वैष्णव खण्ड · अध्याय 48
शबर विश्वावसु के द्वारा विद्यापति को नीलमाधव का दर्शन
श्लोक 1 (skanda.2.48.1)
जैमिनिरुवाच । इत्युक्तस्तेन विप्रेण शबरश्चिंतयाकुलः । अस्माकमुपजीव्योऽसौ रहस्यस्थो जनार्दनः
jaiminiruvāca ityuktastena vipreṇa śabaraściṁtayākulaḥ asmākamupajīvyo'sau rahasyastho janārdanaḥ
जैमिनि ने कहा — उस ब्राह्मण द्वारा ऐसा कहे जाने पर शबर चिंता से व्याकुल हो गया — "वे जनार्दन, जो हमारे जीवन-निर्वाह का आधार हैं, गुप्त रूप से स्थित हैं;
श्लोक 2 (skanda.2.48.2)
उपस्थितं नो दुर्दैवं येन स्यात्सार्वलौकिकः । न दर्शयामि चेद्विप्रं शापं मेऽसौ प्रदास्यति
upasthitaṁ no durdaivaṁ yena syātsārvalaukikaḥ na darśayāmi cedvipraṁ śāpaṁ me'sau pradāsyati
— हमारे सामने ऐसा दुर्भाग्य उपस्थित हो गया है, जिससे यह रहस्य सर्वलोक-विदित हो जाएगा। यदि मैं इस ब्राह्मण को दर्शन नहीं कराता, तो यह मुझे शाप देगा;
श्लोक 3 (skanda.2.48.3)
सर्वेषां ब्राह्मणो मान्यो विशेषादतिथिस्त्वयम् । यस्मिन्विफलकामे तु द्वौ लोकौ विफलौ मम
sarveṣāṁ brāhmaṇo mānyo viśeṣādatithistvayam yasminviphalakāme tu dvau lokau viphalau mama
— एक ब्राह्मण सबके लिए माननीय है, और यह तो विशेष रूप से अतिथि भी है; यदि इसकी कामना विफल हो जाए, तो मेरे दोनों लोक विफल हो जाएँगे।"
श्लोक 4 (skanda.2.48.4)
एवं विचारयन्विश्वावसुः शबरपुंगवः । जनप्रवादं सस्मार पुराणं शबरालये
evaṁ vicārayanviśvāvasuḥ śabarapuṁgavaḥ janapravādaṁ sasmāra purāṇaṁ śabarālaye
इस प्रकार विचार करते हुए शबरश्रेष्ठ विश्वावसु ने शबर-निवास में प्रचलित एक प्राचीन जनश्रुति का स्मरण किया —
श्लोक 5 (skanda.2.48.5)
अस्मिन्नंतर्हिते देवे भूम्यंतर्लीनमाधवे । इन्द्रद्युम्नो नरपतिः शक्रतुल्यपराक्रमः
asminnaṁtarhite deve bhūmyaṁtarlīnamādhave indradyumno narapatiḥ śakratulyaparākramaḥ
— कि जब यह देव अंतर्हित हो जाएगा, माधव पृथ्वी के भीतर लीन हो जाएँगे, तब इंद्र के समान पराक्रमी राजा इंद्रद्युम्न,
श्लोक 6 (skanda.2.48.6)
मनुष्यवपुषा यो वै ब्रह्मलोकं व्रजेदपि । सोऽस्मिन्प्रजाभिरागत्य वाजिमेधशतेन च
manuṣyavapuṣā yo vai brahmalokaṁ vrajedapi so'sminprajābhirāgatya vājimedhaśatena ca
— जो मनुष्य-शरीर से ही ब्रह्मलोक तक जा पहुँचेगा, वह अपनी प्रजा के साथ यहाँ आकर सौ अश्वमेध यज्ञों से,
श्लोक 7 (skanda.2.48.7)
इष्ट्वा दारुमयं विष्णुं चतुर्द्धा स्थापयिष्यति । अस्य चेद्भाग्यमुत्पन्नं ब्राह्मणस्यातिथेर्भृशम्
iṣṭvā dārumayaṁ viṣṇuṁ caturddhā sthāpayiṣyati asya cedbhāgyamutpannaṁ brāhmaṇasyātitherbhṛśam
— यजन करके काष्ठमय विष्णु को चार रूपों में स्थापित करेगा। यदि इस अतिथि ब्राह्मण का भाग्य अत्यंत प्रबल उदित हुआ हो,
श्लोक 8 (skanda.2.48.8)
अंतर्द्धानं भगवतः सन्निधानमथो भवेत् । तदेनं दर्शयिष्यामि नीलेंद्रमणिमच्युतम्
aṁtarddhānaṁ bhagavataḥ sannidhānamatho bhavet tadenaṁ darśayiṣyāmi nīleṁdramaṇimacyutam
— और भगवान् का अंतर्धान अथवा सन्निधान जो भी हो, तब मैं इसे नीलमणिमय अच्युत का दर्शन कराऊँगा;
श्लोक 9 (skanda.2.48.9)
न पौरुषेयं कस्यापि कर्तव्ये देवनिर्मिते । इत्थं विचार्य मनसा शबरश्च पुनःपुनः
na pauruṣeyaṁ kasyāpi kartavye devanirmite itthaṁ vicārya manasā śabaraśca punaḥpunaḥ
— देवनिर्मित कार्य में मनुष्य के प्रयत्न का कोई स्थान नहीं है।" इस प्रकार बार-बार मन में विचार करके उस शबर ने,
श्लोक 10 (skanda.2.48.10)
उवाच विप्रं पुरतो ध्यायंतं विष्णुमव्ययम्
uvāca vipraṁ purato dhyāyaṁtaṁ viṣṇumavyayam
— अपने सामने अव्यय विष्णु का ध्यान करते हुए उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 11 (skanda.2.48.11)
शबर उवाच । अस्माभिः पूर्वतोऽप्येष उदंतः श्रुत एव हि । इंद्रद्युम्नो नरपतिरत्र वासं करिष्यति
śabara uvāca asmābhiḥ pūrvato'pyeṣa udaṁtaḥ śruta eva hi iṁdradyumno narapatiratra vāsaṁ kariṣyati
