वैष्णव खण्ड · अध्याय 56
नृसिंह-प्रतिष्ठा और राजा की स्तुति
श्लोक 1 (skanda.2.56.1)
जैमिनिरुवाच । नृपं सुमनसं दृष्ट्वा श्रद्दधानं महाक्रतौ । उवाच परमप्रीत्या नारदो लोकहर्षणः
jaiminiruvāca nṛpaṁ sumanasaṁ dṛṣṭvā śraddadhānaṁ mahākratau uvāca paramaprītyā nārado lokaharṣaṇaḥ
जैमिनि ने कहा — राजा को सुंदर मन वाला और महायज्ञ में श्रद्धावान् देखकर, लोगों को आनंद देने वाले नारद ने परम प्रीति से कहा —
श्लोक 2 (skanda.2.56.2)
व्यवसाये सुकृतिनां देवा यांति सहायताम् । तत्रोदाहरणं त्वं हि यत्सहायश्चतुर्मुखः
vyavasāye sukṛtināṁ devā yāṁti sahāyatām tatrodāharaṇaṁ tvaṁ hi yatsahāyaścaturmukhaḥ
'पुण्यशाली पुरुषों के कार्य में देवता सहायक बनते हैं; इसका उदाहरण तुम स्वयं हो, जिसके सहायक स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा हैं।'
श्लोक 3 (skanda.2.56.3)
तदेहि यामस्तत्रैव नीलकंठस्य सन्निधौ । सर्वराक्षससंहारं सर्वविघ्ननिवारणम्
tadehi yāmastatraiva nīlakaṁṭhasya sannidhau sarvarākṣasasaṁhāraṁ sarvavighnanivāraṇam
'तो चलो, हम वहीं नीलकंठ के समीप चलें — जो समस्त राक्षसों के संहारक और समस्त विघ्नों के निवारक हैं;'
श्लोक 4 (skanda.2.56.4)
स्थापयाम्यग्रतो राजन्नृसिंहं वारुणीमुखम् । अंतर्हितो हि भगवान्प्रत्यक्षोऽसौ नृकेसरी
sthāpayāmyagrato rājannṛsiṁhaṁ vāruṇīmukham aṁtarhito hi bhagavānpratyakṣo'sau nṛkesarī
'हे राजन्! मैं आगे ही पश्चिममुखी नृसिंह की स्थापना करता हूँ; भगवान् यद्यपि अंतर्हित हैं, फिर भी यह नरकेसरी प्रत्यक्ष होगा।'
श्लोक 5 (skanda.2.56.5)
सन्निधावस्य यागस्तु फलातिशयवान्भवेत् । त्वमग्रतो गच्छ शीघ्रं प्रासादं तत्र कारय
sannidhāvasya yāgastu phalātiśayavānbhavet tvamagrato gaccha śīghraṁ prāsādaṁ tatra kāraya
'उनकी उपस्थिति में यज्ञ का फल अत्यधिक बढ़ जाएगा; तुम आगे जाओ, शीघ्र वहाँ मंदिर बनवाओ।'
श्लोक 6 (skanda.2.56.6)
स्मरणान्मम चागत्य सुतो वै विश्वकर्मणः । प्रत्यङ्मुखं तु प्रासादं स तूर्णं घटयिष्यति
smaraṇānmama cāgatya suto vai viśvakarmaṇaḥ pratyaṅmukhaṁ tu prāsādaṁ sa tūrṇaṁ ghaṭayiṣyati
'मेरे स्मरण मात्र से विश्वकर्मा का पुत्र वहाँ आकर शीघ्र ही पश्चिमाभिमुख मंदिर बना देगा।'
श्लोक 7 (skanda.2.56.7)
दक्षिणे नीलकंठस्य यो महांश्चंदनद्रुमः । धनुःशतांतरे राजंश्चिररूढस्तु तिष्ठति
dakṣiṇe nīlakaṁṭhasya yo mahāṁścaṁdanadrumaḥ dhanuḥśatāṁtare rājaṁścirarūḍhastu tiṣṭhati
'नीलकंठ के दक्षिण में जो विशाल चंदन-वृक्ष है, हे राजन्, सौ धनुष की दूरी पर, चिरकाल से खड़ा है;'
श्लोक 8 (skanda.2.56.8)
तस्य पश्चिमदेशस्थं क्षेत्रं राजन्भविष्यति । वाजिमेधसहस्रेण तस्याग्रे यजतां भवान्
tasya paścimadeśasthaṁ kṣetraṁ rājanbhaviṣyati vājimedhasahasreṇa tasyāgre yajatāṁ bhavān
'उसके पश्चिम में क्षेत्र होगा, हे राजन्; वहीं उसके सामने सहस्र अश्वमेध यज्ञ करना।'
श्लोक 9 (skanda.2.56.9)
गच्छ त्वमहमत्रैव स्थास्यामि दिनपञ्चकम् । आराध्यैनं दिव्यसिंहं ज्योतीरूपमनन्तकम्
