वैष्णव खण्ड · अध्याय 43
मार्कण्डेय का महाप्रलय-दर्शन
श्लोक 1 (skanda.2.43.1)
श्रीरुवाच । साधु ते बुद्धिरुत्पन्ना विष्णोः संनिधिमाश्रिता । अद्भुतं कथयाम्येतत्क्षेत्रस्य रविनंदन
śrīruvāca sādhu te buddhirutpannā viṣṇoḥ saṁnidhimāśritā adbhutaṁ kathayāmyetatkṣetrasya ravinaṁdana
श्री ने कहा — हे रविनंदन (यम)! विष्णु के सान्निध्य का आश्रय लेकर तुम्हारे मन में जो यह विचार उत्पन्न हुआ है, वह उत्तम है। मैं तुम्हें इस क्षेत्र का यह अद्भुत वृत्तांत सुनाती हूँ।
श्लोक 2 (skanda.2.43.2)
यथाहं भगवद्वक्षः स्थलस्था ददृशे पुरा । चराचरे जगत्यस्मिन्प्रलीने प्रलये यम
yathāhaṁ bhagavadvakṣaḥ sthalasthā dadṛśe purā carācare jagatyasminpralīne pralaye yama
जैसे मैंने पूर्वकाल में, हे यम, इस चराचर जगत् के प्रलय में लीन हो जाने पर, भगवान् के वक्षस्थल पर स्थित होकर देखा था,
श्लोक 3 (skanda.2.43.3)
एतत्क्षेत्रमहं चैव द्वे एवोपस्थिते तदा । स तदा सप्तकल्पायुर्मृकंडोरात्मजो मुनिः
etatkṣetramahaṁ caiva dve evopasthite tadā sa tadā saptakalpāyurmṛkaṁḍorātmajo muniḥ
— उस समय केवल यह क्षेत्र और मैं, हम दोनों ही उपस्थित थे। उस समय सात कल्पों की आयु वाले मृकंडु-पुत्र मुनि (मार्कण्डेय) थे,
श्लोक 4 (skanda.2.43.4)
प्रणष्टे स्थावरचरे निमग्नः प्रलयार्णवे । नावस्थानमवाप्यैव शर्म लेभे न कुत्रचित्
praṇaṣṭe sthāvaracare nimagnaḥ pralayārṇave nāvasthānamavāpyaiva śarma lebhe na kutracit
— जो चराचर के नष्ट हो जाने पर प्रलय के समुद्र में डूबे हुए, कहीं भी स्थान न पाकर, कहीं भी शांति नहीं पा रहे थे।
श्लोक 5 (skanda.2.43.5)
जलार्णवे भ्राम्यमाणः प्रलये स इतस्ततः । पुरुषोत्तमसादृश्ये क्षेत्रे स वटमैक्षत
jalārṇave bhrāmyamāṇaḥ pralaye sa itastataḥ puruṣottamasādṛśye kṣetre sa vaṭamaikṣata
प्रलय के जलसमुद्र में इधर-उधर भ्रमण करते हुए, उन्होंने पुरुषोत्तम के समान उस क्षेत्र में एक वटवृक्ष देखा।
श्लोक 6 (skanda.2.43.6)
उत्प्लुत्योत्प्लुत्य मूलं तु न्यग्रोधस्य समीपतः । शुश्राव बाल वचनं मार्कण्डेय ममांतिकम्
utplutyotplutya mūlaṁ tu nyagrodhasya samīpataḥ śuśrāva bāla vacanaṁ mārkaṇḍeya mamāṁtikam
बार-बार ऊपर उछलते हुए, न्यग्रोध के मूल के समीप उन्होंने बालक की वाणी सुनी — 'मार्कण्डेय, मेरे समीप आओ,
श्लोक 7 (skanda.2.43.7)
प्रविश्य दुःखमतुलं जहीहि खलु मा शुचः । तच्छ्रुत्वा चित्रवचनमप्रतर्क्यं तदा मुनिः
praviśya duḥkhamatulaṁ jahīhi khalu mā śucaḥ tacchrutvā citravacanamapratarkyaṁ tadā muniḥ
— प्रवेश करो, और अपने अतुल दुःख को त्याग दो; शोक मत करो।' यह अद्भुत, अकल्पनीय वचन सुनकर मुनि तब,
श्लोक 8 (skanda.2.43.8)
