वैष्णव खण्ड · अध्याय 45
पुण्डरीक और अंबरीष का विष्णु-दर्शन एवं मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.2.45.1)
जैमिनि रुवाच । निर्विण्णचेतसौ तौ तु त्यक्त्वा वेश्यादिसंगतिम् । ध्यायंतौ मनसा विष्णुं शुद्धाहारव्रतावुभौ
jaimini ruvāca nirviṇṇacetasau tau tu tyaktvā veśyādisaṁgatim dhyāyaṁtau manasā viṣṇuṁ śuddhāhāravratāvubhau
जैमिनि ने कहा — विरक्त-चित्त हुए वे दोनों वेश्या आदि के संग को त्यागकर, मन से विष्णु का ध्यान करते हुए, शुद्ध आहार का व्रत रखने वाले हो गए।
श्लोक 2 (skanda.2.45.2)
कालेन कियता प्राप्तौ नीलाद्रिनिलयं हरेः । तीर्थराजजले स्नात्वा यथावद्विधिचोदितम्
kālena kiyatā prāptau nīlādrinilayaṁ hareḥ tīrtharājajale snātvā yathāvadvidhicoditam
कुछ समय बाद वे हरि के नीलाचल-निवास पर पहुँचे; और विधिपूर्वक तीर्थराज के जल में स्नान किया।
श्लोक 3 (skanda.2.45.3)
प्रासादद्वारि तिष्ठंतौ साष्टांगं प्रणिपत्य च । भगवंतं निरीक्षंतौ नापश्यतां तदा द्विजा
prāsādadvāri tiṣṭhaṁtau sāṣṭāṁgaṁ praṇipatya ca bhagavaṁtaṁ nirīkṣaṁtau nāpaśyatāṁ tadā dvijā
मंदिर के द्वार पर खड़े होकर, साष्टांग प्रणाम करके, भगवान् को देखने की चेष्टा करते हुए भी, उन दोनों द्विजों ने उस समय उनका दर्शन नहीं पाया।
श्लोक 4 (skanda.2.45.4)
विवर्णवदनौ देवमदृष्ट्वा चिंतयाकुलौ । आरभेते ह्यनशनं भगवद्दर्शनावधि
vivarṇavadanau devamadṛṣṭvā ciṁtayākulau ārabhete hyanaśanaṁ bhagavaddarśanāvadhi
भगवान् का दर्शन न पाकर उनके मुख उदास हो गए, चिंता से व्याकुल होकर उन्होंने भगवद्दर्शन तक अनशन आरंभ किया।
श्लोक 5 (skanda.2.45.5)
कीर्तयंते भगवतो नाम कल्मषनाशनम् । तृतीयस्यां त्रियामायां ज्योतिरेकमपश्यताम्
kīrtayaṁte bhagavato nāma kalmaṣanāśanam tṛtīyasyāṁ triyāmāyāṁ jyotirekamapaśyatām
वे भगवान् के पापनाशक नाम का कीर्तन करते रहे; तीसरी रात्रि के प्रहर में उन्होंने एक ज्योति देखी।
श्लोक 6 (skanda.2.45.6)
त्रीण्यहानि पुनस्तौ च तदोपावसतां स्थिरौ । मध्ये सप्तमरात्रेस्तु भगवंतमपश्यताम्
trīṇyahāni punastau ca tadopāvasatāṁ sthirau madhye saptamarātrestu bhagavaṁtamapaśyatām
फिर वे तीन दिन और स्थिर होकर उसी उपवास में रहे; सातवीं रात्रि के मध्य में उन्होंने भगवान् का दर्शन पाया।
श्लोक 7 (skanda.2.45.7)
त्रिदशानां स्तुतीः श्रुत्वा दिव्यज्ञानौ बभूवतुः । अपास्तपापनिर्मोकौ साक्षाद्देवमपश्यताम्
tridaśānāṁ stutīḥ śrutvā divyajñānau babhūvatuḥ apāstapāpanirmokau sākṣāddevamapaśyatām
तैंतीस देवताओं की स्तुतियाँ सुनकर वे दिव्य ज्ञान से संपन्न हो गए; पाप के आवरण से मुक्त होकर उन्होंने भगवान् का साक्षात् दर्शन किया।
श्लोक 8 (skanda.2.45.8)
शंखचक्रगदापाणि दिव्यालंकारभूषितम् । रत्नपादुकयोः पृष्ठे विन्यस्तचरणांबुजम्
śaṅkhacakragadāpāṇi divyālaṁkārabhūṣitam ratnapādukayoḥ pṛṣṭhe vinyastacaraṇāṁbujam
उन्होंने देखा — शंख, चक्र और गदा हाथों में धारण किए, दिव्य आभूषणों से सुशोभित, उनके चरण-कमल रत्नजड़ित पादुकाओं पर रखे हुए थे।
श्लोक 9 (skanda.2.45.9)
व्याकोशपुंडरीकाक्षं प्रसन्नवदनं विभुम् । वामपार्श्वे स्थितां लक्ष्मीं वामेनालिंग्य बाहुना
vyākośapuṁḍarīkākṣaṁ prasannavadanaṁ vibhum vāmapārśve sthitāṁ lakṣmīṁ vāmenāliṁgya bāhunā
उनके नेत्र खिले हुए कमल के समान थे, मुख प्रसन्न था, वे सर्वव्यापी प्रभु अपने बाएँ हाथ से बाईं ओर खड़ी लक्ष्मी का आलिंगन किए हुए थे।
श्लोक 10 (skanda.2.45.10)
नागवल्लीदलं बद्धमाददानं श्रिया हृतम् । रत्नवेत्रकराः काश्चित्काश्चिच्चामरपाणयः
nāgavallīdalaṁ baddhamādadānaṁ śriyā hṛtam ratnavetrakarāḥ kāścitkāściccāmarapāṇayaḥ
श्री द्वारा लाए गए बंधे हुए पान के पत्ते को ग्रहण करते हुए; कुछ परिचारिकाएँ हाथों में रत्नजड़ित वेत्र (छड़ी) लिए थीं, कुछ चंवर लिए हुए थीं।
श्लोक 11 (skanda.2.45.11)
गंधतैलप्रदीपास्तु रत्नवर्तिप्रदीपिकाः । काश्चिद्दधानाः स्वकरैर्योवनाढ्याः सुभूषिताः