शबर ने कहा — हमने भी पहले से ही यह समाचार सुन रखा है कि राजा इंद्रद्युम्न यहाँ निवास करेगा।
श्लोक 12 (skanda.2.48.12)
ततोऽपि भाग्यवांस्त्वं हि यदग्रे नीलमाधवम् । चक्षुषा पश्यसे ब्रह्मन्नेहि यामो ह्यधित्यकाम्
tato'pi bhāgyavāṁstvaṁ hi yadagre nīlamādhavam cakṣuṣā paśyase brahmannehi yāmo hyadhityakām
उससे भी बढ़कर भाग्यवान् तुम हो, हे ब्राह्मण! कि तुम सबसे पहले अपनी आँखों से नीलमाधव का दर्शन करोगे; आओ, हम पर्वत की चोटी पर चलें।
श्लोक 13 (skanda.2.48.13)
इत्युक्त्वा तं करे धृत्वा वर्त्मना गहनं ययौ । उपर्युपर्युपारुह्य शिलाविषमवर्त्मनि
ityuktvā taṁ kare dhṛtvā vartmanā gahanaṁ yayau uparyuparyupāruhya śilāviṣamavartmani
ऐसा कहकर, उसका हाथ पकड़कर वह घने मार्ग से ऊपर की ओर चला, चट्टानों वाले दुर्गम रास्ते पर चढ़ता हुआ,
श्लोक 14 (skanda.2.48.14)
एकैकनरगम्ये च कंटकाचितदुर्गमे । तमःप्राये पथि गतं बोधयन्वचसा द्विजम्
ekaikanaragamye ca kaṁṭakācitadurgame tamaḥprāye pathi gataṁ bodhayanvacasā dvijam
— जिस पर केवल एक-एक व्यक्ति ही चल सकता था, जो काँटों से भरा और दुर्गम था; अंधकारपूर्ण उस मार्ग पर चलते हुए उसने अपनी वाणी से उस ब्राह्मण को ढाढस बँधाया,
श्लोक 15 (skanda.2.48.15)
मुहूर्ताभ्यां रौहिणस्य कुंडस्याविशतां तटे । तं दृष्ट्वा सोऽब्रवीद्विप्रं कुंडमेतद्द्विजोत्तम
muhūrtābhyāṁ rauhiṇasya kuṁḍasyāviśatāṁ taṭe taṁ dṛṣṭvā so'bravīdvipraṁ kuṁḍametaddvijottama
दो मुहूर्तों में वे दोनों रौहिण कुंड के तट पर पहुँचे। उसे देखकर उसने ब्राह्मण से कहा — "हे द्विजोत्तम! यह वह कुंड है,
श्लोक 16 (skanda.2.48.16)
रौहिणाख्यं महत्तीर्थं कारणं सर्वपाथसाम् । अत्र स्नात्वा नरो याति वैकुंठभवनं द्विज
rauhiṇākhyaṁ mahattīrthaṁ kāraṇaṁ sarvapāthasām atra snātvā naro yāti vaikuṁṭhabhavanaṁ dvija
रौहिण नामक, समस्त जलों का कारण-भूत, महातीर्थ है; हे द्विज! यहाँ स्नान करके मनुष्य वैकुंठ-धाम को जाता है।
श्लोक 17 (skanda.2.48.17)
एतस्य पूर्वभागेऽसो कल्पच्छायावटो महान् । छायां यस्य समाक्रम्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति
etasya pūrvabhāge'so kalpacchāyāvaṭo mahān chāyāṁ yasya samākramya brahmahatyāṁ vyapohati
इसके पूर्व भाग में वह विशाल कल्प-वटवृक्ष है, जिसकी छाया में प्रवेश करने मात्र से ब्रह्महत्या का पाप दूर हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.2.48.18)
एतयोरंतरे ब्रह्मन्निकुंजाभ्यंतरे स्थितम् । पश्य साक्षाजगन्नाथं वेदांतप्रतिपादितम्
etayoraṁtare brahmannikuṁjābhyaṁtare sthitam paśya sākṣājagannāthaṁ vedāṁtapratipāditam
हे ब्राह्मण! इन दोनों के बीच, एक निकुंज के भीतर स्थित, वेदांत द्वारा प्रतिपादित साक्षात् जगन्नाथ को देखो।
श्लोक 19 (skanda.2.48.19)
दृष्ट्वा जहीहि सकलं विविधं पापसंचयम् । इत ऊर्ध्वं न शोचस्व पतितो भवसागरे
dṛṣṭvā jahīhi sakalaṁ vividhaṁ pāpasaṁcayam ita ūrdhvaṁ na śocasva patito bhavasāgare
उनका दर्शन करके अपने संपूर्ण नाना पापों के संचय को त्याग दो; अब से आगे संसार-सागर में गिरे होने का शोक मत करो।"
श्लोक 20 (skanda.2.48.20)
जैमिनिरुवाच । स तु कुंडे द्विजः स्नात्वा संप्रदृष्टमनाः सुधी । दूरात्प्रणम्य शिरसा मनसा वचसा हरिम्
jaiminiruvāca sa tu kuṁḍe dvijaḥ snātvā saṁpradṛṣṭamanāḥ sudhī dūrātpraṇamya śirasā manasā vacasā harim
जैमिनि ने कहा — उस बुद्धिमान ब्राह्मण ने कुंड में स्नान करके, एकाग्रचित्त होकर, दूर से ही सिर झुकाकर, मन और वाणी से हरि को प्रणाम किया,
श्लोक 21 (skanda.2.48.21)
तुष्टाव चैकाग्रमना हर्षगद्गदया गिरा
tuṣṭāva caikāgramanā harṣagadgadayā girā
और एकाग्रचित्त होकर हर्ष से गद्गद वाणी में उनकी स्तुति करने लगा।
श्लोक 22 (skanda.2.48.22)
विद्यापतिरुवाच । प्रधानपुरुषातीत सर्वव्यापिन्परात्पर । चराचरपरीणाम परमार्थ नमोऽस्तु ते
vidyāpatiruvāca pradhānapuruṣātīta sarvavyāpinparātpara carācaraparīṇāma paramārtha namo'stu te
