वैष्णव खण्ड · अध्याय 61
प्रासाद की पूर्णता और नारद का मुक्ति-आश्वासन
श्लोक 1 (skanda.2.61.1)
जैमिनिरुवाच । इति ब्रुवाणं राजर्षिं कश्चिदृग्वेदपारगः । वेदांतविज्ज्ञानशीलो द्विजो वाक्यं मुदा जगौ
jaiminiruvāca iti bruvāṇaṁ rājarṣiṁ kaścidṛgvedapāragaḥ vedāṁtavijjñānaśīlo dvijo vākyaṁ mudā jagau
जैमिनि ने कहा — इस प्रकार कहते हुए राजर्षि से, ऋग्वेद के पारंगत, वेदांत के ज्ञाता, स्वभाव से विद्वान एक द्विज ने प्रसन्नतापूर्वक यह वचन कहा।
श्लोक 2 (skanda.2.61.2)
अहो तवायं खलु भाग्यराशिर्येनाविरासीद्भुवि दारुमूर्तिः । यस्यात्युपास्तिं श्रुतिराह मुक्तिप्रदामनात्मज्ञविमोहितानाम्
aho tavāyaṁ khalu bhāgyarāśiryenāvirāsīdbhuvi dārumūrtiḥ yasyātyupāstiṁ śrutirāha muktipradāmanātmajñavimohitānām
'अहो! यह तुम्हारा भाग्य-राशि ही है, जिसके कारण पृथ्वी पर यह काष्ठ-मूर्ति प्रकट हुई — जिसकी अत्यंत उपासना को श्रुति ही आत्मज्ञान से रहित मोहग्रस्त लोगों के लिए भी मुक्तिदायिनी कहती है।'
श्लोक 3 (skanda.2.61.3)
य एष प्लवते दारुः सिंधोः पारे ह्यपौरुषम् । तमुपास्य दुराराध्यं मुक्तिं यांति सुदुर्लभाम्
ya eṣa plavate dāruḥ siṁdhoḥ pāre hyapauruṣam tamupāsya durārādhyaṁ muktiṁ yāṁti sudurlabhām
'जो यह अपौरुषेय काष्ठ समुद्र के पार से तैरता हुआ आया है, उसकी उपासना कर, यद्यपि वह दुराराध्य है, फिर भी लोग अत्यंत दुर्लभ मुक्ति को प्राप्त करते हैं।'
श्लोक 4 (skanda.2.61.4)
ब्रह्मज्ञाननिधिः साक्षान्नारदः प्रत्युवाच यत् । न हि वेदांतवचसोऽपरस्माज्ज्ञानमस्य वै
brahmajñānanidhiḥ sākṣānnāradaḥ pratyuvāca yat na hi vedāṁtavacaso'parasmājjñānamasya vai
साक्षात् ब्रह्मज्ञान के निधि नारद ने उत्तर दिया — 'वेदांत के वचनों से भिन्न इसका कोई ज्ञान नहीं है।
श्लोक 5 (skanda.2.61.5)
न हि प्रवृत्तिर्विष्णोस्तु विना वेदं प्रवर्तते । परेषां स्वस्य वा सृष्टौ श्रुतिप्रामाण्यवान्प्रभुः
na hi pravṛttirviṣṇostu vinā vedaṁ pravartate pareṣāṁ svasya vā sṛṣṭau śrutiprāmāṇyavānprabhuḥ
विष्णु की प्रवृत्ति वेद के बिना कभी नहीं होती; चाहे औरों की सृष्टि हो या अपनी, प्रभु सदा श्रुति के प्रामाण्य से युक्त ही होते हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.61.6)
विना श्रुतिं प्रवर्तेच्चेत्कस्तत्प्रामाण्यमृच्छति । तस्माच्छ्रुतिप्रसिद्धोऽयमवतारोऽत्र भूपते
vinā śrutiṁ pravarteccetkastatprāmāṇyamṛcchati tasmācchrutiprasiddho'yamavatāro'tra bhūpate
यदि वे श्रुति के बिना प्रवृत्त होते, तो उसके प्रामाण्य को कौन सिद्ध करता? अतः, हे राजन्! यह अवतार श्रुति से ही प्रसिद्ध है।
श्लोक 7 (skanda.2.61.7)
वेदांतवेद्यं पुरुषं गीतं तं सामगीतिषु । प्रतिमां न तु जानीहि निःश्रेयसकरं नृणाम्
vedāṁtavedyaṁ puruṣaṁ gītaṁ taṁ sāmagītiṣu pratimāṁ na tu jānīhi niḥśreyasakaraṁ nṛṇām
इसे मात्र प्रतिमा मत जानो — यह वही वेदांत से जानने योग्य पुरुष है, जो साम-गीतों में गाया गया है, मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी।
श्लोक 8 (skanda.2.61.8)
दर्शनादेव नः शांतं सुदृढं तम उत्तमम् । संत्येव श्रुतयः पूर्वमेतदर्चाप्रकाशिकाः
darśanādeva naḥ śāṁtaṁ sudṛḍhaṁ tama uttamam saṁtyeva śrutayaḥ pūrvametadarcāprakāśikāḥ
इसके दर्शनमात्र से ही हमारा वह अत्यंत सघन और दृढ़ अंधकार शांत हो जाता है। इस प्रतिमा-उपासना की महिमा को प्रकट करने वाली श्रुतियाँ पहले से ही विद्यमान हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.61.9)