विस्मयं परमं लेभे स्वदुःखं नाप्यचिन्तयत् । वारिभिः शीर्यते नैतद्दह्यते कालवह्निना
vismayaṁ paramaṁ lebhe svaduḥkhaṁ nāpyacintayat vāribhiḥ śīryate naitaddahyate kālavahninā
— परम आश्चर्य को प्राप्त हुए, और अपने दुःख का चिंतन भी नहीं किया। 'यह जल से नष्ट नहीं होता, कालाग्नि से भी नहीं जलता,
श्लोक 9 (skanda.2.43.9)
संवर्तकादिभिर्नैतच्छोष्यते नापि चाल्यते । एकार्णवे महाघोरे नौरिव क्षेत्रमीक्ष्यते
saṁvartakādibhirnaitacchoṣyate nāpi cālyate ekārṇave mahāghore nauriva kṣetramīkṣyate
— संवर्तक आदि प्रलयकारी वायु से यह न सूखता है, न हिलता है। इस अत्यंत भयंकर एकार्णव में यह क्षेत्र नौका के समान दिखाई देता है।'
श्लोक 10 (skanda.2.43.10)
तत्रायं यूपसदृशो न्यग्रोधस्तिष्ठते महान् । यं गृहीत्वा क्षेत्रमिदं न्यग्रोध ईशितुस्तनुः
tatrāyaṁ yūpasadṛśo nyagrodhastiṣṭhate mahān yaṁ gṛhītvā kṣetramidaṁ nyagrodha īśitustanuḥ
'वहाँ यह यूप के समान महान न्यग्रोध खड़ा है, जिसे धारण करके यह क्षेत्र टिका है — यह न्यग्रोध स्वयं ईश्वर का शरीर है —
श्लोक 11 (skanda.2.43.11)
महाप्रलय वातेन शाखा नास्य हि कम्पते । तस्याधस्तात्स हि मुनिः स्थित्वा चैतदचिंतयत्
mahāpralaya vātena śākhā nāsya hi kampate tasyādhastātsa hi muniḥ sthitvā caitadacintayat
— महाप्रलय के वायु से भी इसकी शाखा कंपित नहीं होती।' इसके नीचे खड़े होकर उस मुनि ने यह विचार किया —
श्लोक 12 (skanda.2.43.12)
एकार्णवेऽस्मिन्प्रलये नष्टे स्थावरजंगमे । भूप्रदेशः स्थिरतरः कथमेष विभाव्यते
ekārṇave'sminpralaye naṣṭe sthāvarajaṁgame bhūpradeśaḥ sthirataraḥ kathameṣa vibhāvyate
'इस एकार्णव प्रलय में, चराचर के नष्ट हो जाने पर, यह भूप्रदेश इतना स्थिर कैसे प्रतीत होता है,
श्लोक 13 (skanda.2.43.13)
यत्रायं शाखिप्रवरः कोमलः परिदृश्यते । मार्कंडेयागच्छ मुहुरिति सप्रश्रयं वचः
yatrāyaṁ śākhipravaraḥ komalaḥ paridṛśyate mārkaṁḍeyāgaccha muhuriti sapraśrayaṁ vacaḥ
— जहाँ यह श्रेष्ठ, कोमल वृक्ष दिखाई देता है?' और 'मार्कण्डेय, बार-बार आओ' — ऐसा वह विनम्र वचन [उन्हें स्मरण हो आया]।
श्लोक 14 (skanda.2.43.14)
कुतो निराश्रमियदं चिन्तयन्निति स प्लवन् । शंखचक्रगदापाणिं नारायणमलोकयत्
kuto nirāśramiyadaṁ cintayanniti sa plavan śaṅkhacakragadāpāṇiṁ nārāyaṇamalokayat
'यह आश्रम कहाँ से आया?' ऐसा विचार करते हुए, तैरते हुए, उन्होंने शंख-चक्र-गदा हाथ में लिए हुए नारायण को देखा,
श्लोक 15 (skanda.2.43.15)
तदंगपद्मासनगां मां च वैवस्वतैक्षत । विवशो जलवाताभ्यां तदा सुस्थो व्यवस्थितः
tadaṁgapadmāsanagāṁ māṁ ca vaivasvataikṣata vivaśo jalavātābhyāṁ tadā sustho vyavasthitaḥ
