वैष्णव खण्ड · अध्याय 55
नृसिंह-दर्शन और भगवान् के अंतर्धान का रहस्य
श्लोक 1 (skanda.2.55.1)
जैमिनिरुवाच । ततस्ते प्रस्थिता विप्रा नीलकण्ठांतिकं मुदा । प्रपूज्य तं महादेवं श्रीदुर्गां प्रणिपत्य च
jaiminiruvāca tataste prasthitā viprā nīlakaṇṭhāṁtikaṁ mudā prapūjya taṁ mahādevaṁ śrīdurgāṁ praṇipatya ca
जैमिनि ने कहा — तब वे ब्राह्मण आनंदपूर्वक नीलकंठ के समीप से चल पड़े; उस महादेव की पूजा कर और श्रीदुर्गा को प्रणाम कर,
श्लोक 2 (skanda.2.55.2)
विमुच्य स्यंदनवरं पादचाराः सहानुगाः । आरोढुं नीलभूमिध्रं प्रयाताः संयतेद्रियाः
vimucya syaṁdanavaraṁ pādacārāḥ sahānugāḥ āroḍhuṁ nīlabhūmidhraṁ prayātāḥ saṁyatedriyāḥ
उत्तम रथ को छोड़कर, अनुगामियों सहित पैदल ही, इंद्रियों को संयत कर वे नीलपर्वत पर चढ़ने के लिए प्रस्थित हुए,
श्लोक 3 (skanda.2.55.3)
नानाद्रुमलताकीर्णं नानापक्षिगणाकुलम् । शिलाविषमसंरोधमभितः परिवेषकम्
nānādrumalatākīrṇaṁ nānāpakṣigaṇākulam śilāviṣamasaṁrodhamabhitaḥ pariveṣakam
जो नाना वृक्षों और लताओं से भरा, नाना पक्षिगणों से व्याप्त, ऊबड़-खाबड़ शिलाओं से चारों ओर से घिरा हुआ था,
श्लोक 4 (skanda.2.55.4)
भ्रमद्भ्रमरसंभूतभ्रमकृद्गंडशैलकम् । दक्षिणांभोधिकल्लोलजलावृतनितंबकम्
bhramadbhramarasaṁbhūtabhramakṛdgaṁḍaśailakam dakṣiṇāṁbhodhikallolajalāvṛtanitaṁbakam
जो भ्रमण करते भ्रमरों से उत्पन्न चक्कर से युक्त पर्वत-श्रेणियों वाला था, जिसका ढलान दक्षिण समुद्र की लहरों से आप्लावित था,
श्लोक 5 (skanda.2.55.5)
अप्रतर्क्यं सदा मर्त्यैर्दुष्प्रवेश्यं महोरगैः । मत्तमातंगकघटाबृंहितैर्भीषणांतरम्
apratarkyaṁ sadā martyairduṣpraveśyaṁ mahoragaiḥ mattamātaṁgakaghaṭābṛṁhitairbhīṣaṇāṁtaram
जो मनुष्यों के लिए सदा अकल्पनीय, महासर्पों के कारण दुष्प्रवेश्य, मत्त हाथियों के झुंड की गर्जना से भयंकर था,
श्लोक 6 (skanda.2.55.6)
श्वापदैश्चिरसंवासैः शस्त्राघातमवेदिभिः । निर्भयैः परितः कीर्णं मृगयूथैरनेकशः
śvāpadaiścirasaṁvāsaiḥ śastrāghātamavedibhiḥ nirbhayaiḥ paritaḥ kīrṇaṁ mṛgayūthairanekaśaḥ
चिरकाल से वहाँ रहने वाले, अस्त्र-आघात से अनजान, निर्भय हिंसक पशुओं के झुंडों से चारों ओर भरा हुआ था —
श्लोक 7 (skanda.2.55.7)
प्रवेष्टुकामा न प्रापुर्यदा ते मार्गमंतरम् । तदा नारदसंसर्गाद्विदित्वा तु गिरेः शिरः
praveṣṭukāmā na prāpuryadā te mārgamaṁtaram tadā nāradasaṁsargādviditvā tu gireḥ śiraḥ
