वैष्णव खण्ड · अध्याय 57
महासभा और सहस्र अश्वमेध यज्ञों का संकल्प
श्लोक 1 (skanda.2.57.1)
मुनय ऊचुः । प्रतिष्ठिते नारसिंहे क्षेत्रे तस्मिन्नराधिपः । किं चकार मुने ब्रूहि परं कौतूहलं तु तत्
munaya ūcuḥ pratiṣṭhite nārasiṁhe kṣetre tasminnarādhipaḥ kiṁ cakāra mune brūhi paraṁ kautūhalaṁ tu tat
मुनियों ने कहा — जब उस क्षेत्र में नृसिंह प्रतिष्ठित हो गए, तब राजा ने क्या किया, हे मुनि? कहिए, यही हमारा परम कौतूहल है।
श्लोक 2 (skanda.2.57.2)
जैमिनिरुवाच । इन्द्रादींस्त्रिदशान्सर्वान्न्यमन्त्रयत पूर्वतः । ततः स मन्त्रयामास ऋषीन्विप्रान्सहस्रशः
jaiminiruvāca indrādīṁstridaśānsarvānnyamantrayata pūrvataḥ tataḥ sa mantrayāmāsa ṛṣīnviprānsahasraśaḥ
जैमिनि ने कहा — पहले उन्होंने इंद्र आदि समस्त तैंतीस देवताओं को आमंत्रित किया; फिर उन्होंने सहस्रों ऋषियों और ब्राह्मणों को आमंत्रित किया,
श्लोक 3 (skanda.2.57.3)
अध्येतॄंश्चतुरो वेदान्सषडंगपदक्रमैः । यज्ञविद्यासु कुशलान्मीमांसापरिनिष्ठितान्
adhyetṝṁścaturo vedānsaṣaḍaṁgapadakramaiḥ yajñavidyāsu kuśalānmīmāṁsāpariniṣṭhitān
— चारों वेदों के छह अंगों और पदक्रम सहित अध्येताओं को, यज्ञ-विद्या में कुशल और मीमांसा में पूर्ण निष्णात लोगों को,
श्लोक 4 (skanda.2.57.4)
सभाष्यकल्पसूत्रैस्तु परिनिष्ठितकर्मिणः । अष्टादशसु विद्यासु कुशलान्धर्मकोविदान्
sabhāṣyakalpasūtraistu pariniṣṭhitakarmiṇaḥ aṣṭādaśasu vidyāsu kuśalāndharmakovidān
— भाष्य और कल्पसूत्रों द्वारा कर्मकांड में निपुण लोगों को, अठारह विद्याओं में कुशल, धर्म के ज्ञाताओं को,
श्लोक 5 (skanda.2.57.5)
सदाचारावदातांश्च कुलीनान्सत्यवादिनः । वैष्णवांश्च विशेषेण मंत्रयामास सादरम्
sadācārāvadātāṁśca kulīnānsatyavādinaḥ vaiṣṇavāṁśca viśeṣeṇa maṁtrayāmāsa sādaram
— सदाचार से उज्ज्वल, कुलीन, सत्यवादी लोगों को; और विशेष रूप से वैष्णवों को उन्होंने आदरपूर्वक आमंत्रित किया।
श्लोक 6 (skanda.2.57.6)
त्रैलोक्ये ये च राजानः सिद्धाः सप्तर्षयो द्विजाः । सच्छूद्रा वणिजो द्वीपपतयश्च निमंत्रिताः
trailokye ye ca rājānaḥ siddhāḥ saptarṣayo dvijāḥ sacchūdrā vaṇijo dvīpapatayaśca nimaṁtritāḥ
त्रैलोक्य में जो भी राजा, सिद्ध, सप्तर्षि, द्विज, सच्छूद्र, वणिक् और द्वीपों के स्वामी थे — सबको निमंत्रित किया गया।
श्लोक 7 (skanda.2.57.7)
क्रोशद्वयमिता विप्राः सभासीत्तस्य भूपतेः । पाषाणघटिता सोच्चा सुधया सानुलेपिता
krośadvayamitā viprāḥ sabhāsīttasya bhūpateḥ pāṣāṇaghaṭitā soccā sudhayā sānulepitā
हे द्विजो! उस राजा की सभा दो कोस तक विस्तृत थी; पत्थर से निर्मित, ऊँची, चूने से लिपी हुई,
श्लोक 8 (skanda.2.57.8)
क्वचिद्रत्नमयी भूमिः क्वचित्कांचननिर्मिता । स्फाटिकी राजती चैव यथायोग्यं कृतस्थली
kvacidratnamayī bhūmiḥ kvacitkāṁcananirmitā sphāṭikī rājatī caiva yathāyogyaṁ kṛtasthalī
— कहीं रत्नमयी भूमि, कहीं सोने से निर्मित, कहीं स्फटिक की, कहीं चाँदी की — प्रत्येक स्थान यथोचित रूप से बनाया गया था;
श्लोक 9 (skanda.2.57.9)
स्तंभै रत्नमयैः प्रोच्चैर्दुकूलपरिवेष्टितैः । चारुचंद्रातपाढ्या तु गन्धमाल्यैः सचामरैः
staṁbhai ratnamayaiḥ proccairdukūlapariveṣṭitaiḥ cārucaṁdrātapāḍhyā tu gandhamālyaiḥ sacāmaraiḥ
— रत्नमयी ऊँचे स्तंभों वाली, दुकूल-वस्त्रों से लिपटी हुई, सुंदर चंद्र-सी छतरी से युक्त, गंध-माला और चामरों से सुशोभित;
श्लोक 10 (skanda.2.57.10)
मुक्तादामांतरस्थैश्च चारुवातायना शुभा । कृष्णागुरुस्नेहसिक्ता श्रीखण्डसलिलोक्षिता
muktādāmāṁtarasthaiśca cāruvātāyanā śubhā kṛṣṇāgurusnehasiktā śrīkhaṇḍasalilokṣitā
— मोतियों की मालाओं के बीच सुंदर झरोखों से युक्त, मंगलमयी, कृष्णागुरु के तेल से सिंचित, चंदन-जल से आर्द्र;
श्लोक 11 (skanda.2.57.11)
सर्वर्त्तुकुसुमाकीर्णा प्रांतोपवनसंवृता । वाप्यः स्फटिकसोपानाः पद्मकद्वारमंडिताः
sarvarttukusumākīrṇā prāṁtopavanasaṁvṛtā vāpyaḥ sphaṭikasopānāḥ padmakadvāramaṁḍitāḥ
— सभी ऋतुओं के पुष्पों से बिखरी हुई, चारों ओर उपवनों से घिरी हुई; उसकी बावड़ियों में स्फटिक की सीढ़ियाँ, कमल-द्वारों से अलंकृत;
श्लोक 12 (skanda.2.57.12)
चक्रवाकैः प्लवैर्हंसैः सारसैर्मधुरस्वनैः । व्याप्तांतराः स्वच्छशीतसुगंधमधुरांभसः
cakravākaiḥ plavairhaṁsaiḥ sārasairmadhurasvanaiḥ vyāptāṁtarāḥ svacchaśītasugaṁdhamadhurāṁbhasaḥ
— चक्रवाक, जलपक्षी, हंस और मधुर स्वर वाले सारसों से भरी हुई, स्वच्छ, शीतल, सुगंधित और मधुर जल वाली;
श्लोक 13 (skanda.2.57.13)
परितः शतशस्तस्याः सुखावतरणा द्विजाः । उपच्छायाविरचनाः शोभमानाः समंततः
paritaḥ śataśastasyāḥ sukhāvataraṇā dvijāḥ upacchāyāviracanāḥ śobhamānāḥ samaṁtataḥ
— उसके चारों ओर सैकड़ों सुखद स्नान-घाट थे, हे द्विजो, और छाया की व्यवस्था चारों ओर शोभायमान थी।
श्लोक 14 (skanda.2.57.14)
यज्ञशाला मरुत्तस्य यथासीद्भो द्विजोत्तमाः । तथेंद्रद्युम्नभूपस्य रचिता विश्वकर्मणा
yajñaśālā maruttasya yathāsīdbho dvijottamāḥ tatheṁdradyumnabhūpasya racitā viśvakarmaṇā
जैसी मरुत्त राजा की यज्ञशाला थी, हे श्रेष्ठ द्विजो, वैसी ही इंद्रद्युम्न राजा की भी विश्वकर्मा द्वारा रची गई थी।
श्लोक 15 (skanda.2.57.15)
शुभेऽह्नि शुभनक्षत्रे वासयित्वा सभासदः । राज्ञः सिंहासनासीनान्दृष्ट्वासीनानृषीनपि
śubhe'hni śubhanakṣatre vāsayitvā sabhāsadaḥ rājñaḥ siṁhāsanāsīnāndṛṣṭvāsīnānṛṣīnapi
शुभ दिन, शुभ नक्षत्र में, सभासदों को बिठाकर, राजाओं को सिंहासनों पर तथा ऋषियों को भी बैठा देखकर,
श्लोक 16 (skanda.2.57.16)
ससिद्धान्ब्रह्मर्षिगणान्बहुमूल्यकुथस्थितान् । देवान्कांचनपीठस्थान्यथायोग्यमथ द्विजान्
sasiddhānbrahmarṣigaṇānbahumūlyakuthasthitān devānkāṁcanapīṭhasthānyathāyogyamatha dvijān
— सिद्धों और ब्रह्मर्षि-समूहों को बहुमूल्य आसनों पर, देवताओं को सोने के पीठों पर, और द्विजों को यथायोग्य आसनों पर बैठाकर,
श्लोक 17 (skanda.2.57.17)
वरासनस्थानन्यांश्च यथादेशं सुखस्थितान् । मध्ये नृपाणां देवानामृषीणां च शचीपतिम्
varāsanasthānanyāṁśca yathādeśaṁ sukhasthitān madhye nṛpāṇāṁ devānāmṛṣīṇāṁ ca śacīpatim
— और अन्य लोगों को श्रेष्ठ आसनों पर, यथायोग्य स्थान पर सुखपूर्वक बिठाकर; राजाओं, देवताओं और ऋषियों के मध्य शचीपति (इंद्र) को,
श्लोक 18 (skanda.2.57.18)
साम्राज्यलक्षणे स्वस्य रत्नसिंहासने स्थितम् । दिव्यैर्माल्यैस्तथा गंधैर्वासोभिर्विष्टरादिभिः
sāmrājyalakṣaṇe svasya ratnasiṁhāsane sthitam divyairmālyaistathā gaṁdhairvāsobhirviṣṭarādibhiḥ