एतदर्चा प्रशस्ता वै सदर्थे विनियोजिता । अहो भारतवर्षस्था मनुष्याः क्षीणकल्मषाः
etadarcā praśastā vai sadarthe viniyojitā aho bhāratavarṣasthā manuṣyāḥ kṣīṇakalmaṣāḥ
यह प्रतिमा-अर्चा सत्प्रयोजन में लगाई जाकर अत्यंत प्रशस्त है। अहो! भारतवर्ष में रहने वाले मनुष्य क्षीण-पाप हैं,
श्लोक 10 (skanda.2.61.10)
अपवर्गप्रदो येषामाविरासीज्जनार्दनः । तत्राप्ययं चोढ्रदेशः सर्वेषामुत्तमोत्तमः
apavargaprado yeṣāmāvirāsījjanārdanaḥ tatrāpyayaṁ coḍhradeśaḥ sarveṣāmuttamottamaḥ
— जिनके लिए मुक्ति देने वाले जनार्दन स्वयं प्रकट हुए हैं! और इन सबमें भी यह उड्र देश सर्वश्रेष्ठ है,
श्लोक 11 (skanda.2.61.11)
यत्रस्थाश्चर्मनेत्रेण पश्यंति ब्रह्मरूपिणम् । श्रुतिस्मृतीनां गहनः पंथा कर्मभिराकुलः
yatrasthāścarmanetreṇa paśyaṁti brahmarūpiṇam śrutismṛtīnāṁ gahanaḥ paṁthā karmabhirākulaḥ
— जहाँ रहने वाले लोग अपने चर्म-नेत्रों से ही ब्रह्म-रूप का दर्शन करते हैं। श्रुति-स्मृतियों का मार्ग गहन है, कर्मों से आकुल है,
श्लोक 12 (skanda.2.61.12)
येन याता भ्रमंतीह घटीयंत्रवदाकुलाः । निर्व्यलीकपदप्राप्तिहेतुरेष स चिन्मयः
yena yātā bhramaṁtīha ghaṭīyaṁtravadākulāḥ nirvyalīkapadaprāptihetureṣa sa cinmayaḥ
— जिस पर चलने वाले घटीयंत्र के समान व्याकुल होकर भटकते रहते हैं; परंतु यह चिन्मय स्वरूप ही निष्कपट पद की प्राप्ति का कारण है।
श्लोक 13 (skanda.2.61.13)
श्रुत्यादिभिर्विनोपायैः परमानंदमुक्तिदः । निरंतरगतायातदुःस्थितानां दुरात्मनाम्
śrutyādibhirvinopāyaiḥ paramānaṁdamuktidaḥ niraṁtaragatāyātaduḥsthitānāṁ durātmanām
श्रुति आदि के साधनों के बिना ही वह परमानंद-मुक्ति देने वाला है — निरंतर आवागमन में दुःस्थित उन दुरात्माओं को भी।
श्लोक 14 (skanda.2.61.14)
एष दारुवपुर्विष्णुः सुखदाता सुबांधवः । श्रुतिस्मृत्युक्तनियमा वर्तंते नेह पार्थिव
eṣa dāruvapurviṣṇuḥ sukhadātā subāṁdhavaḥ śrutismṛtyuktaniyamā vartaṁte neha pārthiva
यह काष्ठ-शरीरधारी विष्णु ही सुखदाता और सच्चा बंधु है; हे राजन्! यहाँ श्रुति-स्मृति में कहे गए नियम लागू नहीं होते।
श्लोक 15 (skanda.2.61.15)
यथा तथा दृष्टिपथमाचांडालाद्विमुक्तिदः । अभक्तश्चेदमुं पश्येद्गतानुगतिको नरः
yathā tathā dṛṣṭipathamācāṁḍālādvimuktidaḥ abhaktaścedamuṁ paśyedgatānugatiko naraḥ
जैसे भी हो, जिसकी दृष्टि इस पर पड़ जाए, वह चांडाल तक को भी मुक्ति देता है; बिना भक्ति के भी, केवल भीड़ का अनुसरण करने वाला मनुष्य यदि इसे देख ले,
श्लोक 16 (skanda.2.61.16)
अश्वमेधसहस्राणां फलं ह्यविकलं लभेत् । भजेच्चेन्नियमस्थो हि भक्तिमान्दृढमानसः
aśvamedhasahasrāṇāṁ phalaṁ hyavikalaṁ labhet bhajeccenniyamastho hi bhaktimāndṛḍhamānasaḥ
— तो निश्चय ही सहस्र अश्वमेध का पूर्ण फल पाता है। और यदि नियमपूर्ण, दृढ़चित्त, भक्तिमान मनुष्य उसे भजे,
श्लोक 17 (skanda.2.61.17)
असंशयं स सायुज्यं ब्रह्मणा लभते नरः । क्व दुःखायासबहुलमनायासविनश्वरम्
asaṁśayaṁ sa sāyujyaṁ brahmaṇā labhate naraḥ kva duḥkhāyāsabahulamanāyāsavinaśvaram
— तो वह निःसंदेह ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त करता है। कहाँ वह मार्ग, जो अत्यंत परिश्रम और दुःख से युक्त, अल्पकालिक,
श्लोक 18 (skanda.2.61.18)
अचिरस्थं क्षुद्रफलं पुनरावृत्तिलक्षणम् । क्वेदं दारुमयं ब्रह्म पापराशिदवानलम्
acirasthaṁ kṣudraphalaṁ punarāvṛttilakṣaṇam kvedaṁ dārumayaṁ brahma pāparāśidavānalam