जब प्रवेश की इच्छा रखते हुए भी वे भीतर का मार्ग न पा सके, तब नारद के संग से पर्वत के शिखर को जानकर,
श्लोक 8 (skanda.2.55.8)
आसेदुर्यत्र वसति कृष्णागुरुतरोरधः । सर्वापद्भयसंहर्ता दिव्यसिंहवपुर्विभुः
āseduryatra vasati kṛṣṇāgurutaroradhaḥ sarvāpadbhayasaṁhartā divyasiṁhavapurvibhuḥ
वे वहाँ पहुँचे जहाँ काले अगुरु-वृक्ष के नीचे निवास करते हैं समस्त आपदाओं के भय को हरने वाले, दिव्य सिंह-शरीर धारण करने वाले विभु,
श्लोक 9 (skanda.2.55.9)
यं दृष्ट्वा ब्रह्महत्याया लीयन्ते कोटयो नृणाम् । व्यात्तास्यं भीमदशनमापिंगलसटाकुलम्
yaṁ dṛṣṭvā brahmahatyāyā līyante koṭayo nṛṇām vyāttāsyaṁ bhīmadaśanamāpiṁgalasaṭākulam
जिनके दर्शन से मनुष्यों की करोड़ों ब्रह्महत्याएँ लीन हो जाती हैं — फैला हुआ मुख, भयंकर दाँत, पिंगल जटाओं से व्याप्त,
श्लोक 10 (skanda.2.55.10)
उग्रं त्रिनेत्रं दैत्यस्य स्वोरावुत्तानशायिनः । वक्षःस्थलं दारयंतं नखरैर्वज्रदारुणैः
ugraṁ trinetraṁ daityasya svorāvuttānaśāyinaḥ vakṣaḥsthalaṁ dārayaṁtaṁ nakharairvajradāruṇaiḥ
उग्र, त्रिनेत्र, अपनी जांघ पर चित्त लेटे दैत्य के वक्षस्थल को वज्र-सम भयंकर नखों से विदीर्ण करते हुए,
श्लोक 11 (skanda.2.55.11)
अरुणाभं लसज्जिह्वं साट्टहासमुखं विभुम् । शंखचक्रलसद्बाहुं किरीटमुकुटोज्ज्वलम्
aruṇābhaṁ lasajjihvaṁ sāṭṭahāsamukhaṁ vibhum śaṁkhacakralasadbāhuṁ kirīṭamukuṭojjvalam
अरुण-आभ, लपलपाती जिह्वा वाले, अट्टहास से भरे मुखवाले विभु, शंख-चक्र से देदीप्यमान भुजाओं वाले, किरीट-मुकुट से उज्ज्वल,
श्लोक 12 (skanda.2.55.12)
नेत्रोच्छलद्वह्निकणसंत्रासितदिगन्तरम् । प्रचंडाघातभूम्यंतप्रविष्टपदपंकजम्
netrocchaladvahnikaṇasaṁtrāsitadigantaram pracaṁḍāghātabhūmyaṁtapraviṣṭapadapaṁkajam
नेत्रों से उछलती अग्नि-कणों से दिशाओं को त्रस्त करने वाले, प्रचंड आघात से पृथ्वी में धँसे हुए चरण-कमलों वाले —
श्लोक 13 (skanda.2.55.13)
तमादिमृर्तिं ते दृष्ट्वा नारदाग्रे तदा हरिम् । निर्भया ददृशुर्दूरात्प्रणेमुर्विगतज्वराः
tamādimṛrtiṁ te dṛṣṭvā nāradāgre tadā harim nirbhayā dadṛśurdūrātpraṇemurvigatajvarāḥ
उस आदि मूर्ति हरि का दर्शन कर, नारद के आगे, निर्भय होकर उन्होंने दूर से ही देखा और प्रणाम किया, उनका भय जाता रहा।
श्लोक 14 (skanda.2.55.14)
इन्द्रद्युम्नोऽपि तं दृष्ट्वा नारदोक्तौ विशस्वसे । भाविकार्ये प्रत्ययवानिदमाह महामुनिम्
indradyumno'pi taṁ dṛṣṭvā nāradoktau viśasvase bhāvikārye pratyayavānidamāha mahāmunim
