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वैष्णव खण्ड · अध्याय 54

इंद्रद्युम्न का विषाद और नारद का आश्वासन

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (skanda.2.54.1)

मुनय ऊचुः । रथमारुह्य तौ यातौ यदा नारदपार्थिवौ । क्व यातौ चक्रतुः किं वा तन्नो वद महामुने

munaya ūcuḥ rathamāruhya tau yātau yadā nāradapārthivau kva yātau cakratuḥ kiṁ vā tanno vada mahāmune

मुनियों ने कहा — जब नारद और राजा रथ पर चढ़कर गए, तब वे कहाँ गए और उन्होंने क्या किया? हे महामुने, यह हमें बताओ।

श्लोक 2 (skanda.2.54.2)

जैमिनिरुवाच । सार्द्धं च विद्यापतिना पुरोहितकनीयसा । क्षेत्रांते नीलकण्ठस्य समीपमुपजग्मतुः

jaiminiruvāca sārddhaṁ ca vidyāpatinā purohitakanīyasā kṣetrāṁte nīlakaṇṭhasya samīpamupajagmatuḥ

जैमिनि ने कहा — विद्यापति नामक युवा पुरोहित के साथ वे क्षेत्र की सीमा पर नीलकंठ के समीप पहुँचे।

श्लोक 3 (skanda.2.54.3)

दुर्निमित्तमभून्मार्गे व्रजतोऽस्य महीक्षितः । वामाक्षिभुजयोः स्पन्दः स्फुरणं च मुहुर्मुहुः

durnimittamabhūnmārge vrajato'sya mahīkṣitaḥ vāmākṣibhujayoḥ spandaḥ sphuraṇaṁ ca muhurmuhuḥ

मार्ग में जाते हुए उस राजा के लिए अपशकुन हुआ — बार-बार बाईं आँख और भुजा में स्पंदन और फड़कन।

श्लोक 4 (skanda.2.54.4)

तद्दृष्ट्वा नृपशार्दूलो विषादमुपसेदिवान् । पप्रच्छ कारणं चास्य सर्वज्ञाननिधिं मुनिम्

taddṛṣṭvā nṛpaśārdūlo viṣādamupasedivān papraccha kāraṇaṁ cāsya sarvajñānanidhiṁ munim

उसे देखकर वह सिंह-सम राजा विषाद को प्राप्त हुआ, और सर्वज्ञान के निधि उस मुनि से इसका कारण पूछा —

श्लोक 5 (skanda.2.54.5)

अव्याहतं मे साम्राज्यं प्राप्तं क्षेत्रोत्तमं त्विदम् । दर्शनार्थं माधवस्य यात्रेयं तु शुभावहा

avyāhataṁ me sāmrājyaṁ prāptaṁ kṣetrottamaṁ tvidam darśanārthaṁ mādhavasya yātreyaṁ tu śubhāvahā

'मेरा साम्राज्य अबाधित है, यह उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो चुका है; माधव के दर्शन के लिए यह यात्रा शुभकारी ही है,

श्लोक 6 (skanda.2.54.6)

अकार्यं मे भवेदद्य किं मुने ब्रूहि तत्त्वतः । स्पन्दते वामनेत्रं तु स्फुरते च भुजोऽसकृत्

akāryaṁ me bhavedadya kiṁ mune brūhi tattvataḥ spandate vāmanetraṁ tu sphurate ca bhujo'sakṛt

'— फिर भी आज मेरे लिए क्या अनिष्ट होने वाला है? हे मुने, सत्य-सत्य कहो: बाईं आँख फड़कती है और भुजा बार-बार स्पंदित होती है।'

श्लोक 7 (skanda.2.54.7)

तच्छ्रुत्वा नारदः प्राह भावि कार्यं च सूचयन् । श्रावयन्कुशलं वाक्यं यदुक्तं पद्मयोनिना

tacchrutvā nāradaḥ prāha bhāvi kāryaṁ ca sūcayan śrāvayankuśalaṁ vākyaṁ yaduktaṁ padmayoninā

यह सुनकर नारद ने होनहार को सूचित करते हुए, ब्रह्मा द्वारा कहे गए कुशल-वचन को सुनाते हुए कहा —

श्लोक 8 (skanda.2.54.8)

