वैष्णव खण्ड · अध्याय 58
दिव्य वृक्ष की प्राप्ति और शिल्पी का व्रत
श्लोक 1 (skanda.2.58.1)
जैमिनिरुवाच । ततः प्रववृते सुत्या नृपतेर्वाजिमेधिका । तस्यां त्रैलोक्यमभवदेकसद्मनिभं द्विजाः
jaiminiruvāca tataḥ pravavṛte sutyā nṛpatervājimedhikā tasyāṁ trailokyamabhavadekasadmanibhaṁ dvijāḥ
जैमिनि ने कहा — तब राजा के अश्वमेध यज्ञ की सुत्या (सोमाभिषव) रीति आगे बढ़ी; उसमें, हे द्विजो, तीनों लोक मानो एक ही घर के समान हो गए।
श्लोक 2 (skanda.2.58.2)
शास्त्रैः स्तोत्रैर्दिवस्पृग्भिर्वर्णक्रमसमुज्ज्वलैः । यथापदस्वरन्यासैरन्ये शब्दास्तिरोहिताः
śāstraiḥ stotrairdivaspṛgbhirvarṇakramasamujjvalaiḥ yathāpadasvaranyāsairanye śabdāstirohitāḥ
आकाश को स्पर्श करने वाले शास्त्रों और स्तोत्रों से, जो वर्णों के सही क्रम से देदीप्यमान थे, स्वर और स्थान के यथोचित न्यास से अन्य सब शब्द दब गए।
श्लोक 3 (skanda.2.58.3)
दीनेभ्योऽवारितं तत्र दीयन्ते वाञ्छितानि वै । नटनर्त्तकसूतानां साभूत्कल्पद्रुमोपमा
dīnebhyo'vāritaṁ tatra dīyante vāñchitāni vai naṭanarttakasūtānāṁ sābhūtkalpadrumopamā
वहाँ दीनों को बिना रोक-टोक इच्छित वस्तुएँ दी जाती थीं; नट, नर्तक और सूतों के लिए वह सभा कल्पवृक्ष के समान हो गई थी।
श्लोक 4 (skanda.2.58.4)
तन्मध्येऽवभृथे स्नातुं कृता यत्रोपकारिका । दक्षिणे तटभूदेशे बिल्वेश्वरसमीपतः
tanmadhye'vabhṛthe snātuṁ kṛtā yatropakārikā dakṣiṇe taṭabhūdeśe bilveśvarasamīpataḥ
उसके मध्य अवभृथ-स्नान के लिए एक उपकारिका (स्नान-स्थल) बनाई गई थी, दक्षिण दिशा में तट-भूमि पर, बिल्वेश्वर के समीप।
श्लोक 5 (skanda.2.58.5)
नियुक्ताः सेवका राज्ञा ससंभ्रममुपस्थिताः । न्यवेदयन्त नृपतिं कृतांजलिपुटा द्विजाः
niyuktāḥ sevakā rājñā sasaṁbhramamupasthitāḥ nyavedayanta nṛpatiṁ kṛtāṁjalipuṭā dvijāḥ
राजा द्वारा नियुक्त सेवक घबराए हुए वहाँ उपस्थित हुए; हाथ जोड़कर उन द्विजों ने राजा को निवेदन किया।
श्लोक 6 (skanda.2.58.6)
देव दृष्टो महान्वृक्षस्तटभूमौ महोदधेः । प्रविष्टाग्रसमुद्रांतः कल्लोलप्लवमूलकः
deva dṛṣṭo mahānvṛkṣastaṭabhūmau mahodadheḥ praviṣṭāgrasamudrāṁtaḥ kallolaplavamūlakaḥ
'हे देव! महासागर के तट-भूमि पर एक विशाल वृक्ष देखा गया है, जिसका अग्रभाग समुद्र में प्रविष्ट है और जो लहरों पर तैरता हुआ जड़ सहित है।'
श्लोक 7 (skanda.2.58.7)
