वैष्णव खण्ड · अध्याय 52
इंद्रद्युम्न की एकाम्रवन-यात्रा और शिव की काशी-कथा
श्लोक 1 (skanda.2.52.1)
जैमिनिरुवाच । उक्ते ब्रह्मसुतेनेत्थमिंद्रद्युम्नो महीपतिः । मुनेस्तुवचनं श्रुत्वा प्रहृष्टेनांतरात्मना । विचार्य परया बुद्ध्या श्रमं मेने फलावहम्
jaiminiruvāca ukte brahmasutenetthamiṁdradyumno mahīpatiḥ munestuvacanaṁ śrutvā prahṛṣṭenāṁtarātmanā vicārya parayā buddhyā śramaṁ mene phalāvaham
जैमिनि ने कहा — ब्रह्मपुत्र नारद के इस प्रकार कहने पर, राजा इंद्रद्युम्न ने मुनि के वचन सुनकर, प्रसन्न अंतःकरण से, उत्तम बुद्धि से विचार करके, इस परिश्रम को फलदायी माना।
श्लोक 2 (skanda.2.52.2)
अहो मे परमं भाग्यं बहुजन्मांतरार्जितम् । व्यवसाये ममोद्युक्तः सर्वलोकपितामहः
aho me paramaṁ bhāgyaṁ bahujanmāṁtarārjitam vyavasāye mamodyuktaḥ sarvalokapitāmahaḥ
अहो, यह मेरा परम सौभाग्य है, जो अनेक जन्मों में अर्जित हुआ है — सर्वलोक के पितामह ब्रह्मा स्वयं मेरे इस कार्य में उद्यत हुए हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.52.3)
जीवन्मुक्तं स्वतनुजं मत्सहायमकारयत् । सहायो यादृशः पुंसां भवेत्कार्यं हि तादृशम्
jīvanmuktaṁ svatanujaṁ matsahāyamakārayat sahāyo yādṛśaḥ puṁsāṁ bhavetkāryaṁ hi tādṛśam
अपने जीवन्मुक्त पुत्र नारद को उन्होंने मेरा सहायक बनाया; जैसा सहायक पुरुष को मिलता है, वैसा ही उसका कार्य सिद्ध होता है।
श्लोक 4 (skanda.2.52.4)
श्रुतं सभासु सर्वासु इति वृद्धानुशासनम् । स इत्थं चिंतयन्राजा विसृज्य च सभासदः
śrutaṁ sabhāsu sarvāsu iti vṛddhānuśāsanam sa itthaṁ ciṁtayanrājā visṛjya ca sabhāsadaḥ
सभी सभाओं में यह सुना जाता है, यही वृद्धों का उपदेश है — ऐसा विचार करते हुए राजा ने सभासदों को विदा किया।
श्लोक 5 (skanda.2.52.5)
ततो मुनिं करे धृत्वा विवेशांतःपुरे द्विजाः । तमर्चयित्वा विधिवत्पल्यंके सह तेन वै
tato muniṁ kare dhṛtvā viveśāṁtaḥpure dvijāḥ tamarcayitvā vidhivatpalyaṁke saha tena vai
तब मुनि को हाथ से पकड़कर वे अंतःपुर में गए, हे द्विजो! और विधिपूर्वक उनका पूजन कर उन्हीं के साथ शय्या पर बैठे।
श्लोक 6 (skanda.2.52.6)
निशावशेषं नृपतिर्निनाय संलपन्मिथः । ततः प्रभाते विमले नित्यं कर्म समाप्य वै
niśāvaśeṣaṁ nṛpatirnināya saṁlapanmithaḥ tataḥ prabhāte vimale nityaṁ karma samāpya vai
राजा ने रात्रि का शेष भाग परस्पर वार्तालाप में बिताया; फिर निर्मल प्रभात में नित्य कर्म पूर्ण करके,
श्लोक 7 (skanda.2.52.7)
पूजयित्वा जगन्नाथं संततार महानदीम् । ओढ्रदेशाधिपेनाग्रे गच्छतादिष्टपद्धतिः
pūjayitvā jagannāthaṁ saṁtatāra mahānadīm oḍhradeśādhipenāgre gacchatādiṣṭapaddhatiḥ
जगन्नाथ का पूजन कर महानदी को पार किया; ओड्रदेश के अधिपति द्वारा आगे बताए गए मार्ग से जाते हुए,
श्लोक 8 (skanda.2.52.8)
एकाम्र वनकं क्षेत्रमभियातो बलान्वितः । स गत्वा किंचिदध्वानं प्राप्य गंधवहाभिधाम्
ekāmra vanakaṁ kṣetramabhiyāto balānvitaḥ sa gatvā kiṁcidadhvānaṁ prāpya gaṁdhavahābhidhām
सेनासहित एकाम्रवन नामक क्षेत्र की ओर चल पड़े; कुछ दूर जाकर गंधवहा नामक नदी को पाकर,
श्लोक 9 (skanda.2.52.9)
नदीं वेगवतीं शीततोयामाक्रम्य वेगवान् । पूर्वाह्नपूजासमये कोटिलिंगेश्वरस्य वै
nadīṁ vegavatīṁ śītatoyāmākramya vegavān pūrvāhnapūjāsamaye koṭiliṁgeśvarasya vai
वेगवान् राजा ने शीतल जलवाली उस वेगवती नदी को पार किया; कोटिलिंगेश्वर के पूर्वाह्न-पूजा के समय,
श्लोक 10 (skanda.2.52.10)
चर्चरीशंखकाहालमृदंगमुरजध्वनिम् । व्यश्नुवानं महारण्यं दूराच्छुश्राव भूपतिः
carcarīśaṁkhakāhālamṛdaṁgamurajadhvanim vyaśnuvānaṁ mahāraṇyaṁ dūrācchuśrāva bhūpatiḥ
दूर से ही राजा ने महावन में गूँजते हुए झांझ, शंख, काहल, मृदंग और मुरज की ध्वनि सुनी।
श्लोक 11 (skanda.2.52.11)
मन्यमानो भगवतो नीलाचल निवासिनः । उवाच नारदं प्रीतो ध्वनिः कुत्र महामुने
manyamāno bhagavato nīlācala nivāsinaḥ uvāca nāradaṁ prīto dhvaniḥ kutra mahāmune
यह भगवान् नीलाचलवासी की ओर से है — ऐसा मानकर प्रसन्न होकर उन्होंने नारद से पूछा — 'हे महामुने! यह ध्वनि कहाँ से आ रही है?'
श्लोक 12 (skanda.2.52.12)
नीलाद्रिशिखरावासः प्राप्तः किं परमेश्वरः । यदर्चासमये ह्येष श्रूयते संकुलध्वनिः
nīlādriśikharāvāsaḥ prāptaḥ kiṁ parameśvaraḥ yadarcāsamaye hyeṣa śrūyate saṁkuladhvaniḥ
'क्या नीलगिरि के शिखर पर निवास करने वाले परमेश्वर तक हम पहुँच गए हैं? क्योंकि यह उपासना के समय सुनाई देने वाला कोलाहल-सा शब्द है।'
श्लोक 13 (skanda.2.52.13)
उताहोप्यन्यदेवो वा निकटे वर्त्तते मुने । इति पृष्टस्तदा राज्ञा प्रोवाच मुनिपुंगवः
utāhopyanyadevo vā nikaṭe varttate mune iti pṛṣṭastadā rājñā provāca munipuṁgavaḥ
'अथवा कोई अन्य देवता ही समीप है, हे मुने?' — इस प्रकार राजा द्वारा पूछे जाने पर मुनिश्रेष्ठ ने कहा —
श्लोक 14 (skanda.2.52.14)
राजन्सुदुर्लभं क्षेत्रं गोपितं मुरवैरिणा । न तत्रास्तीति भगवान्कैरपि ज्ञायते नृभिः
rājansudurlabhaṁ kṣetraṁ gopitaṁ muravairiṇā na tatrāstīti bhagavānkairapi jñāyate nṛbhiḥ
'हे राजन्! यह अत्यंत दुर्लभ क्षेत्र है, मुर के शत्रु (विष्णु) द्वारा छिपाया गया है; इसीलिए मनुष्य कहते हैं कि भगवान् वहाँ नहीं हैं, क्योंकि वे किसी भी मनुष्य द्वारा नहीं जाने जाते।'
श्लोक 15 (skanda.2.52.15)
त्वं हि भाग्यवतां श्रेष्ठस्त्वद्भाग्यात्ते पुरोधसा । दृष्टः कथंचिद्भगवान्संयतेंद्रियवर्त्मना
tvaṁ hi bhāgyavatāṁ śreṣṭhastvadbhāgyātte purodhasā dṛṣṭaḥ kathaṁcidbhagavānsaṁyateṁdriyavartmanā
'तुम भाग्यवानों में श्रेष्ठ हो; तुम्हारे ही भाग्य से तुम्हारे पुरोहित ने संयमित इंद्रियों के मार्ग से किसी प्रकार भगवान् का दर्शन किया है।'
श्लोक 16 (skanda.2.52.16)
त्वं हि तावद्बलैर्युक्तः षडंगैनृपसत्तम । साहसेऽतिप्रवृत्तोऽसि संशयो मे महीपते
tvaṁ hi tāvadbalairyuktaḥ ṣaḍaṁgainṛpasattama sāhase'tipravṛtto'si saṁśayo me mahīpate
'तुम तो सेना के छहों अंगों से युक्त हो, हे नृपश्रेष्ठ; परंतु तुम अत्यंत साहस में प्रवृत्त हो — मुझे इसकी शंका है, हे महीपते!'
