वैष्णव खण्ड · अध्याय 46
उत्कल देश का वर्णन एवं महिमा
श्लोक 1 (skanda.2.46.1)
मुनय ऊचुः । कस्मिन्देशे द्विजश्रेष्ठ तत्क्षेत्रं पुरुषोत्तमम् । यत्र नारायणः साक्षाद्दारुरूपी प्रकाशते
munaya ūcuḥ kasmindeśe dvijaśreṣṭha tatkṣetraṁ puruṣottamam yatra nārāyaṇaḥ sākṣāddārurūpī prakāśate
मुनियों ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! वह पुरुषोत्तम क्षेत्र किस देश में है, जहाँ नारायण साक्षात् काष्ठ-रूप में प्रकट होते हैं?
श्लोक 2 (skanda.2.46.2)
जैमिनि रुवाच । उत्कलोनाम देशोऽस्ति ख्यातः परमपावनः । यत्र तीर्थान्यनेकानि पुण्यान्यायतनानि च
jaimini ruvāca utkalonāma deśo'sti khyātaḥ paramapāvanaḥ yatra tīrthānyanekāni puṇyānyāyatanāni ca
जैमिनि ने कहा — उत्कल नाम का एक देश है, परम पवित्र और विख्यात, जहाँ अनेक पवित्र तीर्थ और पुण्य मंदिर हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.46.3)
दक्षिणस्योदधेस्तीरे स तु देशः प्रतिष्ठितः । यत्र स्थिता वै पुरुषाः सदाचारनिदर्शनाः
dakṣiṇasyodadhestīre sa tu deśaḥ pratiṣṭhitaḥ yatra sthitā vai puruṣāḥ sadācāranidarśanāḥ
वह देश दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित है, जहाँ के निवासी पुरुष सदाचार के आदर्श हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.46.4)
वृत्ताध्ययनसंपन्ना यज्वानो यत्र भूसुराः । सृष्ट्यादौ क्रतवो वेदा वेदशास्त्रप्रवर्तकाः
vṛttādhyayanasaṁpannā yajvāno yatra bhūsurāḥ sṛṣṭyādau kratavo vedā vedaśāstrapravartakāḥ
जहाँ के ब्राह्मण सदाचार और अध्ययन से संपन्न, यज्ञ करने वाले हैं, मानो सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न यज्ञ और वेद स्वयं वेद-शास्त्र के प्रवर्तक बनकर प्रकट हुए हों।
श्लोक 5 (skanda.2.46.5)
अष्टादशानां विद्यानां निधानं संप्रकीर्तितम् । गृहे गृहे निवसति लक्ष्मीर्नारायणाज्ञया
aṣṭādaśānāṁ vidyānāṁ nidhānaṁ saṁprakīrtitam gṛhe gṛhe nivasati lakṣmīrnārāyaṇājñayā
वह देश अठारह विद्याओं का भंडार कहा गया है; नारायण की आज्ञा से घर-घर में लक्ष्मी निवास करती हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.46.6)
लज्जाशीला विनीताश्च आधिव्याधिविवर्जिताः । पितृमातृरताः सत्यवादिनो वैष्णवा जनाः
lajjāśīlā vinītāśca ādhivyādhivivarjitāḥ pitṛmātṛratāḥ satyavādino vaiṣṇavā janāḥ
वहाँ के लोग विनम्र, लज्जाशील, मानसिक और शारीरिक रोगों से मुक्त, माता-पिता में अनुरक्त, सत्यवादी और वैष्णव हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.46.7)
न चात्रावैष्णवः कश्चिन्नास्तिको वापि वर्तते । सर्वे परहितास्तत्र न लुब्धा न शठाः खलाः
na cātrāvaiṣṇavaḥ kaścinnāstiko vāpi vartate sarve parahitāstatra na lubdhā na śaṭhāḥ khalāḥ