— अपने साम्राज्य के चिह्न-स्वरूप रत्न-सिंहासन पर बिठाकर, दिव्य मालाओं, गंधों, वस्त्रों तथा आसनों आदि से,
श्लोक 19 (skanda.2.57.19)
पुरोधसा समं पूर्वमर्चयामास ऋद्धिमत् । विनीतो दीनवत्तस्य चक्रे पूजां तथा नृपः
purodhasā samaṁ pūrvamarcayāmāsa ṛddhimat vinīto dīnavattasya cakre pūjāṁ tathā nṛpaḥ
— पहले पुरोहित के साथ मिलकर अत्यंत समृद्धिपूर्वक उनकी पूजा की; और विनम्र राजा ने भी, मानो एक दीन व्यक्ति के समान, स्वयं उनकी पूजा की।
श्लोक 20 (skanda.2.57.20)
आश्चर्यं मन्यतेऽस्यासौ त्रैलोक्येशोऽपि तद्यथा । ततः सिद्धान्देवमुनीनचर्यन्निंद्रवत्तदा
āścaryaṁ manyate'syāsau trailokyeśo'pi tadyathā tataḥ siddhāndevamunīnacaryanniṁdravattadā
त्रैलोक्येश्वर इंद्र भी इसे आश्चर्य मानते थे; फिर उन्होंने सिद्धों और देव-मुनियों की पूजा वैसे ही की जैसे इंद्र की,
श्लोक 21 (skanda.2.57.21)
विस्मयं जनयामास कुवेरस्याप्यधिश्रियः । ततो देवान्समानर्च प्रभूतस्वस्वसंपदः
vismayaṁ janayāmāsa kuverasyāpyadhiśriyaḥ tato devānsamānarca prabhūtasvasvasaṁpadaḥ
— जिससे धन के स्वामी कुबेर को भी विस्मय हुआ; फिर उन्होंने देवताओं की पूजा की, अपनी अपार संपत्ति के अनुरूप,
श्लोक 22 (skanda.2.57.22)
उपचारैर्महीनाथः सम्यगव्यग्रमानसः । राज्ञः संपूजयामास राजयोग्यैः परिच्छदैः
upacārairmahīnāthaḥ samyagavyagramānasaḥ rājñaḥ saṁpūjayāmāsa rājayogyaiḥ paricchadaiḥ
— महीपति ने उपचारों द्वारा, पूर्ण अव्यग्र मन से; और उन्होंने राजाओं की भी राज-योग्य साज-सज्जा से भलीभाँति पूजा की।
श्लोक 23 (skanda.2.57.23)
यथा ते मेनिरे भूपा भवामः सांप्रतं वयम् । सत्यं राज्यं क्रमात्प्राप्तं नेदृशश्च परिच्छदः
yathā te menire bhūpā bhavāmaḥ sāṁprataṁ vayam satyaṁ rājyaṁ kramātprāptaṁ nedṛśaśca paricchadaḥ
जिससे वे राजा सोचने लगे — 'क्या हम भी अब तक ऐसे ही थे? यद्यपि हमें भी क्रमशः सत्य राज्य प्राप्त हुआ, पर ऐसा वैभव कभी नहीं था।'
श्लोक 24 (skanda.2.57.24)
आनर्च वैष्णवान्भूय उपचारैः समानयन्। शांता अपि यथा चित्रं मेनिरे विषयागमम्
ānarca vaiṣṇavānbhūya upacāraiḥ samānayan śāṁtā api yathā citraṁ menire viṣayāgamam
उन्होंने वैष्णवों की भी आगे बढ़कर उपचारों सहित पूजा की, इतनी कि शांत स्वभाव वाले भी इस वैभव के आगमन को विचित्र मानने लगे।
श्लोक 25 (skanda.2.57.25)
ततो विप्रान्बाहुजातान्वैश्यान्मुनिपुरःसरम् । सम्यक्प्रपूजयामास सत्त्वोद्रिक्तो महीपतिः
tato viprānbāhujātānvaiśyānmunipuraḥsaram samyakprapūjayāmāsa sattvodrikto mahīpatiḥ
फिर मुनियों के आगे-आगे ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की भी उन्होंने भलीभाँति पूजा की — सत्त्वगुण से परिपूर्ण उस महीपति ने।
श्लोक 26 (skanda.2.57.26)
अन्यांश्च सचिवद्वारा पूजयित्वा ससंभ्रमः । दृष्टः स विनयान्नम्रः कृतांजलिपुटस्तथा
anyāṁśca sacivadvārā pūjayitvā sasaṁbhramaḥ dṛṣṭaḥ sa vinayānnamraḥ kṛtāṁjalipuṭastathā
और मंत्रियों के द्वारा शेष सबकी पूजा करवाकर, व्याकुलतापूर्ण विनम्रता से नत, हाथ जोड़े हुए वे उपस्थित दिखे।
श्लोक 27 (skanda.2.57.27)
महेंद्रमुच्चैराहेदं नारदेन पुरोधसा
maheṁdramuccairāhedaṁ nāradena purodhasā
पुरोहित नारद के माध्यम से उन्होंने महेंद्र से ऊँचे स्वर में यह कहा —
श्लोक 28 (skanda.2.57.28)
इन्द्रद्युम्न उवाच । तव प्रसादाद्देवेश इच्छामीदं प्रसीद मे । क्रतुना हयमेधेन प्रयक्ष्ये यज्ञपूरुषम्
indradyumna uvāca tava prasādāddeveśa icchāmīdaṁ prasīda me kratunā hayamedhena prayakṣye yajñapūruṣam
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'हे देवेश! आपकी कृपा से मैं यह चाहता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हों — अश्वमेध यज्ञ द्वारा मैं यज्ञ-पुरुष का यजन करना चाहता हूँ।
श्लोक 29 (skanda.2.57.29)
अनुजानीहि मां देव क्रतूनामीश्वरो भवान् । त्वदाज्ञापालकाः सर्वे त्रैलोक्ये निवसंति ये
anujānīhi māṁ deva kratūnāmīśvaro bhavān tvadājñāpālakāḥ sarve trailokye nivasaṁti ye
— मुझे अनुज्ञा दीजिए, हे देव; आप ही यज्ञों के स्वामी हैं। त्रिलोक में जो भी निवास करते हैं, वे सब आपकी ही आज्ञा का पालन करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.2.57.30)
यावत्क्रतुसहस्रस्य संस्था च भवति प्रभो । तावत्त्वं त्रिदशैः सार्द्धं सदोमध्यगतो वस
yāvatkratusahasrasya saṁsthā ca bhavati prabho tāvattvaṁ tridaśaiḥ sārddhaṁ sadomadhyagato vasa
— जब तक सहस्र यज्ञों की पूर्णता न हो, हे प्रभो, तब तक आप देवताओं सहित सदन के मध्य में विराजमान रहें।
श्लोक 31 (skanda.2.57.31)
यष्टुमिच्छामि देवेश नाहं त्वत्पदलिप्सया । सर्वेषां वेत्सि देवेश मनोवृत्तिं सदा प्रभो
yaṣṭumicchāmi deveśa nāhaṁ tvatpadalipsayā sarveṣāṁ vetsi deveśa manovṛttiṁ sadā prabho
— हे देवेश! मैं यजन करना चाहता हूँ, आपके पद की इच्छा से नहीं; हे देवेश, हे प्रभो! आप सदा सबके मन की वृत्ति को जानते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.57.32)
युष्माकं पूर्वदृष्टोऽत्र वपुष्मान्माधवः प्रभुः । उपासनायां सोऽयं यो वालुकाभिस्तिरोदधे
yuṣmākaṁ pūrvadṛṣṭo'tra vapuṣmānmādhavaḥ prabhuḥ upāsanāyāṁ so'yaṁ yo vālukābhistirodadhe
— वह शरीरधारी माधव प्रभु, जो पहले आप सबके द्वारा उपासना के स्थान में देखे गए थे, वे ही अब बालू से छिप गए हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.57.33)
तस्य भूयः प्रकाशार्थं वाजिमेधसहस्रकम्। करिष्ये वचनादिंद्र चतुरास्यस्य शासनात् । पुनः प्रकाशिते तस्मिञ्छ्रेयो वोऽपि भविष्यति
tasya bhūyaḥ prakāśārthaṁ vājimedhasahasrakam kariṣye vacanādiṁdra caturāsyasya śāsanāt punaḥ prakāśite tasmiñchreyo vo'pi bhaviṣyati
— उनके पुनः प्रकट होने के लिए मैं सहस्र अश्वमेध यज्ञ करूँगा, हे इंद्र, चतुर्मुख ब्रह्मा के वचन और आदेश से; उनके फिर प्रकट होने पर तुम सबका भी कल्याण होगा।'
श्लोक 34 (skanda.2.57.34)
इति विज्ञापिते राज्ञा महेंद्रप्रमुखाः सुराः । अन्तर्द्धानोतरं या च श्रुता पूर्वं सरस्वती
iti vijñāpite rājñā maheṁdrapramukhāḥ surāḥ antarddhānotaraṁ yā ca śrutā pūrvaṁ sarasvatī
राजा द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, महेंद्र आदि देवताओं को उस अशरीरी सरस्वती-वाणी का स्मरण हुआ, जो पहले (भगवान् के अंतर्धान के बाद) सुनी गई थी।
श्लोक 35 (skanda.2.57.35)
अशरीरां स्मरंतस्तामिदं प्रोचुः प्रहर्षिताः । इन्द्रद्युम्न महात्मासि सत्यं सत्यवतो भुवि