श्लोक 17 (skanda.2.52.17)
संवर्त्तते नीलगिरिर्योजने तु तृतीयके । इदं त्वेकाम्रकवनं क्षेत्रं गौरीपतेर्विभोः । नातिदूरे महीपाल भीतः स शरणागतः
saṁvarttate nīlagiriryojane tu tṛtīyake idaṁ tvekāmrakavanaṁ kṣetraṁ gaurīpatervibhoḥ nātidūre mahīpāla bhītaḥ sa śaraṇāgataḥ
'नीलगिरि यहाँ से तीसरे योजन पर स्थित है; परंतु यह एकाम्रक वन तो गौरीपति के विभु का क्षेत्र है — अधिक दूर नहीं, हे महीपाल; वे भयभीत होकर यहीं शरण में आए हैं।'
श्लोक 18 (skanda.2.52.18)
इंद्रद्युम्न उवाच । कथं स भीतो गौरीशः कं वा शरणमागतः
iṁdradyumna uvāca kathaṁ sa bhīto gaurīśaḥ kaṁ vā śaraṇamāgataḥ
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'गौरीश किस प्रकार भयभीत हुए? और किसकी शरण में गए?'
श्लोक 19 (skanda.2.52.19)
ददाह त्रिपुरं घोरं शरेणैकेन यः पुरा । अत्र मे विस्मयो जातः श्रोतुमिच्छामि दुर्लभम्
dadāha tripuraṁ ghoraṁ śareṇaikena yaḥ purā atra me vismayo jātaḥ śrotumicchāmi durlabham
'जिन्होंने पूर्वकाल में एक ही बाण से भयंकर त्रिपुर को भस्म कर दिया था — इस बात पर मुझे विस्मय हुआ है; मैं यह दुर्लभ कथा सुनना चाहता हूँ।'
श्लोक 20 (skanda.2.52.20)
रक्षिता भवभीतानां भवः परमपावनः । किमर्थं भयभीतोऽसौ कः समर्थोऽस्य वै जये
rakṣitā bhavabhītānāṁ bhavaḥ paramapāvanaḥ kimarthaṁ bhayabhīto'sau kaḥ samartho'sya vai jaye
'भव तो संसार से भयभीतों के रक्षक और परम पावन हैं — वे स्वयं किसलिए भयभीत हुए? उन्हें जीतने में कौन समर्थ है?'
श्लोक 21 (skanda.2.52.21)
नारद उवाच । अत्र ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महीपते । उपयेमे पुरा गौरीं तपसा वशमागतः
nārada uvāca atra te kathayiṣyāmi purāvṛttaṁ mahīpate upayeme purā gaurīṁ tapasā vaśamāgataḥ
नारद ने कहा — 'हे राजन्! मैं तुम्हें इस विषय का प्राचीन वृत्तांत सुनाता हूँ। पूर्वकाल में, तप से वश में आकर उन्होंने गौरी से विवाह किया।'
श्लोक 22 (skanda.2.52.22)
ब्रह्मचारी हिमगिरौ भगवान्नीललोहितः । उत्सृज्य ब्रह्मचर्यं तु सोऽनंगशरपीडितः
brahmacārī himagirau bhagavānnīlalohitaḥ utsṛjya brahmacaryaṁ tu so'naṁgaśarapīḍitaḥ
हिमगिरि पर ब्रह्मचारी रहे भगवान् नीललोहित ने ब्रह्मचर्य त्यागकर — वे कामदेव के बाणों से पीड़ित हो गए थे।
श्लोक 23 (skanda.2.52.23)
तया रेमे रुचिरया यौवनोन्मत्तया नृप । तत्पितुर्विषये भोगान्बुभुजे देवकांक्षितान्
tayā reme rucirayā yauvanonmattayā nṛpa tatpiturviṣaye bhogānbubhuje devakāṁkṣitān
यौवन से उन्मत्त, मनोहर उस गौरी के साथ उन्होंने विहार किया, हे राजन्; उसके पिता के राज्य में उन्होंने देवताओं द्वारा भी अभिलषित भोगों का उपभोग किया।
श्लोक 24 (skanda.2.52.24)
कदाचिदथ निर्याती स्ववासभवनात्सती । सामपूर्वं कुलस्त्रीभिर्मात्रोक्ता सस्मितं वचः
kadācidatha niryātī svavāsabhavanātsatī sāmapūrvaṁ kulastrībhirmātroktā sasmitaṁ vacaḥ
एक बार वह सती अपने निवास-भवन से बाहर निकली, तब कुल की स्त्रियों के साथ उसकी माता ने सस्नेह, मुस्कुराते हुए वचन कहे —
श्लोक 25 (skanda.2.52.25)
आर्ये महत्तपस्तप्तं वरार्थं गहने वने । निष्कुलो निर्गुणो वृद्धो वरः प्राप्तो वरानने
ārye mahattapastaptaṁ varārthaṁ gahane vane niṣkulo nirguṇo vṛddho varaḥ prāpto varānane
'हे आर्ये! वर की प्राप्ति के लिए गहन वन में महान् तप किया गया, फिर भी हे वरानने! तुझे कुलहीन, गुणहीन, वृद्ध वर ही मिला।'
श्लोक 26 (skanda.2.52.26)
दिवारात्रिं न त्यजसि सन्निधिं तादृशस्य वै । को गुणः कथ्यतां वत्से किं वा पत्युः प्रसादजम्
divārātriṁ na tyajasi sannidhiṁ tādṛśasya vai ko guṇaḥ kathyatāṁ vatse kiṁ vā patyuḥ prasādajam
'दिन-रात तू उसका साथ नहीं छोड़ती — बता तो, हे वत्से, उसमें कौन-सा गुण है, या उसकी कृपा से तुझे क्या मिला है?'
श्लोक 27 (skanda.2.52.27)
भूषणाच्छादनं प्राप्तं ममैव गृहवासिनी । चिरं तिष्ठसि भद्रे त्वं पितृभोगोपलालिता
bhūṣaṇācchādanaṁ prāptaṁ mamaiva gṛhavāsinī ciraṁ tiṣṭhasi bhadre tvaṁ pitṛbhogopalālitā
'तुझे तो केवल आभूषण और वस्त्र ही मिले हैं, और तू अब भी मेरे ही घर में रहती है; हे भद्रे, तू पिता के भोगों से पालित होकर चिरकाल से यहीं बैठी है।'
श्लोक 28 (skanda.2.52.28)
त्रैलोक्ये यास्तु कन्या वै परिणीताः पितुर्गृहात् । प्रयात्यलंकृताभर्त्रा भर्तृवेश्मनि शुश्रुम
trailokye yāstu kanyā vai pariṇītāḥ piturgṛhāt prayātyalaṁkṛtābhartrā bhartṛveśmani śuśruma
'हमने सुना है कि त्रिलोक में जो भी कन्याएँ पिता के घर से विवाहित होती हैं, वे अलंकृत होकर पति द्वारा पति के घर ले जाई जाती हैं।'
श्लोक 29 (skanda.2.52.29)
अहं तु मानसी कन्या पितृणां पितृलोकतः । आगता तु महाभागे परिणीता हिमाद्रिणा
ahaṁ tu mānasī kanyā pitṛṇāṁ pitṛlokataḥ āgatā tu mahābhāge pariṇītā himādriṇā
'मैं तो पितरों की मानसी कन्या हूँ, पितृलोक से आई; हे महाभागे, मुझे हिमाद्रि ने विवाह कर [अपने घर] लाया था।'
श्लोक 30 (skanda.2.52.30)
इत्थमुक्ता मया हास्यान्न क्रोधाच्चललोचने । जामातुरग्रे नो वाच्यं स हि विष्णुसमो मतः
itthamuktā mayā hāsyānna krodhāccalalocane jāmāturagre no vācyaṁ sa hi viṣṇusamo mataḥ
'यह मैंने हास्यवश कहा है, क्रोधवश नहीं, हे चंचल-नेत्रे! अपने पति के सामने यह न कहना, क्योंकि वे तो विष्णु के समान माने जाते हैं।'
श्लोक 31 (skanda.2.52.31)
नारद उवाच । मातुरित्थं वचः श्रुत्वा भर्तृनिंदाप्रपीडिता । कोपप्रस्फुरदोष्ठी सा वाचं नोचे मनागपि
nārada uvāca māturitthaṁ vacaḥ śrutvā bhartṛniṁdāprapīḍitā kopaprasphuradoṣṭhī sā vācaṁ noce manāgapi
नारद ने कहा — माता के इन वचनों को सुनकर, पति की निंदा से पीड़ित होकर, क्रोध से काँपते होठों वाली उसने तनिक भी वचन नहीं कहा।
श्लोक 32 (skanda.2.52.32)
प्रययावंतिकं भर्तुर्निह्नुवानांऽबिकावचः । जगाद परुषं वाक्यं स्नेहगर्भं मिताक्षरम्
prayayāvaṁtikaṁ bharturnihnuvānāṁ'bikāvacaḥ jagāda paruṣaṁ vākyaṁ snehagarbhaṁ mitākṣaram
वह अपनी माता के वचन छिपाती हुई अपने पति के समीप गई; उसने स्नेहयुक्त किंतु कठोर, संक्षिप्त वचन कहे —
श्लोक 33 (skanda.2.52.33)
स्वामिन्न सांप्रतं चैतद्यद्वासः श्वशुरालये । क्षौद्रीयसामपि गुरोस्त्रैलोक्यस्य कथं नु ते
svāminna sāṁprataṁ caitadyadvāsaḥ śvaśurālaye kṣaudrīyasāmapi gurostrailokyasya kathaṁ nu te
'हे स्वामिन्! अब यह उचित नहीं कि हमारा निवास श्वशुर के घर में हो; त्रिलोक के गुरु ऐसे आप के लिए यह कैसे उचित है?'
