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वैष्णव खण्ड · अध्याय 47

राजा इंद्रद्युम्न और पुरुषोत्तम-क्षेत्र की खोज

अध्याय 46अध्याय-सूचीअध्याय 48

श्लोक 1 (skanda.2.47.1)

मुनय ऊचुः । कस्मिन्युगे स तु नृप इन्द्रद्युम्नोऽभवन्मुने । कस्मिन्देशेऽस्य नगरं कथं वा पुरुषोत्तमम्

munaya ūcuḥ kasminyuge sa tu nṛpa indradyumno'bhavanmune kasmindeśe'sya nagaraṁ kathaṁ vā puruṣottamam

मुनियों ने कहा — हे मुने! वह राजा इंद्रद्युम्न किस युग में हुआ? किस देश में उसकी नगरी थी? और पुरुषोत्तम कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 2 (skanda.2.47.2)

गत्वा च विष्णोः प्रतिमां कारयामास वा कथम् । एतत्सर्वं विस्तरतः कथयस्व महामुने

gatvā ca viṣṇoḥ pratimāṁ kārayāmāsa vā katham etatsarvaṁ vistarataḥ kathayasva mahāmune

और वहाँ जाकर उसने विष्णु की प्रतिमा किस प्रकार बनवाई? हे महामुने! यह सब हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 3 (skanda.2.47.3)

याथातथ्येन सर्वज्ञ परं कौतृहलं हि नः

yāthātathyena sarvajña paraṁ kautṛhalaṁ hi naḥ

हे सर्वज्ञ! हमें यह यथार्थ रूप से जानने की अत्यंत उत्सुकता है।

श्लोक 4 (skanda.2.47.4)

जैमिनिरुवाच । साधु साधु द्विजश्रेष्ठा यत्पृच्छध्वं पुरातनम् । सर्वपापहरं पुण्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्

jaiminiruvāca sādhu sādhu dvijaśreṣṭhā yatpṛcchadhvaṁ purātanam sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ bhuktimuktipradaṁ śubham

जैमिनि ने कहा — साधु, साधु, हे द्विजश्रेष्ठो! तुमने जो यह प्राचीन वृत्तांत पूछा है, वह समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यकारी, भोग और मोक्ष देने वाला तथा कल्याणकारी है।

श्लोक 5 (skanda.2.47.5)

चरितं तस्य वक्ष्यामि तथावृत्तं कृते युगे । शृणुध्वं मुनयः सर्वे सावधाना जितेन्द्रियाः

caritaṁ tasya vakṣyāmi tathāvṛttaṁ kṛte yuge śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve sāvadhānā jitendriyāḥ

उसका चरित्र मैं वैसा ही बताऊँगा जैसा सत्ययुग में घटित हुआ था; हे सभी मुनियो! सावधान और जितेंद्रिय होकर सुनो।

श्लोक 6 (skanda.2.47.6)

आसीत्कृतयुगे विप्रा इन्द्रद्युम्नो महा नृपः । सूर्यवंशे स धर्मात्मा स्रष्टुः पंचमपूरुषः

āsītkṛtayuge viprā indradyumno mahā nṛpaḥ sūryavaṁśe sa dharmātmā sraṣṭuḥ paṁcamapūruṣaḥ

हे विप्रो! सत्ययुग में इंद्रद्युम्न नामक एक महान राजा था, सूर्यवंश में जन्मा, धर्मात्मा, स्रष्टा ब्रह्मा की पाँचवीं पीढ़ी का पुरुष।

श्लोक 7 (skanda.2.47.7)

सत्यवादी सदाचारोऽवदातः सात्त्विकाग्रणीः । न्यायात्सदा पालयति प्रजाः स्वा इव स प्रजाः

satyavādī sadācāro'vadātaḥ sāttvikāgraṇīḥ nyāyātsadā pālayati prajāḥ svā iva sa prajāḥ

वह सत्यवादी, सदाचारी, निर्मल और सात्त्विक पुरुषों में अग्रणी था; वह सदा न्यायपूर्वक प्रजा का पालन अपनी संतान के समान करता था।

श्लोक 8 (skanda.2.47.8)

अध्यात्मविज्ज्ञानशौंडः शूरः संग्रामवर्द्धनः । सदोद्यतः सदा विप्रपूजकः पितृभक्तिमान्

adhyātmavijjñānaśauṁḍaḥ śūraḥ saṁgrāmavarddhanaḥ sadodyataḥ sadā viprapūjakaḥ pitṛbhaktimān

वह अध्यात्म-ज्ञान में निपुण, शूरवीर, युद्ध में विजयी, सदा तत्पर, सदा ब्राह्मणों का पूजक और पितरों में भक्ति रखने वाला था।

श्लोक 9 (skanda.2.47.9)

अष्टादशसु विद्यासु बृहस्पतिरिवापरः । ऐश्वर्येण सुराधीशः कुबेरः कोषसंचये

aṣṭādaśasu vidyāsu bṛhaspatirivāparaḥ aiśvaryeṇa surādhīśaḥ kuberaḥ koṣasaṁcaye

अठारह विद्याओं में मानो दूसरा बृहस्पति था; ऐश्वर्य में देवताओं के स्वामी इंद्र के समान, और कोष-संचय में कुबेर के समान था।

श्लोक 10 (skanda.2.47.10)

रूपवान्सुभगः शीली दाता भोक्ता प्रियंवदः । यष्टा समस्तयज्ञानां ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः

rūpavānsubhagaḥ śīlī dātā bhoktā priyaṁvadaḥ yaṣṭā samastayajñānāṁ brahmaṇyaḥ satyasaṁgaraḥ

वह रूपवान, सुंदर, सुशील, दानी, भोक्ता, मधुरभाषी था; समस्त यज्ञों का यजनकर्ता, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ था।

श्लोक 11 (skanda.2.47.11)

वल्लभो नरनारीणां पौर्णमास्यां यथा शशी । आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः शत्रुपक्षक्षयंकरः

vallabho naranārīṇāṁ paurṇamāsyāṁ yathā śaśī āditya iva duṣprekṣyaḥ śatrupakṣakṣayaṁkaraḥ

वह पुरुषों और स्त्रियों दोनों को पूर्णिमा के चंद्रमा के समान प्रिय था; सूर्य के समान तेज से देख पाना कठिन, तथा शत्रु-पक्ष का नाश करने वाला था।

श्लोक 12 (skanda.2.47.12)

वैष्णवः सत्य संपन्नो जितक्रोधो जितेंद्रियः । राजसूयं क्रतुवरं वाजिमेधसहस्रकम्

vaiṣṇavaḥ satya saṁpanno jitakrodho jiteṁdriyaḥ rājasūyaṁ kratuvaraṁ vājimedhasahasrakam

वह वैष्णव, सत्य से संपन्न, क्रोध और इंद्रियों को जीतने वाला था। उसने राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञ और सहस्र अश्वमेध यज्ञ किए,

श्लोक 13 (skanda.2.47.13)

इयाज परमः श्रीमान्मुमुक्षुर्धर्मतत्परः । एवं सर्वगुणोपेतः स पृथ्वीं पालयन्नृपः

iyāja paramaḥ śrīmānmumukṣurdharmatatparaḥ evaṁ sarvaguṇopetaḥ sa pṛthvīṁ pālayannṛpaḥ

यह अत्यंत श्रीमान्, मुमुक्षु और धर्मपरायण राजा उन्हें संपन्न करता रहा। इस प्रकार समस्त गुणों से युक्त वह राजा पृथ्वी का पालन करता था।