— तुच्छ फल देने वाला और पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) के लक्षण वाला है? और कहाँ यह काष्ठमय ब्रह्म, जो पाप-राशि के लिए दावानल के समान है,
श्लोक 19 (skanda.2.61.19)
सच्चिदानंदकैवल्यमुक्तिदं दर्शनादपि । वेदानुवचनादीनि दुष्कराणि दुरात्मनाम्
saccidānaṁdakaivalyamuktidaṁ darśanādapi vedānuvacanādīni duṣkarāṇi durātmanām
— जो दर्शनमात्र से ही सच्चिदानंद-कैवल्य रूपी मुक्ति देता है? वेद के अनुशीलन आदि साधन दुरात्माओं के लिए अत्यंत कठिन हैं;
श्लोक 20 (skanda.2.61.20)
महात्मभिस्तैर्यत्प्राप्यं तदव्यग्रमयं ददेत् । अन्यक्षेत्रेषु भगवान्सुदूरो मर्त्यवासिनाम्
mahātmabhistairyatprāpyaṁ tadavyagramayaṁ dadet anyakṣetreṣu bhagavānsudūro martyavāsinām
— जो उन महात्माओं को (उन कठिन साधनों से) प्राप्य है, वही यह सहज ही प्रदान कर देता है। अन्य क्षेत्रों में भगवान् मरणशील प्राणियों से अत्यंत दूर रहते हैं,
श्लोक 21 (skanda.2.61.21)
स्वक्षेत्रेऽस्मिन्निवसति नित्यं मुक्तिप्रदो विभुः । अस्मादत्र महाभाग तिष्ठ स्वबलपौरुषः
svakṣetre'sminnivasati nityaṁ muktiprado vibhuḥ asmādatra mahābhāga tiṣṭha svabalapauruṣaḥ
— किंतु अपने इस क्षेत्र में वे सर्वव्यापी, मुक्तिदाता प्रभु सदा निवास करते हैं। इसलिए, हे महाभाग्यशाली! अपने बल-पौरुष के साथ यहीं स्थिर रहो,
श्लोक 22 (skanda.2.61.22)
विद्वत्तमोऽसि भक्तश्च सांगोपांगममुं भज
vidvattamo'si bhaktaśca sāṁgopāṁgamamuṁ bhaja
— क्योंकि तुम विद्वानों में श्रेष्ठ और भक्त हो; इनकी सांगोपांग आराधना करो।'
श्लोक 23 (skanda.2.61.23)
जैमिनिरुवाच । द्विजस्य तद्वचः श्रुत्वा नारदो हृष्टमानसः । साधूक्तं द्विजवर्येण श्रौतमार्गानुसारिणा
jaiminiruvāca dvijasya tadvacaḥ śrutvā nārado hṛṣṭamānasaḥ sādhūktaṁ dvijavaryeṇa śrautamārgānusāriṇā
जैमिनि ने कहा — उस द्विज के वचन सुनकर, प्रसन्नचित्त नारद ने कहा — 'श्रौत-मार्ग का अनुसरण करने वाले इस श्रेष्ठ द्विज ने अच्छा कहा।
श्लोक 24 (skanda.2.61.24)
सृष्ट्यादौ ब्रह्मनिश्वासैरभवद्वेदसंहतिः । तत्रोपनिषदर्थोऽयं सांप्रतं व्यक्तिमागतः
sṛṣṭyādau brahmaniśvāsairabhavadvedasaṁhatiḥ tatropaniṣadartho'yaṁ sāṁprataṁ vyaktimāgataḥ
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा के श्वासों से वेद-समूह उत्पन्न हुआ; उसमें निहित यह उपनिषदों का अर्थ अब प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुआ है।
श्लोक 25 (skanda.2.61.25)
वेत्त्येतदर्थं भगवान्पद्मयोनिः प्रजापतिः । अज्ञासिषं च भूपाल सांप्रतं तन्मुखादहम्
vettyetadarthaṁ bhagavānpadmayoniḥ prajāpatiḥ ajñāsiṣaṁ ca bhūpāla sāṁprataṁ tanmukhādaham
इस अर्थ को भगवान् पद्मयोनि प्रजापति ही जानते हैं; और मैंने भी, हे राजन्, अभी-अभी उन्हीं के मुख से यह जाना है।
श्लोक 26 (skanda.2.61.26)
तस्याज्ञया कृतं सर्वं यथाभिलषितं तव । एनमाराध्य तिष्ठात्र याम्यहं ब्रह्मणोंऽतिकम्
tasyājñayā kṛtaṁ sarvaṁ yathābhilaṣitaṁ tava enamārādhya tiṣṭhātra yāmyahaṁ brahmaṇoṁ'tikam
उन्हीं की आज्ञा से यह सब तुम्हारी इच्छानुसार सम्पन्न हुआ है। इसकी आराधना करते हुए यहीं ठहरो; मैं ब्रह्मा के समीप जाता हूँ —
श्लोक 27 (skanda.2.61.27)
कृतं निवेदयिष्यामि प्रकाशं च मुरद्विषः । प्रासादं कुरु भूपाल धनेन महता तथा
kṛtaṁ nivedayiṣyāmi prakāśaṁ ca muradviṣaḥ prāsādaṁ kuru bhūpāla dhanena mahatā tathā