विद्यापति ने कहा — हे प्रकृति और पुरुष से परे! हे सर्वव्यापी! हे परात्पर! हे चराचर के परिणाम-स्वरूप! हे परमार्थ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 23 (skanda.2.48.23)
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहास संप्रतिपादितैः । कर्मभिस्त्वं समाराध्य एक एव जगत्पते
śrutismṛtipurāṇetihāsa saṁpratipāditaiḥ karmabhistvaṁ samārādhya eka eva jagatpate
हे जगत्पते! श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास द्वारा प्रतिपादित कर्मों से आप एक ही आराधनीय हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.48.24)
त्वत्त एतज्जगत्सर्वं सृष्टौ संपद्यते विभो । त्वदाधारमिदं देव त्वयैव परिपाल्यते
tvatta etajjagatsarvaṁ sṛṣṭau saṁpadyate vibho tvadādhāramidaṁ deva tvayaiva paripālyate
हे विभो! आपसे ही यह संपूर्ण जगत् सृष्टि के समय उत्पन्न होता है; हे देव! यह आप पर ही आधारित है, और आपके द्वारा ही इसका पालन होता है।
श्लोक 25 (skanda.2.48.25)
कल्पांते संहृतं सर्वं त्वत्कुक्षौ सावकाशकम् । सुखं वसति सर्वात्मन्नंतर्यामिन्नमोऽस्तु ते
kalpāṁte saṁhṛtaṁ sarvaṁ tvatkukṣau sāvakāśakam sukhaṁ vasati sarvātmannaṁtaryāminnamo'stu te
कल्प के अंत में समस्त जगत् संहृत होकर आपके ही उदर में यथास्थान सुखपूर्वक निवास करता है; हे सर्वात्मन्! हे अंतर्यामिन्! आपको नमस्कार है।
श्लोक 26 (skanda.2.48.26)
नमस्ते देवदेवाय त्रयीरूपाय ते नमः । चंद्रसूर्यादिरुपेण जगद्भासयते सदा
namaste devadevāya trayīrūpāya te namaḥ caṁdrasūryādirupeṇa jagadbhāsayate sadā
हे देवों के देव! आपको नमस्कार है; तीनों वेदों के स्वरूप आपको नमस्कार है, जो चंद्र-सूर्य आदि रूप से सदा जगत् को प्रकाशित करते हैं।
श्लोक 27 (skanda.2.48.27)
सर्वतीर्थमयी गंगा यस्य पादाब्जसंगमात् । पुनाति सकलाँल्लोकांस्तस्मै पावयते नमः
sarvatīrthamayī gaṁgā yasya pādābjasaṁgamāt punāti sakalām̐llokāṁstasmai pāvayate namaḥ
जिनके चरण-कमल के संपर्क से समस्त तीर्थों से युक्त गंगा समस्त लोकों को पवित्र करती है, उन पवित्र करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 28 (skanda.2.48.28)
हवींषि मंत्रपूतानि सम्यग्दत्तानि वह्निषु । परिणामकृते तुभ्यं .जगज्जीवयते नमः
havīṁṣi maṁtrapūtāni samyagdattāni vahniṣu pariṇāmakṛte tubhyaṁ .jagajjīvayate namaḥ
अग्नियों में विधिपूर्वक अर्पित, मंत्रों से पवित्र की गई आहुतियाँ भी फल देने वाले आपको ही प्राप्त होती हैं; जगत् को जीवन देने वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 29 (skanda.2.48.29)
यदंशमुपजीवंति जगंत्यानंदरूपिणः । सर्वकल्मषहीनाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः
yadaṁśamupajīvaṁti jagaṁtyānaṁdarūpiṇaḥ sarvakalmaṣahīnāya tasmai brahmātmane namaḥ
हे आनंदस्वरूप! जिनके अंश पर सारे जगत् जीवित रहते हैं, उन समस्त पापों से रहित ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 30 (skanda.2.48.30)
निर्मलाय स्वरूपाय शुभरूपाय मायिने । सर्वसंगविहीनाय नमस्ते विश्वसाक्षिणे
nirmalāya svarūpāya śubharūpāya māyine sarvasaṁgavihīnāya namaste viśvasākṣiṇe
निर्मल स्वरूप वाले, शुभ रूप वाले, मायाधीश, समस्त आसक्तियों से रहित, विश्व के साक्षी आपको नमस्कार है।
श्लोक 31 (skanda.2.48.31)
बहुपादाक्षिशीर्षास्यबाहवे सर्वजिष्णवे । सर्वजीवस्वरूपाय नमस्ते सर्वरूपिणे
bahupādākṣiśīrṣāsyabāhave sarvajiṣṇave sarvajīvasvarūpāya namaste sarvarūpiṇe
अनेक चरणों, नेत्रों, सिरों, मुखों और भुजाओं वाले, सबको जीतने वाले, समस्त जीवों के स्वरूप, सर्वरूप आपको नमस्कार है।
श्लोक 32 (skanda.2.48.32)
नमस्ते कमलाकांत नमस्ते कमलासन । नमः कमलपत्राक्ष त्राहि मां पुरुषोत्तम
namaste kamalākāṁta namaste kamalāsana namaḥ kamalapatrākṣa trāhi māṁ puruṣottama
