वैष्णव खण्ड · अध्याय 60
इंद्रद्युम्न की शरणागति-स्तुति और प्रासाद-निर्माण का संकल्प
श्लोक 1 (skanda.2.60.1)
जैमिनिरुवाच । इत्थं प्रबोधितस्तेन नारदेन क्षितीश्वरः । तुष्टाव जगतां नाथं वचोभिः करुणान्वितम्
jaiminiruvāca itthaṁ prabodhitastena nāradena kṣitīśvaraḥ tuṣṭāva jagatāṁ nāthaṁ vacobhiḥ karuṇānvitam
जैमिनि ने कहा — इस प्रकार नारद के द्वारा प्रबोधित हुए पृथ्वीपति ने करुणा से युक्त वचनों द्वारा जगत्-नाथ की स्तुति की।
श्लोक 2 (skanda.2.60.2)
इन्द्रद्युम्न उवाच । त्वदंघ्रिपाथोजयुगं मुरारे नोपासितं जन्मसु पूर्वजेषु । तत्कर्मणां दारुणपाकभाजं दीनं परित्राहि कृपांबुधे माम्
indradyumna uvāca tvadaṁghripāthojayugaṁ murāre nopāsitaṁ janmasu pūrvajeṣu tatkarmaṇāṁ dāruṇapākabhājaṁ dīnaṁ paritrāhi kṛpāṁbudhe mām
इंद्रद्युम्न ने कहा — हे मुरारे! पूर्व जन्मों में मैंने आपके चरण-कमलों की उपासना नहीं की; उन्हीं कर्मों के कठोर परिपाक से पीड़ित, दीन मुझे बचाइए, हे करुणासागर।
श्लोक 3 (skanda.2.60.3)
क्व निर्मलं त्वच्चरणाब्जयुग्मं विरिंचिरुद्रेंद्रकिरीटमग्नम् । क्वाहं कुदीनः शकृदस्रमांसमूत्रास्थिसंघैः पिहितस्त्वचा वै
kva nirmalaṁ tvaccaraṇābjayugmaṁ viriṁcirudreṁdrakirīṭamagnam kvāhaṁ kudīnaḥ śakṛdasramāṁsamūtrāsthisaṁghaiḥ pihitastvacā vai
कहाँ आपके निर्मल चरण-कमल-युगल, जो ब्रह्मा, रुद्र और इंद्र के मुकुटों में धँसे रहते हैं; और कहाँ मैं अत्यंत दीन, केवल त्वचा से ढके मल-रक्त-मांस-मूत्र-अस्थि के समूह जैसा!
श्लोक 4 (skanda.2.60.4)
असारसंसारपरिभ्रमेण श्रमातुरस्त्वां कथमीश जाने । जानंति ते त्वां खलु देवदेव येषां भवो दुःखभवप्रकाशः
asārasaṁsāraparibhrameṇa śramāturastvāṁ kathamīśa jāne jānaṁti te tvāṁ khalu devadeva yeṣāṁ bhavo duḥkhabhavaprakāśaḥ
इस सारहीन संसार में भटकते-भटकते थके हुए, हे ईश! मैं आपको कैसे जानूँ? हे देवदेव! आपको तो वही जानते हैं, जिनके लिए यह संसार दुःख-रूप में प्रकट हो चुका है।
श्लोक 5 (skanda.2.60.5)
प्रभो मया दुःखमनेकजन्मपापार्जितं भुक्तमनेकभावम् । शुभार्जितो यः सुखलेशभावो निदर्शनं यन्मधुपृक्ततिक्ते
prabho mayā duḥkhamanekajanmapāpārjitaṁ bhuktamanekabhāvam śubhārjito yaḥ sukhaleśabhāvo nidarśanaṁ yanmadhupṛktatikte
हे प्रभो! मैंने अनेक जन्मों के पापों से अर्जित दुःख को अनेक रूपों में भोगा है; पुण्य से प्राप्त सुख का जो लेशमात्र भाग है, वह तो कड़वे पर मधु लेप के समान उदाहरण-मात्र है।
श्लोक 6 (skanda.2.60.6)
यदेव सौख्यानुभवाय देव कर्मार्जितो मे विषयोपभोगः । स एव दुःखं परिणामतो मे न मद्विधो दुःखिजनोऽस्ति चान्यः
yadeva saukhyānubhavāya deva karmārjito me viṣayopabhogaḥ sa eva duḥkhaṁ pariṇāmato me na madvidho duḥkhijano'sti cānyaḥ
हे देव! जो विषय-भोग सुख के अनुभव के लिए मेरे कर्मों से अर्जित हुआ, वही परिणाम में मेरे लिए दुःख बन जाता है; मेरे समान दुःखी और कोई नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.2.60.7)
विभो यदि त्वां मनसापि पूर्वमुपास्तमन्यद्विषमेक्षणोऽहम्। कथं तदालप्स्यमनेकजन्म पुनः पुनर्भोग्यमशेषदुःखम्
vibho yadi tvāṁ manasāpi pūrvamupāstamanyadviṣamekṣaṇo'ham kathaṁ tadālapsyamanekajanma punaḥ punarbhogyamaśeṣaduḥkham
हे विभो! यदि मैंने पहले मन से भी आपकी उपासना की होती, बिना कहीं और दृष्टि लगाए, तो यह अनंत जन्मों तक बार-बार भोगने योग्य अशेष दुःख मुझे कैसे प्राप्त होता?
