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वैष्णव खण्ड · अध्याय 59

चतुर्मूर्ति का प्राकट्य — जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (skanda.2.59.1)

जैमिनिरुवाच । ततः स पृथिवीपालस्तथा कृत्वांऽतरिक्षगा । यदुवाच गिरां देवी तद्वत्परिचचार ह

jaiminiruvāca tataḥ sa pṛthivīpālastathā kṛtvāṁ'tarikṣagā yaduvāca girāṁ devī tadvatparicacāra ha

जैमिनि ने कहा — तब उस पृथ्वीपाल ने वैसा ही किया, और आकाशगामिनी वाग्देवी ने जो कहा था, उसी के अनुसार आचरण किया।

श्लोक 2 (skanda.2.59.2)

एवं दिनेदिने याते दिव्यगंधोऽनुभूयते । पारिजातप्रसूनानां वृष्टिर्मर्त्येषु दुर्लभा

evaṁ dinedine yāte divyagaṁdho'nubhūyate pārijātaprasūnānāṁ vṛṣṭirmartyeṣu durlabhā

इस प्रकार दिन-प्रतिदिन बीतते हुए दिव्य सुगंध का अनुभव होता था; पारिजात के पुष्पों की वर्षा हुई, जो मनुष्यों में दुर्लभ है।

श्लोक 3 (skanda.2.59.3)

दिव्यसंगीतनादश्च गीतानि रुचिराणि च । स्वर्गंगाजलवृष्टिश्च सूक्ष्मबिंदुसुशोभना

divyasaṁgītanādaśca gītāni rucirāṇi ca svargaṁgājalavṛṣṭiśca sūkṣmabiṁdusuśobhanā

दिव्य संगीत की ध्वनि और मनोहर गीत सुनाई देते थे, तथा सूक्ष्म बूँदों से शोभित स्वर्ग-गंगा के जल की वर्षा होती थी।

श्लोक 4 (skanda.2.59.4)

ऐरावतादिनागानां मदगंधो वनद्विपैः । दुःसहः सर्वभूतानां सुखकार्यनुभूयते

airāvatādināgānāṁ madagaṁdho vanadvipaiḥ duḥsahaḥ sarvabhūtānāṁ sukhakāryanubhūyate

ऐरावत आदि नागों तथा वन के हाथियों की मद-गंध, जो अन्यत्र सब प्राणियों के लिए असह्य होती है, यहाँ सुखकारक अनुभव होती थी।

श्लोक 5 (skanda.2.59.5)

यज्ञार्थमागता देवास्ते सर्वे विगतज्वराः । आविर्भूतं हरिं दृष्ट्वा उपासांचक्रिरे द्विजाः

yajñārthamāgatā devāste sarve vigatajvarāḥ āvirbhūtaṁ hariṁ dṛṣṭvā upāsāṁcakrire dvijāḥ

यज्ञ के लिए आए हुए सभी देवगण, अपने सारे संताप त्यागकर, प्रकट हुए हरि को देखकर उनकी उपासना करने लगे, हे द्विजो।

श्लोक 6 (skanda.2.59.6)

यथा हि माधवं पूर्वं तथा तं विष्णुशाखिनम् । उपासनासु देवानां दिव्यचिह्नानि जज्ञिरे

yathā hi mādhavaṁ pūrvaṁ tathā taṁ viṣṇuśākhinam upāsanāsu devānāṁ divyacihnāni jajñire

जैसे पहले माधव की उपासना होती थी, वैसे ही उस विष्णु-वृक्ष की भी; देवताओं की उपासनाओं में दिव्य चिह्न प्रकट होने लगे।

श्लोक 7 (skanda.2.59.7)

निर्ववाह स्वयं देवः क्रमात्पंचदशे दिने । चतुर्मूर्तिः स भगवान्यथा पूर्वं मयोदितः

nirvavāha svayaṁ devaḥ kramātpaṁcadaśe dine caturmūrtiḥ sa bhagavānyathā pūrvaṁ mayoditaḥ