मंजिष्ठवर्णः सर्वत्र शंखचक्रांकितः प्लवन् । स्नानवेश्मसमीपेऽसौ दृष्टोऽस्माभिः परोऽद्भुतः
maṁjiṣṭhavarṇaḥ sarvatra śaṁkhacakrāṁkitaḥ plavan snānaveśmasamīpe'sau dṛṣṭo'smābhiḥ paro'dbhutaḥ
'सर्वत्र मंजिष्ठा (लाल रंग) के वर्ण वाला, शंख-चक्र से अंकित, तैरता हुआ — यह अत्यंत अद्भुत वृक्ष हमने स्नान-गृह के समीप देखा है।'
श्लोक 8 (skanda.2.58.8)
न दृष्टपूर्वो वृक्षोऽयमुद्यत्सूर्यनिभोंऽशुना । गंधेन वासयन्सर्वा तटभूमिं सुगंधिना
na dṛṣṭapūrvo vṛkṣo'yamudyatsūryanibhoṁ'śunā gaṁdhena vāsayansarvā taṭabhūmiṁ sugaṁdhinā
'यह वृक्ष पहले कभी नहीं देखा गया, उदित सूर्य के समान किरणों वाला, अपनी सुगंध से समस्त तट-भूमि को सुवासित करने वाला।'
श्लोक 9 (skanda.2.58.9)
द्रुमः साधारणो नायं लक्ष्यते देवभूरुहः । कश्चिद्देवस्तरुव्याजादागतो लक्ष्यते धुवम्
drumaḥ sādhāraṇo nāyaṁ lakṣyate devabhūruhaḥ kaściddevastaruvyājādāgato lakṣyate dhuvam
'यह कोई साधारण वृक्ष प्रतीत नहीं होता, यह देवताओं का वृक्ष जान पड़ता है; निश्चय ही कोई देवता वृक्ष के बहाने यहाँ आया है।'
श्लोक 10 (skanda.2.58.10)
नियुक्तानां वचः श्रुत्वा राजा नारदमब्रवीत् । तत्किं निमित्तं यद्दृष्टं तरुश्रेष्ठं वदंति ते
niyuktānāṁ vacaḥ śrutvā rājā nāradamabravīt tatkiṁ nimittaṁ yaddṛṣṭaṁ taruśreṣṭhaṁ vadaṁti te
नियुक्त सेवकों की बात सुनकर राजा ने नारद से कहा — 'यह क्या कारण है, जिस श्रेष्ठ वृक्ष के देखे जाने की बात वे कहते हैं?'
श्लोक 11 (skanda.2.58.11)
नारदः प्रहसन्वाक्यमुवाच नृपसत्तमम् । पूर्णाहुतिः समाप्नोतु यथा स्यात्सफलः क्रतुः
nāradaḥ prahasanvākyamuvāca nṛpasattamam pūrṇāhutiḥ samāpnotu yathā syātsaphalaḥ kratuḥ
नारद ने हँसते हुए श्रेष्ठ राजा से कहा — 'पूर्णाहुति सम्पन्न होने दो, जिससे यज्ञ सफल हो सके।'
श्लोक 12 (skanda.2.58.12)
उपस्थितं ते तद्भाग्यं स्वप्ने यद्दृष्टवान्पुरा । श्वेतद्वीपे विश्वमूर्तिर्दृष्टो यो विष्णुरव्ययः
upasthitaṁ te tadbhāgyaṁ svapne yaddṛṣṭavānpurā śvetadvīpe viśvamūrtirdṛṣṭo yo viṣṇuravyayaḥ
'तुम्हारा वह सौभाग्य उपस्थित है जो तुमने पहले स्वप्न में देखा था — श्वेतद्वीप में देखे गए विश्वरूप, अव्यय विष्णु।'
श्लोक 13 (skanda.2.58.13)
तदंगस्खलितं रोम तरुत्वमुपपद्यते । अंशावतारः स्थास्नुर्यः पृथिव्यां परमेष्ठिनः
tadaṁgaskhalitaṁ roma tarutvamupapadyate aṁśāvatāraḥ sthāsnuryaḥ pṛthivyāṁ parameṣṭhinaḥ