श्लोक 34 (skanda.2.52.34)
तदावयोर्नात्र योग्या वसतिर्मे प्रिया विभो । न संति किं ते वासाय योग्या वै भूमयः प्रभोः
tadāvayornātra yogyā vasatirme priyā vibho na saṁti kiṁ te vāsāya yogyā vai bhūmayaḥ prabhoḥ
'इसलिए हम दोनों के लिए यहाँ का निवास योग्य नहीं है, न मुझे प्रिय है, हे विभो; क्या आपके निवास के योग्य पृथ्वियाँ नहीं हैं, हे प्रभो?'
श्लोक 35 (skanda.2.52.35)
इत्युक्तः शिवया सोऽथ भगवान्वृषभध्वजः । तया सार्द्धं वृषारूढो मध्यदेशं ययौ त्वरन्
ityuktaḥ śivayā so'tha bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ tayā sārddhaṁ vṛṣārūḍho madhyadeśaṁ yayau tvaran
शिवा के इस प्रकार कहने पर, वृषभध्वज भगवान् उसके साथ वृषभ पर आरूढ़ होकर शीघ्र ही मध्यदेश की ओर चले।
श्लोक 36 (skanda.2.52.36)
विलंघ्य सर्व तीर्थानि प्रयागं पावनं महत् । पूर्वसागरगामिन्या गंगाया उत्तरे तटे
vilaṁghya sarva tīrthāni prayāgaṁ pāvanaṁ mahat pūrvasāgaragāminyā gaṁgāyā uttare taṭe
समस्त तीर्थों को, और महान् पावन प्रयाग को लाँघकर, पूर्व सागर की ओर बहने वाली गंगा के उत्तरी तट पर,
श्लोक 37 (skanda.2.52.37)
वाराणसीं नाम पुरीं गौर्या वासाय निर्ममे । पंचक्रोशमितां रम्यां वरप्रासादशोभिताम्
vārāṇasīṁ nāma purīṁ gauryā vāsāya nirmame paṁcakrośamitāṁ ramyāṁ varaprāsādaśobhitām
गौरी के निवास के लिए उन्होंने वाराणसी नामक नगरी रची, पाँच क्रोश विस्तृत, रमणीय, उत्तम प्रासादों से सुशोभित,
श्लोक 38 (skanda.2.52.38)
अट्टालकशतैर्युक्तामसंख्योपवनैर्युताम् । नानातीर्थसमायुक्तां नानाजनसमाकुलाम्
aṭṭālakaśatairyuktāmasaṁkhyopavanairyutām nānātīrthasamāyuktāṁ nānājanasamākulām
सैकड़ों अट्टालिकाओं से युक्त, असंख्य उपवनों से युक्त, नाना तीर्थों से संयुक्त, नाना जनों से भरी हुई,
श्लोक 39 (skanda.2.52.39)
आज्ञया धूर्जटेः शुभ्रां निर्मितां विश्वकर्मणा । पावनैः शीतलैर्गंगातरंगैः क्षपितांहसाम्
ājñayā dhūrjaṭeḥ śubhrāṁ nirmitāṁ viśvakarmaṇā pāvanaiḥ śītalairgaṁgātaraṁgaiḥ kṣapitāṁhasām
धूर्जटि की आज्ञा से विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, उज्ज्वल, गंगा की पावन शीतल लहरों से जिसके पाप धुल जाते हैं।
श्लोक 40 (skanda.2.52.40)
तत्र मध्ये पुरे स्वर्णप्राकाराट्टालशोभिते । रत्नस्तंभैः सुघटिते सर्वाशापरिपूरके
tatra madhye pure svarṇaprākārāṭṭālaśobhite ratnastaṁbhaiḥ sughaṭite sarvāśāparipūrake
वहाँ नगरी के मध्य में, स्वर्ण-प्राकार और अट्टालिकाओं से सुशोभित, रत्नस्तंभों से सुनिर्मित, समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले [भवन] में,
श्लोक 41 (skanda.2.52.41)
तया रेमे पशुपतिः श्रियेव मधुसूदनः । सा पुरी विश्वनाथेन कदाचिन्नैव मुच्यते
tayā reme paśupatiḥ śriyeva madhusūdanaḥ sā purī viśvanāthena kadācinnaiva mucyate
पशुपति ने उसके साथ उसी प्रकार विहार किया जैसे मधुसूदन श्री के साथ करते हैं; वह नगरी विश्वनाथ द्वारा कभी भी नहीं त्यागी जाती।
श्लोक 42 (skanda.2.52.42)
अविमुक्तेति सा ख्याता नृणां मुक्तिप्रदायिनी । पुरासीन्मनुजाधीश सेविता भवभीरुभिः
avimukteti sā khyātā nṛṇāṁ muktipradāyinī purāsīnmanujādhīśa sevitā bhavabhīrubhiḥ
वह 'अविमुक्त' नाम से प्रसिद्ध है, मनुष्यों को मुक्ति देने वाली; हे मनुजाधीश, प्राचीन काल में संसार से भयभीत लोगों द्वारा वह सेवित थी।
श्लोक 43 (skanda.2.52.43)
तत्रोषिता तदा गौरी तेन भर्त्रा स्वलंकृता । मातरं पितरं चापि न सस्मार महीपते
tatroṣitā tadā gaurī tena bhartrā svalaṁkṛtā mātaraṁ pitaraṁ cāpi na sasmāra mahīpate
वहाँ उस समय गौरी उस पति द्वारा भलीभाँति अलंकृत होकर निवास करती रही; हे महीपते, उसे माता-पिता का भी स्मरण नहीं रहा।
श्लोक 44 (skanda.2.52.44)
एवं बहुयुगेऽतीते कैलासाद्रिं स जग्मिवान् । आत्मनः कोटिलिंगानि तत्र संस्थाप्य वै प्रभुः
evaṁ bahuyuge'tīte kailāsādriṁ sa jagmivān ātmanaḥ koṭiliṁgāni tatra saṁsthāpya vai prabhuḥ
इस प्रकार बहुत युग बीत जाने पर वे कैलास पर्वत को गए; अपने कोटि लिंगों को वहाँ स्थापित करके, हे प्रभु,
श्लोक 45 (skanda.2.52.45)
राजानः पालयामासुस्तां पुरीं बहुशो नृप । तत्रासीत्काशिराजाख्यः पुरा द्वापरके युगे
rājānaḥ pālayāmāsustāṁ purīṁ bahuśo nṛpa tatrāsītkāśirājākhyaḥ purā dvāparake yuge
अनेक राजाओं ने उस नगरी का बहुत बार पालन किया, हे राजन्; वहाँ प्राचीन काल में, द्वापर युग में, काशिराज नामक एक राजा हुआ।
श्लोक 46 (skanda.2.52.46)
शंभुं संतोषयामास तपसोग्रेण वै प्रभुम् । जरासन्धपुरोगाणां राज्ञां जेतारमच्युतम्
śaṁbhuṁ saṁtoṣayāmāsa tapasogreṇa vai prabhum jarāsandhapurogāṇāṁ rājñāṁ jetāramacyutam
उसने कठोर तप से शंभु प्रभु को संतुष्ट किया — जरासंध आदि राजाओं के भी विजेता, अच्युत को जीतने की इच्छा से।
श्लोक 47 (skanda.2.52.47)
संग्रामे प्रभविष्यामीत्यभिसंधाय पार्थिवः । प्रादात्तस्मै वरं सोऽपि पिनाकी पारितोषितः
saṁgrāme prabhaviṣyāmītyabhisaṁdhāya pārthivaḥ prādāttasmai varaṁ so'pi pinākī pāritoṣitaḥ
'मैं युद्ध में विजयी होऊँगा' — यह संकल्प कर उस राजा ने तप किया; और प्रसन्न होकर पिनाकधारी शिव ने उसे वर दिया।
श्लोक 48 (skanda.2.52.48)
जेतासि कंसहंतारं संग्रामे त्वमरिंदम । तवार्थे प्रमथैः सार्द्धमहं योत्स्ये वृषे स्थितः
jetāsi kaṁsahaṁtāraṁ saṁgrāme tvamariṁdama tavārthe pramathaiḥ sārddhamahaṁ yotsye vṛṣe sthitaḥ
'हे शत्रुदमन! तुम कंस के वधकर्ता को युद्ध में जीतोगे; तुम्हारे लिए मैं अपने प्रमथगणों सहित वृषभ पर स्थित होकर युद्ध करूँगा।'
श्लोक 49 (skanda.2.52.49)
शंभोरिति वरं लब्ध्वा प्रमत्तः स नराधिपः । शंखचक्रधरं संख्ये हरिमाह्वत वीर्यवान्
śaṁbhoriti varaṁ labdhvā pramattaḥ sa narādhipaḥ śaṁkhacakradharaṁ saṁkhye harimāhvata vīryavān
शंभु से यह वर पाकर वह राजा अहंकार से मत्त हो गया; उस वीर्यवान् ने शंख-चक्रधारी हरि को युद्ध के लिए ललकारा।
श्लोक 50 (skanda.2.52.50)
अन्तर्यामी स भगवाञ्ज्ञात्वा वृत्तांतमीदृशम् । चक्रं प्रस्थापयामास काशिराजस्य सूदने
antaryāmī sa bhagavāñjñātvā vṛttāṁtamīdṛśam cakraṁ prasthāpayāmāsa kāśirājasya sūdane
अंतर्यामी भगवान् ने यह वृत्तांत जानकर काशिराज के विनाश के लिए अपना चक्र भेजा।
श्लोक 51 (skanda.2.52.51)
तदुग्रदर्शनं चक्रं सहस्रादित्यवर्चसम् । काशिराजशिरश्छित्त्वा तद्बलं तां पुरीं ततः
tadugradarśanaṁ cakraṁ sahasrādityavarcasam kāśirājaśiraśchittvā tadbalaṁ tāṁ purīṁ tataḥ
वह उग्र दर्शन वाला चक्र, सहस्र सूर्यों के तेज से युक्त, काशिराज के सिर को काटकर, फिर उसकी सेना और उस नगरी को,