aśarīrāṁ smaraṁtastāmidaṁ procuḥ praharṣitāḥ indradyumna mahātmāsi satyaṁ satyavato bhuvi
उस अशरीरी वाणी को स्मरण करते हुए, प्रसन्न होकर उन्होंने कहा — 'हे इंद्रद्युम्न! तुम सचमुच महात्मा हो, पृथ्वी पर सत्यवादियों में सत्य ही हो।
श्लोक 36 (skanda.2.57.36)
तच्चेष्टितं पुरास्माभिरन्वभावि भविष्यकम् । सहायास्ते भविष्यामः कार्ये त्रैलोक्यपावने
tacceṣṭitaṁ purāsmābhiranvabhāvi bhaviṣyakam sahāyāste bhaviṣyāmaḥ kārye trailokyapāvane
— वह चेष्टा, जो भविष्य में होने वाली थी, हमने पहले ही देख ली थी। हम तुम्हारे इस त्रैलोक्य-पावन कार्य में सहायक बनेंगे,
श्लोक 37 (skanda.2.57.37)
स्रष्टा स जगतां यत्र उद्युक्तः स्वयमेव हि । अत्रैवोवाच भगवानस्माकमपि भूतले
sraṣṭā sa jagatāṁ yatra udyuktaḥ svayameva hi atraivovāca bhagavānasmākamapi bhūtale
— जिसमें स्वयं जगत् के स्रष्टा ही उद्यत हैं। भगवान् ने स्वयं यहीं, इसी पृथ्वी पर, हमसे भी कहा था,
श्लोक 38 (skanda.2.57.38)
प्रविशंस्तदनुक्रोशवशाद्भूयः प्रकाशनम् । करिष्ये दारवं देहमित्येतत्परिनिष्ठितम्
praviśaṁstadanukrośavaśādbhūyaḥ prakāśanam kariṣye dāravaṁ dehamityetatpariniṣṭhitam
— प्रवेश करते हुए, उसी अनुकंपा के कारण — 'मैं फिर से काष्ठ-देह धारण कर प्रकट होऊँगा' — यह पूर्णतः निश्चित है।
श्लोक 39 (skanda.2.57.39)
नात्रास्माकं व्यलीकं तु नेंद्रस्य च महीपते । अस्मद्दिष्टसमुद्योगस्तव नः प्रीतिकारकः
nātrāsmākaṁ vyalīkaṁ tu neṁdrasya ca mahīpate asmaddiṣṭasamudyogastava naḥ prītikārakaḥ
— इसमें न हमारी ओर से और न इंद्र की ओर से, हे राजन्, कोई असत्य है; हमारे द्वारा बताया गया यह उद्यम हम सबको प्रिय ही है।
श्लोक 40 (skanda.2.57.40)
सुखं यजस्व राजेंद्र वैकुंठं भक्तवत्सलम् । क्रतुना हयमेधेन सहस्रपरिवर्तिना
sukhaṁ yajasva rājeṁdra vaikuṁṭhaṁ bhaktavatsalam kratunā hayamedhena sahasraparivartinā
— सुखपूर्वक यजन करो, हे राजेंद्र, भक्तवत्सल वैकुंठ का, सहस्र बार दोहराए जाने वाले अश्वमेध यज्ञ से।
श्लोक 41 (skanda.2.57.41)
दुराराध्यो हि भगवानस्माकं भक्तवत्सलः । वयमप्यत्र देवत्वं त्यक्त्वा भक्ति परायणाः
durārādhyo hi bhagavānasmākaṁ bhaktavatsalaḥ vayamapyatra devatvaṁ tyaktvā bhakti parāyaṇāḥ
— यद्यपि भगवान् हमारे लिए भी दुराराध्य हैं, फिर भी वे भक्तवत्सल हैं; हम भी यहाँ अपने देवत्व को त्यागकर, भक्ति में तत्पर,
श्लोक 42 (skanda.2.57.42)
आराधयामः क्षेत्रेस्मिन्विनीता नररूपिणः । प्रियं हि मानुषे लोके कर्म सिद्ध्यति वै कृतम्
ārādhayāmaḥ kṣetresminvinītā nararūpiṇaḥ priyaṁ hi mānuṣe loke karma siddhyati vai kṛtam
— विनम्र होकर, मनुष्य-रूप धारण कर इस क्षेत्र में उनकी आराधना करेंगे; क्योंकि मनुष्य-लोक में किया गया कर्म ही उन्हें प्रिय होता है और सिद्ध होता है।'
श्लोक 43 (skanda.2.57.43)
जैमिनिरुवाच । इत्युक्ते त्रिदशैः सेंद्रैः परितुष्टांतरात्मना । आरंभार्थं क्रतो राजा भगवंतमपूजयत्
jaiminiruvāca ityukte tridaśaiḥ seṁdraiḥ parituṣṭāṁtarātmanā āraṁbhārthaṁ krato rājā bhagavaṁtamapūjayat
जैमिनि ने कहा — देवताओं द्वारा इंद्र सहित इस प्रकार कहे जाने पर, अंतःकरण से पूर्ण संतुष्ट राजा ने यज्ञ आरंभ करने के लिए भगवान् की पूजा की,
श्लोक 44 (skanda.2.57.44)
उपचारसहस्रैस्तु यथावत्प्रतिपादितैः । ततः पितृगणान्राजा निरूप्य श्रद्धयान्वितः
upacārasahasraistu yathāvatpratipāditaiḥ tataḥ pitṛgaṇānrājā nirūpya śraddhayānvitaḥ
— सहस्रों उपचारों से, यथाविधि प्रस्तुत किए गए; फिर राजा ने श्रद्धापूर्वक पितृगणों का निर्णय (निर्धारण) कर,
श्लोक 45 (skanda.2.57.45)
सदोगृहगतान्विप्रान्याज्ञिकान्समलंकृतान् । कृत्वेष्टदेवं पुरतो वैकुंठं साग्निहोत्रकम्
sadogṛhagatānviprānyājñikānsamalaṁkṛtān kṛtveṣṭadevaṁ purato vaikuṁṭhaṁ sāgnihotrakam
— सदन-गृह में उपस्थित, यज्ञरत, सुसज्जित ब्राह्मणों को सम्मानित कर, अपने इष्टदेव अग्निहोत्र-सहित वैकुंठ को आगे स्थापित कर,
श्लोक 46 (skanda.2.57.46)
आकांक्षन्कल्पितं लग्नं संवृत्ते स्वस्तिवाचने । उपस्थितः सपत्नीकः शुद्धमांगल्यवेषधृक्
ākāṁkṣankalpitaṁ lagnaṁ saṁvṛtte svastivācane upasthitaḥ sapatnīkaḥ śuddhamāṁgalyaveṣadhṛk
— नियत लग्न की प्रतीक्षा करते हुए, जब स्वस्तिवाचन सम्पन्न हुआ, तब वे पत्नी सहित शुद्ध मंगल-वेष धारण कर उपस्थित हुए,
श्लोक 47 (skanda.2.57.47)
स्वस्ति वाच्य द्विजाञ्छुद्धान्पुण्याहं वृद्धिकर्म च । ततः संभृतसंभारो वरयामास ऋत्विजः
svasti vācya dvijāñchuddhānpuṇyāhaṁ vṛddhikarma ca tataḥ saṁbhṛtasaṁbhāro varayāmāsa ṛtvijaḥ
— और शुद्ध द्विजों से स्वस्तिवाचन, पुण्याह-वाचन तथा वृद्धि-कर्म कराकर, फिर सामग्री एकत्र कर उन्होंने ऋत्विजों का वरण किया।
श्लोक 48 (skanda.2.57.48)
वृतास्ते तु सपत्नीकं दीक्षयंतो नृपोत्तमम् । विहृत्य दीक्षणायेष्टान्न्ययजन्सभ्यचोदिताः
vṛtāste tu sapatnīkaṁ dīkṣayaṁto nṛpottamam vihṛtya dīkṣaṇāyeṣṭānnyayajansabhyacoditāḥ
उन वृत ऋत्विजों ने पत्नी सहित श्रेष्ठ राजा को दीक्षित करते हुए, दीक्षा के उपहार बाँटकर, सभा से प्रेरित होकर यजन किया।
श्लोक 49 (skanda.2.57.49)
प्रणीय तं प्रज्वलंतं वेद्यामाहवनीयकम् । त्रैलोक्यमंगलकरं किं साक्षाद्वैष्णवं महः
praṇīya taṁ prajvalaṁtaṁ vedyāmāhavanīyakam trailokyamaṁgalakaraṁ kiṁ sākṣādvaiṣṇavaṁ mahaḥ
उस प्रज्वलित आहवनीय अग्नि को वेदी पर लाकर — त्रैलोक्य का कल्याण करने वाली, क्या वह साक्षात् वैष्णव तेज ही न थी? —
श्लोक 50 (skanda.2.57.50)
सुप्रोक्षितं चाभिमंत्र्य अनुज्ञाप्य दिगीश्वरान् । मुमुचुस्ते हयं मुख्यमंगेषु शुभलक्षणम्
suprokṣitaṁ cābhimaṁtrya anujñāpya digīśvarān mumucuste hayaṁ mukhyamaṁgeṣu śubhalakṣaṇam
— भलीभाँति प्रोक्षण कर, मंत्रों से अभिमंत्रित कर, दिक्पालों से अनुज्ञा लेकर, उन्होंने शुभ लक्षणों वाले अंगों से युक्त श्रेष्ठ अश्व को छोड़ा।
श्लोक 51 (skanda.2.57.51)
ततः स दीक्षितो राजा वाग्यतो रौरवीं त्वचम् । अधिष्ठाय सदोमध्ये मृत्युंजय इव स्थितः
tataḥ sa dīkṣito rājā vāgyato rauravīṁ tvacam adhiṣṭhāya sadomadhye mṛtyuṁjaya iva sthitaḥ
तब वह दीक्षित राजा, वाणी को संयत कर, मृगचर्म पर बैठकर, सदन के मध्य मानो मृत्युंजय के समान स्थित रहे।
श्लोक 52 (skanda.2.57.52)
निमंत्रितानां मुक्त्यर्थं चक्षुषा संदिदेश वै । सुराणां रत्नपात्राणि महार्घाणि नृपाज्ञया
nimaṁtritānāṁ muktyarthaṁ cakṣuṣā saṁdideśa vai surāṇāṁ ratnapātrāṇi mahārghāṇi nṛpājñayā