श्लोक 14 (skanda.2.47.14)

अवंतींनाम नगरीं मालवे भुवि विश्रुताम् । उवास सर्वरत्नाढ्यां द्वितीयाममरावतीम्

avaṁtīṁnāma nagarīṁ mālave bhuvi viśrutām uvāsa sarvaratnāḍhyāṁ dvitīyāmamarāvatīm

वह मालव देश में विख्यात, सब रत्नों से समृद्ध, मानो दूसरी अमरावती के समान अवंती नामक नगरी में निवास करता था।

श्लोक 15 (skanda.2.47.15)

तत्र स्थितो नरपतिर्विष्णौ भक्तिमनुत्तमाम् । चकार मनसा वाचा कर्मणा परमाद्भुताम्

tatra sthito narapatirviṣṇau bhaktimanuttamām cakāra manasā vācā karmaṇā paramādbhutām

वहाँ रहते हुए उस राजा ने मन, वचन और कर्म से विष्णु के प्रति अत्यंत उत्कृष्ट और अद्भुत भक्ति की।

श्लोक 16 (skanda.2.47.16)

एवं प्रवर्तमानोऽसौ कदाचिच्छ्रीपतेर्विभोः । पूजासमयमासाद्य देवार्चनगृहांतरे

evaṁ pravartamāno'sau kadācicchrīpatervibhoḥ pūjāsamayamāsādya devārcanagṛhāṁtare

इस प्रकार आचरण करते हुए वह एक बार श्रीपति भगवान् की पूजा का समय पाकर, देव-अर्चन-गृह के भीतर,

श्लोक 17 (skanda.2.47.17)

विद्वद्भिः कविभिश्चैव तीर्थयात्राप्रसिद्धिभिः । दैवज्ञैः श्रोत्रियैः सार्द्धं पुरोहितमवस्थितम्

vidvadbhiḥ kavibhiścaiva tīrthayātrāprasiddhibhiḥ daivajñaiḥ śrotriyaiḥ sārddhaṁ purohitamavasthitam

— विद्वानों, कवियों, तीर्थयात्रा में प्रसिद्ध व्यक्तियों, ज्योतिषियों और वेदपाठी श्रोत्रियों के साथ बैठे हुए अपने पुरोहित से,

श्लोक 18 (skanda.2.47.18)

आदृतो व्याजहारेद ज्ञायतां क्षेत्रमुत्तमम् । यत्र साक्षाज्जगन्नाथं पश्यामोऽनेन चक्षुषा

ādṛto vyājahāreda jñāyatāṁ kṣetramuttamam yatra sākṣājjagannāthaṁ paśyāmo'nena cakṣuṣā

— आदरपूर्वक कहा — "जान लिया जाए वह उत्तम क्षेत्र, जहाँ हम इन्हीं नेत्रों से साक्षात् जगन्नाथ का दर्शन कर सकें।"

श्लोक 19 (skanda.2.47.19)

एवमुक्तो नृपाग्र्येण वैष्णवेन पुरोहितः । तीर्थयातृव्रजं पश्यन्नुवाच प्रश्रितं वचः

evamukto nṛpāgryeṇa vaiṣṇavena purohitaḥ tīrthayātṛvrajaṁ paśyannuvāca praśritaṁ vacaḥ

वैष्णव प्रधान राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर पुरोहित ने तीर्थयात्रियों के समूह की ओर देखकर विनम्र वचन कहा —

श्लोक 20 (skanda.2.47.20)

भोभोस्तीर्थाटनव्यग्रा धार्मिकास्तीर्थकोविदाः । यदादिशति देवोऽयं युष्माभिस्तच्छ्रुतं किल

bhobhostīrthāṭanavyagrā dhārmikāstīrthakovidāḥ yadādiśati devo'yaṁ yuṣmābhistacchrutaṁ kila

"हे तीर्थाटन में तत्पर धर्मात्मा, तीर्थों में निपुण पुरुषो! यह राजा जो आदेश दे रहे हैं, उसे तुमने सुन ही लिया है।

श्लोक 21 (skanda.2.47.21)

विज्ञाय तस्याभिप्रायं कश्चित्सुबहुतीर्थगः । उवाच वाग्ग्मी राजानं बद्धांजलिपुटं मुदा

vijñāya tasyābhiprāyaṁ kaścitsubahutīrthagaḥ uvāca vāggmī rājānaṁ baddhāṁjalipuṭaṁ mudā

उसका अभिप्राय समझकर, बहुत तीर्थों में विचरण करने वाले एक वाक्पटु पुरुष ने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा से कहा —

श्लोक 22 (skanda.2.47.22)

राजन्ननेकतीर्थानि व्यचारिषमहं प्रभो । आशैशवात्क्षितितले श्रुतान्यन्यैस्तु यानि वै

rājannanekatīrthāni vyacāriṣamahaṁ prabho āśaiśavātkṣititale śrutānyanyaistu yāni vai

"हे राजन्! हे प्रभो! मैंने बचपन से ही पृथ्वी पर अनेक तीर्थों का भ्रमण किया है, और जिन अन्य तीर्थों के विषय में मैंने दूसरों से सुना है,

श्लोक 23 (skanda.2.47.23)

ओढ्रदेश इति ख्यातो वर्षे भारतसंज्ञिते । दक्षिणस्योदधेस्तीरे क्षेत्रं श्रीपुरुषोत्तमम्

oḍhradeśa iti khyāto varṣe bhāratasaṁjñite dakṣiṇasyodadhestīre kṣetraṁ śrīpuruṣottamam

— भारतवर्ष में ओढ्रदेश नाम से विख्यात एक देश है, वहाँ दक्षिण समुद्र के तट पर श्रीपुरुषोत्तम नामक क्षेत्र है,

श्लोक 24 (skanda.2.47.24)

यत्र नीलगिरिर्नाम समंतात्काननावृतः । तस्योत्संगे कल्पवृक्षः समंतात्क्रोशसंमितः

yatra nīlagirirnāma samaṁtātkānanāvṛtaḥ tasyotsaṁge kalpavṛkṣaḥ samaṁtātkrośasaṁmitaḥ

जहाँ नीलगिरि नामक पर्वत है, जो चारों ओर वन से घिरा है; उसकी गोद में एक क्रोश तक फैला हुआ कल्पवृक्ष है,

श्लोक 25 (skanda.2.47.25)

तस्य छायां समाक्रम्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति । तस्य पश्चाद्दिशि ख्यातं कुंडं रौहिणसंज्ञितम्

tasya chāyāṁ samākramya brahmahatyāṁ vyapohati tasya paścāddiśi khyātaṁ kuṁḍaṁ rauhiṇasaṁjñitam

जिसकी छाया में प्रवेश करने मात्र से ब्राह्मण-हत्या का पाप दूर हो जाता है। उसकी पश्चिम दिशा में रौहिण नाम से विख्यात एक कुंड है,

श्लोक 26 (skanda.2.47.26)

तत्पूर्णं कारणांभोभिः स्पर्शनादेव मुक्तिदम् । तस्य प्राक्तटमास्थाय नीलेंद्रमणिनिर्मिता

tatpūrṇaṁ kāraṇāṁbhobhiḥ sparśanādeva muktidam tasya prāktaṭamāsthāya nīleṁdramaṇinirmitā

जो प्रलय के जल से भरा हुआ है और जिसका स्पर्श मात्र मुक्ति देने वाला है। उसके पूर्वी तट पर स्थित, नीलमणि से निर्मित,