हे कमला के प्रियतम! आपको नमस्कार है। हे कमलासन! आपको नमस्कार है। हे कमल-दल के समान नेत्रों वाले! नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 33 (skanda.2.48.33)
असारसंसारपरिभ्रमेण निपीड्यमानं खलु रोगशोकैः । मामुद्धरास्माद्भवदुःखजातात्पादाब्जयोस्ते शरणं प्रपन्नम्
asārasaṁsāraparibhrameṇa nipīḍyamānaṁ khalu rogaśokaiḥ māmuddharāsmādbhavaduḥkhajātātpādābjayoste śaraṇaṁ prapannam
इस सारहीन संसार के भ्रमण से, रोग और शोक से पीड़ित मुझे, आपके चरण-कमलों की शरण में आए हुए मुझे, इस भव-दुःख-समूह से उद्धार कीजिए।
श्लोक 34 (skanda.2.48.34)
जैमिनिरुवाच । इति स्तुत्वा सुरेशानं देवं प्रणवरूपिणम् । प्रणतः प्रणवं मंत्रं जजाप पुरतो हरेः
jaiminiruvāca iti stutvā sureśānaṁ devaṁ praṇavarūpiṇam praṇataḥ praṇavaṁ maṁtraṁ jajāpa purato hareḥ
जैमिनि ने कहा — इस प्रकार देवताओं के स्वामी, ओंकार-स्वरूप देव की स्तुति करके, प्रणाम करते हुए उसने हरि के सम्मुख प्रणव-मंत्र का जप किया।
श्लोक 35 (skanda.2.48.35)
जपांते शांतमनसं कृतांजलिमुपस्थितम् । मन्यमानं कृतार्थं स्वं प्रोवाच शबरो द्विजम्
japāṁte śāṁtamanasaṁ kṛtāṁjalimupasthitam manyamānaṁ kṛtārthaṁ svaṁ provāca śabaro dvijam
जप के अंत में, शांत मन से हाथ जोड़े खड़े, अपने को कृतार्थ मानते हुए उस ब्राह्मण से शबर ने कहा —
श्लोक 36 (skanda.2.48.36)
विश्वावसुरुवाच । कृतार्थस्त्वं प्रभुं दृष्ट्वा सांप्रतं द्विजपुंगव । दिनांतोऽभूद्गृहं यावः क्षुधितोऽसि श्रमान्वितः
viśvāvasuruvāca kṛtārthastvaṁ prabhuṁ dṛṣṭvā sāṁprataṁ dvijapuṁgava dināṁto'bhūdgṛhaṁ yāvaḥ kṣudhito'si śramānvitaḥ
विश्वावसु ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! अब प्रभु का दर्शन कर आप कृतार्थ हो गए हैं; दिन समाप्त हो गया है, चलें अपने घर की ओर; आप भूखे और थके हुए हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.48.37)
वासोऽप्यरण्ये हिंस्राणां नास्माकमुचिता स्थितिः । यावद्भानोर्भाति भासस्तावद्यामो निजालयम्
vāso'pyaraṇye hiṁsrāṇāṁ nāsmākamucitā sthitiḥ yāvadbhānorbhāti bhāsastāvadyāmo nijālayam
वन में हिंसक जीवों के बीच रहना भी हमारे लिए उचित नहीं है; जब तक सूर्य की किरणें चमक रही हैं, तब तक चलें अपने घर की ओर।
श्लोक 38 (skanda.2.48.38)
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं पाणौ गृहीत्वा शबरः पुनः । आजगाम द्विजश्रेष्ठाः स्वाश्रमं त्वरयान्वितः
ityuktvā brāhmaṇaṁ pāṇau gṛhītvā śabaraḥ punaḥ ājagāma dvijaśreṣṭhāḥ svāśramaṁ tvarayānvitaḥ
ऐसा कहकर उस ब्राह्मण का हाथ पकड़कर शबर पुनः तेजी से अपने आश्रम की ओर लौट चला, हे द्विजश्रेष्ठो!
श्लोक 39 (skanda.2.48.39)
ब्राह्मणोऽपि जगन्नाथं ध्यायन्नानंदसागरम् । क्षुत्तृषाश्रमजातानि दुःखानि बुबुधे न हि
brāhmaṇo'pi jagannāthaṁ dhyāyannānaṁdasāgaram kṣuttṛṣāśramajātāni duḥkhāni bubudhe na hi
वह ब्राह्मण भी आनंद के सागर जगन्नाथ का ध्यान करते हुए भूख, प्यास और थकान से उत्पन्न दुःखों को अनुभव ही नहीं कर सका।
श्लोक 40 (skanda.2.48.40)
शिलाविषममार्गेऽपि कंटकोत्करदुर्गमे । व्रजन्न दुःखं लेभेऽसौ शरीरानास्थया मुदा
śilāviṣamamārge'pi kaṁṭakotkaradurgame vrajanna duḥkhaṁ lebhe'sau śarīrānāsthayā mudā
चट्टानों से भरे विषम मार्ग पर, काँटों के ढेर से दुर्गम पथ पर चलते हुए भी, शरीर की चिंता किए बिना, हर्षपूर्वक उसे कोई कष्ट नहीं हुआ।
श्लोक 41 (skanda.2.48.41)
एवं व्रजंतौ तौ विप्र शबरौ शबरालयम् । सायाह्ने तमनुप्राप्तौ वैष्णवाग्र्यौ तु भो द्विजाः
evaṁ vrajaṁtau tau vipra śabarau śabarālayam sāyāhne tamanuprāptau vaiṣṇavāgryau tu bho dvijāḥ
हे विप्रो! इस प्रकार चलते हुए वे दोनों, ब्राह्मण और शबर, संध्या के समय शबर-निवास पर आ पहुँचे — दोनों ही वैष्णवों में श्रेष्ठ।
श्लोक 42 (skanda.2.48.42)
तत्रातिथिमनुप्राप्तं ब्राह्मणं शबरोत्तमः । भक्ष्यभोज्य विधानैश्च विविधैः समपूजयत्
