वैष्णव खण्ड · अध्याय 53
कपोतेश्वर और बिल्वेश्वर की कथा
श्लोक 1 (skanda.2.53.1)
मुनय ऊचुः । कपोतेशस्थली चापि कथं ख्याता महामुने । को वा कपोतः कश्चेश एतन्नो वक्तुमर्हसि
munaya ūcuḥ kapoteśasthalī cāpi kathaṁ khyātā mahāmune ko vā kapotaḥ kaśceśa etanno vaktumarhasi
मुनियों ने कहा — 'हे महामुने! कपोतेश-स्थली कैसे विख्यात हुई? कपोत कौन है, और ईश कौन? यह हमें बताने योग्य हो।'
श्लोक 2 (skanda.2.53.2)
जैमिनिरुवाच । पुरा कुशस्थली सा वै असेव्या सर्वजंतुभिः । तीक्ष्णधारैः कुशाग्रैस्तु परितः कंटकैश्चिता
jaiminiruvāca purā kuśasthalī sā vai asevyā sarvajaṁtubhiḥ tīkṣṇadhāraiḥ kuśāgraistu paritaḥ kaṁṭakaiścitā
जैमिनि ने कहा — पहले वह कुशस्थली किसी भी प्राणी के लिए रहने योग्य नहीं थी, चारों ओर तीक्ष्ण धार वाले कुश के अग्रभागों और काँटों से भरी हुई थी।
श्लोक 3 (skanda.2.53.3)
निस्तरुर्निर्जलाधारा पिशाचवसतिर्यथा । यदा पूर्वं भगवतो नान्यो देवोऽपि पूज्यते
nistarurnirjalādhārā piśācavasatiryathā yadā pūrvaṁ bhagavato nānyo devo'pi pūjyate
वृक्षरहित, जलरहित, मानो पिशाचों का निवास — जब पूर्वकाल में भगवान् के अतिरिक्त कोई अन्य देवता पूजित नहीं होता था,
श्लोक 4 (skanda.2.53.4)
पूज्यः स्यामहमप्येवं स्पर्धासीद्धूर्जटेस्तदा । चिंतयन्निति तस्यैव विष्णोर्भक्तौ मनोऽदधत्
pūjyaḥ syāmahamapyevaṁ spardhāsīddhūrjaṭestadā ciṁtayanniti tasyaiva viṣṇorbhaktau mano'dadhat
'मैं भी इस प्रकार पूज्य बनूँ' — यही धूर्जटि की स्पर्धा थी; ऐसा विचार करते हुए उन्होंने अपना मन विष्णु की भक्ति में लगाया।
श्लोक 5 (skanda.2.53.5)
सर्वनिर्विषये देशे स्थित्वाऽहं निष्परिग्रहः । सुमहत्तप आस्थाय तोषयिष्यामि तं हरिम्
sarvanirviṣaye deśe sthitvā'haṁ niṣparigrahaḥ sumahattapa āsthāya toṣayiṣyāmi taṁ harim
'सर्वथा विषयरहित देश में स्थित होकर, निष्परिग्रह होकर, महान् तप का आश्रय लेकर मैं उन हरि को संतुष्ट करूँगा।'
श्लोक 6 (skanda.2.53.6)
किं वदेयं रमेशाय का स्तुतिः शारदापतेः । सर्वब्रह्मांडनाथस्य किं वान्यत्तुष्टिकारकम्
kiṁ vadeyaṁ rameśāya kā stutiḥ śāradāpateḥ sarvabrahmāṁḍanāthasya kiṁ vānyattuṣṭikārakam
'रमापति से मैं क्या कहूँ? शारदापति की क्या स्तुति करूँ? सम्पूर्ण ब्रह्मांडों के स्वामी को और क्या संतुष्ट कर सकता है?'