नारद उवाच । मा भूद्विषादस्ते भूप सविघ्नं प्रायशः शुभम् । विघ्नांते च शुभं पुंसां पुनर्भाग्यवतां नृप

nārada uvāca mā bhūdviṣādaste bhūpa savighnaṁ prāyaśaḥ śubham vighnāṁte ca śubhaṁ puṁsāṁ punarbhāgyavatāṁ nṛpa

नारद ने कहा — 'हे राजन्! विषाद मत करो; प्रायः शुभ कार्य विघ्नसहित होते हैं, और विघ्न के अंत में भाग्यवान् पुरुषों को पुनः शुभ ही प्राप्त होता है।'

श्लोक 9 (skanda.2.54.9)

सत्यं त्वं सार्वभौमोऽसि क्षेत्रं विष्णोर्वपुस्त्विदम् । यात्रा तेऽत्र यदर्थेयं सोऽन्तर्द्धानमुपागमत्

satyaṁ tvaṁ sārvabhaumo'si kṣetraṁ viṣṇorvapustvidam yātrā te'tra yadartheyaṁ so'ntarddhānamupāgamat

'सत्य है, तुम सार्वभौम सम्राट हो; यह क्षेत्र साक्षात् विष्णु का शरीर है; परंतु जिसके लिए तुम्हारी यह यात्रा हुई, वे स्वयं अंतर्धान को प्राप्त हो गए हैं।'

श्लोक 10 (skanda.2.54.10)

एष विद्यापतिर्विप्रो दिने यस्मिन्ददर्श तम् । सायंकाले ततोऽन्येद्युः स्वर्णवालुकया वृतः । ययौ पातालनिलयं मर्त्यलोके सुदुर्लभः

eṣa vidyāpatirvipro dine yasmindadarśa tam sāyaṁkāle tato'nyedyuḥ svarṇavālukayā vṛtaḥ yayau pātālanilayaṁ martyaloke sudurlabhaḥ

'यह विद्यापति ब्राह्मण जिस दिन उनका दर्शन कर पाया, उसके अगले दिन संध्या समय ही वे स्वर्ण-बालू से आच्छादित होकर पाताल-निवास में चले गए — मृत्युलोक में अत्यंत दुर्लभ हो गए।'

श्लोक 11 (skanda.2.54.11)

जैमिनिरुवाच । तच्छ्रुत्वा घोरवचनं वव्रपातसमं नृपः । पपात धरणीपृष्ठे निःसंज्ञः स द्विजोत्तमाः

jaiminiruvāca tacchrutvā ghoravacanaṁ vavrapātasamaṁ nṛpaḥ papāta dharaṇīpṛṣṭhe niḥsaṁjñaḥ sa dvijottamāḥ

जैमिनि ने कहा — उस वज्रपात-सम भयंकर वचन को सुनकर राजा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, हे द्विजोत्तमो।

श्लोक 12 (skanda.2.54.12)

तं तथा पतितं दृष्ट्वा पुरोहितपुरोगमाः । स्निग्धाः सखायः सर्वे ते हाहाकारमुपाद्रवन्

taṁ tathā patitaṁ dṛṣṭvā purohitapurogamāḥ snigdhāḥ sakhāyaḥ sarve te hāhākāramupādravan

उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर पुरोहित आदि, तथा उसके सभी स्नेही मित्र, हाहाकार करते हुए दौड़ पड़े।

श्लोक 13 (skanda.2.54.13)

कर्पूरशीतलं वारि मुखे सिक्त्वा पुनःपुनः । चन्दनागुरुकर्पूरैः सर्वांगं लिलिपुश्च ते

karpūraśītalaṁ vāri mukhe siktvā punaḥpunaḥ candanāgurukarpūraiḥ sarvāṁgaṁ lilipuśca te

कपूर से शीतल जल से उसके मुख को बार-बार सींचकर, उन्होंने उसके सारे शरीर को चंदन, अगुरु और कपूर से लेप दिया।

श्लोक 14 (skanda.2.54.14)

चामरैस्तालवृंतैश्च वीजयामासुराशु तम् । नारदोऽपि च संभ्रांतो धारयन्योगधारणाम्

cāmaraistālavṛṁtaiśca vījayāmāsurāśu tam nārado'pi ca saṁbhrāṁto dhārayanyogadhāraṇām

चामर और ताड़पत्र के पंखों से शीघ्र उसे हवा करने लगे; नारद भी व्याकुल होकर योगधारणा का सहारा लेकर,

श्लोक 15 (skanda.2.54.15)