उन्होंने केवल दृष्टि से ही निमंत्रित लोगों के भोजन की व्यवस्था का निर्देश दिया; राजा की आज्ञा से देवताओं के लिए बहुमूल्य रत्न-पात्र बनवाए गए —
श्लोक 53 (skanda.2.57.53)
सचिवः कारयामास भोजनाय समृद्धिमत् । शुद्धसौवर्णपात्राणि मुनीनां च महीक्षिताम्
sacivaḥ kārayāmāsa bhojanāya samṛddhimat śuddhasauvarṇapātrāṇi munīnāṁ ca mahīkṣitām
— मंत्री ने भोजन के लिए समृद्धिपूर्ण व्यवस्था करवाई; मुनियों और राजाओं के लिए शुद्ध स्वर्ण-पात्र,
श्लोक 54 (skanda.2.57.54)
द्विजानां भोजनार्थाय नवानि प्रत्यहं द्विजाः । क्षत्रियाणां विशां विप्रा राजतानि शुभानि च
dvijānāṁ bhojanārthāya navāni pratyahaṁ dvijāḥ kṣatriyāṇāṁ viśāṁ viprā rājatāni śubhāni ca
— द्विजों के भोजन के लिए प्रतिदिन नए पात्र, हे द्विजो; और क्षत्रियों तथा वैश्यों के लिए, हे विप्रो, सुंदर चाँदी के पात्र,
श्लोक 55 (skanda.2.57.55)
कांस्यनिर्मलपात्राणि शूद्राणां भोजनाय वै । अहन्यहनि पात्राणि भोजनांते द्विजोत्तमाः
kāṁsyanirmalapātrāṇi śūdrāṇāṁ bhojanāya vai ahanyahani pātrāṇi bhojanāṁte dvijottamāḥ
— शूद्रों के भोजन के लिए स्वच्छ काँसे के पात्र। प्रतिदिन भोजन के अंत में, हे श्रेष्ठ द्विजो, वे पात्र
श्लोक 56 (skanda.2.57.56)
आकरेषु प्रपात्यंते प्रोच्छिष्टदलवज्जनैः । तत्र यज्ञोत्सवे ये वै भोजनाय निमंत्रिताः
ākareṣu prapātyaṁte procchiṣṭadalavajjanaiḥ tatra yajñotsave ye vai bhojanāya nimaṁtritāḥ
— सेवकों द्वारा जूठे पत्तों के समान गड्ढों में डाल दिए जाते थे। उस यज्ञोत्सव में जो भी भोजन के लिए निमंत्रित थे,
श्लोक 57 (skanda.2.57.57)
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च प्रपौत्राश्चैव संततिः । नित्यं पंचरसान्नानि बहुमानपुरःसरम्
teṣāṁ putrāśca pautrāśca prapautrāścaiva saṁtatiḥ nityaṁ paṁcarasānnāni bahumānapuraḥsaram
— उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र तक की संतति को भी नित्य पंचरस युक्त अन्न, बड़े सम्मान के साथ,
श्लोक 58 (skanda.2.57.58)
आदृतैर्भोजिता राज्ञ इंद्रद्युम्नस्य शासनात् । कुटुंबवत्स्थितास्तत्र संस्था यावन्महाक्रतोः
ādṛtairbhojitā rājña iṁdradyumnasya śāsanāt kuṭuṁbavatsthitāstatra saṁsthā yāvanmahākratoḥ
— राजा इंद्रद्युम्न के आदेश से आदरपूर्वक भोजन कराया जाता था; वे वहाँ महायज्ञ की समाप्ति तक एक ही कुटुंब के समान रहते थे।
श्लोक 59 (skanda.2.57.59)
यद्देशीया जनास्तेषामधिष्ठाता च तान्नृपः । नृपाणामनुसंधाता इंद्रद्युम्नप्रयाचितः
yaddeśīyā janāsteṣāmadhiṣṭhātā ca tānnṛpaḥ nṛpāṇāmanusaṁdhātā iṁdradyumnaprayācitaḥ
जिस-जिस देश के लोग थे, उनके अपने राजा ही उनके अधिष्ठाता बनाए गए थे; और राजाओं में समन्वय स्थापित करने वाला, इंद्रद्युम्न की प्रार्थना से नियुक्त हुआ —
श्लोक 60 (skanda.2.57.60)
नारदः समदर्शी तु परोपकृतिलोलुपः । इंद्रादीनां सुरेंद्राणां देवर्षीणां नृपोत्तमः
nāradaḥ samadarśī tu paropakṛtilolupaḥ iṁdrādīnāṁ sureṁdrāṇāṁ devarṣīṇāṁ nṛpottamaḥ
— समदर्शी नारद, जो दूसरों के उपकार के लिए सदा लालायित रहते थे; और इंद्र आदि देवराजों तथा देवर्षियों के ऊपर, श्रेष्ठ राजा
श्लोक 61 (skanda.2.57.61)
स्वयं नरपतिश्चर्यां चकार क्रतुपूर्त्तये । षड्विधान्यन्नपानानि संस्कृतानि द्विधा नरैः
svayaṁ narapatiścaryāṁ cakāra kratupūrttaye ṣaḍvidhānyannapānāni saṁskṛtāni dvidhā naraiḥ
— स्वयं मनुष्यों के स्वामी ने यज्ञ की पूर्णता के लिए स्वयं सेवा-कार्य किया। छह प्रकार के अन्न-पान दो प्रकार से मनुष्यों द्वारा तैयार किए जाते थे —
श्लोक 62 (skanda.2.57.62)
देवानां भोजने तत्र मंत्रतंत्रविशारदैः । मर्त्यानां नल विद्यायां कुशलैः संस्कृतानि वै
devānāṁ bhojane tatra maṁtrataṁtraviśāradaiḥ martyānāṁ nala vidyāyāṁ kuśalaiḥ saṁskṛtāni vai
— देवताओं के भोजन के लिए मंत्र-तंत्र में कुशल लोगों द्वारा, और मनुष्यों के लिए पाक-विद्या में निपुण लोगों द्वारा तैयार किए गए।
श्लोक 63 (skanda.2.57.63)
क्षुत्पिपासानभिज्ञा हि सुधाहारा दिवौकसः । तेषामपि अपूर्वत्वादाश्चर्यं तद्धि भोजनम्
kṣutpipāsānabhijñā hi sudhāhārā divaukasaḥ teṣāmapi apūrvatvādāścaryaṁ taddhi bhojanam
अमृत खाने वाले देवगण भूख-प्यास से अपरिचित होते हैं, फिर भी उनके लिए भी वह भोजन, अपनी अभूतपूर्वता के कारण, आश्चर्यजनक ही था।
श्लोक 64 (skanda.2.57.64)
नराणां दुर्लभं मर्त्य इंद्रद्युम्नगृहेऽशनम्। इन्द्रद्युम्नस्य चेंद्रस्य विशेषो मर्त्यवासिता
narāṇāṁ durlabhaṁ martya iṁdradyumnagṛhe'śanam indradyumnasya ceṁdrasya viśeṣo martyavāsitā
मरणशील मनुष्यों के लिए इंद्रद्युम्न के घर जैसा भोजन दुर्लभ है; इंद्रद्युम्न और इंद्र में यही विशेष भेद है कि एक मर्त्य-लोक में निवास करते हैं।
श्लोक 65 (skanda.2.57.65)
अत्यद्भुतकरं ह्येतत्प्रत्यहं च नवं नवम् । संमाननादरावृद्धिर्भोज्यस्य द्विजसत्तमाः
atyadbhutakaraṁ hyetatpratyahaṁ ca navaṁ navam saṁmānanādarāvṛddhirbhojyasya dvijasattamāḥ
यह अत्यंत अद्भुत करने वाला था कि प्रतिदिन कुछ नया-नया होता था; हे श्रेष्ठ द्विजो, भोज्य पदार्थों के प्रति सम्मान और आदर उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता था,
श्लोक 66 (skanda.2.57.66)
अन्योन्यस्पर्द्धयैवात्र प्रवर्द्धते परस्परम् । सुगंधसुमनोमाल्यकस्तूर्यादिप्रलेपनम्
anyonyasparddhayaivātra pravarddhate parasparam sugaṁdhasumanomālyakastūryādipralepanam
— और यहाँ पारस्परिक होड़ के कारण एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर वह और भी बढ़ता जाता था; सुगंधित पुष्प-मालाएँ, कस्तूरी आदि लेप,
श्लोक 67 (skanda.2.57.67)
चित्रसूक्ष्मदुकूलानि सोपधानासनानि च । रत्नपल्यंकिका शय्या रत्नदंडप्रकीर्णकम्
citrasūkṣmadukūlāni sopadhānāsanāni ca ratnapalyaṁkikā śayyā ratnadaṁḍaprakīrṇakam
— सुंदर सूक्ष्म वस्त्र, तकिए सहित आसन, रत्न-जड़ित पलंग की शय्याएँ, रत्न-दंड वाले पंखे,
श्लोक 68 (skanda.2.57.68)
जातीलवंगकर्पूरैर्नागवल्लीदलानि च । मनोहराणि गीतानि नृत्यानि विविधानि च
jātīlavaṁgakarpūrairnāgavallīdalāni ca manoharāṇi gītāni nṛtyāni vividhāni ca
— चमेली, लौंग और कपूर से युक्त पान के पत्ते, मनोहर गीत और नाना प्रकार के नृत्य,
श्लोक 69 (skanda.2.57.69)
भरतस्य मुनेः शिक्षापंडितै रचितानि च । स्वस्ववंशयशोऽभिज्ञाः शतशः सूतमागधाः
bharatasya muneḥ śikṣāpaṁḍitai racitāni ca svasvavaṁśayaśo'bhijñāḥ śataśaḥ sūtamāgadhāḥ
— मुनि भरत की शिक्षा में पारंगत गुरुओं द्वारा रचे गए; और अपने-अपने वंश की कीर्ति में निपुण सैकड़ों सूत और मागध।