gaccha tvamahamatraiva sthāsyāmi dinapañcakam ārādhyainaṁ divyasiṁhaṁ jyotīrūpamanantakam
'तुम जाओ, मैं यहीं पाँच दिन ठहरूँगा; इस दिव्य, ज्योतिस्वरूप, अनंत सिंह की आराधना करते हुए,'
श्लोक 10 (skanda.2.56.10)
प्रत्यर्चायां प्रतिष्ठाप्य प्राणेंद्रियमनोयुतम् । दीपाद्दीपं यथा राजन्नयिष्ये शोभनाकृतिम्
pratyarcāyāṁ pratiṣṭhāpya prāṇeṁdriyamanoyutam dīpāddīpaṁ yathā rājannayiṣye śobhanākṛtim
'प्रतिकृति में प्राण, इंद्रिय और मन की स्थापना कर, दीपक से दीपक की भाँति, हे राजन्, मैं उसे सुंदर रूप में ले आऊँगा।'
श्लोक 11 (skanda.2.56.11)
नारदस्येति वचनं प्रतिश्रुत्य नृपोत्तमः । जगाम तत्र वेगेन चन्दनद्रुमसंनिधिम्
nāradasyeti vacanaṁ pratiśrutya nṛpottamaḥ jagāma tatra vegena candanadrumasaṁnidhim
नारद के इस वचन को स्वीकार कर, श्रेष्ठ राजा वेग से उस चंदन-वृक्ष के समीप गया।
श्लोक 12 (skanda.2.56.12)
तत्रापश्यत्सुघटकं शिल्पशास्त्रविशारदम् । नारदस्याज्ञया प्राप्तं पुत्रं वै देवशिल्पिनः
tatrāpaśyatsughaṭakaṁ śilpaśāstraviśāradam nāradasyājñayā prāptaṁ putraṁ vai devaśilpinaḥ
वहाँ उसने शिल्पशास्त्र में निपुण एक उत्तम शिल्पी को देखा — नारद की आज्ञा से आया हुआ, देवशिल्पी (विश्वकर्मा) का ही पुत्र,
श्लोक 13 (skanda.2.56.13)
मनुष्यरूपमास्थाय शस्त्रसूत्रधरं स्थितम् । राजानं स तु दृष्ट्वा वै चिकीर्षंतं सुरालयम्
manuṣyarūpamāsthāya śastrasūtradharaṁ sthitam rājānaṁ sa tu dṛṣṭvā vai cikīrṣaṁtaṁ surālayam
मनुष्य-रूप धारण किए, हाथ में उपकरण और नापने की डोरी लिए खड़ा; राजा को देवमंदिर बनवाने की इच्छा रखते देख,
श्लोक 14 (skanda.2.56.14)
कृतांजलिपुटः प्रोचे देवाहं शिल्पशास्त्रवित् । नरसिंहालयं तेऽद्य घटयिष्यामि शोभनम् । राजापि तमुवाचेदं प्रहसन्भो द्विजोत्तमाः
kṛtāṁjalipuṭaḥ proce devāhaṁ śilpaśāstravit narasiṁhālayaṁ te'dya ghaṭayiṣyāmi śobhanam rājāpi tamuvācedaṁ prahasanbho dvijottamāḥ
हाथ जोड़कर उसने कहा — 'हे देव! मैं शिल्पशास्त्र का ज्ञाता हूँ; आज ही मैं तुम्हारे लिए सुंदर नरसिंह-मंदिर बना दूँगा।' राजा ने भी हँसते हुए, हे द्विजोत्तमो, उससे कहा —
श्लोक 15 (skanda.2.56.15)
इन्द्रद्युम्न उवाच । न शिल्पी त्वं हि सामान्यः शिल्पशास्त्रप्रणेतृकः । कथितो नारदेनैव त्वष्टुः पुत्रो महायशाः
indradyumna uvāca na śilpī tvaṁ hi sāmānyaḥ śilpaśāstrapraṇetṛkaḥ kathito nāradenaiva tvaṣṭuḥ putro mahāyaśāḥ
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'तुम कोई साधारण शिल्पी नहीं, बल्कि शिल्पशास्त्र के प्रवर्तक ही हो; नारद ने ही तुम्हें त्वष्टा के महायशस्वी पुत्र के रूप में बताया है।'
श्लोक 16 (skanda.2.56.16)
निर्जनेऽस्मिन्महारण्ये नेतः पूर्वं जनाश्रयः । वयमद्यागताः शिल्पिन्सम्बन्धः किंनिमित्तकः
nirjane'sminmahāraṇye netaḥ pūrvaṁ janāśrayaḥ vayamadyāgatāḥ śilpinsambandhaḥ kiṁnimittakaḥ
'इस निर्जन महावन में पहले कभी मनुष्यों का निवास नहीं था; हम आज ही यहाँ आए हैं, हे शिल्पी — यह संबंध किस कारण से है?'
