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वैष्णव खण्ड · अध्याय 49

नीलमाधव का अंतर्धान और इंद्रद्युम्न को प्राप्त पवित्र माला

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (skanda.2.49.1)

जैमिनिरुवाच । प्रत्यागते ततो विप्रे सायाह्ने सुरसंकुले । माधवार्चनवेलायां वातश्चंडगतिर्ववौ

jaiminiruvāca pratyāgate tato vipre sāyāhne surasaṁkule mādhavārcanavelāyāṁ vātaścaṁḍagatirvavau

जैमिनि ने कहा — उस ब्राह्मण के लौट जाने के बाद, संध्या के समय, जब देवगण वहाँ एकत्रित थे, माधव की पूजा के समय एक प्रचंडगति वायु चली।

श्लोक 2 (skanda.2.49.2)

सुवर्णवालुकाश्चासौ विचकार च सर्वशः । तेनाकुलदृशो देवा न शेकुरवलोकने

suvarṇavālukāścāsau vicakāra ca sarvaśaḥ tenākuladṛśo devā na śekuravalokane

उसने सुवर्ण-बालू को चारों ओर बिखेर दिया; उससे व्याकुल दृष्टि वाले देवगण कुछ भी देख नहीं पाए।

श्लोक 3 (skanda.2.49.3)

श्रीकांतस्य तदा विप्रा दध्युस्ते पुरुषोत्तमम् । यावद्ध्यानस्थिरदृशो मुहूर्तं ते दिवौकसः

śrīkāṁtasya tadā viprā dadhyuste puruṣottamam yāvaddhyānasthiradṛśo muhūrtaṁ te divaukasaḥ

हे विप्रो! तब उन्होंने श्रीकांत पुरुषोत्तम का ध्यान किया; एक मुहूर्त तक वे देवगण ध्यान में स्थिर दृष्टि वाले रहे।

श्लोक 4 (skanda.2.49.4)

ध्यानांते वालुकाराशिं ददृशुस्ते न माधवम् । रौहिणं च तथा कुंडं बभूवुर्व्याकुलेन्द्रियाः

dhyānāṁte vālukārāśiṁ dadṛśuste na mādhavam rauhiṇaṁ ca tathā kuṁḍaṁ babhūvurvyākulendriyāḥ

ध्यान के अंत में उन्होंने केवल बालू का ढेर देखा, माधव को नहीं; रौहिण कुंड को भी वे नहीं देख पाए, और उनकी इंद्रियाँ व्याकुल हो उठीं।

श्लोक 5 (skanda.2.49.5)

चिंतामवापुर्महतीं हाहेति रुरुदुर्भृशम् । किमेतन्नो हि दुर्दैवमेकदा समुपस्थितम्

ciṁtāmavāpurmahatīṁ hāheti rurudurbhṛśam kimetanno hi durdaivamekadā samupasthitam

वे अत्यंत चिंता से भर गए, "हाय, हाय!" कहकर अत्यंत विलाप करने लगे — "यह हमारे लिए कैसा दुर्भाग्य अचानक आ उपस्थित हुआ है!

श्लोक 6 (skanda.2.49.6)

दृशां सेचनकः श्रीशः क्षणाद्यन्नोपलभ्यते । अपराधं किमस्माकं लक्षितं पुरुषोत्तम

dṛśāṁ secanakaḥ śrīśaḥ kṣaṇādyannopalabhyate aparādhaṁ kimasmākaṁ lakṣitaṁ puruṣottama

वह श्रीश, जो नेत्रों को सींचने वाले हैं, क्षण भर में ही अलभ्य हो गए! हे पुरुषोत्तम! क्या हमारा कोई अपराध देखा गया है?

श्लोक 7 (skanda.2.49.7)

युगपत्सेवकान्सर्वानपहाय न दृश्यसे । येषामर्थे जगन्नाथ स्वीचकर्थ कलेवरम्

yugapatsevakānsarvānapahāya na dṛśyase yeṣāmarthe jagannātha svīcakartha kalevaram

आप एक ही साथ अपने समस्त सेवकों को छोड़कर अदृश्य हो गए हैं — हे जगन्नाथ! जिनके लिए आपने यह शरीर धारण किया था,

श्लोक 8 (skanda.2.49.8)

ताननाथान्परित्यज्य कानने किमुपेक्षसे । स्वशरीरविभूतीर्नो विहाय कमलेक्षण

tānanāthānparityajya kānane kimupekṣase svaśarīravibhūtīrno vihāya kamalekṣaṇa

— उन्हीं अनाथों को त्यागकर इस वन में आप क्यों उपेक्षा करते हैं? हे कमलनयन! अपनी ही देह की विभूतियों को हम पर छोड़कर,

श्लोक 9 (skanda.2.49.9)

किमकांडं रचयसि कथाशेषान्दिवौकसः । तवांशभूतान्नः सर्वान्यज्वानः प्रयजंति वै

kimakāṁḍaṁ racayasi kathāśeṣāndivaukasaḥ tavāṁśabhūtānnaḥ sarvānyajvānaḥ prayajaṁti vai

— क्यों अकस्मात् आप देवताओं को केवल कथा-शेष बनाते हैं? आपके ही अंश-स्वरूप हम सबको यज्ञकर्ता यज्ञों द्वारा पूजते हैं,

श्लोक 10 (skanda.2.49.10)