श्लोक 70 (skanda.2.57.70)
एतान्यन्यानि वस्तूनि दुर्लभान्यपि यानि वै । त्रिदशाश्चापि मर्त्याश्चान्वभुज्यंत सुसादरम्
etānyanyāni vastūni durlabhānyapi yāni vai tridaśāścāpi martyāścānvabhujyaṁta susādaram
इन तथा अन्य दुर्लभ वस्तुओं का भी देवताओं और मनुष्यों ने समान रूप से अत्यंत आदरपूर्वक उपभोग किया।
श्लोक 71 (skanda.2.57.71)
एकतोऽन्यत्र चित्राणि न च हीनानि कुत्रचित् । पातालवासिनां चापि भोजनं वै सुधाधिकम्
ekato'nyatra citrāṇi na ca hīnāni kutracit pātālavāsināṁ cāpi bhojanaṁ vai sudhādhikam
एक ओर से दूसरी ओर तक सब कुछ अद्भुत था, कहीं भी कोई कमी नहीं थी। पाताल-निवासियों के लिए भी वहाँ का भोजन अमृत से भी बढ़कर था,
श्लोक 72 (skanda.2.57.72)
यद्भुक्त्वा नानुवाञ्छन्ति पातालगमनं हि ते । पुराणि यानि पाताले रत्नौघालोकितानि च
yadbhuktvā nānuvāñchanti pātālagamanaṁ hi te purāṇi yāni pātāle ratnaughālokitāni ca
— जिसे खाकर वे पाताल लौटना भी नहीं चाहते थे। पाताल में जो नगर हैं, जो रत्नों के समूह से आलोकित हैं,
श्लोक 73 (skanda.2.57.73)
विना सूर्यप्रकाशेन तादृशान्येव भूपतिः । ददौ तेषां निवासाय येषु पातालबुद्धयः
vinā sūryaprakāśena tādṛśānyeva bhūpatiḥ dadau teṣāṁ nivāsāya yeṣu pātālabuddhayaḥ
— सूर्य के प्रकाश के बिना ही चमकते हुए — ठीक वैसे ही निवास-स्थान राजा ने उनके लिए बनवाए, जिससे पाताल-वासियों को अपने ही घर जैसा भान होता।
श्लोक 74 (skanda.2.57.74)
सुखासीनाश्च क्रीडंतो भुंजाना शेरते मुदा । देवानामपि नान्यत्र भूमिस्पर्शनमस्ति वै
sukhāsīnāśca krīḍaṁto bhuṁjānā śerate mudā devānāmapi nānyatra bhūmisparśanamasti vai
वे सुखपूर्वक बैठे हुए, क्रीड़ा करते, भोजन करते और आनंद से विश्राम करते थे; देवताओं को भी अन्यत्र कहीं और भूमि-स्पर्श का अवसर नहीं मिलता।
श्लोक 75 (skanda.2.57.75)
इन्द्रद्युम्नपुरे तत्र स्वर्गादपि मनोहरे । यदृच्छया सुखक्रीडासक्ता नो तत्यजुर्भुवम्
indradyumnapure tatra svargādapi manohare yadṛcchayā sukhakrīḍāsaktā no tatyajurbhuvam
स्वर्ग से भी अधिक मनोहर उस इंद्रद्युम्न-पुरी में, स्वेच्छा से सुख-क्रीड़ा में आसक्त होकर, उन्होंने वह भूमि छोड़ना नहीं चाहा।
श्लोक 76 (skanda.2.57.76)
अभिलाषोपजातं तु सुखं स्वर्गे वदंति हि । अनिच्छयापि भो विप्राः सुखं सर्वत्र तत्र वै
abhilāṣopajātaṁ tu sukhaṁ svarge vadaṁti hi anicchayāpi bho viprāḥ sukhaṁ sarvatra tatra vai
स्वर्ग में सुख को इच्छा से उत्पन्न होने वाला कहा जाता है; परंतु हे विप्रो, वहाँ बिना इच्छा के भी सर्वत्र सुख ही सुख था।
श्लोक 77 (skanda.2.57.77)
आदृत्य यत्नान्मन्यंते भोज्यं ते सादरं नराः । न याचितः कोपि जनः कुतो वा स्यात्पराङ्मुखः
ādṛtya yatnānmanyaṁte bhojyaṁ te sādaraṁ narāḥ na yācitaḥ kopi janaḥ kuto vā syātparāṅmukhaḥ
वहाँ के लोग जो कुछ भी भोज्य मिलता, उसे यत्नपूर्वक आदर से मानते थे; कोई भी मांगने वाला निराश नहीं लौटता था — फिर पराङ्मुख कैसे होता?
श्लोक 78 (skanda.2.57.78)
राजाधिराजवेश्मानि जनानां स्वगृहैः समम् । तदासीत्स्वगृहे तेषां न सदा सर्वसंभवः
rājādhirājaveśmāni janānāṁ svagṛhaiḥ samam tadāsītsvagṛhe teṣāṁ na sadā sarvasaṁbhavaḥ
उस राजाधिराज के भवन जनसाधारण के अपने ही घरों के समान थे; क्योंकि अपने घर में तो सदा सब कुछ उपलब्ध नहीं होता।
श्लोक 79 (skanda.2.57.79)
तत्र यत्कामनातीतं तद्वस्तु सुलभं बहु । इत्थं प्रवर्तिते यज्ञे यज्ञेशप्रीतये मुदा
tatra yatkāmanātītaṁ tadvastu sulabhaṁ bahu itthaṁ pravartite yajñe yajñeśaprītaye mudā
वहाँ जो भी कामना से परे था, वह वस्तु भी प्रचुर मात्रा में सुलभ थी। इस प्रकार यज्ञ चलते हुए, यज्ञेश्वर की प्रसन्नता के लिए, आनंदपूर्वक,
श्लोक 80 (skanda.2.57.80)
पृथिवी हृतसर्वस्वा वाजिमेधेस्य भूपतेः । या पूर्वं साभवद्भूयः स्वर्णवृष्टिसुभूषिता
pṛthivī hṛtasarvasvā vājimedhesya bhūpateḥ yā pūrvaṁ sābhavadbhūyaḥ svarṇavṛṣṭisubhūṣitā
— इस राजा के अश्वमेध यज्ञ से सर्वस्व हरण की गई पृथ्वी, जो पहले ऐसी ही हुई थी, पुनः स्वर्ण-वर्षा से सुशोभित हो गई।
श्लोक 81 (skanda.2.57.81)
इत्थं प्रवृत्ते लोकानां तत्र त्रैलोक्यवासिनाम् । दानसंमानभोज्यानां विधौ विधिवतोऽन्वहम्
itthaṁ pravṛtte lokānāṁ tatra trailokyavāsinām dānasaṁmānabhojyānāṁ vidhau vidhivato'nvaham
इस प्रकार त्रैलोक्यवासी लोगों को प्रतिदिन विधिपूर्वक दान, सम्मान और भोजन देने की व्यवस्था चलते हुए,
श्लोक 82 (skanda.2.57.82)
अश्वमेधं प्रति जना जगुर्गाथाः परस्परम् । नेदृग्यागस्य संभारो विधेः शास्त्रप्रचोदितः
aśvamedhaṁ prati janā jagurgāthāḥ parasparam nedṛgyāgasya saṁbhāro vidheḥ śāstrapracoditaḥ
— लोग परस्पर अश्वमेध के विषय में गाथाएँ गाने लगे कि 'इस विधि से शास्त्र-प्रेरित यज्ञ-सामग्री का ऐसा संभार
श्लोक 83 (skanda.2.57.83)
इंद्रद्युम्नस्य राजर्षेर्न भूतो न भविष्यति । न याचितारोऽदातारो मिथो यत्र निमंत्रिताः
iṁdradyumnasya rājarṣerna bhūto na bhaviṣyati na yācitāro'dātāro mitho yatra nimaṁtritāḥ
— राजर्षि इंद्रद्युम्न के अतिरिक्त न पहले हुआ है, न आगे होगा। यहाँ जो निमंत्रित हुए, वे परस्पर न मांगने वाले रहे, न देने से इनकार करने वाले,
श्लोक 84 (skanda.2.57.84)
न कामभंगो यत्रासीद्देवानामपि भो द्विजाः । ईदृक्समृद्धिः क्रतुराट् प्रवृत्तो भूपतेस्तदा
na kāmabhaṁgo yatrāsīddevānāmapi bho dvijāḥ īdṛksamṛddhiḥ kraturāṭ pravṛtto bhūpatestadā
— और देवताओं की भी कोई कामना यहाँ अपूर्ण नहीं रही, हे द्विजो। इतनी समृद्धि से युक्त यह यज्ञराज उस राजा द्वारा संचालित हुआ था।'
श्लोक 85 (skanda.2.57.85)
अधिश्रद्धः सुसंपन्नः पूर्वस्मादपरोऽभवत् । स्मृतिकाराः कल्पकारास्तथा शास्त्रप्रणेतृकाः
adhiśraddhaḥ susaṁpannaḥ pūrvasmādaparo'bhavat smṛtikārāḥ kalpakārāstathā śāstrapraṇetṛkāḥ
प्रत्येक अगला यज्ञ पिछले से अधिक श्रद्धा और समृद्धि से युक्त होता गया। स्मृतिकार, कल्पसूत्रकार तथा शास्त्रकार,
श्लोक 86 (skanda.2.57.86)
यज्ञानुष्ठानकुशलाः सदाचारावतंसकाः । अग्न्याधानाद्यवभृथप्रचारमनुपूर्वशः
yajñānuṣṭhānakuśalāḥ sadācārāvataṁsakāḥ agnyādhānādyavabhṛthapracāramanupūrvaśaḥ
— यज्ञ के अनुष्ठान में कुशल, सदाचार के भूषण-स्वरूप, अग्नि-स्थापना से लेकर अवभृथ-स्नान तक के सभी अनुष्ठान क्रमशः,
श्लोक 87 (skanda.2.57.87)
क्रतुः सदस्यानुमते नृपतेः प्रीतये द्विजाः । न मंत्राः स्वरतो हीना वर्णतो वापि कर्हिचित्