इंद्रद्युम्न ने भी उन्हें देखकर नारद के वचन में विश्वास किया; होनहार कार्य पर विश्वस्त होकर उसने महामुनि से यह कहा —
श्लोक 15 (skanda.2.55.15)
महर्षे कृतकृत्योऽस्मि त्वं हि ज्ञाननिधिः परम् । दुराराध्यो नृसिहोऽयं दर्शनेऽपि भयावहः
maharṣe kṛtakṛtyo'smi tvaṁ hi jñānanidhiḥ param durārādhyo nṛsiho'yaṁ darśane'pi bhayāvahaḥ
'हे महर्षे! मैं कृतकृत्य हूँ, तुम्हीं परम ज्ञान के निधि हो; यह नृसिंह दुराराध्य हैं, दर्शन मात्र से भी भयकारी हैं;
श्लोक 16 (skanda.2.55.16)
भवादृशैः सुसेव्योयं मादृशैर्दूरतोऽपि सः । दर्शनात्कृतकृत्योऽस्मि संलीनाशेषपातकः
bhavādṛśaiḥ susevyoyaṁ mādṛśairdūrato'pi saḥ darśanātkṛtakṛtyo'smi saṁlīnāśeṣapātakaḥ
'तुम्हारे-जैसों द्वारा वे सुसेव्य हैं, मुझ-जैसों द्वारा तो दूर से ही; फिर भी दर्शन मात्र से मैं कृतकृत्य हूँ, मेरे समस्त पाप लीन हो गए।'
श्लोक 17 (skanda.2.55.17)
त्वत्सन्निधानादेवात्र तिष्ठामो निर्भया मुने । अत्युग्र मूर्तिर्भगवान्स्वल्पवीर्यैर्नरैः कथम्
tvatsannidhānādevātra tiṣṭhāmo nirbhayā mune atyugra mūrtirbhagavānsvalpavīryairnaraiḥ katham
'तुम्हारी उपस्थिति मात्र से ही, हे मुने, हम यहाँ निर्भय खड़े हैं; अत्यंत उग्र मूर्ति वाले भगवान् को अल्प सामर्थ्य वाले मनुष्य कैसे,
श्लोक 18 (skanda.2.55.18)
आराध्यते दैत्यराजं त्रिलोकेशं विदारयन् । यस्य नीलमयी मूर्तिः कृपासिंधोः स्थिता तु वै
ārādhyate daityarājaṁ trilokeśaṁ vidārayan yasya nīlamayī mūrtiḥ kṛpāsiṁdhoḥ sthitā tu vai
'जिन्होंने दैत्यराज, त्रिलोकों के स्वामी को विदीर्ण किया, आराध सकते हैं? फिर भी करुणासागर की वह नीलवर्णा मूर्ति भी यहीं विराजमान है —
श्लोक 19 (skanda.2.55.19)
कस्मिन्स्थले मुनिश्रेष्ठ दर्शनाद्या विमुक्तिदा । तन्मे दर्शय विप्रेंद्र यन्मे मुक्तिप्रदं मतम्
kasminsthale muniśreṣṭha darśanādyā vimuktidā tanme darśaya vipreṁdra yanme muktipradaṁ matam
'हे मुनिश्रेष्ठ! वह किस स्थान में है, जो दर्शनमात्र से मुक्ति देती है? हे विप्रेंद्र, वह मुझे दिखाओ, जिसे तुम मुझे मुक्तिदायक मानते हो।'
श्लोक 20 (skanda.2.55.20)
इत्युक्तो नारदस्तस्मै दर्शयामास पावनम् । स्थानं यत्र स्थितो देवः स्वर्णसैकत संवृतः
ityukto nāradastasmai darśayāmāsa pāvanam sthānaṁ yatra sthito devaḥ svarṇasaikata saṁvṛtaḥ
इस प्रकार कहे जाने पर नारद ने उन्हें वह पावन स्थान दिखाया, जहाँ स्वर्ण-बालू से आच्छादित होकर वह देव स्थित था —