देव ने स्वयं क्रमशः पंद्रहवें दिन कार्य पूर्ण किया — वे भगवान् चतुर्मूर्ति हुए, जैसा मैंने पहले वर्णन किया था।

श्लोक 8 (skanda.2.59.8)

तादृगाविर्बभूवासौ युष्माकं वर्णितः पुरा । दिव्यसिंहासनगतो बलभद्रासुदर्शनैः

tādṛgāvirbabhūvāsau yuṣmākaṁ varṇitaḥ purā divyasiṁhāsanagato balabhadrāsudarśanaiḥ

वे उसी प्रकार प्रकट हुए जैसा तुम्हें पहले वर्णित किया गया था — दिव्य सिंहासन पर बलभद्र और सुदर्शन के साथ विराजमान,

श्लोक 9 (skanda.2.59.9)

शंखचक्रगदापद्मलसद्बाहुर्जनार्दनः । गदामुसलचक्राब्जं धारयन्पन्नगाकृतिः

śaṁkhacakragadāpadmalasadbāhurjanārdanaḥ gadāmusalacakrābjaṁ dhārayanpannagākṛtiḥ

शंख, चक्र, गदा और पद्म से सुशोभित भुजाओं वाले जनार्दन; और नाग-रूप में गदा, मूसल, चक्र तथा पद्म धारण किए हुए,

श्लोक 10 (skanda.2.59.10)

छत्राकृतिफणासप्तमुकुटोज्ज्वलकुंडलः । सुभद्रा चारुवदना वराब्जाभयधारिणी

chatrākṛtiphaṇāsaptamukuṭojjvalakuṁḍalaḥ subhadrā cāruvadanā varābjābhayadhāriṇī

उनके सात फणों का छत्राकार विस्तार, मुकुट और कुंडलों से देदीप्यमान; और सुभद्रा, सुंदर मुख वाली, वर तथा अभय की मुद्रा और कमल धारण किए हुए,

श्लोक 11 (skanda.2.59.11)

लक्ष्मीः प्रादुर्बभूवेयं सर्वचैतन्यरूपिणी । इयं कृष्णावतारे हि रोहिणीगर्भसंभवा

lakṣmīḥ prādurbabhūveyaṁ sarvacaitanyarūpiṇī iyaṁ kṛṣṇāvatāre hi rohiṇīgarbhasaṁbhavā

यह लक्ष्मी प्रकट हुई, समस्त चैतन्य का साक्षात् रूप; कृष्णावतार में यही रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुई थी,

श्लोक 12 (skanda.2.59.12)

बलभद्राकृतिर्जाता बलरूपस्य चिंतनात् । क्षणं न सहते सा हि मोक्तुं लीलावतारिणम्

balabhadrākṛtirjātā balarūpasya ciṁtanāt kṣaṇaṁ na sahate sā hi moktuṁ līlāvatāriṇam

'बल' के रूप के चिंतन से बलभद्र का आकार धारण किए हुए; क्योंकि वह लीला-अवतारी को क्षणभर भी छोड़ना सहन नहीं कर पाती।

श्लोक 13 (skanda.2.59.13)

न भेदोऽस्तीह को विप्राः कृष्णस्य च बलस्य च । एकगर्भप्रसूतत्वाद्व्यवहारोऽथ लौकिकः

na bhedo'stīha ko viprāḥ kṛṣṇasya ca balasya ca ekagarbhaprasūtatvādvyavahāro'tha laukikaḥ

हे विप्रो! यहाँ कृष्ण और बल में कोई भेद नहीं है; एक ही गर्भ से जन्म होने के कारण यह भेद केवल लौकिक व्यवहार है।

श्लोक 14 (skanda.2.59.14)

भगिनी बलदेवस्येत्येषा पौराणिकी कथा । पुंरूपे स्त्रीस्वरूपेण लक्ष्मीः सर्वत्र तिष्ठति

bhaginī baladevasyetyeṣā paurāṇikī kathā puṁrūpe strīsvarūpeṇa lakṣmīḥ sarvatra tiṣṭhati

'यह बलदेव की बहन है' — यह पौराणिक कथा है; परंतु लक्ष्मी पुरुष-रूप में भी और स्त्री-रूप में भी सर्वत्र विद्यमान रहती है।