— और उनके अंगस्थ पद्मासन पर विराजमान मुझे भी देखा, हे वैवस्वत। जल और वायु से विवश होते हुए भी वे तब सुस्थिर होकर खड़े हो गए।
श्लोक 16 (skanda.2.43.16)
हृष्टांतरात्मा स मुनिरावां साष्टांगमानतः । प्रसादनाय देवस्य स्तोत्रमेतदुदाहरत्
hṛṣṭāṁtarātmā sa munirāvāṁ sāṣṭāṅgamānataḥ prasādanāya devasya stotrametadudāharat
हृदय में हर्षित होकर उस मुनि ने हम दोनों को साष्टांग प्रणाम किया, और देव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तोत्र कहा —
श्लोक 17 (skanda.2.43.17)
मार्कण्डेय उवाच । त्वत्पादपद्मानुसरानुषंगं रुद्रेंद्रपद्मासनसम्पदाढ्यम् । त्वद्भक्तिहीनं परितः प्रतप्तं दीनं परित्राहि कृपांबुधे माम्
mārkaṇḍeya uvāca tvatpādapadmānusarānuṣaṁgaṁ rudreṁdrapadmāsanasampadāḍhyam tvadbhaktihīnaṁ paritaḥ prataptaṁ dīnaṁ paritrāhi kṛpāṁbudhe mām
मार्कण्डेय ने कहा — हे कृपासागर! रुद्र और इंद्र भी जिनके चरणकमल के अनुसरण की सम्पदा से समृद्ध हैं, उस [ऐश्वर्य] से रहित, आपकी भक्ति से हीन, सर्वत्र संतप्त, दीन मुझे बचाइए।
श्लोक 18 (skanda.2.43.18)
ब्रह्मादिभिर्यत्परिचर्यमाणं पदाम्बुजद्वन्द्वमचिंत्यशक्ति । श्वः श्रेयसप्राप्तिनिदानतत्त्वं दीनं परित्राहि कृपाम्बुधे माम्
brahmādibhiryatparicaryamāṇaṁ padāmbujadvandvamaciṁtyaśakti śvaḥ śreyasaprāptinidānatattvaṁ dīnaṁ paritrāhi kṛpāmbudhe mām
जिनके चरणकमल-युगल को ब्रह्मा आदि देव सेवते हैं, जो अचिंत्य शक्ति से संपन्न है, जो कल्याण की भावी प्राप्ति का मूल तत्त्व है — हे कृपासागर! दीन मुझे बचाइए।
श्लोक 19 (skanda.2.43.19)
यदंगभूतं जगदण्डमेतदनेककोटि प्रगुणं विभाति । लीलाविलासस्थितिसृष्टिलीनं तन्मां सुदीनं परिरक्ष विष्णो
yadaṁgabhūtaṁ jagadaṇḍametadanekakoṭi praguṇaṁ vibhāti līlāvilāsasthitisṛṣṭilīnaṁ tanmāṁ sudīnaṁ parirakṣa viṣṇo
हे विष्णु! जिनके अंगस्वरूप यह अनेक कोटि ब्रह्माण्ड सुसज्जित होकर प्रकाशित होते हैं, जिनकी लीला-विलास में सृष्टि, स्थिति और प्रलय लीन हो जाते हैं, उन आप मुझ अत्यंत दीन की रक्षा कीजिए।
श्लोक 20 (skanda.2.43.20)
एकं सुवर्णं कटकादिभेदैर्नाना यथा वा नभसोदितोऽर्कः । आधारवैषम्यजलेषु तादृग्विभाव्यसे निर्गुण एक एव
ekaṁ suvarṇaṁ kaṭakādibhedairnānā yathā vā nabhasodito'rkaḥ ādhāravaiṣamyajaleṣu tādṛgvibhāvyase nirguṇa eka eva
जैसे एक ही सुवर्ण कड़े आदि भेदों से नाना रूप धारण करता है, अथवा जैसे आकाश में उदित एक ही सूर्य विभिन्न जलाशयों की असमानता से भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, वैसे ही निर्गुण होते हुए भी आप एक होकर अनेक रूपों में प्रतीत होते हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.43.21)
अशेषसंपूर्णरुचिप्रहीणोपादानसंकल्पविवर्जितोऽपि । दीनानुकंपानुगुणं बिभर्षि युगे युगे देहमपारशक्ते