श्लोक 21 (skanda.2.55.21)
पश्यैतं योजनायामं योजनद्वयमुच्छ्रितम् । कल्पांतस्थायिनं भूप न्यग्रोधं मुक्तिदं नृणाम्
paśyaitaṁ yojanāyāmaṁ yojanadvayamucchritam kalpāṁtasthāyinaṁ bhūpa nyagrodhaṁ muktidaṁ nṛṇām
'देखो, यह एक योजन लंबा, दो योजन ऊँचा, कल्पांत तक स्थिर रहने वाला वटवृक्ष है, हे राजन्, मनुष्यों को मुक्ति देने वाला;
श्लोक 22 (skanda.2.55.22)
छायायाः क्रमणाद्यस्य मुच्यते पापकंचुकात् । अस्य मूले नरः प्राणांस्त्यजन्मुक्तिमवाप्नुयात्
chāyāyāḥ kramaṇādyasya mucyate pāpakaṁcukāt asya mūle naraḥ prāṇāṁstyajanmuktimavāpnuyāt
'इसकी छाया में चलने मात्र से पाप का आवरण छूट जाता है; इसके मूल में प्राण त्यागने वाला मनुष्य मुक्ति पाता है।'
श्लोक 23 (skanda.2.55.23)
न्यग्रोधरूपं दृष्ट्वापि नारायणमकल्मषम् । निष्पापो जायते मर्त्यः किमुत पूजयन्स्तुवन्
nyagrodharūpaṁ dṛṣṭvāpi nārāyaṇamakalmaṣam niṣpāpo jāyate martyaḥ kimuta pūjayanstuvan
'निष्कलंक नारायण के इस वटवृक्ष-रूप का दर्शन मात्र करने से भी मनुष्य निष्पाप हो जाता है — पूजन और स्तवन करने से तो कहना ही क्या!'
श्लोक 24 (skanda.2.55.24)
अस्य मूलात्प्रतीच्यां हि नृसिंहस्योत्तरे नृप । अतिष्ठन्माधवो यत्र चतुर्मूर्तिधरो विभुः
asya mūlātpratīcyāṁ hi nṛsiṁhasyottare nṛpa atiṣṭhanmādhavo yatra caturmūrtidharo vibhuḥ
'इसके मूल से पश्चिम में, और नृसिंह के उत्तर में, हे राजन्, चतुर्मूर्तिधारी विभु माधव कभी विराजमान थे।'
श्लोक 25 (skanda.2.55.25)
अनुग्रहीतुं त्वामेव पुनरत्रोद्भविष्यति । श्वेतद्वीपे यथा विष्णुर्भोगभूमौ निजालयः
anugrahītuṁ tvāmeva punaratrodbhaviṣyati śvetadvīpe yathā viṣṇurbhogabhūmau nijālayaḥ
'केवल तुम्हारे अनुग्रह के लिए वे पुनः यहीं प्रकट होंगे — जैसे विष्णु श्वेतद्वीप में भोगभूमि में अपने ही निवास में विराजते हैं,
श्लोक 26 (skanda.2.55.26)
जंबूद्वीपे कर्मभूमौ निजं स्थानमिदं स्मृतम् । स्वस्यैवातिरहस्यत्वान्न प्रकाशोस्य संमतः
jaṁbūdvīpe karmabhūmau nijaṁ sthānamidaṁ smṛtam svasyaivātirahasyatvānna prakāśosya saṁmataḥ
'वैसे ही जंबूद्वीप की कर्मभूमि में यह उनका निजी स्थान माना गया है; अपनी अत्यंत गोपनीयता के कारण इसका प्रकाशन स्वीकृत नहीं है।'
श्लोक 27 (skanda.2.55.27)
मोक्षाधिकारी जानाति स्थलमेतन्महीपते । अविश्वासपदं नृणां दुष्कृतां हि विशेषतः
mokṣādhikārī jānāti sthalametanmahīpate aviśvāsapadaṁ nṛṇāṁ duṣkṛtāṁ hi viśeṣataḥ