श्लोक 27 (skanda.2.47.27)

तनुः श्रीवासुदेवस्य साक्षान्मुक्तिप्रदायिनी । तत्र कुंडे तु यः स्नात्वा दृष्ट्वा तु पुरुषोत्तमम्

tanuḥ śrīvāsudevasya sākṣānmuktipradāyinī tatra kuṁḍe tu yaḥ snātvā dṛṣṭvā tu puruṣottamam

— श्री वासुदेव की वह मूर्ति साक्षात् मुक्ति प्रदान करने वाली है। जो उस कुंड में स्नान करके पुरुषोत्तम का दर्शन करता है,

श्लोक 28 (skanda.2.47.28)

अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य विमुच्यते । तत्रास्त आश्रमश्रेष्ठः ख्यातः शबरदीपकः

aśvamedhasahasrasya phalaṁ prāpya vimucyate tatrāsta āśramaśreṣṭhaḥ khyātaḥ śabaradīpakaḥ

वह सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल पाकर मुक्त हो जाता है। वहाँ एक श्रेष्ठ आश्रम है, जो शबरदीपक के नाम से विख्यात है,

श्लोक 29 (skanda.2.47.29)

पश्चिमस्यां दिशि विभोर्वेष्टितः शबरालयैः । यस्मादेकपदीमार्गो येन विष्ण्वालयं व्रजेत्

paścimasyāṁ diśi vibhorveṣṭitaḥ śabarālayaiḥ yasmādekapadīmārgo yena viṣṇvālayaṁ vrajet

जो प्रभु की पश्चिम दिशा में, शबरों के निवासों से घिरा हुआ है, जहाँ से एक पगडंडी मार्ग जाता है, जिससे विष्णु के मंदिर तक पहुँचा जा सकता है,

श्लोक 30 (skanda.2.47.30)

यत्र साक्षाज्जगन्नाथः शंखचक्रगदाधरः । जंतूनां दर्शनान्मुक्तिं यो ददाति कृपानिधिः

yatra sākṣājjagannāthaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ jaṁtūnāṁ darśanānmuktiṁ yo dadāti kṛpānidhiḥ

जहाँ साक्षात् जगन्नाथ शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए विराजमान हैं, वे करुणा के सागर, जो अपने दर्शन मात्र से प्राणियों को मुक्ति प्रदान करते हैं।

श्लोक 31 (skanda.2.47.31)

तत्रोषितं मया राजन्वर्षं श्रीपुरुषोत्तमे । तुष्ट्यर्थं देवदेवस्य व्रतिना वनवासिना

tatroṣitaṁ mayā rājanvarṣaṁ śrīpuruṣottame tuṣṭyarthaṁ devadevasya vratinā vanavāsinā

हे राजन्! उस श्रीपुरुषोत्तम में मैंने देवाधिदेव को प्रसन्न करने के लिए एक वर्ष तक व्रतधारी और वनवासी बनकर निवास किया।

श्लोक 32 (skanda.2.47.32)

प्रतिरात्रं भगवतो दर्शनाय दिवौकसाम् । आगतानां महाराज दिव्यगंधो ह्यमानुषः

pratirātraṁ bhagavato darśanāya divaukasām āgatānāṁ mahārāja divyagaṁdho hyamānuṣaḥ

हे महाराज! प्रतिरात्रि भगवान् के दर्शन के लिए आने वाले देवताओं की अलौकिक दिव्य सुगंध वहाँ अनुभव होती है,

श्लोक 33 (skanda.2.47.33)

नानास्तुतिवचःकल्पपुष्पवृष्टिश्च लभ्यते । महिमैष न कुत्रापि विष्णोः स्थाने प्रकाशते

nānāstutivacaḥkalpapuṣpavṛṣṭiśca labhyate mahimaiṣa na kutrāpi viṣṇoḥ sthāne prakāśate

वहाँ नाना प्रकार की स्तुति-वाणी और दिव्य पुष्पवर्षा भी अनुभव होती है; यह महिमा विष्णु के अन्य किसी स्थान में प्रकट नहीं होती।

श्लोक 34 (skanda.2.47.34)

पौराणिकी प्रवृत्तिश्च श्रुता तत्र महीपते । वायसो माधवं दृष्ट्वा तिर्यग्देहोऽपि मुच्यते

paurāṇikī pravṛttiśca śrutā tatra mahīpate vāyaso mādhavaṁ dṛṣṭvā tiryagdeho'pi mucyate

हे महीपते! वहाँ मैंने यह पौराणिक वृत्तांत भी सुना कि एक कौआ भी माधव का दर्शन कर, पशु-पक्षी की देह में होते हुए भी, मुक्त हो गया।

श्लोक 35 (skanda.2.47.35)

नाधिकारी पुण्यकृत्ये ज्ञानहीनोऽपि पार्थिव । तृषार्त्तो रौहिणे कुंडे जलं पातुं समागतः

nādhikārī puṇyakṛtye jñānahīno'pi pārthiva tṛṣārtto rauhiṇe kuṁḍe jalaṁ pātuṁ samāgataḥ

हे पार्थिव! पुण्य-कर्म का अधिकारी न होते हुए, ज्ञानरहित होते हुए भी, प्यास से पीड़ित होकर रौहिण कुंड में जल पीने आया हुआ कोई मूर्ख भी,

श्लोक 36 (skanda.2.47.36)

त्यक्त्वा कालवशात्प्राणान्विष्णुसारूप्यमाप्तवान् । अहमासं पुरा मूर्खस्तत्प्रसादात्तु सांप्रतम्

tyaktvā kālavaśātprāṇānviṣṇusārūpyamāptavān ahamāsaṁ purā mūrkhastatprasādāttu sāṁpratam

— काल के वशीभूत होकर वहीं प्राण त्यागकर विष्णु के सारूप्य को प्राप्त हुआ। मैं भी पहले मूर्ख था, किंतु उन्हीं की कृपा से अब,

श्लोक 37 (skanda.2.47.37)

अष्टादशसु विद्यासु शेषो वा स्यान्ममापरः । मतिश्च निर्मला जाता विष्णोः पश्यामि नापरम्

aṣṭādaśasu vidyāsu śeṣo vā syānmamāparaḥ matiśca nirmalā jātā viṣṇoḥ paśyāmi nāparam

अठारह विद्याओं में मुझसे बढ़कर मानो शेषनाग ही हो सकता है; मेरी बुद्धि निर्मल हो गई है, और विष्णु से बढ़कर मुझे कुछ और नहीं दिखता।

श्लोक 38 (skanda.2.47.38)

त्वं यस्माद्विष्णुभक्तोऽसि सततं च दृढव्रतः । अतस्तवोपदेशार्थमागतोऽहं तवांतिकम्

tvaṁ yasmādviṣṇubhakto'si satataṁ ca dṛḍhavrataḥ atastavopadeśārthamāgato'haṁ tavāṁtikam

चूँकि आप विष्णु के भक्त हैं और सदा दृढ़-व्रती हैं, इसलिए मैं आपको उपदेश देने के लिए ही आपके समीप आया हूँ।

श्लोक 39 (skanda.2.47.39)

नो धनं न च भूमिं च त्वत्तः संप्रार्थ्यतेऽधुना । व्यलीकमेतन्मा बुद्ध्वा तत्रस्थं श्रीधरं भज

no dhanaṁ na ca bhūmiṁ ca tvattaḥ saṁprārthyate'dhunā vyalīkametanmā buddhvā tatrasthaṁ śrīdharaṁ bhaja