श्लोक 15 (skanda.2.59.15)

पुंनाम्ना भगवान्विष्णुः स्त्रीनाम्ना कमलालया । देवतिर्यङ्मनुष्यादौ विद्यते न तयोः परम्

puṁnāmnā bhagavānviṣṇuḥ strīnāmnā kamalālayā devatiryaṅmanuṣyādau vidyate na tayoḥ param

पुरुष-नाम से वे भगवान् विष्णु हैं, स्त्री-नाम से कमला (लक्ष्मी) निवासिनी हैं; देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि में इन दोनों से परे कुछ भी नहीं है।

श्लोक 16 (skanda.2.59.16)

को ह्यन्यः पुंडरीकाक्षाद्भुवनानि चतुर्दश । धारयेत्तु फणाग्रेण सोऽनंतो बलसंज्ञितः

ko hyanyaḥ puṁḍarīkākṣādbhuvanāni caturdaśa dhārayettu phaṇāgreṇa so'naṁto balasaṁjñitaḥ

पुण्डरीकाक्ष के अतिरिक्त और कौन चौदह भुवनों को अपने फण के अग्रभाग पर धारण कर सकता है? वे ही अनंत हैं, जो 'बल' नाम से कहलाते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.59.17)

तस्य शक्तिस्वरूपेयं भगिनी श्रीः प्रकीर्तिता । सुदर्शनं तु यच्चक्रं सदा विष्णोः करे स्थितम्

tasya śaktisvarūpeyaṁ bhaginī śrīḥ prakīrtitā sudarśanaṁ tu yaccakraṁ sadā viṣṇoḥ kare sthitam

उनकी शक्ति-स्वरूपा यह बहन श्री नाम से प्रसिद्ध है; और जो चक्र सुदर्शन नाम से सदा विष्णु के हाथ में रहता है,

श्लोक 18 (skanda.2.59.18)

शाखाग्रस्तंभमध्यस्थं तद्रूपं तत्तुरीयकम् । एवं तु मूर्त्तयस्तेन चतस्रो वै प्रकाशिताः

śākhāgrastaṁbhamadhyasthaṁ tadrūpaṁ tatturīyakam evaṁ tu mūrttayastena catasro vai prakāśitāḥ

वह शाखा के अग्रभाग के स्तंभ के मध्य में स्थित है, वह चतुर्थ रूप है। इस प्रकार उनके द्वारा चार मूर्तियाँ प्रकट की गईं।

श्लोक 19 (skanda.2.59.19)

निर्वृत्ते भगवद्रूपे चतुर्द्धा दिव्यरूपिणि । लोकानामुपकाराय पुनराहांतरिक्षगा

nirvṛtte bhagavadrūpe caturddhā divyarūpiṇi lokānāmupakārāya punarāhāṁtarikṣagā

जब भगवान् का चतुर्विध दिव्य रूप पूर्ण हो गया, तब आकाशगामिनी वाणी लोकों के हित के लिए पुनः बोली —

श्लोक 20 (skanda.2.59.20)

पटैराच्छाद्य सुदृढं नृपते प्रतिमास्त्विमाः । स्वं स्वं वर्णं प्रापयाशु वर्णकैश्चित्रकर्मणा

paṭairācchādya sudṛḍhaṁ nṛpate pratimāstvimāḥ svaṁ svaṁ varṇaṁ prāpayāśu varṇakaiścitrakarmaṇā

'हे राजन्! इन प्रतिमाओं को वस्त्रों से दृढ़तापूर्वक ढककर, चित्रकर्म द्वारा शीघ्र इन्हें अपना-अपना रंग प्रदान करो।'

श्लोक 21 (skanda.2.59.21)

नीलाभ्रश्यामलं विष्णुं शंखेंदुधवलं बलम् । रक्तं सुदर्शनं चक्रं सुभद्रां कुंकुमारुणाम्

nīlābhraśyāmalaṁ viṣṇuṁ śaṁkheṁdudhavalaṁ balam raktaṁ sudarśanaṁ cakraṁ subhadrāṁ kuṁkumāruṇām