aśeṣasaṁpūrṇaruciprahīṇopādānasaṁkalpavivarjito'pi dīnānukampānuguṇaṁ bibharṣi yuge yuge dehamapāraśakte
सम्पूर्ण कांति से परिपूर्ण, उपादान-कारण और संकल्प से रहित होते हुए भी, हे अपार शक्ति वाले! आप दीनों पर अनुकम्पा के अनुरूप युग-युग में देह धारण करते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.43.22)
त्वत्पादपद्मं जगदीश पूर्वमसेव्यतानात्मधिया मया यत् । तत्कर्मणा दारुणपाकभाजं दीनं परित्राहि कृपांबुधे माम्
tvatpādapadmaṁ jagadīśa pūrvamasevyatānātmadhiyā mayā yat tatkarmaṇā dāruṇapākabhājaṁ dīnaṁ paritrāhi kṛpāṁbudhe mām
हे जगदीश! पूर्वकाल में जो मैंने अज्ञानवश, आत्म-बुद्धि से रहित होकर, आपके चरणकमल की सेवा नहीं की, उस कर्म के फलस्वरूप मैं भयंकर परिपाक को भोग रहा हूँ। हे कृपासागर! दीन मुझे बचाइए।
श्लोक 23 (skanda.2.43.23)
अशेषलोकस्थितिसृष्टिलीनविलासि यत्ते त्रिगुणं विभाति । वपुर्महात्मन्महदादिहेतुर्हेतोर्नमस्ते प्रकृतेः परस्य
aśeṣalokasthitisṛṣṭilīnavilāsi yatte triguṇaṁ vibhāti vapurmahātmanmahadādihetur hetornamaste prakṛteḥ parasya
हे महात्मन्! समस्त लोकों की स्थिति, सृष्टि और प्रलय जिस त्रिगुणमय रूप की लीला मात्र हैं, वह शरीर महत् आदि तत्त्वों का कारण है; हे प्रकृति से परे, कारण के भी कारण, आपको नमस्कार है।
श्लोक 24 (skanda.2.43.24)
सर्वत्र गत्वा बृहदप्रमेयं प्रवर्द्धमानं त्वयि बृंहितं च । तद्बह्मरूपं परिणामहेतुं स्वाध्यात्मविश्वात्मकमाश्रयामि
sarvatra gatvā bṛhadaprameyaṁ pravarddhamānaṁ tvayi bṛṁhitaṁ ca tadbahmarūpaṁ pariṇāmahetuṁ svādhyātmaviśvātmakamāśrayāmi
सर्वत्र व्याप्त, महान, अप्रमेय, निरंतर बढ़ने वाला, आपमें ही विस्तारित उस ब्रह्मरूप को, जो परिणाम का कारण है, स्वाध्यात्म और विश्वात्मक है, मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.2.43.25)
एकार्णवे महाघोरे नावस्थातुं प्रदेशभूः । अस्ति लक्ष्मीपते मेघवारिवातप्रकंपनात्
ekārṇave mahāghore nāvasthātuṁ pradeśabhūḥ asti lakṣmīpate meghavārivātaprakaṁpanāt
हे लक्ष्मीपते! इस अत्यंत भयंकर एकार्णव में, बादलों के जल और वायु के कम्पन के कारण, खड़े होने के लिए कोई भूमि-प्रदेश नहीं है,
श्लोक 26 (skanda.2.43.26)
त्राहि विष्णो जगन्नाथ मग्नं संसारसागरे । मामुद्धरास्माद्गोविंद कृपापांगविलोकनात
trāhi viṣṇo jagannātha magnaṁ saṁsārasāgare māmuddharāsmādgoviṁda kṛpāpāṅgavilokanāta
— हे विष्णु, जगन्नाथ! संसार-सागर में डूबे हुए मेरी रक्षा कीजिए; हे गोविंद! अपनी कृपादृष्टि के अवलोकन से मुझे इससे उद्धार कीजिए।
श्लोक 27 (skanda.2.43.27)
श्रीरुवाच । स्तुवंतमेवं ब्रह्मर्षि साक्षान्नारायणो विभुः । विलोक्यानुग्रहदृशा वाक्यं चेदमुवाच ह