kratuḥ sadasyānumate nṛpateḥ prītaye dvijāḥ na maṁtrāḥ svarato hīnā varṇato vāpi karhicit
— सभा की सहमति से, राजा की प्रसन्नता के लिए, हे द्विजो, संपन्न करते थे; मंत्र कभी भी स्वर या वर्ण में त्रुटिपूर्ण नहीं होते थे।
श्लोक 88 (skanda.2.57.88)
ये वै विधिविधातारस्ते वै कर्मप्रचारकाः । प्रायश्चित्तनिमित्तेन प्रायश्चित्तनिबंधनात्
ye vai vidhividhātāraste vai karmapracārakāḥ prāyaścittanimittena prāyaścittanibaṁdhanāt
जो विधि-विधान करने वाले थे, वे ही कर्म का संचालन भी करते थे; किसी प्रायश्चित्त के अवसर पर, प्रायश्चित्त के निर्धारित नियम से ही,
श्लोक 89 (skanda.2.57.89)
कर्मोपघातो नो तत्र योगिनः कर्मयोगिनः । यत्र सप्तर्षयो दिव्याः सदस्याः क्रतुसाक्षिणः
karmopaghāto no tatra yoginaḥ karmayoginaḥ yatra saptarṣayo divyāḥ sadasyāḥ kratusākṣiṇaḥ
— कर्म-योगी उन योगिजनों के कारण वहाँ कर्म में कोई बाधा नहीं आती थी; जहाँ दिव्य सप्तर्षि स्वयं सभासद और यज्ञ के साक्षी थे,
श्लोक 90 (skanda.2.57.90)
प्रचारयंति कर्माणि गुणदोषविभागिनः । याज्ञवल्क्यादयस्तेऽत्र मुनयस्त्वृत्विजो वृताः
pracārayaṁti karmāṇi guṇadoṣavibhāginaḥ yājñavalkyādayaste'tra munayastvṛtvijo vṛtāḥ
— गुण-दोष का विभाजन करते हुए कर्मों का संचालन करते थे; याज्ञवल्क्य आदि मुनि वहाँ ऋत्विज के रूप में वृत हुए थे।
श्लोक 91 (skanda.2.57.91)
सदोगतास्ते मुनयः परस्परकथांतरे । वाकोवाक्यानि सूक्तानि गुह्योपनिषदानि च
sadogatāste munayaḥ parasparakathāṁtare vākovākyāni sūktāni guhyopaniṣadāni ca
सदन में उपस्थित वे मुनि परस्पर वार्तालाप में वाकोवाक्य, सूक्त और गुह्य उपनिषदों की,
श्लोक 92 (skanda.2.57.92)
गाथाः पौराणिकीर्विप्रा विष्णुभक्तिपुरःसराः । चरितानि हरेः सर्वकल्मषौघहराणि च
gāthāḥ paurāṇikīrviprā viṣṇubhaktipuraḥsarāḥ caritāni hareḥ sarvakalmaṣaughaharāṇi ca
— पौराणिक गाथाओं की, हे विप्रो, विष्णु-भक्ति को प्रमुखता देते हुए, तथा हरि के उन चरित्रों की, जो समस्त पाप-राशि को हर लेते हैं —
श्लोक 93 (skanda.2.57.93)
तत्र संवर्तयामासुस्ते सभायां महीक्षितः । तस्य यज्ञे हविः प्राशुः प्रत्यक्षं वह्निमध्यगाः
tatra saṁvartayāmāsuste sabhāyāṁ mahīkṣitaḥ tasya yajñe haviḥ prāśuḥ pratyakṣaṁ vahnimadhyagāḥ
— वे इस प्रकार राजा की सभा में चर्चा किया करते थे; और उस राजा के यज्ञ में वे साक्षात् अग्नि के मध्य प्रवेश कर हवि ग्रहण करते थे।
श्लोक 94 (skanda.2.57.94)
मुदितास्त्रिदशा विप्रा महेंद्रप्रमुखामखे । चिरप्रवासिनो देवा नास्मरंतामरावतीम्
muditāstridaśā viprā maheṁdrapramukhāmakhe cirapravāsino devā nāsmaraṁtāmarāvatīm
महेंद्र आदि की अगुवाई में उस यज्ञ में प्रसन्न देवगण, हे विप्रो, चिरकाल से प्रवासी होने पर भी अमरावती का स्मरण तक नहीं करते थे।
श्लोक 95 (skanda.2.57.95)
अमृतं हि हविस्तेषां कल्पितं ब्रह्मणा पुरा । तत्प्राश्य मुदिता देवा वीर्यवन्तश्चिरायुषः
amṛtaṁ hi havisteṣāṁ kalpitaṁ brahmaṇā purā tatprāśya muditā devā vīryavantaścirāyuṣaḥ
क्योंकि उनका हवि तो पहले ब्रह्मा द्वारा रचित अमृत ही था; उसे ग्रहण कर प्रसन्न देवगण अत्यंत बलवान और दीर्घायु हो गए,
श्लोक 96 (skanda.2.57.96)
यागानुष्ठानविषयादन्यत्र विषयान्बहून् । इन्द्रद्युम्नेन रचितान्समस्तानुपभुंजते
yāgānuṣṭhānaviṣayādanyatra viṣayānbahūn indradyumnena racitānsamastānupabhuṁjate
और यज्ञ-अनुष्ठान के विषय से परे भी, इंद्रद्युम्न द्वारा रचे गए अन्य अनेक भोगों का उन्होंने समस्त रूप से उपभोग किया।
श्लोक 97 (skanda.2.57.97)
तत्र ये नागराजानः पातालतलवासिनः । ततोऽधिकान्मर्त्यलोके विषयानुपभुंजते
tatra ye nāgarājānaḥ pātālatalavāsinaḥ tato'dhikānmartyaloke viṣayānupabhuṁjate
वहाँ पाताल-तल में निवास करने वाले जो नागराज थे, वे इस मर्त्य-लोक में अपने पाताल से भी अधिक भोगों का उपभोग करते थे,
श्लोक 98 (skanda.2.57.98)
पातालगमनं ते वै नेहंते मनसा धुवम् । इत्थं प्रवर्तितो यज्ञस्त्रैलोक्यप्रीतिकारकः
pātālagamanaṁ te vai nehaṁte manasā dhuvam itthaṁ pravartito yajñastrailokyaprītikārakaḥ
— जिससे वे मन से भी निश्चय ही पाताल लौटना नहीं चाहते थे। इस प्रकार त्रिलोक को प्रसन्न करने वाला यह यज्ञ चलता रहा —
श्लोक 99 (skanda.2.57.99)
इन्द्रद्युम्नस्य नृपतेः क्षेत्रेऽस्मिन्पुरुषोत्तमे । जगदीशप्रसादाय पितामहनिदेशतः
indradyumnasya nṛpateḥ kṣetre'sminpuruṣottame jagadīśaprasādāya pitāmahanideśataḥ
— राजा इंद्रद्युम्न का, इस पुरुषोत्तम क्षेत्र में, जगदीश्वर की प्रसन्नता के लिए, पितामह ब्रह्मा के निर्देश से।
श्लोक 100 (skanda.2.57.100)
एकोनं क्रमतः संस्थामवाप पृथिवीपतिः । सहस्रं हयमेधस्य यथावद्विधिचोदितम्
ekonaṁ kramataḥ saṁsthāmavāpa pṛthivīpatiḥ sahasraṁ hayamedhasya yathāvadvidhicoditam
क्रमशः, यथाविधि निर्दिष्ट रीति से, पृथ्वीपति ने सहस्र अश्वमेध यज्ञों में से नौ सौ निन्यानवे को पूर्ण कर लिया।
श्लोक 101 (skanda.2.57.101)
ततः साहस्रिके यज्ञे वाजिमेधे महीपतिः । दिनेदिने दिव्यगतिर्बभूव नृपतिस्तदा
tataḥ sāhasrike yajñe vājimedhe mahīpatiḥ dinedine divyagatirbabhūva nṛpatistadā
फिर उस सहस्रवें, समापक अश्वमेध यज्ञ में, राजा प्रतिदिन मानो दिव्य गति को प्राप्त होने लगे।
श्लोक 102 (skanda.2.57.102)
सुत्यायाः सप्त दिवसाद्या रात्रिरभवत्पुरा । तस्यास्तुरीयप्रहरे दध्यौ स विष्णुमव्ययम्
sutyāyāḥ sapta divasādyā rātrirabhavatpurā tasyāsturīyaprahare dadhyau sa viṣṇumavyayam
सोमाभिषव के सातवें दिन से पहली रात्रि में, उसके चतुर्थ प्रहर में, उन्होंने अव्यय विष्णु का ध्यान किया।
श्लोक 103 (skanda.2.57.103)
ध्याने तस्मिन्ददर्शासौ महाभाग्यवशान्नृपः । प्रत्यक्षमिव स श्वेतद्वीपं स्फटिकनिर्मितम्
dhyāne tasmindadarśāsau mahābhāgyavaśānnṛpaḥ pratyakṣamiva sa śvetadvīpaṁ sphaṭikanirmitam
उस ध्यान में, अपने महाभाग्य के प्रभाव से, राजा ने मानो साक्षात् ही स्फटिक-निर्मित श्वेतद्वीप को देखा,
श्लोक 104 (skanda.2.57.104)
समंतात्परिवार्यैनं तिष्ठंतं क्षीरसागरम् । महाकल्पद्रुमैः पुष्पगंधामोदिदिगंतरैः
samaṁtātparivāryainaṁ tiṣṭhaṁtaṁ kṣīrasāgaram mahākalpadrumaiḥ puṣpagaṁdhāmodidigaṁtaraiḥ
— उसके चारों ओर घिरा हुआ क्षीरसागर, महान कल्पवृक्षों से युक्त, जिनकी पुष्प-सुगंध दिशाओं के अंत तक फैली हुई थी,
श्लोक 105 (skanda.2.57.105)
फलपल्लववल्केषु बहिरंतश्च सर्वशः । शंखचक्रांकितैः शुभ्रैः सर्वालंकारभूषितः
phalapallavavalkeṣu bahiraṁtaśca sarvaśaḥ śaṁkhacakrāṁkitaiḥ śubhraiḥ sarvālaṁkārabhūṣitaḥ