'हे महीपते! केवल मोक्ष का अधिकारी ही इस स्थान को जानता है; यह मनुष्यों के, विशेषतः दुष्कर्मियों के, विश्वास के मार्ग में नहीं आता।'
श्लोक 28 (skanda.2.55.28)
अत्र याऽन्या प्रतिकृतिः पौरैर्विष्णोः प्रतिष्ठिता । सापि मुक्तिप्रदा भूप किं पुनः सा स्वयंभुवा
atra yā'nyā pratikṛtiḥ paurairviṣṇoḥ pratiṣṭhitā sāpi muktipradā bhūpa kiṁ punaḥ sā svayaṁbhuvā
'यहाँ जो विष्णु की अन्य प्रतिकृति नगरवासियों द्वारा प्रतिष्ठित की गई है, वह भी मुक्ति देने वाली है, हे राजन् — फिर स्वयंभू द्वारा स्थापित वह [मूल मूर्ति] तो कहना ही क्या!'
श्लोक 29 (skanda.2.55.29)
अंतर्द्धानतिरोधाने सुनिमित्ते जगत्प्रभोः । अनुग्रहार्थं साधूनां जायते च युगेयुगे
aṁtarddhānatirodhāne sunimitte jagatprabhoḥ anugrahārthaṁ sādhūnāṁ jāyate ca yugeyuge
'साधुओं पर अनुग्रह के लिए, किसी शुभ निमित्त से जगत्प्रभु का अंतर्धान और तिरोधान युग-युग में होता रहता है;
श्लोक 30 (skanda.2.55.30)
नानावतारैर्भगवान्मत्स्यकूर्मादिकैर्नृप । निमित्तनाशे च तिरोदधाति परमेश्वरः
nānāvatārairbhagavānmatsyakūrmādikairnṛpa nimittanāśe ca tirodadhāti parameśvaraḥ
'मत्स्य, कूर्म आदि नाना अवतारों में, हे राजन्, भगवान् उस निमित्त के समाप्त हो जाने पर परमेश्वर [स्वरूप में] छिप जाते हैं।'
श्लोक 31 (skanda.2.55.31)
निर्निमित्तं स्थितो नित्यमिह कारुण्यसागरः । श्वेतद्वीपाद्यथा विष्णुरन्यत्रावतरेत्प्रभुः
nirnimittaṁ sthito nityamiha kāruṇyasāgaraḥ śvetadvīpādyathā viṣṇuranyatrāvataretprabhuḥ
'फिर भी बिना किसी निमित्त के वे करुणा-सागर यहाँ सदा नित्य स्थित रहते हैं; जैसे श्वेतद्वीप से विष्णु प्रभु अन्यत्र अवतरित होते हैं,
श्लोक 32 (skanda.2.55.32)
अत्र स्थितोऽपि स द्वारकाकांचीपुष्करादिषु । प्रकाशं याति कृपया तरुमूलप्ररोहवत्
atra sthito'pi sa dvārakākāṁcīpuṣkarādiṣu prakāśaṁ yāti kṛpayā tarumūlaprarohavat
'वैसे ही यहाँ रहते हुए भी वे कृपा से द्वारका, कांची, पुष्कर आदि में प्रकट होते हैं, जैसे वृक्ष की जड़ से नई कोंपल फूटती है।'
श्लोक 33 (skanda.2.55.33)
नानातीर्थेषु देशेषु क्षेत्रेष्वायतनेषु च । अंशावतारास्तस्यैव मा भूत्ते संशयो नृप
nānātīrtheṣu deśeṣu kṣetreṣvāyataneṣu ca aṁśāvatārāstasyaiva mā bhūtte saṁśayo nṛpa
'नाना तीर्थों, देशों, क्षेत्रों और आयतनों में जो अंश-अवतार हैं, वे उन्हीं के हैं — हे राजन्, इसमें तुम्हें कोई संशय न हो।'