gaṁdhatailapradīpāstu ratnavartipradīpikāḥ kāściddadhānāḥ svakarairyovanāḍhyāḥ subhūṣitāḥ
कुछ युवा, सुभूषित परिचारिकाएँ अपने हाथों से सुगंधित तेल के दीपक और रत्नबत्ती वाली दीपिकाएँ लिए हुए थीं।
श्लोक 12 (skanda.2.45.12)
पश्चाद्रत्नमयं छत्रं बिभ्रती काचिदुज्ज्वला । धूपपात्रं मुखाभ्याशे कृष्णागुरुसुधूपितम्
paścādratnamayaṁ chatraṁ bibhratī kācidujjvalā dhūpapātraṁ mukhābhyāśe kṛṣṇāgurusudhūpitam
पीछे एक तेजस्विनी रत्नमय छत्र धारण किए हुए थी; मुख के समीप कृष्णागुरु से सुगंधित धूपपात्र था।
श्लोक 13 (skanda.2.45.13)
काचिद्दधाना प्रम्लोचां हसंती विग्रहश्रिया । लीलालकदृशा देवाननुगृह्णंतमग्रतः
kāciddadhānā pramlocāṁ hasaṁtī vigrahaśriyā līlālakadṛśā devānanugṛhṇaṁtamagrataḥ
कोई एक अप्सरा प्रम्लोचा-सी सुंदर, अपनी देहकांति से हँसती हुई खड़ी थी — और वे प्रभु अपनी चंचल चितवन से सम्मुख खड़े देवताओं पर अनुग्रह करते हुए,
श्लोक 14 (skanda.2.45.14)
बद्धांजलिपुटान्नम्रकन्धरान्स्तुवतः पृथक् । सिद्धान्मुनिगणान्दिव्यान्सनकादीन्स्मितेन च
baddhāṁjalipuṭānnamrakandharānstuvataḥ pṛthak siddhānmunigaṇāndivyānsanakādīnsmitena ca
— जो हाथ जोड़े, गर्दन झुकाए, अलग-अलग स्तुति कर रहे थे — सिद्धों, दिव्य मुनिगणों और सनक आदि को भी मुस्कुराकर अनुग्रहीत करते हुए,
श्लोक 15 (skanda.2.45.15)
नारदादींश्च गंधर्वान्दिव्यगानमनोहरान् । दत्तावधानं श्रवणे लीलयैवानुकम्पिनम्
nāradādīṁśca gaṁdharvāndivyagānamanoharān dattāvadhānaṁ śravaṇe līlayaivānukampinam
— और नारद आदि गंधर्वों को, जिनका दिव्य गान मनोहर था, जिनके गायन को वे सहज लीला से ही ध्यान देकर सुनते और उन पर अनुकंपा करते थे,
श्लोक 16 (skanda.2.45.16)
प्रह्लादादीन्वैष्णवाग्र्यान्स्वरूपं ध्यायतोऽग्रतः । चित्ताकर्षणसंलीनां विदधानं स्वविग्रहे
prahlādādīnvaiṣṇavāgryānsvarūpaṁ dhyāyato'grataḥ cittākarṣaṇasaṁlīnāṁ vidadhānaṁ svavigrahe
— तथा प्रह्लाद आदि श्रेष्ठ वैष्णवों को, जो सम्मुख बैठे उनके स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अपने ही विग्रह में उनके चित्त को आकर्षित कर लीन करते हुए,
श्लोक 17 (skanda.2.45.17)
वक्षःस्थलप्रविलसत्कौस्तुभप्रतिबिंबितैः । देवादिभिर्विश्वरूपमूर्त्तेः स्वस्याः प्रकाशकम्
vakṣaḥsthalapravilasatkaustubhapratibiṁbitaiḥ devādibhirviśvarūpamūrtteḥ svasyāḥ prakāśakam
— अपने वक्षस्थल पर सुशोभित कौस्तुभमणि में प्रतिबिंबित देवादि रूपों के द्वारा अपने ही विश्वरूप स्वरूप को प्रकट करते हुए,
श्लोक 18 (skanda.2.45.18)
उपर्युपरि दिव्यायाः पुष्पवृष्टेरधः स्थितम् । श्रीसन्निधानविगतश्रियमप्सरसां गणम्
uparyupari divyāyāḥ puṣpavṛṣṭeradhaḥ sthitam śrīsannidhānavigataśriyamapsarasāṁ gaṇam
— ऊपर से लगातार बरसती दिव्य पुष्पवर्षा के नीचे खड़े, श्री की समीपता से जिनकी अपनी शोभा फीकी पड़ गई थी, ऐसे अप्सराओं के समूह को,
श्लोक 19 (skanda.2.45.19)
पश्यंतं विविधं नित्यमङ्गहारमनोहरम् । दिव्यलीलाविलासं तं दृष्ट्वा तौ द्विजबाहुजौ
paśyaṁtaṁ vividhaṁ nityamaṅgahāramanoharam divyalīlāvilāsaṁ taṁ dṛṣṭvā tau dvijabāhujau
— देखते हुए, नित्य विविध सुंदर अंगभंगिमाओं वाले उस दिव्य लीला-विलास को देखकर, वे दोनों ब्राह्मण और क्षत्रिय,
श्लोक 20 (skanda.2.45.20)
बभूवतुः क्षणात्सर्वविद्यानां पारगौ द्विजाः । त्रिः परिक्रम्य देवेशं कृतांजलिपुटावुभौ । साष्टांगपातप्रणतौ तुष्टुवाते मुदान्वितौ
babhūvatuḥ kṣaṇātsarvavidyānāṁ pāragau dvijāḥ triḥ parikramya deveśaṁ kṛtāṁjalipuṭāvubhau sāṣṭāṁgapātapraṇatau tuṣṭuvāte mudānvitau
उसी क्षण समस्त विद्याओं में पारंगत हो गए। देवेश की तीन परिक्रमा करके, दोनों हाथ जोड़े, साष्टांग प्रणाम करके, वे हर्षपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 21 (skanda.2.45.21)
पुण्डरीक उवाच । नमस्ते जगदाधार सर्गस्थित्यंतकारण । नारायण नमस्तेऽस्तु परमात्मन्परायण
puṇḍarīka uvāca namaste jagadādhāra sargasthityaṁtakāraṇa nārāyaṇa namaste'stu paramātmanparāyaṇa