श्लोक 8 (skanda.2.60.8)
विभुत्वदासत्वपितृत्वपुत्रप्रियत्वमातृत्वधनित्वभावैः । वध्यत्वहिंस्रत्वपतित्वजायाभावैश्च तिर्यक्त्वसुरादिभावैः
vibhutvadāsatvapitṛtvaputrapriyatvamātṛtvadhanitvabhāvaiḥ vadhyatvahiṁsratvapatitvajāyābhāvaiśca tiryaktvasurādibhāvaiḥ
स्वामी होने, दास होने, पिता, पुत्र, प्रिय, माता, धनी होने के भावों से; वध्य, हिंसक, पति, पत्नी होने के भावों से; और पशु, असुर आदि योनियों के भावों से —
श्लोक 9 (skanda.2.60.9)
नीचोर्द्धभावं बहुशः सकृद्वा भवांगणेऽस्मिँन्लुठतानुभूतम् । न वा मुरारे तव पादपद्मदूरीभवस्येष्टफलं हि चैतत्
nīcorddhabhāvaṁ bahuśaḥ sakṛdvā bhavāṁgaṇe'smiṁnluṭhatānubhūtam na vā murāre tava pādapadmadūrībhavasyeṣṭaphalaṁ hi caitat
— नीच और उच्च भाव, अनेक बार अथवा एक बार, इस संसार-मैदान में लोटते हुए मेरे द्वारा अनुभव किए गए हैं; और हे मुरारे! यही आपके चरण-कमल से दूर रहने का इच्छित फल है।
श्लोक 10 (skanda.2.60.10)
कोशं बलं चैतदशेषपृथिवीधनैर्वृतं यौवनरूपरूप्यः। मनोऽनुकूलाः शतशः स्त्रियश्च निष्कंटकं मे नृपमंडलं च
kośaṁ balaṁ caitadaśeṣapṛthivīdhanairvṛtaṁ yauvanarūparūpyaḥ mano'nukūlāḥ śataśaḥ striyaśca niṣkaṁṭakaṁ me nṛpamaṁḍalaṁ ca
यह कोष, यह बल, समस्त पृथ्वी के धन से घिरा हुआ, यौवन और रूप-सौंदर्य; सैकड़ों मनोनुकूल स्त्रियाँ और मेरा निष्कंटक राजमंडल भी —
श्लोक 11 (skanda.2.60.11)
साम्राज्यता चापि भरो महान्मे त्वज्ज्ञानहीस्य पशोरिवायम्। भारावतारं कुरु मे कृपाब्धे सदैव तत्रोदित खेदयोगः
sāmrājyatā cāpi bharo mahānme tvajjñānahīsya paśorivāyam bhārāvatāraṁ kuru me kṛpābdhe sadaiva tatrodita khedayogaḥ
— और यह साम्राज्य भी, आपके ज्ञान से रहित मेरे लिए, एक पशु के समान भार-स्वरूप ही है। हे करुणासागर! मेरे इस भार को उतार दीजिए, क्योंकि इसमें सदा ही दुःख उदित होता रहता है।
श्लोक 12 (skanda.2.60.12)
दीनानुकंपिन्करिणो विमुक्तिः कृता विभो त्वत्स्मृतिमात्रकेण। भ्रांतं घटीयंत्रवदत्र नाथ मां त्रातुमर्हस्यनुकंपिभावात्
dīnānukaṁpinkariṇo vimuktiḥ kṛtā vibho tvatsmṛtimātrakeṇa bhrāṁtaṁ ghaṭīyaṁtravadatra nātha māṁ trātumarhasyanukaṁpibhāvāt
हे दीनों पर अनुकंपा करने वाले! आपने केवल अपने स्मरण मात्र से गजेंद्र को मुक्ति दी थी; हे नाथ! घटीयंत्र के समान इस संसार में भटकते हुए मुझे भी उसी अनुकंपा-भाव से बचाना उचित है।
श्लोक 13 (skanda.2.60.13)
न मे त्वदन्यः खलु बन्धुरत्र प्रवाहविभ्रष्टतरुस्वभावे । पापीयसी बुद्धिरुपेतभावा स्नेहानुबन्धा विषयेऽभिभेद्या
na me tvadanyaḥ khalu bandhuratra pravāhavibhraṣṭatarusvabhāve pāpīyasī buddhirupetabhāvā snehānubandhā viṣaye'bhibhedyā
इस प्रवाह में बहते वृक्ष के समान स्वभाव वाले संसार में आपके अतिरिक्त मेरा कोई बंधु नहीं है; स्नेह के बंधन से युक्त, विषयों में भेदने योग्य, मेरी यह अत्यंत पापपूर्ण बुद्धि है।
श्लोक 14 (skanda.2.60.14)
अहर्निशं मे तव पादपद्मान्नापैतु मत्प्रार्थितमेतदेव । त्वां सच्चिदानंदसुपूर्णसिंधुं प्राप्तास्तु ये जन्मसहस्रभाग्यैः
aharniśaṁ me tava pādapadmānnāpaitu matprārthitametadeva tvāṁ saccidānaṁdasupūrṇasiṁdhuṁ prāptāstu ye janmasahasrabhāgyaiḥ
रात-दिन आपके चरण-कमल से मेरा यह चित्त कभी न हटे — यही मेरी एकमात्र प्रार्थना है; आप, सत्-चित्-आनंद से परिपूर्ण सागर, केवल उन्हें ही प्राप्त होते हैं जिनका सौभाग्य सहस्रों जन्मों का हो।
श्लोक 15 (skanda.2.60.15)
किं ते हि पश्यंति लवैकसौख्यमनेकदुःखं विषयेन्द्रजालम् । क्व बन्धनं कर्मभिरिष्टलेशदुःखाकरग्रंथिशतैरभेद्यम्
kiṁ te hi paśyaṁti lavaikasaukhyamanekaduḥkhaṁ viṣayendrajālam kva bandhanaṁ karmabhiriṣṭaleśaduḥkhākaragraṁthiśatairabhedyam
क्या वे विषयों के इस इंद्रजाल को देखते हैं भी — क्षणभर के सुख और अनेक दुःखों से भरा हुआ? कर्मों से बंधा यह बंधन कहाँ है, जो इष्ट-लेश और दुःख की खानि सैकड़ों गाँठों से अभेद्य है?