यहाँ कोई भी अवैष्णव या नास्तिक नहीं रहता; सभी परहितकारी हैं, न लोभी हैं, न धूर्त, न दुष्ट।
श्लोक 8 (skanda.2.46.8)
दीर्घायुषस्तत्र जनाः स्त्रियश्च पतिदेवताः । सुशीला धर्मशीलाश्च त्रपाचारित्रभूषिताः
dīrghāyuṣastatra janāḥ striyaśca patidevatāḥ suśīlā dharmaśīlāśca trapācāritrabhūṣitāḥ
वहाँ के लोग दीर्घायु हैं, और स्त्रियाँ पति को ही देवता मानने वाली, सुशील, धर्मपरायण, लज्जा और सच्चरित्रता से भूषित हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.46.9)
रूपयौवनगर्वाढ्याः सर्वालंकारभूषिताः । कुलशीलवयोवृत्तानुरूपाचारचंचवः
rūpayauvanagarvāḍhyāḥ sarvālaṁkārabhūṣitāḥ kulaśīlavayovṛttānurūpācāracaṁcavaḥ
वे रूप और यौवन के गर्व से युक्त, समस्त आभूषणों से सुशोभित, अपने कुल, स्वभाव, आयु और वृत्ति के अनुरूप आचरण में निपुण हैं।
श्लोक 10 (skanda.2.46.10)
स्वकर्मनिरतास्तत्र प्रजारक्षणदीक्षिताः । क्षत्रिया दानशौंडाश्च शस्त्रशास्त्रविशारदाः
svakarmaniratāstatra prajārakṣaṇadīkṣitāḥ kṣatriyā dānaśauṁḍāśca śastraśāstraviśāradāḥ
वहाँ के क्षत्रिय अपने कर्म में निरत, प्रजा की रक्षा के लिए दीक्षित, दान में उदार और शस्त्र-शास्त्र दोनों में निपुण हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.46.11)
यजंते क्रतुभिः सर्वे सततं भूरिदक्षिणैः । दीप्यंते चित्तयो येषां यूपाः कांचनभूषिताः
yajaṁte kratubhiḥ sarve satataṁ bhūridakṣiṇaiḥ dīpyaṁte cittayo yeṣāṁ yūpāḥ kāṁcanabhūṣitāḥ
सभी निरंतर बहुत दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करते हैं, जिनकी यज्ञाग्नियाँ और स्वर्ण से सुशोभित यूप (यज्ञ-स्तंभ) देदीप्यमान रहते हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.46.12)
येषां गृहेष्वतिथयः कामनाधिकपूजिताः । वैश्याश्च कृषि वाणिज्यगोरक्षावृत्तिसंस्थिताः
yeṣāṁ gṛheṣvatithayaḥ kāmanādhikapūjitāḥ vaiśyāśca kṛṣi vāṇijyagorakṣāvṛttisaṁsthitāḥ
जिनके घरों में अतिथियों की उनकी इच्छा से भी बढ़कर पूजा की जाती है; और वैश्य कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा के व्यवसाय में स्थित हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.46.13)
देवान्गुरून्द्विजान्भक्त्या प्रीणयंति धनैरपि । एकस्य द्वारि यातोऽर्थी न गच्छेदन्यवेश्मनि
devāngurūndvijānbhaktyā prīṇayaṁti dhanairapi ekasya dvāri yāto'rthī na gacchedanyaveśmani
वे देवताओं, गुरुओं और ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक धन से भी प्रसन्न करते हैं; एक के द्वार पर गया हुआ याचक दूसरे के घर नहीं जाता।
श्लोक 14 (skanda.2.46.14)
गीतकाव्यकलाशिल्पकुशलाः प्रियवादिनः । शूद्राश्च धार्मिकास्तत्र स्नानदानक्रियारताः