पुण्डरीक ने कहा — हे जगत् के आधार! हे सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारण! हे नारायण! हे परमात्मन्! हे परायण! आपको नमस्कार है।
श्लोक 22 (skanda.2.45.22)
परमार्थस्त्वमेवैको भवाप्ययविवर्जितः । नित्यानन्दस्वरूपं त्वां विदन्ति ध्यानचक्षुषः
paramārthastvamevaiko bhavāpyayavivarjitaḥ nityānandasvarūpaṁ tvāṁ vidanti dhyānacakṣuṣaḥ
आप ही अकेले परम सत्य हैं, जन्म और मृत्यु से रहित; ध्यान-चक्षु वाले ही आपके नित्यानंद स्वरूप को जानते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.45.23)
चिन्मात्रं जगतामीशमधिष्ठानं परात्परम् । कथं नु मूढहृदयास्त्वां जानंति सुनिर्मलम्
cinmātraṁ jagatāmīśamadhiṣṭhānaṁ parātparam kathaṁ nu mūḍhahṛdayāstvāṁ jānaṁti sunirmalam
आप शुद्ध चैतन्यमात्र हैं, जगत् के ईश्वर हैं, परम आधार हैं, सबसे परे हैं — भला मूढ़ हृदय वाले उस अत्यंत निर्मल आपको कैसे जान सकते हैं?
श्लोक 24 (skanda.2.45.24)
कामार्थलिप्सासंभ्रातचेतसोऽत्यंतदुःखिनः । गतागतपथे श्रांताः सुखभाजः कदाचन
kāmārthalipsāsaṁbhrātacetaso'tyaṁtaduḥkhinaḥ gatāgatapathe śrāṁtāḥ sukhabhājaḥ kadācana
काम और अर्थ की लालसा से भ्रमित चित्त वाले, अत्यंत दुखी, आवागमन के मार्ग में थके हुए लोग कभी सुख के भागी नहीं होते।
श्लोक 25 (skanda.2.45.25)
अनुकंपय मां नाथ सुदीनं शरणागतम् । मूढं दुष्कृतकर्माणं पतितं भवसागरे
anukaṁpaya māṁ nātha sudīnaṁ śaraṇāgatam mūḍhaṁ duṣkṛtakarmāṇaṁ patitaṁ bhavasāgare
हे नाथ! मुझ अत्यंत दीन, शरणागत, मूढ़, दुष्कर्मी, संसार-सागर में गिरे हुए पर कृपा कीजिए।
श्लोक 26 (skanda.2.45.26)
कोऽन्यस्त्वत्सदृशो बन्धुर्ब्रह्मांडे नाथ वर्त्तते । स्वकर्त्तव्यानपेक्षो यो दीनानाथदयालुकः
ko'nyastvatsadṛśo bandhurbrahmāṇḍe nātha varttate svakarttavyānapekṣo yo dīnānāthadayālukaḥ
हे नाथ! इस ब्रह्मांड में आपके समान दूसरा कौन-सा बंधु है, जो अपने कर्तव्य की अपेक्षा किए बिना दीन-अनाथों पर दयालु होता है?
श्लोक 27 (skanda.2.45.27)
उच्चावचभ्रमाद्दुःखं जलयंत्रघटीमिव । अजस्रमधिकर्त्तारं परित्राहि कृपांबुधे
uccāvacabhramādduḥkhaṁ jalayaṁtraghaṭīmiva ajasramadhikarttāraṁ paritrāhi kṛpāṁbudhe
ऊँच-नीच भ्रमण से, जलयंत्र की घड़ियों के समान, निरंतर बढ़ते हुए दुःख से, हे करुणा के सागर! मुझे बचाइए।
श्लोक 28 (skanda.2.45.28)
योगक्षेमाभिसंधाना ये मूढास्त्वामुपासते । लीलाविमुक्तिदं ते वै त्वन्मायापरिमोहिताः
yogakṣemābhisaṁdhānā ye mūḍhāstvāmupāsate līlāvimuktidaṁ te vai tvanmāyāparimohitāḥ
जो मूढ़ लोग योग-क्षेम की कामना से आपकी उपासना करते हैं, वे आपकी माया से अत्यंत मोहित होकर, आपके द्वारा सहज ही दी जा सकने वाली मुक्ति से वंचित रह जाते हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.45.29)
नारायणेति त्वन्नाम कीर्तितं तु यदृच्छया । त्वत्तोऽधिकं जगन्नाथ चतुर्वर्गैकसाधनम्
nārāyaṇeti tvannāma kīrtitaṁ tu yadṛcchayā tvatto'dhikaṁ jagannātha caturvargaikasādhanam
हे जगन्नाथ! "नारायण" यह आपका नाम यदि अनायास ही कीर्तित हो जाए, तो वह चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने का आपसे बढ़कर कोई अन्य साधन नहीं है।
श्लोक 30 (skanda.2.45.30)
त्वं तु तैस्तैः पृथग्यज्ञैस्तास्ताः सिद्धीः प्रयच्छसि । त्वमेकः शरणं नाथ पतितानां भवार्णवे
tvaṁ tu taistaiḥ pṛthagyajñaistāstāḥ siddhīḥ prayacchasi tvamekaḥ śaraṇaṁ nātha patitānāṁ bhavārṇave
आप ही उन-उन भिन्न-भिन्न यज्ञों के द्वारा उन-उन सिद्धियों को प्रदान करते हैं; हे नाथ! संसार-सागर में गिरे हुओं के लिए आप ही एकमात्र शरण हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.45.31)
ज्ञाननौकासमारूढः करुणाक्षेपणीकरः । परं पारं प्रभो नेतुं संसाराब्धेर्विचेतनम्
jñānanaukāsamārūḍhaḥ karuṇākṣepaṇīkaraḥ paraṁ pāraṁ prabho netuṁ saṁsārābdhervicetanam