श्लोक 52 (skanda.2.52.52)
ददाह कुपितं राजन्विष्णोराशयवीर्यवित् । तद्दृष्ट्वा सुमहत्कर्म क्रुद्धः पशुपतिस्तदा
dadāha kupitaṁ rājanviṣṇorāśayavīryavit taddṛṣṭvā sumahatkarma kruddhaḥ paśupatistadā
क्रोध में जलाकर भस्म कर दिया, हे राजन्, विष्णु के अभिप्राय और पराक्रम को जानकर; उस महान् कर्म को देखकर पशुपति क्रुद्ध हुए,
श्लोक 53 (skanda.2.52.53)
गणैर्वृतो वृषारूढः पिनाकी तदुपाद्रवत् । ततः सुदर्शनं चक्रं दृष्ट्वा तं प्रथमं पुरः
gaṇairvṛto vṛṣārūḍhaḥ pinākī tadupādravat tataḥ sudarśanaṁ cakraṁ dṛṣṭvā taṁ prathamaṁ puraḥ
गणों से घिरे, वृषभ पर आरूढ़ पिनाकधारी उस ओर दौड़े; तब सुदर्शन चक्र को सबसे पहले सामने देखकर,
श्लोक 54 (skanda.2.52.54)
शंभुः पाशुपतास्त्रं तच्चकारोत्पातसन्निभम् । पुरा विष्णोर्वरं प्राप्तं शंभुना भक्तितोषितात्
śaṁbhuḥ pāśupatāstraṁ taccakārotpātasannibham purā viṣṇorvaraṁ prāptaṁ śaṁbhunā bhaktitoṣitāt
शंभु ने उत्पात-सदृश उस पाशुपत अस्त्र को सन्नद्ध किया; परंतु पूर्वकाल में शंभु ने विष्णु की भक्ति से संतुष्ट होकर उनसे यह वर पाया था —
श्लोक 55 (skanda.2.52.55)
बलेनाप्याययिष्यामि तवास्त्रं संस्मृतस्त्वया । मयि चेत्प्रतिकूलस्त्वं भविष्यति च निष्प्रभम्
balenāpyāyayiṣyāmi tavāstraṁ saṁsmṛtastvayā mayi cetpratikūlastvaṁ bhaviṣyati ca niṣprabham
'जब तुम इसका स्मरण करोगे, मैं अपने बल से तुम्हारे अस्त्र को बढ़ाऊँगा; परंतु यदि तुम मेरे प्रतिकूल हुए, तो यह निष्प्रभ हो जाएगा।'
श्लोक 56 (skanda.2.52.56)
घोरे पाशुपते चास्मिन्नस्त्रे च विफलीकृते । वाराणस्यां च दग्धायां भयत्रस्तो वृषध्वजः
ghore pāśupate cāsminnastre ca viphalīkṛte vārāṇasyāṁ ca dagdhāyāṁ bhayatrasto vṛṣadhvajaḥ
वह भयंकर पाशुपत अस्त्र निष्फल हो जाने पर, और वाराणसी के दग्ध हो जाने पर, भयभीत हुए वृषभध्वज ने,
श्लोक 57 (skanda.2.52.57)
तुष्टाव जगतामदिमनादिं पुरुषोत्तमम्
tuṣṭāva jagatāmadimanādiṁ puruṣottamam
जगत् के आदि, अनादि पुरुषोत्तम की स्तुति की।
श्लोक 58 (skanda.2.52.58)
महादेव उवाच । नारायण परंधाम परमात्मन्परात्पर । सच्चिदानन्दविभव निरञ्जन नमोऽस्तु ते
mahādeva uvāca nārāyaṇa paraṁdhāma paramātmanparātpara saccidānandavibhava nirañjana namo'stu te
महादेव ने कहा — हे नारायण! हे परम धाम! हे परमात्मन्! हे परात्पर! सच्चिदानंद-वैभव, निरंजन — तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 59 (skanda.2.52.59)
जगत्कारणसृष्ट्यादि कर्मकृद्गुणभेदतः । मायया निजया गुप्त स्वप्रकाश नमोऽस्तु ते
jagatkāraṇasṛṣṭyādi karmakṛdguṇabhedataḥ māyayā nijayā gupta svaprakāśa namo'stu te
जगत् के कारण, सृष्टि आदि कर्मों के करने वाले, गुणों के भेद से, अपनी ही माया से छिपे, स्वयंप्रकाश — तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 60 (skanda.2.52.60)
नांतर्बहिर्बहिश्चांतर्दूरस्थो निकटाश्रयः । गुरुर्लघुः स्थिरोऽणीयान्स्थवीयांश्च नमोऽस्तु ते
nāṁtarbahirbahiścāṁtardūrastho nikaṭāśrayaḥ gururlaghuḥ sthiro'ṇīyānsthavīyāṁśca namo'stu te
न भीतर, न बाहर, फिर भी बाहर और भीतर; दूर स्थित, फिर भी निकट का आश्रय; गुरु, लघु, स्थिर, अत्यंत सूक्ष्म और अत्यंत स्थूल — तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 61 (skanda.2.52.61)
कोटयश्चतुरास्यस्य पलार्द्धं मम चातुल । यदपांगविलासोत्थं तस्मै कालात्मने नमः
koṭayaścaturāsyasya palārddhaṁ mama cātula yadapāṁgavilāsotthaṁ tasmai kālātmane namaḥ
चतुर्मुख ब्रह्मा के करोड़ों वर्ष और मेरा आधा पल, हे अनुपम, जो तुम्हारे कटाक्ष के विलास मात्र से उत्पन्न होते हैं — उस काल-स्वरूप को नमस्कार।
श्लोक 62 (skanda.2.52.62)
एकैकरोमाकलितब्रह्माण्डगणसंवृतम् । मानातीतं वपुर्यस्य तस्मै विश्वात्मने नमः
ekaikaromākalitabrahmāṇḍagaṇasaṁvṛtam mānātītaṁ vapuryasya tasmai viśvātmane namaḥ
जिसका शरीर, माप से परे, अपने एक-एक रोम में समाहित असंख्य ब्रह्माण्डों के समूहों से व्याप्त है, उस विश्वात्मा को नमस्कार।
श्लोक 63 (skanda.2.52.63)
स्वकालपरिमाणेन वेधसः प्रलयोद्भवौ । मन्वंतरादिघटनाकलनाय नमोऽस्तु ते
svakālaparimāṇena vedhasaḥ pralayodbhavau manvaṁtarādighaṭanākalanāya namo'stu te
अपने काल के माप से जिसमें विधाता (ब्रह्मा) का प्रलय और उद्भव होता है, मन्वंतर आदि की रचना के लिए तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 64 (skanda.2.52.64)
सृष्टोऽहं तमसा नाथ त्वत्प्रभावानभिज्ञकः । तत्क्षमस्वापराधं मे त्राहि मां शरणागतम्
sṛṣṭo'haṁ tamasā nātha tvatprabhāvānabhijñakaḥ tatkṣamasvāparādhaṁ me trāhi māṁ śaraṇāgatam
हे नाथ! मैं अज्ञान से उत्पन्न हुआ, तुम्हारे प्रभाव से अनभिज्ञ; मेरे इस अपराध को क्षमा करो, शरणागत मेरी रक्षा करो।
श्लोक 65 (skanda.2.52.65)
स्तुतिमित्थं प्रकुर्वाणे तस्मिंस्त्रिपुरदाहिनि । चक्ररूपं परित्यज्य आविरासीदधोक्षजः
stutimitthaṁ prakurvāṇe tasmiṁstripuradāhini cakrarūpaṁ parityajya āvirāsīdadhokṣajaḥ
त्रिपुरदाही शिव के इस प्रकार स्तुति करने पर, अधोक्षज ने चक्र-रूप त्यागकर प्रकट होकर दर्शन दिए —
श्लोक 66 (skanda.2.52.66)
प्रसन्नवदनः श्रीमाञ्छंखचक्रगदाधरः । तार्क्ष्यपद्मासनगतो वनमालाविभूषणः
prasannavadanaḥ śrīmāñchaṁkhacakragadādharaḥ tārkṣyapadmāsanagato vanamālāvibhūṣaṇaḥ
प्रसन्न मुखवाले, श्रीसंपन्न, शंख-चक्र-गदाधारी, गरुड़-आसन पर विराजमान, वनमाला से विभूषित,
श्लोक 67 (skanda.2.52.67)
हारकुण्डलकेयूरमुकुटादिभिरुज्ज्वलः । वामोत्संगगतां लक्ष्मीं सत्यां दक्षिणपार्श्वगाम्
hārakuṇḍalakeyūramukuṭādibhirujjvalaḥ vāmotsaṁgagatāṁ lakṣmīṁ satyāṁ dakṣiṇapārśvagām
हार, कुंडल, केयूर, मुकुट आदि से उज्ज्वल, अपने वाम अंक में साक्षात् लक्ष्मी को, तथा दक्षिण पार्श्व में,
श्लोक 68 (skanda.2.52.68)
बिभ्राणः कृष्णजीमूतकांतदेहं कृपाम्बुधिः । क्रोधाविष्ट इवोवाच बिभ्यतं गिरिजापतिम्
bibhrāṇaḥ kṛṣṇajīmūtakāṁtadehaṁ kṛpāmbudhiḥ krodhāviṣṭa ivovāca bibhyataṁ girijāpatim
श्याम मेघ के समान सुंदर देह धारण किए, करुणा के सागर, मानो क्रोधाविष्ट होकर, भयभीत गिरिजापति से बोले —
श्लोक 69 (skanda.2.52.69)
श्रीभगवानुवाच । कालेनैतावता शंभो दुर्बुद्धिः कथमागता । हेतोर्नृपतिकीटस्य मया योद्धुमुपस्थितः
śrībhagavānuvāca kālenaitāvatā śaṁbho durbuddhiḥ kathamāgatā hetornṛpatikīṭasya mayā yoddhumupasthitaḥ
भगवान् ने कहा — 'हे शंभो! इतने काल के बाद यह दुर्बुद्धि कैसे आई कि एक तुच्छ राजा-कीट के लिए तुम मुझसे युद्ध करने आ खड़े हुए?'