श्लोक 16 (skanda.2.60.16)
अनंतमाद्यंतविहीनमेकमानंददं त्वत्पदपंकजं क्व । मायांबुधौ ते ममता भ्रमौ च कुकर्मनक्रायितगर्तमध्ये
anaṁtamādyaṁtavihīnamekamānaṁdadaṁ tvatpadapaṁkajaṁ kva māyāṁbudhau te mamatā bhramau ca kukarmanakrāyitagartamadhye
आदि-अंत रहित, अनंत, एक, आनंददायक आपका चरण-कमल कहाँ है? और कहाँ है यह आपकी माया का सागर, कुकर्म-रूपी मगरमच्छों वाले गड्ढे के बीच ममता और भ्रम से भरा हुआ?
श्लोक 17 (skanda.2.60.17)
निराश्रयं मे पतितं विलासकटाक्षपातेन नयाद्य तीरम् । स्वकार्यसंसाधनयाश्रितानां संपादनायेष्टविधेरजस्रम्
nirāśrayaṁ me patitaṁ vilāsakaṭākṣapātena nayādya tīram svakāryasaṁsādhanayāśritānāṁ saṁpādanāyeṣṭavidherajasram
अनाश्रय, गिरे हुए मुझे, अपने विलासपूर्ण कटाक्ष की एक दृष्टि से आज तट तक पहुँचाइए — जैसा कि अपने आश्रितों के प्रयोजन सिद्ध करने की आपकी सतत रीति है।
श्लोक 18 (skanda.2.60.18)
भ्राम्यंतमात्मीयहितं विसृज्य मां त्राहि मूढं सहजानुकंपिन् । क्षुद्राय कार्याय बहु भ्रमंतमप्राप्य मूलं परमेश्वरं त्वाम्
bhrāmyaṁtamātmīyahitaṁ visṛjya māṁ trāhi mūḍhaṁ sahajānukaṁpin kṣudrāya kāryāya bahu bhramaṁtamaprāpya mūlaṁ parameśvaraṁ tvām
अपने ही हित को छोड़कर भटकते हुए मुझ मूढ़ को बचाइए, हे सहज करुणामय! क्षुद्र प्रयोजनों के लिए बहुत भटकते हुए, आप जो मूल हैं, परमेश्वर हैं, आपको न पाकर।
श्लोक 19 (skanda.2.60.19)
ओं आयासपात्रं परमं सुदीनं मां त्राहि विष्णो जगदेकवंद्य । वेदांतवेद्याव्यय विश्वनाथ तत्वमीशिषे हंतुमघौघराशीन्
oṁ āyāsapātraṁ paramaṁ sudīnaṁ māṁ trāhi viṣṇo jagadekavaṁdya vedāṁtavedyāvyaya viśvanātha tatvamīśiṣe haṁtumaghaugharāśīn
ॐ। अत्यंत श्रम के पात्र, अति दीन मुझे बचाइए, हे विष्णु, जगत् के एकमात्र वंद्य! हे वेदांत से जानने योग्य, अव्यय, विश्वनाथ! आप ही पापों की समस्त राशि का नाश करने में समर्थ हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.60.20)
तं त्वां परित्यज्य सुखैकहेतुं क्षुद्राशयं मां परिपाहि विष्णो। प्रसुप्त एषोऽखिलभूतसंघश्चतुर्विधो यत्कृतमोहरात्रौ
taṁ tvāṁ parityajya sukhaikahetuṁ kṣudrāśayaṁ māṁ paripāhi viṣṇo prasupta eṣo'khilabhūtasaṁghaścaturvidho yatkṛtamoharātrau
आपको ही, जो सुख के एकमात्र हेतु हैं, त्यागकर, क्षुद्राशय मुझ को रक्षा दीजिए, हे विष्णो! यह समस्त चतुर्विध प्राणी-समूह उसी मोह की रात्रि में सोया हुआ है, जो आपने ही रची है।
श्लोक 21 (skanda.2.60.21)
त्वज्ञानभानूदयमेत्य चांते प्रबोध्यते त्वां शरणं प्रपद्ये। त्वमेक एवाखिललोककर्त्ता फणासहस्रैः परिवीतमूर्तिः
tvajñānabhānūdayametya cāṁte prabodhyate tvāṁ śaraṇaṁ prapadye tvameka evākhilalokakarttā phaṇāsahasraiḥ parivītamūrtiḥ
— और अंत में आपके ज्ञान-रूपी सूर्य के उदय से जगाया जाकर, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। आप ही अकेले समस्त लोकों के कर्ता हैं, सहस्र फणों से घिरी हुई मूर्ति वाले।
श्लोक 22 (skanda.2.60.22)
पर्यायवृत्त्या बलिनां वरिष्ठ त्वामिशितारं शरणं प्रपद्ये। यया सृजस्यत्सि जगंति नाथ वक्षःसरोजासनया स्वशक्त्या
paryāyavṛttyā balināṁ variṣṭha tvāmiśitāraṁ śaraṇaṁ prapadye yayā sṛjasyatsi jagaṁti nātha vakṣaḥsarojāsanayā svaśaktyā
बलवानों में श्रेष्ठ, बारी-बारी से (सृष्टि-स्थिति-संहार) करने वाले, नियंता आप की शरण मैं ग्रहण करता हूँ; अपनी ही शक्ति से, वक्षस्थल के कमल-आसन पर बैठकर, हे नाथ, जो जगत् को रचते हैं,