śrīruvāca stuvaṁtamevaṁ brahmarṣi sākṣānnārāyaṇo vibhuḥ vilokyānugrahadṛśā vākyaṁ cedamuvāca ha
श्री ने कहा — इस प्रकार स्तुति करते हुए उस ब्रह्मर्षि को देखकर, साक्षात् नारायण प्रभु ने अनुग्रहदृष्टि से देखते हुए यह वचन कहा —
श्लोक 28 (skanda.2.43.28)
श्रीभगवानुवाच । मार्कंडेय सुदीनोऽसि मामज्ञाय द्विजोत्तम । दुश्चरं तु तपस्तप्तं दीर्घायुस्तेन केवलम्
śrībhagavānuvāca mārkaṁḍeya sudīno'si māmajñāya dvijottama duścaraṁ tu tapastaptaṁ dīrghāyustena kevalam
श्रीभगवान् ने कहा — हे मार्कण्डेय, हे द्विजोत्तम! मुझे न जानने के कारण तुम अत्यंत दीन हो; तुमने जो दुष्कर तप किया, उससे तुम्हें केवल दीर्घायु ही प्राप्त हुई।
श्लोक 29 (skanda.2.43.29)
शयानं पत्रपुटके पश्य कल्पवटोर्ध्वगम । बालस्वरूपं सर्वेषां कालात्मानं महामुने । प्रविश्य विस्तृतं वक्त्रं तत्रावस्थातुमर्हसि
śayānaṁ patrapuṭake paśya kalpavaṭordhvagam bālasvarūpaṁ sarveṣāṁ kālātmānaṁ mahāmune praviśya vistṛtaṁ vaktraṁ tatrāvasthātumarhasi
कल्पवृक्ष के ऊपर पत्ते के दोने में सोए हुए, हे महामुने, सबके बाल-स्वरूप, कालस्वरूप को देखो; उसके विस्तृत मुख में प्रवेश करके तुम्हें वहाँ ठहरना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.2.43.30)
श्रीरुवाच । एवमुक्तो भगवता स मुनिर्विस्मिताननः । आरुह्य ददृशे बालरूपं तस्याविशन्मुखे
śrīruvāca evamukto bhagavatā sa munirvismitānanaḥ āruhya dadṛśe bālarūpaṁ tasyāviśanmukhe
श्री ने कहा — भगवान् द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह मुनि आश्चर्यचकित मुख वाला होकर ऊपर चढ़ा, उस बाल-रूप को देखकर उसके मुख में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 31 (skanda.2.43.31)
प्रविष्टः कंठमार्गेण महायामं महोदरम् । तत्रासौ ददृशे विप्रो भुवनानि चतुर्दश
praviṣṭaḥ kaṇṭhamārgeṇa mahāyāmaṁ mahodaram tatrāsau dadṛśe vipro bhuvanāni caturdaśa
कंठ के मार्ग से उस विशाल, महान उदर में प्रवेश करके, वहाँ उस विप्र ने चौदह भुवनों को देखा,
श्लोक 32 (skanda.2.43.32)
ब्रह्मादिदिक्पालसुरान्सिद्धगंधर्वराक्षसान् । ऋषीन्दिव्यऋषींश्चैव भूतलं सागरांकितम्
brahmādidikpālasurānsiddhagaṁdharvarākṣasān ṛṣīndivyaṛṣīṁścaiva bhūtalaṁ sāgarāṁkitam
— ब्रह्मा आदि, दिक्पालों, देवताओं, सिद्धों, गंधर्वों, राक्षसों, ऋषियों और दिव्य ऋषियों को, तथा समुद्र से चिह्नित भूतल को,
श्लोक 33 (skanda.2.43.33)
नानातीर्थैर्नदीभिश्च पर्वतैः काननैस्तथा । लक्षितं पत्तनपुरं ग्रामखर्वटकैर्युतम्
nānātīrthairnadībhiśca parvataiḥ kānanaistathā lakṣitaṁ pattanapuraṁ grāmakharvaṭakairyutam
