.49)

किमधिष्ठातृकं क्षेत्रं तत्सर्वं कथयस्व मे । तदहं संपरित्यज्य निर्भयः संचरे यथा

kimadhiṣṭhātṛkaṁ kṣetraṁ tatsarvaṁ kathayasva me tadahaṁ saṁparityajya nirbhayaḥ saṁcare yathā

— और यह भी कि इस क्षेत्र का अधिष्ठाता कौन है — यह सब मुझे बताइए, जिससे मैं भय त्यागकर यहाँ निर्भय होकर विचरण कर सकूँ।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43