— मैं यह किया हुआ कार्य और मुरारि का यह प्राकट्य उन्हें निवेदित करूँगा। हे राजन्! बड़े धन से प्रासाद का निर्माण करो,
श्लोक 28 (skanda.2.61.28)
प्रासादे नरसिंहं तु प्रतिष्ठाप्य विमुच्यसे
prāsāde narasiṁhaṁ tu pratiṣṭhāpya vimucyase
— और प्रासाद में नृसिंह को प्रतिष्ठित कर तुम मुक्त हो जाओगे।'
श्लोक 29 (skanda.2.61.29)
जैमिनिरुवाच । तच्छ्रुत्वा स तु भूमींद्रः प्रत्युवाच मुनिं तदा । महर्षेऽहं त्वया सार्द्धं यियासुर्ब्रह्मणोंऽतिकम्
jaiminiruvāca tacchrutvā sa tu bhūmīṁdraḥ pratyuvāca muniṁ tadā maharṣe'haṁ tvayā sārddhaṁ yiyāsurbrahmaṇoṁ'tikam
जैमिनि ने कहा — यह सुनकर उस भूमींद्र ने तब मुनि से कहा — 'हे महर्षे! मैं भी आपके साथ ब्रह्मा के समीप जाना चाहता हूँ,
श्लोक 30 (skanda.2.61.30)
यत्प्रसादाज्जगन्नाथश्चकेऽयं लोचनातिथिः । निवेद्य तं च प्रासादं प्रतिष्ठार्थं मुरद्विषः
yatprasādājjagannāthaścake'yaṁ locanātithiḥ nivedya taṁ ca prāsādaṁ pratiṣṭhārthaṁ muradviṣaḥ
— जिनकी कृपा से यह जगन्नाथ मेरे नेत्रों के अतिथि बने हैं। उस मुरारि की प्रतिष्ठा के लिए बनने वाले उस प्रासाद का निवेदन कर,
श्लोक 31 (skanda.2.61.31)
विज्ञापयिष्ये सान्निध्ये प्रासादस्थापनोत्सवम् । यथा स्वयं समागम्य ब्रह्मलोकात्पितामहः
vijñāpayiṣye sānnidhye prāsādasthāpanotsavam yathā svayaṁ samāgamya brahmalokātpitāmahaḥ
— मैं उन्हीं के समक्ष प्रासाद-स्थापना के उत्सव के लिए प्रार्थना करूँगा, जिससे स्वयं पितामह ब्रह्मलोक से पधारकर
श्लोक 32 (skanda.2.61.32)
महोत्सवं भगवतः प्रासादेऽत्र करिष्यति । तन्मुने मामपि विधेः संनिधिं प्रापयस्व च
mahotsavaṁ bhagavataḥ prāsāde'tra kariṣyati tanmune māmapi vidheḥ saṁnidhiṁ prāpayasva ca
— यहाँ भगवान् के प्रासाद में महोत्सव करेंगे। अतः, हे मुनि! मुझे भी विधाता की संनिधि तक पहुँचा दो।'
श्लोक 33 (skanda.2.61.33)
गर्भप्रतिष्ठां प्रासादे समाप्येह स्थितो मुने । पश्चादावां गमिष्यावः कंचित्कालं प्रतीक्ष मे
garbhapratiṣṭhāṁ prāsāde samāpyeha sthito mune paścādāvāṁ gamiṣyāvaḥ kaṁcitkālaṁ pratīkṣa me
'प्रासाद में गर्भ-प्रतिष्ठा पूर्ण होने तक, हे राजन्, यहीं ठहरो; उसके पश्चात् हम दोनों जाएँगे — कुछ समय मेरी प्रतीक्षा करो।'
श्लोक 34 (skanda.2.61.34)
ततः स नृपतिः सर्वाञ्छिल्पशास्त्रविशारदान् । पाषाणखंडघटनाकर्मण्येकैकयोगतः
tataḥ sa nṛpatiḥ sarvāñchilpaśāstraviśāradān pāṣāṇakhaṁḍaghaṭanākarmaṇyekaikayogataḥ
तब उस राजा ने शिल्पशास्त्र में निपुण सभी लोगों को, पत्थर के खंडों को गढ़ने के कार्य में, एक-एक कर,
श्लोक 35 (skanda.2.61.35)
सत्कारैर्दानमानैश्च योजयामास सादरम् । दिने दिने सुघटितः प्रासादो ववृधे द्विजाः
satkārairdānamānaiśca yojayāmāsa sādaram dine dine sughaṭitaḥ prāsādo vavṛdhe dvijāḥ
— सत्कार, दान और सम्मान से आदरपूर्वक नियुक्त किया। दिन-प्रतिदिन सुंदर ढंग से बना वह प्रासाद बढ़ता गया, हे द्विजो,
श्लोक 36 (skanda.2.61.36)
परितः पूर्यमाणस्तु शुक्लपक्षे यथा शशी । एवं संवर्ध्यमानोऽपि प्रासादः परिवर्द्धितः
paritaḥ pūryamāṇastu śuklapakṣe yathā śaśī evaṁ saṁvardhyamāno'pi prāsādaḥ parivarddhitaḥ
— चारों ओर से भरता हुआ, जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा भरता है; इस प्रकार निरंतर बढ़ता हुआ वह प्रासाद वृद्धि को प्राप्त होता गया,
श्लोक 37 (skanda.2.61.37)
महोच्छ्रयत्वादल्पेन न कालेनाभिलक्ष्यते । पाषाणसंख्या शक्या वा कथंचिद्घटनाक्रमात्