— जिनके फल, पल्लव और छाल, भीतर-बाहर सभी ओर, शंख-चक्र से अंकित, शुभ्र, समस्त अलंकारों से सुशोभित थे,
श्लोक 106 (skanda.2.57.106)
महामंजिष्ठवर्णैश्च मूर्तिभिस्तैर्मुरद्विषः । तन्मध्ये घटितं दिव्यमणिभिर्मंडपोत्तमम्
mahāmaṁjiṣṭhavarṇaiśca mūrtibhistairmuradviṣaḥ tanmadhye ghaṭitaṁ divyamaṇibhirmaṁḍapottamam
— और मुरारि की मंजिष्ठा-वर्ण वाली मूर्तियों से युक्त; उसके मध्य में दिव्य मणियों से रचा गया श्रेष्ठ मंडप,
श्लोक 107 (skanda.2.57.107)
मध्यस्थसूर्यवद्भासिरत्नसिंहासनोज्ज्वलम् । क्षीराब्धिशीतकल्लोलमंदवातमनोहरम्
madhyasthasūryavadbhāsiratnasiṁhāsanojjvalam kṣīrābdhiśītakallolamaṁdavātamanoharam
— मध्य में स्थित सूर्य के समान चमकते रत्न-सिंहासन से उज्ज्वल, क्षीरसागर की शीतल लहरों की मंद वायु से मनोहर।
श्लोक 108 (skanda.2.57.108)
तन्मध्ये ददृशे देवं शंखचक्रगदाधरम् । नीलजीमूतसंकाशं वनमालाविभूषितम्
tanmadhye dadṛśe devaṁ śaṁkhacakragadādharam nīlajīmūtasaṁkāśaṁ vanamālāvibhūṣitam
उसके मध्य में उन्होंने शंख-चक्र-गदाधारी देव को देखा, नीले मेघ के समान श्याम, वनमाला से विभूषित,
श्लोक 109 (skanda.2.57.109)
सर्वलावण्यभवनं सौंदर्यश्रीनिकेतनम् । निर्भर्त्सयंतं वपुषा पिनद्धं दिव्यभूषणम्
sarvalāvaṇyabhavanaṁ sauṁdaryaśrīniketanam nirbhartsayaṁtaṁ vapuṣā pinaddhaṁ divyabhūṣaṇam
— समस्त लावण्य के निवास-स्थान, सौंदर्य और श्री के आगार, अपने शरीर से सबको तिरस्कृत करते हुए, दिव्य आभूषणों से युक्त,
श्लोक 110 (skanda.2.57.110)
दक्षपार्श्वे स्थितं तत्र अनंतं धरणीधरम् । कोटिचन्द्रप्रतीकाशं हिमाद्रिसदृशप्रभम्
dakṣapārśve sthitaṁ tatra anaṁtaṁ dharaṇīdharam koṭicandrapratīkāśaṁ himādrisadṛśaprabham
— और उनके दक्षिण भाग में स्थित अनंत, धरणीधर, करोड़ों चंद्रमाओं के समान, हिमाद्रि के समान कांतिमान,
श्लोक 111 (skanda.2.57.111)
फणामुकुटविस्तारच्छत्रीभूतं मनोहरम् । मणिकुंडलयुग्मांकं चारुनीलनिचोलकम्
phaṇāmukuṭavistāracchatrībhūtaṁ manoharam maṇikuṁḍalayugmāṁkaṁ cārunīlanicolakam
— फणों के मुकुट के विस्तार से छत्र-रूप बना हुआ मनोहर, मणि-कुंडलों की जोड़ी से चिह्नित, सुंदर नील वस्त्र धारण किए हुए,
श्लोक 112 (skanda.2.57.112)
हललांगलशंखारिस्फुरद्बाहुचतुष्टयम्। हारकेयूरवलय मुद्रिकाभिरलंकृतम्
halalāṁgalaśaṁkhārisphuradbāhucatuṣṭayam hārakeyūravalaya mudrikābhiralaṁkṛtam
— हल, लांगल, शंख और चक्र से चमकती चार भुजाओं वाले, हार, केयूर, कंगन और मुद्रिकाओं से अलंकृत,
श्लोक 113 (skanda.2.57.113)
मेखलाकटिसूत्राढ्यं दिव्यरत्नप्रसाधनम् । दिव्यहालाक्षीबमूर्तिं चारुहासं सुनेत्रकम्
mekhalākaṭisūtrāḍhyaṁ divyaratnaprasādhanam divyahālākṣībamūrtiṁ cāruhāsaṁ sunetrakam
— मेखला और करधनी से सुशोभित कटि वाले, दिव्य रत्नों से सुसज्जित, दिव्य मदिरा से मानो उन्मत्त मूर्ति वाले, सुंदर हास्य और सुंदर नेत्रों वाले;
श्लोक 114 (skanda.2.57.114)
दक्षपार्श्वस्थितां चास्य लक्ष्मीं तां शुभलक्षणाम् । वराभयाब्जहस्तां वै कुंकुमाभां सुलोचनाम्
dakṣapārśvasthitāṁ cāsya lakṣmīṁ tāṁ śubhalakṣaṇām varābhayābjahastāṁ vai kuṁkumābhāṁ sulocanām
— और उनके दक्षिण भाग में स्थित उस शुभ-लक्षणा लक्ष्मी को, जिनके हाथ वर, अभय और कमल की मुद्रा में थे, कुंकुम के समान आभा वाली, सुनयना,
श्लोक 115 (skanda.2.57.115)
त्रैलोक्ययुवतीवृन्ददृष्टांताद्भुतविग्रहाम् । ददर्श पद्मासनगां लावण्यांबुधिपुत्रिकाम्
trailokyayuvatīvṛndadṛṣṭāṁtādbhutavigrahām dadarśa padmāsanagāṁ lāvaṇyāṁbudhiputrikām
— त्रैलोक्य की युवतियों के समूह के लिए भी दृष्टांत बन जाने वाले अद्भुत रूप वाली; पद्मासन पर विराजमान, लावण्य-सागर की पुत्री को उन्होंने देखा,
श्लोक 116 (skanda.2.57.116)
पितामहं च ददृशे पुरतोऽस्य कृतांजलिम् । वामपार्श्वस्थितं चक्रं नानामणिमयं विभोः
pitāmahaṁ ca dadṛśe purato'sya kṛtāṁjalim vāmapārśvasthitaṁ cakraṁ nānāmaṇimayaṁ vibhoḥ
— और उन्होंने अपने समक्ष हाथ जोड़े हुए पितामह ब्रह्मा को देखा, तथा प्रभु के वामभाग में स्थित, नाना मणियों से बने चक्र को,
श्लोक 117 (skanda.2.57.117)
सनकाद्यैर्मुनींद्रैस्तं स्तूयमानं जगद्गुरुम् । दृष्ट्वा स्वप्ने स राजा वै प्रहृष्टो द्विजसत्तमाः
sanakādyairmunīṁdraistaṁ stūyamānaṁ jagadgurum dṛṣṭvā svapne sa rājā vai prahṛṣṭo dvijasattamāḥ
— और सनक आदि श्रेष्ठ मुनियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए उस जगद्गुरु को देखा। हे श्रेष्ठ द्विजो! स्वप्न में यह देखकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए,
श्लोक 118 (skanda.2.57.118)
अदृष्टपूर्वरूपं तं ज्योतिर्मयमनंतकम् । तुष्टाव तत्र ध्यानस्थो हर्षगद्गदया गिरा
adṛṣṭapūrvarūpaṁ taṁ jyotirmayamanaṁtakam tuṣṭāva tatra dhyānastho harṣagadgadayā girā
— उस पहले कभी न देखे गए, ज्योतिर्मय, अनंत रूप को। ध्यानस्थ रहते हुए उन्होंने हर्ष से गद्गद वाणी में उनकी स्तुति की।
श्लोक 119 (skanda.2.57.119)
इन्द्रद्युम्न उवाच । नमस्ते जगदाधार जगदात्मन्नमोऽस्तु ते । कैवल्यत्रिगुणातीत गुणांजन नमोऽस्तु ते
indradyumna uvāca namaste jagadādhāra jagadātmannamo'stu te kaivalyatriguṇātīta guṇāṁjana namo'stu te
इंद्रद्युम्न ने कहा — 'हे जगत् के आधार! आपको नमस्कार है। हे जगदात्मा! आपको नमस्कार हो। हे तीनों गुणों से परे, कैवल्य-स्वरूप, गुणों के आधार! आपको नमस्कार हो।
श्लोक 120 (skanda.2.57.120)
सुशुद्धनिर्मलज्ञानस्वरूपाय नमोऽस्तु ते । शब्दब्रह्माभिधानाय जगद्रूपाय ते नमः
suśuddhanirmalajñānasvarūpāya namo'stu te śabdabrahmābhidhānāya jagadrūpāya te namaḥ
अत्यंत शुद्ध, निर्मल ज्ञान-स्वरूप को नमस्कार हो; शब्द-ब्रह्म कहलाने वाले, जगत्-रूप धारण करने वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 121 (skanda.2.57.121)
संसारपतितश्रांत दुःखध्वंस नमोऽस्तु ते । दुर्भेद्यहृदयग्रंथिभेदकाय नमोऽस्तु ते
saṁsārapatitaśrāṁta duḥkhadhvaṁsa namo'stu te durbhedyahṛdayagraṁthibhedakāya namo'stu te
संसार में गिरे, थके हुओं के दुःख का नाश करने वाले, आपको नमस्कार हो; हृदय की दुर्भेद्य गाँठ को भेदने वाले आपको नमस्कार हो।
श्लोक 122 (skanda.2.57.122)
द्विसप्तभुवनागारमूलस्तंभाय ते नमः । ब्रह्मांडकोटिघटनाशिल्पिने चक्रिणे नमः
dvisaptabhuvanāgāramūlastaṁbhāya te namaḥ brahmāṁḍakoṭighaṭanāśilpine cakriṇe namaḥ