हे प्रभो! ज्ञान की नौका पर आरूढ़, करुणा को ही डाँड़ के रूप में हाथ में लिए, आप संसार-सागर के परम पार तक अचेत जीव को भी ले जाने वाले हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.45.32)
त्वमेक ईशिषे भक्त्यानन्यया परिचिंतितः । येऽन्ये मुक्तिप्रदा देवाः शास्त्रेषु परिनिष्ठिताः
tvameka īśiṣe bhaktyānanyayā pariciṁtitaḥ ye'nye muktipradā devāḥ śāstreṣu pariniṣṭhitāḥ
आप ही अकेले, अनन्य भक्ति से चिंतन किए जाने पर, शासन करते हैं; शास्त्रों में जिन अन्य देवताओं को मुक्तिदाता कहा गया है,
श्लोक 33 (skanda.2.45.33)
दुःखाब्धिकुम्भयोनिं ते त्वद्भक्तिं प्रापयंति वै
duḥkhābdhikumbhayoniṁ te tvadbhaktiṁ prāpayaṁti vai
वे भी तो तुम्हारी भक्ति को ही — जो दुःख-सागर को सोख लेने वाले अगस्त्य-मुनि के समान है — जीवों तक पहुँचाते हैं।
श्लोक 34 (skanda.2.45.34)
तन्मे प्रसीद भगवन्पदपंकजे ते भक्तिं दृढां वितर नाथ भवाब्धिमुच्चैः । घोरं सुदुस्तरममुं हि यया तरेयमष्टांगयोगजनितश्रमवर्जितोऽपि
tanme prasīda bhagavanpadapaṁkaje te bhaktiṁ dṛḍhāṁ vitara nātha bhavābdhimuccaiḥ ghoraṁ sudustaramamuṁ hi yayā tareyamaṣṭāṁgayogajanitaśramavarjito'pi
इसलिए हे भगवन्! मुझ पर प्रसन्न होइए; हे नाथ! अपने चरण-कमलों में दृढ़ भक्ति प्रदान कीजिए, जिससे मैं अष्टांगयोग के परिश्रम से रहित होते हुए भी इस अत्यंत घोर, दुस्तर संसार-सागर को सहज ही पार कर सकूँ।
श्लोक 35 (skanda.2.45.35)
धर्मार्थकामनिचयैः कुमतिप्रगृह्यैः क्षुद्रैरमीभिरहिताल्पसुखैर्न कार्यम् । आज्ञापयांघ्रिनलिनद्वयचिंतनेद्य सांद्रानुवर्धितसुखार्णवमज्जनं मे
dharmārthakāmanicayaiḥ kumatipragṛhyaiḥ kṣudrairamībhirahitālpasukhairna kāryam ājñāpayāṁghrinalinadvayaciṁtanedya sāṁdrānuvardhitasukhārṇavamajjanaṁ me
धर्म, अर्थ और काम के उन संचयों से, जिन्हें दुर्बुद्धि लोग ही ग्रहण करते हैं, जो तुच्छ, अहितकर और अल्प सुख देने वाले हैं, मुझे कुछ प्रयोजन नहीं है। आज ही आज्ञा दीजिए कि आपके दोनों चरण-कमलों के चिंतन से उत्पन्न, निरंतर बढ़ते हुए सुख-सागर में मैं निमग्न हो जाऊँ।
श्लोक 36 (skanda.2.45.36)
स्तुत्वेत्थं जगदीशस्य पादपद्मांतिके द्विजः । पपात त्राहि कृष्णेति वदन्वाष्पार्द्रया गिरा । तस्थौ स पुनरुत्थाय कृतांजलिपुटः स्तुवन्
stutvetthaṁ jagadīśasya pādapadmāṁtike dvijaḥ papāta trāhi kṛṣṇeti vadanvāṣpārdrayā girā tasthau sa punarutthāya kṛtāṁjalipuṭaḥ stuvan
इस प्रकार जगदीश की स्तुति करके वह ब्राह्मण उनके चरण-कमलों के समीप गिर पड़ा, आँसुओं से भीगी वाणी में "हे कृष्ण! रक्षा कीजिए" कहता हुआ; फिर उठकर, हाथ जोड़कर स्तुति करता हुआ खड़ा रहा।
श्लोक 37 (skanda.2.45.37)
अम्बरीष उवाच । प्रसीद देव सर्वात्मन्नसंख्येयशिरोभुज । असंख्य घ्राणनयनपाणिपाद नमोऽस्तु ते
ambarīṣa uvāca prasīda deva sarvātmannasaṁkhyeyaśirobhuja asaṁkhya ghrāṇanayanapāṇipāda namo'stu te
अंबरीष ने कहा — हे देव! हे सर्वात्मन्! प्रसन्न होइए, हे असंख्य सिरों और भुजाओं वाले! हे असंख्य नासिकाओं, नेत्रों, हाथों और पैरों वाले! आपको नमस्कार है।
श्लोक 38 (skanda.2.45.38)
षट्त्रिंशत्तत्त्वातीतोऽसि निष्प्रपंच प्रपंचकः । चतुर्विधजगद्धाम विश्वमूर्ते नमोऽस्तु ते
ṣaṭtriṁśattattvātīto'si niṣprapaṁca prapaṁcakaḥ caturvidhajagaddhāma viśvamūrte namo'stu te
आप छत्तीस तत्त्वों से परे हैं, स्वयं प्रपंच-रहित होते हुए भी प्रपंच के कर्ता हैं; हे चार प्रकार के जगत् के आश्रय! हे विश्वमूर्ते! आपको नमस्कार है।
श्लोक 39 (skanda.2.45.39)
एकपादस्त्रिपादश्च तीर्थपादोंऽतरिक्षपात् । यस्य पादोद्भवा गंगा पुनाति भुवनत्रयम्
ekapādastripādaśca tīrthapādoṁ'tarikṣapāt yasya pādodbhavā gaṁgā punāti bhuvanatrayam
आप एकपाद भी हैं और त्रिपाद भी, तीर्थ ही जिनका चरण है, अंतरिक्ष जिनका चरण है; जिनके चरण से उत्पन्न गंगा तीनों लोकों को पवित्र करती है।
श्लोक 40 (skanda.2.45.40)
ब्रह्महत्यादिपापानां शोधकं यस्य नाम वै । कीर्तितं सर्वशुभदं नमस्तस्मै शुभात्मने