mahocchrayatvādalpena na kālenābhilakṣyate pāṣāṇasaṁkhyā śakyā vā kathaṁcidghaṭanākramāt
— किंतु उसकी अत्यंत ऊँचाई के कारण अल्प समय में यह वृद्धि लक्षित नहीं होती थी। पत्थरों की गिनती तो निर्माण-क्रम से किसी प्रकार संभव हो सकती थी,
श्लोक 38 (skanda.2.61.38)
वित्तव्ययस्तु कोटीनां न संख्यातुं च शक्यते । यावन्तो भारते वर्षे लोकाः समयवर्तिनः
vittavyayastu koṭīnāṁ na saṁkhyātuṁ ca śakyate yāvanto bhārate varṣe lokāḥ samayavartinaḥ
— किंतु करोड़ों में हुए धन-व्यय की गणना नहीं की जा सकती थी। उस समय भारतवर्ष में जितने भी लोग विद्यमान थे,
श्लोक 39 (skanda.2.61.39)
इन्द्रद्युम्नस्य नृपतेर्नियुक्तास्ते महीभृतः । एकैकशो नियुक्ता ये परस्परसमन्विताः
indradyumnasya nṛpaterniyuktāste mahībhṛtaḥ ekaikaśo niyuktā ye parasparasamanvitāḥ
— राजा इंद्रद्युम्न द्वारा नियुक्त हुए, एक-एक कर, परस्पर संबद्ध होकर नियुक्त किए गए,
श्लोक 40 (skanda.2.61.40)
तेऽपि चान्यैर्नियुक्तास्ते सर्वे तत्र प्रवर्तिताः । अजस्रं तन्नियुक्तानां यो हर्षोत्थो महारवः
te'pi cānyairniyuktāste sarve tatra pravartitāḥ ajasraṁ tanniyuktānāṁ yo harṣottho mahāravaḥ
— और उन्होंने भी औरों को नियुक्त किया; वे सब वहाँ कार्य में लग गए। उन नियुक्त लोगों का निरंतर उठने वाला वह महान हर्षनाद,
श्लोक 41 (skanda.2.61.41)
आकाशमश्नुवानोऽसौ दिशां भागानपूरयत् । नृपतेः श्रद्धया भक्त्या सात्त्विकेन प्रसादिता
ākāśamaśnuvāno'sau diśāṁ bhāgānapūrayat nṛpateḥ śraddhayā bhaktyā sāttvikena prasāditā
— आकाश को व्याप्त करता हुआ दिशाओं के भागों को भर देता था। राजा की श्रद्धा और भक्ति से, सात्त्विक भाव से प्रसन्न हुई,
श्लोक 42 (skanda.2.61.42)
श्रीः समृद्धाभवद्विप्राः कीर्त्या सह महीपतेः । क्वचित्कांचनविन्यस्तनानारत्नमहोज्ज्वलः
śrīḥ samṛddhābhavadviprāḥ kīrtyā saha mahīpateḥ kvacitkāṁcanavinyastanānāratnamahojjvalaḥ
श्री, राजा की कीर्ति के साथ-साथ, हे द्विजो, समृद्ध होती गई। कहीं सोने में जड़े नाना रत्नों से अत्यंत उज्ज्वल,
श्लोक 43 (skanda.2.61.43)
क्वचित्स्फटिकभागांतशारदाभ्रनिभच्छविः । क्वचिन्नीलाश्मघटिता भित्तिः कालाभ्रमेदुरा
kvacitsphaṭikabhāgāṁtaśāradābhranibhacchaviḥ kvacinnīlāśmaghaṭitā bhittiḥ kālābhramedurā
कहीं स्फटिक के भाग के छोर पर शरद-मेघ के समान कांति वाली, कहीं नीले पत्थर से बनी दीवार वर्षा-मेघ के समान सघन।
श्लोक 44 (skanda.2.61.44)
एवं सुघटिते विष्णोः प्रासादे सुमनोहरे । गर्भप्रतिष्ठां विधिवत्कृत्वा स नृपसत्तमः
evaṁ sughaṭite viṣṇoḥ prāsāde sumanohare garbhapratiṣṭhāṁ vidhivatkṛtvā sa nṛpasattamaḥ
इस प्रकार विष्णु का वह अत्यंत मनोहर प्रासाद जब सुंदर ढंग से बन गया, तब उस श्रेष्ठ राजा ने विधिपूर्वक गर्भ-प्रतिष्ठा कर,
श्लोक 45 (skanda.2.61.45)
वज्रपातादिभंगादिवारणार्थं यथोचितम् । शिल्पशास्त्रेषु मण्यादि विन्यस्य पौरुषाहृतम्
vajrapātādibhaṁgādivāraṇārthaṁ yathocitam śilpaśāstreṣu maṇyādi vinyasya pauruṣāhṛtam
— वज्रपात आदि से होने वाले विनाश को रोकने के लिए, यथोचित रूप से, शिल्पशास्त्रों में बताए मणि आदि, पुरुषार्थ से लाकर, स्थापित किए;
श्लोक 46 (skanda.2.61.46)
पुनः प्रासादघटनासंभारोचितमेव वै । बहुमूल्यं वस्तुजातं यत्नात्तत्र न्यवेशयत्
punaḥ prāsādaghaṭanāsaṁbhārocitameva vai bahumūlyaṁ vastujātaṁ yatnāttatra nyaveśayat
— और पुनः प्रासाद-निर्माण की सामग्री के अनुकूल जो भी बहुमूल्य वस्तुएँ थीं, उन्हें भी उन्होंने यत्नपूर्वक वहाँ स्थापित किया।