श्लोक 7 (skanda.2.53.7)
तस्मान्न बाह्यं वस्त्वन्यदुपयोगाय तस्य वै । अंतर्यागं समास्थाय निर्व्यलीकेन चेतसा
tasmānna bāhyaṁ vastvanyadupayogāya tasya vai aṁtaryāgaṁ samāsthāya nirvyalīkena cetasā
'इसलिए उनके प्रयोजन के लिए कोई बाहरी वस्तु नहीं है; अंतर्याग का आश्रय लेकर, निश्छल चित्त से,'
श्लोक 8 (skanda.2.53.8)
भक्तेभ्य आत्मप्रददं चराचरगुरुं हरिम् । आराधयिष्ये सर्वेषां पूज्यः स्यां तत्प्रसादतः
bhaktebhya ātmapradadaṁ carācaraguruṁ harim ārādhayiṣye sarveṣāṁ pūjyaḥ syāṁ tatprasādataḥ
'— भक्तों को अपना ही स्वरूप देने वाले, चराचर के गुरु हरि की मैं आराधना करूँगा, जिससे उनकी कृपा से मैं सबका पूज्य बनूँ।'
श्लोक 9 (skanda.2.53.9)
तत इत्यभिसंधाय ययौ पुण्यां कुशस्थलीम् । समीपे नीलगोत्रस्य सर्वद्वंद्वविवर्जितः
tata ityabhisaṁdhāya yayau puṇyāṁ kuśasthalīm samīpe nīlagotrasya sarvadvaṁdvavivarjitaḥ
इस प्रकार निश्चय कर वे पवित्र कुशस्थली को गए, नीलगिरि की श्रेणी के समीप, समस्त द्वंद्वों से रहित होकर।
श्लोक 10 (skanda.2.53.10)
ततस्तेपे तपस्तीव्रं वायुभक्षो महेश्वरः । कपोत इव सूक्ष्मोऽभूदष्टमूर्तिरपि प्रभुः
tatastepe tapastīvraṁ vāyubhakṣo maheśvaraḥ kapota iva sūkṣmo'bhūdaṣṭamūrtirapi prabhuḥ
तब महेश्वर ने वायु मात्र का आहार लेकर तीव्र तप किया; आठ रूपों वाले प्रभु भी कपोत के समान सूक्ष्म हो गए।
श्लोक 11 (skanda.2.53.11)
ततः प्रसन्नो भगवानैश्वर्यं प्रददौ तदा । येनात्मतुल्यः संजातः पूजासंमाननादिषु
tataḥ prasanno bhagavānaiśvaryaṁ pradadau tadā yenātmatulyaḥ saṁjātaḥ pūjāsaṁmānanādiṣu
तब प्रसन्न होकर भगवान् (विष्णु) ने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया, जिससे वे पूजा-सम्मान आदि में उन्हीं के समान हो गए।
श्लोक 12 (skanda.2.53.12)
तपःप्रभावात्तस्यासीत्स्थली वृन्दावनोपमा । सरस्तडागसरसी नदीभिः शोभितांतरा
tapaḥprabhāvāttasyāsītsthalī vṛndāvanopamā sarastaḍāgasarasī nadībhiḥ śobhitāṁtarā
उस तप के प्रभाव से वह स्थान वृन्दावन के समान हो गया, जिसका भीतरी भाग सरोवरों, तालाबों और नदियों से सुशोभित था,
श्लोक 13 (skanda.2.53.13)
नानाद्रुमैर्लताभिश्च सर्वर्तुफलपुष्पकैः । मधुमत्तद्विरेफाणां झंकारैर्मुखराशया
nānādrumairlatābhiśca sarvartuphalapuṣpakaiḥ madhumattadvirephāṇāṁ jhaṁkārairmukharāśayā
नाना वृक्षों और लताओं से युक्त, सभी ऋतुओं के फल-फूलों से भरा, मधु से मत्त भ्रमरों की गुंजार से मुखरित,
श्लोक 14 (skanda.2.53.14)
नानापक्षिगणाकीर्णा सर्वजंतुसुखाश्रया । कपोतसदृशो जातो यतः स तपसा शिवः
nānāpakṣigaṇākīrṇā sarvajaṁtusukhāśrayā kapotasadṛśo jāto yataḥ sa tapasā śivaḥ
नाना पक्षिगणों से भरा, सभी प्राणियों के सुख का आश्रय — क्योंकि शिव तप से कपोत के समान हो गए थे,
श्लोक 15 (skanda.2.53.15)
मुरारेराज्ञया सोऽत्र कपोतेश्वरतां गतः । तदाज्ञयाऽत्र वसति मृडान्या त्र्यंबकः सदा
murārerājñayā so'tra kapoteśvaratāṁ gataḥ tadājñayā'tra vasati mṛḍānyā tryaṁbakaḥ sadā
मुरारि की आज्ञा से यहाँ वे कपोतेश्वर पद को प्राप्त हुए; उसी आज्ञा से त्र्यंबक यहाँ मृडानी के साथ सदा निवास करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.53.16)
येऽर्चयन्ति कपोतेशं स्तुवन्ति प्रणमंति वा । निर्धूतकल्मषास्ते वै प्रयांति पुरुषोत्तमम्