श्लोक 17 (skanda.2.56.17)
देवशिल्पी भवानेव विष्णोरमिततेजसः । सदानुध्यायिनस्तस्य निदेशवशवर्तिनः
devaśilpī bhavāneva viṣṇoramitatejasaḥ sadānudhyāyinastasya nideśavaśavartinaḥ
'तुम स्वयं ही अमित तेजस्वी विष्णु के देवशिल्पी हो, सदा उन्हीं का ध्यान करने वाले, उन्हीं की आज्ञा के अधीन हो;'
श्लोक 18 (skanda.2.56.18)
येन स्मृतस्त्वं मुनिना स एवात्रागमिष्यति । प्रत्यर्चां नरसिंहस्य गृहीत्वा तु दिनांतरे
yena smṛtastvaṁ muninā sa evātrāgamiṣyati pratyarcāṁ narasiṁhasya gṛhītvā tu dināṁtare
'जिस मुनि ने तुम्हें स्मरण किया, वे स्वयं ही अगले दिन नृसिंह की प्रतिकृति लेकर यहाँ आएँगे।'
श्लोक 19 (skanda.2.56.19)
तदाशु घटयस्वाद्य सप्राकारं सतोरणम् । प्रासादं नरसिंहस्य प्रतीचीवदनं शुभम्
tadāśu ghaṭayasvādya saprākāraṁ satoraṇam prāsādaṁ narasiṁhasya pratīcīvadanaṁ śubham
'इसलिए आज ही शीघ्र प्राकार और तोरण सहित नृसिंह का सुंदर, पश्चिममुखी मंदिर बना डालो।'
श्लोक 20 (skanda.2.56.20)
तं पूजयित्वा विधिवन्नियोज्य घटने नृपः । शिलासंचयकान्भृत्यान्बहुवित्तैरयोजयत्
taṁ pūjayitvā vidhivanniyojya ghaṭane nṛpaḥ śilāsaṁcayakānbhṛtyānbahuvittairayojayat
उसे विधिपूर्वक पूजकर और निर्माण-कार्य में नियुक्त कर, राजा ने प्रचुर धन देकर पत्थर एकत्र करने वाले सेवकों को भी लगाया।
श्लोक 21 (skanda.2.56.21)
चतुर्थे दिवसे विप्राः प्रासादोऽभूदनुत्तमः । बहुकालप्रसाध्योऽपि महिम्ना देवशिल्पिनः
caturthe divase viprāḥ prāsādo'bhūdanuttamaḥ bahukālaprasādhyo'pi mahimnā devaśilpinaḥ
चौथे दिन ही, हे द्विजो, वह अनुपम मंदिर, जो सामान्यतः बहुत काल में सिद्ध होता, देवशिल्पी की महिमा से पूर्ण हो गया।
श्लोक 22 (skanda.2.56.22)
ततः प्रभाते विमले नित्यकर्मावसानतः । प्रतिष्ठाविधिसंभारं गृहीत्वा सपरिच्छदः
tataḥ prabhāte vimale nityakarmāvasānataḥ pratiṣṭhāvidhisaṁbhāraṁ gṛhītvā saparicchadaḥ
तब निर्मल प्रभात में, नित्यकर्म समाप्त कर, प्रतिष्ठा-विधि की सामग्री लेकर, अपने परिवार सहित,
श्लोक 23 (skanda.2.56.23)
नारदागमनं प्रेक्ष्य यावत्तिष्ठति भूपतिः । तावच्छुश्रुविरे शङ्खा मृदङ्गा मुरजास्तथा
nāradāgamanaṁ prekṣya yāvattiṣṭhati bhūpatiḥ tāvacchuśruvire śaṅkhā mṛdaṅgā murajāstathā
राजा नारद के आगमन की प्रतीक्षा में खड़ा ही था कि शंख, मृदंग और मुरज की ध्वनियाँ सुनाई देने लगीं,
श्लोक 24 (skanda.2.56.24)
गीतमङ्गलवाद्यानि घंटानां करिणां स्वनाः । तथा जय जयेत्युच्चैः शब्दा आकाशमण्डले
gītamaṅgalavādyāni ghaṁṭānāṁ kariṇāṁ svanāḥ tathā jaya jayetyuccaiḥ śabdā ākāśamaṇḍale
मंगल-गीत और वाद्य, घंटों और हाथियों की ध्वनियाँ, तथा आकाशमंडल में ऊँचे स्वर से 'जय, जय' की ध्वनियाँ।
श्लोक 25 (skanda.2.56.25)
ताञ्छ्रुत्वा विस्मयापन्ना इंद्रद्युम्नपुरोगमाः । राजानः श्रोत्रिया विप्रा वैष्णवाश्च सहस्रशः
tāñchrutvā vismayāpannā iṁdradyumnapurogamāḥ rājānaḥ śrotriyā viprā vaiṣṇavāśca sahasraśaḥ
उन्हें सुनकर विस्मित हुए इंद्रद्युम्न आदि राजा, वेदज्ञ ब्राह्मण, और सहस्रों वैष्णव —
श्लोक 26 (skanda.2.56.26)
निराधारास्त्विमे शब्दा अद्भुतानि न संशयः । विचारयंतस्ते यावत्तावद्दक्षिणतो मरुत्
nirādhārāstvime śabdā adbhutāni na saṁśayaḥ vicārayaṁtaste yāvattāvaddakṣiṇato marut
'ये ध्वनियाँ आधाररहित हैं, निःसंदेह अद्भुत हैं' — ऐसा विचार ही कर रहे थे कि दक्षिण दिशा से वायु बहने लगी,
श्लोक 27 (skanda.2.56.27)
गन्धान्वितद्विरेफौघशब्दिताः पुष्पवृष्टयः । आविर्भूतास्त्रिपथगा वारिणार्द्रीकृता द्विजाः
gandhānvitadvirephaughaśabditāḥ puṣpavṛṣṭayaḥ āvirbhūtāstripathagā vāriṇārdrīkṛtā dvijāḥ
सुगंध और भ्रमरों की गुंजार से युक्त पुष्पवृष्टि प्रकट हुई, हे द्विजो, और त्रिपथगा (गंगा) के जल से सब भीग गए।