brahmahatyādipāpānāṁ śodhakaṁ yasya nāma vai kīrtitaṁ sarvaśubhadaṁ namastasmai śubhātmane
जिनका नाम ब्रह्महत्या आदि पापों को शुद्ध करने वाला है, जिसका कीर्तन ही सब कल्याण देने वाला है, उन शुभस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 41 (skanda.2.45.41)
देव त्वन्नामकीर्त्यापि जायंते सर्वसिद्धयः । कौतुकात्त्वां हि मृग्यंति विद्वांसो बुद्धिशालिनः
deva tvannāmakīrtyāpi jāyaṁte sarvasiddhayaḥ kautukāttvāṁ hi mṛgyaṁti vidvāṁso buddhiśālinaḥ
हे देव! आपके नाम के कीर्तनमात्र से भी समस्त सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं; इसी कौतूहल से बुद्धिमान विद्वान् आपकी खोज करते हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.45.42)
नाथ त्वत्पादसलिलं संश्रयात्तापहारकम् । तापत्रयाभिभूतस्य भक्तिं मेऽत्र दृढां कुरु
nātha tvatpādasalilaṁ saṁśrayāttāpahārakam tāpatrayābhibhūtasya bhaktiṁ me'tra dṛḍhāṁ kuru
हे नाथ! आपके चरणों का जल शरण लेने मात्र से संताप हरने वाला है; त्रिविध ताप से पीड़ित मुझमें इस विषय में दृढ़ भक्ति उत्पन्न कीजिए।
श्लोक 43 (skanda.2.45.43)
अनन्यस्वामिनो मेऽद्य नास्त्यन्यत्प्रार्थनीयकम् । प्रणिपत्य जगन्नाथ त्वां प्रयाचे सहस्रधा
ananyasvāmino me'dya nāstyanyatprārthanīyakam praṇipatya jagannātha tvāṁ prayāce sahasradhā
आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई स्वामी नहीं है, आज मुझे प्रार्थना करने योग्य और कुछ नहीं है; हे जगन्नाथ! प्रणाम करके मैं आपसे सहस्र प्रकार से याचना करता हूँ।
श्लोक 44 (skanda.2.45.44)
समस्तपुरुषार्थस्य बीजं त्वत्पादपंकजे । यावत्प्राणान्धारयामि तावद्भक्तिर्दृढास्तु मे
samastapuruṣārthasya bījaṁ tvatpādapaṁkaje yāvatprāṇāndhārayāmi tāvadbhaktirdṛḍhāstu me
समस्त पुरुषार्थों का बीज आपके चरण-कमलों में ही है; जब तक मैं प्राण धारण करूँ, तब तक मेरी भक्ति दृढ़ बनी रहे।
श्लोक 45 (skanda.2.45.45)
सृष्टिं विनिर्ममे चेमां यया भक्त्या पितामहः । संहरत्यखिलं रुद्रो लक्ष्मीश्चैश्वर्यदायिनी
sṛṣṭiṁ vinirmame cemāṁ yayā bhaktyā pitāmahaḥ saṁharatyakhilaṁ rudro lakṣmīścaiśvaryadāyinī
जिस भक्ति से पितामह ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की, रुद्र समस्त का संहार करते हैं, और ऐश्वर्य देने वाली लक्ष्मी आपकी सेवा करती हैं,
श्लोक 46 (skanda.2.45.46)
दीनानुकंपिंस्तां भक्तिं प्रार्थये नान्यमानसः । अनाद्य विद्यापंकेस्मिन्सुदृढे दुस्तरं भृशम्
dīnānukaṁpiṁstāṁ bhaktiṁ prārthaye nānyamānasaḥ anādya vidyāpaṁkesminsudṛḍhe dustaraṁ bhṛśam
— हे दीनों पर दया करने वाले! उसी भक्ति की मैं याचना करता हूँ, अन्यत्र मन न लगाकर; इस अनादि अविद्या के अत्यंत दृढ़, दुस्तर कीचड़ में,
श्लोक 47 (skanda.2.45.47)
निमग्नस्य जगन्नाथ निरालंबं प्रणश्यतः । महामहिम्नस्त्वद्भक्तेर्नान्यदस्ति परायणम्
nimagnasya jagannātha nirālaṁbaṁ praṇaśyataḥ mahāmahimnastvadbhakternānyadasti parāyaṇam
— हे जगन्नाथ! डूबे हुए, आधारहीन, नष्ट होते हुए मेरे लिए, आपकी महिमामयी भक्ति के अतिरिक्त कोई और परम आश्रय नहीं है।
श्लोक 48 (skanda.2.45.48)
श्रुतिस्मृत्यादिसंभिन्नमार्गाः संमोहहेतवः । त्वद्भक्तिमपहार्येते न प्रवर्त्तितुमीश्वराः
śrutismṛtyādisaṁbhinnamārgāḥ saṁmohahetavaḥ tvadbhaktimapahāryete na pravarttitumīśvarāḥ
श्रुति, स्मृति आदि से भिन्न-भिन्न मार्ग तो मोह के ही कारण हैं; आपकी भक्ति को हर लेने वाले ये मार्ग [किसी को सत्य पथ पर] प्रवृत्त करने में समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.45.49)
अनन्यशरणं स्वामिन्ननुकम्पय मां विभो । इति स्तुवञ्जगन्नाथपादपद्मांतिके मुदा
ananyaśaraṇaṁ svāminnanukampaya māṁ vibho iti stuvañjagannāthapādapadmāṁtike mudā
हे स्वामिन्! मुझ अनन्य-शरण पर कृपा कीजिए, हे विभो! — इस प्रकार स्तुति करते हुए वह जगन्नाथ के चरण-कमलों के समीप हर्षपूर्वक,
श्लोक 50 (skanda.2.45.50)