ye'rcayanti kapoteśaṁ stuvanti praṇamaṁti vā nirdhūtakalmaṣāste vai prayāṁti puruṣottamam
जो कपोतेश की पूजा, स्तुति या प्रणाम करते हैं, वे पाप धुलकर निश्चय ही पुरुषोत्तम को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 17 (skanda.2.53.17)
अतः परं प्रवक्ष्यामि बिल्वेशमहिमां द्विजाः । पातालवासिनः पूर्वं दैत्या भित्त्वा महीतलम्
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi bilveśamahimāṁ dvijāḥ pātālavāsinaḥ pūrvaṁ daityā bhittvā mahītalam
अब इसके आगे, हे द्विजो, मैं बिल्वेश की महिमा कहूँगा। पहले पाताल-निवासी दैत्यों ने पृथ्वी-तल को भेदकर,
श्लोक 18 (skanda.2.53.18)
उपद्रवंति भूर्लोकं भक्षयन्ति जनांस्तथा । भारावतरणार्थाय देवकीगर्भसंभवः
upadravaṁti bhūrlokaṁ bhakṣayanti janāṁstathā bhārāvataraṇārthāya devakīgarbhasaṁbhavaḥ
भूलोक को उपद्रवित किया और लोगों को खा जाने लगे; तब पृथ्वी का भार उतारने के लिए, देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए भगवान् प्रभु ने,
श्लोक 19 (skanda.2.53.19)
पालयामास पृथिवीं यदा स भगवान्प्रभुः । यादवैः पांडवैः सार्द्धं तदा तत्स्थानमागतः
pālayāmāsa pṛthivīṁ yadā sa bhagavānprabhuḥ yādavaiḥ pāṁḍavaiḥ sārddhaṁ tadā tatsthānamāgataḥ
जब पृथ्वी की रक्षा की, तब यादवों और पांडवों के साथ वे उस स्थान पर आए।
श्लोक 20 (skanda.2.53.20)
तीर्थराजस्य सलिले स्नात्वा तं नीलमाधवम् । दूरात्प्रणम्य मनसा दैत्यद्वारमुपागतः
tīrtharājasya salile snātvā taṁ nīlamādhavam dūrātpraṇamya manasā daityadvāramupāgataḥ
तीर्थराज के जल में स्नान कर, दूर से ही मन में नीलमाधव को प्रणाम कर, वे दैत्यों के द्वार तक पहुँचे।
श्लोक 21 (skanda.2.53.21)
दृष्ट्वा तद्विवरं घोरमप्रवेश्यं तु मानवैः । भ्रांत्या संमोहयँल्लोकान्प्रथयञ्छिवपूज्यताम्
dṛṣṭvā tadvivaraṁ ghoramapraveśyaṁ tu mānavaiḥ bhrāṁtyā saṁmohayam̐llokānprathayañchivapūjyatām
उस मानवों के लिए अप्रवेश्य, भयंकर गुफा को देखकर, भ्रम से लोगों को मोहित करते और शिव-पूजा का प्रचार करते हुए,
श्लोक 22 (skanda.2.53.22)
बैल्वं फलं समादाय तत्रावाह्य त्रिलोचनम् । पूजयित्वा पुरारातिं तुष्टावासुरसूदनः
bailvaṁ phalaṁ samādāya tatrāvāhya trilocanam pūjayitvā purārātiṁ tuṣṭāvāsurasūdanaḥ
बिल्व-फल लेकर वहाँ त्रिलोचन का आवाहन कर, त्रिपुरारि की पूजा कर, असुर-संहारक ने उनकी स्तुति की —
श्लोक 23 (skanda.2.53.23)
श्री भगवानुवाच । नमस्ते त्रिगुणातीत गुणत्रयविभागकृत् । त्रयीमय त्रयातीत त्रिकालज्ञानिने नमः
śrī bhagavānuvāca namaste triguṇātīta guṇatrayavibhāgakṛt trayīmaya trayātīta trikālajñānine namaḥ
भगवान् ने कहा — 'तुम्हें नमस्कार, जो तीनों गुणों से परे हो, फिर भी तीनों गुणों का विभाजन करने वाले हो; त्रयीमय, त्रय से परे, त्रिकाल के ज्ञाता — तुम्हें नमस्कार।'
श्लोक 24 (skanda.2.53.24)
शशिसूर्याग्निनेत्राय ब्रह्मण्याय वरात्मने । अष्टैश्वर्यनिधानाय तुभ्यमष्टात्मने नमः
śaśisūryāgninetrāya brahmaṇyāya varātmane aṣṭaiśvaryanidhānāya tubhyamaṣṭātmane namaḥ
'चंद्र, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, ब्राह्मणों के हितैषी, वरात्मन्, आठों ऐश्वर्यों के निधि, अष्टमूर्ति — तुम्हें नमस्कार।'