'उनके शरीर से गिरा हुआ एक रोम वृक्ष-रूप को प्राप्त हुआ है; यह परमेष्ठी का पृथ्वी पर स्थायी अंशावतार है।'
श्लोक 14 (skanda.2.58.14)
तद्रूपावतरं याति भगवान्भक्तवत्सलः । द्रुमो ह्यपौरुषो योसौ भाजनं नास्य दर्शने
tadrūpāvataraṁ yāti bhagavānbhaktavatsalaḥ drumo hyapauruṣo yosau bhājanaṁ nāsya darśane
'भक्तवत्सल भगवान् उसी रूप में अवतरित होते हैं; क्योंकि यह वृक्ष अपौरुषेय है, उन्हीं के दर्शन का पात्र है।'
श्लोक 15 (skanda.2.58.15)
त्वामृते पुरुषव्याघ्र पृथिव्यां नृपसत्तम । त्वद्भाग्यवशतः सर्वलोकानां नयनातिथिः
tvāmṛte puruṣavyāghra pṛthivyāṁ nṛpasattama tvadbhāgyavaśataḥ sarvalokānāṁ nayanātithiḥ
'हे पुरुषश्रेष्ठ नृपश्रेष्ठ! पृथ्वी पर तुम्हारे अतिरिक्त और किसी के लिए नहीं — तुम्हारे ही सौभाग्य से यह समस्त लोकों के नेत्रों का अतिथि बनेगा।'
श्लोक 16 (skanda.2.58.16)
भविष्यति महाराज सर्वकल्मषनाशनः । समाप्यावभृथस्नानं तटांते सरितां पतेः
bhaviṣyati mahārāja sarvakalmaṣanāśanaḥ samāpyāvabhṛthasnānaṁ taṭāṁte saritāṁ pateḥ
'हे महाराज! वे समस्त पापों का नाश करने वाले होंगे। नदियों के स्वामी (समुद्र) के तट पर अवभृथ-स्नान पूर्ण करो,
श्लोक 17 (skanda.2.58.17)
उत्सवं सुमहत्कृत्वा कृतकौतुकमंगलम् । महावेद्यां स्थापयात्र यज्ञेशं तरुरूपिणम्
utsavaṁ sumahatkṛtvā kṛtakautukamaṁgalam mahāvedyāṁ sthāpayātra yajñeśaṁ tarurūpiṇam
— अत्यंत महान उत्सव करके, कौतुक-मंगल सम्पन्न कर, यहाँ महावेदी पर वृक्ष-रूपी यज्ञेश्वर को स्थापित करो।'
श्लोक 18 (skanda.2.58.18)
विचार्येत्थं मुदा युक्तौ तावुभौ नृपनारदौ । सुसमृद्धौ तत्र यातौ यत्रासौ भगवद्द्रुमः
vicāryetthaṁ mudā yuktau tāvubhau nṛpanāradau susamṛddhau tatra yātau yatrāsau bhagavaddrumaḥ
इस प्रकार विचार कर, आनंद से युक्त वे दोनों राजा और नारद, अत्यंत समृद्ध होकर, वहाँ गए जहाँ वह भगवद्-वृक्ष था।
श्लोक 19 (skanda.2.58.19)
तं दृष्ट्वा हर्षिताः सर्वे ब्रह्म साक्षादुपस्थितम् । मेनिरे जन्मसाफल्यं जीवन्मुक्ता महोदयाः
taṁ dṛṣṭvā harṣitāḥ sarve brahma sākṣādupasthitam menire janmasāphalyaṁ jīvanmuktā mahodayāḥ
उसे देखकर सब हर्षित हुए; साक्षात् ब्रह्म को उपस्थित मानकर, जीवन्मुक्त महाभाग्यशाली जनों ने अपने जन्म को सफल माना।
श्लोक 20 (skanda.2.58.20)
इन्द्रद्युम्नोऽपि नृपतिर्ममज्जामृतसागरे । स्वप्ने दृष्ट्वा जगन्नाथं यथासौ भगवत्प्रियः