श्लोक 47 (skanda.2.61.47)
ततो विरच्यमानेऽस्मिन्प्रासादे कीर्तिवर्द्धने । मनसापि न संभाव्ये त्रिषु लोकेषु भूभुजाम्
tato viracyamāne'sminprāsāde kīrtivarddhane manasāpi na saṁbhāvye triṣu lokeṣu bhūbhujām
इस प्रकार जब यह कीर्ति बढ़ाने वाला प्रासाद बनाया जा रहा था — जो तीनों लोकों के राजाओं के लिए मन से भी असंभाव्य था —
श्लोक 48 (skanda.2.61.48)
देवानामपि नो लक्ष्ये द्विजाः कल्पांतवासिनाम् । प्रासाद ईदृशो भूमौ क्वचिच्च घटितो न हि
devānāmapi no lakṣye dvijāḥ kalpāṁtavāsinām prāsāda īdṛśo bhūmau kvacicca ghaṭito na hi
— जो कल्पांत तक निवास करने वाले देवताओं की दृष्टि में भी नहीं आता था, हे द्विजो — ऐसा प्रासाद पृथ्वी पर कहीं भी कभी नहीं बना था।
श्लोक 49 (skanda.2.61.49)
स्वर्गे वा इत्थमादित्या आलपंति परस्परम्। अहो सुबुद्धिरस्योच्चैर्येयमीदृक्परीणता
svarge vā itthamādityā ālapaṁti parasparam aho subuddhirasyoccairyeyamīdṛkparīṇatā
स्वर्ग में भी आदित्यगण परस्पर इस प्रकार बात करते थे — 'अहो! इसकी सुबुद्धि कितनी उच्च है, जो इस प्रकार परिणत हुई है!'
श्लोक 50 (skanda.2.61.50)
श्रद्धया भगवत्पादपद्मयोः साभिलाषिणी । अलौकिकानि कर्माणि पश्यंति हि रचंत्यपि
śraddhayā bhagavatpādapadmayoḥ sābhilāṣiṇī alaukikāni karmāṇi paśyaṁti hi racaṁtyapi
श्रद्धा से युक्त, भगवान् के चरण-कमलों की अभिलाषा रखने वाले लोग ही अलौकिक कर्मों को न केवल देखते हैं, बल्कि उन्हें स्वयं भी रचते हैं।
श्लोक 51 (skanda.2.61.51)
के वात्र भूमौ राजानो बभूवुर्नीतिशालिनः । सार्वभौमास्तु साम्राज्यजेतारः सर्वविद्विषाम्
ke vātra bhūmau rājāno babhūvurnītiśālinaḥ sārvabhaumāstu sāmrājyajetāraḥ sarvavidviṣām
'भला इस पृथ्वी पर नीति-कुशल, सार्वभौम, समस्त शत्रुओं के साम्राज्य के विजेता ऐसे कौन से राजा हुए हैं,
श्लोक 52 (skanda.2.61.52)
वित्तानि यैः संचितानि सुबहूनि च कोटिशः । अश्वमेधसहस्रं तु यत्कृतं त्रिदिवेशितुः
vittāni yaiḥ saṁcitāni subahūni ca koṭiśaḥ aśvamedhasahasraṁ tu yatkṛtaṁ tridiveśituḥ
— जिन्होंने करोड़ों की संख्या में इतना विपुल धन संचित किया हो? और स्वर्ग के स्वामी (इंद्र) के लिए किया गया वह सहस्र अश्वमेध यज्ञ —
श्लोक 53 (skanda.2.61.53)
शक्यं वा स्याद्भूभुजां तु नातः पूर्वमनुष्ठितम्। न दृष्टं न श्रुतं वापि वाजिमेधसहस्रकम्
śakyaṁ vā syādbhūbhujāṁ tu nātaḥ pūrvamanuṣṭhitam na dṛṣṭaṁ na śrutaṁ vāpi vājimedhasahasrakam
— क्या अन्य राजाओं के लिए संभव हो सकता है? यह इससे पहले कभी नहीं किया गया; ऐसा सहस्र अश्वमेध न कभी देखा गया, न सुना गया,
श्लोक 54 (skanda.2.61.54)
महीक्षितानुष्ठितं वै यत्र त्रैलोक्य वासिनः। पृथिव्यामस्य नृपतेः सहस्था भोगभोगिनः
mahīkṣitānuṣṭhitaṁ vai yatra trailokya vāsinaḥ pṛthivyāmasya nṛpateḥ sahasthā bhogabhoginaḥ
— जो किसी राजा द्वारा संपन्न हुआ हो और जिसमें त्रैलोक्य के निवासी उपस्थित रहे हों। इस राजा के साथ पृथ्वी पर, समस्त भोगों को भोगते हुए त्रैलोक्यवासी रहते थे;
श्लोक 55 (skanda.2.61.55)
ब्रह्मलोक इवाभाति सभ यस्य च यज्विनः। मूर्तिमंतस्त्रयो वेदाश्चतुष्पादो वृषस्तथा
brahmaloka ivābhāti sabha yasya ca yajvinaḥ mūrtimaṁtastrayo vedāścatuṣpādo vṛṣastathā
— जिसकी यज्ञ-सभा ब्रह्मलोक के समान शोभित होती थी, जहाँ तीनों वेद और चतुष्पाद धर्म साक्षात् मूर्तिमान थे,
श्लोक 56 (skanda.2.61.56)