पपात दण्डवद्भूमौ प्रसीदेति वदन्मुहुः । ततस्ते देवताः सर्वे स्तुत्वा संपूज्य केशवम्
papāta daṇḍavadbhūmau prasīdeti vadanmuhuḥ tataste devatāḥ sarve stutvā saṁpūjya keśavam
— दंडवत् भूमि पर गिर पड़ा, बार-बार "प्रसन्न होइए" कहता हुआ। तत्पश्चात् वे सभी देवता केशव की स्तुति और भलीभाँति पूजा करके,
श्लोक 51 (skanda.2.45.51)
तल्लीलापांगसंतुष्टाः प्रयातास्त्रिदिवं पुनः । तत उन्मीलितदृशौ पुण्डरीकांबरीषकौ
tallīlāpāṁgasaṁtuṣṭāḥ prayātāstridivaṁ punaḥ tata unmīlitadṛśau puṇḍarīkāṁbarīṣakau
उनकी लीलामय कृपादृष्टि से संतुष्ट होकर पुनः स्वर्ग को चले गए। तत्पश्चात् पुण्डरीक और अंबरीष ने अपनी आँखें खोलीं।
श्लोक 52 (skanda.2.45.52)
मायया मोहितौ विष्णोः स्वप्नदृष्टमबुध्यताम् । यां दृष्ट्वा दिव्यलीलां हि साक्षात्पललचक्षुषा
māyayā mohitau viṣṇoḥ svapnadṛṣṭamabudhyatām yāṁ dṛṣṭvā divyalīlāṁ hi sākṣātpalalacakṣuṣā
विष्णु की माया से मोहित वे दोनों समझ गए कि यह तो स्वप्न में देखा हुआ था — जिस दिव्य लीला को उन्होंने साक्षात् अपने मांस-नेत्रों से देखा था,
श्लोक 53 (skanda.2.45.53)
पुनर्मानुषभावौ तौ दिव्यसिंहासनस्थितम् । नीलजीमूतसंकाशं फुल्लपद्मायतेक्षणम्
punarmānuṣabhāvau tau divyasiṁhāsanasthitam nīlajīmūtasaṁkāśaṁ phullapadmāyatekṣaṇam
— वे दोनों, अब पुनः मनुष्य-भाव को प्राप्त होकर, स्मरण करते रहे दिव्य सिंहासन पर विराजमान, नील मेघ के समान वर्ण वाले, खिले हुए कमल-सदृश विशाल नेत्रों वाले उस स्वरूप को,
श्लोक 54 (skanda.2.45.54)
शोणाधरं चारुनासं दिव्यकुण्डलभूषितम् । शंखचक्रगदापद्मधारिणं वनमालिनम्
śoṇādharaṁ cārunāsaṁ divyakuṇḍalabhūṣitam śaṅkhacakragadāpadmadhāriṇaṁ vanamālinam
— लाल अधरों वाले, सुंदर नासिका वाले, दिव्य कुंडलों से भूषित, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले, वनमाला पहने हुए,
श्लोक 55 (skanda.2.45.55)
पीनोरस्कं चारुहारमनर्घ्यमुकुटोज्ज्वलम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं दिव्यांगदविभूषितम्
pīnoraskaṁ cāruhāramanarghyamukuṭojjvalam śrīvatsakaustubhoraskaṁ divyāṁgadavibhūṣitam
— विशाल वक्षस्थल वाले, सुंदर हार पहने, अमूल्य मुकुट से देदीप्यमान, श्रीवत्स और कौस्तुभमणि से सुशोभित वक्षस्थल वाले, दिव्य बाजूबंदों से विभूषित,
श्लोक 56 (skanda.2.45.56)
प्रलंबबाहुं दीनार्तपरित्राणसमुद्यतम् । सुवर्णसूत्रसंनद्ध मध्यग्रंथिमणीयुतम्
pralaṁbabāhuṁ dīnārtaparitrāṇasamudyatam suvarṇasūtrasaṁnaddha madhyagraṁthimaṇīyutam
— लंबी भुजाओं वाले, दीन-आर्तों की रक्षा के लिए सदा उद्यत, स्वर्ण-सूत्र से बंधे, बीच में मणि की गाँठ वाली करधनी से युक्त,
श्लोक 57 (skanda.2.45.57)
दिव्य पीतांबरधरं दिव्यस्रग्गन्धभूषितम् । स्वर्णपद्मासनासीनं सर्वांगालिंगितश्रियम्
divya pītāṁbaradharaṁ divyasraggandhabhūṣitam svarṇapadmāsanāsīnaṁ sarvāṁgāliṁgitaśriyam
— दिव्य पीतांबर धारण किए, दिव्य माला और सुगंध से सुशोभित, स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान, अपने संपूर्ण अंगों से लक्ष्मी का आलिंगन किए हुए,
श्लोक 58 (skanda.2.45.58)
प्रपन्नसंतापहरं सुधासागरमुल्बणम् । अशेषवांछाफलदं कल्पवृक्षं सुपुष्पितम्
prapannasaṁtāpaharaṁ sudhāsāgaramulbaṇam aśeṣavāṁchāphaladaṁ kalpavṛkṣaṁ supuṣpitam
— शरणागतों के संताप को हरने वाले, अमृत के विशाल सागर के समान, समस्त इच्छाओं का फल देने वाले, फूले हुए कल्पवृक्ष के समान,
श्लोक 59 (skanda.2.45.59)
दक्षपार्श्वस्थितं तस्य ददृशाते हलायुधम् । बिभर्त्ति येन ब्रह्मांडं बलेन महता विभुः
dakṣapārśvasthitaṁ tasya dadṛśāte halāyudham bibhartti yena brahmāṇḍaṁ balena mahatā vibhuḥ
— और उनके दक्षिण पार्श्व में स्थित हलधर (बलराम) को उन्होंने देखा, जिस महाबल से वे प्रभु ब्रह्मांड को धारण करते हैं।
श्लोक 60 (skanda.2.45.60)
तं बलं नागराजानं फणासप्तकमंडितम् । कैलासशिखरोत्तुंग धवलं कुण्डलोज्ज्वलम्
taṁ balaṁ nāgarājānaṁ phaṇāsaptakamaṁḍitam kailāsaśikharottuṁga dhavalaṁ kuṇḍalojjvalam