श्लोक 70 (skanda.2.52.70)
कति वा मत्प्रभावास्ते नो ज्ञाता धूर्जटे त्वया । सत्यं पाशुपतं तेऽस्त्रं दुर्जयं ससुरासुरैः
kati vā matprabhāvāste no jñātā dhūrjaṭe tvayā satyaṁ pāśupataṁ te'straṁ durjayaṁ sasurāsuraiḥ
'हे धूर्जटे! मेरी कितनी शक्तियाँ तुमने नहीं जानी हैं? सच है कि तुम्हारा पाशुपत अस्त्र देवों और असुरों दोनों के लिए दुर्जय है —
श्लोक 71 (skanda.2.52.71)
मत्क्रोधरूपं तच्चक्रं त्वामपि क्षमते न यत् । मामवज्ञाय जगति भ्रमति त्वामृते हि कः
matkrodharūpaṁ taccakraṁ tvāmapi kṣamate na yat māmavajñāya jagati bhramati tvāmṛte hi kaḥ
'— परंतु वह मेरे क्रोध का ही रूप, वह चक्र, तुम्हें भी नहीं छोड़ता। मेरी अवज्ञा करके संसार में तुम्हारे सिवा कौन विचरण करता है?'
श्लोक 72 (skanda.2.52.72)
तपोभिर्बहुभिः पूर्वं मच्छरीरतयोर्जितः । सांप्रतं चेच्चिरं रंतुं गौर्या सार्द्धमिहेच्छसि
tapobhirbahubhiḥ pūrvaṁ maccharīratayorjitaḥ sāṁprataṁ cecciraṁ raṁtuṁ gauryā sārddhamihecchasi
'पहले अनेक तपों से मेरे ही शरीर (प्रसाद) द्वारा तुम बलशाली बनाए गए थे; अब यदि तुम गौरी के साथ यहाँ चिरकाल विहार करना चाहते हो,
श्लोक 73 (skanda.2.52.73)
पुरीं वाराणसीं चेमां यदीच्छसि चिरस्थिताम् । मन्नाम्ना भुवि विख्यातं क्षेत्रं श्रीपुरुषोत्तमम्
purīṁ vārāṇasīṁ cemāṁ yadīcchasi cirasthitām mannāmnā bhuvi vikhyātaṁ kṣetraṁ śrīpuruṣottamam
'और यदि यह वाराणसी नगरी चिरस्थायी रहे, यह चाहते हो, तो पृथ्वी पर मेरे ही नाम से विख्यात क्षेत्र श्रीपुरुषोत्तम को जाओ,
श्लोक 74 (skanda.2.52.74)
दक्षिणस्योदधेस्तीरे नीलाचलविभूषितम् । दशयोजनविस्तीर्णं यावद्विरजमण्डलम्
dakṣiṇasyodadhestīre nīlācalavibhūṣitam daśayojanavistīrṇaṁ yāvadvirajamaṇḍalam
'दक्षिण समुद्र के तट पर, नीलाचल से सुशोभित, दस योजन विस्तृत, विरजामंडल तक फैला हुआ,
श्लोक 75 (skanda.2.52.75)
क्रमशः पावनं क्षेत्रं यावच्चित्रोत्पला नदी । ततः प्रभृति यो देशो यावत्स्याद्दक्षिणार्णवः
kramaśaḥ pāvanaṁ kṣetraṁ yāvaccitrotpalā nadī tataḥ prabhṛti yo deśo yāvatsyāddakṣiṇārṇavaḥ
'क्रमशः पावन वह क्षेत्र चित्रोत्पला नदी तक, और उससे आगे जो देश दक्षिण समुद्र तक फैला है,
श्लोक 76 (skanda.2.52.76)
पदात्पदाच्छ्रेष्ठतमो नीलाद्रिरपवर्गदः । चतुर्देहस्थितोऽहं वै यत्र नीलमणीमयः
padātpadācchreṣṭhatamo nīlādrirapavargadaḥ caturdehasthito'haṁ vai yatra nīlamaṇīmayaḥ
'प्रत्येक पग पर उत्तरोत्तर श्रेष्ठ, मोक्षदायी नीलाचल, जहाँ मैं नीलमणि-मय चार रूपों में स्थित हूँ,
श्लोक 77 (skanda.2.52.77)
तस्योत्तरस्यां विख्यातं वनमेकाम्रकाह्वयम् । पार्वत्या तत्र निवस निर्भयस्त्रिपुरांतक
tasyottarasyāṁ vikhyātaṁ vanamekāmrakāhvayam pārvatyā tatra nivasa nirbhayastripurāṁtaka
'उसके उत्तर में विख्यात एकाम्रक नामक वन है — हे त्रिपुरांतक, वहाँ पार्वती के साथ निर्भय होकर निवास करो।
श्लोक 78 (skanda.2.52.78)
सृजता सर्वलोकानां मन्निदेशात्स्वयंभुवा । तत्रापि कोटिलिंगानां राजा त्वमभिषेक्ष्यसे
sṛjatā sarvalokānāṁ mannideśātsvayaṁbhuvā tatrāpi koṭiliṁgānāṁ rājā tvamabhiṣekṣyase
'मेरे आदेश से स्वयंभू ब्रह्मा, जो समस्त लोकों की रचना करते हैं, [वहाँ भी व्यवस्था करेंगे]; वहाँ भी तुम कोटिलिंगों के राजा के रूप में अभिषिक्त होगे।
श्लोक 79 (skanda.2.52.79)
सर्वतीर्थमयं चेदं तीर्थं यन्मणिकर्णिकम् । इहाहंकारमुत्सृज्य व्रज त्वं सपरिच्छदः
sarvatīrthamayaṁ cedaṁ tīrthaṁ yanmaṇikarṇikam ihāhaṁkāramutsṛjya vraja tvaṁ saparicchadaḥ
'और यह मणिकर्णिका तीर्थ, जो सभी तीर्थों का समावेश है — यहाँ अहंकार त्यागकर, अपने परिवार सहित, प्रस्थान करो।'
श्लोक 80 (skanda.2.52.80)
नारद उवाच । इत्युक्तो वासुदेवेन त्र्यंबको नतकन्धरः । कृतांजलिपुटो भूत्वा प्रोवाच मधुसूदनम्
nārada uvāca ityukto vāsudevena tryaṁbako natakandharaḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā provāca madhusūdanam
वासुदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर त्रिनेत्र शिव ने गर्दन झुकाकर, हाथ जोड़कर मधुसूदन से कहा —
श्लोक 81 (skanda.2.52.81)
महादेव उवाच । देवदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिहर प्रभो । त्वदाज्ञापालनं श्रेयः कारणं मे जगत्पते
mahādeva uvāca devadeva jagannātha praṇatārtihara prabho tvadājñāpālanaṁ śreyaḥ kāraṇaṁ me jagatpate
महादेव ने कहा — 'हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाले प्रभो! तुम्हारी आज्ञा का पालन ही, हे जगत्पते, मेरे कल्याण का कारण है।'
श्लोक 82 (skanda.2.52.82)
यत्तु मूढतया देव अवलेपः कृतो मया । तवैवानुग्रहस्तत्र प्रभो चांचल्यकारणम्
yattu mūḍhatayā deva avalepaḥ kṛto mayā tavaivānugrahastatra prabho cāṁcalyakāraṇam
'जो अहंकार मैंने मूढ़तावश किया, हे देव, उसमें भी, हे प्रभो, तुम्हारी ही कृपा चंचलता का कारण थी।'
श्लोक 83 (skanda.2.52.83)
यदादिशसि देवेश प्रयाणं पुरुषोत्तमम् । तन्मूर्ध्नि कृत्वा यास्यामि क्षेत्रं मुक्तिप्रदं शिवम्
yadādiśasi deveśa prayāṇaṁ puruṣottamam tanmūrdhni kṛtvā yāsyāmi kṣetraṁ muktipradaṁ śivam
'हे देवेश! तुम जो पुरुषोत्तम को जाने की आज्ञा देते हो, उसे मस्तक पर धारण कर मैं उस मुक्तिदायी, मंगलमय क्षेत्र में जाऊँगा।'
श्लोक 84 (skanda.2.52.84)
अभिसंधिं कुरुष्वाद्य ममानुग्रहकारणम् । पुरुषोत्तमं मम क्षेत्रं त्वमेव परिपालय
abhisaṁdhiṁ kuruṣvādya mamānugrahakāraṇam puruṣottamaṁ mama kṣetraṁ tvameva paripālaya
'आज मेरी कृपा के लिए यह प्रतिज्ञा करो — पुरुषोत्तम, मेरा यह क्षेत्र, तुम स्वयं इसका पालन करो,
श्लोक 85 (skanda.2.52.85)
यथा पुनर्नेदृशं तद्विनाशमुपयास्यति । इत्थमेतत्पुरा क्षेत्रं महादेवेन निर्मितम्
yathā punarnedṛśaṁ tadvināśamupayāsyati itthametatpurā kṣetraṁ mahādevena nirmitam
'जिससे वह पुनः इस प्रकार विनाश को प्राप्त न हो।' इस प्रकार, प्राचीन काल में यह क्षेत्र महादेव द्वारा निर्मित हुआ था।
श्लोक 86 (skanda.2.52.86)
बलश्रीसहितं देवमर्चयन्पुरुषोत्तमम् । अत्र साक्षादुमाकांतः स्थापितः परमेष्ठिना