— अनेक तीर्थों, नदियों, पर्वतों और वनों से चिह्नित, नगरों तथा ग्रामों और छोटे-छोटे गाँवों से युक्त भूमि को,
श्लोक 34 (skanda.2.43.34)
पातालानि तथा सप्त नागकन्याः सहस्रशः । महार्घ्यमणिसौधैश्च सुधापात्रैः समुज्ज्वलैः
pātālāni tathā sapta nāgakanyāḥ sahasraśaḥ mahārghyamaṇisaudhaiśca sudhāpātraiḥ samujjvalaiḥ
— सातों पातालों को, सहस्रों नागकन्याओं को, बहुमूल्य मणियों से बने भवनों और उज्ज्वल अमृत-पात्रों से,
श्लोक 35 (skanda.2.43.35)
अनर्घ्यमणिभिर्नागैः सेवितं परमाद्भुतम् । जगतां धारिणं शेषं सहस्रफणमंडितम्
anarghyamaṇibhirnāgaiḥ sevitaṁ paramādbhutam jagatāṁ dhāriṇaṁ śeṣaṁ sahasraphaṇamaṁḍitam
— अमूल्य मणियों से सुशोभित नागों से सेवित, परम अद्भुत [उन प्रदेशों] को, तथा जगत् को धारण करने वाले, सहस्रफणों से सुशोभित शेष को,
श्लोक 36 (skanda.2.43.36)
व्याकर्तारमशेषाणां शास्त्राणां शिष्यमध्यगम् । ब्रह्मांडोदरगं वस्तु यत्किंचित्परमेष्ठिना
vyākartāramaśeṣāṇāṁ śāstrāṇāṁ śiṣyamadhyagam brahmāṇḍodaragaṁ vastu yatkiṁcitparameṣṭhinā
— समस्त शास्त्रों के व्याख्याता, शिष्यों के मध्य विराजमान को, तथा ब्रह्माण्ड के उदर में जो कुछ भी परमेष्ठी (ब्रह्मा) द्वारा,
श्लोक 37 (skanda.2.43.37)
सृष्टं सर्वं ददृशेऽसौ तत्कुक्षौ स महामुनिः । नापश्यदंतं कुक्षेस्तु भ्रममाण इतस्ततः
sṛṣṭaṁ sarvaṁ dadṛśe'sau tatkukṣau sa mahāmuniḥ nāpaśyadaṁtaṁ kukṣestu bhramamāṇa itastataḥ
— वह सब कुछ उस महामुनि ने उसके उदर में देखा; परंतु इधर-उधर भ्रमण करते हुए भी उन्हें उस उदर का अंत नहीं दिखा।
श्लोक 38 (skanda.2.43.38)
ततो विनिष्क्रम्य पुनर्ददृशे च मया सह । पूर्वमालक्षितं यद्वदास्थितं पुरुषोत्तमम्
tato viniṣkramya punardadṛśe ca mayā saha pūrvamālakṣitaṁ yadvadāsthitaṁ puruṣottamam
तत्पश्चात् बाहर निकलकर उन्होंने फिर से मेरे साथ, जैसा पहले देखा था वैसे ही स्थित पुरुषोत्तम को देखा।
श्लोक 39 (skanda.2.43.39)
विस्मयोत्फुल्लनयनः प्रणिपत्येदमब्रवीत्
vismayotphullanayanaḥ praṇipatyedamabravīt
आश्चर्य से खिले हुए नेत्रों वाले उन्होंने प्रणाम करके यह कहा —
श्लोक 40 (skanda.2.43.40)
मार्कंडेय उवाच । भगवन्देवदेवेश किमद्भुतमिदं प्रभो । महाप्रलयसंरोधे सृष्टिरत्र विभाव्यते
mārkaṁḍeya uvāca bhagavandevadeveśa kimadbhutamidaṁ prabho mahāpralayasaṁrodhe sṛṣṭiratra vibhāvyate
मार्कण्डेय ने कहा — हे भगवन्, देवदेवेश, हे प्रभो! यह क्या अद्भुत है, कि महाप्रलय के सम्पूर्ण अवरोध में भी यहाँ सृष्टि दिखाई देती है!
श्लोक 41 (skanda.2.43.41)
त्वन्माया दुरवच्छेद्या कथं वै ज्ञायते मया
tvanmāyā duravacchedyā kathaṁ vai jñāyate mayā
आपकी माया अभेद्य है; वह मेरे द्वारा कैसे जानी जा सकती है?