उस बल को नागराज शेष के रूप में, सात फणों से सुशोभित, कैलास शिखर के समान ऊँचा, श्वेत वर्ण, कुंडलों से देदीप्यमान,
श्लोक 61 (skanda.2.45.61)
विचित्रवनमालाढ्यं दिव्यनीलनिचोलिनम् । सततं वारुणीक्षीब घूर्णोन्नयनपंकजम्
vicitravanamālāḍhyaṁ divyanīlanicolinam satataṁ vāruṇīkṣība ghūrṇonnayanapaṁkajam
विचित्र वनमाला से युक्त, दिव्य नील वस्त्र पहने, निरंतर मदिरा के मद से घूमते हुए कमल-नेत्रों वाले,
श्लोक 62 (skanda.2.45.62)
निम्नपृष्ठोन्नतोरस्कं कुण्डलीकृतविग्रहम् । शंखचक्रगदापद्मसमुज्ज्वलचतुर्भुजम्
nimnapṛṣṭhonnatoraskaṁ kuṇḍalīkṛtavigraham śaṅkhacakragadāpadmasamujjvalacaturbhujam
नीची पीठ, उन्नत वक्षस्थल वाले, कुंडली मारे हुए शरीर वाले, शंख-चक्र-गदा-पद्म से देदीप्यमान चार भुजाओं वाले — उन्हें देखा।
श्लोक 63 (skanda.2.45.63)
नानालंकाररुचिरं नतकल्मषनाशनम् । तयोर्मध्ये स्थितां भद्रां सुभद्रां कुंकुमारुणाम्
nānālaṁkāraruciraṁ natakalmaṣanāśanam tayormadhye sthitāṁ bhadrāṁ subhadrāṁ kuṁkumāruṇām
नाना अलंकारों से सुंदर, प्रणत जनों के पाप का नाश करने वाले उन्हें देखा; और उन दोनों के मध्य स्थित, कुंकुम के समान लाल वर्ण वाली कल्याणी सुभद्रा को भी देखा।
श्लोक 64 (skanda.2.45.64)
सर्वलावण्यवसतिं सर्वदेव नमस्कृताम् । लक्ष्मीं लक्ष्मीशहृदयपंकजस्थां पृथक्स्थिताम्
sarvalāvaṇyavasatiṁ sarvadeva namaskṛtām lakṣmīṁ lakṣmīśahṛdayapaṁkajasthāṁ pṛthaksthitām
समस्त सौंदर्य की निवासभूमि, समस्त देवों द्वारा नमस्कृत — तथा लक्ष्मीपति के हृदय-कमल में स्थित रहने वाली लक्ष्मी को भी अलग खड़ी हुई देखा।
श्लोक 65 (skanda.2.45.65)
वराब्जधारिणीं देवीं दिव्यनेपथ्यभूषणाम् । प्रपन्नकल्पलतिकां सर्वकल्मषनाशिनीन्
varābjadhāriṇīṁ devīṁ divyanepathyabhūṣaṇām prapannakalpalatikāṁ sarvakalmaṣanāśinīn
वर देने वाली, कमल धारण करने वाली देवी को, दिव्य वेश-भूषा से अलंकृत, शरणागतों के लिए कल्पलता-स्वरूप, समस्त पापों का नाश करने वाली,
श्लोक 66 (skanda.2.45.66)
संसारार्णवमग्नानां तारिणीं देवतारणीम् । वामपार्श्वस्थितं विष्णोरद्राष्टां चक्रमुत्तमम्
saṁsārārṇavamagnānāṁ tāriṇīṁ devatāraṇīm vāmapārśvasthitaṁ viṣṇoradrāṣṭāṁ cakramuttamam
संसार-सागर में डूबे हुओं को पार लगाने वाली, देवताओं को भी तारने वाली — और विष्णु के बाएँ पार्श्व में स्थित उत्तम चक्र को उन्होंने देखा।
श्लोक 67 (skanda.2.45.67)
दार्वग्रनिर्मितं विप्राः स्वर्णभक्तिसमुज्ज्वलम् । चतुर्द्धावस्थितं विष्णुं दृष्ट्वा तौ द्विजबाहुजौ
dārvagranirmitaṁ viprāḥ svarṇabhaktisamujjvalam caturddhāvasthitaṁ viṣṇuṁ dṛṣṭvā tau dvijabāhujau
हे विप्रो! लकड़ी के अग्रभाग से निर्मित, स्वर्ण की पत्तियों से देदीप्यमान — इस प्रकार चार रूपों में स्थित विष्णु को देखकर वे दोनों, ब्राह्मण और क्षत्रिय,
श्लोक 68 (skanda.2.45.68)
अरुणोदयवेलायां श्रमं सार्थममन्यताम् । संस्मृत्य तां स्वप्नलीलां विस्मयं जग्मतुस्तदा
aruṇodayavelāyāṁ śramaṁ sārthamamanyatām saṁsmṛtya tāṁ svapnalīlāṁ vismayaṁ jagmatustadā
अरुणोदय के समय अपने परिश्रम को सार्थक मान बैठे; उस स्वप्न-लीला का स्मरण करके वे दोनों उस समय विस्मय को प्राप्त हुए।
श्लोक 69 (skanda.2.45.69)
न दारुप्रतिमा चेयं साक्षाद्ब्रह्म प्रकाशते । सदोगतानां विप्राणां वाक्यं श्रद्दधतुश्च तौ
na dārupratimā ceyaṁ sākṣādbrahma prakāśate sadogatānāṁ viprāṇāṁ vākyaṁ śraddadhatuśca tau
"यह काष्ठ की प्रतिमा नहीं है, यह तो साक्षात् ब्रह्म ही प्रकट होता है" — और सभा में गए हुए ब्राह्मणों के इस वचन पर वे दोनों श्रद्धा करने लगे।
श्लोक 70 (skanda.2.45.70)
क्वावां महापातकिनौ यातनाक्रमभागिनौ । क्वेदं सुरसमाक्रांतस्थितं विष्णोः प्रदर्शनम्
kvāvāṁ mahāpātakinau yātanākramabhāginau kvedaṁ surasamākrāṁtasthitaṁ viṣṇoḥ pradarśanam
"कहाँ हम दोनों महापातकी, यातनाओं के क्रम के भागी, और कहाँ यह देवताओं से घिरा विष्णु का यह दर्शन!