balaśrīsahitaṁ devamarcayanpuruṣottamam atra sākṣādumākāṁtaḥ sthāpitaḥ parameṣṭhinā
बल और श्री सहित भगवान् पुरुषोत्तम की पूजा करते हुए, यहाँ साक्षात् उमापति परमेष्ठी ब्रह्मा द्वारा स्थापित किए गए।
श्लोक 87 (skanda.2.52.87)
वयं तत्र व्रजिष्यामो द्रक्ष्यामः पुरनाशनम् । सुदृढांतस्तमःस्तोमभास्वंतं गिरिजापतिम्
vayaṁ tatra vrajiṣyāmo drakṣyāmaḥ puranāśanam sudṛḍhāṁtastamaḥstomabhāsvaṁtaṁ girijāpatim
'हम वहाँ जाएँगे, त्रिपुर-नगर के नाशक, गिरिजापति को देखेंगे, जो अंतर के दृढ़ अंधकार-समूह को नष्ट करने वाले तेजस्वी हैं।'
श्लोक 88 (skanda.2.52.88)
यदेतच्छांभवं क्षेत्रं तमसो नाशनं परम् । रजःप्रक्षालनं श्रेयः ख्यातं विरजमण्डलम्
yadetacchāṁbhavaṁ kṣetraṁ tamaso nāśanaṁ param rajaḥprakṣālanaṁ śreyaḥ khyātaṁ virajamaṇḍalam
यह शांभव क्षेत्र अंधकार (तम) का सर्वोत्तम नाशक है; रज के प्रक्षालन में कल्याणकारी, विरजामंडल के नाम से विख्यात है।
श्लोक 89 (skanda.2.52.89)
सत्त्वोद्रिक्ततया ख्यातं मुक्तिदं पुरुषोत्तमम् । यावत्यन्यानि क्षेत्राणि मुक्तिदानि श्रुतानि ते
sattvodriktatayā khyātaṁ muktidaṁ puruṣottamam yāvatyanyāni kṣetrāṇi muktidāni śrutāni te
सत्त्व की अधिकता से विख्यात, मुक्तिदायी पुरुषोत्तम — अन्य जितने भी क्षेत्र मुक्तिदायी सुने गए हैं,
श्लोक 90 (skanda.2.52.90)
तानि सर्वाणि राजेंद्र ददते मुक्तिमत्र वै । एतत्क्षेत्रं महाराज दुष्कृताविलचेतसाम्
tāni sarvāṇi rājeṁdra dadate muktimatra vai etatkṣetraṁ mahārāja duṣkṛtāvilacetasām
हे राजेंद्र, वे सब यहाँ मुक्ति प्रदान करते हैं। परंतु यह क्षेत्र, हे महाराज, दुष्कर्मों से मलिन चित्त वालों के लिए,
श्लोक 91 (skanda.2.52.91)
न विश्वासपथं याति रहस्यं चक्रपाणिनः
na viśvāsapathaṁ yāti rahasyaṁ cakrapāṇinaḥ
विश्वास के मार्ग में नहीं आता — यह चक्रपाणि का रहस्य है।
श्लोक 92 (skanda.2.52.92)
जैमिनिरुवाच । नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रहृष्टहृदयो नृपः । उवाच मुनिशार्दूलं विस्मयोत्फुल्ललोचनः । साधु मे कथितं ब्रह्मन्क्षेत्रं परमपावनम्
jaiminiruvāca nāradasya vacaḥ śrutvā prahṛṣṭahṛdayo nṛpaḥ uvāca muniśārdūlaṁ vismayotphullalocanaḥ sādhu me kathitaṁ brahmankṣetraṁ paramapāvanam
जैमिनि ने कहा — नारद के वचन सुनकर, हृदय में अत्यंत प्रसन्न, विस्मय से खिले नेत्रों वाले राजा ने मुनिश्रेष्ठ से कहा — 'हे ब्रह्मन्, तुमने मुझे यह परम पावन क्षेत्र भलीभाँति बताया है।'
श्लोक 93 (skanda.2.52.93)
यत्रोमापतिरास्तेऽसौ पालकः पुरुषोत्तमः । अवश्यं तत्र गच्छामः पन्था यद्यपि वक्रभूः । उद्दिष्टेष्टपरिप्राप्तौ यदिदं कारणं महत्
yatromāpatirāste'sau pālakaḥ puruṣottamaḥ avaśyaṁ tatra gacchāmaḥ panthā yadyapi vakrabhūḥ uddiṣṭeṣṭapariprāptau yadidaṁ kāraṇaṁ mahat
'जहाँ उमापति स्वयं पुरुषोत्तम के आश्रय में रक्षक बनकर विराजते हैं — वहाँ हम अवश्य जाएँगे, चाहे मार्ग टेढ़ा ही क्यों न हो; क्योंकि यही इस इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति का महान् कारण बताया गया है।'
श्लोक 94 (skanda.2.52.94)
जैमिनिरुवाच । ततस्तौ मुनिभूपालौ मध्याह्नसमये द्विजाः । प्रापतुः सबलौ क्षेत्रमेकाम्रवनसंज्ञकम्
jaiminiruvāca tatastau munibhūpālau madhyāhnasamaye dvijāḥ prāpatuḥ sabalau kṣetramekāmravanasaṁjñakam
जैमिनि ने कहा — हे द्विजो! तब वे दोनों, मुनि और राजा, सेना सहित मध्याह्न के समय एकाम्रवन नामक क्षेत्र में पहुँचे।
श्लोक 95 (skanda.2.52.95)
बिंदुतीर्थे नृपः स्नात्वा तीरस्थं पुरुषोत्तमम् । संपूज्य विधिवद्यातः कोटीश्वरमहालयम्
biṁdutīrthe nṛpaḥ snātvā tīrasthaṁ puruṣottamam saṁpūjya vidhivadyātaḥ koṭīśvaramahālayam
राजा ने बिंदुतीर्थ में स्नान कर तट पर स्थित पुरुषोत्तम का सम्यक् पूजन किया, फिर विधिपूर्वक कोटीश्वर के महान् मंदिर को गए।
श्लोक 96 (skanda.2.52.96)
तद्वारि सम्यगाचांतस्तत्प्रीत्यै सुबहूनि सः । गजाश्वधनरत्नानि वस्त्रालंकरणानि च
tadvāri samyagācāṁtastatprītyai subahūni saḥ gajāśvadhanaratnāni vastrālaṁkaraṇāni ca
उसका जल भलीभाँति पीकर, उसकी प्रसन्नता के लिए उसने अनेक हाथी, घोड़े, धन, रत्न, वस्त्र और आभूषण,
श्लोक 97 (skanda.2.52.97)
द्विजेभ्यः प्रददौ राजा सात्त्विकं धर्ममास्थितः । लिंगं त्रिभुवनेशं तं महास्नानेन पूजयन्
dvijebhyaḥ pradadau rājā sāttvikaṁ dharmamāsthitaḥ liṁgaṁ tribhuvaneśaṁ taṁ mahāsnānena pūjayan
द्विजों को दान दिए, सात्त्विक धर्म में स्थित राजा ने; त्रिभुवनेश उस लिंग का महास्नान से पूजन करते हुए,
श्लोक 98 (skanda.2.52.98)
अतुलां प्रीतिमालेभे विष्णोरद्वैतदर्शनः । स्तुत्वा प्रणम्य भक्त्यासौ वीणया चोपगाय्य च
atulāṁ prītimālebhe viṣṇoradvaitadarśanaḥ stutvā praṇamya bhaktyāsau vīṇayā copagāyya ca
विष्णु के साथ उनकी अभिन्नता का दर्शन कर अतुल प्रीति प्राप्त की; भक्तिपूर्वक स्तुति और प्रणाम कर, वीणा बजाकर गाकर,
श्लोक 99 (skanda.2.52.99)
कृतांजलिपुटो देवप्रसादनकृतोद्यमः । अनन्यमनसा तस्थौ चिंतयन्वृषभध्वजम्
kṛtāṁjalipuṭo devaprasādanakṛtodyamaḥ ananyamanasā tasthau ciṁtayanvṛṣabhadhvajam
हाथ जोड़कर, देव को प्रसन्न करने के प्रयास में तत्पर, अनन्य मन से वृषभध्वज का ध्यान करते हुए वे खड़े रहे।
श्लोक 100 (skanda.2.52.100)
ततः प्रसन्नो भगवांस्त्र्यंबकः परमेश्वरः । साक्षान्नृपमुवाचेदं स्पष्टाक्षरपदं द्विजाः
tataḥ prasanno bhagavāṁstryaṁbakaḥ parameśvaraḥ sākṣānnṛpamuvācedaṁ spaṣṭākṣarapadaṁ dvijāḥ
तब प्रसन्न होकर त्र्यंबक परमेश्वर ने, हे द्विजो, स्पष्ट शब्दों में साक्षात् राजा से यह कहा —
श्लोक 101 (skanda.2.52.101)
कोटिलिंगेश उवाच । इन्द्रद्युम्न महाराज वैष्णवस्त्वादृशो भुवि । दुर्लभः खलु ते वांछा चिरात्सम्यग्भविष्यति
koṭiliṁgeśa uvāca indradyumna mahārāja vaiṣṇavastvādṛśo bhuvi durlabhaḥ khalu te vāṁchā cirātsamyagbhaviṣyati
कोटिलिंगेश ने कहा — 'हे महाराज इंद्रद्युम्न! तुम्हारे जैसा वैष्णव पृथ्वी पर दुर्लभ है; तुम्हारी इच्छा चिरकाल बाद भलीभाँति पूर्ण होगी।'
श्लोक 102 (skanda.2.52.102)