प्राणानररक्षन्नरपतेर्जानंस्तत्र शुभायतिम् । सोऽपि राजा चिरात्संज्ञां लेभे यत्नैरनुत्तमैः

prāṇānararakṣannarapaterjānaṁstatra śubhāyatim so'pi rājā cirātsaṁjñāṁ lebhe yatnairanuttamaiḥ

राजा के प्राणों की रक्षा करते रहे, वहाँ आने वाले शुभ भविष्य को जानते हुए; वह राजा भी चिरकाल बाद उत्तम प्रयत्नों से चेतना को प्राप्त हुआ।

श्लोक 16 (skanda.2.54.16)

उत्थाय पादयोर्विप्रा नारदस्यापतत्पुनः । किमकार्षं मुने पापं कस्मिञ्जन्मांतरे दृढम्

utthāya pādayorviprā nāradasyāpatatpunaḥ kimakārṣaṁ mune pāpaṁ kasmiñjanmāṁtare dṛḍham

उठकर वह पुनः नारद के चरणों में गिर पड़ा — 'हे मुने, मैंने किसी पूर्वजन्म में कौन-सा पाप किया है,

श्लोक 17 (skanda.2.54.17)

यस्य पाकदशायां वै दुःखमासीत्सुदारुणम् । कर्मणा मनसा वाचा नो द्विजानां गवामपि । अपराधः कृतः कश्चित्स्वप्नेऽपि मुनिपुंगव

yasya pākadaśāyāṁ vai duḥkhamāsītsudāruṇam karmaṇā manasā vācā no dvijānāṁ gavāmapi aparādhaḥ kṛtaḥ kaścitsvapne'pi munipuṁgava

'— जिसके पकने से यह अत्यंत भयंकर दुःख आया है? कर्म से, मन से, वाणी से, ब्राह्मणों या गायों के प्रति भी मैंने कभी, हे मुनिश्रेष्ठ, स्वप्न में भी कोई अपराध नहीं किया है।'

श्लोक 18 (skanda.2.54.18)

नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म यत्परिकीर्तितम् । राज्ञस्तन्मुनिशार्दूल न त्यक्तं वै मया क्वचित्

nityaṁ naimittikaṁ kāmyaṁ karma yatparikīrtitam rājñastanmuniśārdūla na tyaktaṁ vai mayā kvacit

'राजा के लिए बताए गए नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म, हे मुनिश्रेष्ठ, मैंने कभी नहीं त्यागे;

श्लोक 19 (skanda.2.54.19)

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां च महामुने । तथाश्रितानां बंधूनां नापमानः कृतो मया

devatātithibhṛtyānāṁ pitṝṇāṁ ca mahāmune tathāśritānāṁ baṁdhūnāṁ nāpamānaḥ kṛto mayā

'देवताओं, अतिथियों, सेवकों और पितरों का, हे महामुने, तथा आश्रितों और बांधवों का भी, मैंने कभी अपमान नहीं किया है;

श्लोक 20 (skanda.2.54.20)

पंचाशदपराधा ये विष्णोर्वैष्णवपुंगव । त्यक्ताः प्रयत्नात्ते सर्वे क्रुद्धा इव महोरगाः

paṁcāśadaparādhā ye viṣṇorvaiṣṇavapuṁgava tyaktāḥ prayatnātte sarve kruddhā iva mahoragāḥ

'विष्णु के जो पचास अपराध कहे गए हैं, हे वैष्णवश्रेष्ठ, वे सब मैंने यत्नपूर्वक त्यागे हैं, जैसे कुपित महासर्पों को त्यागा जाता है।'

श्लोक 21 (skanda.2.54.21)

किं भाग्यं चरितं तेन पुरोहितकनीयसा । यच्चर्मचक्षुषा दृष्टो भगवान्नीलमाधवः

kiṁ bhāgyaṁ caritaṁ tena purohitakanīyasā yaccarmacakṣuṣā dṛṣṭo bhagavānnīlamādhavaḥ

'उस युवा पुरोहित ने ऐसा कौन-सा भाग्यशाली आचरण किया, कि उसने चर्मचक्षुओं से साक्षात् भगवान् नीलमाधव का दर्शन पाया —

श्लोक 22 (skanda.2.54.22)

किमर्थं राज्यविभ्रंशो जानतैष न्वया कृतः । यात्रासमय एवैतत्कथं वा न प्रकीर्तितम्

kimarthaṁ rājyavibhraṁśo jānataiṣa nvayā kṛtaḥ yātrāsamaya evaitatkathaṁ vā na prakīrtitam

'— जबकि जानते हुए भी तुमने मेरे राज्य का यह विनाश क्यों होने दिया? यात्रा के आरंभ में ही यह बात मुझे क्यों नहीं बताई गई?