gītakāvyakalāśilpakuśalāḥ priyavādinaḥ śūdrāśca dhārmikāstatra snānadānakriyāratāḥ
वे गीत, काव्य, कला और शिल्प में कुशल, मधुरभाषी हैं; और शूद्र भी धर्मपरायण, स्नान और दान के कर्मों में रत हैं।
श्लोक 15 (skanda.2.46.15)
कर्मणा मनसा वाचा धनैश्च द्विजसेवकाः । येऽन्ये संकरजातास्ते स्वेस्वे धर्मे प्रतिष्ठिताः
karmaṇā manasā vācā dhanaiśca dvijasevakāḥ ye'nye saṁkarajātāste svesve dharme pratiṣṭhitāḥ
वे कर्म, मन, वाणी और धन से द्विजों की सेवा करने वाले हैं; और जो अन्य मिश्रित जातियाँ हैं, वे भी अपने-अपने धर्म में प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.46.16)
न विपर्यंति ऋतवो नाकाले वर्षते घनः । न सस्यहानिर्न मरुत्क्षुन्न पीडयति प्रजाः
na viparyaṁti ṛtavo nākāle varṣate ghanaḥ na sasyahānirna marutkṣunna pīḍayati prajāḥ
वहाँ ऋतुएँ अपने क्रम से विपरीत नहीं होतीं, न असमय बादल बरसते हैं; न फसल की हानि होती है, न आँधी या भूख प्रजा को पीड़ित करती है।
श्लोक 17 (skanda.2.46.17)
दुर्भिक्षमरके नात्र राष्ट्रभंगः प्रजायते । नालभ्यं तत्र वस्त्वस्ति यत्किंचित्पृथिवीगतम्
durbhikṣamarake nātra rāṣṭrabhaṁgaḥ prajāyate nālabhyaṁ tatra vastvasti yatkiṁcitpṛthivīgatam
यहाँ अकाल या महामारी से राष्ट्र का विनाश नहीं होता; पृथ्वी पर जो कुछ भी वस्तु है, वह वहाँ अप्राप्य नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.2.46.18)
एवं सर्वगुणैर्युक्तो नानाद्रुमलताकुलः । अर्जुनाशोकपुन्नाग तालहिंतालशालकैः
evaṁ sarvaguṇairyukto nānādrumalatākulaḥ arjunāśokapunnāga tālahiṁtālaśālakaiḥ
इस प्रकार समस्त गुणों से युक्त वह देश नाना वृक्षों और लताओं से भरा है — अर्जुन, अशोक, पुन्नाग, ताल, हिंताल और शाल के वृक्षों से,
श्लोक 19 (skanda.2.46.19)
प्राचीनामलकैर्लोध्रैर्बकुलैर्नागकेशरैः । नारिकेलैः प्रियालैश्च सरलैर्देवदारुभिः
prācīnāmalakairlodhrairbakulairnāgakeśaraiḥ nārikelaiḥ priyālaiśca saralairdevadārubhiḥ
— प्राचीनामलक, लोध्र, बकुल, नागकेसर, नारियल, प्रियाल, सरल (चीड़) और देवदारु के वृक्षों से,
श्लोक 20 (skanda.2.46.20)
धवैश्च खदिरैर्बिल्वैः पनसैश्च कपित्थकैः । चंपकैः कर्णिकारैश्च कोविदारैः सपाटलैः
dhavaiśca khadirairbilvaiḥ panasaiśca kapitthakaiḥ caṁpakaiḥ karṇikāraiśca kovidāraiḥ sapāṭalaiḥ
— धव, खदिर, बिल्व, कटहल, कैथ, चंपा, कर्णिकार, कोविदार और पाटल के वृक्षों से,
श्लोक 21 (skanda.2.46.21)
कदंबनिंबनिचुरलरसालामलकैस्तथा । नागरंगैश्च जंबीरैर्नीपकैर्मातुलुंगकैः
kadaṁbaniṁbanicuralarasālāmalakaistathā nāgaraṁgaiśca jaṁbīrairnīpakairmātuluṁgakaiḥ
— कदंब, नीम, निचुल, आम, आँवला, नारंगी, जंबीर, नीप और बिजौरे के वृक्षों से भी,