सुराः संकल्पकामास्तु यत्राद्भुतधियोऽभवन् । अयं प्रासादवर्यो वै बुद्धेर्विषयतां गतः
surāḥ saṁkalpakāmāstu yatrādbhutadhiyo'bhavan ayaṁ prāsādavaryo vai buddherviṣayatāṁ gataḥ
— जहाँ देवगण, अपनी समस्त कामनाएँ पूर्ण हुई देखकर, विस्मित बुद्धि वाले हो गए। यह श्रेष्ठ प्रासाद तो सचमुच बुद्धि के विषय से भी परे चला गया है —
श्लोक 57 (skanda.2.61.57)
मनोऽपि यत्र भवति न वा त्रैलोक्यवासिनाम् । भूपतेर्दुर्लभं किं स्यात्सहायो यस्य नारदः
mano'pi yatra bhavati na vā trailokyavāsinām bhūpaterdurlabhaṁ kiṁ syātsahāyo yasya nāradaḥ
— जहाँ त्रैलोक्यवासियों का मन भी नहीं पहुँच पाता। भला उस राजा के लिए क्या दुर्लभ हो सकता है, जिसका सहायक नारद हो,
श्लोक 58 (skanda.2.61.58)
पितामहश्च जगतां स्रष्टा सर्वामरेश्वरः । अथवा विष्णुभक्तस्य नातिदूरं चिकीर्षितम्
pitāmahaśca jagatāṁ sraṣṭā sarvāmareśvaraḥ athavā viṣṇubhaktasya nātidūraṁ cikīrṣitam
— और जगत् के स्रष्टा, समस्त देवताओं के ईश्वर, पितामह हों? अथवा विष्णु-भक्त के लिए कुछ भी संकल्पित कार्य दूर नहीं है —
श्लोक 59 (skanda.2.61.59)
विष्णोस्तद्भक्तलोकस्य नांतरं विद्यते द्विजः । ततः स नारदं प्राह प्रासादांते मुनीश्वरम्
viṣṇostadbhaktalokasya nāṁtaraṁ vidyate dvijaḥ tataḥ sa nāradaṁ prāha prāsādāṁte munīśvaram
— क्योंकि विष्णु और उनके भक्तजनों के बीच, हे द्विज, वस्तुतः कोई भेद नहीं है।' तब प्रासाद-निर्माण की समाप्ति पर उसने मुनीश्वर नारद से कहा —
श्लोक 60 (skanda.2.61.60)
सर्वं सपन्नमासीन्मे यदशक्यं सुरासुरैः । साक्षाद्भगवतो विष्णोरद्वैतोपासनारतः
sarvaṁ sapannamāsīnme yadaśakyaṁ surāsuraiḥ sākṣādbhagavato viṣṇoradvaitopāsanārataḥ
'देवताओं और असुरों के लिए भी जो असंभव था, वह सब मुझ — साक्षात् भगवान् विष्णु की अद्वैत उपासना में रत — के लिए संपन्न हो गया;
श्लोक 61 (skanda.2.61.61)
भगवद्वपुराभाषि प्रासादस्तु चिरं मयि । इत्युक्त्वा पादयोर्मूर्ध्ना प्रणनाम स नारदम्
bhagavadvapurābhāṣi prāsādastu ciraṁ mayi ityuktvā pādayormūrdhnā praṇanāma sa nāradam
— भगवान् का शरीर ही मेरे माध्यम से इस चिरस्थायी प्रासाद के रूप में प्रकट हुआ है।' यह कहकर उसने नारद के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।
श्लोक 62 (skanda.2.61.62)
नारदोऽपि तमुत्थाप्य परिपूज्य नृपोत्तमम्। त्वत्तो न भेदो नृपते ममास्ति खलु तत्त्वतः
nārado'pi tamutthāpya paripūjya nṛpottamam tvatto na bhedo nṛpate mamāsti khalu tattvataḥ
नारद ने भी उस श्रेष्ठ राजा को उठाकर, भलीभाँति सम्मानित कर कहा — 'हे राजन्! सच तो यह है कि तुझमें और मुझमें कोई भेद नहीं है।
श्लोक 63 (skanda.2.61.63)
यस्तु साक्षाज्जगन्नाथ आविर्भूतः कृतेन वा। अवश्यमर्चयस्वैनं जीवन्मुक्तोऽसि सांप्रतम्
yastu sākṣājjagannātha āvirbhūtaḥ kṛtena vā avaśyamarcayasvainaṁ jīvanmukto'si sāṁpratam
जो साक्षात् जगन्नाथ, चाहे तुम्हारे कर्म से या स्वयं की कृपा से, प्रकट हुए हैं, उनकी अवश्य ही आराधना करो; तुम अभी से ही जीवन्मुक्त हो।
श्लोक 64 (skanda.2.61.64)
तत्पादपद्मे यादृक्ते चेतः प्रवणतान्वितम्। भक्त्या ह्यनन्यया पुंसः किमतः परमस्ति वै
tatpādapadme yādṛkte cetaḥ pravaṇatānvitam bhaktyā hyananyayā puṁsaḥ kimataḥ paramasti vai
उनके चरण-कमलों के प्रति तुम्हारा जैसा हृदय झुका हुआ है, उस अनन्य भक्ति से युक्त पुरुष के लिए इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?