त्वत्प्रीत्यै यज्ञपुरुष त्वदादिष्टफलप्रदान् । त्वदहंकारवर्ष्माणस्त्वदनुग्रहजीवनाः

tvatprītyai yajñapuruṣa tvadādiṣṭaphalapradān tvadahaṁkāravarṣmāṇastvadanugrahajīvanāḥ

— हे यज्ञपुरुष! आपकी प्रसन्नता के लिए ही, आपके ही आदेशानुसार फल देने वाले, आपके ही अहंकार-रूपी देह वाले, आपकी ही कृपा से जीवित रहने वाले हम,

श्लोक 11 (skanda.2.49.11)

कांदिशीका कुत्र यामः सांप्रतं त्वदुपेक्षिताः । दिवि स्थानैश्च किं कार्यं त्वामनालोक्य माधव

kāṁdiśīkā kutra yāmaḥ sāṁprataṁ tvadupekṣitāḥ divi sthānaiśca kiṁ kāryaṁ tvāmanālokya mādhava

— अब हम भयभीत होकर कहाँ जाएँ, आपके द्वारा उपेक्षित होकर? हे माधव! आपके दर्शन के बिना स्वर्ग में अपने स्थानों से भी हमें क्या प्रयोजन?

श्लोक 12 (skanda.2.49.12)

अकृतार्थास्त्वया हीना भविष्यामो वनेचराः । निष्कलंकसुधाभानुं सुषमापरिभावुकम्

akṛtārthāstvayā hīnā bhaviṣyāmo vanecarāḥ niṣkalaṁkasudhābhānuṁ suṣamāparibhāvukam

आपसे रहित होकर हम असफल, वन में भटकने वाले हो जाएँगे। हे निष्कलंक अमृत-किरण के समान, हे परम सौंदर्य के आधार,

श्लोक 13 (skanda.2.49.13)

त्वदास्यं चेन्न पश्यामो न यास्यामः सुरालयम् । तप आस्थाय परममत्रैव संशितव्रताः

tvadāsyaṁ cenna paśyāmo na yāsyāmaḥ surālayam tapa āsthāya paramamatraiva saṁśitavratāḥ

— यदि हम आपके मुख का दर्शन नहीं करेंगे, तो हम देव-लोक को नहीं जाएँगे; यहीं परम तप का आश्रय लेकर, दृढ़ व्रत धारण करके,

श्लोक 14 (skanda.2.49.14)

वर्तामहे वन्यवृत्त्या जटावल्कलधारिणः । यावत्त्वां पुंडरीकाक्ष विलोकिष्यामहे वयम्

vartāmahe vanyavṛttyā jaṭāvalkaladhāriṇaḥ yāvattvāṁ puṁḍarīkākṣa vilokiṣyāmahe vayam

— हम वन्य-वृत्ति से रहेंगे, जटा और वल्कल धारण किए हुए, जब तक हम, हे कमलनयन! आपका दर्शन नहीं पा लेते।

श्लोक 15 (skanda.2.49.15)

निसर्गकरुणांभोधे दीनान्नस्त्रातुमर्हसि । अनाथान्दीनहदयांस्त्वामेव शरणं गतान्

nisargakaruṇāṁbhodhe dīnānnastrātumarhasi anāthāndīnahadayāṁstvāmeva śaraṇaṁ gatān

हे स्वभाव से ही करुणा के सागर! हम दीनों की रक्षा करना आपके ही योग्य है — हम अनाथ, दीन-हृदय, केवल आपकी ही शरण में आए हुए हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.49.16)

त्वदनालोकशोकैकपारावारे निमज्जतः । शुभदृष्टितरण्या नः समुद्धर जगत्पते

tvadanālokaśokaikapārāvāre nimajjataḥ śubhadṛṣṭitaraṇyā naḥ samuddhara jagatpate

आपके अदर्शन के शोक-सागर में डूबते हुए हमें, हे जगत्पते! अपनी शुभ दृष्टि की नौका से उद्धार कीजिए।"

श्लोक 17 (skanda.2.49.17)

एवं प्रलपतां तत्र सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् । अशरीरा तदा वाणी पुनः प्रादुर्बभूव ह

evaṁ pralapatāṁ tatra sarveṣāṁ tridivaukasām aśarīrā tadā vāṇī punaḥ prādurbabhūva ha

वहाँ इस प्रकार विलाप करते हुए उन सब देवताओं के बीच, तब एक अशरीर वाणी पुनः प्रकट हुई —

श्लोक 18 (skanda.2.49.18)

अत्रार्थे भोः सुरा यत्नं कर्तुमर्हथ नो वृथा । अद्यप्रभृति देवस्य दर्शनं दुर्लभं भुवि

atrārthe bhoḥ surā yatnaṁ kartumarhatha no vṛthā adyaprabhṛti devasya darśanaṁ durlabhaṁ bhuvi

"हे देवो! इस विषय में तुम्हें व्यर्थ प्रयत्न नहीं करना चाहिए; आज से इस देवता का दर्शन पृथ्वी पर दुर्लभ हो गया है।

श्लोक 19 (skanda.2.49.19)

अत्र स्थानेऽपि तं नत्वा तद्दर्शनफलं लभेत् । स्वयंभुवोंऽतिकं गत्वा हेतुं ज्ञास्यथ निश्चितम्

atra sthāne'pi taṁ natvā taddarśanaphalaṁ labhet svayaṁbhuvoṁ'tikaṁ gatvā hetuṁ jñāsyatha niścitam