indradyumno'pi nṛpatirmamajjāmṛtasāgare svapne dṛṣṭvā jagannāthaṁ yathāsau bhagavatpriyaḥ
राजा इंद्रद्युम्न भी अमृत-सागर में डूब गए, क्योंकि भगवान् के प्रिय होने के कारण, जैसे उन्होंने स्वप्न में जगन्नाथ को देखा था,
श्लोक 21 (skanda.2.58.21)
तथा ददर्श तं वृक्षं चक्षुःशाखं चतुर्भुजम् । स्वकं श्रमं मन्यमानः सफलं नृपसत्तमः
tathā dadarśa taṁ vṛkṣaṁ cakṣuḥśākhaṁ caturbhujam svakaṁ śramaṁ manyamānaḥ saphalaṁ nṛpasattamaḥ
वैसे ही उन्होंने उस वृक्ष को नेत्र-रूपी शाखाओं वाला और चार भुजाओं वाला देखा; और श्रेष्ठ राजा ने अपने परिश्रम को सफल माना।
श्लोक 22 (skanda.2.58.22)
जहौ शोकं नीलमणिमाधवांतर्धिजं द्विजाः । पुनः पुनः प्रणम्यैनं हर्षाश्रुनयनो नृपः
jahau śokaṁ nīlamaṇimādhavāṁtardhijaṁ dvijāḥ punaḥ punaḥ praṇamyainaṁ harṣāśrunayano nṛpaḥ
उन्होंने नीलमणि-माधव के अंतर्धान से उत्पन्न शोक त्याग दिया, हे द्विजो; हर्ष के आँसुओं से भरे नेत्रों वाले राजा ने बार-बार उसे प्रणाम किया।
श्लोक 23 (skanda.2.58.23)
द्विजैराहारयामास तरुं कल्लोललोलितम् । शंखकाहालमुरजढक्कापटहनिःस्वनैः
dvijairāhārayāmāsa taruṁ kallolalolitam śaṁkhakāhālamurajaḍhakkāpaṭahaniḥsvanaiḥ
द्विजों के साथ उन्होंने लहरों से हिलते हुए उस वृक्ष को तट पर लाया, शंख, काहल, मृदंग, ढक्का और पटह की ध्वनियों के साथ,
श्लोक 24 (skanda.2.58.24)
गीतवादित्रनिनदैर्जयशब्दैः सहस्रशः । सुगंधिपुष्पांजलिभिराकाशात्पतितैर्मुहुः
gītavāditraninadairjayaśabdaiḥ sahasraśaḥ sugaṁdhipuṣpāṁjalibhirākāśātpatitairmuhuḥ
गीत-वाद्यों की ध्वनियों और सहस्रों जय-जयकारों के साथ, आकाश से बार-बार गिरती हुई सुगंधित पुष्पांजलियों के साथ,
श्लोक 25 (skanda.2.58.25)
परितो धूपपात्रैश्च कृष्णागुरुसुधूपितैः । वेश्याभिर्यौवनोन्मत्तसुरूपाभिः प्रचालितैः
parito dhūpapātraiśca kṛṣṇāgurusudhūpitaiḥ veśyābhiryauvanonmattasurūpābhiḥ pracālitaiḥ
चारों ओर कृष्णागुरु से सुधूपित धूप-पात्रों के साथ, यौवन से उन्मत्त सुरूपा वेश्याओं द्वारा हिलाए जाते हुए,
श्लोक 26 (skanda.2.58.26)
रत्नदण्डप्रकीर्णैश्च वीज्यमानं समंततः । पताकाभिर्दिव्यपट्टदुकूलाभिः सुशोभितम्
ratnadaṇḍaprakīrṇaiśca vījyamānaṁ samaṁtataḥ patākābhirdivyapaṭṭadukūlābhiḥ suśobhitam
रत्नजड़ित दंडों वाले पंखों से चारों ओर हवा किए जाते हुए, दिव्य पट्ट और दुकूल की पताकाओं से सुशोभित।