इत्युक्त्वांतर्दधे शंभुः पश्यतस्तु महीक्षितः । नारदं पुनराहेदं यदादिष्टं स्वयंभुवा
ityuktvāṁtardadhe śaṁbhuḥ paśyatastu mahīkṣitaḥ nāradaṁ punarāhedaṁ yadādiṣṭaṁ svayaṁbhuvā
यह कहकर, राजा के देखते-देखते ही शंभु अंतर्धान हो गए; फिर उन्होंने नारद से पुनः वही कहा जो स्वयंभू ने आदेशित किया था —
श्लोक 103 (skanda.2.52.103)
तत्कल्पय महाभाग वाजिमेधपुरःसरम् । विष्णोः कलेवरे तस्मिन्क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे
tatkalpaya mahābhāga vājimedhapuraḥsaram viṣṇoḥ kalevare tasminkṣetre śrīpuruṣottame
'हे महाभाग! उसकी व्यवस्था करो — पुरुषोत्तम नामक उस श्रीक्षेत्र में, जो विष्णु का साक्षात् शरीर है, अश्वमेध यज्ञपूर्वक,
श्लोक 104 (skanda.2.52.104)
अंतर्वेदी महापुण्या विष्णोर्हृदयसंनिभा । तस्याः संरक्षणायाहं स्थापितो विष्णुनाष्टधा
aṁtarvedī mahāpuṇyā viṣṇorhṛdayasaṁnibhā tasyāḥ saṁrakṣaṇāyāhaṁ sthāpito viṣṇunāṣṭadhā
'अंतर्वेदी, जो अत्यंत पुण्यमय है, विष्णु के हृदय के समान है; उसकी रक्षा के लिए मैं विष्णु द्वारा आठ रूपों में स्थापित हुआ हूँ।'
श्लोक 105 (skanda.2.52.105)
शंखाकृतेरग्रभागे नीलकण्ठोऽहमास्थितः । दुर्गया सह विप्रेंद्र तत्रेमं भूपतिं नय
śaṁkhākṛteragrabhāge nīlakaṇṭho'hamāsthitaḥ durgayā saha vipreṁdra tatremaṁ bhūpatiṁ naya
'शंखाकार के अग्रभाग में मैं नीलकंठ के रूप में स्थित हूँ; हे विप्रेंद्र, दुर्गा के साथ इस राजा को वहाँ ले चलो।'
श्लोक 106 (skanda.2.52.106)
अन्तर्हितः खल्विदानीं नीलरत्नतनुर्हरिः । तत्र श्रीनरसिंहस्य क्षेत्रं कुरु मदाज्ञया
antarhitaḥ khalvidānīṁ nīlaratnatanurhariḥ tatra śrīnarasiṁhasya kṣetraṁ kuru madājñayā
'नीलरत्न-शरीर हरि अभी अंतर्हित हैं; वहाँ मेरी आज्ञा से श्रीनरसिंह का क्षेत्र स्थापित करो।'
श्लोक 107 (skanda.2.52.107)
तत्र नः सन्निधौ वाजिमेधेन यजतामयम् । सहस्रेण नृपश्रेष्ठ तदन्ते तरुमद्भुतम्
tatra naḥ sannidhau vājimedhena yajatāmayam sahasreṇa nṛpaśreṣṭha tadante tarumadbhutam
'हे नृपश्रेष्ठ, यह राजा हमारी उपस्थिति में सहस्र अश्वमेध यज्ञ करे; उसके अंत में उस अद्भुत वृक्ष को,
श्लोक 108 (skanda.2.52.108)
दर्शयैनं द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मरूपमकल्मषम् । चतस्रः प्रतिमास्तेन विश्वकर्मा घटिष्यति
darśayainaṁ dvijaśreṣṭha brahmarūpamakalmaṣam catasraḥ pratimāstena viśvakarmā ghaṭiṣyati
'हे द्विजश्रेष्ठ, इसे निष्कलंक ब्रह्मरूप दिखाओ; उससे विश्वकर्मा चार प्रतिमाएँ गढ़ेंगे।'
श्लोक 109 (skanda.2.52.109)
तासां प्रतिष्ठितौ ब्रह्मा स्वयमेवागमिष्यति । यथायं क्षीणपापः स्याद्वाजिमेधैर्यजन्हरिम्
tāsāṁ pratiṣṭhitau brahmā svayamevāgamiṣyati yathāyaṁ kṣīṇapāpaḥ syādvājimedhairyajanharim
'उनकी प्रतिष्ठा के लिए स्वयं ब्रह्मा वहाँ आएँगे, जिससे यह राजा अश्वमेध यज्ञों द्वारा हरि की पूजा कर पापरहित हो जाए।'
श्लोक 110 (skanda.2.52.110)
तिष्ठत्वब्दसहस्रं वै तदंते लोकयिष्यति । समस्तजगदाधारं सर्वकल्मषनाशनम्
tiṣṭhatvabdasahasraṁ vai tadaṁte lokayiṣyati samastajagadādhāraṁ sarvakalmaṣanāśanam
'वह हज़ार वर्ष प्रतीक्षा करे; उसके अंत में वह समस्त जगत् के आधार, समस्त पापों के नाशक को देखेगा —
श्लोक 111 (skanda.2.52.111)
दारवीं तनुमास्थाय दर्शनादपवर्गदम् । न तस्य चरितं वेत्ति ब्रह्माऽहं त्वं च नारद
dāravīṁ tanumāsthāya darśanādapavargadam na tasya caritaṁ vetti brahmā'haṁ tvaṁ ca nārada
'— जो काष्ठ का शरीर धारण कर दर्शनमात्र से मुक्ति देते हैं। न ब्रह्मा, न मैं, न तुम, हे नारद, उनकी लीला को जानते हैं।'
श्लोक 112 (skanda.2.52.112)
आज्ञानुष्ठानतो भक्त्या प्रसीदति स केवलम् । नारदोऽपि महादेवं प्रणिपत्य जगद्गुरुम् । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा यदादिष्टं त्वया विभो
ājñānuṣṭhānato bhaktyā prasīdati sa kevalam nārado'pi mahādevaṁ praṇipatya jagadgurum uvāca prāṁjalirbhūtvā yadādiṣṭaṁ tvayā vibho
'केवल आज्ञा के भक्तिपूर्वक पालन से ही वे प्रसन्न होते हैं।' नारद ने भी जगद्गुरु महादेव को प्रणाम कर, हाथ जोड़कर कहा — 'जो आपने आज्ञा दी है, हे विभो —
श्लोक 113 (skanda.2.52.113)
पितामहोऽपि मामित्थं निर्दिदेशास्य कल्पनम् । पितामहश्च त्वं नाथ नो भिन्नौ परमात्मनः
pitāmaho'pi māmitthaṁ nirdideśāsya kalpanam pitāmahaśca tvaṁ nātha no bhinnau paramātmanaḥ
'— पितामह ने भी मुझे इसी योजना का निर्देश दिया है। और तुम ही पितामह हो, हे नाथ — तुम दोनों परमात्मा से भिन्न नहीं हो।'
श्लोक 114 (skanda.2.52.114)
नृपतेरस्य भाग्यर्द्धिरीदृशी यत्कृते विभो । अगोचरोऽसि मनसस्त्र्याणामप्यनुग्रहः
nṛpaterasya bhāgyarddhirīdṛśī yatkṛte vibho agocaro'si manasastryāṇāmapyanugrahaḥ
'इस राजा का ऐसा सौभाग्य है कि जिसके लिए, हे विभो, तुम्हारी कृपा — जो त्रिलोक के मन के लिए भी अगोचर है —
श्लोक 115 (skanda.2.52.115)
यत्प्रसंगेन तरणं भवाब्धेरपि दुष्कृताम् । अचिंत्यमहिमा ह्येष भगवान्भूतभावनः
yatprasaṁgena taraṇaṁ bhavābdherapi duṣkṛtām aciṁtyamahimā hyeṣa bhagavānbhūtabhāvanaḥ
'— जिसके संपर्क से दुष्कर्मी भी भवसागर को पार कर जाते हैं; अचिंत्य है इस भगवान् की महिमा, जो समस्त प्राणियों के उद्गम हैं।'
श्लोक 116 (skanda.2.52.116)
न बुद्धिगोचरे भक्तिर्यावत्या प्रीयते ह्यसौ । चिरं यतंतस्तिष्ठंति वेदानुवचनादिभिः । क्षुद्रोऽपि लभते मुक्तिमनायासेन कर्मणा
na buddhigocare bhaktiryāvatyā prīyate hyasau ciraṁ yataṁtastiṣṭhaṁti vedānuvacanādibhiḥ kṣudro'pi labhate muktimanāyāsena karmaṇā
'बुद्धि की पहुँच में नहीं है वह भक्ति, जिससे वे प्रसन्न होते हैं; वेदाध्ययन आदि से चिरकाल प्रयत्न करते रहते हैं, तथापि नगण्य व्यक्ति भी बिना प्रयास के, केवल भक्ति-कर्म से मुक्ति पा लेता है।'
श्लोक 117 (skanda.2.52.117)
गव्योपजीव्या गोप्यस्तु वनचारगृहोषिताः । अरण्यजीवनाः प्रापुर्मुक्तिं कामोपभोगतः
gavyopajīvyā gopyastu vanacāragṛhoṣitāḥ araṇyajīvanāḥ prāpurmuktiṁ kāmopabhogataḥ
'गौओं पर जीवन-निर्वाह करने वाली, वन में विचरने वाली, कुटियों में रहने वाली गोपियों ने, अरण्य में जीवन बिताते हुए, केवल कामना के भोग से ही मुक्ति पा ली।'