इसी स्थान पर उन्हें प्रणाम करके भी उनके दर्शन का फल प्राप्त किया जा सकेगा। स्वयंभू ब्रह्मा के पास जाकर तुम इसका कारण निश्चय ही जान सकोगे।"

श्लोक 20 (skanda.2.49.20)

तच्छ्रुत्वा त्रिदशाः सर्वे ब्रह्मणोंऽतिकमागताः । यमानुग्रहवृत्तांतमवतारं च दारुणः

tacchrutvā tridaśāḥ sarve brahmaṇoṁ'tikamāgatāḥ yamānugrahavṛttāṁtamavatāraṁ ca dāruṇaḥ

यह सुनकर समस्त देवगण ब्रह्मा के समीप गए; और यम पर की गई कृपा का वृत्तांत तथा काष्ठमय अवतार का रहस्य,

श्लोक 21 (skanda.2.49.21)

श्रुत्वा संतुष्टमनसः सर्वे ते त्रिदिवं गताः । स तु विद्यापतिर्विप्रो रथारूढोऽभ्यचिंतयत्

śrutvā saṁtuṣṭamanasaḥ sarve te tridivaṁ gatāḥ sa tu vidyāpatirvipro rathārūḍho'bhyaciṁtayat

— सुनकर, संतुष्ट-चित्त होकर वे सभी स्वर्ग को चले गए। इधर वह ब्राह्मण विद्यापति, रथ पर आरूढ़ होकर, विचार करने लगा —

श्लोक 22 (skanda.2.49.22)

मम कार्यं तु निष्पन्नं यद्दृष्टो नीलमाधवः । आसमंतात्क्षेत्रमिदं परिभ्रम्यावलोकये

mama kāryaṁ tu niṣpannaṁ yaddṛṣṭo nīlamādhavaḥ āsamaṁtātkṣetramidaṁ paribhramyāvalokaye

"मेरा कार्य तो सिद्ध हो गया, क्योंकि मैंने नीलमाधव का दर्शन कर लिया; अब इस क्षेत्र के चारों ओर घूमकर मैं इसे अच्छी तरह देख लूँ,

श्लोक 23 (skanda.2.49.23)

अदृष्टपूर्वं परमं सुपुण्यं संकीर्तनं यस्य मलापहारि । क्षेत्रोत्तमं श्रीपुरुषोत्तमाख्यं प्रदक्षिणीकृत्य व्रजामि तूर्णम्

adṛṣṭapūrvaṁ paramaṁ supuṇyaṁ saṁkīrtanaṁ yasya malāpahāri kṣetrottamaṁ śrīpuruṣottamākhyaṁ pradakṣiṇīkṛtya vrajāmi tūrṇam

यह पहले कभी न देखा गया, परम पुण्यमय क्षेत्र है, जिसका कीर्तन मात्र भी पाप हरने वाला है — इस श्रीपुरुषोत्तम नामक उत्तम क्षेत्र की परिक्रमा करके मैं शीघ्र ही लौट चलूँ।

श्लोक 24 (skanda.2.49.24)

पृथ्वीप्रदक्षिणफलं शतधा भजंते पर्यंति ये सकलकल्मषदार्यरण्यम् । नीलाद्रिमण्डिमिदं पुरुपोत्तमाख्यं मित्रं ममोपदिशति स्म समुद्रतीरे

pṛthvīpradakṣiṇaphalaṁ śatadhā bhajaṁte paryaṁti ye sakalakalmaṣadāryaraṇyam nīlādrimaṇḍimidaṁ purupottamākhyaṁ mitraṁ mamopadiśati sma samudratīre

जो इस समस्त पापों को हरने वाले, नीलाद्रि से सुशोभित पुरुषोत्तम नामक क्षेत्र की समुद्र-तट पर परिक्रमा करते हैं, वे पृथ्वी की परिक्रमा के फल को सौ गुना पाते हैं — ऐसा मेरे मित्र ने मुझे बताया था।"

श्लोक 25 (skanda.2.49.25)

विचिंत्येत्थं द्विजश्रेष्ठः परिबभ्राम वै तदा । क्षेत्रं पश्यन्वनं चैव नानाद्रुमगणान्वितम्

viciṁtyetthaṁ dvijaśreṣṭhaḥ paribabhrāma vai tadā kṣetraṁ paśyanvanaṁ caiva nānādrumagaṇānvitam

इस प्रकार सोचकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने तब उस क्षेत्र की परिक्रमा की, नाना वृक्षों के समूह से युक्त उस वन को देखते हुए,

श्लोक 26 (skanda.2.49.26)

नानापक्षिगणाघुष्टं कूजद्भ्रमरगुंफितम् । अप्रविष्टार्ककिरणं छायातरुगणावृतम्

nānāpakṣigaṇāghuṣṭaṁ kūjadbhramaraguṁphitam apraviṣṭārkakiraṇaṁ chāyātarugaṇāvṛtam

— जो नाना पक्षी-समूहों के कलरव से गूँज रहा था, गुंजार करते भ्रमरों से भरा था, जिसमें सूर्य की किरणें प्रवेश नहीं कर पाती थीं, जो छायादार वृक्षों के समूह से घिरा था,