अभी न धन और न भूमि आपसे माँगी जा रही है; इसे झूठ न समझकर उस स्थान पर विराजमान श्रीधर की उपासना कीजिए।"

श्लोक 40 (skanda.2.47.40)

एवमुक्त्वा तु जटिलः सर्वेषां पश्यतां तदा । अंतर्द्धानं जगामाशु राजा परमविस्मयम्

evamuktvā tu jaṭilaḥ sarveṣāṁ paśyatāṁ tadā aṁtarddhānaṁ jagāmāśu rājā paramavismayam

ऐसा कहकर वह जटाधारी तपस्वी सबके देखते-देखते तत्काल अंतर्धान हो गया; राजा परम विस्मय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 41 (skanda.2.47.41)

अवाप्य व्याकुलमतिः कथं मे निर्वहेदिति । पुरोहितमुवाचेदं तस्यैवार्थस्य साधने

avāpya vyākulamatiḥ kathaṁ me nirvahediti purohitamuvācedaṁ tasyaivārthasya sādhane

व्याकुल मन से "यह मेरे लिए कैसे सिद्ध होगा" — ऐसा सोचकर, उसी कार्य को सिद्ध करने के लिए उसने अपने पुरोहित से यह कहा —

श्लोक 42 (skanda.2.47.42)

इन्द्रद्युम्न उवाच । अमानुषमिदं वृत्तं श्रुत्वेदानीममानुषात् । बुद्धिस्त्वरयते तत्र यत्रास्तेऽसौ गदाधरः

indradyumna uvāca amānuṣamidaṁ vṛttaṁ śrutvedānīmamānuṣāt buddhistvarayate tatra yatrāste'sau gadādharaḥ

इंद्रद्युम्न ने कहा — इस अलौकिक व्यक्ति से यह अलौकिक वृत्तांत सुनकर, अब मेरी बुद्धि वहाँ जाने के लिए शीघ्रता कर रही है, जहाँ वे गदाधर विराजमान हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.47.43)

मम धर्मार्थकामा हि त्वदायत्ता द्विजोत्तम । अविरुद्धास्त्वत्प्रसादात्त्रिवर्गः साधितो मया

mama dharmārthakāmā hi tvadāyattā dvijottama aviruddhāstvatprasādāttrivargaḥ sādhito mayā

हे द्विजोत्तम! मेरे धर्म, अर्थ और काम आप पर ही निर्भर हैं; आपकी ही कृपा से मैंने बिना विरोध के त्रिवर्ग को सिद्ध किया है।

श्लोक 44 (skanda.2.47.44)

इदानीं चेद्द्विजश्रेष्ठ त्वमत्रार्थे गमिष्यसि । चतुर्वर्गस्तु संपूर्णः प्राप्तः स्यात्सांप्रतं मया

idānīṁ ceddvijaśreṣṭha tvamatrārthe gamiṣyasi caturvargastu saṁpūrṇaḥ prāptaḥ syātsāṁprataṁ mayā

अब यदि, हे द्विजश्रेष्ठ, आप इस कार्य के लिए वहाँ जाएँ, तो अभी मुझे चारों पुरुषार्थ पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाएँगे।

श्लोक 45 (skanda.2.47.45)

पुरोहित उवाच । बाढमेतत्करिष्यामि यथा द्रक्ष्यसि केशवम् । वर्माच्छादितचक्षुर्भ्यां साक्षान्मुक्तिप्रदं विभुम्

purohita uvāca bāḍhametatkariṣyāmi yathā drakṣyasi keśavam varmācchāditacakṣurbhyāṁ sākṣānmuktipradaṁ vibhum

पुरोहित ने कहा — निश्चय ही मैं यह करूँगा, जिससे आप उन केशव को, जो कवच से ढके नेत्रों से भी साक्षात् मुक्तिदाता प्रभु हैं, देख सकें।

श्लोक 46 (skanda.2.47.46)

एवमत्र यतिष्यामि तत्र सर्वे यथा वयम् । वत्स्यामः ससहायाश्च क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे

evamatra yatiṣyāmi tatra sarve yathā vayam vatsyāmaḥ sasahāyāśca kṣetre śrīpuruṣottame

मैं इसके लिए प्रयत्न करूँगा, जिससे हम सब अपने सहायकों सहित उस श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में निवास कर सकें।

श्लोक 47 (skanda.2.47.47)

साफल्यं किमतो राजञ्जन्मिनो जन्मनो भवेत् । पुरुषं तमसः पारं साक्षाद्द्रक्ष्यसि माधवम्

sāphalyaṁ kimato rājañjanmino janmano bhavet puruṣaṁ tamasaḥ pāraṁ sākṣāddrakṣyasi mādhavam

हे राजन्! जन्म लेने वाले प्राणी के जन्म की सफलता इससे बढ़कर और क्या हो सकती है? आप उस अंधकार से परे पुरुष, साक्षात् माधव का दर्शन करेंगे।

श्लोक 48 (skanda.2.47.48)

भ्राता विद्यापतिर्नाम कनीयान्मे व्रजिष्यति । देशभ्रमणशीलैश्च चारैः सह तवाधुना

bhrātā vidyāpatirnāma kanīyānme vrajiṣyati deśabhramaṇaśīlaiśca cāraiḥ saha tavādhunā

मेरा छोटा भाई, जिसका नाम विद्यापति है, अभी देश में भ्रमण करने के स्वभाव वाले आपके गुप्तचरों के साथ वहाँ जाएगा।

श्लोक 49 (skanda.2.47.49)

तत्र गत्वा जगन्नाथं दृष्ट्वा स हि गिरौ यथा । कंटकावाससंस्थानं भूप्रदेशं प्रमीय च

tatra gatvā jagannāthaṁ dṛṣṭvā sa hi girau yathā kaṁṭakāvāsasaṁsthānaṁ bhūpradeśaṁ pramīya ca

वहाँ जाकर, जगन्नाथ का दर्शन करके, वह उस पर्वत को, वहाँ के कँटीले निवास-स्थानों को, और उस भूप्रदेश को नापकर,

श्लोक 50 (skanda.2.47.50)

तूर्णं प्रवृत्तिमानेता श्रेयोऽस्माकं भविष्यति । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा पुनरुवाच ह

tūrṇaṁ pravṛttimānetā śreyo'smākaṁ bhaviṣyati tasya tadvacanaṁ śrutvā rājā punaruvāca ha

शीघ्र ही समाचार लेकर लौटेगा — इसी में हमारा कल्याण होगा। उसका यह वचन सुनकर राजा ने फिर कहा —

श्लोक 51 (skanda.2.47.51)

इन्द्रद्युम्न उवाच । साधु ब्रह्मन्समाधाय व्यवसायो विचारितः । अहं प्रथमतोप्येतच्छ्रुत्वैव कृतनिश्चयः

indradyumna uvāca sādhu brahmansamādhāya vyavasāyo vicāritaḥ ahaṁ prathamatopyetacchrutvaiva kṛtaniścayaḥ

इंद्रद्युम्न ने कहा — साधु, हे ब्राह्मण! आपने भलीभाँति विचारकर यह उपाय सोचा है; मैं भी पहले ही, यह सुनते ही, निश्चय कर चुका था

श्लोक 52 (skanda.2.47.52)