श्लोक 118 (skanda.2.52.118)
द्रुहन्निरंतरं प्राप शिशुपालः सभांतरे । व्याधोः हृदयमाविध्य गतिं प्राप सुदुर्लभाम्
druhanniraṁtaraṁ prāpa śiśupālaḥ sabhāṁtare vyādhoḥ hṛdayamāvidhya gatiṁ prāpa sudurlabhām
'निरंतर द्वेष करने वाला शिशुपाल भी सभा के मध्य में उसे पा गया; और व्याध ने हृदय बींधकर भी अत्यंत दुर्लभ गति पाई।'
श्लोक 119 (skanda.2.52.119)
वस्त्राकर्षं गृहं नीत्वा कुब्जैनं बुभुजे पुरा । यं ध्यानलयमापन्ना लभंते न सुरस्त्रियः
vastrākarṣaṁ gṛhaṁ nītvā kubjainaṁ bubhuje purā yaṁ dhyānalayamāpannā labhaṁte na surastriyaḥ
'वस्त्र खींचकर घर ले जाकर कुब्जा ने पूर्वकाल में उनका भोग किया — जिन्हें ध्यान में लीन होकर भी देवांगनाएँ नहीं पातीं।'
श्लोक 120 (skanda.2.52.120)
चंडालाय ददौ मुक्तिं दूरस्थायापि नो पुनः । आसन्नायातिभक्ताय श्रोत्रियाय पुरा विभुः
caṁḍālāya dadau muktiṁ dūrasthāyāpi no punaḥ āsannāyātibhaktāya śrotriyāya purā vibhuḥ
'भगवान् ने पूर्वकाल में दूर बसे चांडाल को मुक्ति दी, किंतु समीप रहने वाले, अत्यंत भक्त, वेदज्ञ ब्राह्मण को नहीं दी —
श्लोक 121 (skanda.2.52.121)
मायाभिर्वंचयेत्त्वां हि पितामहमपि प्रभुः । तिष्ठंति दुःखबहुलास्तपोभिर्देहबंधनाः
māyābhirvaṁcayettvāṁ hi pitāmahamapi prabhuḥ tiṣṭhaṁti duḥkhabahulāstapobhirdehabaṁdhanāḥ
'— अपनी माया से वे तुम्हें भी, हे पितामह, भ्रमित कर देते हैं; अनेक दुःखों से भरे तपस्वी तप द्वारा शरीर के बंधन में बंधे रहते हैं —
श्लोक 122 (skanda.2.52.122)
गौतमाद्या ब्रह्मचर्यनिष्ठाः कल्पान्तवासिनः । ईदृक्तादृक्परिच्छेदगोचरं नास्य चेष्टितम्
gautamādyā brahmacaryaniṣṭhāḥ kalpāntavāsinaḥ īdṛktādṛkparicchedagocaraṁ nāsya ceṣṭitam
'— गौतम आदि ब्रह्मचर्य में निष्ठ, कल्पांत तक निवास करने वाले [भी बंधे ही रहते हैं]। उनकी चेष्टा किसी भी ऐसी-वैसी परिभाषा के दायरे में नहीं आती।'
श्लोक 123 (skanda.2.52.123)
व्यवसायेन बहुना कालेन महता तथा । निर्णेतुं शक्यते नास्य चरितं वा सुमेधसः
vyavasāyena bahunā kālena mahatā tathā nirṇetuṁ śakyate nāsya caritaṁ vā sumedhasaḥ
'महान् प्रयत्न से, अथवा दीर्घ काल से भी, बुद्धिमानों के लिए भी उनका चरित्र निश्चित करना संभव नहीं है।'
श्लोक 124 (skanda.2.52.124)
उपाया बहवः संति ये शास्त्रपरिनिष्ठिताः । विदुषां मोचनायेह बहुशस्तैर्यजंति वै
upāyā bahavaḥ saṁti ye śāstrapariniṣṭhitāḥ viduṣāṁ mocanāyeha bahuśastairyajaṁti vai
'शास्त्रों में प्रतिष्ठित अनेक उपाय हैं, जिनसे विद्वान लोग यहाँ मुक्ति के लिए बार-बार यज्ञ करते हैं।'
श्लोक 125 (skanda.2.52.125)
सर्वेषामुत्तमोपायो वसतिः पुरुषोत्तमे । याऽवश्यं स्वामिसायुज्यं प्रापयेत्सुसखा यथा
sarveṣāmuttamopāyo vasatiḥ puruṣottame yā'vaśyaṁ svāmisāyujyaṁ prāpayetsusakhā yathā
'परंतु उन सबमें उत्तम उपाय पुरुषोत्तम में निवास है, जो सुहृद की भाँति निश्चय ही स्वामी के साथ सायुज्य प्राप्त कराता है।'
श्लोक 126 (skanda.2.52.126)
तदेनं मायिनं प्राप्तुमुपायो नांतरीयकः । स्वयं निधाय हरिणा यत्र वासः सुरक्षितः
tadenaṁ māyinaṁ prāptumupāyo nāṁtarīyakaḥ svayaṁ nidhāya hariṇā yatra vāsaḥ surakṣitaḥ
'इसलिए उस मायावी को पाने का, हरि द्वारा स्वयं सुरक्षित निवास-स्थान से बढ़कर कोई अनिवार्य उपाय नहीं है।'
श्लोक 127 (skanda.2.52.127)
इंद्रद्युम्नप्रसंगेन जायते सार्वलौकिकः । तदाज्ञापय देवेश गृहीत्वैनं बलान्वितम्
iṁdradyumnaprasaṁgena jāyate sārvalaukikaḥ tadājñāpaya deveśa gṛhītvainaṁ balānvitam
'इंद्रद्युम्न के संसर्ग से यह [अवसर] संपूर्ण जगत् के लिए सुलभ हो जाता है; इसलिए हे देवेश, आज्ञा दो — इसे सेना सहित लेकर,
श्लोक 128 (skanda.2.52.128)
उपत्यकायां संस्थाप्य दीक्षयित्वा महाक्रतौ । आगमिष्यामि पादाब्जसमीपं ते वृषध्वज
upatyakāyāṁ saṁsthāpya dīkṣayitvā mahākratau āgamiṣyāmi pādābjasamīpaṁ te vṛṣadhvaja
'तराई में स्थापित कर, महायज्ञ के लिए दीक्षित करके, मैं तुम्हारे चरणकमलों के समीप आऊँगा, हे वृषभध्वज।'
श्लोक 129 (skanda.2.52.129)
जैमिनिरुवाच । तथेत्युक्त्वा महादेवः क्षणादंतर्दधे मुनेः । सोऽपि राज्ञो रथे तिष्ठन्प्रययौ क्षेत्रमुत्तमम्
jaiminiruvāca tathetyuktvā mahādevaḥ kṣaṇādaṁtardadhe muneḥ so'pi rājño rathe tiṣṭhanprayayau kṣetramuttamam
जैमिनि ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर महादेव मुनि की दृष्टि से क्षणभर में अंतर्धान हो गए; वे भी राजा के रथ में बैठकर उस उत्तम क्षेत्र की ओर चले।
श्लोक 130 (skanda.2.52.130)
द्वितीयेऽह्नि कपोतेशस्थलीमासेदिवान्नृपः । दैर्घ्यायामसमायुक्तां जलाशयद्रुमाकुलाम्
dvitīye'hni kapoteśasthalīmāsedivānnṛpaḥ dairghyāyāmasamāyuktāṁ jalāśayadrumākulām
दूसरे दिन राजा कपोतेश-स्थली पहुँचा, जो लंबाई-चौड़ाई से युक्त, जलाशयों और वृक्षों से भरी हुई थी।
श्लोक 131 (skanda.2.52.131)
बिल्वेशः पूर्वसीमायां समुद्रतटमास्थितः । सेनानिवेश योग्यां तां मत्रिणा संनिवेदिताम्
bilveśaḥ pūrvasīmāyāṁ samudrataṭamāsthitaḥ senāniveśa yogyāṁ tāṁ matriṇā saṁniveditām
बिल्वेश पूर्वी सीमा पर, समुद्र-तट पर स्थित है; सेना के पड़ाव के योग्य वह स्थान मंत्री द्वारा बताया गया।
श्लोक 132 (skanda.2.52.132)
यथायोग्यं यथास्थानं स्थापयित्वा नृपोत्तमः । बिल्वेश्वरकपोतेशं नमस्कृत्य प्रपूज्य च
yathāyogyaṁ yathāsthānaṁ sthāpayitvā nṛpottamaḥ bilveśvarakapoteśaṁ namaskṛtya prapūjya ca
उचित रीति से, उचित स्थान पर [सेना को] ठहराकर, श्रेष्ठ राजा ने बिल्वेश्वर और कपोतेश को प्रणाम कर भलीभाँति पूजा की,
श्लोक 133 (skanda.2.52.133)
रथमास्थाय मतिमान्सहितो ब्रह्मसूनुना । मनसा वचसा विष्णुं नीलाचलनिवासिनम् । चिंतयन्कीर्तयन्विप्रा जगाम संनिधिं हरेः
rathamāsthāya matimānsahito brahmasūnunā manasā vacasā viṣṇuṁ nīlācalanivāsinam ciṁtayankīrtayanviprā jagāma saṁnidhiṁ hareḥ
रथ पर चढ़कर, बुद्धिमान राजा ब्रह्मपुत्र के साथ, मन और वचन से नीलाचल-निवासी विष्णु का ध्यान और कीर्तन करते हुए, हे द्विजो, हरि के समीप गए।