श्लोक 27 (skanda.2.49.27)

सर्वर्तुकुसुमोपेतं लतागुल्मोपशोभितम् । नानाजलाशयाधारकूजत्सारससंकुलम्

sarvartukusumopetaṁ latāgulmopaśobhitam nānājalāśayādhārakūjatsārasasaṁkulam

— जो सभी ऋतुओं के फूलों से युक्त था, लताओं और झाड़ियों से सुशोभित था, नाना जलाशयों के आधार पर बोलते हुए सारसों से भरा था,

श्लोक 28 (skanda.2.49.28)

पद्मकह्लारकुमुदविकचोत्पलराजितम् । न जलं तत्र कुसुमपरिहीनं लतादिकम्

padmakahlārakumudavikacotpalarājitam na jalaṁ tatra kusumaparihīnaṁ latādikam

— कमल, कह्लार, कुमुद और खिले हुए नीलकमल से सुशोभित था; वहाँ न तो कोई जलाशय फूलों से रहित था, न कोई लता।

श्लोक 29 (skanda.2.49.29)

परीत्य वेगात्तत्क्षेत्रं जगामाथ द्विजोत्तमः । ध्यायन्निरशनः प्राज्ञः प्राप्यावन्तीं दिनात्यये

parītya vegāttatkṣetraṁ jagāmātha dvijottamaḥ dhyāyanniraśanaḥ prājñaḥ prāpyāvantīṁ dinātyaye

उस क्षेत्र की तीव्र गति से परिक्रमा करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण फिर आगे बढ़ा; ध्यान करते हुए, बिना अन्न ग्रहण किए, वह प्रज्ञावान् अंततः दिन ढलने पर अवंती जा पहुँचा।

श्लोक 30 (skanda.2.49.30)

दूतैरावेदितं पूर्वं दूरस्थस्यागतं द्विजाः । श्रुत्वेंद्रद्युम्नो नृपतिः प्रहर्षं परमं ययौ

dūtairāveditaṁ pūrvaṁ dūrasthasyāgataṁ dvijāḥ śrutveṁdradyumno nṛpatiḥ praharṣaṁ paramaṁ yayau

हे विप्रो! उसका दूर से आगमन दूतों द्वारा पहले ही सूचित कर दिया गया था; यह सुनकर राजा इंद्रद्युम्न परम हर्ष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 31 (skanda.2.49.31)

तदागमनमाकांक्षन्पूजयित्वा जनार्द्दनम् । विद्वद्भिर्ब्राह्मणैः सार्द्धं तस्थौ संहृष्टमानसः

tadāgamanamākāṁkṣanpūjayitvā janārddanam vidvadbhirbrāhmaṇaiḥ sārddhaṁ tasthau saṁhṛṣṭamānasaḥ

उसके आगमन की प्रतीक्षा करते हुए, जनार्दन की पूजा करके, विद्वान ब्राह्मणों के साथ अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर वह बैठा रहा।

श्लोक 32 (skanda.2.49.32)

एतस्मिन्नंतरे विप्राः स तु विद्यापतिर्द्विजः । प्रावेशिकैर्वेत्रहस्तैर्दौवारिकपुरःसरैः

etasminnaṁtare viprāḥ sa tu vidyāpatirdvijaḥ prāveśikairvetrahastairdauvārikapuraḥsaraiḥ

हे विप्रो! इसी बीच वह ब्राह्मण विद्यापति, प्रवेश-द्वार के वेत्रधारी द्वारपालों से आगे किए जाने पर,

श्लोक 33 (skanda.2.49.33)

निर्दिष्टमार्गः पौरैश्चाऽनुमतः कौतुकान्वितैः । निर्माल्यमालां नीलाख्य माधवस्य सुशोभनाम्

nirdiṣṭamārgaḥ pauraiścā'numataḥ kautukānvitaiḥ nirmālyamālāṁ nīlākhya mādhavasya suśobhanām

— पथ-निर्देशित होकर, कौतूहलपूर्ण नगरवासियों द्वारा स्वागत किया जाता हुआ, नील माधव की सुंदर निर्माल्य-माला को

श्लोक 34 (skanda.2.49.34)

निधाय पाणौ राजाग्रे प्रविवेश त्वरान्वितः । तं दृष्ट्वा नृपतिः सोऽथ समुत्थाय वरासनात् । प्रसीद जगदीशेति वदन्नंतिकमभ्यगात्

nidhāya pāṇau rājāgre praviveśa tvarānvitaḥ taṁ dṛṣṭvā nṛpatiḥ so'tha samutthāya varāsanāt prasīda jagadīśeti vadannaṁtikamabhyagāt

हाथ में लिए हुए शीघ्रतापूर्वक राजा के सम्मुख प्रविष्ट हुआ। उसे देखकर राजा अपने श्रेष्ठ आसन से उठकर, "हे जगदीश! प्रसन्न होइए" कहते हुए उसके समीप गया।

श्लोक 35 (skanda.2.49.35)

अद्य मे जीवितं जातं सफलं जन्मकर्मणा । निर्माल्यमालावपुषं यत्पश्यामीहमाधवम्

adya me jīvitaṁ jātaṁ saphalaṁ janmakarmaṇā nirmālyamālāvapuṣaṁ yatpaśyāmīhamādhavam