श्लोक 23 (skanda.2.60.23)
तां भद्ररूपां जगदाश्रयां ते देवारणिं पादयुगे नतोऽस्मि । यदंशुजालप्रतिसृष्टमेतद्ब्रह्मांडजालं करसंगि नाथ
tāṁ bhadrarūpāṁ jagadāśrayāṁ te devāraṇiṁ pādayuge nato'smi yadaṁśujālapratisṛṣṭametadbrahmāṁḍajālaṁ karasaṁgi nātha
— उस मंगलरूपा, जगत् की आश्रयदात्री, देवताओं की उत्पत्ति-भूमि को मैं आपके चरण-युगल में नमन करता हूँ; जिसकी किरणों के समूह से यह ब्रह्मांड-जाल प्रकट होकर आपके ही हाथ में बना रहता है, हे नाथ।
श्लोक 24 (skanda.2.60.24)
सुदर्शनं दैत्यबलस्य हंतृ चक्राभिधं त्वां प्रणतः सुदर्शनम्। स्तुत्वेत्थं नृपतिश्रेष्ठः साष्टांग प्रणनाम सः
sudarśanaṁ daityabalasya haṁtṛ cakrābhidhaṁ tvāṁ praṇataḥ sudarśanam stutvetthaṁ nṛpatiśreṣṭhaḥ sāṣṭāṁga praṇanāma saḥ
दैत्यों की सेना का नाश करने वाले, चक्र नाम से प्रसिद्ध, हे सुदर्शन! आपको प्रणत, मैं सुदर्शन को नमस्कार करता हूँ। इस प्रकार स्तुति कर, श्रेष्ठ राजा ने साष्टांग प्रणाम किया।
श्लोक 25 (skanda.2.60.25)
परित्राहि जगन्नाथ मग्नं संसारसागरे। अनाथबन्धो कृपया दीनं मां तमसाकुलम्
paritrāhi jagannātha magnaṁ saṁsārasāgare anāthabandho kṛpayā dīnaṁ māṁ tamasākulam
'हे जगन्नाथ! संसार-सागर में डूबे हुए मुझे बचाइए। हे अनाथों के बंधु! कृपापूर्वक अंधकार से व्याकुल, दीन मुझे बचाइए।'
श्लोक 26 (skanda.2.60.26)
नारद उवाच। जय जय नारायण अपारभवसागरोत्तारपरायण सनकसनंदनसनातनप्रभृति योगिवरविचिंत्यमानदिव्यतत्त्व स्वमायाविलसिताध्यासपरिणमिताशेषभूततत्त्व त्रितत्त्व त्रिदण्डधर त्रिणाचिकेतत्रिमधुत्रिसुपर्णोपगीयमानदिव्यज्ञानच्छन्दोमय स्वासनसुपर्णप्रिय भक्तप्रिय भक्तजनैकवत्सल स्वमायाजालव्यवहितस्वरूप विश्वरूप विश्वप्रकाश विश्वतोमुख विश्वतोक्षि विश्वतःश्रवण विश्वतःपादशिरोग्रीव विश्वहस्तनासारसनात्वक्केशलोमलिंग सर्वलोकात्मक सर्वलोकसुखावह सर्वलोकोपकारक सर्वलोकनमस्कृत लीलाविलसितकोटिपद्मोद्भव रुद्रेंद्रमरुदश्विसाध्यसिद्धगणप्रणताशेषसुरासुरत्रिभुवनगुरो न कस्यापि ज्ञानगोचर नमस्ते नमस्ते
nārada uvāca jaya jaya nārāyaṇa apārabhavasāgarottāraparāyaṇa sanakasanaṁdanasanātanaprabhṛti yogivaraviciṁtyamānadivyatattva svamāyāvilasitādhyāsapariṇamitāśeṣabhūtatattva tritattva tridaṇḍadhara triṇāciketatrimadhutrisuparṇopagīyamānadivyajñānacchandomaya svāsanasuparṇapriya bhaktapriya bhaktajanaikavatsala svamāyājālavyavahitasvarūpa viśvarūpa viśvaprakāśa viśvatomukha viśvatokṣi viśvataḥśravaṇa viśvataḥpādaśirogrīva viśvahastanāsārasanātvakkeśalomaliṁga sarvalokātmaka sarvalokasukhāvaha sarvalokopakāraka sarvalokanamaskṛta līlāvilasitakoṭipadmodbhava rudreṁdramarudaśvisādhyasiddhagaṇapraṇatāśeṣasurāsuratribhuvanaguro na kasyāpi jñānagocara namaste namaste