श्लोक 28 (skanda.2.56.28)
तदनंतरमेवासौ नारदो ब्रह्मणः सुतः । तपःप्रभावनिर्व्यूढ विमानवरशायिनीम्
tadanaṁtaramevāsau nārado brahmaṇaḥ sutaḥ tapaḥprabhāvanirvyūḍha vimānavaraśāyinīm
इसके तुरंत बाद ब्रह्मपुत्र नारद, तप के प्रभाव से प्राप्त उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर [प्रकट हुए],
श्लोक 29 (skanda.2.56.29)
रत्नचामरहस्ताभिर्दिव्यस्त्रीभिः सुशोभिताम् । अलंकृतां वहुविधैर्मणिरत्नप्रसाधनैः
ratnacāmarahastābhirdivyastrībhiḥ suśobhitām alaṁkṛtāṁ vahuvidhairmaṇiratnaprasādhanaiḥ
रत्नमय चामर हाथों में लिए दिव्य स्त्रियों से सुशोभित, मणि-रत्नों के नाना आभूषणों से अलंकृत [विमान पर],
श्लोक 30 (skanda.2.56.30)
दिव्यमाल्यांबरधरां दिव्यगन्धानुलेपनाम् । रम्यां प्रतिष्ठितप्राणां घटितां विश्वकर्मणा
divyamālyāṁbaradharāṁ divyagandhānulepanām ramyāṁ pratiṣṭhitaprāṇāṁ ghaṭitāṁ viśvakarmaṇā
दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य सुगंध से अनुलिप्त, रमणीय, प्राण-प्रतिष्ठित, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित,
श्लोक 31 (skanda.2.56.31)
तेजोमण्डलसंवीतां परितो हर्षदामपि । आदाय नरसिंहस्य प्रत्यर्चां प्रत्युपस्थितः
tejomaṇḍalasaṁvītāṁ parito harṣadāmapi ādāya narasiṁhasya pratyarcāṁ pratyupasthitaḥ
तेजोमंडल से घिरी, सब ओर आनंद देने वाली, नृसिंह की उस प्रतिकृति को लेकर वे वहाँ उपस्थित हुए।
श्लोक 32 (skanda.2.56.32)
तां दृष्ट्वा हर्षिताः सर्वे राजा राजानुयायिनः । अन्तर्द्धानं गतो देवो नारदेनोद्धृतः किमु
tāṁ dṛṣṭvā harṣitāḥ sarve rājā rājānuyāyinaḥ antarddhānaṁ gato devo nāradenoddhṛtaḥ kimu
उसे देखकर राजा और उसके अनुयायी सभी हर्षित हुए — मानो अंतर्धान हुए देव को ही नारद ने पुनः प्रकट कर लाया हो!
श्लोक 33 (skanda.2.56.33)
मेनिरे हर्षितात्मानः प्रशशंसुश्च तं मुनिम् । निरूप्य संनिधिस्थां तु नरसिंहाकृतिं द्विजाः । आद्यमूर्तेर्नृसिंहस्य प्रतिमामथ मेनिरे
menire harṣitātmānaḥ praśaśaṁsuśca taṁ munim nirūpya saṁnidhisthāṁ tu narasiṁhākṛtiṁ dvijāḥ ādyamūrternṛsiṁhasya pratimāmatha menire
प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने मुनि की सराहना की; और समीप उपस्थित नृसिंह की उस आकृति की परीक्षा कर, हे द्विजो, उसे नृसिंह के आदि-रूप की ही प्रतिमा माना।
श्लोक 34 (skanda.2.56.34)
प्रत्युत्थाय ततो राजा प्रहृष्टेनांतरात्मना । प्रदक्षिणीकृत्य हरिं जगाम शिरसा महीम्
pratyutthāya tato rājā prahṛṣṭenāṁtarātmanā pradakṣiṇīkṛtya hariṁ jagāma śirasā mahīm
तब राजा उठ खड़ा हुआ, अत्यंत हर्षित अंतःकरण से हरि की प्रदक्षिणा कर पृथ्वी पर मस्तक झुकाया।
श्लोक 35 (skanda.2.56.35)
श्रद्धासंपत्तियोग्येन संभारेण नृपाज्ञया । प्रस्थापयामास मुनिः प्रासादं शुभलक्षणम्
śraddhāsaṁpattiyogyena saṁbhāreṇa nṛpājñayā prasthāpayāmāsa muniḥ prāsādaṁ śubhalakṣaṇam
श्रद्धा और संपत्ति के अनुरूप सामग्री से, राजा की आज्ञा से, मुनि ने उस शुभ-लक्षण मंदिर में [प्रतिमा की] प्रतिष्ठा की।
श्लोक 36 (skanda.2.56.36)
प्रतिमां देवदेवस्य सुमुहूर्ते द्विजोत्तमाः । धरारमाभ्यां सहितां रत्नवेद्यां प्रतिष्ठिताम् । योगारूढतनुं राजा इन्द्रद्युम्नोऽथ तुष्टुवे
pratimāṁ devadevasya sumuhūrte dvijottamāḥ dharāramābhyāṁ sahitāṁ ratnavedyāṁ pratiṣṭhitām yogārūḍhatanuṁ rājā indradyumno'tha tuṣṭuve
देवाधिदेव की उस प्रतिमा को, हे द्विजोत्तमो, उत्तम मुहूर्त में धरा और रमा सहित, रत्नमय वेदी पर प्रतिष्ठित किया गया; तब राजा इंद्रद्युम्न ने योगमग्न उस रूप की स्तुति की,
श्लोक 37 (skanda.2.56.37)
वैष्णवैर्ब्राह्मणैर्भूपैर्नारदेन च धीमता । गुह्योपनिषदैः स्मार्तैः स्तोत्रैः शास्त्रैर्मुदान्वितैः