"आज मेरा जीवन सार्थक हुआ, मेरा जन्म और कर्म सफल हुआ, क्योंकि मैं यहाँ निर्माल्य-माला के रूप में स्वयं माधव का दर्शन कर रहा हूँ।

श्लोक 36 (skanda.2.49.36)

मालां मुकुन्दशिरसोऽनुपमप्रमोदलाभाधरीकृतसुरद्रुमकांतगन्धाम् । अन्धीकृतालिनिचयां पवनप्रसारिगन्धप्रणाशितजगत्कलुषां नमामि

mālāṁ mukundaśiraso'nupamapramodalābhādharīkṛtasuradrumakāṁtagandhām andhīkṛtālinicayāṁ pavanaprasārigandhapraṇāśitajagatkaluṣāṁ namāmi

मुकुंद के सिर से उतरी हुई, अनुपम आनंद देने वाली, कल्पवृक्ष की मनोहर सुगंध को भी तुच्छ करने वाली, जिसकी सुगंध से भ्रमरों के समूह अंधे हो गए हैं, जिसकी वायु में फैलती सुगंध से जगत् की मलिनता का नाश हो जाता है, ऐसी उस माला को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.2.49.37)

यत्पादपंकजगलद्रजसोनुषंगा ब्रह्मादयः परमसंपदमापुरस्य । विष्णोः कलेवरसमुज्ज्वलितांगरागसंसक्तपुष्पनिलयां प्रणतोस्मि मालाम्

yatpādapaṁkajagaladrajasonuṣaṁgā brahmādayaḥ paramasaṁpadamāpurasya viṣṇoḥ kalevarasamujjvalitāṁgarāgasaṁsaktapuṣpanilayāṁ praṇatosmi mālām

जिनके चरण-कमल से गिरे हुए पराग-कणों के संपर्क से ब्रह्मा आदि देवों ने परम संपदा प्राप्त की, उन्हीं विष्णु के शरीर पर लगे हुए सुगंधित अंगराग से संसक्त, फूलों के निवासस्थान-रूप इस माला को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 38 (skanda.2.49.38)

पद्मां हृत्पद्मवसतिं सपत्नीं या हसत्यसौ । विकस्वरैः सुकुसुमैर्विष्ण्वंकस्थितिर्गर्विताम्

padmāṁ hṛtpadmavasatiṁ sapatnīṁ yā hasatyasau vikasvaraiḥ sukusumairviṣṇvaṁkasthitirgarvitām

यह माला उस पद्मा को, जो हृदय-कमल की निवासिनी है, अपनी सौत मानकर, अपने खिले हुए सुंदर फूलों से, विष्णु की गोद में स्थित होने के गर्व से युक्त उसे भी मानो हँसती है।

श्लोक 39 (skanda.2.49.39)

कुत्र स्थितेयमाहार्षीन्महिमानं स्रगुज्वला । या श्रीनिधेः शरीरेऽऽभूत्सर्वांगव्यापिनी चिरम्

kutra sthiteyamāhārṣīnmahimānaṁ sragujvalā yā śrīnidheḥ śarīre''bhūtsarvāṁgavyāpinī ciram

कहाँ रहकर इस देदीप्यमान माला ने ऐसी महिमा प्राप्त की, जो श्री-निधि विष्णु के शरीर पर चिरकाल तक सर्वांग-व्यापिनी रही है?

श्लोक 40 (skanda.2.49.40)

जय नीलाद्रिशिखरभूषणाघप्रद्षण । प्रणतार्त्तिहर श्रीमंस्त्राहि मां शरणागतम्

jaya nīlādriśikharabhūṣaṇāghapradṣaṇa praṇatārttihara śrīmaṁstrāhi māṁ śaraṇāgatam

हे नीलाद्रि के शिखर के आभूषण! हे पापों को दूषित करने वाले! हे प्रणत जनों की पीड़ा हरने वाले! हे श्रीमन्! विजय हो! मुझ शरणागत की रक्षा कीजिए।"

श्लोक 41 (skanda.2.49.41)

इति ब्रुवाणः क्षितिपो बाष्पगद्गदया गिरा । जगाम शिरसा भूमिं स्फुरद्रोमांचकंचुकः

iti bruvāṇaḥ kṣitipo bāṣpagadgadayā girā jagāma śirasā bhūmiṁ sphuradromāṁcakaṁcukaḥ

ऐसा कहते हुए वह राजा, आँसुओं से गद्गद वाणी में, रोमांच से कवचित शरीर के साथ, सिर के बल भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 42 (skanda.2.49.42)

सोऽपि विद्यापतिर्विप्रः क्षपिताशेषकल्मषः । दिव्यदेहो नृपस्याग्रे ध्यायन्माधवमास्थितः

so'pi vidyāpatirvipraḥ kṣapitāśeṣakalmaṣaḥ divyadeho nṛpasyāgre dhyāyanmādhavamāsthitaḥ

उधर वह ब्राह्मण विद्यापति भी, अपने समस्त पापों से मुक्त होकर, दिव्य देह धारण किए हुए, राजा के सम्मुख माधव का ध्यान करते हुए खड़ा रहा।

श्लोक 43 (skanda.2.49.43)