नारद ने कहा — जय हो, जय हो, हे नारायण, अपार भव-सागर से पार उतारने में समर्पित! सनक-सनंदन-सनातन आदि योगिश्रेष्ठों द्वारा चिंतन किए जाने योग्य दिव्य तत्त्व! अपनी माया के विलास से समस्त प्राणि-तत्त्वों को परिणत करने वाले! तीनों तत्त्वों के स्वरूप, त्रिदंड धारण करने वाले, तीन नाचिकेत-अग्नियों, तीन मधु-विद्याओं और तीन सुपर्ण-गीतों से गाए जाने वाले दिव्य ज्ञान-स्वरूप, छंदों के साक्षात् स्वरूप! अपने वाहन गरुड़ के प्रिय, भक्तों के प्रिय, भक्तजनों के प्रति ही विशेष स्नेह रखने वाले! अपनी ही माया-जाल से आवृत अपने वास्तविक स्वरूप वाले, विश्वरूप, विश्व-प्रकाश, सब ओर मुख वाले, सब ओर नेत्र वाले, सब ओर श्रवण वाले, सब ओर पैर-सिर-गर्दन-हाथ-नासिका-रसना-त्वचा-केश-रोम-अंगों वाले! सर्वलोक के आत्मस्वरूप, सर्वलोक को सुख देने वाले, सर्वलोक के उपकारक, सर्वलोक द्वारा नमस्कृत! अपनी लीला के विलास से करोड़ों कमलों (ब्रह्माओं) को उत्पन्न करने वाले! रुद्र, इंद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, साध्य और सिद्धगणों समेत अशेष सुर-असुरों द्वारा प्रणत, त्रिभुवन के गुरु! जो किसी के ज्ञान का विषय नहीं — आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
श्लोक 27 (skanda.2.60.27)
जैमिनिरुवाच । अन्ये च ये नृपतयः श्रोत्रिया वेदपारगाः । मुनयो द्विजाः क्षत्रियाश्च विद्वांसो वैश्यजातयः
jaiminiruvāca anye ca ye nṛpatayaḥ śrotriyā vedapāragāḥ munayo dvijāḥ kṣatriyāśca vidvāṁso vaiśyajātayaḥ
जैमिनि ने कहा — और अन्य जो राजा, श्रोत्रिय, वेद के पारगामी, मुनि, द्विज, क्षत्रिय तथा विद्वान वैश्यकुल में उत्पन्न लोग थे,
श्लोक 28 (skanda.2.60.28)
अस्तुवन्पुण्डरीकाक्षं बलिनं भद्रया सह । सूक्तैः स्तोत्रैः पुराणैश्च कविताभिर्यथा तथा
astuvanpuṇḍarīkākṣaṁ balinaṁ bhadrayā saha sūktaiḥ stotraiḥ purāṇaiśca kavitābhiryathā tathā
— उन्होंने पुण्डरीकाक्ष की, बल और भद्रा के साथ, वैदिक सूक्तों, स्तोत्रों, पुराणों और काव्यों द्वारा, जैसी जिसकी सामर्थ्य थी, स्तुति की।
श्लोक 29 (skanda.2.60.29)
अथेंद्रद्युम्नः प्रोवाच पुरोधसमकल्मषम् । पूजार्थं वासुदेवस्य उपचारोपसंस्कृतम्
atheṁdradyumnaḥ provāca purodhasamakalmaṣam pūjārthaṁ vāsudevasya upacāropasaṁskṛtam
तब इंद्रद्युम्न ने अपने निष्पाप पुरोहित से, वासुदेव की पूजा के लिए, समस्त उपचारों से युक्त सामग्री तैयार करने को कहा।
श्लोक 30 (skanda.2.60.30)
स्वयं स नृपतिश्रेष्ठः पूजयामास तान्क्रमात् । नारदस्योपदेशेन विधिना मंत्रतस्तथा
svayaṁ sa nṛpatiśreṣṭhaḥ pūjayāmāsa tānkramāt nāradasyopadeśena vidhinā maṁtratastathā
उस श्रेष्ठ राजा ने स्वयं ही, नारद के उपदेश से, विधिपूर्वक और मंत्रोच्चारण सहित, उन सबकी क्रमशः पूजा की।
श्लोक 31 (skanda.2.60.31)
द्वादशाक्षरमंत्रेण बलभद्रमपूजयत् । यमुपास्य ध्रुवः स्थानं प्राप्तवानुत्तमोत्तमम्
dvādaśākṣaramaṁtreṇa balabhadramapūjayat yamupāsya dhruvaḥ sthānaṁ prāptavānuttamottamam
द्वादशाक्षर मंत्र से उन्होंने बलभद्र की पूजा की, जिनकी उपासना करके ध्रुव ने उत्तमोत्तम अचल पद प्राप्त किया था।
श्लोक 32 (skanda.2.60.32)
त्रयीप्रसिद्धं यत्सूक्तं पावनं पौरुषं महत् । तेन नारायणं भूपः पूजयामास शक्तितः
trayīprasiddhaṁ yatsūktaṁ pāvanaṁ pauruṣaṁ mahat tena nārāyaṇaṁ bhūpaḥ pūjayāmāsa śaktitaḥ
वेदत्रयी में प्रसिद्ध, पावन और महान पुरुष-सूक्त से राजा ने अपनी शक्ति के अनुसार नारायण की पूजा की।
श्लोक 33 (skanda.2.60.33)
देव्याः सूक्तेन भद्रां तां सौदर्शन्या सुदर्शनम् । यथासमृद्धि भक्त्या तान्पूजयित्वा नृपोत्तमः
devyāḥ sūktena bhadrāṁ tāṁ saudarśanyā sudarśanam yathāsamṛddhi bhaktyā tānpūjayitvā nṛpottamaḥ
देवी-सूक्त से उस भद्रा की, और सौदर्शनी सूक्त से सुदर्शन की — इस प्रकार श्रेष्ठ राजा ने अपनी समृद्धि के अनुसार भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा कर,