श्लोक 23 (skanda.2.54.23)

किमर्थं वा श्रोत्रियाणां स्थानभ्रंशो मया कृतः । कथमेतैः परित्यक्ताश्चिरात्संस्कृतभूमयः

kimarthaṁ vā śrotriyāṇāṁ sthānabhraṁśo mayā kṛtaḥ kathametaiḥ parityaktāścirātsaṁskṛtabhūmayaḥ

'मैंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को उनके स्थानों से क्यों च्युत किया? चिरकाल से बसाई गई ये भूमियाँ अब उनके द्वारा कैसे त्यागी जाएँगी?

श्लोक 24 (skanda.2.54.24)

आवंशभूतेर्वृत्तिर्या प्रजाभिः परिपालिता । मदर्थं सा परित्यक्ता जीविष्यंति कथं नु ताः

āvaṁśabhūtervṛttiryā prajābhiḥ paripālitā madarthaṁ sā parityaktā jīviṣyaṁti kathaṁ nu tāḥ

'पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रजा द्वारा पाला गया वह जीवन-निर्वाह मेरे कारण त्याग दिया गया — वे अब कैसे जिएँगी?

श्लोक 25 (skanda.2.54.25)

प्राणान्न धारयिष्यामि न द्रक्ष्यामि यदा हरिम् । एष मे निश्चयो ब्रह्मन्मयि नष्टे कुतः प्रजाः

prāṇānna dhārayiṣyāmi na drakṣyāmi yadā harim eṣa me niścayo brahmanmayi naṣṭe kutaḥ prajāḥ

'यदि हरि का दर्शन नहीं होगा तो मैं प्राण नहीं धारण करूँगा — यही मेरा निश्चय है, हे ब्रह्मन्; मेरे नष्ट होने पर प्रजा का क्या होगा?

श्लोक 26 (skanda.2.54.26)

मुने सदा सकरुणस्त्वं मां शास्ति शुभाशुभम् । सांप्रतं मत्सुतं नीत्वा मालवेष्वभिषेचय

mune sadā sakaruṇastvaṁ māṁ śāsti śubhāśubham sāṁprataṁ matsutaṁ nītvā mālaveṣvabhiṣecaya

'हे मुने, सदा करुणामय तुम मुझे शुभ-अशुभ का उपदेश दो; अभी मेरे पुत्र को ले जाकर मालव में उसका राज्याभिषेक कर दो,

श्लोक 27 (skanda.2.54.27)

स पालयतु न्यायेन न शोचंतु इमाः प्रजाः । राजानो ये समायातास्ते सर्वं मन्निदेशतः

sa pālayatu nyāyena na śocaṁtu imāḥ prajāḥ rājāno ye samāyātāste sarvaṁ mannideśataḥ

'वह न्यायपूर्वक शासन करे, जिससे ये प्रजाएँ शोक न करें। जो राजा यहाँ आए हैं, वे सब मेरे आदेश से,

श्लोक 28 (skanda.2.54.28)

मत्सूनोर्मालवेशस्य प्रयांतु वचने स्थिताः । प्रायोपवेशविधिना चिंतयन्नीलमाधवम्

matsūnormālaveśasya prayāṁtu vacane sthitāḥ prāyopaveśavidhinā ciṁtayannīlamādhavam

'मेरे पुत्र, मालव के राजा के वचन में स्थित रहकर उसकी सेवा करें। और मैं स्वयं प्रायोपवेशन-विधि से, नीलमाधव का ध्यान करते हुए,

श्लोक 29 (skanda.2.54.29)

आयुःशेषं करिष्यामि सफलं क्षेत्रसंस्थितः

āyuḥśeṣaṁ kariṣyāmi saphalaṁ kṣetrasaṁsthitaḥ

'अपनी शेष आयु को यहीं इस क्षेत्र में रहकर सफल करूँगा।'

श्लोक 30 (skanda.2.54.30)

जैमिनिरुवाच । विलपंतमिन्द्रुम्नं राजानं ब्रह्मणः सुतः । उत्थाप्य प्रश्रयगिरा सांत्वयन्निदमब्रवीत्

jaiminiruvāca vilapaṁtamindrumnaṁ rājānaṁ brahmaṇaḥ sutaḥ utthāpya praśrayagirā sāṁtvayannidamabravīt