श्लोक 27 (skanda.2.58.27)
राजर्षिराजवृन्दैश्च तुरगैः पत्तिभिर्वृतम् । मागधैर्वंद्यमानं तु स्तूयमानं महर्षिभिः
rājarṣirājavṛndaiśca turagaiḥ pattibhirvṛtam māgadhairvaṁdyamānaṁ tu stūyamānaṁ maharṣibhiḥ
राजर्षियों और राजाओं के समूहों से, घोड़ों और पैदल सैनिकों से घिरा हुआ, मागधों द्वारा वंदित और महर्षियों द्वारा स्तुत,
श्लोक 28 (skanda.2.58.28)
ऋत्विग्भिर्ब्राह्मणैश्चैव विद्वद्भिः श्रोत्रियैस्तथा । राजन्यैर्वैश्यकुलजैः सच्छूद्रैः परिचारितम्
ṛtvigbhirbrāhmaṇaiścaiva vidvadbhiḥ śrotriyaistathā rājanyairvaiśyakulajaiḥ sacchūdraiḥ paricāritam
ऋत्विजों, ब्राह्मणों, विद्वानों, श्रोत्रियों तथा क्षत्रियों, वैश्यकुलजातों और सच्छूद्रों द्वारा सेवित,
श्लोक 29 (skanda.2.58.29)
स्तोत्रैर्बहुविधैः श्रौतैः स्मार्तैः पौराणिकैस्तथा । स्तूयमानं तरुं विष्णोर्भूर्लोके परिवेष्टितम्
stotrairbahuvidhaiḥ śrautaiḥ smārtaiḥ paurāṇikaistathā stūyamānaṁ taruṁ viṣṇorbhūrloke pariveṣṭitam
श्रौत, स्मार्त और पौराणिक — अनेक प्रकार के स्तोत्रों से स्तुत होते हुए विष्णु के उस वृक्ष को, जो पृथ्वीलोक में घिरा हुआ था,
श्लोक 30 (skanda.2.58.30)
स्रग्गन्धालंकृतं दिव्यं महावेदीं विनिन्यतुः। वितानवरचित्रायां वेष्टितायां निरंतरम्
sraggandhālaṁkṛtaṁ divyaṁ mahāvedīṁ vininyatuḥ vitānavaracitrāyāṁ veṣṭitāyāṁ niraṁtaram
माला और गंध से अलंकृत, दिव्य वितान से आच्छादित करते हुए, वे दोनों निरंतर महावेदी की ओर ले गए।
श्लोक 31 (skanda.2.58.31)
वेद्यां तं स्थापयामासुरिंद्रद्युम्नस्य शासनात् । वचसा नारदस्यैनं पूजयामास पार्थिवः
vedyāṁ taṁ sthāpayāmāsuriṁdradyumnasya śāsanāt vacasā nāradasyainaṁ pūjayāmāsa pārthivaḥ
इंद्रद्युम्न के आदेश से उन्होंने उसे वेदी पर स्थापित किया; नारद के वचन से राजा ने उसका पूजन किया,
श्लोक 32 (skanda.2.58.32)
सहस्रैरुपचाराणां दिव्यरूपैर्नृपोत्तमः । पूजावसाने पप्रच्छ नारदं मुनिसत्तमम्
sahasrairupacārāṇāṁ divyarūpairnṛpottamaḥ pūjāvasāne papraccha nāradaṁ munisattamam
सहस्रों दिव्य उपचारों से, श्रेष्ठ राजा ने; पूजा की समाप्ति पर उन्होंने मुनिश्रेष्ठ नारद से पूछा —
श्लोक 33 (skanda.2.58.33)
कीदृश्यः प्रतिमा विष्णोर्घटयिष्यति कः पुनः । तच्छ्रुत्वा तं मुनिः प्राह अचिंत्यमहिमा गुरुः