श्लोक 34 (skanda.2.55.34)
क्षणं न त्यजतीशानः क्षेत्रं क्षेत्रमिव स्वकम् । त्वदुपज्ञस्तु भूपाल प्रकाशोऽन्यो भविष्यति
kṣaṇaṁ na tyajatīśānaḥ kṣetraṁ kṣetramiva svakam tvadupajñastu bhūpāla prakāśo'nyo bhaviṣyati
'ईश इस क्षेत्र को अपने ही शरीर की भाँति क्षणभर के लिए भी नहीं त्यागते; परंतु हे भूपाल, तुम्हारे द्वारा खोजा गया एक नया प्राकट्य होगा।'
श्लोक 35 (skanda.2.55.35)
इति संदर्शितं स्थानं नारदेन महात्मना । साष्टांगपातं भूमौ तदिंद्रद्युम्नो ननाम ह
iti saṁdarśitaṁ sthānaṁ nāradena mahātmanā sāṣṭāṁgapātaṁ bhūmau tadiṁdradyumno nanāma ha
इस प्रकार महात्मा नारद द्वारा वह स्थान दिखाए जाने पर, इंद्रद्युम्न ने भूमि पर साष्टांग प्रणाम किया।
श्लोक 36 (skanda.2.55.36)
मन्वानस्तु स्थितं देवं प्रकाशमिव तुष्टुवे
manvānastu sthitaṁ devaṁ prakāśamiva tuṣṭuve
उस देव को मानो साक्षात् स्थित मानकर उन्होंने उनकी स्तुति की —
श्लोक 37 (skanda.2.55.37)
इंद्रद्युम्न उवाच । देवदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन । त्राहि मां पुंडरीकाक्ष पतितं भवसागरे
iṁdradyumna uvāca devadeva jagannātha praṇatārtivināśana trāhi māṁ puṁḍarīkākṣa patitaṁ bhavasāgare
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'हे देवदेव! हे जगन्नाथ! शरणागतों की पीड़ा के नाशक! हे पुंडरीकाक्ष! भवसागर में गिरे हुए मुझे बचाओ।'
श्लोक 38 (skanda.2.55.38)
त्वमेक एव दुःखौघध्वंसकः परमेश्वर । क्षुद्राः क्षुद्रान्हि सेवंते सुखलेशस्य लिप्सया
tvameka eva duḥkhaughadhvaṁsakaḥ parameśvara kṣudrāḥ kṣudrānhi sevaṁte sukhaleśasya lipsayā
'तुम अकेले ही, हे परमेश्वर, दुःखों के प्रवाह के नाशक हो; तुच्छ लोग तो सुख के लेशमात्र की चाह में तुच्छों की ही सेवा करते हैं।'
श्लोक 39 (skanda.2.55.39)
अनादित्रिविधौघस्य राशेः स्वस्य महांहसः । दुरुच्छेद्यस्य सततं पूर्यमाणस्य जन्मनः
anāditrividhaughasya rāśeḥ svasya mahāṁhasaḥ durucchedyasya satataṁ pūryamāṇasya janmanaḥ
'मेरे अनादि, त्रिविध, दुर्निवार्य, प्रत्येक जन्म से बढ़ते ही जाने वाले महापाप-राशि के इस समूह को —
श्लोक 40 (skanda.2.55.40)
किं पुनर्भक्तिभावेन साक्षान्मुक्तिप्रदं नृणाम् । कर्माधीनं तु ये मूढा वदंति त्वां क्रृपानिधिम्
kiṁ punarbhaktibhāvena sākṣānmuktipradaṁ nṛṇām karmādhīnaṁ tu ye mūḍhā vadaṁti tvāṁ krṛpānidhim