'नील मेघ के समान श्याम विष्णु को, शंख-चंद्रमा के समान श्वेत बल को, लाल सुदर्शन-चक्र को, कुंकुम के समान अरुण सुभद्रा को —

श्लोक 22 (skanda.2.59.22)

नानालंकाररुचिरां नानाभंगिविभागशः । अमी दारुस्वरूपेण दृष्टाः पापाय हेतवे

nānālaṁkārarucirāṁ nānābhaṁgivibhāgaśaḥ amī dārusvarūpeṇa dṛṣṭāḥ pāpāya hetave

— नाना अलंकारों से सुंदर, नाना भंगिमाओं में विभक्त। ये काष्ठ-रूप में देखे जाने पर पाप के कारण बन जाते हैं (यदि अपूर्ण अवस्था में देखे जाएँ)।'

श्लोक 23 (skanda.2.59.23)

गोपनीया प्रयत्नेन पटनिर्यासवल्कलैः । तस्मात्प्रथममेवैतांस्तरोरेवास्य वल्कलैः

gopanīyā prayatnena paṭaniryāsavalkalaiḥ tasmātprathamamevaitāṁstarorevāsya valkalaiḥ

'इन्हें वस्त्र, गोंद और छाल से यत्नपूर्वक ढकना चाहिए; अतः सर्वप्रथम इसी वृक्ष की छाल से,

श्लोक 24 (skanda.2.59.24)

शिल्पिभिः कर्मकुशलैर्दृढमाच्छादयाग्रतः । वर्षे वर्षे च संस्कार्याः पूर्वसंस्कार मोचनात्

śilpibhiḥ karmakuśalairdṛḍhamācchādayāgrataḥ varṣe varṣe ca saṁskāryāḥ pūrvasaṁskāra mocanāt

— कर्मकुशल शिल्पियों द्वारा दृढ़तापूर्वक पहले से आच्छादित किया जाए, और पूर्व लेप को हटाकर प्रतिवर्ष इनका पुनः संस्कार किया जाए।'

श्लोक 25 (skanda.2.59.25)

ऋते वल्कललेपं तु स तु दिव्यश्चिरंतनः । प्रमादाद्य इमं लेपमपनीयेत कश्चन

ṛte valkalalepaṁ tu sa tu divyaściraṁtanaḥ pramādādya imaṁ lepamapanīyeta kaścana

'छाल के लेप के बिना वह चिरंतन दिव्य रूप (अनावृत रहता है); जो कोई प्रमादवश इस लेप को हटा दे,

श्लोक 26 (skanda.2.59.26)

दुर्भिक्षं मरकं राष्ट्रे संततिश्चास्य हीयते । नेक्षितव्यास्त्वया राजन्कदाचिदपवारणाः

durbhikṣaṁ marakaṁ rāṣṭre saṁtatiścāsya hīyate nekṣitavyāstvayā rājankadācidapavāraṇāḥ

— राष्ट्र में दुर्भिक्ष और महामारी लाता है, और उसकी संतान क्षीण हो जाती है। हे राजन्! तुम्हें कभी भी इन्हें अनावृत नहीं देखना चाहिए।'

श्लोक 27 (skanda.2.59.27)

मनुष्यैश्चापि राजेंद्र दृष्टाः स्युर्भयहेतवः । तस्मात्सचित्रा द्रष्टव्या बहुलेपविलेपिताः

manuṣyaiścāpi rājeṁdra dṛṣṭāḥ syurbhayahetavaḥ tasmātsacitrā draṣṭavyā bahulepavilepitāḥ

'हे राजेंद्र! सामान्य मनुष्यों द्वारा देखे जाने पर भी ये भय का कारण बन सकते हैं; अतः इन्हें रंगे-चित्रित और बहुविध लेप से युक्त रूप में ही देखना चाहिए,

श्लोक 28 (skanda.2.59.28)

सुचित्रं पुण्डरीकाक्षं सविलासं सविभ्रमम् । दृष्ट्वा विमुच्यते पापैः कल्पकोटिसमुद्भवैः

sucitraṁ puṇḍarīkākṣaṁ savilāsaṁ savibhramam dṛṣṭvā vimucyate pāpaiḥ kalpakoṭisamudbhavaiḥ