तत्र क्षेत्रे भगवतः सन्निधौ निवसाम्यहम् । तद्गच्छतु तव भ्राता यथेष्टं साधयिष्यति

tatra kṣetre bhagavataḥ sannidhau nivasāmyaham tadgacchatu tava bhrātā yatheṣṭaṁ sādhayiṣyati

कि मैं उस क्षेत्र में भगवान् की सन्निधि में निवास करूँगा। अतः आपका भाई वहाँ जाए, वह जैसा चाहेगा वैसा सिद्ध करेगा।

श्लोक 53 (skanda.2.47.53)

इत्युक्त्वांतःपुरं राजा प्रविवेश मुदान्वितः । पुरोहितोऽपि तान्सर्वान्यथावदनुपूर्वशः

ityuktvāṁtaḥpuraṁ rājā praviveśa mudānvitaḥ purohito'pi tānsarvānyathāvadanupūrvaśaḥ

ऐसा कहकर राजा हर्षपूर्वक अपने अंतःपुर में प्रविष्ट हो गया। पुरोहित ने भी उन सभी गुप्तचरों को यथाविधि, क्रमशः,

श्लोक 54 (skanda.2.47.54)

राजाज्ञया पूजयित्वा प्राहिणोत्स्वं स्वमाश्रमम् । भ्रातरं सुमुहूर्ते च दैवज्ञकृतनिश्चये

rājājñayā pūjayitvā prāhiṇotsvaṁ svamāśramam bhrātaraṁ sumuhūrte ca daivajñakṛtaniścaye

राजा की आज्ञा से सम्मानित करके अपने-अपने आश्रम को विदा किया; और शुभ मुहूर्त में, ज्योतिषियों द्वारा निश्चित समय पर, अपने भाई को

श्लोक 55 (skanda.2.47.55)

प्रस्थापयामास तदा कृतस्वस्त्ययनं द्विजैः । अपसर्पैः प्रत्ययिकैः पुष्पस्यन्दनमास्थितः

prasthāpayāmāsa tadā kṛtasvastyayanaṁ dvijaiḥ apasarpaiḥ pratyayikaiḥ puṣpasyandanamāsthitaḥ

— ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर, विश्वासपात्र गुप्तचरों के साथ, फूलों से सजे रथ पर आरूढ़ करके भेजा।

श्लोक 56 (skanda.2.47.56)

ततः संप्रस्थितो विप्राः स तु विद्यापतिर्द्विजः । मनसा चिन्तयामास मध्ये स्यन्दनमास्थितः

tataḥ saṁprasthito viprāḥ sa tu vidyāpatirdvijaḥ manasā cintayāmāsa madhye syandanamāsthitaḥ

हे विप्रो! तब वह ब्राह्मण विद्यापति यात्रा पर निकल पड़ा, और रथ के मध्य बैठे हुए वह मन में विचार करने लगा —

श्लोक 57 (skanda.2.47.57)

अहो मे सफलं जन्म सुकल्या शर्वरी च मे । द्रक्ष्यामि यद्भगवतो मुखपद्ममघापहम्

aho me saphalaṁ janma sukalyā śarvarī ca me drakṣyāmi yadbhagavato mukhapadmamaghāpaham

"अहो! मेरा जन्म सफल है, और यह रात्रि भी मेरे लिए शुभ है, क्योंकि मैं भगवान् के उस मुख-कमल का दर्शन करूँगा, जो पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 58 (skanda.2.47.58)

श्रवणाद्यैरुपायैर्यं यतमाना अहर्निशम् । पश्यंति यतयः चेतः पुंडरीके व्यवस्थितम्

śravaṇādyairupāyairyaṁ yatamānā aharniśam paśyaṁti yatayaḥ cetaḥ puṁḍarīke vyavasthitam

जिसे श्रवण आदि साधनों से रात-दिन प्रयत्न करते हुए यति लोग, अपने चित्त को हृदय-कमल में स्थिर करके, अंतर्दृष्टि से देखते हैं,

श्लोक 59 (skanda.2.47.59)

तमद्य नीलशिखरिशृंगस्थं बिभ्रतं वपुः । वपुःसंबन्धहरणं साक्षाद्द्रक्ष्यामि चक्रिणम्

tamadya nīlaśikhariśṛṁgasthaṁ bibhrataṁ vapuḥ vapuḥsaṁbandhaharaṇaṁ sākṣāddrakṣyāmi cakriṇam

उसी को आज, नीले पर्वत के शिखर पर स्थित, वह देह धारण किए हुए, जन्म-मृत्यु के देह-संबंध को हरने वाले चक्रधारी को, मैं साक्षात् देखूँगा।

श्लोक 60 (skanda.2.47.60)

श्रुति स्मृतीहासपुराणवाक्यैर्यद्रूपमास्थापयितुं न शक्यम् । तच्छ्रीनिधे रूपमदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तरिष्यामि भवांबुराशिम्

śruti smṛtīhāsapurāṇavākyairyadrūpamāsthāpayituṁ na śakyam tacchrīnidhe rūpamadṛṣṭapūrvaṁ dṛṣṭvā tariṣyāmi bhavāṁburāśim

श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों के वचनों से भी जिस रूप को पूर्ण रूप से स्थापित नहीं किया जा सका, श्री के उस निधि-स्वरूप, पहले कभी न देखे गए रूप को देखकर मैं संसार-सागर को पार कर जाऊँगा।

श्लोक 61 (skanda.2.47.61)

यन्नामसंकीर्तनतस्त्रिवांहः संघः प्रणाशं स्मरतां प्रयाति । तमद्य विश्वेश्वरमप्रमेयं साक्षात्करिष्यामि गिरौ वसन्तम्

yannāmasaṁkīrtanatastrivāṁhaḥ saṁghaḥ praṇāśaṁ smaratāṁ prayāti tamadya viśveśvaramaprameyaṁ sākṣātkariṣyāmi girau vasantam

जिसके नाम के कीर्तन मात्र से स्मरण करने वालों के त्रिविध पापों का समूह नाश को प्राप्त हो जाता है, उसी अप्रमेय विश्वेश्वर को, जो पर्वत पर निवास करते हैं, मैं आज साक्षात् करूँगा।

श्लोक 62 (skanda.2.47.62)

यत्पादपद्माननुसंहितस्य पदेपदे दुःखमुपार्जितस्य । तमः प्रकांडप्रभवं कदाचिन्नात्माश्रितं कर्मभिरेति नाशम्

yatpādapadmānanusaṁhitasya padepade duḥkhamupārjitasya tamaḥ prakāṁḍaprabhavaṁ kadācinnātmāśritaṁ karmabhireti nāśam

जिसके चरण-कमल का आश्रय न लेने वाले, जिसने पद-पद पर दुःख अर्जित किया है, उस पर आश्रित सघन अंधकार से उत्पन्न अज्ञान अपने कर्मों से कभी नाश को नहीं प्राप्त होता।

श्लोक 63 (skanda.2.47.63)

आराध्य सूक्ष्मं स्वगुहानिवासं यं पञ्चकोषावृतमात्मसंस्थम् । वेदांतगीराह न चापि वेद वंदे स्वविद्यैकनिवेद्यमाद्यम्

ārādhya sūkṣmaṁ svaguhānivāsaṁ yaṁ pañcakoṣāvṛtamātmasaṁstham vedāṁtagīrāha na cāpi veda vaṁde svavidyaikanivedyamādyam