श्लोक 65 (skanda.2.61.65)
तीर्थैर्मंत्रैर्जपैर्दानैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः। व्रतैरध्ययनैर्भूप तपोभिश्च यदर्जितुम्
tīrthairmaṁtrairjapairdānaiḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ vratairadhyayanairbhūpa tapobhiśca yadarjitum
तीर्थों, मंत्रों, जप, दान, बहुमूल्य दक्षिणाओं वाले यज्ञों, व्रतों, अध्ययन और तपस्याओं से, हे राजन्, जो कुछ अर्जित करने योग्य है,
श्लोक 66 (skanda.2.61.66)
न शक्यं तव राजेन्द्र भक्त्या तत्करमागतम् । अतः परं न शोचस्व भक्तियोगे नमोऽस्तु ते
na śakyaṁ tava rājendra bhaktyā tatkaramāgatam ataḥ paraṁ na śocasva bhaktiyoge namo'stu te
— वह सब, हे राजेंद्र, अकेली भक्ति से तुम्हारे हाथ में आ चुका है। अतः अब और शोक मत करो; भक्ति-योग में स्थित तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 67 (skanda.2.61.67)
प्रकर्षं बहुराजेंद्र स्थित्वा चास्मिंश्चिरं भुवि । आराधय जगन्नाथमुपचारैर्महोत्सवैः
prakarṣaṁ bahurājeṁdra sthitvā cāsmiṁściraṁ bhuvi ārādhaya jagannāthamupacārairmahotsavaiḥ
हे महाराजेंद्र! इस पृथ्वी पर दीर्घकाल तक उच्च गौरव के साथ रहकर, उपचारों और महोत्सवों द्वारा जगन्नाथ की आराधना करते रहो।
श्लोक 68 (skanda.2.61.68)
पितामहं द्रष्टुकामो गंता चेदंतिकं विभोः । उपदेक्ष्यति सोऽप्यस्य यात्रास्तास्ता महोत्सवाः
pitāmahaṁ draṣṭukāmo gaṁtā cedaṁtikaṁ vibhoḥ upadekṣyati so'pyasya yātrāstāstā mahotsavāḥ
यदि तुम पितामह के दर्शन की इच्छा से उनके समीप जाओगे, तो वे भी तुम्हें इन विविध यात्रा-महोत्सवों की शिक्षा देंगे।
श्लोक 69 (skanda.2.61.69)
स्वयं च भगवानेव वरं तुभ्यं प्रदास्यति । प्रतिष्ठापिते प्रासादे तस्मिन्काले स्वयंभुवा
svayaṁ ca bhagavāneva varaṁ tubhyaṁ pradāsyati pratiṣṭhāpite prāsāde tasminkāle svayaṁbhuvā
और जब उस प्रासाद की स्वयं ब्रह्मा के हाथों प्रतिष्ठा होगी, उस समय स्वयं भगवान् भी तुम्हें वर प्रदान करेंगे —
श्लोक 70 (skanda.2.61.70)
अहमप्यागमिष्यामि तदा सप्तर्षिभिः सह । तदावां तत्र गच्छावो ब्रह्मलोकमकल्मषम्
ahamapyāgamiṣyāmi tadā saptarṣibhiḥ saha tadāvāṁ tatra gacchāvo brahmalokamakalmaṣam
— मैं भी उस समय सप्तर्षियों के साथ आऊँगा; तब हम दोनों वहाँ, उस निष्पाप ब्रह्मलोक को, जाएँगे।
श्लोक 71 (skanda.2.61.71)
त्वां विना भुवि कः शक्तो ब्रह्मलोकगतिं प्रति । इत्युक्त्वा नारदो भूपं समुत्तस्थौ नभस्तलम्
tvāṁ vinā bhuvi kaḥ śakto brahmalokagatiṁ prati ityuktvā nārado bhūpaṁ samuttasthau nabhastalam
तुम्हारे बिना, इस पृथ्वी पर ब्रह्मलोक-गमन के योग्य और कौन है?' यह कहकर नारद राजा के सामने से आकाश-मंडल में उठ गए।