श्लोक 22 (skanda.2.46.22)
मंदारैः पारिजातैश्च न्यग्रोधागुरुचंदनैः । खर्जूराम्रातकैः सिद्धैर्मुचुकुंदैः सकिंशुकैः
maṁdāraiḥ pārijātaiśca nyagrodhāgurucaṁdanaiḥ kharjūrāmrātakaiḥ siddhairmucukuṁdaiḥ sakiṁśukaiḥ
— मंदार, पारिजात, वट, अगरु, चंदन, खजूर, आमड़ा, मुचुकुंद और पलाश के वृक्षों से,
श्लोक 23 (skanda.2.46.23)
तिंदुकैः सप्तपर्णैश्च अश्वत्थैश्च बिभीतकैः । अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः प्रकीर्णः सुमनोहरैः
tiṁdukaiḥ saptaparṇaiśca aśvatthaiśca bibhītakaiḥ anyaiśca vividhairvṛkṣaiḥ prakīrṇaḥ sumanoharaiḥ
— तेंदू, सप्तपर्णी, पीपल और बहेड़ा के तथा अन्य अनेक मनोहर वृक्षों से भरा हुआ,
श्लोक 24 (skanda.2.46.24)
मालतीकुंदबाणैश्च करवीरैः सितेतरैः । केतकीवनषंडैश्च अतिमुक्तैः सकुब्जकैः
mālatīkuṁdabāṇaiśca karavīraiḥ sitetaraiḥ ketakīvanaṣaṁḍaiśca atimuktaiḥ sakubjakaiḥ
— मालती, कुंद, बाण-पुष्प और श्वेत-अश्वेत कनेर के फूलों से, केतकी के वनखंडों से, अतिमुक्त और कुब्जक लताओं से सुशोभित,
श्लोक 25 (skanda.2.46.25)
एलालवंगकंकोलदाडिमैर्बीजपूरकैः । श्रेणीकृतैः पूगवनैरुद्यानैः शतशो वृतः
elālavaṁgakaṁkoladāḍimairbījapūrakaiḥ śreṇīkṛtaiḥ pūgavanairudyānaiḥ śataśo vṛtaḥ
— इलायची, लौंग, ककोल, अनार और बिजौरे के तथा पंक्तिबद्ध सुपारी के वनों वाले सैकड़ों उद्यानों से घिरा हुआ है।
श्लोक 26 (skanda.2.46.26)
नानाद्रुमलताकीर्णः पर्वतैः सिंधुर्भिर्वृतः । स एष देशप्रवर उत्कलाख्यो द्विजोत्तमाः
nānādrumalatākīrṇaḥ parvataiḥ siṁdhurbhirvṛtaḥ sa eṣa deśapravara utkalākhyo dvijottamāḥ
नाना वृक्षों और लताओं से भरा हुआ, पर्वतों और नदियों से घिरा हुआ — हे द्विजोत्तमो! वही यह उत्तम देश उत्कल नाम से जाना जाता है।
श्लोक 27 (skanda.2.46.27)
ऋषिकुल्यां समासाद्य दक्षिणोदधिगामिनीम् । स्वर्णरेखामहानद्योर्मध्ये देशः प्रतिष्ठितः
ṛṣikulyāṁ samāsādya dakṣiṇodadhigāminīm svarṇarekhāmahānadyormadhye deśaḥ pratiṣṭhitaḥ
दक्षिण समुद्र की ओर बहने वाली ऋषिकुल्या नदी को पाकर, ऋषिकुल्या और स्वर्णरेखा महानदी के मध्य में यह देश स्थित है।
श्लोक 28 (skanda.2.46.28)
सन्त्यत्र पुण्यायतने क्षेत्राणि सुबहून्यपि । पूर्वं वस्तीर्थयात्रायां वर्णितानि मया द्विजाः । भूस्वर्गः सांप्रतं ह्येष कथितः पुरुषोत्तमः
santyatra puṇyāyatane kṣetrāṇi subahūnyapi pūrvaṁ vastīrthayātrāyāṁ varṇitāni mayā dvijāḥ bhūsvargaḥ sāṁprataṁ hyeṣa kathitaḥ puruṣottamaḥ
इस पुण्यभूमि में और भी अनेक क्षेत्र हैं, हे द्विजो! जिनका वर्णन मैंने पहले तीर्थयात्रा-प्रसंग में तुम्हें बताया था। अब यह पुरुषोत्तम-क्षेत्र, जो भूलोक का स्वर्ग कहा गया है, तुम्हें बताया गया।