श्लोक 34 (skanda.2.60.34)
तत्प्रीत्यै द्विजमुख्येभ्यो ददौ दानानि भक्तितः । तुलापुरुषदानानि महादानानि पार्थिवः
tatprītyai dvijamukhyebhyo dadau dānāni bhaktitaḥ tulāpuruṣadānāni mahādānāni pārthivaḥ
— उनकी प्रसन्नता के लिए, भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ द्विजों को दान दिए — तुलापुरुष-दान और अन्य महादान उस राजा ने दिए।
श्लोक 35 (skanda.2.60.35)
अश्वमेधांगभूताश्च कोटिशो गा ददौ तदा । अलंकृतास्तथान्याश्च ददौ गा बहुदक्षिणाः
aśvamedhāṁgabhūtāśca koṭiśo gā dadau tadā alaṁkṛtāstathānyāśca dadau gā bahudakṣiṇāḥ
अश्वमेध के अंगभूत होकर उन्होंने उस समय करोड़ों गायें दान कीं; और अन्य अलंकृत गायें भी बहुत सी दक्षिणाओं सहित दान दीं।
श्लोक 36 (skanda.2.60.36)
तासां खुरोद्धृतेर्योगाद्गर्तोभूद्द्विजसत्तमाः । दानांबुना स पूर्णो वै तीर्थमासीन्महाफलम्
tāsāṁ khuroddhṛteryogādgartobhūddvijasattamāḥ dānāṁbunā sa pūrṇo vai tīrthamāsīnmahāphalam
उनके खुरों से उठी हुई मिट्टी से एक गड्ढा बन गया, हे श्रेष्ठ द्विजो; वह दान-जल से भरकर महाफलदायी तीर्थ बन गया।
श्लोक 37 (skanda.2.60.37)
तस्मिन्स्नात्वा पितॄन्देवान्संतर्प्य विधिवन्नरः । अश्वमेधसहस्रस्य फलमाप्नोत्यसंशयः
tasminsnātvā pitṝndevānsaṁtarpya vidhivannaraḥ aśvamedhasahasrasya phalamāpnotyasaṁśayaḥ
उसमें स्नान कर, विधिवत् पितरों और देवताओं का तर्पण कर, मनुष्य निःसंदेह सहस्र अश्वमेधों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 38 (skanda.2.60.38)
नाम्ना ख्यातं सरस्तस्य इन्द्रद्युम्नस्य भूपतेः । निर्वपत्यत्र पिंडांश्च पितॄनुद्दिश्य मानवः
nāmnā khyātaṁ sarastasya indradyumnasya bhūpateḥ nirvapatyatra piṁḍāṁśca pitṝnuddiśya mānavaḥ
राजा इंद्रद्युम्न के नाम से प्रसिद्ध वह सरोवर — जो मनुष्य वहाँ पितरों के उद्देश्य से पिंडदान करता है,
श्लोक 39 (skanda.2.60.39)
कुलैकविंशमुद्धत्य ब्रह्मलोके महीयते । नातः परतरं तीर्थं हयमेधांगसंभवात्
kulaikaviṁśamuddhatya brahmaloke mahīyate nātaḥ parataraṁ tīrthaṁ hayamedhāṁgasaṁbhavāt
— वह अपने कुल की इक्कीस पीढ़ियों को ऊपर उठाकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है; अश्वमेध के अंग से उत्पन्न होने के कारण इससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है।
श्लोक 40 (skanda.2.60.40)
इन्द्रद्युम्नस्य सरसः स्याद्वा त्रिपथगा समा । ततः प्रासादघटनामुपचक्राम भूपतिः
indradyumnasya sarasaḥ syādvā tripathagā samā tataḥ prāsādaghaṭanāmupacakrāma bhūpatiḥ
इंद्रद्युम्न का यह सरोवर त्रिपथगामिनी गंगा के समान ही है। इसके बाद राजा ने प्रासाद-निर्माण का कार्य आरंभ किया।
श्लोक 41 (skanda.2.60.41)
शुभे काले सुनक्षत्रे दैवज्ञविधिचोदिते । समुहूर्ते नारदादीन्ब्राह्मणाग्र्यान्प्रपूज्य च
śubhe kāle sunakṣatre daivajñavidhicodite samuhūrte nāradādīnbrāhmaṇāgryānprapūjya ca
शुभ काल में, अच्छे नक्षत्र में, ज्योतिषियों द्वारा बताए गए विधान से, उपयुक्त मुहूर्त में, नारद आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा कर,
श्लोक 42 (skanda.2.60.42)
स्वस्तिवाचं च कर्मर्द्धिं वाचयित्वा नृपोत्तमः । अर्घ्यं ददौ जगन्नाथं स्मरन्प्रासादवेश्मनि
svastivācaṁ ca karmarddhiṁ vācayitvā nṛpottamaḥ arghyaṁ dadau jagannāthaṁ smaranprāsādaveśmani