vaiṣṇavairbrāhmaṇairbhūpairnāradena ca dhīmatā guhyopaniṣadaiḥ smārtaiḥ stotraiḥ śāstrairmudānvitaiḥ
वैष्णवों, ब्राह्मणों, राजाओं और बुद्धिमान् नारद के साथ, गुह्य उपनिषदों, स्मार्त मंत्रों और शास्त्रोक्त स्तोत्रों से, हर्षपूर्वक —
श्लोक 38 (skanda.2.56.38)
इन्द्रद्युम्न उवाच । एकानेकस्थूलसूक्ष्माणुमूर्ते व्योमातीत व्योमरूपैकरूप । व्योमाकार व्यापक व्योमसंस्थ व्योमारूढ व्योमकेशाब्जयोने
indradyumna uvāca ekānekasthūlasūkṣmāṇumūrte vyomātīta vyomarūpaikarūpa vyomākāra vyāpaka vyomasaṁstha vyomārūḍha vyomakeśābjayone
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'हे एक-अनेक, स्थूल-सूक्ष्म-अणु-रूप! हे आकाश से परे, फिर भी आकाश के एकमात्र रूप वाले! आकाशाकार, व्यापक, आकाश में स्थित, आकाश पर आरूढ़, आकाश जिनके केश हैं, कमल-योनि से उत्पन्न —'
श्लोक 39 (skanda.2.56.39)
दुःखांभोधेस्त्राहि मां दिव्यसिंह प्रादुर्भूतानेककोट्यर्कधामन् । नित्यासन्नो दूरसंस्थो न दूरो नासन्नो वा बोध्यबोधात्मभाव
duḥkhāṁbhodhestrāhi māṁ divyasiṁha prādurbhūtānekakoṭyarkadhāman nityāsanno dūrasaṁstho na dūro nāsanno vā bodhyabodhātmabhāva
'— दुःख के सागर से मेरी रक्षा करो, हे दिव्य सिंह, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों में प्रकट हुआ है! सदा निकट, फिर भी दूर स्थित; न दूर, न निकट; ज्ञेय और ज्ञाता दोनों स्वरूप वाले —'
श्लोक 40 (skanda.2.56.40)
ज्ञेयज्ञेयो ज्ञानगम्योऽप्यगम्यो मायातीतो मानमेयोऽनुमानात् । कृत्स्नस्यादिः कृत्स्नकर्त्तानुमंता पाता हर्त्ता विश्वसाक्षिन्नमस्ते
jñeyajñeyo jñānagamyo'pyagamyo māyātīto mānameyo'numānāt kṛtsnasyādiḥ kṛtsnakarttānumaṁtā pātā harttā viśvasākṣinnamaste
'— ज्ञेय, अज्ञेय, ज्ञान से प्राप्य, फिर भी अगम्य, माया से परे, फिर भी अनुमान से मापे जाने वाले; समस्त के आदि, समस्त के कर्ता, अनुमंता, पालक, संहारक, विश्व के साक्षी — तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 41 (skanda.2.56.41)
दुःखध्वंसस्यैकहेतुं न हेतुं भेत्तुं छेत्तुं संशयानग्रजातम् । ज्योतीरूप ज्ञानरूप प्रकाश स्तोमव्यूहाकार निर्माणहेतो
duḥkhadhvaṁsasyaikahetuṁ na hetuṁ bhettuṁ chettuṁ saṁśayānagrajātam jyotīrūpa jñānarūpa prakāśa stomavyūhākāra nirmāṇaheto
'— दुःख के नाश के एकमात्र कारण, फिर भी स्वयं अकारण; आदि संशयों को भेदने-छेदने वाले; हे ज्योतिस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, प्रकाश, स्तुति-समूहों के आकार, समस्त रचना के हेतु —'
श्लोक 42 (skanda.2.56.42)
त्वत्पादब्जे भक्तिमग्र्यां सदा मे देहि स्वामिन्मूलभूतां चतुर्णाम् । श्रौतैः स्मार्तैर्नित्ययुक्ता जनास्ते दीनास्तिष्ठन्त्यत्र बद्धा भवाब्धौ
tvatpādabje bhaktimagryāṁ sadā me dehi svāminmūlabhūtāṁ caturṇām śrautaiḥ smārtairnityayuktā janāste dīnāstiṣṭhantyatra baddhā bhavābdhau
'— हे स्वामिन्! अपने चरण-कमल में सदा मुझे वह श्रेष्ठ भक्ति दो, जो चारों पुरुषार्थों की जड़ है; श्रौत-स्मार्त कर्मों में सदा लगे रहने वाले लोग यहाँ दीन होकर भवसागर में बंधे रहते हैं।'
श्लोक 43 (skanda.2.56.43)
अनन्तपादं बहुहस्तनेत्रमनंतकर्णं ककुभौघवस्त्रम् । दिवानिशानाथसुकुण्डलाढ्यं नक्षत्रमाला कृतचारुहारम्
anantapādaṁ bahuhastanetramanaṁtakarṇaṁ kakubhaughavastram divāniśānāthasukuṇḍalāḍhyaṁ nakṣatramālā kṛtacāruhāram
'— अनंत चरणों वाले, अनेक हाथों-नेत्रों वाले, अनंत कानों वाले, दिशाओं के समूह ही जिनका वस्त्र है; दिन-रात के स्वामी सूर्य-चंद्र रूपी सुंदर कुंडलों से सुशोभित, नक्षत्र-माला से रचित सुंदर हार धारण किए —'
श्लोक 44 (skanda.2.56.44)
त्वामद्भुतं दिव्यनृसिंहमूर्तिं भक्तेष्टपूर्तिं शरणं प्रपद्ये । यत्पादपद्म हि पितामहस्य किरीटरत्नैर्विकचत्वमेति