उस सूक्ष्म, अपनी ही गुहा में निवास करने वाले, पाँच कोशों से आवृत्त, आत्मा में ही स्थित, जिसे वेदांत की वाणी भी नहीं कह सकी और स्वयं भी नहीं जान सकी, केवल अपनी ही विद्या से जाने जा सकने वाले उस आदि पुरुष की आराधना करके, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 64 (skanda.2.47.64)

ब्रह्मांडमालाकलितानुरोमं सहस्रमूर्द्धांघ्रिदृशं पुराणम् । निःश्वासवातोत्थित वेदराशिं सर्वप्रपंचेशमहं प्रपद्ये

brahmāṇḍamālākalitānuromaṁ sahasramūrddhāṁghridṛśaṁ purāṇam niḥśvāsavātotthita vedarāśiṁ sarvaprapaṁceśamahaṁ prapadye

जिसके प्रत्येक रोम में ब्रह्मांडों की माला समाई हुई है, जिसके सहस्रों सिर, चरण और नेत्र हैं, वह पुरातन पुरुष, जिसकी श्वास-वायु से वेदों की राशि उत्पन्न हुई, समस्त प्रपंच के स्वामी की, मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 65 (skanda.2.47.65)

यन्मायया निर्मितकूटमेतत्सृष्टिक्षयस्थानविलासि रूपम् । निरूपितारोपितहेयरूपस्वरूपहीनं प्रणवस्वरूपम्

yanmāyayā nirmitakūṭametatsṛṣṭikṣayasthānavilāsi rūpam nirūpitāropitaheyarūpasvarūpahīnaṁ praṇavasvarūpam

जिसकी माया से निर्मित यह छलरूप है, जो सृष्टि, स्थिति और प्रलय में अपनी लीला दिखाता है; किंतु उसका असली स्वरूप निरूपित और आरोपित त्याज्य रूपों से रहित है, वह ओंकार-स्वरूप है।

श्लोक 66 (skanda.2.47.66)

तिर्यक्तृषाशांतिनिमित्ततोऽपि यदृच्छया यत्सविधं प्रयातः । देहेन तेनैव सरूपमुक्तिमवाप तं दृष्टिपथं करिष्ये

tiryaktṛṣāśāṁtinimittato'pi yadṛcchayā yatsavidhaṁ prayātaḥ dehena tenaiva sarūpamuktimavāpa taṁ dṛṣṭipathaṁ kariṣye

जिसके समीप कोई पशु भी केवल अपनी प्यास बुझाने के लिए, संयोग से जा पहुँचा और उसी शरीर से सरूप्य-मुक्ति को प्राप्त हुआ — उसी को आज मैं अपनी दृष्टि के पथ पर लाऊँगा।

श्लोक 67 (skanda.2.47.67)

अहो अहो मे खलु भाग्यशंसी यत्कोटिजन्मार्जितपुण्य एकः । समुत्थितो मे खलु चर्मदृग्भ्यां विलोकयिष्ये जगदादिकंदम्

aho aho me khalu bhāgyaśaṁsī yatkoṭijanmārjitapuṇya ekaḥ samutthito me khalu carmadṛgbhyāṁ vilokayiṣye jagadādikaṁdam

अहो, अहो! मेरा भाग्य वास्तव में प्रशंसनीय है, कि करोड़ों जन्मों में अर्जित पुण्य का एक अंश मुझ में उदित हुआ है — मैं अपने ही चर्म-नेत्रों से जगत् के आदि-मूल का दर्शन करूँगा।

श्लोक 68 (skanda.2.47.68)

इत्थं संचिन्तयन्विप्रः प्रहृष्टेनांतरात्मना । अतीतं बहुमध्वानं नाबुध्यद्रथवेगतः

itthaṁ saṁcintayanvipraḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā atītaṁ bahumadhvānaṁ nābudhyadrathavegataḥ

इस प्रकार अपने हर्षित अंतरात्मा से विचार करते हुए उस ब्राह्मण को रथ की गति के कारण बहुत लंबा मार्ग बीत जाने का पता ही नहीं चला।

श्लोक 69 (skanda.2.47.69)

दिनमध्ये व्यतिक्रांते लंबिते बहुवासरे । वर्त्मन्यदृश्यताग्रे तु देशो भुवनमंडनः

dinamadhye vyatikrāṁte laṁbite bahuvāsare vartmanyadṛśyatāgre tu deśo bhuvanamaṁḍanaḥ

दिन का मध्याह्न बीत जाने पर, और बहुत से दिन व्यतीत हो जाने पर, मार्ग में आगे वह देश दिखाई देने लगा, जो संसार का आभूषण है।

श्लोक 70 (skanda.2.47.70)

ओढ्रसंज्ञस्तु भो विप्राः क्षितिमंडलपावनः । इत्थं पश्यन्वनांतानि गिरिदुर्गाश्च मार्गगान् । सूर्यास्तमनवेलायां महानद्यास्तटेऽभवत्

oḍhrasaṁjñastu bho viprāḥ kṣitimaṁḍalapāvanaḥ itthaṁ paśyanvanāṁtāni giridurgāśca mārgagān sūryāstamanavelāyāṁ mahānadyāstaṭe'bhavat

हे विप्रो! वह देश ओढ्र नाम से जाना जाता है और पृथ्वी-मंडल को पवित्र करने वाला है। इस प्रकार वनों के अंत, पर्वतीय दुर्गम मार्गों को देखते हुए, सूर्यास्त के समय वह महानदी के तट पर पहुँचा।

श्लोक 71 (skanda.2.47.71)

अवरुह्य रथाद्विप्रः कृत्वा चाह्निकमादृतः । उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां दध्यौ स मधुसूदनम्

avaruhya rathādvipraḥ kṛtvā cāhnikamādṛtaḥ upāsya paścimāṁ sandhyāṁ dadhyau sa madhusūdanam

रथ से उतरकर उस ब्राह्मण ने आदरपूर्वक अपनी नित्यकर्म-विधि पूरी की, संध्योपासना करके मधुसूदन का ध्यान किया।

श्लोक 72 (skanda.2.47.72)

रथपृष्ठे स्थितो रात्रिं गमयित्वा त्वरान्वितः । महानदीं समुत्तीर्य प्रातःकृत्यं समाप्य सः

rathapṛṣṭhe sthito rātriṁ gamayitvā tvarānvitaḥ mahānadīṁ samuttīrya prātaḥkṛtyaṁ samāpya saḥ

रथ पर ही बैठकर उसने रात्रि व्यतीत की; फिर शीघ्रतापूर्वक महानदी को पार करके, अपने प्रातःकालीन कर्म को पूरा करके,

श्लोक 73 (skanda.2.47.73)

चिंतयन्नेव गोविंदं प्रतस्थे रथमास्थितः । पश्यन्भगवतो मार्गं श्रोत्रियाणां हि यज्वनाम्

ciṁtayanneva goviṁdaṁ pratasthe rathamāsthitaḥ paśyanbhagavato mārgaṁ śrotriyāṇāṁ hi yajvanām

गोविंद का चिंतन करते हुए ही वह रथ पर बैठकर आगे बढ़ा, भगवान् के मार्ग को देखते हुए, वेदपाठी और यज्ञकर्ता ब्राह्मणों के,

श्लोक 74 (skanda.2.47.74)

वह्निवर्चस्विनां विप्रा ग्रामान्पूगैरलंकृतान् । विलंघ्यैकाम्रकवनं यावदायाति स द्विजः

vahnivarcasvināṁ viprā grāmānpūgairalaṁkṛtān vilaṁghyaikāmrakavanaṁ yāvadāyāti sa dvijaḥ