जैमिनि ने कहा — विलाप करते राजा इंद्रद्युम्न को उठाकर, ब्रह्मपुत्र नारद ने विनम्र वाणी से सांत्वना देते हुए यह कहा —

श्लोक 31 (skanda.2.54.31)

नारद उवाच । राजन्पंडितमूर्द्धन्यो वैष्णवो धैयसागरः । श्रेयः सविघ्नं सततं कथं वा नावधारयेः

nārada uvāca rājanpaṁḍitamūrddhanyo vaiṣṇavo dhaiyasāgaraḥ śreyaḥ savighnaṁ satataṁ kathaṁ vā nāvadhārayeḥ

नारद ने कहा — 'हे राजन्! विद्वानों में शिरोमणि, वैष्णव, धैर्य के सागर तुम — यह सदा-सत्य क्यों नहीं समझते कि कल्याण सदा विघ्नसहित होता है?'

श्लोक 32 (skanda.2.54.32)

इदं तु परमं श्रेयः पुंसो जन्मशतार्जितम् । शरीरधारिणं पश्येच्चर्मचक्षुर्गदाधरम्

idaṁ tu paramaṁ śreyaḥ puṁso janmaśatārjitam śarīradhāriṇaṁ paśyeccarmacakṣurgadādharam

'यह तो मनुष्य के लिए सैकड़ों जन्मों में अर्जित परम कल्याण है, कि वह चर्मचक्षुओं से साक्षात् गदाधर को शरीरधारी रूप में देख सके।'

श्लोक 33 (skanda.2.54.33)

निरंकुशा हरेर्लीला केन वाप्यवधार्यते । जीवन्मुक्तोऽप्यहं राजंस्तल्लीलां नातिवर्तये

niraṁkuśā harerlīlā kena vāpyavadhāryate jīvanmukto'pyahaṁ rājaṁstallīlāṁ nātivartaye

'हरि की लीला निरंकुश है — उसे कौन समझ सकता है? हे राजन्, मैं जीवन्मुक्त होकर भी उस लीला का उल्लंघन नहीं करता।'

श्लोक 34 (skanda.2.54.34)

कियता वंचितो नाहं दृढभक्तोऽन्तिकस्थितः । दुरत्यया तस्य माया बहुजन्मशतैरपि

kiyatā vaṁcito nāhaṁ dṛḍhabhakto'ntikasthitaḥ duratyayā tasya māyā bahujanmaśatairapi

'दृढ़ भक्त होकर भी, समीप रहते हुए भी मैं कितना ठगा गया हूँ! उनकी माया सैकड़ों जन्मों में भी दुस्तर है।'

श्लोक 35 (skanda.2.54.35)

अनन्ता तस्य मायेयं दुर्ज्ञेया पद्मयोनिना । नाभिपद्मास्थितेनापि नित्यं च स्तुतिशालिना

anantā tasya māyeyaṁ durjñeyā padmayoninā nābhipadmāsthitenāpi nityaṁ ca stutiśālinā

'यह उनकी माया अनंत है, कमल-योनि ब्रह्मा के लिए भी दुर्ज्ञेय है — जो नाभि-कमल पर स्थित होकर भी सदा उनकी स्तुति में रत रहते हैं।'

श्लोक 36 (skanda.2.54.36)

स्वभाव एवं कथितस्तस्य मायाविनो नृप । विशेषं कथयाम्येवं त्वं तु भाग्यवतां वरः

svabhāva evaṁ kathitastasya māyāvino nṛpa viśeṣaṁ kathayāmyevaṁ tvaṁ tu bhāgyavatāṁ varaḥ

'हे राजन्! इस मायावी का स्वभाव यही कहा गया है। अब मैं तुम्हें एक विशेष बात बताता हूँ, क्योंकि तुम भाग्यशालियों में श्रेष्ठ हो।'

श्लोक 37 (skanda.2.54.37)

तिस्रोऽपि मूर्तयस्तस्य त्वदनुग्रहबुद्धयः । चराचराणां स्रष्टा यः साक्षाल्लोकपितामहः । मामुवाच व्रजाशु त्वमिंद्रद्युम्नस्य चांतिकम्

tisro'pi mūrtayastasya tvadanugrahabuddhayaḥ carācarāṇāṁ sraṣṭā yaḥ sākṣāllokapitāmahaḥ māmuvāca vrajāśu tvamiṁdradyumnasya cāṁtikam