— क्योंकि सुंदर चित्रित, विलासयुक्त और मनोहर पुंडरीकाक्ष को देखकर मनुष्य करोड़ों कल्पों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 29 (skanda.2.59.29)

सुचित्रान्कुरु राजेंद्र चित्रान्कामानवाप्स्यति । आविर्बभूव भगवांस्तवानुग्रहकाम्यया

sucitrānkuru rājeṁdra citrānkāmānavāpsyati āvirbabhūva bhagavāṁstavānugrahakāmyayā

'हे राजेंद्र! इन्हें सुंदर चित्रित करो; ऐसा करने से मनोवांछित कामनाएँ प्राप्त होंगी। भगवान् तुम पर अनुग्रह करने की इच्छा से प्रकट हुए हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.59.30)

तव प्रसादाज्जंतूनां चतुर्वर्गं प्रदास्यति । नीलाद्रौ कल्पवृक्षस्य वायव्यां शतहस्ततः

tava prasādājjaṁtūnāṁ caturvargaṁ pradāsyati nīlādrau kalpavṛkṣasya vāyavyāṁ śatahastataḥ

— तुम्हारे प्रसाद से वे प्राणियों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करेंगे। नीलाद्रि पर, कल्पवृक्ष से वायव्य कोण में सौ हाथ की दूरी पर,

श्लोक 31 (skanda.2.59.31)

प्रदेशे सुमहत्स्थाने प्रासादं सुदृढायतम् । उत्तरे नरसिंहस्य सहस्रकरमुच्छ्रितम्

pradeśe sumahatsthāne prāsādaṁ sudṛḍhāyatam uttare narasiṁhasya sahasrakaramucchritam

— उस अत्यंत विशाल स्थान पर एक सुदृढ़ और विस्तृत प्रासाद बनवाओ, नृसिंह के उत्तर में, सहस्र हाथ ऊँचा उठा हुआ,

श्लोक 32 (skanda.2.59.32)

कारयित्वा प्रतिष्ठाप्य तत्रैनं विनिवेशय । पुरा स्थितं पर्वतेऽस्मिन्योऽभ्यर्चयति माधवम्

kārayitvā pratiṣṭhāpya tatrainaṁ viniveśaya purā sthitaṁ parvate'sminyo'bhyarcayati mādhavam

— बनवाकर और प्रतिष्ठित कर, उन्हें वहाँ स्थापित करो। इस पर्वत पर पूर्वकाल में जो निवास कर माधव की अर्चना करता था,

श्लोक 33 (skanda.2.59.33)

नाम्ना विश्वावसुर्नाम शबरो वैष्णवोत्तमः । पुरोधसः सख्यमासीत्तेन सार्द्धं पुरा च ते

nāmnā viśvāvasurnāma śabaro vaiṣṇavottamaḥ purodhasaḥ sakhyamāsīttena sārddhaṁ purā ca te

— विश्वावसु नामक, वैष्णवश्रेष्ठ शबर था; तुम्हारे पुरोहित की उससे पूर्वकाल में मित्रता थी।

श्लोक 34 (skanda.2.59.34)

तयोः संततिरेवास्य लेपसंस्कारकर्मणि । नियुज्यतां महाराज भविष्यत्सूत्सवेषु च

tayoḥ saṁtatirevāsya lepasaṁskārakarmaṇi niyujyatāṁ mahārāja bhaviṣyatsūtsaveṣu ca

'हे महाराज! उन दोनों की संतान को ही इस लेप-संस्कार के कार्य में तथा भविष्य के उत्सवों में नियुक्त किया जाए।'

श्लोक 35 (skanda.2.59.35)

विररामैतदाभाष्य सा तु दिव्या सरस्वती । तयोपदिष्टमाकर्ण्य प्रहृष्टेनांतरात्मना

virarāmaitadābhāṣya sā tu divyā sarasvatī tayopadiṣṭamākarṇya prahṛṣṭenāṁtarātmanā