अग्नि के समान तेजस्वी उन ब्राह्मणों के, सुपारी के वृक्षों से सुशोभित गाँवों को पार करते हुए, जब तक वह ब्राह्मण एकाम्रक वन तक नहीं पहुँचा,

श्लोक 75 (skanda.2.47.75)

शंखचक्रगदापद्मधारिणो ददृशे जनान् । जन्मांतरितमात्मानं बुबुधे दिव्यरूपिणम्

śaṅkhacakragadāpadmadhāriṇo dadṛśe janān janmāṁtaritamātmānaṁ bubudhe divyarūpiṇam

वहाँ उसने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले जनों को देखा; उसे लगा मानो वह स्वयं दूसरे जन्म को प्राप्त हुआ है, अपने को दिव्य रूप में अनुभव करने लगा।

श्लोक 76 (skanda.2.47.76)

अवरुह्य रथात्तूर्णं साष्टांगं प्रणिपत्य च । हर्षाश्रुपूर्णनयनो नान्यत्किंचिदपश्यत

avaruhya rathāttūrṇaṁ sāṣṭāṁgaṁ praṇipatya ca harṣāśrupūrṇanayano nānyatkiṁcidapaśyata

रथ से तुरंत उतरकर, साष्टांग प्रणाम करके, हर्ष के आँसुओं से भरे नेत्रों वाले उसने और कुछ भी नहीं देखा,

श्लोक 77 (skanda.2.47.77)

केवलं मनसा विष्णुं पश्यन्बाह्ये च भो द्विजाः । एवं व्रजन्यदा विप्रो ध्यायन्पश्यन्स्तुवन्हरिम्

kevalaṁ manasā viṣṇuṁ paśyanbāhye ca bho dvijāḥ evaṁ vrajanyadā vipro dhyāyanpaśyanstuvanharim

हे विप्रो! केवल मन से विष्णु का दर्शन करता रहा, बाह्य दृष्टि से भी वैसा ही। इस प्रकार आगे बढ़ते हुए, जब वह ब्राह्मण हरि का ध्यान, दर्शन और स्तवन करता जा रहा था,

श्लोक 78 (skanda.2.47.78)

अपश्यत्काननाकीर्णं कल्पन्यग्रोधभूषितम् । नीलाचलं लिखंतं खं पश्यतां पापनाशनम्

apaśyatkānanākīrṇaṁ kalpanyagrodhabhūṣitam nīlācalaṁ likhaṁtaṁ khaṁ paśyatāṁ pāpanāśanam

— उसने देखा, वनों से भरा, कल्पवृक्ष और वटवृक्ष से सुशोभित, आकाश को छूता हुआ नीलाचल पर्वत, जिसका दर्शन ही पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 79 (skanda.2.47.79)

अत्यद्भुतं निवसंति साक्षात्तनुभृतो हरेः । उपत्यकायामारूढः समंतान्मार्गयन्द्विजः

atyadbhutaṁ nivasaṁti sākṣāttanubhṛto hareḥ upatyakāyāmārūḍhaḥ samaṁtānmārgayandvijaḥ

अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से वहाँ हरि के साक्षात् देहधारी अंश निवास करते हैं। पर्वत की तलहटी पर चढ़कर, चारों ओर मार्ग खोजते हुए वह ब्राह्मण,

श्लोक 80 (skanda.2.47.80)

मार्गं न लेभे विप्रोऽसौ मुकुंदालोकनोत्सुकः । असुप्यत ततो भूमौ कुशानास्तीर्य वाग्यतः

mārgaṁ na lebhe vipro'sau mukuṁdālokanotsukaḥ asupyata tato bhūmau kuśānāstīrya vāgyataḥ

— मुकुंद के दर्शन के लिए उत्सुक होते हुए भी मार्ग नहीं पा सका। तब वह मौन होकर, कुशा बिछाकर भूमि पर सो गया,

श्लोक 81 (skanda.2.47.81)

दर्शने तस्य देवस्य तमेव शरणं ययौ । ततः शुश्राव वचनं गिरेः पश्चादमानुषम्

darśane tasya devasya tameva śaraṇaṁ yayau tataḥ śuśrāva vacanaṁ gireḥ paścādamānuṣam

उस देव के दर्शन के लिए उन्हीं की शरण में गया। तत्पश्चात् उसने पर्वत के पीछे से एक अलौकिक वाणी सुनी,

श्लोक 82 (skanda.2.47.82)

भगवद्भक्तिविषयं संलापं कुर्वतां मिथः । ततो विद्यापतिर्हृष्टोऽनुसरंस्तं जगाम वै

bhagavadbhaktiviṣayaṁ saṁlāpaṁ kurvatāṁ mithaḥ tato vidyāpatirhṛṣṭo'nusaraṁstaṁ jagāma vai

जो भगवद्भक्ति के विषय में परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। तब प्रसन्न होकर विद्यापति उस वाणी का अनुसरण करते हुए वहाँ गया।

श्लोक 83 (skanda.2.47.83)

ददर्श शबरागारैर्वेष्टितं परितो द्विजाः । क्षेत्रस्य दीपसंस्थानं ख्यातं शबरदीपकम्

dadarśa śabarāgārairveṣṭitaṁ parito dvijāḥ kṣetrasya dīpasaṁsthānaṁ khyātaṁ śabaradīpakam

हे विप्रो! उसने देखा शबरों के घरों से चारों ओर घिरा हुआ, उस क्षेत्र के दीपक-स्वरूप स्थान, जो शबरदीपक नाम से विख्यात था।

श्लोक 84 (skanda.2.47.84)

तत्र गत्वा शनैर्विप्रः प्रविश्य विनयान्वितः । ददर्श विष्णुभक्तांस्ताञ्छंखचक्रगदाधरान्

tatra gatvā śanairvipraḥ praviśya vinayānvitaḥ dadarśa viṣṇubhaktāṁstāñchaṁkhacakragadādharān

वहाँ जाकर, धीरे-धीरे और विनयपूर्वक प्रवेश करके उस ब्राह्मण ने विष्णु के उन भक्तों को देखा, जो शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए थे।

श्लोक 85 (skanda.2.47.85)

प्रणम्य शिरसा विप्रस्तस्थौ बद्धांजलिस्तदा । ततोविश्वावसुर्नाम शबरः पलितांगकः

praṇamya śirasā viprastasthau baddhāṁjalistadā tatoviśvāvasurnāma śabaraḥ palitāṁgakaḥ

सिर झुकाकर प्रणाम करके वह ब्राह्मण हाथ जोड़े खड़ा रहा। तभी विश्वावसु नामक, श्वेत-केश वाला एक शबर,

श्लोक 86 (skanda.2.47.86)

अवसाय हरेः पूजां पूजाशेषोपशोभितः । संप्राप्तो गिरिमध्यात्तु तस्मिन्नेव क्षणे द्विजाः

avasāya hareḥ pūjāṁ pūjāśeṣopaśobhitaḥ saṁprāpto girimadhyāttu tasminneva kṣaṇe dvijāḥ

हरि की पूजा समाप्त करके, पूजा के प्रसाद-अवशेष से सुशोभित होकर, उसी क्षण, हे विप्रो! पर्वत के मध्य से आ पहुँचा।

श्लोक 87 (skanda.2.47.87)

आलोक्य तं द्विजो हर्षमुपयातो व्यचिंतयत् । एष प्राप्तो हरेः स्थानाच्छ्रांतो निर्माल्यभूषितः