tatrātithimanuprāptaṁ brāhmaṇaṁ śabarottamaḥ bhakṣyabhojya vidhānaiśca vividhaiḥ samapūjayat
वहाँ उस अतिथि ब्राह्मण का शबरश्रेष्ठ ने विविध प्रकार के भक्ष्य और भोज्य पदार्थों के विधान से सत्कार किया।
श्लोक 43 (skanda.2.48.43)
ततोऽभितृप्तस्तद्दत्तैरुपचारैर्नृपोचितैः । विस्मयं परमं लेभे शबरस्य सुदुर्लभैः
tato'bhitṛptastaddattairupacārairnṛpocitaiḥ vismayaṁ paramaṁ lebhe śabarasya sudurlabhaiḥ
तत्पश्चात् उसके द्वारा दिए गए, राजाओं के योग्य उपचारों से पूर्णतः तृप्त होकर वह अत्यंत विस्मित हो गया कि शबर को इतनी दुर्लभ वस्तुएँ कैसे प्राप्त हुईं।
श्लोक 44 (skanda.2.48.44)
शबरोऽयं निवसति विषमे काननांतरे । आरण्यकैर्वर्त्तमानः कथमस्य गृहांतरे
śabaro'yaṁ nivasati viṣame kānanāṁtare āraṇyakairvarttamānaḥ kathamasya gṛhāṁtare
"यह शबर तो दुर्गम वन के भीतर रहता है, वन्य वस्तुओं से जीवन-निर्वाह करता है; फिर इसके घर के भीतर,
श्लोक 45 (skanda.2.48.45)
राजार्हभक्ष्यभोज्यानि सुलभान्यद्भुतं महत् । इति विस्मयमापन्नं ब्राह्मणं शबरस्तदा
rājārhabhakṣyabhojyāni sulabhānyadbhutaṁ mahat iti vismayamāpannaṁ brāhmaṇaṁ śabarastadā
— राजाओं के योग्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थ इतनी सहजता से कैसे उपलब्ध हैं? यह बड़ा ही आश्चर्य है!" — इस प्रकार विस्मय को प्राप्त उस ब्राह्मण से तब शबर ने,
श्लोक 46 (skanda.2.48.46)
प्रोवाच स्निग्धवचसा विनयावनतो भृशम्
provāca snigdhavacasā vinayāvanato bhṛśam
— अत्यंत विनम्र होकर, स्नेहपूर्ण वाणी में कहा।
श्लोक 47 (skanda.2.48.47)
शबर उवाच । भो विप्र श्रमहीनोऽसि कच्चित्क्षुत्तृड्विवर्जितः । आरण्यकानां भवने नागराणां कुतः सुखम्
śabara uvāca bho vipra śramahīno'si kaccitkṣuttṛḍvivarjitaḥ āraṇyakānāṁ bhavane nāgarāṇāṁ kutaḥ sukham
शबर ने कहा — हे विप्र! क्या आपकी थकान दूर हो गई, क्या आप भूख-प्यास से मुक्त हो गए? हम वनवासियों के घर में नगरवासियों को भला सुख कहाँ से मिले?
श्लोक 48 (skanda.2.48.48)
अज्ञाता नागरी वृत्तिः शबरैस्तु विशेषतः । राजोपजीविनां श्रेष्ठौ राजामात्यपुरोहितौ
ajñātā nāgarī vṛttiḥ śabaraistu viśeṣataḥ rājopajīvināṁ śreṣṭhau rājāmātyapurohitau
शबरों को नगरों की जीवन-शैली विशेष रूप से अज्ञात है; राजा पर आश्रित रहने वालों में श्रेष्ठ राजा के मंत्री और पुरोहित होते हैं,
श्लोक 49 (skanda.2.48.49)
तयो राजसमः पूज्यः पुरोधाः शास्त्रसंमतः । इन्द्रद्युम्नो नरपतिः सार्वभौमः प्रतापवान्
tayo rājasamaḥ pūjyaḥ purodhāḥ śāstrasaṁmataḥ indradyumno narapatiḥ sārvabhaumaḥ pratāpavān
— उन दोनों में पुरोहित राजा के समान पूज्य है, यह शास्त्र-सम्मत है। राजा इंद्रद्युम्न, जो सार्वभौम और प्रतापी है,
श्लोक 50 (skanda.2.48.50)
त्वयि तुष्टे स संतुष्टो ध्रुवं विप्र भविष्यति । इत्युक्तवत्यरण्यस्थे स तु प्रीततरो द्विजः । उवाच शबरं प्रीत्या विनयाद्भुतवादिनम्
tvayi tuṣṭe sa saṁtuṣṭo dhruvaṁ vipra bhaviṣyati ityuktavatyaraṇyasthe sa tu prītataro dvijaḥ uvāca śabaraṁ prītyā vinayādbhutavādinam
— यदि आप प्रसन्न हों, तो वह निश्चय ही प्रसन्न होगा, हे विप्र! जब उस वन में रहने वाले शबर ने ऐसा कहा, तो वह ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुआ और स्नेहपूर्वक, विनय से अद्भुत बोलने वाले उस शबर से कहा —
श्लोक 51 (skanda.2.48.51)
विद्यापतिरुवाच । साधो मदुपचाराय हृतान्येतानि यानि ते । वस्तुन्यमानुषाणीह यान्यदृष्टानि राजभिः
vidyāpatiruvāca sādho madupacārāya hṛtānyetāni yāni te vastunyamānuṣāṇīha yānyadṛṣṭāni rājabhiḥ
विद्यापति ने कहा — हे साधो! मेरे सत्कार के लिए आपने जो ये अलौकिक वस्तुएँ लाईं, जिन्हें राजाओं ने भी कभी नहीं देखा,
श्लोक 52 (skanda.2.48.52)
चित्रमेतद्दिव्यवस्तुसंचयः शबरालये । एतत्ख्यातुं कौतुकं मे साधो संवर्द्धते महत्
citrametaddivyavastusaṁcayaḥ śabarālaye etatkhyātuṁ kautukaṁ me sādho saṁvarddhate mahat