श्लोक 42 (skanda.2.43.42)
श्रीभगवानुवाच । मुने क्षेत्रमिदं चित्रं शाश्वतं मे विभावय । न सृष्टिप्रलयावत्र विद्येते न च संसृतिः
śrībhagavānuvāca mune kṣetramidaṁ citraṁ śāśvataṁ me vibhāvaya na sṛṣṭipralayāvatra vidyete na ca saṁsṛtiḥ
श्रीभगवान् ने कहा — हे मुने! इस अद्भुत, शाश्वत क्षेत्र को मेरा ही स्वरूप जानो; यहाँ न सृष्टि है, न प्रलय, और न संसार-चक्र है।
श्लोक 43 (skanda.2.43.43)
सदैकरूपं पुरुषोत्तमाख्यं मुक्तिप्रदं मामिह संप्रबुध्य । अत्र प्रविष्टो न पुनः प्रयाति गर्भस्थितिं सांद्रसुखस्वरूपः
sadaikarūpaṁ puruṣottamākhyaṁ muktipradaṁ māmiha saṁprabudhya atra praviṣṭo na punaḥ prayāti garbhasthitiṁ sāṁdrasukhasvarūpaḥ
सदा एकरूप, पुरुषोत्तम नामक, मुक्ति देने वाले मुझे यहाँ भलीभाँति जानकर, जो यहाँ प्रवेश करता है, वह सघन सुखस्वरूप होकर पुनः गर्भवास को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 44 (skanda.2.43.44)
इत्याज्ञप्तो भगवता मार्कंडेयो महामुनिः । अत्र वासं करिष्यामीत्यन्यतीर्थपराङ्मुखः । प्रहृष्टवदनः प्राह प्रणिपत्य जगद्गुरुम्
ityājñapto bhagavatā mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ atra vāsaṁ kariṣyāmītyanyatīrthaparāṅmukhaḥ prahṛṣṭavadanaḥ prāha praṇipatya jagadgurum
भगवान् द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर, महामुनि मार्कण्डेय, 'मैं यहीं निवास करूँगा' ऐसा निश्चय करके, अन्य तीर्थों से विमुख होकर, हर्षित मुख से जगद्गुरु को प्रणाम करके बोले —
श्लोक 45 (skanda.2.43.45)
मार्कण्डेय उवाच । उवाच स तथा विष्णुं भक्तिश्रद्धासमन्वितः । अनुगृह्णीष्व भगवन्क्षेत्रेस्मिन्पुरुषोत्तमे । यथा स्थितो मृत्युवशं न व्रजे पुरुषोत्तम
mārkaṇḍeya uvāca uvāca sa tathā viṣṇuṁ bhaktiśraddhāsamanvitaḥ anugṛhṇīṣva bhagavankṣetresminpuruṣottame yathā sthito mṛtyuvaśaṁ na vraje puruṣottama
मार्कण्डेय ने कहा — भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर उन्होंने विष्णु से इस प्रकार कहा — 'हे भगवन्! इस पुरुषोत्तम क्षेत्र में मुझ पर अनुग्रह कीजिए, जिससे यहाँ स्थित रहते हुए, हे पुरुषोत्तम, मैं मृत्यु के वश में न जाऊँ।'
श्लोक 46 (skanda.2.43.46)
श्रीभगवानुवाच । अत्र स्थितिं मे विप्रर्षे क्षेत्रे मोक्षप्रसाधके
śrībhagavānuvāca atra sthitiṁ me viprarṣe kṣetre mokṣaprasādhake
श्रीभगवान् ने कहा — हे विप्रर्षे! इस मोक्ष-सिद्ध करने वाले क्षेत्र में मेरा निवास —
श्लोक 47 (skanda.2.43.47)
करिष्यामि न संदेहो यावदाभूतसंप्लवम् । प्रलयावसाने तीर्थं ते रचयिष्यामि शाश्वतम्
kariṣyāmi na saṁdeho yāvadābhūtasaṁplavam pralayāvasāne tīrthaṁ te racayiṣyāmi śāśvatam
— मैं करूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं, जब तक समस्त भूतों का प्रलय न हो जाए। प्रलय की समाप्ति पर मैं तुम्हारे लिए एक शाश्वत तीर्थ रचूँगा,
श्लोक 48 (skanda.2.43.48)
यत्तीरे तप आस्थाय मद्द्वितीयतनुं शिवम् । आराध्य मदनुक्रोशान्मृत्युं जेष्यसि निश्चितम्