tvāmadbhutaṁ divyanṛsiṁhamūrtiṁ bhakteṣṭapūrtiṁ śaraṇaṁ prapadye yatpādapadma hi pitāmahasya kirīṭaratnairvikacatvameti
'— उस अद्भुत, दिव्य नृसिंह-रूप, भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले तुम्हारी शरण में मैं आता हूँ; जिनके चरण-कमल पितामह के मुकुट-रत्नों से ही चमक पाते हैं।'
श्लोक 45 (skanda.2.56.45)
यदीयपादाब्जयुगांतभूमौ लुठेच्छिरो यस्य हि पांचभौतम् । तद्दिव्यपादं शिरसा वहंति सुरेन्द्रनार्यः खलु तं नमामि
yadīyapādābjayugāṁtabhūmau luṭhecchiro yasya hi pāṁcabhautam taddivyapādaṁ śirasā vahaṁti surendranāryaḥ khalu taṁ namāmi
'जिनके चरण-युगल के नीचे किसी का भी पंचभौतिक सिर लोट सकता है, उस दिव्य चरण को देवेंद्र की पत्नियाँ भी सिर पर धारण करती हैं — मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।'
श्लोक 46 (skanda.2.56.46)
तद्दिव्यसिंहं हतपापसंघं पादाश्रितानां करुणाब्धिसिंहम् । पादाऽब्जसंघट्टविघट्टमानब्रह्मांडभांडं प्रणमामि चण्डम्
taddivyasiṁhaṁ hatapāpasaṁghaṁ pādāśritānāṁ karuṇābdhisiṁham pādā'bjasaṁghaṭṭavighaṭṭamānabrahmāṁḍabhāṁḍaṁ praṇamāmi caṇḍam
'उस दिव्य सिंह को, जो पापों के समूह के नाशक हैं, चरणाश्रितों के लिए करुणा-सागर सिंह हैं, जिनके चरण-कमलों के स्पर्श मात्र से ब्रह्मांड-भांड टूट जाता है — उस प्रचंड को मैं प्रणाम करता हूँ।'
श्लोक 47 (skanda.2.56.47)
सटाच्छटाकंपनशीर्यमाणघनौघविद्रावितपापसंघम् । चंडाट्टहासांतरिताब्दशब्दं त्रिलोकगर्भं नृहरिं नमामि
saṭācchaṭākaṁpanaśīryamāṇaghanaughavidrāvitapāpasaṁgham caṁḍāṭṭahāsāṁtaritābdaśabdaṁ trilokagarbhaṁ nṛhariṁ namāmi
'जिनके अयाल के हिलने से बिखरते घने बादल-समूह पापों के समूह को भगा देते हैं; जिनके प्रचंड अट्टहास से बादलों की गर्जना भी दब जाती है; जो तीनों लोकों को अपने उदर में धारण करते हैं — उस नृहरि को मैं प्रणाम करता हूँ।'
श्लोक 48 (skanda.2.56.48)
नमस्ते नमस्ते नमस्तेऽद्य विष्णो परित्राहि दीनानुकंपिन्ननाथम् । भवंतं समासाद्य मे देहबन्धो मुरारे न संसारकारागृहेऽस्तु
namaste namaste namaste'dya viṣṇo paritrāhi dīnānukaṁpinnanātham bhavaṁtaṁ samāsādya me dehabandho murāre na saṁsārakārāgṛhe'stu
'हे विष्णु! तुम्हें आज बार-बार नमस्कार है — दीनों और अनाथों पर करुणा करने वाले, मेरी रक्षा करो। हे मुरारे! तुम्हें पाकर मेरे इस देह-बंधन को अब संसार के कारागार में न रहने दो।'
श्लोक 49 (skanda.2.56.49)
हयमेधसहस्रांते यथा त्वां चर्मचक्षुषा । दिव्यरूपं प्रपश्यामि तथानुक्रोशय प्रभो
hayamedhasahasrāṁte yathā tvāṁ carmacakṣuṣā divyarūpaṁ prapaśyāmi tathānukrośaya prabho
'जैसे सहस्र अश्वमेध यज्ञों के अंत में मैं तुम्हारे दिव्य रूप को इन्हीं चर्म-नेत्रों से देख सकूँ, वैसी ही कृपा करो, हे प्रभो।'
श्लोक 50 (skanda.2.56.50)
यथा चेज्यासहस्रं मे निर्विघ्नं तत्समाप्यते । यज्ञेश त्वत्प्रसादान्मे तथा सान्निध्यमस्तु ते
yathā cejyāsahasraṁ me nirvighnaṁ tatsamāpyate yajñeśa tvatprasādānme tathā sānnidhyamastu te
'जैसे मेरा सहस्र-यज्ञ निर्विघ्न रूप से पूर्ण हो जाए, हे यज्ञेश, तुम्हारी कृपा से वैसी ही तुम्हारी सन्निधि मुझे प्राप्त हो।'
श्लोक 51 (skanda.2.56.51)
कोटयः पापराशीनां क्षयं यांति यथा प्रभो । धर्मार्थकामा हस्तस्था नैषां चित्रं स्तुवंति ये । मोक्षस्य भाजनं विष्णो ते नरा ये तवाश्रयाः
koṭayaḥ pāparāśīnāṁ kṣayaṁ yāṁti yathā prabho dharmārthakāmā hastasthā naiṣāṁ citraṁ stuvaṁti ye mokṣasya bhājanaṁ viṣṇo te narā ye tavāśrayāḥ
'हे प्रभो! तुम्हारा दर्शन करने वालों के करोड़ों पाप-समूह नष्ट हो जाते हैं; धर्म, अर्थ और काम तो जो तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके हाथ में ही रहते हैं — इसमें क्या आश्चर्य!'