तेजसा सर्वलोकानां पापानि क्षालयन्सुधीः । अनुगृह्णातु देवस्त्वां नीलाद्रिशिखरालयः

tejasā sarvalokānāṁ pāpāni kṣālayansudhīḥ anugṛhṇātu devastvāṁ nīlādriśikharālayaḥ

उस बुद्धिमान ने कहा — "अपने तेज से समस्त लोकों के पापों को धो देने वाले, नीलाद्रि के शिखर पर निवास करने वाले वे देव आप पर कृपा करें।

श्लोक 44 (skanda.2.49.44)

श्रीपतेरियमाज्ञा ते मालारूपा प्रकाशिता । द्रष्टुं क्षेत्रोत्तमगतं स्वं साक्षान्मुक्तिदायकम्

śrīpateriyamājñā te mālārūpā prakāśitā draṣṭuṁ kṣetrottamagataṁ svaṁ sākṣānmuktidāyakam

श्रीपति की यही आज्ञा माला के रूप में आपके सम्मुख प्रकट हुई है, कि आप उस उत्तम क्षेत्र में स्थित, साक्षात् मुक्ति देने वाले अपने स्वरूप का दर्शन करें।"

श्लोक 45 (skanda.2.49.45)

इत्युच्चरन्नरपतेरामुमोच गले स्रजम् । सोऽप्युत्थाय क्षितिपतिर्मालां हृदयलंबिनीम्

ityuccarannarapaterāmumoca gale srajam so'pyutthāya kṣitipatirmālāṁ hṛdayalaṁbinīm

ऐसा कहते हुए उसने राजा के गले में वह माला पहना दी। राजा भी उठकर, हृदय तक लटकती उस माला को

श्लोक 46 (skanda.2.49.46)

दृष्ट्वा मेने श्रियः कांतं साक्षाद्धृदयगामिनम् । निधाय पाणी शिरसि दरमीलितलोचनः

dṛṣṭvā mene śriyaḥ kāṁtaṁ sākṣāddhṛdayagāminam nidhāya pāṇī śirasi daramīlitalocanaḥ

— देखकर, उसे साक्षात् श्री के प्रियतम के रूप में, अपने हृदय में प्रवेश करते हुए मानने लगा; दोनों हाथ सिर पर रखकर, नेत्र अधखुले किए हुए,

श्लोक 47 (skanda.2.49.47)

आनंदाश्रुजलक्लिन्नवदनस्तुष्टुवे हरिम्

ānaṁdāśrujalaklinnavadanastuṣṭuve harim

— आनंद के अश्रुओं से भीगे हुए मुख से हरि की स्तुति करने लगा।

श्लोक 48 (skanda.2.49.48)

इन्द्रद्युम्न उवाच । जयाखिलजगत्सृष्टिस्थितिसंहारशिल्पकृत् । लीलाविश्ववपुर्लोमसंख्यब्रह्मांडभारभृत्

indradyumna uvāca jayākhilajagatsṛṣṭisthitisaṁhāraśilpakṛt līlāviśvavapurlomasaṁkhyabrahmāṇḍabhārabhṛt

इंद्रद्युम्न ने कहा — समस्त जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार के शिल्पकार, विजयी हों! जिनके प्रत्येक रोम में असंख्य ब्रह्मांडों का भार धारण करने वाला विश्व-देह लीलामात्र है,

श्लोक 49 (skanda.2.49.49)

अंतर्यामिन्नशेषाणां प्रणतार्तिहर प्रभो । ब्रह्मेंद्र रुद्रमुकुटकिर्मीरितपदांबुज

aṁtaryāminnaśeṣāṇāṁ praṇatārtihara prabho brahmeṁdra rudramukuṭakirmīritapadāṁbuja

हे समस्त प्राणियों के अंतर्यामी! हे प्रणत जनों की पीड़ा हरने वाले प्रभो! हे ब्रह्मा, इंद्र और रुद्र के मुकुटों से रंगे हुए चरण-कमल वाले!

श्लोक 50 (skanda.2.49.50)

दीनानाथविपन्नैकसततत्राणतत्पर । निर्व्याजकरुणावारिपारावार परात्पर

dīnānāthavipannaikasatatatrāṇatatpara nirvyājakaruṇāvāripārāvāra parātpara

हे दीन, अनाथ और संकटग्रस्त लोगों की निरंतर एकमात्र रक्षा में तत्पर! हे निष्कपट करुणा के जल के महासागर! हे परात्पर!

श्लोक 51 (skanda.2.49.51)

त्वदेकशरणं दीनमनादिभ्रमनिर्भरम् । परित्राहि जगन्नाथ भक्ताविरतवत्सल

tvadekaśaraṇaṁ dīnamanādibhramanirbharam paritrāhi jagannātha bhaktāviratavatsala

हे जगन्नाथ! हे भक्तों पर निरंतर वात्सल्य रखने वाले! अनादि भ्रम से भरे, मुझ दीन को, जो केवल आपकी ही शरण में है, बचाइए।

श्लोक 52 (skanda.2.49.52)

इति स्तुवन्नरपतिः स्वासने समुपाविशत् । गृहमेधिब्रह्मचारियतिवैखानसैर्वृतः

iti stuvannarapatiḥ svāsane samupāviśat gṛhamedhibrahmacāriyativaikhānasairvṛtaḥ

इस प्रकार स्तुति करते हुए राजा अपने आसन पर बैठ गया, गृहस्थों, ब्रह्मचारियों, संन्यासियों और वानप्रस्थों से घिरा हुआ,