— यह आश्चर्य है कि दिव्य वस्तुओं का ऐसा संग्रह शबर के निवास में है! हे साधो! इसे बताने के लिए मेरे मन में बड़ा कौतूहल बढ़ रहा है।
श्लोक 53 (skanda.2.48.53)
शबर उवाच । एतत्प्रकाशितुं विप्र मतिर्नोत्सहते मम । तथापि ते द्विजश्रेष्ठाऽतिथिभक्त्या वदाम्यहम्
śabara uvāca etatprakāśituṁ vipra matirnotsahate mama tathāpi te dvijaśreṣṭhā'tithibhaktyā vadāmyaham
शबर ने कहा — हे विप्र! इसे प्रकट करने का मेरा मन नहीं होता; फिर भी, हे द्विजश्रेष्ठ! अतिथि के प्रति भक्ति के कारण मैं आपको बताता हूँ।
श्लोक 54 (skanda.2.48.54)
शक्रादयो देवगणाः समायान्त्यन्वहं द्विज । दिव्योपचारानादाय पूजनाय जगत्पतेः
śakrādayo devagaṇāḥ samāyāntyanvahaṁ dvija divyopacārānādāya pūjanāya jagatpateḥ
हे द्विज! इंद्र आदि देवगण प्रतिदिन दिव्य उपहार लेकर जगत्पति की पूजा के लिए यहाँ आते हैं।
श्लोक 55 (skanda.2.48.55)
पूजयित्वा जगन्नाथं स्तुत्वा नत्वा च भक्तितः । गीतशवादित्रनृत्यैश्च संतोष्य पुरुषोत्तमम्
pūjayitvā jagannāthaṁ stutvā natvā ca bhaktitaḥ gītaśavāditranṛtyaiśca saṁtoṣya puruṣottamam
जगन्नाथ की पूजा करके, भक्तिपूर्वक स्तुति और नमन करके, गीत, वाद्य और नृत्य से पुरुषोत्तम को संतुष्ट करके,
श्लोक 56 (skanda.2.48.56)
पुनः प्रयांति सततं त्रिदिवं सुरसत्तमाः । दिव्यान्येतानि वस्तूनि निर्माल्यानि जगत्पतेः
punaḥ prayāṁti satataṁ tridivaṁ surasattamāḥ divyānyetāni vastūni nirmālyāni jagatpateḥ
वे श्रेष्ठ देवगण निरंतर पुनः स्वर्ग को चले जाते हैं। ये सब जो दिव्य वस्तुएँ हैं, वे जगत्पति के निर्माल्य हैं,
श्लोक 57 (skanda.2.48.57)
दत्तानि तुभ्यं विदुषे कथं विस्मयते भवान् । विष्णोर्निर्माल्यभोगेन क्षीणरोगजरा वयम्
dattāni tubhyaṁ viduṣe kathaṁ vismayate bhavān viṣṇornirmālyabhogena kṣīṇarogajarā vayam
जो मैंने आपको, हे विद्वान्, दिए हैं; आप क्यों विस्मित होते हैं? विष्णु के निर्माल्य का भोग करने से हम रोग और वृद्धावस्था से क्षीण नहीं होते।
श्लोक 58 (skanda.2.48.58)
सपुत्रबांधवाः सर्वे निवसामोऽयुतायुषः । विष्णुनिर्माल्यभोगेन क्षीयते पापसंहतिः
saputrabāṁdhavāḥ sarve nivasāmo'yutāyuṣaḥ viṣṇunirmālyabhogena kṣīyate pāpasaṁhatiḥ
हम सब, पुत्रों और बंधुओं सहित, दस हजार वर्षों तक जीवित रहते हैं; विष्णु के निर्माल्य के सेवन से पापों का समूह भी क्षीण हो जाता है।
श्लोक 59 (skanda.2.48.59)
न तच्चित्रं द्विजश्रेष्ठ येन स्यान्मुक्तिभाजनम् । श्रुत्वैतद्दुर्लभं कर्म ब्राह्मणो रोमहर्षणः
na taccitraṁ dvijaśreṣṭha yena syānmuktibhājanam śrutvaitaddurlabhaṁ karma brāhmaṇo romaharṣaṇaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ! तब यह कोई आश्चर्य नहीं कि इससे मुक्ति भी प्राप्त हो जाए। इस दुर्लभ वृत्तांत को सुनकर वह ब्राह्मण रोमांचित हो उठा,
श्लोक 60 (skanda.2.48.60)
आनंदाश्रुविलुप्ताक्षः स्वं कृतार्थममन्यत । अहो शबरजन्मासौ पश्यत्यव्ययमीश्वरम्
ānaṁdāśruviluptākṣaḥ svaṁ kṛtārthamamanyata aho śabarajanmāsau paśyatyavyayamīśvaram
उसकी आँखें आनंद के अश्रुओं से भर गईं, और उसने अपने को कृतार्थ माना। "अहो! यह शबर-जन्म पाकर भी अव्यय ईश्वर का दर्शन करता है,
श्लोक 61 (skanda.2.48.61)
तदुच्छिष्टं दिव्यभोगमुपभुंक्ते दिवानिशम् । नान्योऽस्य सदृशो लोके पृथिव्यां सचराचरे
taducchiṣṭaṁ divyabhogamupabhuṁkte divāniśam nānyo'sya sadṛśo loke pṛthivyāṁ sacarācare
दिन-रात उनके दिव्य भोग के अवशेष का सेवन करता है; इस चराचर जगत् में पृथ्वी पर इसके समान दूसरा कोई नहीं है।
श्लोक 62 (skanda.2.48.62)
यादृशो विष्णुभक्तोऽयं शबरो नीलपर्वते । किं गत्वा स्वगृहे मेऽद्य कुटुंबेनाऽसुखात्मना
yādṛśo viṣṇubhakto'yaṁ śabaro nīlaparvate kiṁ gatvā svagṛhe me'dya kuṭuṁbenā'sukhātmanā
नीलपर्वत पर रहने वाला यह शबर जैसा विष्णु-भक्त है — मुझे भी अपने घर जाकर, दुखी परिवार के साथ रहकर क्या मिलेगा?