श्लोक 25 (skanda.2.53.25)
यस्य रूपं तमःपारे तमोनाशनमव्ययम् । अज्ञानानां तमश्छिन्नं तस्मै वितमसे नमः
yasya rūpaṁ tamaḥpāre tamonāśanamavyayam ajñānānāṁ tamaśchinnaṁ tasmai vitamase namaḥ
'जिनका रूप, अंधकार से परे, अविनाशी, अंधकार का नाशक है; जिन्होंने अज्ञान का अंधकार काट दिया — उस अंधकाररहित को नमस्कार।'
श्लोक 26 (skanda.2.53.26)
एवं स्वमात्मनात्मानं स्तुत्वा स भगवान्प्रभुः । तस्य प्रसादाद्विवरं सुप्रवेशमपश्यत
evaṁ svamātmanātmānaṁ stutvā sa bhagavānprabhuḥ tasya prasādādvivaraṁ supraveśamapaśyata
इस प्रकार अपने ही आत्मा से अपनी स्तुति कर, वह भगवान् प्रभु — उनकी कृपा से वह गुफा सुगमता से प्रवेश योग्य दिखी।
श्लोक 27 (skanda.2.53.27)
तेन मार्गेण पातालं ससैन्योऽभ्यगमत्प्रभुः । हत्वा तत्र बलोदग्रान्दैत्यान्भारावतारणः
tena mārgeṇa pātālaṁ sasainyo'bhyagamatprabhuḥ hatvā tatra balodagrāndaityānbhārāvatāraṇaḥ
उस मार्ग से प्रभु सेना सहित पाताल में गए; वहाँ बलशाली दैत्यों को मारकर, भार को उतारने वाले उन्होंने,
श्लोक 28 (skanda.2.53.28)
पुनरागम्य तत्रैव स्थित्वा स वृषभध्वजम् । संपूज्य भगवान्द्वाररोधाय स्थापयञ्छिवम्
punarāgamya tatraiva sthitvā sa vṛṣabhadhvajam saṁpūjya bhagavāndvārarodhāya sthāpayañchivam
पुनः लौटकर, वहीं ठहरकर, वृषभध्वज शिव की भलीभाँति पूजा कर, द्वार रोकने के लिए शिव को स्थापित किया —
श्लोक 29 (skanda.2.53.29)
इदमाह महाबुद्धिर्भक्तिवश्यो गदाधरः । धूर्जटे तिष्ठ प्रासादे रुन्धानोऽसुर निर्गमम्
idamāha mahābuddhirbhaktivaśyo gadādharaḥ dhūrjaṭe tiṣṭha prāsāde rundhāno'sura nirgamam
महाबुद्धिमान्, भक्ति के वश में रहने वाले गदाधर ने यह कहा — 'हे धूर्जटे! इस मंदिर में रहो, असुरों के निर्गमन को रोकते हुए।'
श्लोक 30 (skanda.2.53.30)
त्वदन्यः कः क्षमः शंभो कर्बूरबलनाशने । स्थापयित्वा महादेवं ततो द्वारावतीं ययौ
tvadanyaḥ kaḥ kṣamaḥ śaṁbho karbūrabalanāśane sthāpayitvā mahādevaṁ tato dvārāvatīṁ yayau
'तुम्हारे सिवा और कौन, हे शंभो, इस भयंकर सेना के नाश में समर्थ है?' — महादेव को इस प्रकार स्थापित कर वे फिर द्वारावती को गए।
श्लोक 31 (skanda.2.53.31)
ततःप्रभृति बिल्वेशः पृथिव्यां ख्यातिमागतः । पूर्वविधिः स बिल्वेशः क्षेत्रराजस्य भो द्विजाः
tataḥprabhṛti bilveśaḥ pṛthivyāṁ khyātimāgataḥ pūrvavidhiḥ sa bilveśaḥ kṣetrarājasya bho dvijāḥ
तभी से बिल्वेश पृथ्वी पर विख्यात हुए; हे द्विजो, वह बिल्वेश ही क्षेत्रराज (पुरुषोत्तम) का प्रथम रक्षक-विधान है।
श्लोक 32 (skanda.2.53.32)
तं दृष्ट्वा पापहंतारं मृड्रानीपतिमव्ययम् । सर्वान्कामानवाप्नोति विपत्तिं दुस्तरां जयेत्
taṁ dṛṣṭvā pāpahaṁtāraṁ mṛḍrānīpatimavyayam sarvānkāmānavāpnoti vipattiṁ dustarāṁ jayet
उन पापनाशक, अविनाशी मृडानीपति का दर्शन कर मनुष्य सभी कामनाएँ प्राप्त करता है और दुस्तर विपत्ति पर भी विजय पाता है।
श्लोक 33 (skanda.2.53.33)
कपोतबिल्वेश्वरयोर्माहात्म्यं कथितं तु वः । अतः परं भो मुनयः किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ
kapotabilveśvarayormāhātmyaṁ kathitaṁ tu vaḥ ataḥ paraṁ bho munayaḥ kimanyacchrotumicchatha
इस प्रकार कपोतेश्वर और बिल्वेश्वर की महिमा तुम्हें बताई गई। हे मुनियो, अब इसके आगे और क्या सुनना चाहते हो?