श्लोक 53 (skanda.2.49.53)

अष्टादशसु विद्यासु कुशलैर्यज्वभिर्द्विजैः । मीनैः स्थविरभृत्यैश्च सार्द्धं मंत्रिपुरःसरैः

aṣṭādaśasu vidyāsu kuśalairyajvabhirdvijaiḥ mīnaiḥ sthavirabhṛtyaiśca sārddhaṁ maṁtripuraḥsaraiḥ

अठारह विद्याओं में निपुण, यज्ञकर्ता ब्राह्मणों के साथ, मंत्रियों के साथ, वृद्ध सेवकों के साथ,

श्लोक 54 (skanda.2.49.54)

विद्यापति पूजयित्वा बहुमानपुरःसरम् । उपवेश्याग्रतः पीठे पृष्ट्वा कुशलमादितः

vidyāpati pūjayitvā bahumānapuraḥsaram upaveśyāgrataḥ pīṭhe pṛṣṭvā kuśalamāditaḥ

— विद्यापति को अत्यंत सम्मानपूर्वक पूजकर, अपने सामने एक आसन पर बिठाकर, पहले कुशल-क्षेम पूछकर,

श्लोक 55 (skanda.2.49.55)

पुरुषोत्तमक्षेत्रस्य विष्णोर्नीलाश्मवर्ष्मणः । महिमानं स्वरूपं च पप्रच्छावहितो मुदा

puruṣottamakṣetrasya viṣṇornīlāśmavarṣmaṇaḥ mahimānaṁ svarūpaṁ ca papracchāvahito mudā

उसने पुरुषोत्तम-क्षेत्र और नीलमणि-रूपी विष्णु की महिमा तथा स्वरूप के विषय में सावधानी और हर्षपूर्वक प्रश्न किया।

श्लोक 56 (skanda.2.49.56)

ब्राह्मणः क्षत्रियेणासौ पृष्टोनुभवमात्मनः । भिल्लद्वीपप्रवेशादिमज्जनांतं सरित्पतेः

brāhmaṇaḥ kṣatriyeṇāsau pṛṣṭonubhavamātmanaḥ bhilladvīpapraveśādimajjanāṁtaṁ saritpateḥ

क्षत्रिय राजा द्वारा प्रश्न किए जाने पर वह ब्राह्मण, भिल्लद्वीप में प्रवेश करने से लेकर समुद्र में स्नान करने तक के अपने अनुभव को,

श्लोक 57 (skanda.2.49.57)

क्षेत्रोत्तमस्य वृत्तांतं कथयामास विस्तरात् । नीलाद्रिरोहणं नीलमाधवस्य च दर्शनम्

kṣetrottamasya vṛttāṁtaṁ kathayāmāsa vistarāt nīlādrirohaṇaṁ nīlamādhavasya ca darśanam

उस उत्तम क्षेत्र का समस्त वृत्तांत विस्तार से कह सुनाया — नीलाचल पर्वत पर चढ़ना, नीलमाधव का दर्शन,

श्लोक 58 (skanda.2.49.58)

स्नानं च रौहिणे कुण्डे महिमानं वटस्य च । नृसिंहाद्यष्टशंभून शक्तीनामष्टसंस्थितिम्

snānaṁ ca rauhiṇe kuṇḍe mahimānaṁ vaṭasya ca nṛsiṁhādyaṣṭaśaṁbhūna śaktīnāmaṣṭasaṁsthitim

रौहिण कुंड में स्नान, वटवृक्ष की महिमा, नृसिंह आदि आठ शिवों की तथा आठ शक्तियों की स्थिति,

श्लोक 59 (skanda.2.49.59)

रथेनाक्रमणाद्दृष्टौ क्षेत्रस्यायामविस्तरौ । तत्सर्वं वर्णयामास यथावदनुपूर्वशः

rathenākramaṇāddṛṣṭau kṣetrasyāyāmavistarau tatsarvaṁ varṇayāmāsa yathāvadanupūrvaśaḥ

रथ से घूमकर देखी गई क्षेत्र की लंबाई और चौड़ाई — यह सब उसने यथाविधि, क्रमशः वर्णन किया।

श्लोक 60 (skanda.2.49.60)

तच्छ्रुत्वा चित्रमतुलं तैर्थिकावेदितं पुरा । संप्रतीतो हृष्टमनाः पुनस्तं क्षितिपोऽब्रवीत्

tacchrutvā citramatulaṁ tairthikāveditaṁ purā saṁpratīto hṛṣṭamanāḥ punastaṁ kṣitipo'bravīt

पूर्व में तीर्थयात्री द्वारा बताए गए उस अनुपम आश्चर्य को सुनकर, अब विश्वास करते हुए, हर्षित मन वाले राजा ने पुनः उससे कहा —

श्लोक 61 (skanda.2.49.61)

इन्द्रद्युम्न उवाच । श्रुतपूर्वं तु भगवंस्त्वत्तोऽश्रौषं सुदुर्लभम् । क्षेत्रोत्तमं द्विजश्रेष्ठ सांप्रतं वर्णयस्व मे

indradyumna uvāca śrutapūrvaṁ tu bhagavaṁstvatto'śrauṣaṁ sudurlabham kṣetrottamaṁ dvijaśreṣṭha sāṁprataṁ varṇayasva me