'उनके तीनों ही रूप तुम्हारे प्रति अनुग्रह में लगे हैं। जो चराचर के स्रष्टा, साक्षात् लोकपितामह हैं, उन्होंने मुझसे कहा — जाओ शीघ्र इंद्रद्युम्न के समीप —

श्लोक 38 (skanda.2.54.38)

नीलाचलं प्रयात्येष दिदृक्षुर्नीलमाधवम् । अन्तर्द्धानं गतो ह्येष यमेन प्रार्थितो विभुः

nīlācalaṁ prayātyeṣa didṛkṣurnīlamādhavam antarddhānaṁ gato hyeṣa yamena prārthito vibhuḥ

'— वह नीलमाधव के दर्शन की इच्छा से नीलाचल जा रहा है। परंतु प्रभु यम की प्रार्थना से अंतर्धान हो चुके हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.54.39)

न तत्र शोकः कर्तव्यः शक्यते तत्र नान्यथा । वाच्यो मद्वचनाद्राजा पंचमी मम संततिः

na tatra śokaḥ kartavyaḥ śakyate tatra nānyathā vācyo madvacanādrājā paṁcamī mama saṁtatiḥ

'इस पर शोक नहीं करना चाहिए — इसे अन्यथा नहीं किया जा सकता। मेरे वचन से राजा से कहो कि वह मेरी ही मानो पाँचवीं संतान है —

श्लोक 40 (skanda.2.54.40)

तत्कृते परमात्मानं प्रसाद्य पुरुषोत्तमम् । श्वेतद्वीपान्नयिष्यामि सहस्रांते महाक्रतोः

tatkṛte paramātmānaṁ prasādya puruṣottamam śvetadvīpānnayiṣyāmi sahasrāṁte mahākratoḥ

'— उसी के लिए परमात्मा पुरुषोत्तम को प्रसन्न करके, सहस्र महायज्ञों के अंत में मैं उन्हें श्वेतद्वीप से ले आऊँगा।

श्लोक 41 (skanda.2.54.41)

इन्द्रद्युम्नः स इदानीं क्षेत्रे श्रीपुरुषोत्तमे । अश्वमेधसहस्रैस्तु यजन्विष्णुं स तिष्ठतु

indradyumnaḥ sa idānīṁ kṣetre śrīpuruṣottame aśvamedhasahasraistu yajanviṣṇuṁ sa tiṣṭhatu

'वह इंद्रद्युम्न अब पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही रहकर सहस्र अश्वमेध यज्ञों से विष्णु का यजन करता रहे।

श्लोक 42 (skanda.2.54.42)

तदंते दारवतनुं विष्णुं द्रक्ष्यति चक्षुषा । सोऽवतारो हरेः ख्यातिं तस्य द्वारा गमिष्यति

tadaṁte dāravatanuṁ viṣṇuṁ drakṣyati cakṣuṣā so'vatāro hareḥ khyātiṁ tasya dvārā gamiṣyati

'उसके अंत में वह काष्ठमय शरीर में विष्णु को अपने नेत्रों से देखेगा; हरि का वह अवतार उसी के द्वारा प्रसिद्धि पाएगा।

श्लोक 43 (skanda.2.54.43)

तदा तु तनवो विष्णोः प्रतिष्ठप्या मया धुवम् । पुरा स्म मणिमूर्तिस्तु चतुर्द्धावस्थितो हरिः

tadā tu tanavo viṣṇoḥ pratiṣṭhapyā mayā dhuvam purā sma maṇimūrtistu caturddhāvasthito hariḥ

'तब निश्चय ही मेरे द्वारा विष्णु की मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित की जाएँगी। पूर्वकाल में हरि रत्नमय मूर्ति में चार रूपों में स्थित हुए थे —

श्लोक 44 (skanda.2.54.44)

दृष्ट्वा पुरोधसा तस्य साक्षादग्रे निवेदितः । दिव्यदारुवपुर्भूयश्चतुर्द्धावतरिष्यति

dṛṣṭvā purodhasā tasya sākṣādagre niveditaḥ divyadāruvapurbhūyaścaturddhāvatariṣyati