यह कहकर वह दिव्य सरस्वती मौन हो गई; उसके उपदेश को सुनकर, प्रसन्न अंतःकरण से,

श्लोक 36 (skanda.2.59.36)

वेष्टनं मोचयामास महावेद्या नृपोत्तमः । ददृशुस्ते तदा सर्वे रत्नसिंहासने स्थितम्

veṣṭanaṁ mocayāmāsa mahāvedyā nṛpottamaḥ dadṛśuste tadā sarve ratnasiṁhāsane sthitam

श्रेष्ठ राजा ने महावेदी का आवरण हटा दिया; तब उन सभी ने रत्न-सिंहासन पर विराजमान देखा —

श्लोक 37 (skanda.2.59.37)

रामं कृष्णं सुभद्रां च वासुदेवं सुदर्शनम् । यथोपदिष्टलेप्यादिसंस्कारे रुचिराकृतिम्

rāmaṁ kṛṣṇaṁ subhadrāṁ ca vāsudevaṁ sudarśanam yathopadiṣṭalepyādisaṁskāre rucirākṛtim

राम, कृष्ण, सुभद्रा और वासुदेव के सुदर्शन को, यथोपदिष्ट लेप आदि संस्कार से युक्त, मनोहर आकृति वाले,

श्लोक 38 (skanda.2.59.38)

कृपया स्मेरवदनमुन्नतायतवक्षसम् । दीनानामुद्धृतौ नाथं प्रलंबभुजपंजरम्

kṛpayā smeravadanamunnatāyatavakṣasam dīnānāmuddhṛtau nāthaṁ pralaṁbabhujapaṁjaram

कृपा से मुस्कुराते मुख वाले, ऊँचे और विस्तृत वक्षस्थल वाले, दीनों के उद्धार में समर्थ नाथ, लंबी भुजाओं के पंजर वाले,

श्लोक 39 (skanda.2.59.39)

प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं हासशोणायताधरम् । पश्यतां दृष्टिमात्रेण हर्तारं पापसंचयम्

prabuddhapuṇḍarīkākṣaṁ hāsaśoṇāyatādharam paśyatāṁ dṛṣṭimātreṇa hartāraṁ pāpasaṁcayam

खिले हुए पुंडरीकाक्ष वाले, हास्य से लालिमा युक्त विस्तृत अधरों वाले, जिन्हें देखने मात्र से देखने वालों के संचित पाप हर लिए जाते हैं —

श्लोक 40 (skanda.2.59.40)

पद्मासनस्थितं कृष्णं दिव्यालंकारभूषितम्। स्वतेजसा परिवृतं दारुदेहेऽपि निर्मलम्

padmāsanasthitaṁ kṛṣṇaṁ divyālaṁkārabhūṣitam svatejasā parivṛtaṁ dārudehe'pi nirmalam

पद्मासन पर विराजमान कृष्ण को, दिव्य आभूषणों से भूषित, अपने ही तेज से घिरे हुए, काष्ठ-देह में भी निर्मल,

श्लोक 41 (skanda.2.59.41)

नीलजीमूतसंकाशं सर्वसंतापनाशनम् । ददर्श बलदेवं च साट्टहासमुखांबुजम्

nīlajīmūtasaṁkāśaṁ sarvasaṁtāpanāśanam dadarśa baladevaṁ ca sāṭṭahāsamukhāṁbujam

नीले मेघ के समान श्याम, समस्त संतापों का नाश करने वाले; और बलदेव को भी उन्होंने देखा, जिनका कमल-मुख अट्टहास से खिला हुआ था,

श्लोक 42 (skanda.2.59.42)

फणामण्डलविस्तीर्णं वारुणीघूर्णितेक्षणम् । प्रोत्थितं नागराजानं पीनोन्नतसुवक्षसम्

phaṇāmaṇḍalavistīrṇaṁ vāruṇīghūrṇitekṣaṇam protthitaṁ nāgarājānaṁ pīnonnatasuvakṣasam

जिनके फणों का मंडल विस्तृत था, जिनके नेत्र मानो वारुणी (मदिरा) से घूर्णित थे, उठे हुए नागराज, जिनका वक्षस्थल पुष्ट और उन्नत था,