'— भक्तिभाव से तो क्या कहना, वह साक्षात् ही मनुष्यों को मुक्ति देने वाला है! जो मूढ़ तुम्हें, करुणा के निधि को, केवल कर्म के अधीन कहते हैं,
श्लोक 41 (skanda.2.55.41)
ते न जानंति भगवन्कर्मैवं प्रेरितं त्वया । अजामिलेन विप्रेण त्यक्त्वा वर्णाश्रमोदितम्
te na jānaṁti bhagavankarmaivaṁ preritaṁ tvayā ajāmilena vipreṇa tyaktvā varṇāśramoditam
'वे नहीं जानते, हे भगवन्, कि कर्म भी तुम्हारे ही द्वारा प्रेरित है। अजामिल नामक ब्राह्मण ने वर्णाश्रम-धर्म त्यागकर,
श्लोक 42 (skanda.2.55.42)
किं न पापं कृतं स्वामिन्सोऽपि त्वन्नामकीर्तनात् । मुक्तोऽभूत्स्मरणादेव पाशहस्तैर्विमोचितः
kiṁ na pāpaṁ kṛtaṁ svāminso'pi tvannāmakīrtanāt mukto'bhūtsmaraṇādeva pāśahastairvimocitaḥ
'हे स्वामिन्, कौन-सा पाप नहीं किया था? फिर भी वह तुम्हारे नाम-कीर्तन मात्र से मुक्त हो गया — केवल स्मरण से यमदूतों के पाश से छूट गया।'
श्लोक 43 (skanda.2.55.43)
सर्वेऽप्युपाया देवेश कीर्तितास्तव दर्शने । त्वयि दृष्टे हि भिद्यंते संशया हृदि संस्थिताः
sarve'pyupāyā deveśa kīrtitāstava darśane tvayi dṛṣṭe hi bhidyaṁte saṁśayā hṛdi saṁsthitāḥ
'हे देवेश! सभी उपाय तुम्हारे दर्शन में ही समाप्त होते कहे गए हैं; तुम्हारे दर्शन होने पर ही हृदय में स्थित संशय टूट जाते हैं।'
श्लोक 44 (skanda.2.55.44)
निःसंशयो भवेत्सद्यः पापपुण्यक्षयो धुवम् । त्वमेव शरणं दीनमनुगृह्णीष्व मां विभो
niḥsaṁśayo bhavetsadyaḥ pāpapuṇyakṣayo dhuvam tvameva śaraṇaṁ dīnamanugṛhṇīṣva māṁ vibho
'तत्काल संशयरहित हो जाता है, और पाप-पुण्य दोनों का क्षय निश्चित हो जाता है। तुम ही मेरे शरण हो — मुझ दीन पर अनुग्रह करो, हे विभो।'
श्लोक 45 (skanda.2.55.45)
निश्चितानि त्वया देव गर्भस्थस्य च यानि मे । तैरेव मे जनिर्जातु याचे त्वां केवलं त्विदम्
niścitāni tvayā deva garbhasthasya ca yāni me taireva me janirjātu yāce tvāṁ kevalaṁ tvidam
'हे देव! गर्भ में रहते हुए ही तुमने मेरे लिए जो कुछ निश्चित किया है, उसी के अनुसार मेरा जन्म हो — मैं तुमसे केवल यही माँगता हूँ।'
श्लोक 46 (skanda.2.55.46)
तिरश्चो मुक्तिदा मूर्तिः स्थिता ते याऽत्र तां पुनः । अनेन चक्षुषा पश्यामीश नान्यत्प्रयोजनम्
tiraśco muktidā mūrtiḥ sthitā te yā'tra tāṁ punaḥ anena cakṣuṣā paśyāmīśa nānyatprayojanam
'तुम्हारी वह मुक्तिदायी मूर्ति जो यहाँ छिपी हुई स्थित है, उसे इन्हीं नेत्रों से मैं देख सकूँ, हे ईश — इसके सिवा मेरा कोई और प्रयोजन नहीं है।'
श्लोक 47 (skanda.2.55.47)