kīdṛśyaḥ pratimā viṣṇorghaṭayiṣyati kaḥ punaḥ tacchrutvā taṁ muniḥ prāha aciṁtyamahimā guruḥ
'विष्णु की प्रतिमा कैसी होगी, और उसे कौन गढ़ेगा?' यह सुनकर मुनि ने कहा — 'गुरु की महिमा अचिंत्य है।
श्लोक 34 (skanda.2.58.34)
को वेद तस्य चेष्टां वै सर्वलोकोत्तरां नृप । स्रष्टा यो जगतां तस्याप्येषा संशयगोचरा
ko veda tasya ceṣṭāṁ vai sarvalokottarāṁ nṛpa sraṣṭā yo jagatāṁ tasyāpyeṣā saṁśayagocarā
'हे राजन! उनकी चेष्टा को कौन जानता है, जो समस्त लोकों से परे है? जगत् के स्रष्टा (ब्रह्मा) के लिए भी यह संशय का विषय है।'
श्लोक 35 (skanda.2.58.35)
विचारयंतौ तावित्थं यावन्नारदपार्थिवौ । अशरीरा ततो वाणी शुश्रुवे चांतरिक्षतः
vicārayaṁtau tāvitthaṁ yāvannāradapārthivau aśarīrā tato vāṇī śuśruve cāṁtarikṣataḥ
नारद और राजा जब तक इस प्रकार विचार कर रहे थे, तभी आकाश से एक अशरीरी वाणी सुनाई दी,
श्लोक 36 (skanda.2.58.36)
तत्र विस्मयमानानां सर्वेषामेव शृण्वताम् । अपौरुषेयो भगवानविचारपथे स्थितः
tatra vismayamānānāṁ sarveṣāmeva śṛṇvatām apauruṣeyo bhagavānavicārapathe sthitaḥ
वहाँ उपस्थित, आश्चर्यचकित हो सुनते हुए सभी को — 'भगवान् अपौरुषेय हैं, वे विचार के मार्ग से परे स्थित हैं।'
श्लोक 37 (skanda.2.58.37)
सुगुप्तायां महावेद्यां स्वयं सोऽवतरिष्यति । प्रच्छाद्यतां दिनान्येषा यावत्पंचदशानि वै
suguptāyāṁ mahāvedyāṁ svayaṁ so'vatariṣyati pracchādyatāṁ dinānyeṣā yāvatpaṁcadaśāni vai
'वे स्वयं सुरक्षित महावेदी पर अवतरित होंगे; यह पंद्रह दिनों तक ढकी रहे।'
श्लोक 38 (skanda.2.58.38)
उपस्थितोऽयं यो वृद्धः शस्त्रपाणिस्तु वर्द्धकिः । एनमंतः प्रवेश्यैव द्वारं बध्नंतु यत्नतः
upasthito'yaṁ yo vṛddhaḥ śastrapāṇistu varddhakiḥ enamaṁtaḥ praveśyaiva dvāraṁ badhnaṁtu yatnataḥ
'यह जो वृद्ध शिल्पकार शस्त्र हाथ में लिए उपस्थित हुआ है, इसे भीतर प्रवेश कराकर द्वार को यत्नपूर्वक बंद कर दें।'
श्लोक 39 (skanda.2.58.39)
बहिर्वाद्यानि कुर्वंतु यावत्तु घटना भवेत् । श्रुतो हि घटनाशब्दो बाधिर्यांधत्वदायकः
bahirvādyāni kurvaṁtu yāvattu ghaṭanā bhavet śruto hi ghaṭanāśabdo bādhiryāṁdhatvadāyakaḥ
'बाहर वाद्य बजाते रहें जब तक निर्माण-कार्य चलता रहे; क्योंकि निर्माण की ध्वनि सुन लेने से बहरापन और अंधापन प्राप्त होता है,
श्लोक 40 (skanda.2.58.40)
नरके वसतिं चैव कुर्यात्संताननाशनम् । नांतःप्रवेशनं कुर्यान्न पश्येच्च कदाचन