'— उनके पुरोहित द्वारा देखी और साक्षात् उसके सामने बताई गई; अब पुनः दिव्य काष्ठ-शरीर में वे चार रूपों में अवतरित होंगे।'

श्लोक 45 (skanda.2.54.45)

तस्मान्मा व्यथ राजेंद्र वांछा ते सफला ध्रुवम् । भविष्यति न संदेहो निर्व्यलीको वसेह वै

tasmānmā vyatha rājeṁdra vāṁchā te saphalā dhruvam bhaviṣyati na saṁdeho nirvyalīko vaseha vai

'इसलिए, हे राजेंद्र, व्यथित मत हो; तुम्हारी इच्छा अवश्य सफल होगी, इसमें संदेह नहीं। निश्छल भाव से यहीं निवास करो।'

श्लोक 46 (skanda.2.54.46)

जैमिनिरुवाच । सांत्वयित्वा निनायेत्थं राजानं नारदस्तदा । विश्वासपदवीं विप्राः पुनर्वाक्यमुवाच ह

jaiminiruvāca sāṁtvayitvā nināyetthaṁ rājānaṁ nāradastadā viśvāsapadavīṁ viprāḥ punarvākyamuvāca ha

जैमिनि ने कहा — हे द्विजो! इस प्रकार सांत्वना देकर नारद ने राजा को विश्वास के मार्ग पर ला खड़ा किया, फिर पुनः यह वचन कहा —

श्लोक 47 (skanda.2.54.47)

नारद उवाच । शंखाकृतेः क्षेत्रवरस्य चाग्रे यो नीलकण्ठः खलु दुर्गयाऽऽस्ते । यामो वयं तत्र च वाजिमेधक्रतूपयोग्या सुसमा स्थली सा

nārada uvāca śaṁkhākṛteḥ kṣetravarasya cāgre yo nīlakaṇṭhaḥ khalu durgayā''ste yāmo vayaṁ tatra ca vājimedhakratūpayogyā susamā sthalī sā

नारद ने कहा — 'शंख के आकार वाले उस श्रेष्ठ क्षेत्र के अग्रभाग में जो नीलकंठ हैं, वे दुर्गा सहित वहाँ विराजते हैं। चलो हम वहीं चलें — वह समतल स्थान अश्वमेध-यज्ञ के लिए उपयुक्त है।'

श्लोक 48 (skanda.2.54.48)

तस्यां विनिर्माय सहस्रवर्षस्थिरां सुशालां हयमेधनाय । नीलाद्रिवासस्य नृसिंहमूर्तिं दृष्ट्वा कृतार्थं विरचय्य जन्म

tasyāṁ vinirmāya sahasravarṣasthirāṁ suśālāṁ hayamedhanāya nīlādrivāsasya nṛsiṁhamūrtiṁ dṛṣṭvā kṛtārthaṁ viracayya janma

'वहाँ सहस्र वर्ष तक स्थिर रहने योग्य उत्तम शाला बनवाकर, अश्वमेध के लिए, नीलाचल-निवासी की नृसिंह-मूर्ति का दर्शन कर, अपने जन्म को सफल करके,'

श्लोक 49 (skanda.2.54.49)

तस्यैव मूर्तिं प्रतियातनां ते नित्यार्चनीयां तव पूजनीयाम् । प्रत्यक्प्रतिष्ठाप्य समस्तविघ्नविनाशहेतोः फलबृंहणाय

tasyaiva mūrtiṁ pratiyātanāṁ te nityārcanīyāṁ tava pūjanīyām pratyakpratiṣṭhāpya samastavighnavināśahetoḥ phalabṛṁhaṇāya

'— उसी मूर्ति की एक प्रतिकृति, सदा पूजनीय, तुम्हारे लिए वंदनीय, पश्चिमाभिमुख स्थापित कर, समस्त विघ्नों के नाश और फल की वृद्धि के लिए,'

श्लोक 50 (skanda.2.54.50)

आरप्स्यामः क्रतुवरं मुनिवर्यैर्यथोचितम् । विलम्बोऽत्र न हि श्रेयानिति पैतामहं वचः

ārapsyāmaḥ kratuvaraṁ munivaryairyathocitam vilambo'tra na hi śreyāniti paitāmahaṁ vacaḥ

'हम श्रेष्ठ मुनियों के साथ, यथोचित रीति से, उत्तम यज्ञ आरंभ करेंगे; यहाँ विलंब करना कल्याणकारी नहीं है' — ऐसा पितामह का वचन था।

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55