— स्वस्तिवाचन और कर्मवृद्धि का पाठ करवाकर, श्रेष्ठ राजा ने जगन्नाथ का स्मरण करते हुए प्रासाद-निर्माण में अर्घ्य अर्पित किया।
श्लोक 43 (skanda.2.60.43)
वसुधां प्रार्थयित्वा तु स्थानमाचंद्रतारकम् । शिल्पिनः पूजयामास वास्तुयागपुरःसरम्
vasudhāṁ prārthayitvā tu sthānamācaṁdratārakam śilpinaḥ pūjayāmāsa vāstuyāgapuraḥsaram
जब तक चंद्र-सूर्य-तारे रहें तब तक के लिए भूमि की याचना कर, उन्होंने वास्तु-यज्ञ को आगे रखकर शिल्पियों की पूजा की।
श्लोक 44 (skanda.2.60.44)
महोत्सवं तथा चक्रे गीतवाद्यैः प्रभूतकैः । दीनानाथविपन्नेभ्यो ददौ वस्तु यथेप्सितम्
mahotsavaṁ tathā cakre gītavādyaiḥ prabhūtakaiḥ dīnānāthavipannebhyo dadau vastu yathepsitam
उन्होंने गीत-वाद्यों से युक्त महोत्सव भी किया; दीन, अनाथ और विपन्न लोगों को उनकी इच्छानुसार वस्तुएँ दान कीं।
श्लोक 45 (skanda.2.60.45)
राज्ञो विसर्जयामास बहुमानपुरःसरम् । कृतार्थानवतारं तं हरेर्दृष्ट्वा हतांहसः
rājño visarjayāmāsa bahumānapuraḥsaram kṛtārthānavatāraṁ taṁ harerdṛṣṭvā hatāṁhasaḥ
उन्होंने राजाओं को बड़े सम्मान के साथ विदा किया, जो हरि के इस कृतार्थकारी अवतार को देखकर पापमुक्त और कृतार्थ हो गए थे।
श्लोक 46 (skanda.2.60.46)
ततः स कोटिशो वित्तं ददौ पाषाणदारके । आहृतौ बहुदेशेभ्यो दृषदां पार्थिवोत्तमः
tataḥ sa koṭiśo vittaṁ dadau pāṣāṇadārake āhṛtau bahudeśebhyo dṛṣadāṁ pārthivottamaḥ
फिर उस श्रेष्ठ राजा ने अनेक देशों से मँगवाए गए पत्थर तोड़ने वालों को करोड़ों धन प्रदान किया।
श्लोक 47 (skanda.2.60.47)
उवाचेदं मुदा युक्तः सभायां पृथिवीधरः । अष्टादशभ्यो द्वीपेभ्यो यन्मया पौरुषार्जितम्
uvācedaṁ mudā yuktaḥ sabhāyāṁ pṛthivīdharaḥ aṣṭādaśabhyo dvīpebhyo yanmayā pauruṣārjitam
पृथ्वीपति ने प्रसन्न होकर सभा में यह कहा — 'अठारह द्वीपों से जो कुछ मैंने अपने पौरुष से अर्जित किया है,
श्लोक 48 (skanda.2.60.48)
तत्सर्वं जगदीशस्य प्रासादायापवर्जितम् । जैत्रयात्राप्रसंगेन श्रमो लब्धस्तु यो मया
tatsarvaṁ jagadīśasya prāsādāyāpavarjitam jaitrayātrāprasaṁgena śramo labdhastu yo mayā
— वह सब जगदीश्वर के प्रासाद के लिए अर्पित है। विजय-यात्राओं के प्रसंग से मुझे जो श्रम प्राप्त हुआ,
श्लोक 49 (skanda.2.60.49)
सफलोऽस्तु स मे विष्णोः प्रासादायार्थयोगतः । अतः परं मे किं भाग्यं चराचरगुरुं हरिम्
saphalo'stu sa me viṣṇoḥ prāsādāyārthayogataḥ ataḥ paraṁ me kiṁ bhāgyaṁ carācaraguruṁ harim
— वह विष्णु के प्रासाद के अर्थ-योग से सफल हो। इससे बढ़कर मेरा क्या सौभाग्य होगा, कि इन दोनों भुजाओं से अर्जित संपत्ति से मैं
श्लोक 50 (skanda.2.60.50)
प्रसादयिष्ये संपत्त्या भुजद्वंद्वार्जितश्रिया । श्रीः सदा पुण्डरीकाक्षे श्रियोनुग्रहजा मम
prasādayiṣye saṁpattyā bhujadvaṁdvārjitaśriyā śrīḥ sadā puṇḍarīkākṣe śriyonugrahajā mama
— चराचर जगत् के गुरु हरि को प्रसन्न करूँ। श्री सदा पुंडरीकाक्ष में निवास करे; मेरी संपत्ति उन्हीं की कृपा से उत्पन्न हो।
श्लोक 51 (skanda.2.60.51)
किं कर्तुमीशस्तस्यां वै देवदेवस्य चक्रिणः । कटाक्षपातो यस्य स्यात्तस्य श्रीः सर्वतोमुखी
kiṁ kartumīśastasyāṁ vai devadevasya cakriṇaḥ kaṭākṣapāto yasya syāttasya śrīḥ sarvatomukhī