कृतांजलिपुटो राजा स्तुत्वैवं मधुसूदनम् । पुनर्ननाम धरणीपृष्ठे साश्रुविलोचनः
kṛtāṁjalipuṭo rājā stutvaivaṁ madhusūdanam punarnanāma dharaṇīpṛṣṭhe sāśruvilocanaḥ
हाथ जोड़े राजा ने इस प्रकार मधुसूदन की स्तुति कर, अश्रुपूरित नेत्रों से पुनः पृथ्वी पर प्रणाम किया।
श्लोक 48 (skanda.2.55.48)
ततोंऽतरिक्षगा वाणी सामसुस्वरभाषिणी । उच्चचार नभोमध्ये इन्द्रद्युम्नस्य शृण्वतः
tatoṁ'tarikṣagā vāṇī sāmasusvarabhāṣiṇī uccacāra nabhomadhye indradyumnasya śṛṇvataḥ
तब आकाश में विचरण करती, साम-गान के समान मधुर स्वर वाली एक वाणी, नभोमध्य में गूँज उठी, जिसे इंद्रद्युम्न ने सुना —
श्लोक 49 (skanda.2.55.49)
मा चिंतां व्रज भूपाल व्रजिष्ये त्वदृशोः पथम् । पैतामहं वचः प्राह नारदो यत्कुरुष्व तत्
mā ciṁtāṁ vraja bhūpāla vrajiṣye tvadṛśoḥ patham paitāmahaṁ vacaḥ prāha nārado yatkuruṣva tat
'हे राजन्! चिंता मत करो, मैं तुम्हारी दृष्टि के पथ में आऊँगा। नारद जो पितामह का वचन बताएँ, वही करो।'
श्लोक 50 (skanda.2.55.50)
तच्छ्रुत्वा दिव्यवचनं नारदस्य च भाषितम् । श्रद्दधे वाजिमेधाय भगवत्प्रीतिकारकः
tacchrutvā divyavacanaṁ nāradasya ca bhāṣitam śraddadhe vājimedhāya bhagavatprītikārakaḥ
उस दिव्य वाणी और नारद के कथन को सुनकर, भगवान् को प्रसन्न करने की इच्छा से उसने अश्वमेध यज्ञ में श्रद्धा रखी।
श्लोक 51 (skanda.2.55.51)
नारदं च पुनः प्राह हर्षगद्गदया गिरा । मुने त्वया यदादिष्टं चतुर्मुखनिदेशतः
nāradaṁ ca punaḥ prāha harṣagadgadayā girā mune tvayā yadādiṣṭaṁ caturmukhanideśataḥ
और उसने फिर हर्ष से गद्गद वाणी में नारद से कहा — 'हे मुने! जो तुमने चतुर्मुख ब्रह्मा के आदेश से बताया है,
श्लोक 52 (skanda.2.55.52)
अशरीरा त्वियं वाणी अनुजज्ञे तदेव हि । पितामहो जगन्नाथो भेदो वै नाऽनयोः क्वचित्
aśarīrā tviyaṁ vāṇī anujajñe tadeva hi pitāmaho jagannātho bhedo vai nā'nayoḥ kvacit
'उसी को इस अशरीर वाणी ने भी अनुमोदित किया है; पितामह और जगन्नाथ में वस्तुतः कहीं कोई भेद नहीं है।'
श्लोक 53 (skanda.2.55.53)
पद्मयोनेः सुतस्त्वं हि वचस्ते भगवद्वचः । तत्कर्तव्यं प्रयत्नेन यच्छ्रेयउपपादकम्
padmayoneḥ sutastvaṁ hi vacaste bhagavadvacaḥ tatkartavyaṁ prayatnena yacchreyaupapādakam
'तुम कमल-योनि (ब्रह्मा) के पुत्र हो, तुम्हारा वचन ही भगवान् का वचन है; इसलिए जो भी कल्याणकारी है, वह प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए।'