श्लोक 71 (skanda.2.45.71)
मूर्खयोरावयोरष्टादशविद्याप्रवीणता । यस्मात्तस्मान्न च भ्रांतिर्ज्ञानं तत्समवादिनः
mūrkhayorāvayoraṣṭādaśavidyāpravīṇatā yasmāttasmānna ca bhrāṁtirjñānaṁ tatsamavādinaḥ
हम दोनों मूर्खों को अठारह विद्याओं में जो प्रवीणता प्राप्त हुई है, उससे यह सिद्ध होता है कि यह कोई भ्रम नहीं है — यह ज्ञान उन ब्राह्मणों के कथन के ही अनुरूप है।
श्लोक 72 (skanda.2.45.72)
यदूचुर्दारवं ब्रह्म तीर्थराजतटे स्थितम् । वटमूले प्रकाशंतं दृष्ट्वा जंतुर्विमुच्यते
yadūcurdāravaṁ brahma tīrtharājataṭe sthitam vaṭamūle prakāśaṁtaṁ dṛṣṭvā jaṁturvimucyate
उन्होंने जो कहा था कि तीर्थराज के तट पर स्थित वह काष्ठमय ब्रह्म वटवृक्ष के मूल में प्रकाशित है, जिसका दर्शन करके प्राणी मुक्त हो जाता है —
श्लोक 73 (skanda.2.45.73)
तदेवायं जगन्नाथश्चतुर्द्धा संव्यवस्थितः । क्षितौ यदावतरति चतूरूपः प्रकाशते
tadevāyaṁ jagannāthaścaturddhā saṁvyavasthitaḥ kṣitau yadāvatarati catūrūpaḥ prakāśate
वही यह जगन्नाथ है, जो चार रूपों में स्थित है; जब यह पृथ्वी पर अवतीर्ण होता है, तब यह चार रूपों में प्रकट होता है।
श्लोक 74 (skanda.2.45.74)
तदास्य संनिधावावां स्थास्यावः प्राणधारिणौ । यावन्नान्यत्र गच्छावः क्षुद्रकामपराङ्मुखौ
tadāsya saṁnidhāvāvāṁ sthāsyāvaḥ prāṇadhāriṇau yāvannānyatra gacchāvaḥ kṣudrakāmaparāṅmukhau
इसलिए हम दोनों प्राण धारण करते हुए उसकी सन्निधि में ही रहेंगे, जब तक हम, तुच्छ कामनाओं से विमुख होकर, अन्यत्र नहीं जाते।"
श्लोक 75 (skanda.2.45.75)
इति निश्चित्य मुनयो विष्णौ भक्तिपरायणौ । नारायणाख्यं सततं जपन्तौ मुक्तिमागतौ
iti niścitya munayo viṣṇau bhaktiparāyaṇau nārāyaṇākhyaṁ satataṁ japantau muktimāgatau
ऐसा निश्चय करके, विष्णु में भक्तिपरायण हुए वे दोनों मुनि, निरंतर "नारायण" नाम का जप करते हुए मुक्ति को प्राप्त हुए।
श्लोक 76 (skanda.2.45.76)
जैमिनिरुवाच । प्रसंगात्कथितं ह्येतद्रहस्यं पापनाशनम् । शृण्वंति ये तु चरितं पुण्डरीकांबरीषयोः
jaiminiruvāca prasaṁgātkathitaṁ hyetadrahasyaṁ pāpanāśanam śṛṇvaṁti ye tu caritaṁ puṇḍarīkāṁbarīṣayoḥ
जैमिनि ने कहा — प्रसंगवश यह पापनाशक रहस्य कह दिया गया; जो लोग पुण्डरीक और अंबरीष के इस चरित्र को सुनते हैं,
श्लोक 77 (skanda.2.45.77)
सततं च् कीर्तयंतश्च मुदा परमय युताः । व्रजंति विष्णुनिलयं मुदा परमया युताः । व्रजंति विष्णुनिलयं तेऽपि निर्द्धूतकल्मषाः
satataṁ c kīrtayaṁtaśca mudā paramaya yutāḥ vrajaṁti viṣṇunilayaṁ mudā paramayā yutāḥ vrajaṁti viṣṇunilayaṁ te'pi nirddhūtakalmaṣāḥ
और जो निरंतर हर्षपूर्वक इसका कीर्तन करते हैं, वे परम आनंद से युक्त होकर विष्णु के धाम को जाते हैं; वे भी, पापों से मुक्त होकर, विष्णु के धाम को प्राप्त होते हैं।