narake vasatiṁ caiva kuryātsaṁtānanāśanam nāṁtaḥpraveśanaṁ kuryānna paśyecca kadācana
— और नरक-वास तथा संतान का नाश होता है। कोई भी भीतर प्रवेश न करे और कभी भी न देखे।'
श्लोक 41 (skanda.2.58.41)
नियुक्तादन्यः पश्येच्चेद्राज्ञो राष्ट्रस्य चैव ह । द्रष्टुश्चापि महाभीतिरंधता चक्षुषोर्युगे
niyuktādanyaḥ paśyeccedrājño rāṣṭrasya caiva ha draṣṭuścāpi mahābhītiraṁdhatā cakṣuṣoryuge
'यदि नियुक्त व्यक्ति के अतिरिक्त कोई और देखे, तो राजा और राष्ट्र दोनों को महाभय होगा, और देखने वाले की दोनों आँखें अंधी हो जाएँगी।'
श्लोक 42 (skanda.2.58.42)
तस्मान्नावेक्षणं कार्यं यावत्प्रतिमनिर्मितिः । निर्व्यूढस्तु स्वयं दैवः कृत्यांते तु वदिष्यति
tasmānnāvekṣaṇaṁ kāryaṁ yāvatpratimanirmitiḥ nirvyūḍhastu svayaṁ daivaḥ kṛtyāṁte tu vadiṣyati
'अतः जब तक प्रतिमा-निर्माण पूर्ण न हो, तब तक देखना नहीं चाहिए। कार्य पूर्ण होने पर स्वयं देव ही कार्य की समाप्ति पर बताएँगे —
श्लोक 43 (skanda.2.58.43)
यत्कार्यं प्रयत्नेन सर्वलोकसुखावहम् । तच्छ्रुत्वा नारदाद्यास्ते यथोक्तं विष्णुना स्वयम्
yatkāryaṁ prayatnena sarvalokasukhāvaham tacchrutvā nāradādyāste yathoktaṁ viṣṇunā svayam
— वह कार्य, जो प्रयत्नपूर्वक किया गया, समस्त लोकों को सुख देने वाला होगा।' यह सुनकर, विष्णु के स्वयं कहे इस वचन के अनुसार, नारद आदि,
श्लोक 44 (skanda.2.58.44)
चिकीर्षंति तथा कर्त्तुं तत्रायातश्च वर्द्धकिः । प्रोवाच नृपतिं सोऽथ स्वप्ने दृष्टास्तु यास्त्वया
cikīrṣaṁti tathā karttuṁ tatrāyātaśca varddhakiḥ provāca nṛpatiṁ so'tha svapne dṛṣṭāstu yāstvayā
उसी प्रकार करने का संकल्प करने लगे; और वहाँ वह शिल्पकार आया। उसने राजा से कहा — 'तुमने स्वप्न में जो रूप देखे थे,
श्लोक 45 (skanda.2.58.45)
ता एवाहं घटिष्यामि दारुणा दिव्यरूपिणा । इत्युक्त्वांतर्दधे वेद्यां वृद्धवर्द्धकिरूपधृक्
tā evāhaṁ ghaṭiṣyāmi dāruṇā divyarūpiṇā ityuktvāṁtardadhe vedyāṁ vṛddhavarddhakirūpadhṛk
— उन्हीं रूपों को मैं काष्ठ से, दिव्य आकार में गढ़ूँगा।' यह कहकर, वृद्ध शिल्पकार का रूप धारण किए हुए, वे वेदी में अंतर्धान हो गए —
श्लोक 46 (skanda.2.58.46)
वंचनार्थं मनुष्याणां साक्षान्नारायणो विभुः
vaṁcanārthaṁ manuṣyāṇāṁ sākṣānnārāyaṇo vibhuḥ
— साक्षात् सर्वव्यापी नारायण ही, मनुष्यों को धोखा देने (परीक्षा में डालने) के प्रयोजन से।