श्लोक 52 (skanda.2.56.52)
स्तुत्वेत्थं दिव्य सिंहं तं भूपतिर्हष्टमानसः । दण्डपातप्रणामेन जगाम धरणीं मुहुः
stutvetthaṁ divya siṁhaṁ taṁ bhūpatirhaṣṭamānasaḥ daṇḍapātapraṇāmena jagāma dharaṇīṁ muhuḥ
'हे विष्णु! जो मनुष्य तुम्हारी शरण में हैं, वे ही मोक्ष के भाजन हैं।' इस प्रकार उस दिव्य सिंह की स्तुति कर राजा हर्षित मन से बार-बार दंड की भाँति गिरकर पृथ्वी पर प्रणाम करने लगा।
श्लोक 53 (skanda.2.56.53)
जैमिनिरुवाच । क्षेत्रं तन्नरसिंहस्य ब्रह्मणा निर्मितं पुरा । इन्द्रद्युम्नानुग्रहाय सर्वलोकहिताय च
jaiminiruvāca kṣetraṁ tannarasiṁhasya brahmaṇā nirmitaṁ purā indradyumnānugrahāya sarvalokahitāya ca
जैमिनि ने कहा — नृसिंह का वह क्षेत्र पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा इंद्रद्युम्न पर अनुग्रह और समस्त लोकों के हित के लिए रचा गया था।
श्लोक 54 (skanda.2.56.54)
पश्यंति ये नृसिंहं तं शंभुना सह संस्थितम् । न देहबन्धं ते विप्राः प्राप्नुवंति न संशयः
paśyaṁti ye nṛsiṁhaṁ taṁ śaṁbhunā saha saṁsthitam na dehabandhaṁ te viprāḥ prāpnuvaṁti na saṁśayaḥ
जो लोग शंभु के साथ स्थित उस नृसिंह का दर्शन करते हैं, हे द्विजो, वे फिर देह के बंधन को नहीं पाते — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 55 (skanda.2.56.55)
मनसा वांछितं यद्यत्प्राप्नुवंति ततोऽधिकम् । स्तोत्रेणानेन ये दिव्यसिंहरूपं स्तुवंति वै
manasā vāṁchitaṁ yadyatprāpnuvaṁti tato'dhikam stotreṇānena ye divyasiṁharūpaṁ stuvaṁti vai
जो इस स्तोत्र से दिव्य सिंह-रूप की स्तुति करते हैं, वे मन में जो-जो चाहते हैं, उससे भी अधिक प्राप्त करते हैं।
श्लोक 56 (skanda.2.56.56)
सर्वकामप्रदो देवस्तस्य मुक्तिं प्रयच्छति । ज्येष्ठशुक्लद्वादशी या स्वातीनक्षत्रसंयुता
sarvakāmaprado devastasya muktiṁ prayacchati jyeṣṭhaśukladvādaśī yā svātīnakṣatrasaṁyutā
वह सर्वकामप्रद देव उसे मुक्ति भी प्रदान करते हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी, जो स्वाति नक्षत्र से युक्त हो,
श्लोक 57 (skanda.2.56.57)
तस्यां प्रतिष्ठितः क्षेत्रे दिव्यसिंहो महर्षिणा । सुतेन ब्रह्मणः साक्षात्तत्र पश्यंति तं च ये
tasyāṁ pratiṣṭhitaḥ kṣetre divyasiṁho maharṣiṇā sutena brahmaṇaḥ sākṣāttatra paśyaṁti taṁ ca ye
उस दिन उस क्षेत्र में महर्षि द्वारा, ब्रह्मा के साक्षात् पुत्र द्वारा, दिव्य सिंह प्रतिष्ठित हुए थे। जो वहाँ उनका दर्शन करते हैं,
श्लोक 58 (skanda.2.56.58)
वाजिमेधसहस्रस्य फलं साग्रं लभंति ते । पञ्चामृतैर्वा क्षीरेण नारिकेलरसेन वा
vājimedhasahasrasya phalaṁ sāgraṁ labhaṁti te pañcāmṛtairvā kṣīreṇa nārikelarasena vā
वे सहस्र अश्वमेध यज्ञ का संपूर्ण फल प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य पंचामृत से, दूध से, या नारियल-जल से,
श्लोक 59 (skanda.2.56.59)
स्नापयंति नरा ये वै अथवा गन्धवारिणा । पूजयित्वा महासिंहमुपचारैः सपायसैः
snāpayaṁti narā ye vai athavā gandhavāriṇā pūjayitvā mahāsiṁhamupacāraiḥ sapāyasaiḥ
अथवा सुगंधित जल से उन्हें स्नान कराते हैं, और महासिंह की पायसादि उपचारों से पूजा करते हैं,