श्लोक 43 (skanda.2.59.43)

किंचिन्नतं पृष्ठदेशे कुण्डलीकृतविग्रहम् । अग्रसंफुल्लककुभं कैलासशिखरं यथा

kiṁcinnataṁ pṛṣṭhadeśe kuṇḍalīkṛtavigraham agrasaṁphullakakubhaṁ kailāsaśikharaṁ yathā

पीठ के भाग में कुछ झुके हुए, कुंडलाकार शरीर वाले, अग्रभाग में फैले हुए कंधों वाले, मानो कैलास का शिखर हो,

श्लोक 44 (skanda.2.59.44)

हलचक्राब्जमुसलधारिणं वनमालिनम् । हारकुण्डलकेयूरकिरीटमुकुटोज्ज्वलम्

halacakrābjamusaladhāriṇaṁ vanamālinam hārakuṇḍalakeyūrakirīṭamukuṭojjvalam

हल, चक्र, कमल और मूसल धारण किए हुए, वनमाला पहने हुए, हार, कुंडल, केयूर और किरीट-मुकुट से देदीप्यमान।

श्लोक 45 (skanda.2.59.45)

तयोर्मध्ये स्थितां लक्ष्मीं सुभद्रां भद्ररूपिणीम्

tayormadhye sthitāṁ lakṣmīṁ subhadrāṁ bhadrarūpiṇīm

उन दोनों के मध्य विराजमान लक्ष्मी को, सुभद्रा के रूप में, समस्त मंगल-स्वरूपा,

श्लोक 46 (skanda.2.59.46)

सर्वदेवारणीं पापसागरोत्तारकारिणीम् । विकचांभोजवदनां वराब्जाभयधारिणीम्

sarvadevāraṇīṁ pāpasāgarottārakāriṇīm vikacāṁbhojavadanāṁ varābjābhayadhāriṇīm

समस्त देवताओं की उत्पत्ति-भूमि, पाप-सागर से पार उतारने वाली, खिले हुए कमल के समान मुख वाली, वर-कमल और अभय-मुद्रा धारण किए हुए,

श्लोक 47 (skanda.2.59.47)

रूपलावण्यवसतिं शोभमानां प्रसाधनैः । कुंकुमारुणदेहां तां साक्षाल्लक्ष्मीमिवापराम्

rūpalāvaṇyavasatiṁ śobhamānāṁ prasādhanaiḥ kuṁkumāruṇadehāṁ tāṁ sākṣāllakṣmīmivāparām

रूप और लावण्य का निवास-स्थान, आभूषणों से शोभायमान, कुंकुम के समान अरुण देह वाली, मानो साक्षात् एक और लक्ष्मी हों —

श्लोक 48 (skanda.2.59.48)

ददर्श विष्णोर्वामस्थां चक्रशाखाग्रनिर्मिताम् । बालार्कसदृशीं तीक्ष्णधारां तेजोमयीं द्विजाः

dadarśa viṣṇorvāmasthāṁ cakraśākhāgranirmitām bālārkasadṛśīṁ tīkṣṇadhārāṁ tejomayīṁ dvijāḥ

उन्हें विष्णु के वामभाग में स्थित देखा; और चक्र की शाखा के अग्रभाग में निर्मित, उदीयमान सूर्य के समान, तीक्ष्ण धार वाले, तेजोमय सुदर्शन को भी, हे द्विजो।

श्लोक 49 (skanda.2.59.49)

तां दृष्ट्वानन्दपाथोधि निमग्नः पृथिवीपतिः । कर्तव्यमूढः स्वतनौ स्वयं न प्रबभूव ह

tāṁ dṛṣṭvānandapāthodhi nimagnaḥ pṛthivīpatiḥ kartavyamūḍhaḥ svatanau svayaṁ na prababhūva ha

इसे देखकर, आनंद-सागर में निमग्न हुए पृथ्वीपति, कर्तव्य को लेकर मोहग्रस्त हो गए और स्वयं अपने शरीर पर भी अधिकार न रख सके।