श्लोक 63 (skanda.2.48.63)
अनेन सख्यं निष्पाद्य स्थास्याम्यत्र वनांतरे । चिन्तयित्वा चिरं विप्रः श्रीकृष्णासक्तमानसः
anena sakhyaṁ niṣpādya sthāsyāmyatra vanāṁtare cintayitvā ciraṁ vipraḥ śrīkṛṣṇāsaktamānasaḥ
इससे मित्रता करके मैं यहीं इस वन में रह जाऊँगा।" इस प्रकार, श्रीकृष्ण में आसक्त-चित्त उस ब्राह्मण ने बहुत देर तक विचार करके,
श्लोक 64 (skanda.2.48.64)
पुनः प्रोवाच शबरं मयि ते चेदनुग्रहः । साधो सख्यं त्वया कार्यमिति मे निश्चयो महान्
punaḥ provāca śabaraṁ mayi te cedanugrahaḥ sādho sakhyaṁ tvayā kāryamiti me niścayo mahān
पुनः शबर से कहा — "यदि मुझ पर आपकी कृपा हो, हे साधो! तो आपसे मित्रता करने का मेरा दृढ़ निश्चय है।
श्लोक 65 (skanda.2.48.65)
किं गत्वा सेवया राज्ञः परत्रासुखहेतुना । अत्र स्थित्वा त्वया सार्धमुपास्य मधुसूदनम्
kiṁ gatvā sevayā rājñaḥ paratrāsukhahetunā atra sthitvā tvayā sārdhamupāsya madhusūdanam
राजा की सेवा करने से जो परलोक में सुख का कारण नहीं बनती, उससे मुझे क्या लाभ? इसके बदले यहीं रहकर, आपके साथ मधुसूदन की उपासना करके,
श्लोक 66 (skanda.2.48.66)
यथा पुनर्देहबंधो यतिष्ये न भवेन्मम । साधु मित्र त्वया सार्द्धं भाग्यान्मे संगमोऽभवत्
yathā punardehabaṁdho yatiṣye na bhavenmama sādhu mitra tvayā sārddhaṁ bhāgyānme saṁgamo'bhavat
— मैं यत्न करूँगा कि मुझे पुनः देह-बंधन प्राप्त न हो। हे मित्र! सौभाग्य से आपके साथ मेरा यह संगम हुआ है, यह अत्यंत उत्तम है।
श्लोक 67 (skanda.2.48.67)
दुस्तारं भवसंसारं तरिष्ये त्वत्प्रसादतः । सारमेतत्प्रशंसंति संसारे भवसागरे
dustāraṁ bhavasaṁsāraṁ tariṣye tvatprasādataḥ sārametatpraśaṁsaṁti saṁsāre bhavasāgare
आपकी कृपा से मैं इस दुस्तर संसार-चक्र को पार कर लूँगा। संसार-सागर में इसी सार-तत्त्व की प्रशंसा की जाती है,
श्लोक 68 (skanda.2.48.68)
यद्वैष्णवेन मित्रत्वं दुःखसंसारपारदम् । मित्रस्य सहवासेन पुनः प्रत्यक्षमेष्यति
yadvaiṣṇavena mitratvaṁ duḥkhasaṁsārapāradam mitrasya sahavāsena punaḥ pratyakṣameṣyati
कि वैष्णव के साथ मित्रता ही दुःखमय संसार से पार ले जाने वाली है। मित्र के सहवास से वे भगवान् पुनः साक्षात् प्रकट होंगे,
श्लोक 69 (skanda.2.48.69)
भगवान्पुण्डरीकाक्षः शंखचक्रगदाधरः । इंद्रद्युम्नो नरपतिर्मयि प्रत्यागते सखे
bhagavānpuṇḍarīkākṣaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ iṁdradyumno narapatirmayi pratyāgate sakhe
— वे कमलनयन भगवान्, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले। हे सखे! जब राजा इंद्रद्युम्न मेरे लौट जाने पर,
श्लोक 70 (skanda.2.48.70)
भगवंतं समाराद्धुमिहैव स निवत्स्यति । प्रासादं विपुलं चात्र चिकीर्षुर्भगवत्प्रियम्
bhagavaṁtaṁ samārāddhumihaiva sa nivatsyati prāsādaṁ vipulaṁ cātra cikīrṣurbhagavatpriyam
भगवान् की आराधना के लिए यहीं आकर निवास करेंगे, तब वे भगवान् को प्रिय एक विशाल मंदिर यहाँ बनवाना चाहेंगे,
श्लोक 71 (skanda.2.48.71)
सहस्रमुपचाराणां पूजनाय जगत्पतेः । रचयिष्यामीति महत्प्रतिज्ञासीन्महीपतेः
sahasramupacārāṇāṁ pūjanāya jagatpateḥ racayiṣyāmīti mahatpratijñāsīnmahīpateḥ
और जगत्पति की पूजा के लिए सहस्र उपचारों की व्यवस्था भी करेंगे — यह उस राजा की महान प्रतिज्ञा थी,
श्लोक 72 (skanda.2.48.72)
प्रतिश्रुतं तत्पुरतः प्रीतस्तन्मेऽनुमन्यताम्
pratiśrutaṁ tatpurataḥ prītastanme'numanyatām
जो उसके सामने प्रतिज्ञा के रूप में कहा गया था; हे मित्र! प्रसन्न होकर आप इसका अनुमोदन करें।"
श्लोक 73 (skanda.2.48.73)
शबर उवाच । सखे पुरातनी वार्त्ता प्रसिद्धैवात्र तादृशी
śabara uvāca sakhe purātanī vārttā prasiddhaivātra tādṛśī
शबर ने कहा — हे सखे! यहाँ ऐसी ही प्राचीन बात पहले से ही प्रसिद्ध है,
श्लोक 74 (skanda.2.48.74)
त्वया यथैव कथितं इन्द्रद्युम्नसमागमः । केवलं माधवं तत्र न द्रक्ष्यति महीपतिः
tvayā yathaiva kathitaṁ indradyumnasamāgamaḥ kevalaṁ mādhavaṁ tatra na drakṣyati mahīpatiḥ
जैसा आपने कहा, वैसा ही इंद्रद्युम्न का आगमन होगा; किंतु वहाँ राजा माधव का दर्शन नहीं कर पाएगा,
श्लोक 75 (skanda.2.48.75)
अचिरादेव भगवान्स्वर्णवालुकयावृतः । प्रतिजज्ञे यमायैतदन्तर्द्धानं गमिष्यति