श्लोक 60 (skanda.2.56.60)
जपाकुसुममाल्यैश्च गन्धमाल्यैः सुशोभनैः । धूपदीपैः सकर्पूरैस्तांबूलैरतिशोभनैः
japākusumamālyaiśca gandhamālyaiḥ suśobhanaiḥ dhūpadīpaiḥ sakarpūraistāṁbūlairatiśobhanaiḥ
जपाकुसुम की मालाओं से, सुंदर सुगंधित पुष्पहारों से, कर्पूरयुक्त धूप-दीप से, अत्यंत सुंदर पान-सुपारी से,
श्लोक 61 (skanda.2.56.61)
सुगीर्भिः स्तुतिपाठैश्च जयशब्दैस्तथोच्चकै । प्रदक्षिणप्रणामैश्च दानैर्ब्राह्मणतर्पणैः । सन्तोष्य नरसिंहं तं ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्
sugīrbhiḥ stutipāṭhaiśca jayaśabdaistathoccakai pradakṣiṇapraṇāmaiśca dānairbrāhmaṇatarpaṇaiḥ santoṣya narasiṁhaṁ taṁ brahmalokamavāpnuyāt
मधुर गीतों और स्तुति-पाठों से, ऊँचे स्वर में जय-जयकार से, प्रदक्षिणा और प्रणाम से, दान और ब्राह्मण-तर्पण से — इस प्रकार नृसिंह को संतुष्ट कर मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 62 (skanda.2.56.62)
वैशाखस्य चतुर्दश्यां सौरिवारेऽनिलर्क्षके । आद्यावतारः सिंहस्य प्रदोषसमये द्विजाः
vaiśākhasya caturdaśyāṁ saurivāre'nilarkṣake ādyāvatāraḥ siṁhasya pradoṣasamaye dvijāḥ
वैशाख मास की चतुर्दशी को, शनिवार के दिन, स्वाति नक्षत्र में, संध्या के समय — यही सिंह का आद्य अवतरण-काल है, हे द्विजो;
श्लोक 63 (skanda.2.56.63)
तस्यां संपूज्य विधिवन्नरसिंहं समाहितः । जन्मकोटिसहस्रैस्तु पापराशिः सुसंचितः । दह्यते तत्क्षणादेव तूलराशिरिवाग्निना
tasyāṁ saṁpūjya vidhivannarasiṁhaṁ samāhitaḥ janmakoṭisahasraistu pāparāśiḥ susaṁcitaḥ dahyate tatkṣaṇādeva tūlarāśirivāgninā
उस दिन विधिपूर्वक, एकाग्रचित्त होकर नृसिंह की पूजा करने से, हज़ारों-करोड़ों जन्मों में संचित पाप-राशि उसी क्षण भस्म हो जाती है, जैसे रुई का ढेर अग्नि से।
श्लोक 64 (skanda.2.56.64)
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा नमस्कृत्वा प्रणिपत्य च भक्तितः । स्तुत्वा विमुच्यते पापैर्निर्मोकेन भुजंगवत्
dṛṣṭvā spṛṣṭvā namaskṛtvā praṇipatya ca bhaktitaḥ stutvā vimucyate pāpairnirmokena bhujaṁgavat
दर्शन, स्पर्श, नमस्कार, भक्तिपूर्वक प्रणाम और स्तुति से मनुष्य पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है जैसे सर्प अपनी केंचुली से।
श्लोक 65 (skanda.2.56.65)
न तस्य व्याधयः संति न शोका नाधयस्तथा । सर्वान्कामानवाप्नोति हयमेधफलं तथा
na tasya vyādhayaḥ saṁti na śokā nādhayastathā sarvānkāmānavāpnoti hayamedhaphalaṁ tathā
उसे कोई रोग नहीं होते, न शोक, न मानसिक पीड़ाएँ; वह समस्त कामनाओं को पाता है, और अश्वमेध यज्ञ का फल भी।
श्लोक 66 (skanda.2.56.66)
समीपे तस्य भो विप्रा यजनं दानमेव च । अन्यानि पुण्यकर्माणि कृतानि च सकृन्नरैः । कोटिकोटिगुणानि स्युर्नरसिंहप्रसादतः
samīpe tasya bho viprā yajanaṁ dānameva ca anyāni puṇyakarmāṇi kṛtāni ca sakṛnnaraiḥ koṭikoṭiguṇāni syurnarasiṁhaprasādataḥ
हे विप्रो! उनके समीप किया गया यज्ञ, दान, अथवा मनुष्यों द्वारा एक बार भी किए गए अन्य पुण्य-कर्म, नृसिंह की कृपा से करोड़ों-करोड़ गुना हो जाते हैं।