श्लोक 50 (skanda.2.59.50)

दरमीलितनेत्रः सन्सृजन्बाष्पांबु केवलम् । कृतांजलिपुटस्तस्थौ स्थूणाकारो नृपोत्तमः

daramīlitanetraḥ sansṛjanbāṣpāṁbu kevalam kṛtāṁjalipuṭastasthau sthūṇākāro nṛpottamaḥ

आधे मुँदे नेत्रों से केवल आँसुओं की धारा बहाते हुए, हाथ जोड़े हुए श्रेष्ठ राजा एक खंभे के समान स्थिर खड़े रहे।

श्लोक 51 (skanda.2.59.51)

उवाच तं मुनिवरः स्मितवक्त्रः क्षितीश्वरम् । यदर्थं श्रममापन्नस्तत्सांप्रतमभूत्तव

uvāca taṁ munivaraḥ smitavaktraḥ kṣitīśvaram yadarthaṁ śramamāpannastatsāṁpratamabhūttava

मुनिश्रेष्ठ नारद ने मुस्कुराते हुए उस भूपति से कहा — 'जिस उद्देश्य से तुमने यह परिश्रम उठाया था, वह अब तुम्हारा हो गया है।

श्लोक 52 (skanda.2.59.52)

प्रत्यक्षं नृपशार्दूल एकस्त्वं भाग्यवान्भुवि । अमुं पश्य जगन्नाथं पुण्डरीकायतेक्षणम्

pratyakṣaṁ nṛpaśārdūla ekastvaṁ bhāgyavānbhuvi amuṁ paśya jagannāthaṁ puṇḍarīkāyatekṣaṇam

हे नृपशार्दूल! पृथ्वी पर तुम अकेले ही ऐसे भाग्यशाली हो कि उन्हें साक्षात् देख सको। इस जगन्नाथ को देखो, जिनके नेत्र विशाल कमल-दल के समान हैं,

श्लोक 53 (skanda.2.59.53)

भक्तानुग्रहपाथोधिं सर्वज्ञाननिधिं हरिम् । यं द्रष्टुं योगिनो नित्यं यतंति यतमानसाः

bhaktānugrahapāthodhiṁ sarvajñānanidhiṁ harim yaṁ draṣṭuṁ yogino nityaṁ yataṁti yatamānasāḥ

— भक्तों पर अनुग्रह करने वाले सागर, समस्त ज्ञान के निधि, हरि, जिन्हें देखने के लिए योगिजन अपने मन को संयत कर सदा प्रयत्नशील रहते हैं,

श्लोक 54 (skanda.2.59.54)

अवधानेन महता क्षणं पश्यन्ति मानवाः । सोऽयं दारुमयं देहं समास्थाय जनार्दनः

avadhānena mahatā kṣaṇaṁ paśyanti mānavāḥ so'yaṁ dārumayaṁ dehaṁ samāsthāya janārdanaḥ

— जिन्हें मनुष्य अत्यंत सावधानी से क्षणभर के लिए देख पाते हैं। वही जनार्दन इस काष्ठमय देह को धारण कर,

श्लोक 55 (skanda.2.59.55)

अनुग्रहीतुं त्वां भूप प्रत्यक्षत्वमुपागतः । भजैनं धरणीनाथं स्तुहि कारुण्यसागरम्

anugrahītuṁ tvāṁ bhūpa pratyakṣatvamupāgataḥ bhajainaṁ dharaṇīnāthaṁ stuhi kāruṇyasāgaram

— तुम पर अनुग्रह करने के लिए, हे राजन्, तुम्हारे साक्षात् दृष्टिपथ में आए हैं। इस धरणीनाथ की भक्ति करो, इस करुणा-सागर की स्तुति करो —

श्लोक 56 (skanda.2.59.56)

ददाति संस्तुतः कामान्सर्वान्नृप मनोगतान्

dadāti saṁstutaḥ kāmānsarvānnṛpa manogatān

— क्योंकि, हे राजन्, स्तुति किए जाने पर वे मन में स्थित समस्त कामनाओं को प्रदान करते हैं।'

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