acirādeva bhagavānsvarṇavālukayāvṛtaḥ pratijajñe yamāyaitadantarddhānaṁ gamiṣyati
क्योंकि भगवान्, स्वर्ण-बालू से आच्छादित होकर, शीघ्र ही अंतर्धान हो जाएँगे — यह उन्होंने यम को स्वयं प्रतिज्ञा की है।
श्लोक 76 (skanda.2.48.76)
महाभाग्यपरीपाकात्प्रत्यक्षोऽयं त्वया कृतः । इन्द्रद्युम्नागमाभ्यासे ध्रुवं स व्यवधास्यति
mahābhāgyaparīpākātpratyakṣo'yaṁ tvayā kṛtaḥ indradyumnāgamābhyāse dhruvaṁ sa vyavadhāsyati
महाभाग्य के परिपाक से ही आपने उनका साक्षात् दर्शन किया है; इंद्रद्युम्न के आगमन के निकट आते ही वे निश्चय ही अंतर्हित हो जाएँगे।
श्लोक 77 (skanda.2.48.77)
एषोऽर्थस्तु त्वया मित्र न वक्तव्यो नृपाग्रतः । आगत्य सोऽत्र नृपतिरदृष्ट्वा परमेश्वरम्
eṣo'rthastu tvayā mitra na vaktavyo nṛpāgrataḥ āgatya so'tra nṛpatiradṛṣṭvā parameśvaram
किंतु हे मित्र! यह बात राजा के सामने आपको नहीं कहनी चाहिए। यहाँ आकर वह राजा परमेश्वर का दर्शन न पाकर,
श्लोक 78 (skanda.2.48.78)
प्रायोपवेशव्रतवान्स्वप्ने दृष्ट्वा गदाधरम् । तदादेशाद्दारुमयं प्रभोर्लिंगचतुष्टयम्
prāyopaveśavratavānsvapne dṛṣṭvā gadādharam tadādeśāddārumayaṁ prabhorliṁgacatuṣṭayam
प्रायोपवेशन का व्रत लेगा, तब स्वप्न में गदाधर का दर्शन पाकर, उन्हीं के आदेश से प्रभु के काष्ठमय चार लिंगों को,
श्लोक 79 (skanda.2.48.79)
पूजयिष्यति भक्त्या च प्रतिष्ठाय स्वयंभुवा । स्थितिरत्र हरेर्यावदावयोर्वंशसंस्थितिः
pūjayiṣyati bhaktyā ca pratiṣṭhāya svayaṁbhuvā sthitiratra hareryāvadāvayorvaṁśasaṁsthitiḥ
स्वयं स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करेगा। यहाँ हरि की यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक हम दोनों का वंश यहाँ स्थित रहेगा।
श्लोक 80 (skanda.2.48.80)
अनुग्रहाद्भगवतो नात्र कार्या विचारणा । तदत्रार्थे सखे खेदं मा व्रज क्षिप्रमेव हि
anugrahādbhagavato nātra kāryā vicāraṇā tadatrārthe sakhe khedaṁ mā vraja kṣiprameva hi
भगवान् की कृपा से इस विषय में कोई शंका नहीं करनी चाहिए। अतः हे सखे! इस विषय में शीघ्र ही खेद मत कीजिए;
श्लोक 81 (skanda.2.48.81)
निर्वर्त्स्यतेऽचिरादेव मित्रेदानीं सुखं स्वप । प्रातर्दृष्ट्वा पुनर्देवं नीलेन्द्राश्ममयं विभुम्
nirvartsyate'cirādeva mitredānīṁ sukhaṁ svapa prātardṛṣṭvā punardevaṁ nīlendrāśmamayaṁ vibhum
यह शीघ्र ही पूर्ण हो जाएगा, हे मित्र! अभी सुखपूर्वक विश्राम करो; प्रातःकाल नीलमणि-निर्मित प्रभु का पुनः दर्शन करके,
श्लोक 82 (skanda.2.48.82)
सिंधौ स्नात्वा तस्य तटे निवासाय महीपतेः । द्रक्ष्यामः साधु संस्थानं यथाभिलषितं सखे
siṁdhau snātvā tasya taṭe nivāsāya mahīpateḥ drakṣyāmaḥ sādhu saṁsthānaṁ yathābhilaṣitaṁ sakhe
समुद्र में स्नान करके, राजा के निवास के लिए उसके तट पर, हे सखे! हम एक उपयुक्त स्थान की खोज करेंगे, जैसा भी अभीष्ट होगा।
श्लोक 83 (skanda.2.48.83)
इत्यन्याश्च कथाः पुण्याः कृत्वा तौ च परस्परम् । शुभस्थाने चास्वपतां शयने पल्लवास्तृते
ityanyāśca kathāḥ puṇyāḥ kṛtvā tau ca parasparam śubhasthāne cāsvapatāṁ śayane pallavāstṛte
इस प्रकार और भी अनेक पुण्य कथाएँ आपस में करके, वे दोनों एक शुभ स्थान पर, पत्तों से बिछी हुई शय्या पर सो गए।
श्लोक 84 (skanda.2.48.84)
प्रभातायां तु शर्वर्यां तीर्थराजोदकेन तौ । स्नानं निर्वर्त्य विधिवन्माधवं प्रणिपत्य च
prabhātāyāṁ tu śarvaryāṁ tīrtharājodakena tau snānaṁ nirvartya vidhivanmādhavaṁ praṇipatya ca
रात्रि के प्रभात होने पर उन दोनों ने तीर्थराज (समुद्र) के जल से विधिपूर्वक स्नान किया और माधव को प्रणाम करके,
श्लोक 85 (skanda.2.48.85)
राजार्हस्थानं निर्णीय निवासाय गतौ पुनः । तत्र मित्रेणाभिमन्त्र्य राज्ञो निर्देशकारणात्
rājārhasthānaṁ nirṇīya nivāsāya gatau punaḥ tatra mitreṇābhimantrya rājño nirdeśakāraṇāt
राजा के निवास के योग्य स्थान का निश्चय करके फिर लौट गए। वहाँ मित्र से परामर्श करके, राजा को निर्देश देने के प्रयोजन से,
श्लोक 86 (skanda.2.48.86)
रथमारुह्य विप्रः स त्ववंतीपुरमाययौ
rathamāruhya vipraḥ sa tvavaṁtīpuramāyayau
वह ब्राह्मण रथ पर सवार होकर अवंतीपुर को लौट गया।