इंद्रद्युम्न ने कहा — हे भगवन्! जो पहले सुना गया था, वही अत्यंत दुर्लभ वृत्तांत अब मैंने आपसे भी सुना। हे द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे उस उत्तम क्षेत्र का,

श्लोक 62 (skanda.2.49.62)

नीलेन्द्रमणिमूर्तेस्तु विष्णो रूपं यथातथम् । विद्यापतिरुवाच । हंत ते कथयिष्यामि दिव्यां मूर्तिं जगत्पतेः

nīlendramaṇimūrtestu viṣṇo rūpaṁ yathātatham vidyāpatiruvāca haṁta te kathayiṣyāmi divyāṁ mūrtiṁ jagatpateḥ

और नीलमणि-मूर्ति विष्णु के रूप का यथार्थ वर्णन कीजिए। विद्यापति ने कहा — अवश्य, मैं आपको जगत्पति की उस दिव्य मूर्ति के विषय में बताऊँगा,

श्लोक 63 (skanda.2.49.63)

यां चर्मचक्षुषा दृष्ट्वा जायते मुक्तिभाजनम् । नीलेन्द्रमणिपाषाणमयी मूर्तिः पुरातनी

yāṁ carmacakṣuṣā dṛṣṭvā jāyate muktibhājanam nīlendramaṇipāṣāṇamayī mūrtiḥ purātanī

जिसे चर्म-नेत्रों से देखने मात्र से मनुष्य मुक्ति का भागी बन जाता है। नीलमणि-पाषाण से निर्मित वह मूर्ति अत्यंत प्राचीन है,

श्लोक 64 (skanda.2.49.64)

यान्वहं ब्रह्मरुद्रेंद्रपुरोगैरर्चिता सुरैः । आरोपितेयं दिव्या स्रक्पूजायां हि सुपर्वभिः

yānvahaṁ brahmarudreṁdrapurogairarcitā suraiḥ āropiteyaṁ divyā srakpūjāyāṁ hi suparvabhiḥ

जिसकी नित्य ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र आदि प्रमुख देवताओं द्वारा पूजा की जाती है, जिस पर पूजा के समय देवताओं द्वारा यह दिव्य माला चढ़ाई जाती है।

श्लोक 65 (skanda.2.49.65)

सेयं न म्लायति नृप न च गन्धेन रिच्यते । दिने बहुतिथे यातेऽपीदृशी स्रग्धरोद्भवा

seyaṁ na mlāyati nṛpa na ca gandhena ricyate dine bahutithe yāte'pīdṛśī sragdharodbhavā

हे राजन्! यह माला न तो कभी मुरझाती है, न ही अपनी सुगंध खोती है; कई दिन बीत जाने पर भी यह उसी सुगंध-निधि से उत्पन्न माला वैसी ही बनी रहती है।

श्लोक 66 (skanda.2.49.66)

दिव्योपहारः निर्माल्यभक्षणात्क्षीणकल्मषम् । मां न पश्यसि किं राजन्नतिमानुषवर्चसम्

divyopahāraḥ nirmālyabhakṣaṇātkṣīṇakalmaṣam māṁ na paśyasi kiṁ rājannatimānuṣavarcasam

यह दिव्य उपहार है — इसके निर्माल्य का सेवन करने मात्र से पाप क्षीण हो जाते हैं; हे राजन्! क्या आप मुझमें अलौकिक तेज नहीं देखते?

श्लोक 67 (skanda.2.49.67)

सकृदप्यशनाद्यस्य क्षुत्पिपासाबलक्षयाः । न बाधन्ते नृपश्रेष्ठ दृष्टेनादृष्टकल्पनम्

sakṛdapyaśanādyasya kṣutpipāsābalakṣayāḥ na bādhante nṛpaśreṣṭha dṛṣṭenādṛṣṭakalpanam

हे राजश्रेष्ठ! जिसके एक बार भी भोजन करने से भूख, प्यास और बल-क्षय जैसी बाधाएँ नहीं सताती हैं — इसमें दृष्ट फल से अदृष्ट फल की कल्पना की जा सकती है।

श्लोक 68 (skanda.2.49.68)

भुक्तिर्मुक्तिश्च वै राजन्न् तत्र युगपत्स्थिते । न जरारोगशोकादिदुःखं तत्र हि विद्यते

bhuktirmuktiśca vai rājann tatra yugapatsthite na jarārogaśokādiduḥkhaṁ tatra hi vidyate

हे राजन्! वहाँ भोग और मोक्ष दोनों एक साथ स्थित हैं; वहाँ जरा, रोग, शोक आदि दुःख विद्यमान ही नहीं हैं,

श्लोक 69 (skanda.2.49.69)

यत्र साक्षाज्जगन्नाथः प्रसन्नवदनो विभुः । फुल्लेंदीवरपत्राक्षः प्रपन्नामृतमुक्तिदः

yatra sākṣājjagannāthaḥ prasannavadano vibhuḥ phulleṁdīvarapatrākṣaḥ prapannāmṛtamuktidaḥ

जहाँ साक्षात् जगन्नाथ, प्रसन्न मुख वाले, खिले हुए नील कमल-दल के समान नेत्रों वाले, शरणागतों को अमृतमय मुक्ति देने वाले प्रभु स्वयं विराजमान हैं।

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