yattīre tapa āsthāya maddvitīyatanuṁ śivam ārādhya madanukrośānmṛtyuṁ jeṣyasi niścitam
— जिसके तट पर तप करके, मेरे द्वितीय स्वरूप शिव की आराधना करके, मेरी कृपा से तुम निश्चित रूप से मृत्यु पर विजय प्राप्त करोगे।
श्लोक 49 (skanda.2.43.49)
जैमिनिरुवाच । एवं पुरा दत्तवरो मार्कंडेयो महामुनिः । न्यग्रोधवायव्यकोणे खातं चक्रेण वै हरेः
jaiminiruvāca evaṁ purā dattavaro mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ nyagrodhavāyavyakoṇe khātaṁ cakreṇa vai hareḥ
जैमिनि ने कहा — इस प्रकार पूर्वकाल में वरदान पाकर, महामुनि मार्कण्डेय ने, न्यग्रोध के वायव्य कोण में, हरि के चक्र द्वारा खोदे गए,
श्लोक 50 (skanda.2.43.50)
पावनं गर्तमास्थाय पूजयित्वा महेश्वरम् । महता तपसा विप्रो जितवान्मृत्युमंजसा
pāvanaṁ gartamāsthāya pūjayitvā maheśvaram mahatā tapasā vipro jitavānmṛtyumaṁjasā
— उस पवित्र गर्त में स्थित होकर, महेश्वर की पूजा करके, महान तप के द्वारा उस विप्र ने शीघ्र ही मृत्यु पर विजय प्राप्त की।
श्लोक 51 (skanda.2.43.51)
मुनेस्तस्यैव नाम्नायं प्रख्यातो गर्त उत्तमः । यत्र स्नात्वा शिवं दृष्ट्वा वाजिमेधफलं लभेत्
munestasyaiva nāmnāyaṁ prakhyāto garta uttamaḥ yatra snātvā śivaṁ dṛṣṭvā vājimedhaphalaṁ labhet
उसी मुनि के नाम से यह श्रेष्ठ गर्त प्रसिद्ध हुआ, जहाँ स्नान करके और शिव का दर्शन करके अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 52 (skanda.2.43.52)
श्रीरुवाच । पञ्चक्रोशमिदं क्षेत्रं समुद्रांतर्व्यवस्थितम् । द्विक्रोशं तीर्थराजस्य तटभूमौ सुनिर्मलम्
śrīruvāca pañcakrośamidaṁ kṣetraṁ samudrāṁtarvyavasthitam dvikrośaṁ tīrtharājasya taṭabhūmau sunirmalam
श्री ने कहा — यह क्षेत्र पाँच क्रोश का है, समुद्र के भीतर स्थित; इसमें से दो क्रोश तीर्थराज (समुद्र) की तटभूमि पर अत्यंत निर्मल है।
श्लोक 53 (skanda.2.43.53)
सुवर्णवालुकाकीर्णं नीलपर्वतशोभितम् । योऽसौ विश्वेश्वरो देवः साक्षान्नारायणात्मकः
suvarṇavālukākīrṇaṁ nīlaparvataśobhitam yo'sau viśveśvaro devaḥ sākṣānnārāyaṇātmakaḥ
सुवर्ण की बालू से व्याप्त, नीलपर्वत से सुशोभित; जो यह विश्वेश्वर देव साक्षात् नारायण-स्वरूप हैं,
श्लोक 54 (skanda.2.43.54)
संयम्य विषयग्रामं समुद्रतटमास्थितः । उपासितुं जगन्नाथं चतुःषष्टितमः प्रभुः
saṁyamya viṣayagrāmaṁ samudrataṭamāsthitaḥ upāsituṁ jagannāthaṁ catuḥṣaṣṭitamaḥ prabhuḥ
— इंद्रियों के समूह का संयमन करके, समुद्र के तट पर स्थित होकर, जगन्नाथ की उपासना करने वाले, चौंसठवें प्रभु,
श्लोक 55 (skanda.2.43.55)
यमेश्वर इति ख्यातो यमसंयमनाशनः । यं दृष्ट्वा पूजयित्वा तु कोटिलिंगफलं लभेत्
yameśvara iti khyāto yamasaṁyamanāśanaḥ yaṁ dṛṣṭvā pūjayitvā tu koṭiliṁgaphalaṁ labhet
— यमेश्वर नाम से विख्यात, यम के संयमन को नष्ट करने वाले हैं; जिनका दर्शन और पूजन करके करोड़ लिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है।