उस चक्रधारी देवदेव को उसके लिए और क्या करना है? जिस पर उनकी दृष्टि का कटाक्ष पड़ जाए, उसके लिए श्री सब ओर मुख किए रहती है।
श्लोक 52 (skanda.2.60.52)
अष्टादशात्मिका देवी जिह्वाग्रे चास्य नृत्यति । यमाराध्य जगन्नाथं ब्रह्मत्वं प्राप्तवान्विधिः
aṣṭādaśātmikā devī jihvāgre cāsya nṛtyati yamārādhya jagannāthaṁ brahmatvaṁ prāptavānvidhiḥ
अठारह विद्याओं की देवी (सरस्वती) उनकी जिह्वा के अग्रभाग पर नृत्य करती है। इसी जगन्नाथ की आराधना कर ब्रह्मा ने ब्रह्मत्व प्राप्त किया,
श्लोक 53 (skanda.2.60.53)
रुद्रो महेश्वरत्वं च शक्रस्त्रिदिवराजताम् । लेभे तमर्च्य जगतामर्चयिष्यामि शाश्वतम्
rudro maheśvaratvaṁ ca śakrastridivarājatām lebhe tamarcya jagatāmarcayiṣyāmi śāśvatam
— रुद्र ने महेश्वरत्व और इंद्र ने त्रिलोक-राज्य प्राप्त किया, उन्हीं की अर्चना से। मैं भी उन जगत्-नाथ की सदा अर्चना करूँगा।
श्लोक 54 (skanda.2.60.54)
जितं तेन त्रिधा राशीभूतमंहो महात्मना । सांगोपांगेन विधिना येन कृष्णः समर्चितः
jitaṁ tena tridhā rāśībhūtamaṁho mahātmanā sāṁgopāṁgena vidhinā yena kṛṣṇaḥ samarcitaḥ
जिस महात्मा ने सांगोपांग विधि से कृष्ण की पूजा की, उसके द्वारा त्रिविध राशीभूत पाप जीत लिया गया है।
श्लोक 55 (skanda.2.60.55)
कलेवरमिदं क्षेत्रं यत्राहंकारवान्विभुः । आविर्भावतिरोभावौ स्थितिर्नित्या हि यत्प्रभुः
kalevaramidaṁ kṣetraṁ yatrāhaṁkāravānvibhuḥ āvirbhāvatirobhāvau sthitirnityā hi yatprabhuḥ
यह क्षेत्र उनका ही शरीर है, जहाँ अहंकार-शक्ति से युक्त सर्वव्यापी प्रभु का आविर्भाव और तिरोभाव होता है; उनकी नित्य स्थिति ही इसके स्वामित्व का आधार है।
श्लोक 56 (skanda.2.60.56)
अत्र साक्षाद्वपुष्मन्तं संपूज्य जगतां गुरुम् । साक्षात्कृतार्थो भवति चतुर्वर्गस्य भाजनम्
atra sākṣādvapuṣmantaṁ saṁpūjya jagatāṁ gurum sākṣātkṛtārtho bhavati caturvargasya bhājanam
यहाँ साक्षात् शरीरधारी जगत्-गुरु का सम्यक् पूजन कर मनुष्य साक्षात् कृतार्थ हो जाता है, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों का पात्र बन जाता है।
श्लोक 57 (skanda.2.60.57)
बहुव्ययाऽऽयासतो या राज्यऋद्धिर्मयार्जिता । अस्यैवानुग्रहात्सा तु सफलास्तु पदांबुजे
bahuvyayā''yāsato yā rājyaṛddhirmayārjitā asyaivānugrahātsā tu saphalāstu padāṁbuje
बड़े व्यय और परिश्रम से जो राज्य-समृद्धि मैंने अर्जित की है, वह उन्हीं के अनुग्रह से उनके चरण-कमलों में सफल हो।
श्लोक 58 (skanda.2.60.58)
सर्वोपचारैः परिपूज्य देवं द्रव्यैर्हृतैः सागरमेखलायाः । यावत्समाप्नोति हि कर्मपाकः साम्राज्ययात्रा सफला हि मास्तु
sarvopacāraiḥ paripūjya devaṁ dravyairhṛtaiḥ sāgaramekhalāyāḥ yāvatsamāpnoti hi karmapākaḥ sāmrājyayātrā saphalā hi māstu
समुद्र से घिरी इस पृथ्वी से लाई गई संपत्ति द्वारा समस्त उपचारों से देव की पूजा कर — जब तक मेरे कर्मों का परिपाक पूर्ण न हो, तब तक मेरी साम्राज्य-यात्रा सफल बनी रहे।
श्लोक 59 (skanda.2.60.59)
किं द्रव्यजातं खलु येन विष्णुं नोपाहरेत्सांगमपेतकल्मषः । किं पौरुषेयं यदि वासुदेवपरिच्छदो येन न साधितो मे
kiṁ dravyajātaṁ khalu yena viṣṇuṁ nopāharetsāṁgamapetakalmaṣaḥ kiṁ pauruṣeyaṁ yadi vāsudevaparicchado yena na sādhito me
ऐसी कौन सी वस्तु है, जिससे पापरहित मनुष्य विष्णु को सांगोपांग अर्पण न करे? और मेरा पुरुषत्व ही क्या है, यदि उससे मैंने वासुदेव के मंदिर की सामग्री सिद्ध न की?