चौदह भुवनों के भवन के मूल-स्तंभ को नमस्कार है; करोड़ों ब्रह्मांडों की रचना करने वाले शिल्पी, हे चक्रधारी, आपको नमस्कार है।
श्लोक 123 (skanda.2.57.123)
करुणामृतपाथोधिसुधाधाम्ने नमो नमः । दीनोद्धारैकगुह्याय कृपापाथोधये नमः
karuṇāmṛtapāthodhisudhādhāmne namo namaḥ dīnoddhāraikaguhyāya kṛpāpāthodhaye namaḥ
करुणा-अमृत के सागर, सुधा के धाम को नमस्कार है, नमस्कार है; दीनों के उद्धार के एकमात्र रहस्य, कृपा-सागर को नमस्कार है।
श्लोक 124 (skanda.2.57.124)
प्रकाशकानां सूर्यादिज्योतिषां ज्योतिषे नमः । प्रतिस्वस्वनदीप्ताय अन्तःपापाग्नये नमः
prakāśakānāṁ sūryādijyotiṣāṁ jyotiṣe namaḥ pratisvasvanadīptāya antaḥpāpāgnaye namaḥ
सूर्य आदि प्रकाशक ज्योतियों की भी ज्योति को नमस्कार है; अपने ही तेज से प्रज्वलित, भीतर के पाप को भस्म करने वाली अग्नि को नमस्कार है।
श्लोक 125 (skanda.2.57.125)
पावकाय पवित्राय पवित्राणां नमो नमः । गरिष्ठाय वरिष्ठाय द्राघिष्ठाय नमो नमः
pāvakāya pavitrāya pavitrāṇāṁ namo namaḥ gariṣṭhāya variṣṭhāya drāghiṣṭhāya namo namaḥ
पावक, पवित्र, पवित्रों में भी पवित्र को नमस्कार है, नमस्कार है; सबसे भारी, सबसे श्रेष्ठ, सबसे दूर तक फैले हुए को नमस्कार है, नमस्कार है।
श्लोक 126 (skanda.2.57.126)
नेदिष्ठाय दविष्ठाय क्षोदिष्ठाय नमो नमः । वरेण्याय सुपुण्याय नारायण नमोऽस्तु ते
nediṣṭhāya daviṣṭhāya kṣodiṣṭhāya namo namaḥ vareṇyāya supuṇyāya nārāyaṇa namo'stu te
सबसे निकट, सबसे दूर, सबसे सूक्ष्म को नमस्कार है, नमस्कार है; वरणीय, परम पवित्र, हे नारायण! आपको नमस्कार हो।
श्लोक 127 (skanda.2.57.127)
परित्राहि जगन्नाथ दीनबन्धो नमोऽस्तु ते । निस्तीर्णोऽहं भवांभोधिं प्राप्य त्वां तरणिं सुखाम्
paritrāhi jagannātha dīnabandho namo'stu te nistīrṇo'haṁ bhavāṁbhodhiṁ prāpya tvāṁ taraṇiṁ sukhām
हे जगन्नाथ! मुझे बचाइए। हे दीन-बंधु! आपको नमस्कार है। मैं संसार-सागर को पार कर चुका, आप-रूपी सुखद नौका को पाकर।
श्लोक 128 (skanda.2.57.128)
त्वयि दृष्टे रमानाथ क्लेशा व्यपगता मम । चिदानंदस्वरूपं त्वां प्राप्तानां दुःखसंक्षयः
tvayi dṛṣṭe ramānātha kleśā vyapagatā mama cidānaṁdasvarūpaṁ tvāṁ prāptānāṁ duḥkhasaṁkṣayaḥ
हे रमानाथ! आपके दर्शन से मेरे क्लेश दूर हो गए। चित्-आनंद-स्वरूप आपको प्राप्त करने वालों के दुःख का ही नाश हो जाता है।
श्लोक 129 (skanda.2.57.129)
ध्रुवं नाथ समुत्पन्नपरमानंदहेतुकम् । त्राहि त्राहि भवांभोधिमग्नं मां दीनचेतसम्
dhruvaṁ nātha samutpannaparamānaṁdahetukam trāhi trāhi bhavāṁbhodhimagnaṁ māṁ dīnacetasam
हे नाथ! निश्चय ही आप ही परमानंद के उदय के कारण हैं। मुझे बचाइए, बचाइए, जो संसार-सागर में डूबा हुआ, दीन-हृदय हूँ।
श्लोक 130 (skanda.2.57.130)
मध्याह्नार्कोदिते व्योम्नि कुतः संतमसोदयः । ध्यानस्थितः स्तुवन्नेवं प्रणम्य जगदीश्वरम्
madhyāhnārkodite vyomni kutaḥ saṁtamasodayaḥ dhyānasthitaḥ stuvannevaṁ praṇamya jagadīśvaram
'जब आकाश में मध्याह्न का सूर्य उदित हो, तब घोर अंधकार कहाँ से उत्पन्न हो सकता है?' — इस प्रकार ध्यानस्थ रहकर, जगदीश्वर की स्तुति और प्रणाम करते हुए,
श्लोक 131 (skanda.2.57.131)
ध्यानावसाने स पुनः स्वयं जाग्रदबुध्यत । स्वप्नांत इन्द्रद्युम्नोऽपि सस्मारात्मानमात्मना
dhyānāvasāne sa punaḥ svayaṁ jāgradabudhyata svapnāṁta indradyumno'pi sasmārātmānamātmanā
— ध्यान की समाप्ति पर वे स्वयं पुनः जाग्रत होकर जागे; स्वप्न के अंत में इंद्रद्युम्न ने अपने ही द्वारा अपने आपको स्मरण किया।
श्लोक 132 (skanda.2.57.132)
अत्यद्भुतमिदं स्वप्नं दृष्ट्वा च नृपकुंजरः । मेने कृतार्थमात्मानं हयमेधक्रतोस्तथा
atyadbhutamidaṁ svapnaṁ dṛṣṭvā ca nṛpakuṁjaraḥ mene kṛtārthamātmānaṁ hayamedhakratostathā
इस अत्यंत अद्भुत स्वप्न को देखकर राजाओं में गजराज-सम उस राजा ने अपने को और अपने अश्वमेध यज्ञ को भी कृतार्थ माना —
श्लोक 133 (skanda.2.57.133)
सहस्रं सफलं चैव स्वभाग्यं समुपस्थितम् । न हि देवर्षिवचनं वृथा भवति कर्हिचित्
sahasraṁ saphalaṁ caiva svabhāgyaṁ samupasthitam na hi devarṣivacanaṁ vṛthā bhavati karhicit
— सहस्रवाँ यज्ञ सफल हो गया, अपना सौभाग्य निकट आ पहुँचा; क्योंकि देवर्षि का वचन कभी व्यर्थ नहीं होता।
श्लोक 134 (skanda.2.57.134)
प्रत्यक्षं मे कथं नाथः स्वयमत्र भविष्यति । इति चिंताकुलो रात्रिशेषं नीत्वा विशांपतिः
pratyakṣaṁ me kathaṁ nāthaḥ svayamatra bhaviṣyati iti ciṁtākulo rātriśeṣaṁ nītvā viśāṁpatiḥ
'यहाँ प्रभु स्वयं मुझे प्रत्यक्ष कैसे प्राप्त होंगे?' — इस प्रकार चिंता से आकुल होकर, प्रजापालक राजा ने शेष रात्रि बिताई,
श्लोक 135 (skanda.2.57.135)
शशंस नारदस्याग्रे यथा स्वप्नोऽन्वभूयत । स चापि नारदः प्राह शोकस्ते विगतो नृप
śaśaṁsa nāradasyāgre yathā svapno'nvabhūyata sa cāpi nāradaḥ prāha śokaste vigato nṛpa
और नारद के समक्ष उन्होंने बताया कि किस प्रकार वह स्वप्न अनुभव हुआ था। नारद ने भी कहा — 'हे राजन्! तुम्हारा शोक दूर हो गया —
श्लोक 136 (skanda.2.57.136)
अरुणोदयकाले हि भगवंतं ददर्श यत् । दशाहात्फलदः स्वप्नस्तस्मिन्काले नृपोत्तम
aruṇodayakāle hi bhagavaṁtaṁ dadarśa yat daśāhātphaladaḥ svapnastasminkāle nṛpottama
— क्योंकि तुमने अरुणोदय के समय भगवान् का दर्शन किया, हे श्रेष्ठ राजन्! उस समय देखा गया स्वप्न दस दिनों में फल देने वाला होता है।
श्लोक 137 (skanda.2.57.137)
क्रत्वंते भगवानत्र प्रत्यक्षस्ते भविष्यति । यदाह मद्गिरा त्वां हि चराचरगुरुर्विधिः
kratvaṁte bhagavānatra pratyakṣaste bhaviṣyati yadāha madgirā tvāṁ hi carācaragururvidhiḥ
यज्ञ की समाप्ति पर भगवान् स्वयं यहाँ तुम्हें साक्षात् प्राप्त होंगे; क्योंकि जो चराचर के गुरु ब्रह्मा ने मेरे वचन द्वारा तुमसे कहा था,
श्लोक 138 (skanda.2.57.138)
सोऽपि त्वया जगत्स्रष्टा स्वप्नेऽस्मिन्नवलोकितः । तदनुष्ठीयतां यज्ञः पराग्रे न प्रकाशय
so'pi tvayā jagatsraṣṭā svapne'sminnavalokitaḥ tadanuṣṭhīyatāṁ yajñaḥ parāgre na prakāśaya
— उसी जगत्-स्रष्टा को तुमने इस स्वप्न में देखा है। अतः यज्ञ का अनुष्ठान जारी रहने दो; इसे किसी और के आगे प्रकट मत करना।'
श्लोक 139 (skanda.2.57.139)
स्वप्नोऽयं नृपशार्दूल दुर्बोधाचरितो हरेः । किंतु भाग्यवतस्त्वेव स्वप्नस्तादृक्प्रजायते
svapno'yaṁ nṛpaśārdūla durbodhācarito hareḥ kiṁtu bhāgyavatastveva svapnastādṛkprajāyate
'हे नृपश्रेष्ठ! यह स्वप्न हरि के उन आचरणों में से है, जो दुर्बोध हैं; परंतु ऐसा स्वप्न भाग्यशाली पुरुष को ही प्राप्त होता है।'