ālokya taṁ dvijo harṣamupayāto vyaciṁtayat eṣa prāpto hareḥ sthānācchrāṁto nirmālyabhūṣitaḥ

उसे देखकर वह ब्राह्मण हर्षित होकर सोचने लगा — "यह व्यक्ति हरि के स्थान से आया है, थका हुआ, निर्माल्य से सुशोभित है;

श्लोक 88 (skanda.2.47.88)

वैष्णवाग्र्य इतो वार्तां विष्णोः प्राप्स्यामि दुर्लभाम् । चिंतयन्नेव विप्रोऽसौ शबरेणाभ्यभाषत

vaiṣṇavāgrya ito vārtāṁ viṣṇoḥ prāpsyāmi durlabhām ciṁtayanneva vipro'sau śabareṇābhyabhāṣata

इस श्रेष्ठ वैष्णव से मुझे विष्णु का वह दुर्लभ समाचार प्राप्त होगा" — इसी प्रकार सोचते हुए उस ब्राह्मण ने उस शबर से बात की।

श्लोक 89 (skanda.2.47.89)

शबर उवाच । कुतः समागतो विप्र काननांतं सुदुस्तरम् । क्षुत्तृड्भिरतिश्रांतश्च सुखमत्रास्यतां चिरम्

śabara uvāca kutaḥ samāgato vipra kānanāṁtaṁ sudustaram kṣuttṛḍbhiratiśrāṁtaśca sukhamatrāsyatāṁ ciram

शबर ने कहा — हे विप्र! आप इस अत्यंत दुर्गम वन-प्रांत में कहाँ से आए हैं? भूख-प्यास से अत्यंत थके हुए हैं; यहाँ चिरकाल तक सुखपूर्वक विराजिए।

श्लोक 90 (skanda.2.47.90)

पाद्यमासनमर्घं च दत्त्वा विश्वावसुर्द्विजम् । उवाच प्रश्रयगिरा प्रस्तुतं प्रतिपादयन्

pādyamāsanamarghaṁ ca dattvā viśvāvasurdvijam uvāca praśrayagirā prastutaṁ pratipādayan

पाद्य, आसन और अर्घ्य देकर विश्वावसु ने उस ब्राह्मण से विनम्र वाणी में, आगे की बात कहते हुए कहा —

श्लोक 91 (skanda.2.47.91)

फलैः पाकेन वा विप्र प्राणयात्रा भवेत्तव । यत्तुभ्यं रोचते तद्वै दीयतेऽत्र मया द्विज

phalaiḥ pākena vā vipra prāṇayātrā bhavettava yattubhyaṁ rocate tadvai dīyate'tra mayā dvija

"हे विप्र! फलों से अथवा पके हुए अन्न से आपका जीवन-निर्वाह हो सके, ऐसी व्यवस्था हो; हे द्विज! जो आपको रुचे, वही मैं आपको यहाँ दूँगा।

श्लोक 92 (skanda.2.47.92)

भाग्यं ममाद्य भगवञ्जीवितं सफलं च मे । प्राप्तोऽसि मद्गृहं विप्र साक्षाद्विष्णुरिवापरः

bhāgyaṁ mamādya bhagavañjīvitaṁ saphalaṁ ca me prāpto'si madgṛhaṁ vipra sākṣādviṣṇurivāparaḥ

हे भगवन्! आज मेरा सौभाग्य है, मेरा जीवन सफल हुआ है, क्योंकि हे विप्र! आप मेरे घर में मानो साक्षात् दूसरे विष्णु के समान पधारे हैं।"

श्लोक 93 (skanda.2.47.93)

इति ब्रुवाणं शबरं प्रोवाच द्विजपुंगवः । न मे फलैर्न पाकेन कार्यं वैष्णवपुंगव

iti bruvāṇaṁ śabaraṁ provāca dvijapuṁgavaḥ na me phalairna pākena kāryaṁ vaiṣṇavapuṁgava

ऐसा कहते हुए शबर से श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा — "हे वैष्णवश्रेष्ठ! मुझे न फलों से और न पके हुए अन्न से कोई प्रयोजन है।

श्लोक 94 (skanda.2.47.94)

यदर्थमागतं दूरात्साधो तत्सफलं कुरु । इन्द्रद्युम्नस्य नृपतेरवंतिपुरवासिनः

yadarthamāgataṁ dūrātsādho tatsaphalaṁ kuru indradyumnasya nṛpateravaṁtipuravāsinaḥ

हे साधो! जिस प्रयोजन के लिए मैं इतनी दूर से आया हूँ, उसे सफल कीजिए। अवंतिपुर में रहने वाले राजा इंद्रद्युम्न का

श्लोक 95 (skanda.2.47.95)

पुरोहितोऽहं संप्राप्तो विष्णोर्दर्शनलालसः । राज्ञाग्रे तैर्थिकानां हि समाजावसरे श्रुतम्

purohito'haṁ saṁprāpto viṣṇordarśanalālasaḥ rājñāgre tairthikānāṁ hi samājāvasare śrutam

मैं पुरोहित हूँ, और विष्णु के दर्शन की लालसा से यहाँ आया हूँ। राजा के सम्मुख तीर्थयात्रियों की सभा के अवसर पर यह सुना गया था,

श्लोक 96 (skanda.2.47.96)

तीर्थक्षेत्रप्रसंगेन केनचित्प्रस्तुतं तदा । तथा निवेदितं क्षेत्रं राजाग्रे जटिलेन वै

tīrthakṣetraprasaṁgena kenacitprastutaṁ tadā tathā niveditaṁ kṣetraṁ rājāgre jaṭilena vai

कि किसी ने तीर्थ-क्षेत्रों के प्रसंग में इसका उल्लेख किया था, और उसी प्रकार जटाधारी तपस्वी ने भी राजा के सम्मुख इस क्षेत्र का वर्णन किया था।

श्लोक 97 (skanda.2.47.97)

आनुपूर्व्याच्च तत्सर्वं कथयामास स द्विजः । एतदर्थमहं साधो राज्ञा चोत्कण्ठितेन वै

ānupūrvyācca tatsarvaṁ kathayāmāsa sa dvijaḥ etadarthamahaṁ sādho rājñā cotkaṇṭhitena vai

उस जटाधारी ब्राह्मण ने वह सब क्रमशः बता दिया था। हे साधो! इसी प्रयोजन के लिए, अत्यंत उत्कंठित राजा द्वारा

श्लोक 98 (skanda.2.47.98)

प्रेषितोऽहं हरिं द्रष्टुमत्रस्थं नीलमाधवम् । दृष्ट्वा यावन्नरपतेर्वार्त्तां नेष्यामि सोऽप्यहम्

preṣito'haṁ hariṁ draṣṭumatrasthaṁ nīlamādhavam dṛṣṭvā yāvannarapatervārttāṁ neṣyāmi so'pyaham

मुझे यहाँ स्थित हरि, नीलमाधव, का दर्शन करने के लिए भेजा गया है; दर्शन करके मैं ही राजा तक यह समाचार पहुँचाऊँगा।

श्लोक 99 (skanda.2.47.99)

निराहारो ध्रुवं साधो तन्मां विष्णुं प्रदर्शय

nirāhāro dhruvaṁ sādho tanmāṁ viṣṇuṁ pradarśaya

हे साधो! मैं निश्चय ही अन्न ग्रहण नहीं करूँगा; इसलिए मुझे उस विष्णु का दर्शन कराइए।"

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